Showing posts with label 2017. Show all posts
Showing posts with label 2017. Show all posts

Saturday, June 24, 2017

चित्रकथा - 24: 2017 के मई - जून में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत

अंक - 24

2017 के मई - जून में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत


"नाच मेरी जान होके मगन तू..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


देखते ही देखते वर्ष 2017 का आधा पूरा हो गया। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिन्दी फ़िल्म जगत में बहुत सी फ़िल्में बनती चली गईं। और इन फ़िल्मों के लिए गाने भी बनते चले गए। वर्ष के प्रथम चार महीनों के फ़िल्म-संगीत की समीक्षा ’चित्रकथा’ में हम कर चुके हैं। आइए आज के अंक में निगाह डालें मई और जून में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों के गीत-संगीत पर। 




ई का महीना शुरु हुआ एक ताज़े हवा के झोंके से। जी हाँ, फ़िल्म ’मेरी प्यारी बिन्दु’ के ऐल्बम को सुन कर कुछ इसी तरह का अहसास हुआ। आयुष्मान खुराना - परिनीति चोपड़ा अभिनीत इस फ़िल्म में सचिन-जिगर ने संगीत दिया और गीत लिखे कौसर मुनीर और प्रिया सरय्या ने। अन्य कई अभिनेताओं की तरह परिनीति ने भी अपनी गायन क्षमता का पहली बार परिचय दिया इस फ़िल्म में। यह ग़ज़ल है "माना के हम यार नहीं, लो तय है के प्यार नहीं"। कौसर मुनीर ने इस ग़ज़ल से वापसी की है अर्थपूर्ण बोलों वाले गीतों की तरफ़। परिनीति ने आशातीत गायकी का परिवय देते हुए इस शास्त्रीय संगीत की छाया में स्वरबद्ध रचना को बेहद सुन्दर तरीक़े से गाया है। तेज़ रफ़्तार का कोई गीत होता तो बात अलग थी, लेकिन ऐसे ठहराव वाले गीत में सुरों को संभाल कर गाना बेहद मुश्किल काम है। इस ग़ज़ल का एक युगल संस्करण भी है जिसे परिनीति ने सोनू निगम के साथ मिल कर गाया है। भारतीय वाद्यों के प्रयोग से इस ग़ज़ल को चार चाँद लग गया है। ऐल्बम का दूसरा गीत है नकश अज़ीज़ और जोनिता गांधी का गया रेट्रो फ़ील वाला "ये जवानी तेरी, ये जवानी मेरी"। थिरकन भरा हल्के फुल्के बोलों से सजा यह गीत हमें 70 के दशक की याद दिला जाता है। तीसरा गीत है अरिजीत सिंह का गाया "ओ हारेया मैं दिल हारेया"। अतिथि गीतकार प्रिया सरय्या का लिख यह गीत लम्बी रेस का घोड़ा है। यूं तो अरिजीत के इस जौनर के बहुत से गीत हम सुन चुके हैं, पर यह गीत ख़ास है इसके कम्पोज़िशन, बोल और गायकी के लिहाज़ से। गीटार के सुन्दर प्रयोग वाला यह गीत अन्त तक हमारे साथ रहता है। क्लिन्टन सेरेजो और डॉमिनिक़ सेरेजो का गाया "इस तरह" हमें 80 के दशक में ले जाता है। भले यह सचिन-जिगर की रचना है, लेकिन कहीं से एक शंकर-अहसान-लॉय के संगीत की ख़ुशबू सी आती है। इस ऐल्बम की सबसे सुन्दर बात यह है कि सचिन-जिगर ने हर गीत को अलग ट्रीटमेण्ट दे कर विविधता की मिसाल कायम की है। जिगर और सनाह मोइदुत्ती की युगल आवाज़ों में "अफ़ीमी है तेरा मेरा प्यार" एक नर्म रोमांटिक गीत है जिसमें जिगर और सनाह की ताज़ी आवाज़ें दिल को छू जाती है। "अफ़ीमी" शब्द का क्या ख़ूबसूरत अंदाज़ में इस्तमाल हुआ है, शायद पहली बार किसी फ़िल्मी गीत में। और अन्तिम गीत है मोनाली ठाकुर की आवाज़ में "खोल दे बाहें" भी एक ख़ूबसूरत गीत है जिसमें कौसर मुनीर के हिन्दी बोलों के साथ साथ अतिथि गीतकार राना मजुमदार के बांग्ला बोल भी हैं। इसमें भी गीटार का सुन्दर प्रयोग है जो मोनाली की सुरीली आवाज़ के साथ-साथ चलता है। हिन्दी गीत में बांग्ला शब्दों को सही तरीके से ढाला गया है जिस वजह से यह एक अनूठा गीत बन गया है। कुल मिला कर ’मेरी प्यारी बिन्दु’ ऐल्बम एक सफल ऐल्बम है रचनात्मक्ता और विविधता के लिहाज़ से। 12 मई को एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी ’सरकार 3’। फ़िल्म के निर्माताओं के अनुसार यह फ़िल्म ’सरकार’ और ’सरकार राज’ से भी ज़्यादा ग़ुस्सेवाला है। और यह बात इसके गीतों में भी साफ़ झलकता है। फ़िल्म के सात गीत रोहित तेओतिआ द्वारा लिखा और रवि शंकर द्वारा स्वरबद्ध किया हुआ है। अमिताभ बच्चन की आवाज़ में ’गणेश आरती’ के अलावा बाकी सभी गीत किसी न किसी दृष्टि से पहले की दो फ़िल्मों के "गोविन्दा" के इर्द-गिर्द घूमते हैं। ऐल्बम का पहला गीत "ग़ुस्सा" आज के समाज के आम आदमी के ग़ुस्से को उजागर करता है। सुखविन्दर सिंह की बुलन्द आवाज़, उस पर "गोविन्दा" का मन्त्रोच्चारण और पार्श्व का परक्युशन, सब मिल कर एक सशक्त गीत है यह। इसी गीत का एक अन्य संस्करण है "ऐंग्री मिक्स" जिसमें मिका सिंह की भी आवाज़ शामिल है। फिर एक बार कैलाश खेर की आवाज़ में "साम धाम" का एक अन्य रूप इस ऐल्बम में शामिल है और इस बार उनके साथ आवाज़ मिलाई है साकेत बैरोलिया ने। अमिताभ के संवाद से शुरु होता है निलाद्री कुमार का "सरकार ट्रान्स"। टेक्नो बीट्स की गति तनाव को बढ़ाती हुई लगातार बढ़ती चली जाती है और अन्त में अचानक ख़त्म हो जाती है। रोहन विनायक द्वारा स्वरबद्ध ’गणेश आरती’ में अमिताभ बच्चन फिर एक बार परफ़ेक्शन का परिचय देते हैं। धीमी लय से शुरु हो कर जैसे जैसे आरती आगे बढ़ती है, इसकी गति भी ते होने लगती है। "थाम्बा" भी बिग-बी की पंक्तियों से शुरु होता है, वो ही बोल जो ’सरकार’ के "गोविन्दा" गीत में थे। आगे इस गीत को नवराज हंस आगे बढ़ाते हैं पूरे जोश के साथ। मिका, आदर्श शिन्डे और साकेत की आवाज़ों में "शक्ति" भी कुछ कुछ उसी तरह का गीत है। कुल मिला कर ’सरकार 3’ का ऐल्बम इस सीकुएल के पिछले दो फ़िल्मों के ढांचे में ही ढला हुआ है। फ़िल्म के बाहर इन गीतों का क्या वजूद होगा, कहना मुश्किल है।

मई के दूसरे सप्ताह में प्रदर्शित हुई ’हाफ़ गर्लफ़्रेंड’। अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर अभिनीत इस फ़िल्म में छह संगीतकार हैं - तनिष्क बागची, फ़रहान सईद, राहुल मिश्र, मिथुन, अमि मिश्र और ॠषी रिच। ऐल्बम का पहला गीत है "बारिश"। तनिष्क के इस कम्पोज़िशन ने माधव और रिया के रोमांस के आग में हवा का काम किया है। आराफ़ात महमूद और तनिष्क के लिखे बोल "ये मौसम की बारिश, ये बारिश का पानी, ये पानी की बूंदें, तुझे ही तो ढूंढ़े..." बड़े सुन्दर तरीके से गीत के मूड का बयाँ करते हैं। ऐश किंग् और शाशा तिरुपति की आवाज़ें दोनों अदाकारों पर अच्छी बैठी हैं। दूसरा गीत है "तू थोड़ी देर और ठहर जा"; श्रेया घोषाल की सुमधुर आवाज़ में यह गीत कानों में शहद घोलती है। फ़रहान सईद द्वारा स्वरबद्ध कुमार का लिखा यह गीत एक प्रेमी के इन्तज़ार को बड़े ख़ूबसूरत तरीके से बयाँ करता है। फ़रहान ने श्रेया का अच्छा साथ निभाया है इस युगल गीत में। गीत की एक और ख़ास बात है मुराद अली ख़ाँ का बजाया सारंगी की तानें। कुल मिला कर एक सुकूनदायक नग़मा। तीसरा गीत है राहुल मिश्र का गाया और स्वरबद्ध किया "तू ही है, तू ही तो है मेरा जुनूँ"। लाडो सुवल्का का लिखा यह क़व्वालीनुमा नग़मा थोड़े देर के लिए ’फ़ना’ के "चाँद सिफ़ारिश" की याद दिला जाता है। एक आशिक़ के टूटे हुए दिल की सदा है यह गीत और राहुल की उदासी भरी आवाज़-ओ-अंदाज़ ने गीत को सही मुकाम दिया है। ऐल्बम का अगला गीत है "फिर भी तुमको चाहूंगा"। मिथुन द्वारा स्वरबद्ध और मिथुन, अरिजीत सिंह व शाशा तिरुपति की आवाज़ों में मनोज मुन्तशिर का लिखा यह गीत शायद ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। इस दर्द भरे गीत में पियानो, संतूर और बाँसुरी का सुन्दर प्रयोग है और मनोज के असरदार बोल "कल मुझसे मोहब्बत हो ना हो, कल मुझको इजाज़त हो ना हो, टूटे दिल के टुकड़े लेकर, तेरे दर पे ही रह जाऊंगा" दिल को चीर जाते हैं। ’एक विलेन’ फ़िल्म के "गलियाँ" गीत से इसकी थोड़ी बहुत समानता ज़रूर है। इसी गीत का दूसरा भाग है "पल भर" जिसे मिथुन और अरिजीत ने गाया है। कहना मुश्किल है कि दोनों में कौन सा संस्करण बेहतर है। अगला गीत है "lost without you" जिसे पहली बार सुन कर शायद इससे प्यार न हो, लेकिन कुछ और बार सुनने पर इसका असर बनने लगता है। अनुष्का शहाणे और कुणाल वर्मा का लिखा, अमि मिश्र का स्वरबद्ध किया तथा अनुष्का शहाणे व अमि मिश्र का गाया यह गीत हिन्दी-अंग्रेज़ी गीत है जिसमें चीनी वाद्य एर्हु का प्रयोग हुआ है। फ़रहान की "तू थोड़ी देर ठहर जा" का अंग्रेज़ी संस्करण है "stay a little longer" जिसे लिखा व गाया है अनुष्का शहाणे ने, लेकिन हिन्दी संस्करण ही दिल को छूता है। ऐल्बम का अगला गीत है फ़िल्म का शीर्षक गीत "मेरे दिल में" जिसे ॠषी रिच ने कम्पोज़ किया है। हिन्दी और अंग्रेज़ी बोलों से सजा यह गीत यश आनन्द, यश नर्वेकर, आर. रेखी, इशिता मित्र उधवानी और वेरोनिका मेहता ने लिखा है तथा इसे गाया है वेरिनिका और यश नर्वेकर ने। यह दौर सोशल मीडिया में प्रेम निवेदन का दौर है और यह गीत इसी बात की पुष्टि करता है। रैप के शौकीनों के लिए है यह गीत आकर्षक होगा। इसी गीत का एक संवाद संस्करण भी है जिसमें अर्जुन कपूर ने भोजपुरी में संवाद बोले हैं। कुल मिला कर यह ऐल्बम टूटे हुए दिल वाले आशिकों को ध्यान में रख कर बनाया गया है ऐसा प्रतीत होता है। इसी सप्ताह प्रदर्शित हुई ’जट्टू इंजिनीयर’। कम बजट की यह फ़िल्म नहीं चली। गुरमीत राम रहिम सिंह के संगीत में उन्हीं का लिखा और गाया "होली की पिचकारी" और "जोश में पूरे होश में" गीत सुनने वालों पर कोई असर नहीं कर सके।

19 मई को ’हिन्दी मीडियम’ भी प्रदर्शित हुई जिसमें फिर एक बार सचिन-जिगर का संगीत था। इसके ऐल्बम में 2016 के गुरु रंढवा और अर्जुन के चार्टबस्टर गीत "सूट सूट" को शामिल किया गया है। इसे कम्पोज़ किया था गुरु और रजत नागपाल ने। उत्तर भारत के शादी में बजने वाले गीतों की श्रेणी में यह गीत वहाँ के क्लब्स में ज़रूर ख़ूब बजेंगे। ऐल्बम का मूड बदल जाता है जब सचिन जिगर ले आते हैं आतिफ़ असलम को "हूर" में। प्रिया सरय्या के काव्यात्मक बोलों वाले इस गीत में आतिफ़ असलम का वही अंदाज़ सुनने को मिला एक अरसे के बाद। एक अच्छी रचना है कुल मिला कर। "सूट सूट" के बाद एक और सुपरहिट गीत है "ओ हो हो हो" जो बरसों से उत्तर भारत के क्लबों की शान है। सुखबीर के मूल गीत पर कुमार ने नए बोल लिखे हैं और इक्का ने रैप किया है। इस गीत की और क्या बात करें, यह तो लोकप्रियता के झंडे गाढ़ चुका है बरसों पहले ही। बाल गायिका तनिष्का सांघवी ने "इक जिन्दड़ी" को गा कर चमत्कृत कर दिया है। सचिन-जिगर और कुमार का यह गीत एक सिचुएशनल ट्रैक है जो फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाता है। मई के आख़िरी हफ़्ते चार फ़िल्में रिलीज़ हुईं। इनमें एक है कम बजट फ़िल्म ’चकल्लसपुर’। प्रवेश मल्लिक के लिखे और स्वरबद्ध गीतों में पहला गीत है फ़िल्म का शीर्षक गीत "चक चक चकल्लसपुर" जो एक हास्य गीत है और जिसे प्रवेश ने ही गाया है। इस गीत के बिल्कुल विपरीत भाव पर प्रवेश का गाया दर्द भरा गीत है "ये सपना किसका जला है"। तीसरा गीत बिहार के लोक शैली पर आधारित गीत है "उड़ जायी सुगनमा हो राम" जिसे सुनिल मल्लिक ने गाया है। इस गीत में एक बाप अपने मरे हुए बेटे को अपने हाथों में लेकर अस्पताल से घर की तरफ़ लौटते हुए दिखाया जाता है। ऐसे करुण दृश्य में अपनी आँसुओं को रोक पाना संभव नहीं, और उस पर ऐसे भावुक गीत ने व्यथा को और भी बढ़ा दिया है। मूड को बदलते हुए फ़िल्म का अन्तिम गीत है प्रवेश की आवाज़ में "मोरा बलमा सहरिया"। सस्ते भोजपुरी गीतों के ऐल्बम का कोई गीत है ऐसा प्रतीत होता है। इस सप्ताह की दूसरी फ़िल्म है ’कुटुम्ब - दि फ़ैमिली’। आर्यन जैन के संगीत में फ़िल्म के गीत आर्यन और राजेन्द्र तिवारी ने लिखे हैं। पहला गीत एक होली गीत है आर्यन जैन, तृप्ति शक्या और राजपाल यादव की आवाज़ों में। "अवध का छोरा मचाए धमाल" में वो सब बातें हैं जो एक होली गीत में होती हैं। दूसरा गीत है "जाने क्यों बेवजह ये मौसम सुहाना सुहाना लगे" जिसे शाहिद माल्या ने गाया है। पहले प्यार के अहसास को दर्शाता यह गीत एक सुन्दर रचना है। मुखड़े के बाद क़व्वाली/ सूफ़ी शैली में अन्तरा कम्पोज़ किया है आर्यन ने। जावेद अली और लीना बोस की आवाज़ों में "इश्क़ में तेरे ऐसा लगी मुझे यार जैसे ठंडी ठंडी पुर्वैया की चली है बयार" मिट्टी की ख़ुशबू लिए एक नर्मोनाज़ुक प्रेम गीत है। अफ़सोस की बात यह है कि कम बजट की फ़िल्म होने की वजह से इन गानो का ज़्यादा प्रोमोशन नहीं हुआ और इसलिए इन्हें ज़्यादा सुना नहीं जा रहा है।

मई के आख़िरी सप्ताह की तीसरी फ़िल्म थी ’थोड़ी थोड़ी सी मनमानियाँ’। फ़िल्म में दो गीतकार-संगीतकार जोड़ियाँ हैं - गीतकार राघव दत्त - संगीतकार ट्रॉय आरिफ़, तथा गीतकार प्रेरणा सहेतिया - संगीतकार अजय वाज़। इस ऐल्बम में गाने ऐसे हैं जो हर उम्र के श्रोताओं को पसंद आएंगे। राघव-ट्रॉय के दो गीत हैं और प्रेरणा-अजय के तीन। राघव-ट्रॉय का पहला गीत है शेखर रावजियानी और शालमली खोलगडे की आवाज़ों में "मेहरबाँ मेहरबाँ" और दूसरा गीत है यासेर देसाई का गाया "बंजारे"। पहला गीत अगर थिरकता डान्स नंबर है तो दूसरा गीत सॉफ़्ट रॉक शैली में कम्पोज़ किया हुआ ऐसा गीत है जो आपको पिछले दशक के इमरान हाश्मी के फ़िल्मों के गीतों की याद दिला जाएगा। प्रेरणा-अजय के तीन गीत हैं "तू बस चल यहाँ" (निखिल डी’सूज़ा, प्रेरणा), "थोड़ी मनमानियाँ" (निखिल) और "तराशता मैं ये रास्ता" (सिद्धार्थ बसरूर)। "तू बस चल यहाँ" में देसी पंजाबी और रॉक म्युज़िक का फ़्युज़न है; उधर "थोड़ी मनमानियाँ" फ़िल्म के शीर्षक गीत के रूप में एक केअर-फ़्री क़िस्म का गीत है जिसमें एक युवा अपने मन की सुनने की सीख देख रहा है सभी को। "तराशता मैं" में सिद्धार्थ की आवाज़ में एक यूथ अपील है, एक नयापन है जो उन्हें आगे ले जाने में कारगर सिद्ध होगी। मई के अन्तिम सप्ताह में प्रदर्शित होने वाली चौथी और सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म रही सचिन तेन्दुलकर की बायोपिक ’सचिन- ए बिलियन ड्रीम्स’। इस फ़िल्म में गीतों की ज़्यादा गुंजाइश नहीं थी। ए. आर. रहमान और इरशाद कामिल ने तीन गीत रचे हैं। पहला गीत तो हमें सीधा क्रिकेट स्टेडियम में पहुँचा देता है। "सचिन सचिन" का शोर, और ड्रम्स के बीट्स ने इस गीत को एक पावरफ़ुल ट्रैक बना दिया है। इस गीत की ख़ासियत यह है कि इसके चौदह संस्करण बने हैं अलग अलग भारतीय भाषाओं में। ऐसा पिछली बार शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म ’फ़ैन’ में देखा गया था। ख़ैर, इस गीत में कैली ने रैप किया है और सुखविन्दर सिंह की बुलन्द आवाज़ खुल कर आई है जैसा उन्होंने "चक दे इंडिया" में गाया था। शास्त्रीय संगीत की छोटी-छोटी बारीकियों को क्या ख़ूब उभारा है उन्होंने। और दूसरा गीत है "हिन्द मेरे जिन्द" रहमान की आवाज़ में है। देशभक्ति की छाया लिए यह गीत हारमोनियम, बाँसुरी और ड्रम बीट्स से सुसज्जित एक विजय गीत है। और तीसरा गीत है "मर्द मराठा" जिसे ए. आर. अमीन और अंजली गायकवाड ने गाया है। मराठी लोक शैली में कम्पोज़ यह गीत हमें थिरका जाता है। सचिन के लिए हर भारतीय के दिल में इतनी इज़्ज़त है कि उन पर बनी इस फ़िल्म का हर एक पहलु हमें पसन्द आएगी और इसके गानें कोई व्यतिक्रम नहीं है।

जून का महीना शुरु हुआ ऐनिमेटेड फ़िल्म ’हनुमान दा दमदार’ से। रुचि नारायण की इस बाल फ़िल्म में बॉलीवूड के कई जानेमाने कलाकारों ने अपनी आवाज़ें दीं जैसे कि सलमान ख़ान, जावेद अख़्तर, रवीना टंडन, विनय पाठक, मकरन्द देशपांडे, सौरभ शुक्ला, चंकी पांडे, कुणाल खेमु, स्नेहा खनवलकर और हुसैन दलाल। स्नेहा ने ही फ़िल्म का संगीत तैयार किया है और गीत लिखे हैं अभिषेक दुबे ने। ऐल्बम का पहला गीत है सागर कुन्दुरकर की आवाज़ में "भाई ओ भाई"। बच्चों को यह गीत निस्संदेह पसन्द आएगा इसके रीदम और मज़ेदार बोलों की वजह से। दूसरा गीत है "हनुमान चालीसा" जिसे स्नेहा पंडित, मिलिन्द बोरवनकर, निहार शेम्बेकर, रुचि नारायण और ताहिर शब्बीर ने गाया है। बाल आवाज़ में ’हनुमान चालीसा’ का आधुनिक संस्करण आकर्षक है जिसमें गीटार और ड्रम्स ने फ़्युज़न की सृष्टि की है। स्वानन्द किरकिरे और मीनल जैन की आवाज़ों में "आजा आजा निन्नि वाली परियाँ" एक लोरी गीत है जिसमें ऐसी कहानी है जो बच्चों को रात में सुलाते हुए सुनाई जाती है। और चौथा गीत है वही फ़िल्म ’मासूम’ का इतिहास रचने वाला "लकड़ी की काठी" जिसे रिक्रीएट किया गया है। गुलज़ार और पंचम के मूल गीत को वनिता मिश्र, गौरी बापट और गुरप्रीत कौर ने गाया था। ’हनुमान दा दमदार’ फ़िल्म के लिए इस गीत के लिए अतिरिक्त बोल लिखे हैं फ़िल्म के गीतकार अभिषेक दुबे ने, और इस गीत को गाया है राशी सलिल हरमलकर, विया कुमार, अरहान ख़ान, विक्रम सदानन्द पटकर और अत्रेयी भट्टाचार्य ने। कुल मिला कर इस फ़िल्म के चारों गीत अच्छे बने हैं और इनमें रचनात्मक्ता दिखाई देती है। जून के पहले सप्ताह कुल पाँच फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। एक की चर्चा हमने की, दूसरी फ़िल्म थी ’ए डेथ इन दि गंज’ जिसमें कोई गीत नहीं है। तीसरी फ़िल्म थी ’स्वीटी वेड्स एन आर आइ’। ऐल्बम की शुरुआत होती है अर्को के संगीत में अरमान मलिक और प्रकृति कक्कर के गाए "ओ साथिया" से। एक धीमा प्रेम गीत, कर्णप्रिय कम्पोज़िशन, ऐकोस्टिक गीटार का ताज़ा अहसास, कुल मिला कर एक सुन्दर रचना। अरमान और प्रकृति की असरदार आवाज़ों ने इस नर्मोनाज़ुक रोमान्टिक गीत को सुन्दर जामा पहनाया है। ऐल्बम का दूसरा गीत है 90 के दशक का सुपरहिट पंजाबी गीत "दिल ले गई कुड़ी गुजरात दी" जिसे जसबीर जस्सी ने गाया था। इस फ़िल्म की कहानी में एक गुजराती पिता अपनी बेटी की शादी एक एन.आर.आइ से करवाना चाहते हैं, शायद इसी से प्रेरित होकर इस गीत को इस फ़िल्म में रखने का विचार आया होगा। ख़ैर, स्व: श्याम भटेजा के मूल गीत पर अतिरिक्त बोल लिखे डॉ. देवेन्द्र काफ़िर ने और संगीत रिक्रीएट किया जयदेव कुमार ने। केडी के रैप पर जसबीर जस्सी के साथ सोनिआ शर्मा और अकासा सिंह की भी आवाज़ें हैं। रैप वाले जगहों पर गुजराती शब्द डाले गए हैं जो सुनने में मज़ेदार हैं। तीसरा गीत एक बार फिर से सॉफ़्ट नंबर है पलाश मुछाल के लिखे और संगीत में। इस गीत के कुल चार संस्करण हैं। पहले संस्करण में आतिफ़ असलम और पलक मुछाल की आवाज़ें हैं; पहली बार सुनते हुए हो सकता है यह गीत ज़्यादा अपील न करे, लेकिन दो एक बार सुनने पर इसकी कर्णप्रियता दिल को भी छूने लगती है। लेकिन पलक की आवाज़ अतिथि गायिका के रूप में ही लिया गया है जो शुरु होने से पहले ही जैसे ख़त्म हो जाती है। अरिजीत के एकल संस्करण में एक हौन्टिंग् टच है और तीसरे संस्करण में आतिफ़ और अरिजीत के संस्करणों को मिक्स किया गया है जो अपने आप में एक अनोखा प्रयोग है। चौथा संस्करण है पलक मुछाल की एकल आवाज़ में। पलाश का ही लिखा और स्वरबद्ध किया एक शादी गीत है "वेडिंग् होने वाली है" जिसे पलक मुछाल और शाहिद माल्या ने गाया है। एक चुलबुला मज़ेदार गीत जिसमें लड़का शादी के बन्धन को अस्त-व्यस्त कर रहा है और लड़की शादी को लेकर उत्साहित है। राज आशू के संगीत में, शकील आज़मी का लिखा अरमान मलिक की आवाज़ में "शिद्दत से चाहता हूँ" एक तीव्र प्रेम का गीत है जिसमें अरमान की आवाज़ से दीवानगी छलक रही है। इसी गीत का मोहम्मद इरफ़ान का गाया अन्य संस्करण भी है जो अरमान के मुकाबले नर्म है, नाज़ुक है। दोनों संस्करणों का वैषम्य सुन्दर बन पड़ा है। ऐल्बम का आख़िरी नग़मा है "ज़िन्दगी बना लूँ"। पलक मुछाल की आवाज़ में शाहजहाँ अली का स्वरबद्ध किया और बंजारा रफ़ी का लिखा यह गीत कर्णप्रिय है जिस पर संगीत संयोजन इसे और भी ज़्यादा भावुक बनाता है। कुल मिला कर ’स्वीटी वेड्स एन आर आइ’ का ऐल्बम ऐवरेज से उपर है।

2 जून को प्रदर्शित होने वाली पाँच फ़िल्मों में चौथी फ़िल्म थी ’दोबारा: सी यू ईविल’। यूं तो हॉरर फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा गीतों की गुंजाइश नहीं होती है, लेकिन ’1920’ फ़िल्म से इस जौनर की फ़िल्मों में भी अच्छे ख़ासे गीतों का चलन शुरु हुआ था और अब तक जारी है। ’दोबारा’ में भी चार गीत हैं। अर्को का लिखा, उन्हीं का स्वरबद्ध और उनकी तथा असीस कौर की आवाज़ों में ऐल्बम का पहला गीत है "कारी कारी"। अकेलापन और यादें रात की तन्हाई में किस तरह डँसती हैं, यह गीत प्रमाण है। उदासी भरा यह गीत दिल को उदास कर देता है। इस गीत के अन्य संस्करण में अर्को के साथ पायल देव की आवाज़ है। नवोदित गायिका ज्योतिका टंग्री की आवाज़ में "हमदर्द" एक बार फिर अर्को की लिखी-स्वरबद्ध रचना है जिसमें विक्रम भट्ट के हॉरर फ़िल्मों के गीतों के जौनर की याद दिलाती है। गीत में वायलिन का संगीत एक अमंगल की अनुभूति कराती है जो शायद फ़िल्म की कहानी के साथ चलती है। इस गीत का भी एक अन्य संस्करण है जिसमें नेहा पांडे की मुख्य आवाज़ है और साथ में है पैरी जी का रैप। दोनों में निस्सन्देह पहला संस्करण बेहतर है। ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत अरिजीत सिंह की आवाज़ में है - "अब रात गुज़रने वाली है"। पुनीत शर्मा का लिखा व समीरा कोपीकर द्वारा स्वरबद्ध यह गीत ऐल्बम के दूसरे गीतों के भाव के इर्द-गिर्द ही घूमता है लेकिन कुल मिला कर इसका स्तर ऊँचा है। गीत का अन्य संस्करण है समीरा की आवाज़ में जिस पर जोनथन रेबेरो का रैप है। समीरा की आवाज़ में भी यह गीत अच्छा सुनाई दिया पर अरिजीत वाले संस्करण की बात ही कुछ और है। ऐल्बम के अन्डरकरण्ट को एक तरफ़ रखते हुए ऐल्बम का अन्तिम गीत कुछ अलग हट कर है। ताशा ताह और राऊल की आवाज़ों में "मलंग" को एक प्रोमोशनल ट्रैक के रूप में इस्तमाल किया गया। इन दोनों ने इस गीत को लिखा और संगीत दिया राऊल और मैक्स वूल्फ़ ने। लगता नहीं कि इस गीत को फ़िल्म की कहानी में कोई जगह मिली होगी। और 2 जून को रिलीज़ होने वाली पाँचवी फ़िल्म रही ’डिअर माया’ जिसमें मनीषा कोइराला ने अभिनय किया। अनुपम रॉय के संगीत में ऐल्बम का पहला गीत है "सात रंगों से दोस्ताना हुआ" जिसे रेखा भारद्वाज ने गाया है। तबला और सितार के सुन्दर समन्वय ने इस सुरीले गीत की शान को बढ़ा दिया है। इसी गीत का एक ऐकोस्टिक वर्ज़न है अनुपम की ही आवाज़ में जिसमें घटम के संयोजन ने चार चाँद लगा दिया है। हर्षदीप कौर की आवाज़ में "सूने साये तूने पाए" भी बहुत ही सुन्दर तरीके से गाया गया है जिसमें फ़्युज़न है भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का। जोनिता गांधी की आवाज़ में "कहने को" एक मधुर तान से शुरु होता है जो जुदाई के दर्द को उजागर करता है। गीत का हूक लाइन है "How do I say goodbye?" और ऐल्बम का अन्तिम गीत है "बुरी बुरी"। राशी मल की आवाज़ में यह गीत स्पाइस गर्ल्स की याद दिला जाता है।

9 जून को भी पाँच फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। पहली फ़िल्म है ’राबता’ जिसमें सुशान्त सिंह राजपूत और कृति सानोन ने अभिनय किया है। प्रीतम और JAM8 के संगीत में फ़िल्म के गीतों को लिखा है अमिताभ भट्टाचार्य, इरशाद कामिल और कुमार ने। पिछले दिनों यह फ़िल्म विवादों से घिर गई। पहले इसे 2009 की तेलुगू फ़िल्म ’मगधीरा’ के निर्माताओं से लीगल नोटिस मिला उनकी फ़िल्म की कहानी चुराने के इलज़ाम में। और तीन सप्ताह पहले संगीतकार प्रीतम ने फ़िल्म के निर्माता से अनुरोध किया कि उनका नाम फ़िल्म की नामावली से हटा दिया जाए क्योंकि वो किसी और के गीतों को रिक्रीएट करना नहीं चाहते। फ़िल्म के निर्माता चाहते थे कि T-Series के एक हिट गीत को प्रोमोशन के मक़सद से इस्तमाल किया जाए। लेकिन इन सब के बावजूद फ़िल्म का ऐल्बम बहुत ही साधारण बना है। ऐल्बम का पहला गीत है अरिजीत सिंह की आवाज़ में "इक वारी"। ऊँची दुकान फीका पकवान, इस गीत के लिए यह मुहावरा सटीक है। ऐकोस्टिक गीटार का सिन्थेसाइज़र कॉर्ड्स के साथ जुगलबन्दी, इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों का क्रेसेन्डो, नए ज़माने के परक्युशन लूप्स, और उस पर अरिजीत की असरदार आवाज़; लेकिन ताज्जुब की बात है कि गीत ख़त्म होने के बाद आपके दिल पर कोई असर नहीं होता। इसका एक जुबिन नौटियाल संस्करण भी है जिसमें गायकी नर्म है और पार्श्व में कोरस है। मेरी व्यक्तिगत पसन्द अरिजीत वाला संस्करण है। आपको याद होगा ’एजेन्ट विनोद’ फ़िल्म में प्रीतम का ही रचा "राबता" गीत था श्रेया घोषाल का गाया। इस फ़िल्म में इसी गीत को शीर्षक गीत के रूप में डाला गया है जिसे अरिजीत सिंह और निकिता गांधी ने गाया है। श्रेया वाला संस्करण निस्संदेह ज़्यादा सुरीला था, इस वाले में बहुत ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों और ऑटोट्युनरों का कुंभ लगा है। आज के कलाकारों को शायद ऐसा लगता है कि "अली", "मौला" जैसे शब्दों के होने से ही वह एक सूफ़ी गीत बन जाता है। इस फ़िल्म के साथ भी यही हुआ। अरिजीत की आवाज़ में "लम्बी सी जुदाइयाँ" एक दर्द भरा गीत है जो वायलिन से शुरु हो कर ऐकोस्टिक गीटार से होते हुए 90 के दशक के ढोलक और सिन्थेसाइज़र के रास्ते चल पड़ता है। लेकिन तभी अचानक "अली मौला" के नारे सुनाई देते हैं जिनका इस्तमाल इस गीत को एक सूफ़ी नंबर करार देने के अलावा कुछ और नहीं हो सकता। अरिजीत ने वैसे इस गीत को सही मुकाम दिलाया है और कम्पोज़िशन के लिहाज़ से भी इस ऐल्बम का यह एक उम्दा नग़मा है। अरिजीत, नेहा कक्कर और मीत ब्रदर्स की आवाज़ों में "मैं तेरा बॉयफ़्रेन्ड ना ना ना" भी एक रीमेक है 2015 के हिट पंजाबी गीत का। गीत का कैची रीदम इसे लोकप्रिय बनाएगी इसमें कोई संदेह नहीं है पर इस गीत में कोई ख़ास बात भी नहीं है। आतिफ़ असलम की आवाज़ में "दरसल" का कम्पोज़िशन अच्छा है लेकिन आतिफ़ की हर गीत में अपने ’जल’ बैन्ड जैसी गायकी एकरसता पैदा कर रही है। एक लव बैले में जिस तरह की नाज़ुकी की ज़रूरत होती है, वह कहीं कहीं ही सुनाई दी। कुल मिला कर ’राबता’ का गीत-संगीत ऐवरेज है।

9 जून को प्रदर्शित होने वाली दूसरी फ़िल्म है ’बहन होगी तेरी’ जो एक रोमान्टिक कॉमेडी है और इस थीम का असर इसके सात गीतों पर भी पड़ा है। ऐल्बम का पहला गीत है "जय मा - काला चश्मा" जिसमें भक्ति रस है और ऐसा लगता है कि फ़िल्म में इसे जागरण के दृश्य के लिए प्रयोग में लाया गया होगा। संगीतकार जयदेव कुमार ने मूल "काला चश्मा" की धुन को बरकरार रखा है। साहिल सोलंकी, ज्योतिका टंगरी और पैरी जी के गाए इस गीत में मूल गीत की पंक्तियों पर माँ शेरावाली की शान में पंक्तियाँ डाले हैं गीतकार सोनू सग्गु ने। 80-90 के दशक में लोकप्रिय फ़िल्मी गीतों की धुनों पर भजन-कीर्तन की याद दिला दी है इस गीत ने। कुल मिला कर सभी ने अच्छा काम किया है इस गीत में। अरिजीत की आवाज़ में "तेरा होके रहूँ" ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। इन्टरल्युड में बांसुरी की नर्म ध्वनियाँ और पार्श्व में ऐकोस्टिक गीटार का प्रयोग बहुत सुन्दर है जो इस धीमे रोमान्टिक गीत को और भी असरदार बनाते हैं। कौशिक, आकाश और गुड्डु द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को बिपिन दास ने लिखा है। राहुल देव बर्मन - आनन्द बक्शी के सुपरहिट गीत "जानू मेरी जान मैं तेरे कुर्बान" को ॠषी रिच ने इस फ़िल्म के लिए रीक्रिएट किया है जिसे जग्गी डी, शिवि और रफ़्तार ने गाया है। मूल गीत का फ़्लेवर बरकरार है जिस पर क्लबों में नौजवान ख़ूब थिरक रहे होंगे इन दिनों। यासिर देसाई, पावनी पांडे और यश नरवेकर के गाए "तेरी यादों में" एक रोमान्टिक गीत है जिसकी शुरुआत आशाजनक है लेकिन आगे चल कर गीत कहीं खो जाता है। वैसे यश और सुकृति कक्कर की आवाज़ में इस गीत का रीप्राइज़ वर्ज़न काफ़ी बेहतर है। अमजद नदीम द्वारा स्वरबद्ध "तैनु ना बोल पावाँ" एक और धीमा मेलडी प्रधान गीत है जिसे यासिर और ज्योतिका की सुरीली गायकी सुनने वालों को अपनी ओर खींच कर रखता है। इसका भी रीप्राइज़ वर्ज़न असीस कौर की आवाज़ में मूल गीत से बेहतर है। इस सप्ताह रिलीज़ होने वाली अगली फ़िल्म है ’बच्चे सच्चे कच्चे’। इस फ़िल्म में अन्ना हज़ारे ने अतिथि भूमिका निभाई है। फ़िल्म के संगीतकार हैं रविशंकर एस। बच्चों के फ़िल्म में जिस तरह के गाने होते हैं, इस फ़िल्म में भी उसी तरह के हैं। फ़िल्म का शीर्षक गीत वाइ. स्पूर्ति और साथियों ने गाया है जिसमें बच्चे बड़ों की ग़लतियों को पक्ड़ रहे हैं। गीत लिखा है मीना और यशमिता ने। दूसरा गीत है "तेरे पास ये नहीं वो नहीं" जिसे भरत और वैष्नवि ने गाया है। गीत बहुत ही अर्थपूर्ण है जो आज के बच्चों की मनस्थिति को दर्शाता है। फ़िल्म का एक और गीत है "ऐ ख़ुदा वक़्त की रफ़्तार को बढ़ा दे" जावेद अली की आवाज़ में जिसमें एक सूफ़ियाना अंग है और दर्दीला होते हुए भी मन को सुकून देता है।

जून के दूसरे सप्ताह की अगली फ़िल्म रही ’लव यू फ़ैमिली’। इसमें चार संगीतकारों ने संगीत दिया। ऐल्बम का पहला गीत तनमय पाहवा के संगीत में संजीव चतुर्वेदी का लिखा हुआ है। प्रथमेश ताम्बे की आवाज़ में "सर से पाँव तक तेरा इश्क़ ओढ़ बैठा हूँ" युवा अपील लिए एक रोमान्टिक गीत है जिसे निस्संदेह आज की युवा पीढ़ी पसन्द करेगी। साज़ों की अनर्थक भीड़ नहीं, बोल भी सुन्दर, और प्रथमेश की नई ताज़ी दिलकश आवाज़ में इस गीत को सुन कर अच्छा लगा। दूसरा गीत है नरेश करवाला के संगीत में और उन्हीं का लिखा हुआ। ज़ुबीन गर्ग और मेघना यागनिक की आवाज़ों में "तूने छूआ जाने क्या हुआ के जल उठा है बदन" डिस्को बीट्स वाला आधुनिक प्रेम गीत है जिसमें कामोत्तेजक बोल जैसे कि "होठों पे तपस है, साँसों में सिस्कियाँ, लम्हों की ख़्वाहिशें, अब तू समझ भी जा, बरस जा मुझ पे तू बरस जा" गीत को एक कामुक अंग प्रदान करते हैं। ज़ुबीन की आवाज़ में इस तरह के गीत निखर कर आता है। रॉबी बादल ने ऐल्बम के तीम गीत कम्पोज़ किए हैं जिन्हें तीन अलग अलग गीतकारों ने लिखे हैं। तनवीर ग़ाज़ी का लिखा "इश्क़ ने ऐसा शंख बजाया, गूंज उठी तन्हाई मेरी" मधुश्री और सोनू निगम की आवाज़ों में एक बेहद कर्णप्रिय रचना है जिसमें शास्त्रीय संगीत की छाया है। एक अरसे के बाद वरिष्ठ गायकों की आवाज़ में ऐसा स्तरीय गीत सुन कर एक सुखद अनुभूति हुई। मधुश्री की एकल आवाज़ में स्व: हैदर नाज़मी का लिखा "माँ" भी एक भावुक रचना है जिसमें एक बेटी अपनी माँ को ख़त लिख रही है। इसे सुनते हुए आँसुओं को रोक पाना मुश्किल है। फिर एक बार रॉबी बादल ने बेहद ख़ूबसूरत कम्पोज़िशन तैयार की है। "साथ कोई नहीं मेरे, पास कोई नहीं अब मेरे, दुख में उलझी हूँ माँ, ख़ुद से रूठी हूँ माँ, मुझसे रूठा मेरा आसमाँ, ओ माँ..."। मधुश्री की ऊँची पट्टी पर "ओ माँ" की पुकार कलेजा चीर जाता है। शाहिद ख़ान का लिखा फ़िल्म का शीर्षक गीत गाया है मधुश्री, विक्रान्त सिंह, मृदुल घोष, सौम्या और रॉबी बादल; यह एक अंग्रेज़ी गीत है जिसकी धुन "लास्ट क्रिस्मस" की धुन से प्रेरित है (इसी धुन से अनु मलिक भी प्रेरित हुए थे "दिल मेरा चुराया क्यों" गीत के लिए)। यह एक सिचुएशनल गीत है जिसका अस्तित्व फ़िल्म के अन्दर ही है। संगीतकार विष्णु नारायण ने दो गीत कम्पोज़ किए हैं जिन्हें कनवर जुनेजा ने लिखा है। नरेश अय्यर और विष्णु नारायण की आवाज़ों में "नॉटी नॉटी पार्टी" एक साधारण पार्टी गीत है और इस तरह के गीत थोक के भाव आ रहे हैं आजकल। दलेर मेहन्दी, कल्पना पटवारी और विष्णु नारायण की आवाज़ों में "पेग शेग ला लो" भी एक और पार्टी गीत है, फ़र्क बस इतना है कि यह एक पंजाबी पेग शेग क़िस्म का डान्स नंबर है। इस बेहद आम गीत के लिए दलेर मेहन्दी जैसे वरिष्ठ गायक की क्या ज़रूरत पड़ गई, यह कहना मुश्किल है।

16 जून को दो फ़िल्में प्रदर्शित हुईं - ’गेस्ट इन लंदन’ और ’बैंक चोर’। ’अतिथि तुम कब जाओगे’ का सीकुएल ’गेस्ट इन लंदन’ के संगीत के लिए राघव सचर और अमित मिश्र को चुना गया। ऐल्बम शुरु होता है "फ़्रैंकली तू सोना नचदी" से जो एक डान्स नंबर है लेकिन तेज़ रफ़्तार वाला नहीं। अच्छी बात यह है कि इसमें अनर्थक ईलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों का महाकुंभ नहीं है। कुमार के पंजाबी प्रधान बोलों पर राघव सचर और तरन्नुम मलिक ने देसी धमाल मचाया है। राघव ने सैक्सोफ़ोन का अच्छा प्रयोग किया है इस गीत में। "बारिश" जैसे सुकूनदायक गीत के बाद ऐश किंग् की वापसी हुई है "दिल मेरा" गीत में। प्रकृति कक्कर और शाहिद माल्या की आवाज़ों के होते हुए भी यह गीत कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पायी। तीसरा गीत है "दारु विच प्यार" जो हमें ’रईस’ के "लैला मैं लैला" की याद दिला जाता है। वैसे यह गीत ’तुम बिन’ के ताज़ के गाए "दारु विच प्यार" का ही रीक्रिएशन है जिस पर आर्य आचार्य ने रैपिंग् की है। अमित मिश्र और नवेन्दु त्रिपाठी का गाया फ़िल्म का शीर्षक गीत एक सिचुएशनल गीत है जिसका फ़िल्म की कहानी में ही महत्व होगा। "आएगा आनेवाला" गीत के मुखड़े को ही आधार बना कर इस गीत को डेवेलप किया गया है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "रब्बा मेरे हाल दा मेहरम तू" सूफ़ीयाना अंदाज़ का भक्तिमूलक रचना है जिसमें सुमीत आनन्द और अमित मिश्र की आवाज़ें हैं। इस ऐल्बम की अच्छी बात यह है कि केवल पाँच गाने हैं अलग अलग तरह के और किसी भी गीत का अनर्थक रीमिक्स वर्ज़न नहीं बनाया गया है। ’बैंक चोर’ फ़िल्म का साउन्डट्रैक एक मल्टि-कम्पोज़र ऐल्बम है जिसमें कैलाश खेर, रोचक कोहली, शमिर टंडन, और बाबा सेहगल ने संगीत दिया है। ऐल्बम का पहला गीत शीर्षक गीत है "हम हैं बैंक चोर" जिसे कैलाश खेर और अम्बिलि मेनन ने गाया है। इन दोनों ने ही इसे मिल कर लिखा है। जिस तरह से बीच बीच में "बैंक चोर" बोला गया है, ऐसा लगता है कि जैसे आज के दौर का सर्वाधिक लोकप्रिय गाली को बढ़ावा दिया गया है। कैलाश खेर जैसे गायक को इस तरह के घटिया उद्येश्य वाले गीत को लिखने, स्वरबद्ध करने और गाने की क्या आवश्यक्ता पड़ गई थी यह वो ही बता सकते हैं बेहतर! ऐल्बम का दूसरा गीत है अधीश शर्मा का लिखा और रोचक कोहली का स्वरबद्ध किया "तशरीफ़"। रोचक की ही आवाज़ में यह गीत हाल के समय में आने वाली हास्य प्रधान गीतों में काफ़ी सृजनात्मक है। ’हवाइज़ादा’ के गीतों की तरह इस गीत में भी रोचक ने देसी मिज़ाज को बरकरार रखा है। शमिर टंडन के संगीत में वरुण लिखाटे का लिखा ऐल्बम का तीसरा गीत है "बीसी रैप नॉक-आउट: मुंबई वर्सस दिल्ली" जो मुंबई और दिल्ली के बीच एक रैप बैटल है। बहुत ही नई सोच है और काफ़ी मज़ेदार भी। गायक नेज़ी और प्रधान ने अच्छी गायकी का प्रदर्शन किया है। गौतम गोविंद शर्मा का लिखा, रोचक कोहली का स्वरबद्ध किया नकश अज़ीज़ और साथियों का गाया "जय बाबा बैंक चोर" सुन कर ऐसा लग रहा है कि जैसे कोई उसी गाली का प्रोमोशन कर रहा है। बाबा सहगल का लिखा, स्वरबद्ध किया और उन्हीं का गाया "बाए बाबा बैंक चोर" तो जैसे एक गाली ही है। वर्ष 2017 के प्रथमार्ध की अन्तिम फ़िल्म है सलमान ख़ान की ’ट्युब लाइट’ जो रिलीज़ हो रही है ईद के पाक़ मौक़े पर। प्रीतम के संगीत से सजे इस फ़िल्म में गीत लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य और कौसर मुनीर ने। फ़िल्म में कुल छह गीत हैं। कमाल ख़ान और अमित मिश्र की आवाज़ में "सजन रेडियो बजने दे ज़रा"। इस गीत में पार्श्व संगीत और गायन को बहुत सुन्दर तरीके से समक्रमिक बनाया गया है। यह ऐल्बम अभी हाल ही में जारी हुआ है, देखना है कि क्या यह गीत धीरे धीरे लोकप्रियता के पायदान चढ़ पाता है या नहीं। "नाच मेरी जान" एक त्योहार गीत है जिसमें प्रीतम ने बड़ी चतुराई से चार अलग अलग आवाज़ों को साथ में लेकर आए हैं और ये आवाज़ें हैं कमाल ख़ान, नकश अज़ीज़, देव नेगी और तुषार जोशी। अमिताभ के शब्द असरदार हैं और "किन्तु परन्तु" जैसे बोल गीत को मज़ेदार बनाते हैं। कुल मिला कर एक अच्छा गीत है पर लगता नहीं कि यह एक लम्बी रेस का घोड़ा बन पाएगा। राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में "तिनका तिनका दिल मेरा" एक अच्छी रचना है और राहत साहब की पुर-असर आवाज़ में कोई भी आम गीत ख़ास बन ही जाता है।

यहाँ आकर पूरी होती है वर्ष 2017 के प्रथमार्ध में प्रदर्शित होने वाली हिन्दी फ़िल्मों के गीत-संगीत की समीक्षा। ’चित्रकथा’ में आगे चल कर हम फिर से लेकर आएँगे इस वर्ष के द्वितीयार्थ के फ़िल्मी गीतों का लेखा-जोखा। 



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, May 20, 2017

चित्रकथा - 19: 2017 के मार्च और अप्रैल में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत

अंक - 19

2017 के मार्च और अप्रैल में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत

"होली खेले बृज की हर बाला..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



फ़िल्म-संगीत की धारा, जो 1931 में शुरु हुई थी, निरन्तर बहती चली जा रही है, और इस वर्ष भी यह सुरीली धारा रसिकों के दिलों से गुज़रती हुई बहे चली जा रही है। आइए आज ’चित्रकथा’ में चर्चा करें मार्च और अप्रैल 2017 में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों के गीत-संगीत की। 





मार्च और अप्रैल के महीने, यानी कि वसन्त और होली के रंगों का संगम। हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री भी इन रंगों से बच नहीं सकी और एकाधिक होली गीत पिछले दो महीनों में जारी हुए। लेकिन फ़िल्मी गीतों की समीक्षा शुरु करने से पहले दो ग़ैर फ़िल्मी गीतों का उल्लेख करना चाहूंगा जिन्हें लिखा है ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के हमारे प्यारे साथी सजीव सारथी ने। पहला गीत एक होली गीत है "रंग" शीर्षक से जिसे अरविन्द तिवारी ने गाया है और चाणक्य शुक्ला ने संगीत से सँवारा है। "इस होरी डारो ऐसो रंग रे..." एक ऐसा होली गीत है जिसमें पारम्परिक स्वाद भी है और आधुनिक अंदाज़ का ज़ायका भी; गायकी में सूफ़ियाना रंग भी है और भारतीय शास्त्रीय संगीत की छटा भी। जितनी ख़ूबसूरत गायकी अरविन्द की है, वैसा ही है पीयुष अम्भोरे और सुबोध पाण्डे के शास्त्रीय आलाप और ताल गायन। और सजीव सारथी के शब्दों के तो कहने ही क्या। उपर उपर सुनने पर भले ही यह एक होली गीत लगे, पर ग़ौर करने पर पता चलता है कि दरसल यह एक एकतामूलक गीत है जो हमें साम्प्रदायिक एकता का पाठ पढ़ाता है जो आज के समय में सर्वाधिक आवश्यक है। इस गीत में हर एक रंग में प्यार का रंग भरने की बात है; हर एक इंसान अलग है, हर एक की अलग पहचान है, अलग धर्म है, अलग दिनचर्या है, लेकिन ऐसा कुछ करें कि एक इंसान में दूसरे इंसान की छवि मिले, अर्थात् हर इंसान भगवान की रचना है, इसलिए हर कोई सबसे पहले एक ही इंसान सूत्र में बंधा हुआ है, उसके बाद उसका धर्म, उसकी जाति वगेरह आते हैं। जिस तरह से होली में सब रंग एक साथ मिल कर एक रंग बन जाते हैं, उसी तरह हर इंसान को भी सिर्फ़ इंसान बने रहना चाहिए। सजीव सारथी का लिखा दूसरा गीत है "बेख़ुद" जिसे गाया है लन्दन में बसे देसी कलाकार बिस्वजीत नन्दा और सुप्रसिद्ध गायिका हेमा सरदेसाई ने और इसे कृष्ण राज ने स्वरबद्ध किया है। "बेख़ुद वेख़ुद सारा आलम" एक आधुनिक शैली का गीत है जिसमें रॉक फ़्लेवर भी है, बॉलीवूड संगीत की मस्ती भी, और हेमा सरदेसाई की वही "आवारा भँवरे" वाली चुलबुली अंदाज़ भी है। और अंगूठी का नगीना है बिस्वजीत के अरबी शैली में आलाप। इस गीत को सुनते हुए हम इसके साथ कनेक्ट हो जाते हैं और गीत ख़त्म होने पर दोबारा सुनने का मन करता है, यहाँ तक कि लूप में सुनते ही रहने का मन होता है।

अब आते हैं फ़िल्म संगीत पर। मार्च का महीना शुरु हुआ ’कमांडो 2’ के प्रदर्शन से। इस फ़िल्म के कुल सात गीतों में केवल तीन मूल गीत हैं। इसकी प्रीकुएल फ़िल्म ’कमांडो’ में लोक और राग आधारित गीत थे, लेकिन ’कमांडो’ में शहरी रंग साफ़ झलकती है। संगीतकार प्रीतम के 2007 की मशहूर फ़िल्म ’भूल भूलैया’ के हिट गीत "हरे कृष्णा हरे राम" को गौरव-रिशिन ने ’कमांडो 2’ के लिए रीक्रिएट किया है। अरमान मलिक, रितिका और रफ़्तार की आवाज़ें होने के बावजूद इस गीत का स्तर मूल गीत के आसपास भी नहीं है। ऐल्बम के अगले तीन गीतों के संगीतकार हैं मन्नन शाह। कुमार और आतिश कापड़िया ने बोल लिखे जैं। अरमान मलिक की आवाज़ में "तेरे दिल में क्या है" एक नर्म रॉक-पॉप शैली का रोमान्टिक गीत है। लाइव 16-पीस ऑरकेस्ट्रा द्वारा स्ट्रिंग् सेक्शन का प्रयोग इस गीत की ख़ासियत है। इसी गीत का एक निरर्थक ’क्लब मिक्स’ संस्करण भी है। "बुल्लेया" के गायक अमित मिश्रा की आवाज़ में "सीधा साधा दिल मेरा कम है तेरा ज़्यादा" भी एक रॉक आधारित रचना है जिसमें दिलचस्प प्रधान-गौण स्तर परिवर्तन हैं। अमित मिश्रा की रॉक अंदाज़ में प्रबल गायकी ने गीत को न्याय दिलाया है। इसी गीत के अन्य संस्करण में जुबिन नौटियाल की नर्मो-नाज़ुक गायकी उतना असरदार नहीं बन सका। ’कमांडो 2’ फ़िल्म के शीर्षक गीत के दो संस्करण हैं - हिन्दी और अंग्रेज़ी। दोनों संसकरण अदिति सिंह शर्मा ने गाया है। उनकी सशक्त गायकी से गीत का मक़्सद हासिल हो गया है, लेकिन फ़िल्म के बाहर इस गीत की कोई अहमियत नहीं है। कुल मिलाकर ’कमांडो 2’ का संगीत चार्टबस्टर बनने लायक नहीं है। मन्नन शाह को अपनी अगली फ़िल्म में इससे बेहतर प्रदर्शन का प्रयास करना चाहिए।

3 मार्च के दिन एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई - ’जीना इसी का नाम है’। पाँच संगीतकार वाले इस फ़िल्म में कुल सात गीत हैं। फ़िल्म का शीर्षक गीत केके की आवाज़ में है। दीपक अगरवाल के लिखे व स्वरबद्ध किए इस गीत को सुन कर शैलेन्द्र के लिखे इसी मुखड़े के गीत की याद आ गई। निस्संदेह यह गीत लिखते समय दीपक अगरवाल के उपर भी शैलेन्द्र के लिखे गीत की वजह से एक तनाव बनी होगी। "दर्द में कोई मुस्कुरा कर रहे, और कहे हवा हवा है ज़िन्दगी का खेल, वक़्त का है क्या आज है या है कल, दिन गुज़र भी जाएगा तू रखना ताल में, इतनी भी फ़िकर तू कर ना इस क़दर, दम है बहुत अभी जो तेरे पास है, जो हुआ हुआ तू रुक ना हार कर, बस यही तेरा इम्तिहान है, जीना इसी का नाम है, जीना इसी का नाम है..." - केके की उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में यह ठहराव से भरे गीत को सुनते हुए हम इससे जैसे जुड़ जाते हैं। ऐल्बम का दूसरा गीत है ऐश किंग् और शिल्पा राव का गाया "क़ुबूल है" जिसे लिखा है आशिष पंडित ने और स्वरबद्ध किया है विशु मुखर्जी ने। तेज़ जैज़ शैली पर आधारित इस पेप्पी गीत में वो सब ख़ूबियाँ हैं जो आपको झूमने पर मजबूर कर देती है। माउथ ऑरगन का सुंदर प्रयोग अन्तरालों में सुनाई देती है। अंग्रेज़ी शब्दों के हास्यास्पद प्रयोग ने गीत को और भी मज़ेदार बना दिया है। तीसरा गीत है "मुझको तेरे इश्क़ में भिगा दे" (गीतकार कुँवर जुनेजा, संगीतकार हैरी आनन्द) जिसे अंकित तिवारी ने फिर से अपने उसी दिलकश अंदाज़ में गा कर सिद्ध कर दिया है कि इस दौर के वो अग्रणी गायकों में से एक है। और निस्संदेह यह गीत इस साल के श्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों में चुना जाएगा। अन्तरालों में रॉक संगीत गीत में विविधता लाती है। सिद्धांत माधव के संगीत में कुंवर जुनेजा का ही लिखा स्वाति शर्मा का गाया गीत "सोचती हूँ आसमाँ का रंग मैं बदल दूँ" मूड को आगे बढ़ाता है। ओंकार मिन्हास के संगीत में इस फ़िल्म में दो गीत हैं; पहला गीत है आकृति का गाया "लट्टू" एक बच्चों वाला गीत जो "अक्कड़ बक्कड़ बॉम्बे बो" से शुरु होता है और पूरे गीत में तरह तरह के बच्चों वाले जुमले शामिल है। पर अफ़सोस की बात है कि गीत केन्द्रित है "लट्टू भी पी के टल्ली हुआ है" भाव पर। बच्चों वाले गीत में "टल्ली" होने जैसे शब्द समाज को क्या संदेश दे रहा है, सोचने वाली बात है। महेश शर्मा की यह गीत रचना है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "कागज़ सी है ज़िन्दगी" जो ऐल्बम के शीर्षक गीत का ही विस्तार है। ओंकार मिनहास के संगीत में फ़तेह शेर्गिल का लिखा ओंकार मिनहास, रानी हज़ारिका और यूवी का गाया यह गीत दार्शनिक है और यूवी की आवाज़ में जो दर्द है वह इस कम्पोज़िशन को बेहतर बनाती है। लेकिन "गूगल पे ढूंढ़ेगा तुझको ज़माना" जैसे बोल गीत को दर्शन से हास्य की तरफ़ ले जाता है और गीत के मूड और उद्येश्य को ख़तम कर देता है। इस गीत का एक धीमा संस्करण है जिसे नज़ीम के अली ने गाया है जो ज़्यादा अर्थपूर्ण और संजीदा है। कुल मिला कर इस ऐल्बम के गाने बहुत ज़्यादा काबिल-ए-तारीफ़ न होते हुए भी अपने नएपन की वजह से सुनने लायक हैं।


मार्च की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही ’बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ जो 10 तारीख़ को प्रदर्शित हुई। वरुण धवन - आलिआ भट्ट की हिट जोड़ी की इस फ़िल्म में इन दोनों की केमिस्ट्री और भी ज़्यादा निखर कर सामने आई। इससे पहले वरुण-आलिआ की ’हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ हिट रही और उसके गाने भी सुपरहिट रहे जैसे कि "सैटरडे सैटरडे", "लकी तू लकी मी", "मैं तैनु समझावाँ कि", "इमोशनल फ़ूल" आदि। अब ’बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ का गीत-संगीत भी मज़ेदार है। ऐल्बम का पहला गीत है "जो भिड़ा तेरे नैनों से टांका तो आशिक़ सरेन्डर हुआ"। संगीतकार-गायक अमाल मलिक और गायिका श्रेया घोषाल की मस्ती भरी आवाज़ों ने इस कैची थिरकते गीत को युवाओं के होठों तक पहुँचा ही दिया। वरिष्ठ गीतकार शब्बीर अहमद के मस्ती भरे बोलों का भी उतना ही योगदान है। इस गीत में 90 के दशक के गोविन्दा शैली के गीतों की झलक मिलती है। बरसों बाद इस तरह का यह गीत एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आया। दूसरा गीत है "रोके ना रुके नैना"। अमाल के संगीत और कुमार के बोलों से सजा अरिजीत सिंह की आवाज़ में यह गीत बेहद ख़ूबसूरत है और भारतीय पारम्परिक साज़ों जैसे कि सारंगी के प्रयोग से संगीत-संयोजन बहुत सुन्दर बन पड़ा है। स्तर की बात करें तो निस्संदेह यह इस फ़िल्म का श्रेष्ठ गीत है। तीसरे गीत के रूप में गीतकार-संगीतकार-गायक अखिल सचदेवा का "हमसफ़र" एक प्रेम कथागीत है। संगीत से ज़्यादा बोलों पर ज़ोर होने की वजह से गीत अर्थपूर्ण बन पड़ा है। अखिल के साथ मनशील गुजराल ने भी आलापों में अपनी आवाज़ मिलाई है। फ़िल्म का शीर्षक गीत "बद्री की दुल्हनिया" लोक शैली में कम्पोज़ किया हुआ एक होली गीत है। तनिश्क बागची द्वारा स्वरबद्ध और शब्बीर अहमद के बोलों से सजा यह गीत यू.पी. के मशहूर लोकगीत "काहे को जिया ललचाये गई रे मदमाती चिड़ैया" की धुन पर आधारित है। इसी नौटंकी धुन पर ’तीसरी क़सम’ का गीत "चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे" भी आधारित था। "तुझको बना कर के ले जाएँगे बद्री की दुल्हनिया" में आवाज़ें हैं देव नेगी, नेहा कक्कर, मोनाली ठाकुर, इक्का सिंह, रजनीगंधा शेखावत और साथियों की। ऐल्बम का समापन धमाके के साथ होता है "तम्मा तम्मा अगेन" से जो बप्पी लाहिड़ी और अनुराधा पौडवाल के गाए मशहूर गीत "तम्मा तम्मा लोगे" का रीमिक्स वर्ज़न है। इंदीवर के बोलों को ही रखा गया है और बप्पी-अनुराधा की आवाज़ें भी बरकरार हैं। बस बीच बीच में बादशाह का रैप और सोने पे सुहागा अमीन सायानी के ’बिनाका गीतमाला’ से कुछ कुछ लाइनें ली गई हैं। कुल मिला कर ’बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ एक दिलचस्प ऐल्बम है।

17 मार्च को तीन फ़िल्में रिलीज़ हुईं। पहली फ़िल्म ’आ गया हीरो’। गोविन्दा द्वारा निर्मित व अभिनीत यह फ़िल्म बुरी तरह पिटी और इसका गीत-संगीत भी बेकार है। मीत ब्रदर्स, शमिर, विक्की-हार्दिक और अर्घ्य बनर्जी जैसे संगीतकारों के होते हुए भी एक भी गीत क़ायदे का नहीं बना है। फ़िल्म के सातों गीत ("आ गया हीरो", "पुलिस वाला डॉन", "यूपी की डॉन", "लोहे दा लिवर", "डर्टी फ़्लर्टी", "लो होइगवा", "माहिया") में से कोई भी गीत चर्चायोग्य नहीं है। दूसरी फ़िल्म है ’ट्रैप्ड’ जो एक थ्रिलर है। थ्रिलर फ़िल्म में गीतों की गुंजाइश कम होती है। इस फ़िल्म में दो गीत हैं। संगीतकार अलोकानन्द दासगुप्ता और गीतकार राजेश्वरी दासगुप्ता ने दो गीत और दो थीम्स की रचना की है। तेजस मेनन की आवाज़ में "धीमी" एक प्रेम गीत है जिसमें एक अच्छी लगने वाली बात है। फ़िल्मांकन में अपने दफ़्तर में अपने क्रश के उपर जासूसी करने, मरीन ड्राइव में टैक्सी में सैर करने, देर रात के पावभाजी, ये सब हैं इस गीत में। दूसरा गीत है "है तू" जिसमें अलग हट कर आवाज़ है गौरी जयकुमार की। फ़िल्म का विषय अलग हट के होने की वजह से बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब नहीं रही और इस वजह से ये गीत भी अनसुने ही रह गए। 17 मार्च की तीसरी फ़िल्म रही ’मशीन’। अब्बास-मस्तान निर्मित व निर्देशित इस फ़िल्म में अब्बास साहब के पुत्र मुस्तफ़ा बर्मावाला को लौंच किया गया है। फ़िल्म के संगीतकार हैं तनिश्क बागची और डॉ. ज़ेउस जिन्होंने चार गीतों की धुनें बनाई है। पहला गीत आराफ़ात महमूद का लिखा हुआ यासिर देसाई और साशा तिरुपति का गाया हुआ है "इतना तुम्हें चाहा है ना सोच सकोगी" जिसकी पहली लाइन हू-ब-हू "आख़िर तुम्हें आना है ज़रा देर लगेगी" (यलगार) गीत जैसी है। इस पहली लाइन के अलावा दोनों गीतों में कोई समानता नहीं है। नर्मोनाज़ुक रोमान्टिक गीतों की श्रेणी में यह गीत है। यासिर की दिलकश आवाज़ में हिन्दी के बोल हैं जबकि साशा अंग्रेज़ी पंक्तियाँ गाती हैं। कुल मिलाकर एक कर्णप्रिय रचना। दूसरा गीत है "एक चतुर नार" जो फ़िल्म ’पड़ोसन’ के गीत से प्रेरित है। नकश अज़ीज़ और साशा तिरुपति की आवाज़ों में इसके बोलों को निकेत पांडे ने लिखे हैं। इक्का के रैप से सजा यह गीत बस एक मस्ती भरे गीत से ज़्यादा और कुछ नहीं है। जसमीन सैन्डलस और राजवीर सिंह की आवाज़ों में "ब्रेक ऐन फ़ेल" डॉ. ज़ेउस की संगीत रचना है जो जसमीन के फ़िल्म ’किक’ के हिट गीत "यार ना मिले तो मरजावाँ" से मिलती-जुलती है और इस हिन्दी-पंजाबी गीत में कोई नई या उल्लेखनीय बात नज़र नहीं आई। तनिश्क-आराफ़ात-यासिर की तिकड़ी का "तू ही तो मेरा" जैसे "इतना तुम्हें चाहा है" का ही विस्तार है। इस गीत का संगीत संयोजन आकर्षक है। फ़िल्म का अन्तिम गीत है "तेरा जुनून है सर पे चढ़ा" जो जुबिन नौटियाल की आवाज़ में है। जुबिन नौटियाल पिछले कुछ समय से सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। कर्णप्रिय आवाज़ के धनी जुबिन ने इस गीत को भी अच्छा अंजाम दिया है। आराफ़ात के लिखे इस गीत के बोलों में मोहम्मद इरफ़ान का भी योगदान है। इस फ़िल्म में "तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त" गीत को रिक्रीएट किया गया है। विजु शाह के मूल संगीत को तनिश्क बागची ने मिक्स किया है जबकि आनन्द बक्शी के मूल बोलों पर शब्बीर अहमद ने नए बोल लिखे हैं। मूल गीत में उदित नारायण और कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ें थीं, इस संस्करण में उदित नारायण और नेहा कक्कर की आवाज़ें हैं। इस तरह से ’मशीन’ में तीन प्रेम गीत और कुछ डान्स नंबर्स के होने के बावजूद इस ऐल्बम में जैसे पंच की कमी है। कुल मिला कर ऐल्बम बुरा नहीं है पर बहुत ज़्यादा दूर तक जाने की संभावना कम है।

24 मार्च को तीन फ़िल्में प्रदर्शित हुईं - ’फिल्लौरी’, ’भँवरे’, और ’अनारकली ऑफ़ आरा’। अंशई लाल की पहली निर्देशित फ़िल्म ’फिल्लौरी’ में लोगों की अनुष्का शर्मा के एक भूत के रूप में देखने की उत्सुक्ता के साथ-साथ फ़िल्म के ताज़े गीत-संगीत से भी आशाएँ रही। नवोदित संगीतकार शास्वत सचदेव और गायक रोमी ने इस फ़िल्म में "दम दम" और "साहिबा" जैसे गीतों में जादू रचए। इन दोनों गीतों में लोकशैली का प्रभाव है। रोमी ने दोनों गीतों में अपनी दिलकश आवाज़ से रूह डाल दी है और गीतों के ख़त्म हो जाने के बाद भी उनकी आवाज़ और सुर जैसे कानों में गूंजते रहते हैं। ये दोनों गीत अन्विता दत्त गुप्तन ने लिखा है और इनमें उनकी परिपक्वता साफ़ दिखाई देती है, ख़ास कर जब वो लिखती हैं "तेरे बिन साँस काँच सी काटे रे"। "दम दम" में रोमी के साथ आवाज़ विवेक हरिहरन की है और "साहिबा" में उनका साथ दिया है पावनी पांडे ने। "दम दम" का एक पंजाबी संस्करण भी है जिसके पंजाबी बोल शेली ने लिखे हैं। यह आश्चर्य की बात है कि दिलजीत दोसंझ, जिन पर ये गीत फ़िल्माये गए हैं, वो एक गायक होने के बावजूद इन गीतों में उनकी आवाज़ नहीं ली गई है। हालाँकि रोमी भी एक अच्छे गायक हैं, लेकिन फिर भी एक खटका सा लगता है। वैसे "दम दम" के एक और संस्करण में दिलजीत दोसंझ की आवाज़ है, लेकिन यह गीत फ़िल्म की कहानी में नहीं है। जसलीन कौर रॉयल ने इस फ़िल्म में दो गीत कम्पोज़ किए हैं। उन्हीं की आवाज़ में नीरज राजावत के लिखे "दिल शगना दा" एक मीठी लोरी से कम नहीं है। हाँ, यह गीत एक नवविवाहित दुल्हन के दिल की पुकार है जिसमें बेचैनी भी है और उत्तेजना भी। जसलीन द्वारा स्वरबद्ध "व्हाट्स अप" फ़िल्म के तीन डान्स नंबरों में से एक है। मिका की आवाज़ में यह पंजाबी थिरकता गीत बारात का गीत है, इसलिए कोई शक़ नहीं कि इसे सुनते हुए आप भी थिरक उठेंगे। लोक शैली में डान्स नंबर "बजाके तुम्बा" भी एक भंगड़ा/गिद्दा शैली का गीत है जिसमें शास्वत सचदेव के रेंज का पता चलता है जिन्होंने इस ऐल्बम में विविधता ले आए हैं - संजीदे गीत, लोक शैली का डान्स नंबर, आइटम गीत। दिलजीत दोसंझ, नकश अज़ीज़, शिल्पि पॉल और अनुष्का शर्मा की आवाज़ों में "नॉटी बिल्लो" भी पंजाबी रीदम का गीत है जिसमें कोई अलग हट के बत नहीं है। शोर-शराबे के अलावा इस गीत में कुछ नहीं है। ’फिल्लौरी’ के ऐल्बम में विविधता होते हुए भी हर गीत पंजाबी शैली का होने की वजह से ग़ैर-पंजाबी ऑडिएन्स इसे कैसे ग्रहण करेगी कह नहीं सकते। ’भँवरे’ फ़िल्म के गाने भी पंजाबी शैली के हैं। सौरभ चटर्जी और गौरव रत्नाकर के संगीत में इस फ़िल्म के गीत "पेन चोड़" में दोहरे अर्थ के बोलों की वजह से इसे कचरे के डब्बे में डाल दिया जा सकता है। 

स्वरा भास्कर अभिनीत ’अनारकली ऑफ़ आरा’ एक कामोत्तेजक गीतों की गायिका की कहानी है। इसलिए ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म के संगीत में लोक शैली का रंग है और साथ ही गीतों के बोल ऐसे हैं जो परिवार के साथ मिल बैठ कर नहीं सुने जा सकते। रोहित शर्मा स्वरबद्ध इस फ़िल्म के गीतों में दोहरे अर्थ की पंक्तियाँ  भर भर कर डाली गई हैं। स्वाति शर्मा, पावनी पांडे और इन्दु सोनाली के गाए इस तरह के गीतों के अलावा एक स्तरीय गीत भी है रेखा भारद्वाज की आवाज़ में जिसमें शास्त्रीय संगीत की छटा बिखरती है। यह गीत है "बदनाम जिया दे गारी" जिसमें उस नर्तकी के दर्द की वर्णना की गई है। कम्पोज़िशन मेलडी प्रधान होते हुए दर्दीला है। उस पर वायलिन, सितार, सारंगी और तबले के संगीत ने इसे एक आकर्षक गीत बना दिया है। सोनू निगम की दिलकश आवाज़ में "मिट्टी जिस्म की गीली हो चली, ख़ुशबू इसकी रूह तक घुली, इक लम्हा बनके आया है, सब ज़ख़मों का वैध, मन बेक़ैद हुआ" भी एक सुन्दर रचना है। कुल मिला कर इस फ़िल्म के गाने ऐसे हैं कि फ़िल्म की कहानी के हिसाब से अनुकूल हैं पर फ़िल्म के बाहर इन्हें सुनना शायद कर्णप्रिय न लगे। 31 मार्च को तापसी पन्नु, अक्षय कुमार, मनोज बाजपयी अभिनीत फ़िल्म ’नाम शबाना’ प्रदर्शित हुई। निर्मल पाण्डे ’बेबी’ के बाद लेकर आए ’नाम शबाना’। ’बेबी’ में ग़लत जगह पर फ़्लैशबैक सॉंग् के बाद ’नाम शबाना’ में चार गीत लेकर आए जिनका फ़िल्म की कहानी से कोई वास्ता नहीं। ये सारी बातें माफ़ की जा सकती थीं अगर ये चार गीत कमाल के होते। पर अफ़सोस कि बेहद साधारण क़िस्म के ये गीत ऐल्बम और फ़िल्म की शान नहीं बढ़ा सके। चार गीतों में तीन गीत संगीतकार रोचक कोहली और गीतकार मनोज मुन्तशिर के हैं जबकि चौथा गीत है मीत ब्रदर्स और कुमार का। पहला गीत "रोज़ाना" में श्रेया घोषाल की आवाज़ मधुर है पर रोचक ने वही घिसे पिटे धुन में इसे पिरो चर सारी रोचकता ख़त्म कर दी है। गीत समाप्त होने पर यह दिमाग़ से निकल जाता है, आपके साथ नहीं रह पाता। सुनिधि चौहान की आवाज़ में ऐल्बम का दूसरा गीत "ज़िन्दा" में भी वही "रोज़ाना" वाली बात। इससे तो ’इक़बाल’ फ़िल्म का "आशाएँ खिले दिल की" एक बार और सुन लेना बेहतर है। पुराने गीतों की रीमिक्स की नवोदित परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस ऐल्बम का तीसरा गीत है "ज़ुबि ज़ुबि ज़ुब्बी"। संगीतकार बप्पी लाहिड़ी - गायिका अलिशा चिनॉय के मूल गीत का रीमेक किया रोचक कोहली और सुकृति कक्कर ने। कहना ज़रूरी है कि सुकृति की आवाज़ में अलिशा वाली मादकता के न होने से इस गीत से वह चमक ग़ायब है। ऐल्बम का समापन मीत ब्रदर्स और जसमीन सैन्डलस के गाए "बेबी बेशरम" से होता है। हाल ही में जसमीन ने बिल्कुल ऐसा ही एक गीत फ़िल्म ’मशीन’ में गाया था जिसके बोल थे "ब्रेक एन फ़ेल", जो ’किक’ फ़िल्म के "मुझे यार ना मिले तो मर जावाँ" से मिलता जुलता है। यानी कि नए पैकेट में वही पुरानी दाल। इन चारों में से कोई भी गीत ऐसा नहीं जो फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाए। कुल मिलाकर भुला देने वाला ऐल्बम!

31 मार्च को ही सलीम-सुलेमान के संगीत में फ़िल्म प्रदर्शित हुई ’पूर्णा’ जो एक बायोपिक है सबसे कम उम्र में माउन्ट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली मलवत पूर्णा की। इस फ़िल्म के गीतों की सबसे अच्छी बात यह है कि कोई भी रीमिक्स संस्करण नहीं है और ऐल्बम में कुल तीन गीत हैं। प्रेरणादायक फ़िल्म होने की वजह से एक गीत "आशाएँ खिले दिल की" जैसा होना लाज़मी है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में "कुछ पर्बत हिलाएँ तो बात है" ऐसा ही एक गीत है जिसे अमिताभ भट्टाचार्य के बोलों ने सजाया है। पता नहीं क्यों गीत सुनते हुए के.के की याद आ गई। इसी गीत का एक और संस्करण है सलीम मर्चैन्ट की आवाज़ में। सलीम ने इसमें उम्दा गायकी का परिचय दिया है। पार्श्व में नर्म गीटार की ध्वनियों से गीत और सुन्दर बन पड़ा है। राज पंडित और विशाल ददलानी की आवाज़ों में "है पूरी क़ायनात तुझमें कहीं" में शास्त्रीय संगीत की छाया मिलती है। सॉफ़्ट रॉक के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत और भारतीय वाद्यों के फ़्युज़न से और राज पंडित के शास्त्रीय अंदाज़ में गायकी ने इसे एक ख़ूबसूरत जामा पहनाया है। विशाल ददलानी के सशक्त सहयोग ने भी गीत में चार चाँद लगाया है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए"। इस कालजयी रचना को फिर से गाना साहस का काम है और अरिजीत सिंह ने इस दर्द भरे गीत को बेहद सुन्दरता से गाया है। सलीम-सुलेमान ने इस गीत का भार अरिजीत पर डाल कर ग़लती नहीं की और अरिजीत ने भी अपना ज़िम्मा निभाया। अपने सीधे सच्चे शास्त्रीय हरकतों से अरिजीत ने इस दर्दीले गीत में जान फूँक दी है।

अप्रैल का महीना शुरु हुआ ’लाली की शादी में लड्डू में दीवाना’ फ़िल्म से। बेगानी शादी में अब्दुल्लाह दीवाना मुहावरे से प्रेरित इस शीर्षक वाले फ़िल्म की कहानी का पार्श्व शादी का है। इसलिए इस फ़िल्म के गीतों के साथ कई तरह के प्रयोग करने का मौक़ा था। फ़िल्म के तीन संगीतकार विपिन पतवा, रेवन्त सिद्धार्थ और अर्को ने इसी की कोशिश की है। सात गीतों वाले ऐल्बम का पहला गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है सुखविन्दर सिंह और साथियों की आवाज़ों में। फ़िल्म की मूड के मुताबिक इस गीत को लिखा है फ़िल्म के निर्देशक मनीष हरिशंकर ने। पंजाबी प्रभाव वाले इस गीत को सुखविन्दर सिंह के श्रेष्ठ गीतों में नहीं गिना जा सकता। के.के की सशक्त आवाज़ में "बेज़ुबाँ" बेहतर नग़मा है। गीटार के जोशिले पीसेस और के.के की दमदार आवाज़ ने गीत में जोश भर दिया है। अंकित तिवारी और अर्को की आवाज़ों में "रिश्ता" एक गंभीर रोमान्टिक गीत है और अंकित तिवारी तो अब पैशन वाले गीतों के राजा बन ही चुके हैं। इस गीत में भी उनका पैशन छलक पड़ा है। "रोग जाने" के दो संस्करण हैं। पहले में पलक मुछाल - राहत फ़तेह अली ख़ान, तो दूसरे में पलक मुछाल - मोहित लालवानी। सुन्दर मुखड़ा और ढेर सारी भारतीय वाद्यों से गीत कर्णप्रिय बना है लेकिन अन्तरों तक पहुँचते पहुँचते हम इसके आकर्षण से बाहर निकल जाते हैं। पता नहीं पलक क्यों श्रीया की तरह गाने की कोशिशें कर रही हैं! मालिनी अवस्थी की आवाज़ में "मानो या ना मानो" तो जैसे ’चाँदनी’ फ़िल्म की "मैं ससुराल नहीं जाऊँगी" जैसी रचना है, लेकिन ऐसी कुछ ख़ास बात नहीं है जिसके बारे में लिखा जाए। ऐल्बम का आख़िरी नग़मा है मोहम्मद इरफ़ान और विपिन पतवा की आवाज़ों में। "नैनो के पोखर" एक दर्द भरा गीत है। जैसा कि कहा जाता है कि दर्द भरे गीत ज़्यादा मीठे लगते हैं, इस गीत के साथ भी यही बात है। बाँसुरी की तानों से सजा यह गीत एक कर्णप्रिय रचना है। कुल मिला कर यह ऐल्बम बुरा नहीं है, पर ज़्यादा रीकॉल वैल्यु भी नहीं है। 7 अप्रैल को एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई ’ए डेथ इन दि गंज’, जो कोनकोना सेन शर्मा निर्देशित एक फ़ेस्टिवल फ़िल्म है। इस फ़िल्म में कोई गीत नहीं है। 14 अप्रैल को प्रदर्शित होने वाली फ़िल्म ’रिश्तों की साँझ’ हिन्दी और हिमाचली, दो भाषाओं में निर्मित फ़िल्म है। पवित्र चारी और मोहित चौहान की आवाज़ों में गौरव गुलेरिआ के संगीत में "पूछे अम्मा मेरी..." एक दिल को छू लेने वाली रचना है जिसमें है इन्तज़ार का दर्द। मोहित की पहाड़ी आवाज़ में यह हिमाचली लोक शैली का गीत दिल को छू लेता है। संगीतकार गौरव गुलेरिआ भी हिमाचल के धरमशाला के रहने वाले हैं, इसलिए इस गीत के संगीत से उसी मिट्टी की ख़ुशबू आ रही है। इस फ़िल्म के बाक़ी गाने इन्टरनेट पर उपलब्ध ना होने की वजह से हम उन पर चर्चा कर पाने में असमर्थ हैं।


अप्रैल की एक चर्चित फ़िल्म रही ’बेगम जान’। अनु मलिक के संगीत का जलवा एक अन्तराल के बाद सुनने को मिला। कौसर मुनीर के बोलों से सजे इस फ़िल्म के गीत कुछ अलग मिज़ाज के ज़रूर हैं। पहला गीत है आशा भोसले की आवाज़ में "प्रेम में तोहरे ऐसी पड़ी मैं पुराना ज़माना नया हो गया" एक ग़ज़लनुमा नग़मा है। माफ़ी चाहता हूँ पर इसे अगर आशा जी की जगह किसी और से गवाया जाता तो और सुन्दर बन पड़ता। आशा जी को पूरा सम्मान देते हुए कहूँगा कि अब उन्हें फ़िल्मी गीतों से संयास ले लेना चाहिए। कम्पोज़िशन की बात करें तो अनु मलिक ने उम्दा काम किया है "मोह मोह के धागे" की तरह। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि यह गीत 1967 की फ़िल्म ’अनीता’ के लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत में मुकेश के गाए गीत "गोरे गोरे चाँद से मुख पर काली काली आँखें हैं" से प्रेरित है? ख़ैर, "प्रेम में तोहरे" का एक और संस्करण है कविता सेठ की आवाज़ में और उनकी अलग और ख़ास अंदाज़ में। राहत फ़तेह अली ख़ान और सोनू निगम की "आज़ादियाँ" में देश विभाजन का दर्द साफ़ झलक पड़ा है। कौसर मुनीर के असरदार बोल रोंगटे खड़े कर देते हैं। शुरुआत में ढोल और शहनाई की ध्वनियाँ गीत के मूड को स्थापित करती हैं और फिर राहत और सोनू की गायकी तो बस लाजवाब है। कल्पना पटवारी और अल्तमश फ़रीदी का गाया "ओ रे कहारो" एक दर्द भरा गीत है जो कोठों पर काम करने वाली लड़कियों की दुर्दशा सुनाता है। इस गीत में 90 के दशक के फ़िल्मी गीतों की जानी पहचानी शैली और स्वरूप सुनाई देती है। ऐल्बम का अन्तिम गीत एक होली गीत है "होली खेले बृज की हर बाला" श्रीया घोषाल और अनमोल मलिक की आवाज़ों में। शास्त्रीय संगीत आधारित यह नृत्य प्रधान गीत निस्संदेह एक अरसे के बाद आने वाले स्तरीय होली गीतों में से एक है। श्रेया की मधुर आवाज़ और अनमोल के रैप शैली के अन्तरे गीत को मज़ेदार बनाते हैं। कुल मिला कर ’बेगम जान’ के गीत हमें निराश नहीं करते, लेकिन अनु मलिक से हमें उम्मीदें इससे अधिक हैं। 

21 अप्रैल को तीन फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। पहली फ़िल्म थी ’नूर’ जिसमें सोनाक्षी सिंहा एक चुलबुली सी लड़की है, जो एक पत्रकार भी है। इस वजह से अमाल मलिक ने पूरी कोशिशें की हैं कि कुछ दिलचस्प गाने इस फ़िल्म के लिए कम्पोज़ करें। बताना ज़रूरी है कि बतौर एकल संगीतकार यह उनकी दूसरी फ़िल्म है। ऐल्बम की शुरुआत अरमान मलिक की ताज़ी आवाज़ में "उफ़ ये नूर" से होती है, जिसमें एक जीवन्त पार्श्व संगीत और बीच बीच में तालियों ने इसे और भी ज़्यादा पेप्पी बना दिया है। दूसरा गीत है "गुलाबी 2.0", जो रफ़ी साहब के गाए "गुलाबी आँखें जो तेरी देखी" गीत का रीमेक है जिसमें कुमार ने अतिरिक्त बोल डाले हैं। अमाल मलिक, तुल्सी कुमार और यश नार्वेकर की मस्ती भरे अंदाज़ ने इस गीत को एक पार्टी गीत की शक्ल दी है। बादशाह का लिखा व स्वरबद्ध किया "मूव योर लक" एक और क्लब नंबर है जिसमें बादशाह के साथ-साथ सोनाक्षी सिंहा और दिलजीत दोसंझ भी स्वर मिलाते हैं। "जिसे कहते प्यार है" भी एक ताज़गी भरा प्रेम गीत है जिसमें नूर को अहसास होता है कि उसे प्यार हो गया है। सुकृति कक्कर की आवाज़ में यह गीत सुकून देता है। अमाल के सादगी भरे इस कम्पोज़िशन में साज़ों से ज़्यादा गायकी पर ज़ोर दिया गया है जिस वजह से इसे सुनना ज़्यादा अच्छा लग रहा है। प्रकृति कक्कर की गायी "कभी कभी यह भी है ज़रूरी" एक उदासी भरा गीत है पर मनोज मुन्तशिर के असरदार बोलों से यह गीत हमें अपनी तरफ़ खींचता है। उचित मात्रा में ऑरकेस्ट्रेशन और परक्युशन और झंकारों के सही उतार-चढ़ाव से गीत और भी ज़्यादा आकर्षक बन पड़ा है। इसमें कोई भी शक़ नहीं कि अमाल मलिक इस दौर के श्रेष्ठ संगीतकार बनने की राह पर चल पड़े हैं। 21 अप्रैल को जारी होने वाली दूसरी फ़िल्म है ’मातृ’ जिसमें संगीतकार हैं पाक़िस्तानी सूफ़ी रॉक बैण्ड - फ़्युज़ोन। फ़िल्म का एकमात्र गीत "ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी" राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में है। फ़िल्म की कहानी के मुताबिक एस. के. ख़लिश का लिखा यह गीत एक माँ के संघर्ष की कहानी बयाँ करती है। कुल 7 मिनट 45 सेकन्ड्स अवधि का यह गीत कुछ समय के बाद उक्ता देने वाला जैसा लगता है। 21 अप्रैल को प्रदर्शित होने वाली तीसरी फ़िल्म थी ’अजब सिंह की गजब कहानी’ जो एक अपाहिज IRS अफ़सर के संघर्ष की कहानी पर बनी फ़िल्म है। फ़िल्म के मुख्य संगीतकार हैं वेद शर्मा, और कुछ और संगीतकारों ने भी एक एक गीत का योगदान दिया है जैसे कि तन्मय पाहवा, यू. वी. निरंजन और पृथ्वी राज सिंहदेव। ऐल्बम में कुल छह गीत हैं जो फ़िल्म की कहानी में फ़िट होते हैं। पहले वेद शर्मा के गीतों की बात करते हैं। उन्हीं का लिखा कृष्णा बेउरा का गाया "रहमनिया मन ही मन रे थम जा तू, विपदा भले ही लाखों आए रे" ऐल्बम का पहला गीत है। हल्की रॉक शैली की छाया तले यह सूफ़ीयाना गीत सुनने में अच्छा लगता है। आशावादी ख़यालों से भरा यह गीत जीवन में हार न मानने की सीख देता है। वेद शर्मा का लिखा व स्वरबद्ध किया दूसरा गीत है शबाब साबरी का गाया "है प्रचण्ड आग आज यह ज़रा तू जान ले" तेज़ रफ़्तार वाला एक और आशावादी जोशिला गीत है। गीत के मूड को देखते हुए इसका ऑरकेस्ट्रेशन भी इसके अनुसार किया गया है। वेद शर्मा का लिखा, स्वरबद्ध किया और उन्हीं का गाया गीत है "ख़ुदा तू ये सुन ले, कहते हालात जो..."। पिछले दो गीतों के बाद यह गीत ऑरकेस्ट्रेशन की दृष्टि से नर्मोनाज़ुक है, लेकिन भाव कम-ज़्यादा वही है। वेद शर्मा के संगीत में अनिन्द्य चक्रवर्ती और वेद शर्मा का लिखा तथा इन दोनों की आवाज़ों में "मतलबी दुनिया बड़ी... शुनले शोन नोय्तो फ़ोट" एक हिन्दी-बांग्ला गीत है जिसका संगीत हार्ड रॉक शैली में निबद्ध है। अनिन्द्य ने बांग्ला बोलों को लिखा व गाया है जबकि वेद ने हिन्दी वाली पंक्तियाँ संभाली है। दो भाषाओं के समावेश से गीत में एक अनोखापन आया है। इस ऐल्बम का अगला गीत है तन्मय पाहवा के संगीत में, संजीव चतुर्वेदी का लिखा व तरन्नुम मलिक का गाया "मेरे ब्लाउज़ का बटन खुला रह गया"। मस्ती भरे अंदाज़ की वजह से गीत लोकप्रिय हुआ है लेकिन इसके बोलों पर ग़ौर करने पर इसे सुनने का भी मन नहीं होता। हमारे फ़िल्मी गीत और कितना नीचे गिर सकते हैं यह भविष्य ही बताएगी। यू. वी. निरंजन के संगीत में राजेश वर्मा का लिखा रोहित अखौरी का गाया "आँख बन्द करके लोगों की ना सुन के, आसमाँ पे आज उड़ा है एक परिन्दा" रोहित की कमाल ख़ान जैसी आवाज़ की वजह से आकर्षक बन पड़ा है, पर गीत का भाव फिर एक बार आशावादी हौसला अफ़ज़ाई करने वाला है। ऐल्बम का अन्तिम गीत सन्त कबीर की एक भक्ति रचना है जिसे स्वरबद्ध किया व गाया है पृथ्वी राज सिंहदेव ने। बस हारमोनिअम और तबले ्के सुरों और तालों में निबद्ध यह भजन "ना लेना ना देना मगन रहना, भजन करना रे भजन करना" निस्संदेह इस ऐलब्म की श्रेष्ठ रचना है।

अप्रैल माह की अन्तिम फ़िल्म आई ’बाहूबली 2’। 28 अप्रैल को प्रदर्शित इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म का संगीत तैयार किया एम. एम. क्रीम ने। अक्सर यह देखा गया है कि दक्षिण के गीतों के हिन्दी संस्करण हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाते। लेकिन इस फ़िल्म के संगीत के साथ एम. एम. क्रीम ने जो प्रयोग किए हैं, उससे भारत के हर क्षेत्र के श्रोताओं को अपनी तरफ़ खींचने का प्रबन्ध हुआ है। मनोज मुन्तशिर के हिन्दी बोलों ने भी दक्षिणी संगीत को उचित हिन्दी जामा पहनाया है। पाँच गीतों वाले इस ऐल्बम का पहला गीत है फ़िल्म का शीर्षक गीत "जियो रे बाहूबली"। दलेर मेहन्दी, संजीव चिम्मल्गी और राम्या बेहरा का गाया यह गीत ऐल्बम का मूड सेट कर देता है। एम. एम. क्रीम वायलिन के लिए जाने जाते हैं और इस गीत में भी वायलिन का अद्भुत प्रयोग सुनाई देता है। "वीरों के वीर आ" एक रोमान्टिक गीत है जिसमें अदिति पॉल और दीपू की आवाज़ों के बीच बीच में परक्युशन का सुन्दर समन्वय है। एक अरसे के बाद मधुश्री की मधुर आवाज़ में "कान्हा सो जा ज़रा" को सुनना एक सुखद अनुभूति है। शास्त्रीय शैली में स्वरबद्ध यह गतिमय लोरी लोरी से ज़्यादा होली गीत प्रतीत होता है, लेकिन बाँसुरी, वीणा और मृदंग की धुनों से सुसज्जित यह गीत इतना कर्णप्रिय है कि गीत के शुरु से ही मन मोह लेता है। कोरस का भी सुन्दर योगदान रहा इस गीत में। कैलाश खेर की खुली हुई आवाज़ में "जय जयकारा" को सुनना आनन्ददायक है। इस गीत की ध्वनियाँ वाकई मनमोहक है। शीर्षक गीत ही की तरह यह गीत भी अचानक ख़त्म हो जाता है। ऐल्बम का अन्तिम गीत है "शिवम" को गाया है एम. एम. क्रीम के साहबज़ादे काल भैरव ने। धीमी लय वाली यह रचना गीत कम और मंत्रोच्चारण ज़्यादा प्रतीत होता है। कुल मिला कर ’बाहूबली’ का गीत-संगीत आकर्षक है। मनोज मुन्तशिर और एम. एम. क्रीम को थ्री चियर्स!


तो मित्रों, यह थी मार्च और अप्रैल के महीनों में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों के गीत-संगीत की समीक्षा। आशा है आपको पसन्द आई होगी।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, March 4, 2017

चित्रकथा - 8: 2017 के प्रथम दो महीनों की फ़िल्मों का संगीत


अंक - 8

2017 के प्रथम दो महीनों की फ़िल्मों का संगीत

साजन आयो रे, सावन लायो रे...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

देखते ही देखते वर्ष 2017 के दो महीने बीत चुके हैं। फ़िल्म-संगीत की धारा, जो 1931 में शुरु हुई थी, निरन्तर बहती चली जा रही है, और इस वर्ष भी यह सुरीली धारा रसिकों के दिलों से गुज़रती हुई, उथल-पुथल करती हुई बहे जा रही है। आइए आज ’चित्रकथा’ में आज चर्चा करें इन दो महीनों, यानी जनवरी और फ़रवरी 2017, में प्रदर्शित हुई फ़िल्मों के गीत-संगीत की। आज ’चित्रकथा’ में प्रस्तुत है यह संगीत समीक्षा। 




22 अक्टुबर 2015 के दिन गायक लाभ जंजुआ की असमय मृत्यु ने फ़िल्म-संगीत जगत को एक बड़ा
लाभ जंजुआ
झटका दिया। "सोनी दे नख़रे सोनी लगदे", "लंदन ठुमकदा", "जी करदा भई जी करदा" जैसे सुअपर हिट गीतों को गा कर लाभ जंजुआ तेज़ी से सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे थे। पर यह सिलसिला देर तक चल नहीं सका। पर वर्ष 2017 की शुरुआत लाभ जंजुआ के गाए गीत "इश्क़ दा करेण्ट" से ही हुई। फ़िल्म का नाम ’प्रकाश इलेक्ट्रॉनिक्स’ जो प्रदर्शित हुई 6 जनवरी के दिन।  गीतकार-संगीतकार प्रवीण भारद्वाज ने उनसे यह गीत पहले ही रेकॉर्ड करवा लिया था। इस फ़िल्म में कुल चार गीत हैं, चार अलग रंगों के। लाभ जंजुआ के गाए इस थिरकाने वाले डान्स नंबर के बाद दूसरा गीत है गायक के.के की आवाज़ में "इश्क़ जो भी करे वो पागल"। हमेशा अपना लो-प्रोफ़ाइल इमेज रखने वाले के.के अपने गीतों से बोलते हैं। के.के. की आवाज़ में एक ताज़गी है, एक युवा-अपील है, एक आकर्षण है जो दिल को छू जाती है। वैसे तो इस तरह के गीत उन्होंने पहले भी बहुत गाए हैं, पर एक अन्तराल के बाद उनकी आवाज़ में इस गीत को सुनना एक सुखद अनुभव ही रहा। एक और गायक जो एक लम्बे अरसे के बाद सुनाई दिए, वो हैं कमाल ख़ान, जी हाँ, "अ ओ जानेजाना" वाले कमाल ख़ान। उनकी आवाज़ में "इश्क़ तेरी लीला न्यारी" में 90 के दशक की सुगन्ध है। जुदाई के दर्द से भीगा इस तरह का गीत आजकल फ़िल्मों में सुनाई नहीं देती। इसके लिए प्रवीण भारद्वाज का शुक्रिया। और फ़िल्म का अन्तिम गीत है "हबीबी" सुनिधि चौहान की आवाज़ में जिसके कम्पोज़िशन में अरबी रंग है और ऑरकेस्ट्रेशन में रॉक शैली भी है और बीच-बीच में अंग्रेज़ी रैप भी है। सुनिधि के इस तरह के गीत अनगिनत सुनने को मिले हैं, किसी और गायिका से गवाया जाना चाहिए था इसे।


13 जनवरी को प्रदर्शित हुई ’ओके जानु’। आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर के अन्तरंग केमिस्ट्री की
ए. आर. रहमान
वजह से चर्चा में बनी रहने वाली इस फ़िल्म में गुलज़ार साहब के लिखे गीत हैं और संगीतकार ए. आर. रहमान। इसलिए निस्संदेह इस फ़िल्म के गीतों से लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं। इस फ़िल्म में कुल आठ गीत हैं पर तीन गीतों को छोड़ कर बाकी गीतों की धुनें रहमान ने अपनी तमिल फ़िल्म ’ओ कादल कनमनी’ के गीतों से उठाया। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए दो नए गीत बनाए जो "ऐ सिनामिका" और "मलर्गल काएत्तें" के हिन्दी संस्करण हैं। ’ओके जानु’ ऐल्बम का पहला गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है जिसे ए. आर. रहमान और श्रीनिधि वेंकटेश ने गाया है। दूसरा गीत "परंधु सेला वा" के मशहूर हिन्दी संस्करण "हम्मा हम्मा" का कवर वर्ज़न है। मूल शब्द मेहबूब के हैं जिस पर रैपिंग् की है बादशाह ने। इस कवर वर्ज़न में आवाज़ रेमो फ़र्नन्दे की नहीं, बल्कि जुबिन नौटियाल, शाशा तिरुपति, बादशाह, तनिश्क बागची और ए. आर. रहमान की है। यह वर्ज़न ठीक ठाक बना है, पर रेमो वाले मूल गीत की बात ही अलग है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में "इन्ना सोणा क्यों रब ने बनाया" गुलज़ार साहब की रचना है। वैसे तो इसे नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ साहब की मूल रचना कही सकती है, समय-समय पर कई गीतकारों और संगीतकारों ने अपने हिसाब से इसे अपने गीतों में ढाल लिया है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में यह संस्करण बहुत ज़्यादा दिल को नहीं छूती। अगला गीत है "जी लें ज़रा" जो शायद इस ऐल्बम का सबसे अलग हटके गीत है। नीति मोहन, अर्जुन चंडी, सावित्री आर. पृथ्वी और ए. आर. रहमान की आवाज़ों में इस गीत में पुरुष आवाज़ों को धीमा रखा गया है, इसकी वजह है पुरुष आवाज़ों का स्वरमान मुलायम होने की वजह से इससे एक प्रतिध्वनित अंग दिया जा सका है। यह गीत हमें ’रॉकस्टार’ के "फिर से उड़ चला" और ’तमाशा’ के "सफ़रनामा" गीतों की याद दिला जाता है। अगला गीत "कारा फ़नकारा कब आए रे" गुलज़ार साहब का लिखा हुआ नहीं है, बल्कि इसे नवनीत विर्क, कैली, हार्ड कौर और एडीके ने लिखा है। रैप शैली का यह गीत कैली, हार्ड कौर, दिनेश कनगारत्नम, शाशा तिरुपति, अशिमा महाजन और पारोमिता दासगुप्ता ने गाया है। पाश्चात्य बीट्स और साज़ों पर आधारित यह गीत लिरिकल हिप-हॉप जौनर का गीत है और इस तरह के गीत साधारणत: हिन्दी फ़िल्मों में सुनाई नहीं देते। जोनिता गांधी और नकश अज़ीज़ की आवाज़ों में "साजन आयो रे, सावन लायो रे" एक अद्‍भुत शास्त्रीय संगीत आधारित वर्षाकालीन रचना है। गुलज़ार साहब को इसमें बहुत कुछ लिखने का मौका तो नहीं मिला, पर दो पंक्तियों का यह गीत इससे जुड़े सभी कलाकारों की प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। इसी तरह से गुलज़ार साहब का ही लिखा और शाशा तिरुपति का गाया "सुन भँवरा" भी एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना है, जो लेखन, संगीत और गायकी की दृष्टि से एक उत्कृष्ट रचना है। इन दो गीतों को सुन कर जैसे एक उम्मीद जाग उठा है कि अच्छे गीत-संगीत का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है। और ऐल्बम का अन्तिम गीत एक पारम्परिक रचना है "मौला वा सलीम" जिसे ए. आर. अमीन और ए. आर. रहमान ने गाया है।


13 जनवरी को एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी - ’हरामखोर’। श्लोक शर्मा निर्देशित और नवाज़ुद्दीन
अनु मलिक
सिद्दिक़ी - श्रेता त्रिपाठी अभिनीत इस फ़िल्म को 15-वें न्यु यॉर्क इन्डियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल और इन्डियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल ऑफ़ लॉस ऐन्जेलिस में प्रदर्शित किया गया, और नवाज़ुद्दीन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला था। केवल 16 दिनों में तैयार इस फ़िल्म के संगीतकार हैं जसलीन रॉयल, जो एक गायिका हैं। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए एक गीत कम्पोज़ किया और गाया, जिसके बोल हैं "किदरे जावाँ"। फ़ेस्टिवल फ़िल्म होने की वजह से आदित्य शर्मा के लिखे इस गीत को व्यावसायिक सफलता नहीं मिलेगी, पर संगीतकार के रूप में उभरने के लिए जसलीन को शुभकामनाएँ। 20 जनवरी को प्रदर्शित हुई ’कॉफ़ी विथ डी’। इस कमचर्चित और कम बजट की फ़िल्म में गीत लिखे समीर ने और संगीत दिया सुपरबिया ने। फ़िल्म का शीर्षक गीत अनु मलिक की आवाज़ में है। "एक गरम चाय की प्याली" से वो अब कॉफ़ी की तरफ़ रुख़ कर चुके हैं जब वो गाते हैं "बोलो क्या करूँ पीछे ख़ौफ़ है आगे मौत है खड़ी, तेरा काम है चक्का जाम है अपनी है फ़टी पड़ी, मैंने सोच ली, तू भी सोच ले, जी में दम है तो पी, कॉफ़ी विथ डी"। मस्ती भरे बोलों, मस्ती भरे संगीत और अनु मलिक के अंदाज़ की वजह से गीत झूमने पर मजबूर ज़रूर करता है। दूसरा गीत शबाब साबरी का गाया हुआ है; गीत नहीं बल्कि यह एक क़व्वाली है "अली अली हाजी अली"। बहुत सुन्दर कम्पोज़िशन और गायकी की तो बात ही कुछ है। तीसरा गीत शान का गाया हुआ है, "नेशन वान्ट्स टू नो", गीत आज के दौर की प्रवृत्तियों पर व्यंग का निशाना साधता है। अरनब गोस्वामी के मशहूर जुमले "दि नेशन वान्ट्स टू नो" का पंच लाइन लेकर देश में चल रहे मुद्दों को उजागर करता है यह गीत। और फ़िल्म का अन्तिम गीत एक सॉफ़्ट रोमान्टिक डुएट है शान और आकांक्षा शर्मा की आवाज़ों में "तुम्हारी मोहब्बत"। गीत कर्णप्रिय है पर इसमें कोई नई बात या एक्स-फ़ैक्टर नहीं है कि गीत एक लम्बे समय तक याद रहे।


गणतंत्र दिवस के सप्ताह दो महत्वपूर्ण फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। एक राकेश रोशन की ’काबिल’ और दूसरा
राजेश रोशन
शाहरुख़ ख़ान का ’रईस’। फ़िल्म के रिलीज़ डेट को लेकर विवाद खड़ा हुआ जब शाहरुख़ ख़ान ने जान बूझ कर इसे ’काबिल’ के साथ रिलीज़ करने का फ़ैसला लिया। इस वजह से राकेश रोशन ने अपनी फ़िल्म को 26 की जगह 25 को रिलीज़ करने का निर्णय लिया, पर शाहरुख़ ने भी फिर अपनी फ़िल्म को 25 में रिलीज़ करने की घोषणा कर दी। इस वजह से रोशन और ख़ान में एक द्वन्द छिड़ गया। ख़ैर, दोनों फ़िल्में 25 जनवरी को रिलीज़ हुईं। पहले करते हैं ’काबिल’ के गीतों की चर्चा। जब भी राकेश रोशन, राजेश रोशन और हृतिक रोशन की तिकड़ी साथ में आए हैं, हमें कुछ मधुर कर्णप्रिय गाने सुनने को मिले हैं। ’काबिल’ के गाने भी हमें निराश नहीं करते। इस फ़िल्म में तीन मौलिक गीत हैं और दो पुराने गीतों के कवर। फ़िल्म का शीर्षक गीत "मैं तेरे काबिल हूँ या तेरे काबिल नहीं"। नासिर फ़राज़ के लिखे तथा जुबिन नौटियाल व पलक मुछाल के गाए इस गीत में मेलडी है, सुन्दर बोल हैं, और राजेश रोशन का स्टाम्प भी है। गीत का संयोजन और बीट्स कुछ हद तक "आओ सुनाऊँ प्यार की एक कहानी" गीत जैसा है। हृतिक पर जुबिन नौटियाल की आवाज़ सुन्दर बन पड़ा है। इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है जुबिन की आवाज़ में। जुबिन नौटियाल की एकल आवाज़ में "कुछ दिन से मुझे तेरी आदत हो गई है" मनोज मुन्तशिर का लिखा गीत है। गीत का भाव ’कहो ना प्यार है’ के "क्यों चलती है पवन" गीत से मेल खाता है। हृतिक रोशन की फ़िल्म हो और उनका कोई धमाकेदार डान्स सीक्वेन्स ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। ’काबिल’ में भी "मोन आमोर" गीत को रखने का यही मक़सद था। विशाल ददलानी के गाए मनोज मुन्तशिर के लिखे इस थिरकते गीत को सुनते हुए हृतिक की तसवीर आँखों के सामने आ ही जाती है। यह गीत अगर हिट हुआ तो गीत की दृष्टि से नहीं बल्कि हृतिक के नृत्य की वजह से होगा। बाक़ी के दो गीत राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध 70 के दशक के दो गीतों का रिवाइवल है। पहला है "सारा ज़माना हसीनों का दीवाना", ’याराना’ फ़िल्म का गीत। अनजान के मूल बोलों में गीतकार कुमार ने नए बोल डाले हैं। गौरव-रोशिन ने इस संस्करण का संगीत तैयार किया है। ख़ास बात यह कि किशोर कुमार के गाए मूल गीत के इस संस्करण के लिए किसी पुरुष गायक नहीं बल्कि गायिका पायल देव को चुना गया। हाँ, रैपिंग् ज़रूर रफ़्तार ने किया है। मूल गीत से इस संस्करण की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि यह संस्करण एक क्लब रीमिक्स संस्करण है और दोनों अपनी अपनी जगह है। दूसरा गीत है ’जुली’ फ़िल्म का किशोर कुमार का गाया "दिल क्या करे जब किसी से किसी को प्यार हो जाए"। आनन्द बक्शी - राजेश रोशन के रचे मूल गीत को एक बार फिर कुमार और गौरव-रोशिन ने रीक्रिएट किया है। गायक जुबिन नौटियाल ने अच्छा निभाया है यह नया संस्करण है। 70 के दशक के गीत का 2010 के दशक में जो लिबास होना चाहिए, वैसा ही किया है पूरी टीम ने।


शाहरुख़ ख़ान की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’रईस’ के गीत-संगीत की अब बात की जाए। ऐल्बम शुरु होता है
जावेद अख़्तर
सनी लियोन के आइटम नंबर से। इन्दीवर के लिखे और कल्याणजी-आनन्दजी के संगीतबद्ध किए फ़िल्म ’कुर्बानी’ के मशहूर गीत "लैला मैं लैला" गीत को रीक्रिएट किया गया है। पावनी पाण्डे की आवाज़ में संगीतकार राम सम्पथ और गीतकार जावेद अख़्तर ने इस गीत को नया जामा पहनाया है। जनता-जनार्दन को यह संस्करण पसन्द आई है। दूसरा गीत है "ओ ज़ालिमा" जिसे अरिजीत सिंह और हर्षदीप कौर ने गाया है। "गेरुआ" के बाद अरिजीत फिर एक बार शाहरुख़ की आवाज़ बने हैं। JAM8 के संगीत में बोल लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य ने। इस गीत की ख़ास बात यह कि इसमें हारमोनियम का प्रयोग हुआ है और साथ ही अरिजीत सिंह ने ख़ुद इसमें अकोस्टिक गीटार बजाया है। तीसरे गीत "उड़ी उड़ी जाए दिल की पतंग" में आवाज़ें हैं सुखविन्दर सिंह, भूमि त्रिवेदी और करसन सर्गठिया की। जावेद अख़्तर के लिखे और राम सम्पथ के स्वरबद्ध किए इस गीत में गुजरात की लोक शैली है, और फ़िल्म ’हम दिल दे चुके सनम’ के "ढील दे ढील दे रे भैया" की याद दिला जाता है। करसन सर्गठिया के इन्टरल्युड में गुजराती बोल गीत को और भी ज़्यादा आकर्षक बनाते हैं। कुल मिलाकर एक सुन्दर लोक आधारित गीत। इस गीत में तापस रॉय का मैन्डोलिन सुनाई दिया। मिका सिंह की आवाज़ में मयूर पुरी का लिखा और अहीर का संगीतबद्ध गीत "धिंगाना धिंगाना" मस्ती भरा गीत है मिका के पहले के गीतों की ही तरह। फ़िल्म के बाहर इस गीत की क्या वजूद रह जाएगी कह नहीं सकते। राम सम्पथ और तरन्नुम मलिक की आवाज़ों में ’रईस’ का शीर्षक गीत "एनु नाम छे रईस" भी फ़िल्म की कहानी के अनुसार है जो फ़िल्म के बाहर शायद बहुत ज़्यादा ना सुना जाए । राम सम्पथ और हिरल ब्रह्मभट्ट ने गीत लिखा है। इस गीत के संगीत संयोजन में उइलियन पाइप का प्रयोग किया गया है जिसे बजाया है उलिक नेवेल ने। के.के. की आवाज़ में "साँसों के किसी एक मोड़ पर मिली थी तू ज़िन्दगी मेरी दोस्त बनके" एक संजीदा गीत है जिसे मनोज मुन्तशिर ने ख़ूबसूरत बोलों से सजाया है और अहीर ने भी सुन्दर कम्पोज़ किया है। के.के की इन्टेन्स गायकी ने गीत को अपने अंजाम तक पहुँचाया है। और फ़िल्म का अन्तिम गीत एक गुजराती पारम्परिक रचना है "घम्मर घम्मर" जिसे राम सम्पथ के संगीत संयोजन में रोशन राठौड़ ने गाया है। लोक शैली के फ़िल्मी गीतों में यह गीत एक लम्बे समय तक याद रहेगा।


जनवरी के बाद अब हम आ पहुँचे हैं फ़रवरी में। 10 फ़रवरी को ’जॉली एल एल बी 2’ प्रदर्शित हुई। 2013
सुखविन्दर सिंह
में आई ’जॉली एल एल बी’ कामयाब फ़िल्म थी जिसे बहुत से पुरस्कार मिले। अब इसके सीक्वील में अक्षय कुमार के आ जाने से इससे उम्मीदें और भी ज़्यादा बढ़ गईं। इस फ़िल्म में कुल चार गीत हैं और चारों गीत अलग अलग श्रेणी के हैं। पहला गीत "गो पागल" एक होली गीत है। फ़िल्म-संगीत के अन्य गीतों की तरह होली गीतों का अंदाज़ भी अब बदल चुका है। रफ़्तार, निन्दी कौर, गिरिश नाकोड और मंझ म्युज़िक के गाए इस गीत को लिखा है मंज म्युज़िक और रफ़्तार ने तथा इसमें संगीत दिया है मंज म्युज़िक और नीलेश पटेल ने। दूसरा गीत है "बावरा मन राह ताके तरसे से", जुबिन नौटियाल, नीति मोहन और रीक चक्रवर्ती की आवाज़ों में। जुनैद वसी के बोल और चिरन्तन भट्ट का संगीत। निस्सन्देह यह ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। चिरन्तन भट्ट के कीज़ और स्ट्रिंग्स अरेंजमेण्ट ने गीत को ख़ूबसूरत जामा पहनाया है। इस गीत ने अक्षय कुमार और हुमा क़ुरेशी के बीच की केमिस्ट्री को उजागर करने में मदद की है। तीसरा गीत है मीत ब्रदर्स का गाया व कम्पोज़ किया हुआ "जॉली गूड फ़ेलो"। मूल गीत "For He's A Jolly Good Fellow" का देसीकरण किया है गीतकार शब्बीर अहमद ने। कहा जाता है कि अक्षय कुमार ने अपनी बेटी को यह राइम गाते सुना और फिर उन्होंने फ़िल्म के निर्माता/निर्देशक को इस तरह का एक गीत तैयार करने का परामर्श दिया जो फ़िल्म के प्रोमोशन के लिए इस्तमाल में लाया जा सके। यह गीत फ़िल्म के मुख्य नायक के चरित्र और स्वभाव को उजागर करता है। और ऐल्बम का अन्तिम गीत एक भक्तिमूलक क़व्वाली है "ओ रे रंगरेज़ा" जिसे सुखविन्दर सिंह, मुतज़ा मुस्तफ़ा और क़ादिर मुस्तफ़ा ने गाया है। बहुत ही सुन्दर रचना और सुखविन्दर सिंह तो अपने हर गीत में चार चाँद लगाते ही हैं और यह क़व्वाली कोई व्यतिक्रम नहीं। 


17 फ़रवरी को कुल चार फ़िल्में प्रद्रशित हुईं, लेकिन एक भी बॉक ऑफ़िस पर टिक नहीं सकी। पहली
बप्पी लाहिड़ी
फ़िल्म है ’रनिंग् शादी डॉट कॉम’। अमित साध - तापसी पन्नु अभिनीत इस रोमान्टिक कॉमेडी फ़िल्म के मिजाज़ के मुताबिक गाने बनाए गए। ऐल्बम की शुरुआत होती है अभिषेक-अक्षय के संगीत में "प्यार का टेस्ट" गीत से जिसे बप्पी लाहिड़ी और कल्पना पटवारी ने गाया है। डिस्को बीट्स, बप्पी दा की आवाज़, कुल मिला कर जैसे 80 के दशक में पहुँच गए हम। कुछ मज़ेदार बोल हैं इस गीत में जैसे कि "तुम हमारे लुडो हो, हम तुम्हारे हैं चेस"। "मैनरलेस मजनूं" के स्ट्रिंग्स प्रील्युड हमें गीत की तरफ़ आकर्षित करता है और सुकन्या पुरकायस्थ अपनी शालीन गायकी से गीत को आगे बढ़ाती है। इन्हीं की आवाज़ थी "पानी दा रंग वेख के" में। "डिम्पी दे नाम भागे बंटी" एक मस्ती भरा शादी वाला पंजाबी बीट वाला गीत है, शेली के मज़ेदार बोल और एक बार फिर लाभ जंजुआ की जोशीली गायकी से गीत हमारे अन्दर थिरकन पैदा करती है। इस गीत को सुनते हुए यह अनुभव करना मुश्किल है कि अब लाभ हमारे बीच नहीं रहे। सनम पुरी और सोनू कक्कर का गाया "भाग मिल्की भाग" फ़िल्म के भाव से मिलता जुलता गीत है जिसे कीगन पिन्टो ने कम्पोज़ किया है। पिन्टो का अगला गीत "फ़रार" बेहतर है जिसमें जुबिन नौटियाल अपनी मोहक आवाज़ से इस आशावादी गीत को सुरीला अंजाम देते हैं। सॉफ़्ट रॉक का रंग भी इस गीत में सुनने को मिलता है। अनुपम रॉय और हंसिका अय्यर का गाया नर्मो नाज़ुक युगल गीत "मैं फ़रार सा" एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आता है जिसमें इन दो गायकों की आवाज़ ही गीत का मुख्य आकर्षण है। साथ ही रिदमिक बीट्स, गीटार और बंसुरी का सुन्दर संयोजन गीत की शोभा बढ़ाते हैं। जुबिन की आवाज़ में "कुछ तो है" का स्ट्रिंग्-सैक्सोफ़ोन संयोजन ने भी कमाल किया। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह ऐल्बम देसी बीट्स और पाश्चात्य प्रभाव का कॉकटेल है।


17 फ़रवरी की दूसरी फ़िल्म थी ’दि ग़ाज़ी अटैक’, पर इस फ़िल्म में कोई गीत नहीं था। तीसरी फ़िल्म थी
सुरेश वाडकर, साधना सरगम
’इरादा’। इस फ़िल्म में कुछ सुन्दर रचनाएँ हैं। गायक नीरज श्रीधर ने संगीतकार के रूप में फ़िल्म के चारों गीतों को स्वरबद्ध किया है। उनके बैण्ड ’बॉम्बे वाइकिंग्स’ ने इन्हें गाया है। ऐल्बम की शुरुआत "माही" से होती है; यह एक ऐसा गीत है जो दिल के करीब रहने वाले किसी के खो जाने के दर्द को साकार करता है। हर्षदीप कौर और शबद साबरी ने समीर अनजान के बोलों को सजीव कर देते हैं। लोक वाद्यों के प्रयोग से यह सूफ़ीयाना गीत और भी कर्णप्रिय बन पड़ा है और निस्संदेह यह ऐल्बम का सवश्रेष्ठ गीत है। दूसरा गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है जो बिल्कुल नीरज श्रीधर का फ़ोर्टे है। निखिल उज़गरे की सशक्त आवाज़ और रॉक शैली आधारित यह गीत एक प्रेरणादायक गीत है जो दृढ़ संकल्प के शक्ति को उजागर करता है। लेकिन इस गीत को बार-बार सुनने का मन नहीं होता। तीसरा गीत एक लोरी है; पापोन की आवाज़ में "चाँद रजाई ओढ़े" सुन कर आश्वस्त हुए कि फ़िल्मों से अभी पूरी तरह से लोरियाँ ग़ायब नहीं हुई हैं। यह लोरी सुनते हुए जैसे इससे जुड़ने लगते हैं। चौथा व अन्तिम गीत है "मित्रान दे" जो भंगड़ा बीट्स से शुरु तो होता है पर दिल को छू नहीं पाता। मास्टर सलीम, कौर बी और अर्ल एडगर का गाया यह गीत केवल क्लब्स में डान्स करने के लिए सटीक है। कुल मिला कर ’इरादा’ का ऐल्बम लम्बी रेस का घोड़ा नहीं है। 17 फ़रवरी की चौथी फ़िल्म थी ’चौहर’। कम बजट की फ़िल्म थी, कब आई कब गई पता भी नहीं चला। इस फ़िल्म में कुल चार गीत थे और उल्लेखनीय बात यह कि इनमें से दो गीतों में साधना सरगम और सुरेश वाडकर की आवाज़ें थीं। अश्विनी कुमार के संगीत में साधना सरगम का गाया गीत है "तुम जो मिले तो मिला सवेरा, किस्मत मेरी चमक उठी"। बिना अनर्थक साज़ों के कुंभ के यह सुरीला गीत हमें सुरीले दौर की याद दिलाते हैं। पर साधना सरगम की आवाज़ में कुछ कमी सी सुनाई दी है। दूसरा गीत सुरेश वाडकर की आवाज़ में है "पाप पराजित करे पुण्य को झूठ से हारे सच्चाई, न्याय पराजित अन्याय से कलयुग की यह सच्चाई, धर्म अधर्म से हारे, कोई माने या ना माने, राम जाने राम जाने"। सुधीर-सरबजीत के सुन्दर बोल और सुरेश जी की मोहक आवाज़ से गीत सुकून देता है। फ़िल्म के बाकी दो गीत "मुन्नी बदनाम हुई" के गायक ऐश्वर्य निगम की आवाज़ में है - "यार मिला है ऐसा दिलदार मिला है ऐसा" और "हम हैं भैया कमाल के"।


फ़रवरी के अन्तिम सप्ताह तीन फ़िल्में रिलीज़ हुईं - ’वेडिंग् ऐनिवर्सरी’, ’मोना डारलिंग्’ और ’रंगून’।
राशिद ख़ाँ
’वेडिंग् ऐनिवर्सरी’ के संगीतकार अभिषेक राय ने अच्छा काम किया है। राशिद ख़ाँ की आवाज़ में "आए बिदेसिया मोरे द्वारे, हम तो अपनी सुध-बुध हारे" शास्त्रीय संगीत आधारित गीत होते हुए भी पाश्चात्य संगीत का फ़्युज़न है। मानवेन्द्र का लिखा यह गीत इस कमचर्चित फ़िल्म का एक मुख्य आकर्षण है। उस पर नाना पाटेकर का अभिनय। गीत के इन्टरल्युड में अंग्रेज़ी बोल "द स्ट्रेन्जर कम्स नॉकिंग् ऑन द डोर" फ़्युज़न ईफ़ेक्ट को सहारा देते हैं। भूमि त्रिवेदी का गाया "आए सैयां मोरे द्वारे" की धुन "आए बिदेसिया" वाली ही है। भूमि ने एक बार फिर इस शास्त्रीय रचना में कमाल करती हैं। तीसरा गीत है "इत्तेफ़ाक़न जो मिले हैं हम यहाँ" अभिषेक राय और अमिका शैल की आवाज़ों में। एक नयापन है इस युगल गीत में। फ़िल्म हिट होती तो निस्सन्देह गीत चलता, पर अफ़सोस की बात! अभिषेक और भूमि की आवाज़ों में "द रेनबो सॉंग्’ एक जोशीला पाश्चात्य रीदम युक्त गीत है, पर "इत्तेफ़ाक़न" को यकीनन ज़्यादा अंक मिलते हैं। वैसे अभिषेक की आवाज़ को सुन कर इसे लम्बी रेस का घोड़ा जैसा लगता है। अन्तिम गीत है "धिनचक" अभिनन्दा सरकार की आवाज़ में। यह एक आइटम गीत है और इस तरह के अरबी शैली के आइटम गीत हम अनेकों बार सुन चुके हैं, कोई ख़ास बात नही! ’मोना डारलिंग्’ एक हॉरर-थ्रिलर फ़िल्म है, इसलिए गीतों की गुंजाइश नहीं। फ़िल्म का एकमात्र गीत "एक तलाश है ज़िन्दगी" सकीना ख़ान और वसुधा शर्मा ने गाया है। मनीष जे. टिपु का संगीत और समीर सतीजा के बोल। पार्टी नंबर, बस कुछ और नहीं!


फ़रवरी के अन्तिम सप्ताह, 24 तारीख को प्रदर्शित हुई विशाल भारद्वाज की ’रंगून’। जब जब गुलज़ार
गुलज़ार, विशाल भारद्वाज
और विशाल साथ में आए हैं, फ़िल्म और उसके गीतों में कमाल हुआ है। ’रंगून’ के साथ भी वही हुआ। इस फ़िल्म की कहानी और पार्श्व के अनुसार गाने स्वाधीनता-पूर्व समय के होने चाहिए। पहला गीत है "ब्लडी हेल", सुनिधि चौहान की आवाज़। यह एक पेप्पी ट्रैक है जिसमें कंगना रनौत नज़र आती हैं उस ज़माने की अभिनेत्री जुलिया के किरदार में। इस जौनर के बहुत गीत हैं पर जब भी ऐसे गीत पर गुलज़ार साहब के कलम चलते हैं, तब कुछ और ही कमाल होता है। इस गीत के बारे में कुछ न लिख कर बस इसे सुना जाना चाहिए। दूसरा गीत है "मेरे मियाँ गए इंगलैण्ड" जो "मेरे पिया गए रंगून" की धुन पर आधारित है। रेखा भारद्वाज ने अपनी आवाज़ को शमशाद बेगम की तरह नैज़ल कर लिया है इस गीत में। गीत में ऐडोल्फ़ हिटलर और विन्स्टन चर्चिल का उल्लेख है। तीसरा गीत है "जुलिया" जिसके साथ फ़िल्म में कंगना रनौत उर्फ़ जुलिया की एन्ट्री होती है। सुखविन्दर सिंह, के.के, कुणाल गांजावाला और विशाल भारद्वाज का गाया यह गीत सिचुएशनल गीत है। फ़िल्म के बाहर शायद इस गीत को ज़्यादा सुना ना जाए! एक लम्बे समय के बाद कुणाल की आवाज़ सुन कर अच्छा लगा। रेखा की आवाज़ में "एक दूनी दो, दो दूनी चार" भी एक मस्ती भरा गीत है। अभी तक इस फ़िल्म के जितने गीतों का ज़िक्र हमने किया, वो सब पेप्पी या सिचुएशनल गाने थे। इस फ़िल्म में कुछ कर्णप्रिय रोमान्टिक गाने भी हैं। अरिजीत सिंह की आवाज़ में "ये इश्क़ है" शाहिद कपूर और कंगना पर फ़िल्माया एक कामुक अभिव्यक्ति भरा गीत है। गीत के बोल शायद आम जनता को समझ ना आए क्योंकि गुलज़ार साहब ने इसमें भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग किया है। इसी गीत का रेखा भारद्वाज का गाया एक एकल संस्करण भी है। दोनों संस्करण अपनी अपनी जगह अपना कमाल दिखाता है। रेखा भारद्वाज, सुखविन्दर सिंह, सुनिधि चौहान और ओ.एस. अर्जुन का गाया "टिप्पा" को बस इसके बोलों की वजह से सुना जाना चाहिए। गुलज़ार साहब आख़िर गुलज़ार साहब हैं। आज भी वो साबित करते हैं कि उनका किसी से मुक़ाबला नहीं। "टप टप टोपी टोपी" वाला गीत याद है जो आपने कभी दूरदर्शन पर सुना होगा? यकीन मानिए यह गीत आपको उस बीते युग में ले जायेगी। दूसरी तरफ़ अरिजीत की आवाज़ में "अलविदा अलविदा तो नहीं" एक संजीदा व दर्द भरा गीत है। अरिजीत की आवाज़ में दो तरह के गीत ख़ूब उभरते हैं, एक कामुक, दूसरा दर्द भरा। हालाँकि इस तरह के गीत अब वो बहुत गा चुके हैं, यह गीत यक़ीनन उनके लिए ख़ास है क्योंकि यह गुलज़ार की रचना है। क्योंकि यह फ़िल्म 40 के दशक के पार्श्व की फ़िल्म है, इसके गीतों में उस ज़माने के ब्रिटिश प्रभाव से भरे संगीत का असर है। ऐल्बम के बाकी तीन गीत "बी स्टिल" और "शिमी शेक" उस दौर के रेट्रो शैली के अंग्रेज़ी गीत हैं।



आपकी बात


’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने आपको गुज़रे ज़माने की अभिनेत्री आशालता बिस्वास पर उनकी पुत्री शिखा वोहरा से की गई बातचीत पेश की थी। इसके संदर्भ में हमारे पाठक श्रीदास गुरजर ने हमसे पूछा कि "हमीनस्तु" और "हमीनस्तो" में क्या अन्तर है और अगर अन्तर है तो इन दोनों शब्दों का क्या मतलब है। श्रीदास जी, सबसे पहले तो हम आपको यह बता दें कि "हमीनस्तो" और "हमीनस्तु" का एक ही अर्थ है। और यही नहीं इसे "हमीं अस्तु", "हमीं अस्तो", "हमीं अस्त" और "हमीनस्त" भी कहा जाता है। यह दरसल फ़ारसी (परशियन) शब्दावली है जिसका अर्थ है "यहीं है"। इसे लोकप्रियता मिली अमीर ख़ुसरौ के मशहूर शेर "गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त" से जो उन्होंने कशमीर के लिए कही थी। इसका अर्थ यह है कि अगर ज़मीं पर स्वर्ग कहीं है, तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ