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Sunday, February 21, 2010

आंसू तो नहीं है आँखों में....तलत के स्वरों में एक और ग़मज़दा नगमा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 352/2010/52

'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़'। तलत महमूद साहब के गाए १० बेमिसाल ग़ज़लों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस ख़ास पेशकश की दूसरी महफ़िल में आप सभी का स्वागत है। इससे पहले कि आज की ग़ज़ल का ज़िक्र करें, आइए आज तलत महमूद साहब के शुरुआती दिनों का हाल ज़रा आपको बताया जाए। २४ फ़रवरी १९२४ को लखनऊ में मंज़ूर महमूद के घर जन्मे तलत कुंदन लाल सहगल के ज़बरदस्त फ़ैन बने। बदक़िस्मती से उनके घर में संगीत का कोई वातावरण नहीं था, बल्कि उनके पिताजी तो संगीत के पूरी तरह से ख़िलाफ़ थे। उनकी मौसी के अनुरोध पर तलत के पिता ने उन्हे लखनऊ के मॊरिस कॊलेज से एक छोटा सा म्युज़िक का कोर्स करने की अनुमती दे दी। वहीं पर तलत महमूद ने ग़ज़लें गानी शुरु की। १६ वर्ष की आयु में तलत ऑल इंडिया रेडियो के लखनऊ केन्द्र में ग़ालिब, दाग़ और जिगर की ग़ज़लें गाया करते थे। एच. एम. वी ने उनकी आवाज़ सुनी और सन् १९४१ में उनका पहला ग्रामोफ़ोन रिकार्ड जारी किया। उसमे एक गीत था "सब दिन एक समान नहीं था, बन जाउँगा क्या से क्या मैं, इसका तो कुछ ध्यान नहीं था"। दोस्तों, इस गीत के ये बोल उनके लिए सच साबित हुई और कुछ नहीं से तलत महमूद बन गए फ़िल्म जगत के पहली श्रेणी के पार्श्वगायक। तलत साहब इतने हैंडसम थे कि कई फ़िल्मों में उन्होने बतौर हीरो काम किया। इसे भाग्य का खेल ही कहिए कि उनके अभिनय से सजी फ़िल्में हिट नहीं हुई और एक समय के बाद उन्होने केवल गायन में ही अपना पूरा ध्यान लगाने की ठान ली। अभिनय में भले उनको कामयाबी न मिली हो, लेकिन गायन में उन्होने वो मुकाम हासिल किया जिस मुकाम के लिए हर गायक तरसता है। तलत साहब के जीवन की आगे की दास्तान कल की कड़ी में जारी रहेगी, फिलहाल हम बढते हैं आज के गज़ल की तरफ।

आज हम आपको सुनवाने के लिए लाए हैं १९५३ की फ़िल्म 'दायरा' से एक ग़ज़ल जिसे लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने और स्वरबद्ध किया है कमचर्चित संगीतकार जमाल सेन ने। जमाल सेन मास्टर ग़ुलाम हैदर के सहायक हुआ करते थे, जिन्होने स्वतंत्र रूप से संगीत देना शुरु किया हैदर साहब के पाकिस्तान चले जाने के बाद। उनके संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी 'शोख़ियाँ' (१९५१)। 'दायरा' कमाल अमरोही की फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे मीना कुमारी और कमाल साहब ख़ुद। यह इन दोनों की साथ में पहली फ़िल्म थी और आपको पता ही होगा कि आगे चलकर इन्होने शादी कर ली थी। 'दायरा' का संगीत काफ़ी सराहा गया था। ख़ास कर रफ़ी साहब और मुबारक़ बेग़म का गाया "देवता तुम हो मेरा सहारा" गीत तो आज भी जमाल सेन और मुबारक़ बेग़म के श्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है। जहाँ तक तलत साहब के गाए गीतों का सवाल है, इस फ़िल्म में उनके दो गानें सराहे गए, एक था "आ भी जा मेरी दुनिया में कोई नहीं, बिन तेरे कब तलक युंही घबराए दिल" और दूसरा गाना, या ग़ज़ल कह लीजिए, "आंसू तो नहीं है आँखों में पहलू में मगर दिल जलता है, होठों पे लहू है हसरत का आरा सा जिगर पर चलता है"। आज इसी ग़ज़ल की बारी है इस महफ़िल में। दोस्तों, यु तो तलत साहब ने हल्के फुल्के रोमांटिक गीत भी बहुत सारे गाए हैं जैसे कि "तुम तो दिल के तार छेड़ कर हो गए बेख़बर", "तेरे रास्तों पे हम ने एक घर बना लिया है", "तुमही तो मेरी मंज़िल हो", "मेरे जीवन में आया है कौन", "मिलते ही आँखें दिल हुआ दीवाना किसी का", "तेरी चमकती आँखों के आगे ये चमकते सितारे कुछ भी नहीं", "हाये आँखों में मस्ती शराब की" वगेरह वगेरह; लेकिन इस मख़मली आवाज़ के जादूगर के गाए दर्द भरे गीतों का कोई जवाब नहीं है। कल की तरह आज की ग़ज़ल भी ग़मज़दा है। तलत साहब ने ख़ुद ही एक बार कहा था कि "आज भी लोग ख़ास वजह से मेरे गीतों को पसंद करते हैं, मैंने आज भी वही स्टाइल रखा हुआ है, मुझे ख़ुशी है कि लोग मुझे पसंद करते हैं।" तो चलिए दोस्तों, हम तलत साहब की उसी स्टाइल का एक और नमूना आज सुनते हैं और महसूस करते हैं, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के चार शेर।

आंसू तो नहीं है आँखों में पहलू में मगर दिल जलता है,
होठों पे लहू है हसरत का आरा सा जिगर पर चलता है।

जाग उठता है जब ग़म क्या कहिए, उस वक़्त का आलम क्या कहिये,
ठुकरा गए धीरे धीरे जब कोई कलेजा मलता है।

ऐ दर्द-ए-जिगर ये बात है क्या, ये आख़िरी अपनी रात है क्या,
होती है कसक हर धड़कन में हर सांस में ख़ंजर चलता है।

हम हार गए ऐसे ग़म से, देखा ही नहीं जाता हम से,
जलता है पतंगा जब कोई पर शमा का आंसू ढ़लता है।



क्या आप जानते हैं...
- कि तलत महमूद साहब के सुपुत्र ख़ालिद महमूद, जो ख़ुद भी एक गायक हैं, अपने पिता के करीब करीब ७०० दुर्लभ तस्वीरों को www.talatmahmood.com पर सहेज कर रखा है। कभी पधारिएगा ज़रूर इस जाल स्थल पर।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. तलत की गाई इस ग़ज़ल का सबसे पहला शब्द है- "जिंदगी", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. जसवंत राय था इस ग़ज़ल के गीतकार का नाम, ये इंडस्ट्री में किस नाम से जाने जाते हैं- २ अंक.
3. कौन हैं इस ग़ज़ल के संगीतकार - २ अंक.
4. इस फिल्म में तलत साहब ने अभिनय भी किया, फिल्म का नाम- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
अरे इंदु जी आपका जवाब इतनी देर में आया कि हम देख ही नहीं पाए, बिलकुल आपके ३ अंक एकदम पक्के. कल तो नीलम जी गच्चा खा गयीं. शरद जी सही गीत पहचान कर ३ अंक कमाए तो इंदु जी ने आखिरी सवाल का सही जवाब देकर २ अंक चुरा लिए...बधाई
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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