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बुधवार, 19 मई 2010

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं.. मेहदी साहब के सुपुत्र ने कुछ इस तरह उभारा फ़राज़ की ख्वाहिशों को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८४

पाकिस्तान से खबर है कि अस्वस्थ होने के बावजूद मेहदी हसन एक बार फिर अपनी जन्मभूमि पर आना चाहते हैं। राजस्थान के शेखावटी अंचल में झुंझुनूं जिले के लूणा गांव की हवा में आज भी मेहदी हसन की खुशबू तैरती है। देश विभाजन के बाद लगभग २० वर्ष की उम्र में वे लूणा गांव से उखड़ कर पाकिस्तान चले गये थे, लेकिन इस गांव की यादें आज तक उनका पीछा करती हैं। वक्त के साथ उनके ज्यादातर संगी-साथी भी अब इस दुनिया को छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन गांव के दरख्तों, कुओं की मुंडेरों और खेतों में उनकी महक आज भी महसूस की जा सकती है।

छूटी हुई जन्मस्थली की मिट्टी से किसी इंसान को कितना प्यार हो सकता है, इसे १९७७ के उन दिनों में झांक कर देखा जा सकता है, जब मेहदी हसन पाकिस्तान जाने के बाद पहली बार लूणा आये और यहां की मिट्टी में लोट-पोट हो कर रोने लगे। उस समय जयपुर में गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे सरकारी मेहमान बन कर जयपुर आये थे और उनकी इच्छा पर उन्हें लूणा गांव ले जाया गया था। कारों का काफिला जब गांव की ओर बढ़ रहा था, तो रास्ते में उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। काफिला थम गया। सड़क किनारे एक टीले पर छोटा-सा मंदिर था, जहां रेत में लोटपोट हो कर वे पलटियां खाने लगे और रोना शुरू कर दिया। कोई सोच नहीं सकता था कि धरती माता से ऐसे मिला जा सकता है। ऐसा लग रहा था, जैसे वे मां की गोद में लिपट कर रो रहे हों।इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं, ‘वह भावुक कर देने वाला अदभुत दृश्य था। मेहदी हसन का बेटा भी उस समय उनके साथ था। वह घबरा गया कि वालिद साहब को यह क्या हो गया? हमने उनसे कहा कि धैर्य रखें, कुछ नहीं होगा। धीरे-धीरे वह शांत हो गये। बाद में उन्होंने बताया कि यहां बैठ कर वे भजन गया करते थे।’ मेहदी हसन ने तब यह भी बताया था कि पाकिस्तान में अब भी उनके परिवार में सब लोग शेखावटी में बोलते हैं। शेखावटी की धरती उन्हें अपनी ओर खींचती है।

मेहदी हसन के साथ इस यात्रा में आये उनके बेटे आसिफ मेहदी भी अब पाकिस्तान में गजल गाते हैं और बाप-बेटे का एक साझा अलबम भी है – “दिल जो रोता है’।


उपरोक्त पंक्तियाँ हमने "ईश मधु तलवार" से उधार ली हैं। ऐसा करने के हमारे पास दो कारण थे। पहला यह कि उम्र के जिस पड़ाव पर मेहदी साहब आज खड़े हैं, वहाँ से वापस लौटना या फिर पीछे मुड़कर देखना अब नामुमकिन-सा दिख पड़ता है, इसलिए हमारा कर्त्तव्य बनता है कि किसी भी बहाने मेहदी साहब को याद किया जाए और याद रखा जाए। रही बात दूसरे कारण की तो हमारी आज की महफ़िल जिस गज़ल के सहारे बन-संवरकर तैयार हुई है, उसे अपनी आवाज़ से तरोताज़ा करने वाले और कोई नहीं इन्हीं मेहदी साहब के सुपुत्र आसिफ मेहदी हैं(इनका ज़िक्र ऊपर भी आया है)। मुझे पक्का यकीन है कि आसिफ मेहदी के बारे में बहुत हीं कम लोगों को जानकारी होगी। तो हम हीं कुछ बताए देते हैं। आसिफ ने अपने अब्बाजान और अपने एक रिश्तेदार ग़ुलाम क़ादिर की देखरेख में महज १३ साल की उम्र में गाने की शुरूआत कर दी थी। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम १९८३ में लास एंजिल्स में दिया था, जहाँ पर इनके साथ मेहदी साहब भी थे। कहते हैं कि मेहदी साहब ने इन्हें बीच में हीं रोककर गाने से मना कर दिया था और कहा था कि इनकी आवाज़ औरतों जैसी जान पड़ रही है, इसलिए जब तक ये मर्दाना आवाज़ में नहीं गाते, तब तक इन्हें सर-ए-महफ़िल गाना नहीं चाहिए। अब्बाजान की डाँट का आसिफ की गायिकी पर क्या असर हुआ, यह कहने की कोई ज़रूरत नहीं। १९९९ में मिला "निगार अवार्ड" उनकी प्रतिभा का जीता-जागता नमूना है। पाकिस्तान की ६० से भी ज्यादा फिल्मों में गा चुके आसिफ अब हिन्दुस्तानी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं। साथ हीं साथ आसिफ आजकल के युवाओं के बीच गज़लों की घटती लोकप्रियता से भी खासे चिंतित प्रतीत होते हैं। इन दोनों मुद्दों पर उनके विचार कुछ इस प्रकार हैं:

पाकिस्तानी गजल गायक आसिफ मेहदी कहते हैं कि युवा श्रोताओं के गजलों से दूर होने के लिए मीडिया जिम्मेदार है। प्रख्यात गजल गायक मेहदी हसन के बेटे मेहदी ने एस साक्षात्कार में आईएएनएस से कहा, "मीडिया जोर-शोर से पॉप संगीत को प्रोत्साहित कर रही है और इसे वह कुछ ऐसे रूप में प्रस्तुत कर रही है कि युवा इसे सुनने के अलावा और कुछ महसूस ही न कर सकें।" मेहदी ने कहा, "मैं अपनी ओर से गजलों को उनके शुद्ध रूप में प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा हूं। मैं गजल समारोहों में युवा श्रोताओं की संख्या बढ़ाने के लिए पाकिस्तान और भारत में विभिन्न मंचों पर बात कर रहा हूं। 'रूट्स 2 रूट्स'(एक प्रकार का गज़ल समारोह) के साथ मेरा सहयोग महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने मेरे वालिद (मेहदी हसन) और उनके प्रसिद्ध साथियों गुलाम अली, फरीदा खानम और इकबाल बानो जैसे गजल गायकों के अमर संगीत को प्रोत्साहित करने में मेरी मदद की है।" अपने पिता जैसी ही आवाज के मालिक मेहदी अब बॉलीवुड में अपनी शुरुआत करने को तैयार हैं। मेहदी कहते हैं कि उनके पास बॉलीवुड की कई फिल्मों में गाने के प्रस्ताव हैं। वह कहते हैं कि वह लंबे समय से हिंदी फिल्मों में गाना चाहते थे। उन्हें उम्मीद है कि वह जल्दी ही यह शुरुआत कर सकेंगे।

हम दुआ करते हैं कि हिन्दुस्तानी फिल्में जल्द हीं आसिफ साहब की आवाज़ से नवाजी जाएँ। यह तो हुई गायक की बात, अब बारी है इस गज़ल के गज़लगो की, तो यह गज़ल जिनकी लेखनी की उपज है, उनके बारे में कुछ भी कहना पहाड़ को जर्रा कहने के जैसा होगा। इसलिए खुद कुछ न कहके प्रख्यात लेखक "शैलेश जैदी" को हम यह काम सौंपते हैं।

नौशेरा में जन्मे अहमद फ़राज़ जो पैदाइश से हिन्दुस्तानी और विभाजन की त्रासदी से पाकिस्तानी थे उर्दू के उन कवियों में थे जिन्हें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बाद सब से अधिक लोकप्रियता मिली।पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू तथा फ़ारसी में एम0ए0 करने के बाद पाकिस्तान रेडियो से लेकर पाकिस्तान नैशनल सेन्टर के डाइरेक्टर,पाकिस्तान नैशनल बुक फ़ाउन्डेशन के चेयरमैन और फ़ोक हेरिटेज आफ़ पाकिस्तान तथा अकादमी आफ़ लेटर्स के भी चेयरमैन रहे।भारतीय जनमानस ने उन्हें अपूर्व सम्मान दिया,पलकों पर बिठाया और उनकी ग़ज़लों के जादुई प्रभाव से झूम-झूम उठा। मेरे स्वर्गीय मित्र मख़मूर सईदी ने, जो स्वयं भी एक प्रख्यात शायर थे,अपने एक लेख में लिखा था -"मेरे एक मित्र सैय्यद मुअज़्ज़म अली का फ़ोन आया कि उदयपूर की पहाड़ियों पर मुरारी बापू अपने आश्रम में एक मुशायरा करना चाहते हैं और उनकी इच्छा है कि उसमें अहमद फ़राज़ शरीक हों।मैं ने अहमद फ़राज़ को पाकिस्तान फ़ोन किया और उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी।शान्दार मुशायरा हुआ और सुबह चर बजे तक चला। मुरारी बापू श्रोताओं की प्रथम पक्ति में बैठे उसका आनन्द लेते रहे।"

"फ़िराक़", "फ़ैज़" और "फ़राज़" लोक मानस में भी और साहित्य के पार्खियों के बीच भी अपनी गहरी साख रखते हैं।इश्क़ और इन्क़लाब का शायद एक दूसरे से गहरा रिश्ता है। इसलिए इन शायरों के यहां यह रिश्ता संगम की तरह पवित्र और अक्षयवट की तरह शाख़-दर-शाख़ फैला हुआ है। रघुपति सहाय फ़िराक़ ने अहमद फ़राज़ के लिए कहा था-"अहमद फ़राज़ की शायरी में उनकी आवाज़ एक नयी दिशा की पहचान है जिसमें सौन्दर्यबोध और आह्लाद की दिलकश सरसराहटें महसूस की जा सकती हैं" फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को फ़राज़ की रचनाओं में विचार और भावनाओं की घुलनशीलता से निर्मित सुरों की गूंज का एहसास हुआ और लगा कि फ़राज़ ने इश्क़ और म'आशरे को एक दूसरे के साथ पेवस्त कर दिया है।और मजरूह सुल्तानपूरी ने तो फ़राज़ को एक अलग हि कोण से पहचाना । उनका ख़याल है कि "फ़राज़ अपनी मतृभूमि के पीड़ितों के साथी हैं।उन्ही की तरह तड़पते हैं मगर रोते नहीं।बल्कि उन ज़ंजीरों को तोड़ने में सक्रिय दिखायी देते हैं जो उनके समाज के शरीर को जकड़े हुए हैं।"फ़राज़ ने स्वय भी कहा था -

मेरा क़लम तो अमानत है मेरे लोगों की।
मेरा क़लम तो ज़मानत मेरे ज़मीर की है॥

देशभक्त की भावना से ओत-प्रोत इस शेर को सुनने के बाद लाज़िमी हो जाता है कि हम एक प्यार-भरा शेर देख लें क्योंकि आज की की गज़ल बड़ी हीं रूमानी है और रूमानियत को रौ में लाने के लिए माहौल में मिसरी तो घोलनी हीं पड़ेगी:

जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है के तुम हो


और अब वह समय आ गया है, जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार था। तो ज़रा भी देर न करते हुए हम सुनते हैं फिल्म "जन्नत की तलाश" से ज़ुल्फ़िकार अली के द्वारा संगीतबद्ध की गई यह गज़ल:

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को ____ ठहर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
के फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बूटा" और शेर कुछ यूँ था-

इस दुनिया के बाग में
शूली जैसा हर बूटा है।

इस शब्द के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए "रोमेंद्र" जी। हुजूर, आपने इस शब्द को पहचाना तो ज़रूर, लेकिन हमें आपसे शेर की भी दरकार थी। खैर कोई बात नहीं.. पहली मर्तबा था, इसलिए हम आपको माफ़ करते हैं ;) अगली बार से इस बात का भी ध्यान रखिएगा।

अवनींद्र जी, कमाल है..... इस बार आप शेर से हटकर नज़्म पर आ गए। वैसे रचना है बड़ी प्यारी:

अपने मंदिर की खातिर
नौचती रही
तुम मेरे
बाग़ का हर बूटा
और मैं
परेशां रहा
कि भूले से
कोई शूल
तेरे हाथो न चुभ जाये

शरद जी, सच कहूँ तो मैंने इसी शेर के कारण बूटा शब्द को गायब किया था। और वाह! आपने मेरे दिल की बात जान ली:

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है। (आपने यहाँ तू लिखा है.. यानि कि सही शब्द को हीं गुल कर दिया :) )

शन्नो जी, मंजु जी और नीलम जी, आपने "बूटा" को साड़ी पर जड़े "बूटे" की तरह लिया है, जबकि इस नज़्म में बूटा का अर्थ था फूल.. इसलिए मैं आप लोगों के शेर यहाँ पेश नहीं कर रहा। इस बार मुझे माफ़ कीजिएगा। और अगली बार से यह ध्यान दीजिएगा कि कौन-सा शब्द किस अर्थ में इस्तेमाल हुआ है। या फिर फूल की तरह, मुझे समझ नहीं आ रहा। फिर भी मैं आप तीनों के शेर यहाँ रख रहा हूँ। अब महफ़िल के सुधि श्रोतागण हीं इन शेरों का फ़ैसला करेंगे:

स्याह चादर पे चाँद संग आ मुस्कुराते हैं
खामोश आलम में झांक कर टिमटिमाते हैं
आसमा में टंके सितारे लगते हैं जैसे बूटा
रात के अलविदा कहते ही गुम हो जाते हैं. (शन्नो जी)

जब लाल साड़ी पर उकेरा था बूटा,
दिलवर !तब हर साँस ने तेरा नाम जपा . (मंजु जी)

बूटा बूटा जो नोचा उस जालिम ने आसमानों से
लहू लहू वो हुआ उस कातिल के अरमानों से. (नीलम जी)

सीमा जी, आपने बूटा पर कई सारे शेर पेश किए। मुझे उन सारे शेरों में से यह शेर (पंक्तियाँ) सबसे ज्यादा पसंद आया:

मेरी मुहब्बत का ख़्वाब, चमेली का बूटा
जिसके नीचे हकीकत का 'काला नाग' रहता है। (कमल )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें...सज्जाद अली ने कुछ यूँ उम्मीद जगाई, साथ हैं फ़राज़ के शब्द

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६१

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शामिख जी की पसंद की पहली गज़ल लेकर। आज की गज़ल की बात करें, उससे पहले मैं दो सप्ताह की अपनी गैर-हाज़िरी के लिए आप सबसे माफ़ी माँगना चाहूँगा। कुछ ऐसी वज़ह हीं आन पड़ी थी कि मुझे गज़लों की इस शानदार और जानदार महफ़िल को कुछ दिनों के लिए बंद करना पड़ा। लेकिन कोई बात नहीं, गज़लों की रूकी हुई यह गाड़ी दो सप्ताह के बाद फिर से पटरी पर आ गई है और निकट भविष्य में इसकी गति कम होने की मुझे कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। तो चलिए आज की महफ़िल की शुरूआत कर हीं देते हैं। तो आज जो गज़ल हम आपको सुनवाने जा रहे हैं वह यूँ तो मेहदी हसन साहब की आवाज़ में भी उपलब्ध थी, लेकिन हमने जान-बूझकर एक कम-चर्चित गायक की गाई हुई गज़ल को चुना। वैसे इस गायक को कम-चर्चित भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि पाकिस्तानी फिल्मों में इन्होंने बहुत सारे गाने गाए हैं। इस फ़नकार के अब्बाजान साजन(वास्तविक नाम: शफ़क़त हुसैन) नाम से मलयालम फिल्में निर्देशित किया करते हैं। ७० के दशक से अबतक उन्होंने लगभग ३० फिल्में निर्देशित की हैं। मज़े की बात यह है कि खुद तो वे हिन्दुस्तान में रह गए लेकिन उनके दोनों बेटों ने पाकिस्तान में खासा नाम कमाया। जैसे कि आज की गज़ल के गायक सज्जाद अली पाकिस्तान के जानेमाने पॉप गायक हैं, वहीं वक़ार अली एक जानेमाने संगीतकार। सज्जाद अली का जन्म १९६६ में कराची के एक शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। बचपन से हीं इन्हें संगीत की शिक्षा दी गई। शास्त्रीय संगीत में इन्हें खासी रूचि थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद बरकत अली खान, उस्ताद मुबारक अली खान, मेहदी हसन खान, गुलाम अली, अमानत अली खान जैसे धुरंधरों के संगीत और गायिकी को सुनकर हीं इन्होंने खुद को तैयार किया। इनका पहला एलबम १९७९ में रीलिज हुआ था, जिसमें इन्होंने बड़े-बड़े फ़नकारों की गायिकी को दुहराया। उस एलबम के ज्यादातर गाने "हसरत मोहानी" और "मोमिन खां मोमिन" के लिखे हुए थे। यूँ तो इस एलबम ने इन्हें नाम दिया लेकिन इन्हें असली पहचान मिली पीटीवी की २५वीं सालगिरह पर आयोजित किए गए कार्यक्रम "सिलवर जुब्ली" में। दिन था २६ नवंबर १९८३. "लगी रे लगी लगन" और "बावरी चकोरी" ने रातों-रात इन्हें फर्श से अर्श पर पहुँचा दिया। एक वो दिन था और एक आज का दिन है...सज्जाद अली ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अप्रेल २००८ में "चहार बलिश" नाम से इन्होंने अपना एलबम रीलिज किया, जिसमें "चल रैन दे"(यह गाना वास्तव में जुलाई २००६ में मार्केट में आया था और इस गाने ने उस समय खासा धूम मचाया था) भी शामिल है। इनके बारे में इससे ज्यादा क्या कहा जाए कि खुद ए०आर०रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं। वैसे कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन बाकी बातें कभी अगली कड़ी में। अब हम रूख करते हैं इस गज़ल के गज़लगो "अहमद फ़राज़" साहब की ओर।

सबको मालूम है कि फ़राज़ साहब का इंतकाल पिछले साल २५ अगस्त को हुआ था। सबको मालूम है कि उन्हें २००४ में हिलाल-ए-इम्तियाज़ से नवाज़ा गया था और उन्होंने यह कहकर यह सम्मान लौटा दिया था कि "मेरा ईमान मुझे माफ़ नहीं करेगा अगर मैं पाकिस्तान में हो रही इन घटनाओं का मूक दर्शक बना रहूँ। कम से कम मैं इतना तो कर हीं सकता हूँ कि मैं इस तानाशाही सरकार को यह दिखा दूँ कि मौलिक अधिकारों को छीनने वाली यह सरकार लोगों के दिलों में कैसा मकाम रखती है। इसलिए मैं हिलाल-ए-इम्तियाज़ को लौटा रहा हूँ और अपने आप को इस हुकूमत से हमेशा के लिए अलग करता हूँ।" लेकिन कुछ बाते हैं जो सबको मालूम नहीं। और वे हैं फ़राज़ साहब का चुटकीला अंदाज़, हर बात को हँसी में उड़ा जाने की अदा। जैसे कि यूँ तो उन्हें हिलाल-ए-इम्तियाज़ २००४ में मिला, लेकिन उन्होंने इसे लौटाया २००६ में। तो इस मामले में किसी ने उनसे पूछा कि "दो साल की देरी क्यों?" तो उनका जवाब था कि "आपको क्या लगता है कि इन दो सालों में इसने कुछ अंडे दे दिए हैं क्या..यह आज भी वही है।" कहते हैं कि एक बार कुछ लोग फ़राज़ साहब के दरवाजे पर आए और उनसे कहने लगे कि "क्या तुम कलमा सुना सकते हो?" फ़राज़ साहब ने तपाक से जवाब दिया "क्यों? पुराने कलमे में कोई बदलाव आ गया है क्या?" फ़राज़ साहब से एक बार पूछा गया कि १९४७ के पाकिस्तान और आज के पाकिस्तान में क्या फ़र्क महसूस करते हैं। उनका जवाब था: "१९४७ में मुस्लिम लीग के प्रेसीडेंट का नाम मुहम्मद अली जिन्ना था और आज चौधरी गुजरात हुसैन है"। यह तो हुआ उनका मज़ाकिया लहज़ा। लेकिन असल में फ़राज़ साहब ४७ के पाकिस्तान और आज के पाकिस्तान में कोई फ़र्क नहीं महसूस करते थे। उनसे जब पूछा गया कि आजकल वे जोश-औ-जुनूं वाली क्रातिकारी कविताएँ क्यों नहीं लिखते। तो उनका जवाब था:"क्योंकि मैं एक हीं चीज हर बार नहीं लिखना चाहता। पाकिस्तान में चीजें नहीं बदलतीं और इसीलिए मेरी लिखी हुई पुरानी कविताएँ भी पुरानी नहीं होती..उनका आज भी उतना हीं महत्व है, जितना पहले था।" फ़राज़ हमेशा हीं सैनिक शासन के खिलाफ़ रहे थे, तब भी जब उनके बाकी साथियों ने सरकार का साथ देना मुनासिब समझा था। इस मामले में फ़राज़ दृढ-संकल्प थे। उनका कहना था कि "मैं निरंकुशता के खिलाफ़ था, हूँ और रहूँगा। माना कि वक्त बुरा है लेकिन ऐसा वक्त भी नहीं आया कि मुझे किसी के डर से देश छोड़ना पड़े। मैं घर पर हीं रहकर उनका विरोध करूँगा।" लेकिन ज़िया के शासनकाल में उन्हें भी देशनिकाला सहना पड़ा। छ: साल तक वे देश से बाहर रहे। इस मामले में वे "फ़ैज़" के उत्तराधिकारी साबित हुए। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो उन्हें फ़ैज़ के पास ला खड़ा करते हैं। इसलिए कई लोगों का यह मानना है कि सही मायने में फ़ैज़ की परछाई किसी में नज़र आती थी तो वे फ़राज़ हीं थे। फ़राज़ न सिर्फ़ क्रांति के कवि थे बल्कि प्रेम के मामले में भी उनका कोई सानी न था। कहते हैं कि ऐसा कोई प्रेम-पत्र नहीं जिसमें फ़राज़ का शेर शामिल न हो। १९५४ की बात है, जब फ़राज़ पेशावर के इस्लामिया कौलेज़ में पढा करते थे। तब अपने दोस्तों को घेर कर रोमांटिक कविताएँ सुनाना उनकी दैनिक आदत थी। उस समय लड़के-लड़कियाँ खुलेआम आपस में बात नहीं किया करते थे। फिर भी फ़राज़ को लड़कियों की चिट्ठियाँ आती थीं, वो भी न सिर्फ़ अपने कौलेज से, बल्कि शहर के दूसरे कौलेजों से भी। ऐसा असर था फ़राज़ की लेखनी में...

चलते-चलते फ़राज़ के बारे में कुछ शब्द "भारतीय साहित्य संग्रह" पर उपलब्ध फ़राज़ की पुस्तक "खानाबदोश" की समीक्षा से: अहमद फ़राज़ उर्दू के एक समर्थ, सजग और जीवन्त कवि हैं। उनकी कविता जितनी पाकिस्तानी है उतनी ही भारतीय। ऐसा इसलिए कि उर्दू में दोनों देशों के बीच बँटवारा नहीं साझा है। हम यहाँ यह याद कर सकते हैं कि पाकिस्तान बनने के बाद वहाँ के अब तक के सबसे बड़े कवि फ़ैज अहमद फ़ैज़ की भारत में लोकप्रियता और प्रतिष्ठा रही है। जैसे फ़ैज़ में वैसे ही अब अहमद फ़राज़ में यह साफ़ पहचाना जा सकता है कि सरहदों के पार और उनके बावजूद, हमारे समय में हम जिन प्रश्नों, अन्तर्विरोधों, तनावों, बेचैनियों और जिज्ञासाओं से घिरे हैं, उन्हें यह कविता सीधे और निहायत आत्मीय आवाज़ में सम्बोधित करती है। एक बार फिर यह कविता इस सच्चाई का इज़हार है और एसर्शन भी। फ़राज़ की कविता ज़िन्दादिल कविता है, उसमें हमेशा एक क़िस्म की स्फूर्ति है; तब भी वह किसी रूमानी अवसाद में डूबी है। वह ऐसी कविता भी है, जो आदमी और उसके बेशुमार रिश्तों की दुनिया को कविता के भूगोल में स्मरणीय ढंग से विन्यस्त करने की चेष्टा करती है। भले उतनी उदग्र न हो जितनी, मस्लन पाब्लो नेरुदा या कि फ़ैज़ की कविता रही है, वह इसी परंपरा में है जिसमें प्रेम और क्रान्ति में, रूमानी सच्चाई और सामाजिक सच्चाई में बुनियादी तौर पर कोई विरोध भाव नहीं है। उसकी आधुनिकता परम्परा का विस्तार है, उसका अवरोध नहीं। वह अपने समय से जो रिश्ता बनाती है वह सीधा-सादा न होकर ख़ासा जटिल है। वह समय को निरी समकालीनता के बाड़े से निकाल कर उसे थोड़ा पीछे और कुछ आगे ले जानी वाली कविता है। फ़राज़ की ज़ुबान में मिठास और अपनी दुनिया में रचे-बसे होने की अनुगूँजें हैं। ज़रूरी होने पर बेबाकी, तीखापन और तंज़ भी है। उसमें उर्दू की अपनी समृद्ध परम्परा की कृतज्ञ याद है। उसमें लयों, बहरों, छन्दों की आश्चर्यजनक विविधता और क्षमता है। सबसे बढ़कर उसमें खुलापन है, जो अहमद फ़राज़ के इन्सानी तौर पर भरे पूरे और चौकन्ने होने का सबूत है। वह मित्र-कविता है जो हमसे आत्मीयता और आत्मविश्वास के साथ बात करती है और हमारे विश्वास आसानी से जीत लेती है। चलिए आज की महफ़िल की समाप्ति अहमद फ़राज़ के इस शेर से करते हैं, जिसमें मोहब्बत की हद बताई गई है:

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे|


इस शेर के बाद चलिए हम अब १९९५ में रीलिज हुई पाकिस्तानी फिल्म "चिफ़ साहब" से इस गज़ल को सुनते हैं, जिसका हर एक मिसरा न जाने कितनी दास्तान सुना जाता है। तो दिल पर हाथ रखकर इस गज़ल का आनंद लें:

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुये फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुये लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इन्साँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

अब न वो मैं हूँ न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो साये तमन्ना के _____ में मिलें




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "नसीब" और शेर कुछ यूं था -

हाँ नसीब अपने ही सो गए,
हाय हम क्या से क्या हो गए..

सही शब्द के साथ महफ़िल में सबसे पहली हाज़िरी लगाई "मुरारी पारीक" जी ने। मुरारी जी आपका महफ़िल-ए-गज़ल में हार्दिक स्वागत है। आप आगे भी महफ़िल की शोभा बढाते रहें, इसी कामना के साथ आपका यह शेर पेश-ए-खिदमत है:

जो खिल उठें गुलाब मेरे दिल के बाग़ में
रब्बा, मेरे "नसीब" में ऐसी बहार दे (चरागे-दिल वर्ल्ड प्रेस से)

सजीव जी, आगे से आपको शिकायत करने का मौका नहीं मिलेगा :) इस बार समय की कमी के कारण मैं ज्यादा शोध नहीं कर पाया।

शरद जी, तो कैसी लगी आपकी पसंदीदा नज़्मों पर हमारी यह पेशकश? अपनी राय जाहिर ज़रूर कीजिएगा। यह रहा "नसीब" शब्द पर आपका यह शेर:

नसीब आजमाने के दिन आ रहे है
क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं। (फ़ैज़) क्या हुआ..आज कोई स्वरचित शेर नहीं!!

सीमा जी,आपने भी एक से बढकर एक शेर पेश किए। मसलन:

तेरा हिज्र मेरा नसीब है तेरा ग़म ही मेरी हयात है
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों तू कहीं भी हो मेरे साथ है। (निदा फ़ाज़ली)

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया (सुदर्शन फ़ाकिर)

कुलदीप जी, आपका पेश किया शेर भी कमाल का है:

बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार
लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे (राना सहरी)

आप सबके बाद महफ़िल को संभाला शामिख जी ने। शामिख जी, आज से तीन दिनों तक आपकी हीं पसंद की गज़लें पेश होने वाली हैं, इसलिए नदारद मत होईयेगा :) ये रहे आपके शेर:

वही सिपाह-ए-सितम ख़ेमाज़न है चारों तरफ़
जो मेरे बख़्त में था अब नसीब-ए-शहर भी है (अहमद फ़राज़)

नसीब फिर कोई तक़्रीब-ए-क़र्ब हो के न हो
जो दिल में हों वही बातें किया करो उससे (अहमद फ़राज़) संयोग देखिए कि आज हमने जो गज़ल पेश की है, वो भी फ़राज़ साहब की हीं है।

मंजु जी, हर बार की तरह इस बार भी स्वरचित शेर के साथ नज़र आईं:

ऐ मेरे मालिक ! जब -जब मेरा नसीब जगाया ,
तब -तब गम के रोड़े खुशियों के फूल बन महकने लगे .

अंत में महफ़िल सुमित जी के नाम हुई। ये रही आपकी पेशकश:

नसीब में जिसके जो लिखा था वो तेरी महफ़िल में काम आया,
किसी के हिस्से में प्यास आई किसी के हिस्से में जाम आया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009

ऐ राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ...."फ़राज़" के शब्द और "रूना लैला" की आवाज़...

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५६

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं सीमा जी की पसंद की चौथी गज़ल लेकर। आज की गज़ल पिछली तीन गज़लों की हीं तरह खासी लोकप्रिय है। न सिर्फ़ इस गज़ल के चाहने वाले बहुतेरे हैं, बल्कि इस गज़ल के गज़लगो का नाम हर गज़ल-प्रेमी की जुबान पर काबिज़ रहता है। इस गज़ल को गाने वाली फ़नकारा भी किसी मायने में कम नहीं हैं। हमारे लिए अच्छी बात यह है कि हमने महफ़िल-ए-गज़ल में इन दोनों को पहले हीं पेश किया हुआ है...लेकिन अलग-अलग। आज यह पहला मौका है कि दोनों एक-साथ महफ़िल की शोभा बन रहे हैं। तो चलिए हम आज की महफ़िल की विधिवत शुरूआत करते हैं। उससे पहले एक आवश्यक सूचना: ५६ कड़ियों से महफ़िल सप्ताह में दो दिन सज रही है। शुरू की तीन कड़ियो में हमने दो-दो गज़लें पेश की थीं और उस दौरान महफ़िल का अंदाज़ कुछ अलग हीं था। फिर हमे उस अंदाज़, उस तरीके, उस ढाँचे में कुछ कमी महसूस हुई और हमने उसमें परिवर्त्तन करने का निर्णय लिया और वह निर्णय बेहद सफ़ल साबित हुआ। अब चूँकि उस निर्णय पर हमने ५० से भी ज्यादा कड़ियाँ तैयार कर ली हैं तो हमें लगता है कि बदलाव करने का फिर से समय आ गया है। तो अभी तक हम जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, उसके अनुसार अगले सप्ताह से महफ़िल सप्ताह में एक हीं दिन सजेगी और वह दिन रहेगा..बुधवार। महफ़िल में और भी क्या परिवर्त्तन आएँगे, इस पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। इसलिए आपको वह परिवर्त्तन देखने के लिए अगले बुधवार २८ अक्टूबर तक इंतज़ार करना होगा। अगर आप कुछ सुझाव देना चाहें तो आपका स्वागत है। कृप्या रविवार सुबह तक अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अपने विचार हम तक प्रेषित कर दें। धन्यवाद!!

चलिए अब आज के फ़नकार की बात करते हैं। आज की महफ़िल को हमने अहमद फ़राज़ साहब के सुपूर्द करने का फ़ैसला किया है। फ़राज़ साहब के बारे में अपने पुस्तक "आज के प्रसिद्ध शायर- अहमद फ़राज़" में कन्हैया लाल नंदन साहब लिखते हैं: अहमद फ़राज़,जिनका असली नाम सैयद अहमद शाह है, का जन्म पाकिस्तान के सरहदी इलाके कोहत में १४ जनवरी १९३१ को हुआ। उनके वालिद (पिता) एक मामूली शिक्षक थे। वे अहमद फ़राज़ को प्यार तो बहुत करते थे लेकिन यह मुमकिन नहीं था कि उनकी हर जिद वे पूरी कर पाते। बचपन का वाक़या है कि एक बार अहमद फ़राज़ के पिता कुछ कपड़े लाए। कपड़े अहमद फ़राज़ को पसन्द नहीं आए। उन्होंने ख़ूब शोर मचाया कि ‘हम कम्बल के बने कपड़े नहीं पहनेंगे’। इस पर उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सबसे पहला शेर भी कह दिया:

लाए हैं सबके लिए कपड़े सेल से,
लाए हैं हमारे लिए कपड़े जेल से।

बात यहाँ तक बढ़ी कि ‘फ़राज़’ घर छोड़कर फ़रार हो गए। वह फ़रारी तबियत में जज़्ब हो गई। आज तक अहमद फ़राज़ फ़रारी जी रहे हैं। कभी लन्दन, कभी न्यूयार्क, कभी रियाद तो कभी मुम्बई और हैदराबाद।
जानकारी के लिए बता दें कि "फ़राज़" साहब पिछले अगस्त २५ अगस्त को सुपूर्द-ए-खाक हो चुके हैं। इसी पुस्तक में नंदन साहब आगे लिखते हैं: अहमद फ़राज़ की शोहरत ने अब अपने गिर्द एक ऐसा प्रभामण्डल पैदा कर लिया है जिसमें उनकी साम्राज्यवाद और वाज़ीवाद से जूझने वाले एक क्रान्तिकारी रुमानी शायर की छवि चस्पाँ है। फ़राज़ का अपना निजी जीवन भी इस प्रभामण्डल के बनाने में एक कारण रहा है, उन्होंने अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से बाहर गुज़ारा है और वे एक जिलावतन (देशनिकाला) शायर के रूप में पहचाने और सराहे गए हैं। इसके अक्स उनकी शायरी में जगह-जगह हैं। उसमें देश से दूर रहने, देश के लिए तड़पने का एहसास, हिजरत की पीड़ा और हिजरत करने वालों का दर्द जगह-जगह मिलता है। बखूबी हम इसे फ़राज़ की शायरी के विभिन्न रंगों का एक ख़ास रंग कह सकते हैं। हिजरत यानी देश से दूर रहने की पीड़ा और अपने देश की यादें अपनी विशेष शैली और शब्दावली के साथ उनके यहाँ मिलती हैं। कुछ शेर देंखें :

वो पास नहीं अहसास तो है, इक याद तो है, इक आस तो है
दरिया-ए-जुदाई में देखो तिनके का सहारा कैसा है।

मुल्कों मुल्कों घूमे हैं बहुत, जागे हैं बहुत, रोए हैं बहुत
अब तुमको बताएँ क्या यारो दुनिया का नज़ारा कैसा है।

ऐ देश से आने वाले मगर तुमने तो न इतना भी पूछा
वो कवि कि जिसे बनवास मिला वो दर्द का मारा कैसा है।


अपनी पुस्तक "खानाबदोश" की भूमिका में वे लिखते है: मुझे इसका ऐतराफ़ करते हुए एक निशात-अंगेज़ फ़ख़्र महसूस होता है कि जिस शायरी को मैंने सिर्फ़ अपने जज़्बात के इज़हार का वसीला बनाया था इसमें मेरे पढ़ने वालों को अपनी कहानी नज़र आई और अब ये आलम है कि जहाँ-जहाँ भी इन्सानी बस्तियाँ हैं और वहाँ शायरी पढ़ी जाती है मेरी किताबों की माँग है और गा़लिबन इसलिए दुनिया की बहुत सी छोटी-बड़ी जु़बानों में मेरी शायरी के तर्जुमे छप चुके हैं या छप रहे हैं। इस मामले में मैं अपने आपको दुनिया के उन चन्द ख़ुशक़िस्मत लिखने वालों में शुमार पाता हूँ जिन्हें लोगों ने उनकी ज़िन्दगी में ही बे-इन्तिहा मोहब्बत और पज़ीराई बख़्शी है। हिन्दुस्तान में अक्सर मुशायरों में शिरकत से मुझे ज़ाती तौर पर अपने सुनने और पढ़ने वालों से तआरुफ़ का ऐज़ाज़ मिला और वहाँ के अवाम के साथ-साथ निहायत मोहतरम अहले-क़लम ने भी अपनी तहरीरों में मेरी शेअरी तख़लीक़ात को खुले दिल से सराहा। इन बड़ी हस्तियों में फ़िराक़, अली सरदार जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, डॉक्टर क़मर रईस, खुशवंत सिंह, प्रो. मोहम्मद हसन और डॉ. गोपीचन्द नारंग ख़ासतौर पर क़ाबिले-जिक्र हैं। इसके अलावा मेरी ग़ज़लों को आम लोगों तक पहुँचाने में हिन्दुस्तानी गुलूकारों ने भी ऐतराफ़े-मोहब्बत किया, जिनमें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, जगजीत सिंह, पंकज उधास और कई दूसरे नुमायाँ गुलूकार शामिल हैं। फ़राज़ साहब यूँ हीं हम सब की आँखों के तारे नहीं थे। कुछ तो बात थी या कहिए है कि उनका लिखा एक-एक हर्फ़ हमें बेशकिमती मालूम पड़ता है। उदाहरण के लिए इसी शेर को देख लीजिए:

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआयें मुझे न दो ...


क्या बात है!!! पढकर ऐसा लगता है कि मानो कोई हमारी हीं कहानी सुना रहा हो। आप क्या कहते हैं?

अब पेश है वह गज़ल जिसके लिए आज की महफ़िल सजी है। हमें पूरा यकीन है कि यह आपको बेहद पसंद आएगी। तो लुत्फ़ उठाने के लिए तैयार हो जाईये:

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम न सही, फिर भी कभी तो
रस्मों-रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

आज जो दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन ये थी कि ___ हिलनी चाहिए


आपके विकल्प हैं -
a) नींव, b) बुनियाद, c) सरकार, d) आधार

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "हिचकी" और शेर कुछ यूं था -

आखिरी हिचकी तेरे ज़ानों पे आये,
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ ....

क़तील शिफ़ाई साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचाना "सीमा" जी ने। "हिचकी" शब्द पर आपने कुछ शेर भी पेश किए:

साथ हर हिचकी के लब पर उनका नाम आया तो क्या?
जो समझ ही में न आये वो पयाम आया तो क्या? (आरज़ू लखनवी)

तेरी हर बात चलकर यूँ भी मेरे जी से आती है,
कि जैसे याद की खुशबू किसी हिचकी से आती है। (डा. कुँअर 'बेचैन')

सीमा जी के बाद महफ़िल की शान बने "शामिख" जी। यह रही आपकी पेशकश:

नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी,
किसी की आखरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो,
यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो। (सुभद्राकुमारी चौहान)

इनके बाद महफ़िल में हाज़िर हुए अपने स्वरचित शेरों के साथ शरद जी और मंजु जी। ये रही आप दोनों की रचनाएँ। पहले शरद जी:

मैं इसलिए तुझे अब याद करूंगा न सनम
जो हिचकियाँ तुझे चलने लगीं तो बन्द न होंगीं।

इधर हिचकी चली मुझको ,उधर तू मुझको याद आई
मगर ये तय है कि तुझको भी अब हिचकी चली होगी।

और अब मंजु जी:

हिचकी थमने का नाम ही नहीं ले रही थी ,
सजा ए मौत लगने लगी ,
रोकने के लिए कई टोटके भी किये ,
जैसे ही उसका नाम लबों ने लिया
झट से गायब हो गयी .

दिशा जी, आप महफ़िल में आईं, बहुत अच्छा लगा....लेकिन शेर की कमी खल गई। अगली बार ध्यान दीजिएगा।
चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

मंगलवार, 23 सितंबर 2008

जिंदगी से यही गिला है मुझे...

भारी फरमाईश पर एक बार फ़िर रफ़ीक शेख़ लेकर आए हैं अहमद फ़राज़ साहब का कलाम

पिछले सप्ताह हमने सदी के महान शायर अहमद फ़राज़ साहब को एक संगीतमय श्रद्धाजंली दी,जब हमारे संगीतकार मित्र रफ़ीक शेख उनकी एक ग़ज़ल को स्वरबद्ध कर अपनी आवाज़ में पेश किया. इस ग़ज़ल को मिली आपार सफलता और हमें प्राप्त हुए ढ़ेरों मेल और स्क्रैप में की गयी फरमाईशों से प्रेरित होकर रफीक़ शेख ने फ़राज़ साहब की एक और शानदार ग़ज़ल को अपनी आवाज़ में गाकर हमें भेजा है. हमें यकीन है है उनका ये प्रयास उनके पिछले प्रयास से भी अधिक हमारे श्रोताओं को पसंद आएगा. अपनी बेशकीमती टिप्पणियों से इस नवोदित ग़ज़ल गायक को अपना प्रोत्साहन दें.



ग़ज़ल - जिंदगी से यही...
ग़ज़लकार - अहमद फ़राज़.
संगीत और गायन - रफ़ीक शेख




ghazal - zindagi se yahi gila hai mujhe...
shayar / poet - ahmed faraz
singer and composer - rafique sheikh

जिदगी से यही गिला है मुझे,
तू बहुत देर से मिला है मुझे.

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल,
हार जाने का हौंसला है मुझे.

दिल धड़कता नही, टपकता है,
कल जो ख्वाहिश थी आबला है मुझे.

हमसफ़र चाहिए हुजूम नही,
एक मुसाफिर भी काफिला है मुझे.

ये भी देखें -

फ़राज़ साहब की शायरी का आनंद लें उनकी अपनी आवाज़ में

सोमवार, 15 सितंबर 2008

अहमद फ़राज़ साहब को हिंद युग्म की संगीतमय श्रद्धांजलि

१ सितम्बर, अहमद फ़राज़ साहब के इन्तेकाल के ठीक ७ दिन बाद हमने आवाज़ पर फ़राज़ साहब की २३ ग़ज़लों की रिकॉर्डिंग उन्ही की आवाज़ में प्रस्तुत कर उन्हें पहली श्रद्धांजलि अर्पित की थी. मगर हम चाहते थे कि हमारी संगीत टीम भी उनकी किसी ग़ज़ल को अपने अंदाज़ में स्वरबद्ध कर उन्हें याद करें. दुर्भाग्य वश हमारे सभी ग़ज़ल संगीतकार दूसरे आयोजनों में व्यस्त होने के कारण समय नही निकल पा रहे थे, तभी आवाज़ पर ऋषि एस के किसी गीत को सुनकर एक नए संगीतकार/ गायक रफ़ीक शेख की आमद हुई. अब ये सौभाग्य की ही बात थी कि उनके पास फ़राज़ साहब की एक ग़ज़ल की धुन तैयार भी थी, हमारे आग्रह पर उन्होंने इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ में गाकर हमें भेजा, जिसे हम आज आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहे हैं. हम आपको बता दें कि रेफ़ीक़ शेख के रूप में हिंद युग्म आवाज़ को एक और नायाब हीरे की प्राप्ति हुई है, आने वाले किसी शुक्रवार को हम इस उभरते हुए गायक/ संगीतकार की ताज़ी ग़ज़ल भी आपको सुनवायेंगे. फिलहाल तो आनंद लेते हैं अहमद फ़राज़ साहब की इस खूबसूरत ग़ज़ल का, और याद करते हैं एक बार फ़िर इस सदी के उस अजीम शायर को जिसके कलाम ने शायरी को नए मायने दिए.



तेरी बातें ही सुनाने आए,
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए.

फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं,
तेरी आने के ज़माने आए.

अब तो रोने से भी दिल दुखता है,
शायद अब होश ठिकाने आए.

सो रहो मौत के पहलू में फ़राज़,
नींद किस वक्त न जाने आए.

शायर - अहमद फ़राज़.
संगीत और आवाज़ - रफ़ीक़ शेख

Ghazal - Teri Baaten...
Poet/Shyaar - Ahmed Faraaz
Composer/Singer - Rafique Sheikh

अपने प्रोत्साहन /मार्गदर्शन से इस नवोदित कलाकार को और बेहतर काम करने के लिए प्रेरित करें.

सोमवार, 1 सितंबर 2008

अहमद फ़‌राज़ की शायरी, उनकी अपनी आवाज़ में

सुनिए अहमद फ़राज़ की २३ रिकॉर्डिंग उन्हीं की आवाज़ में

पिछला सप्ताह कविता-शायरी के इतिहास के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि हमने पिछले सोमवार कविता का न मिट सकने वाले अध्याय का सृजक, पाकिस्तानी शायर अहमद फ़राज़ को खो दिया। एक दिन बाद ही हिन्द-युग्म पर प्रेमचंद की रूला देने वाली श्रद्धाँजलि प्रकाशित हुई। दीप-जगदीप ने उनके आखिरी ३७ दिनों का ज़िक्र किया। मेरा कविता-प्रेमी मन भी उनको इंटरनेट पर तलाशता रहा। मैंने उनकी आवाज़ कभी नहीं सुनी थी। हाँ, उनकी शायरियाँ दूसरे लोगों की जुबानों से सैकड़ों बार सुन चुका था।

पाकिस्तान के नवशेरा में जन्मे फ़राज़ की आवाज़ खोजते-खोजते मैं एक पाकिस्तानी फोरम पर पहुँच गया, जहाँ उनकी आवाज़ सुरक्षित थी। एक नहीं पूरी २३ रिकॉर्डिंग। कुछ तकनीकी कमियों के कारण उन्हें सीधे सुन पाना आसान न था, तो मैंने सोचा इस महान शायर के साथ यह अन्याय होगा, यदि आवाज़ बहुत बड़े श्रोतावर्ग तक नहीं पहुँची तो। वे फाइलें भी सुनने लायक हालत में नहीं थी। अनुराग शर्मा से निवेदन किया कि वे उन्हें परिवर्धित और संपादित कर दें।

उसी का परिणाम है कि आज हम आपके सामने उनकी २३ रिकॉर्डिंग लेकर उपलब्ध हैं। हर शे'र में अलग-अलग रंग हैं। ज़िदंगी के फलसफे हैं। नीचे के प्लेयर को चलाएँ और कम से कम १ घण्टे के लिए अहमद फ़राज़ की यादों में डूब जायें।


Ahmad Faraz ki ghazalen, unhin ki aawaaz mein

बहुत से पाठकों और श्रोताओं को अहमद फ़राज़ के बारे में अधिक पता नहीं है। आइए शॉर्ट में जानते हैं उनका परिचय।

अहमद फ़राज़ (जनवरी १४, १९३१- अगस्त २५, २००८)


अहमद फ़राज़ बीती सदी के आधुनिक कवियों में से एक माने जाते हैं। 'फ़राज़' उनका तख़ल्लुस है। इनका मूल नाम सैयद अहमद शाह था। अपनी साधारण मगर प्रभावी शैली के कारण फ़राज़ की तुलना मोहम्मद इकबाल और फै़ज़ अहमद फ़ैज़ से की जाती है, तथा तात्कालिक कवियों (शायरों) में इन्हें विशेष स्थान प्राप्त था। मज़हबी रूप से पश्तूनी होते हुए भी फ़राज़ ने पेशावर विश्वविद्यालय से पर्शियन और ऊर्दू भाषा में दक्षता हासिल की और बाद में वहीं अध्यापन करने लगे। हालाँकि उनका जन्मस्थान नौशेरा बताया जाता है लेकिन 'डेली जंग' के साथ एक साक्षात्कार में फ़राज़ ने अपना जन्मस्थान कोहाट बताया था। रेडिफ डॉट कॉम से साथ एक इंटरव्यू में फ़राज़ ने अपने पिता सैयद मुहम्मद शाह के द्वारा अपने भाइयों के लिए आधुनिक वस्त्र और इनके लिए एक साधारण काश्मीरा लाने पर उसको लौटाये जाने और एक पर्ची पर अपनी पहली द्विपंक्ति लिखे जाने का ज़िक्र भी किया था। लाइने थीं-

लाये हैं कपड़े सबके लिए सेल से
लाये हैं हमारे लिए कम्बल जेल से।


( उपर्युक्त बात का उल्लेख साहित्यकार प्रेमचंद सहजवाला ने भी फ़राज़ पर लिखे अपने लेख में किया है)

अपने कॉलेज़ के दिनों में अहमद फ़राज़ और अली सरदार जाफ़री सर्वश्रेष्ठ प्रगतिशील कवि माने जाते थे। खुद फ़राज़ भी जाफरी से प्रभावित थे और उन्हें अपना रॉल मॉडेल मानते थे।

अनेक राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़े गये फ़राज़ को तब जेल भेज दिया गया था जब वे एक मुशायरे में ज़िया-उल-हक़ काल के मिलिटरी राज़ की आलोचना करते पाये गये थे। फिर उन्होंने खुद को ही ६ वर्षों के लिए देश निकाला दे दिया। बाद में जब वे स्वदेश लौटे तो पाकिस्तानी एकादमी ऑफ लेटर्स के चेयरमैन बनें, पाकिस्तान नेशनल बुक फाउँडेशन के भी कई वर्षों तक चेयरमैन रहे।

फ़राज़ जुल्फ़िक़ार-अली-भुट्टो और पाकिस्तानी पिपुल्स पार्टी से प्रभावित थे। साहित्य-सेवा के लिए इन्हें वर्ष २००४ में हिलाल-ए-इम्तियाज़ का पुरस्कार मिला, जिसे इन्होंने सन् २००६ में पाकिस्तानी सरकार की कार्यप्रणाली और नीतियों से नाखुश होकर लौटा दिया।

"मेरी आत्मा मुझे कभी क्षमा नहीं करेगी यदि मैं मूक-चश्मदीद की तरह अपने आस-पास को देखता रहा। कम से कम मैं इतना कर सकता हूँ कि तानाशाह सरकार यह जाने कि अपने मानवाधिकारों के लिए गंभीर जनता की नज़रों क्या स्थान रखती है। मैं यह गरिमामयी सम्मान लौटाकर यह दिखाना चाहता हूँ कि मैं इस सरकार के साथ किसी भी तौर पर नहीं हूँ।" फ़राज़ का वक्तव्य।

शायर अहमद फ़राज़ ने अपना सर्वोत्तम देश-निकाला के समय लिखा। जुलाई २००८ में एक अफ़वाह फैली कि फ़राज़ का शिकागो के एक हस्पताल में देहांत हो गया। फ़राज़ के चिकित्सक ताहिर रोहैल ने इस समाचार का खंडन किया, लेकिन यह सुनिश्चित किया कि वो बहुत बीमार हैं। धीरे-धीरे फ़राज़ का स्वास्थ्य बिगड़ता रहा और २५ अगस्त २००८ की शाम इस्लामाबाद के एक अस्पताल में इनका शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया। इनके मृत-शरीर को २६ अगस्त २००८ की शाम को एच-८, कब्रगाह, इस्लामाबाद में दफना दिया गया।

प्रस्तुति- शैलेश भारतवासी
सहयोग- अनुराग शर्मा

गुरुवार, 28 अगस्त 2008

अहमद फ़राज़ साहब के आखिरी ३७ दिन - आवाज़ पर 'एक्सक्लूसिव'

अब के बिछडे तो शायद ख्वाबों में मिले,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले.


और वो शायर हमसे हमेशा के लिए बिछड़ गया, और अपने पीछे छोड़ गया एक ऐसा खालीपन जिसे भर पाना शायद कभी भी मुमकिन न हो. इस्मत चुगताई ने एक बार मोस्को में, उनसे मुलाकात के बाद कहा था - "अहमद फ़राज़ आम शायरों की तरह नही दिखता है, वह आधुनिक परिधान में रहता है, और उसे पार्टियों में महिलाओं संग नाचने से भी गुरेज नही है."

अहमद फ़राज़ ऐसे शायर थे, जिनका हर शेर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी को बहुत सरलता से छू जाता था. वह शायर सरहदों से परे था, और मोहब्बत को खुदा का दर्जा देता था. बीते सोमवार को ७७ साल की उम्र में उन्होंने अपने चाहने वालों से हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. उनके अन्तिम ३७ दिनों की यह दास्ताँ आवाज़ पर आप के लिए लाये हैं, जगदीप सिंह. सुनते हैं ये विशेष पॉडकास्ट, और उर्दू अदब के उस खुर्शीद को सलाम करें एक बार फ़िर, जिसकी रोशनायी की रोशनी कभी बुझ नही सकती .




अहमद फ़राज़ साहब को आवाज़ के समस्त टीम की भावभीनी श्रदांजली


हिन्द-युग्म पर प्रेमचंद ने भी उन्हें याद किया। पढ़ें

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