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मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

पोर-पोर गुलमोहर खिल गए..जब गुलज़ार, विशाल और सुरेश वाडकर की तिकड़ी के साथ "मेघा बरसे, साजन बरसे"

Taaza Sur Taal (TST) - 08/2011 - BARSE BARSE

कुछ चीजें जितनी पुरानी हो जाएँ, उतनी ज्यादा असर करती हैं, जैसे कि पुरानी शराब। ज्यों-ज्यों दिन बीतता जाए, त्यों-त्यों इसका नशा बढता जाता है। यह बात अगर बस शराब के लिए सही होती, तो मैं यह ज़िक्र यहाँ छेड़ता हीं नहीं। यहाँ मैं बात उन शख्स की कर रहा हूँ, जिनकी लेखनी का नशा शराब से भी ज्यादा है और जिनके शब्द अल्कोहल से भी ज्यादा मारक होते हैं। पिछले आधे दशक से इस शख्स के शब्दों का जादू बरकरार है... दर-असल बरकरार कहना गलत होगा, बल्कि कहना चाहिए कि बढता जा रहा है। हमने इनके गानों की बात ज्यादातर तब की है, जब ये किसी फिल्म का हिस्सा रहे हैं, लेकिन "ताज़ा सुर ताल" के अंतर्गत पहली बार हम एक एलबम के गानों को इनसे जोड़कर लाए हैं। हमने "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" में इनके कई सारे गैर-फिल्मी गाने सुनें हैं और सुनते रहेंगे। हम अगर चाहते तो इस एलबम को भी महफ़िल-ए-ग़ज़ल का हिस्सा बनाया जा सकता था, लेकिन चुकी यह "ताज़ा एलबम" है, तो "ताज़ा सुर ताल" हीं सही उम्मीदवार साबित होता है। अभी तक की हमारी बातों से आपने उन शख्स को पहचान तो लिया हीं होगा। जी हाँ, हम गुलज़ार की हीं बातें कर रहे हैं और एलबम का नाम है "बरसे बरसे"।

जब भी कहीं गुलज़ार का ज़िक्र आता है, तो दो संगीतकार खुद-ब-खुद हमें याद आ जाते हैं। एक तो पंचम दा और दूसरे विशाल। विशाल यानि विशाल भारद्वाज। गुलज़ार साहब ने पंचम दा के साथ कई सारे गैर-फिल्मी गानों पर काम किया है..उनमें से एक एलबम का ज़िक्र हमने महफ़िल-ए-ग़ज़ल में भी किया था। पंचम दा की तुलना में विशाल के गानों की गिनती काफ़ी पीछे रह जाती है, लेकिन आज के समय में विशाल हीं एकलौते ऐसे संगीतकार हैं, जिन्होंने गुलज़ार के लफ़्ज़ों के मर्म को पकड़ा है। विशाल-गुलज़ार के गानों को सुनकर इस बात का अनुमान हीं नहीं लग पाता कि संगीत पहले आया था या गीत। दोनों एक-दूसरे से जुड़े महसूस होते हैं। अब अगर इस जोड़ी में "तेरे लिए" (७ खून माफ़) और "जाग जा" (ओंकारा) जैसे सुमधुर गानों में अपनी मखमली आवाज़ का तड़का लगाने वाले सुरेश वाडेकर को शामिल कर लिया जाए तो इस तरह बनी तिकड़ी का कोई सानी न होगा। आज के एलबम "बरसे बरसे" की यही खासियत है। इस एलबम के गीत लिखे हैं गुलज़ार ने, संगीत दिया है विशाल भारद्वाज ने और आवाज़ है सुरेश वाडेकर की। अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि एलबम के गीत कितने अनमोल होंगे! चलिए तो पहले गाने से शुरूआत करते हैं। यह गीत एलबम का शीर्षक गीत (टाईटल ट्रैक) है।

बरसे-बरसे मेघा कारा,
तन भींजे, मन भींजे म्हारा...
मैं भींजूँ अपने साजन में,
मुझमें भींजे साजन म्हारा..
बैयों में भर ले,
सौंधी माटी-सी मैं महकूँ रे,
आज न रैन ढले...

प्रीत का खेल नियारा,
हारूँ तो हो जाऊँ पिया की,
जीतूँ तो पी म्हारा..


इस गाने में राजस्थानी फोक़ (लोक-संगीत) का पुट इतनी खूबसूरती से डाला हुआ है कि एक बार डूबो तो निकलकर आने का मन हीं नहीं करता। सुरेश वाडेकर को सुनकर ऐसा एक पल को भी नहीं लगता कि वे दर-असल मराठी हैं। राजस्थानी शब्दों का उच्चारण न सिर्फ़ साफ़ है, बल्कि राजस्थान के किसी गाँव का माहौल भी उभरकर आ जाता है। विशाल अपने वाद्य-यंत्रों से श्रोताओं को बाँधकर रखने में कामयाब हुए हैं। "प्रीत का खेल नियारा" वाले अंतरे में गुलज़ार ने "अमीर खुसरो" को ज़िंदा कर दिया है। खुसरो ने भी यही कहा था कि "हारूँ तो मैं पी की और जीतूँ तो पी मेरा"। गुलज़ार ऐसा कमाल करते रहते हैं।

अगला गाना है "ऐसा तो होता नहीं है"। इस गाने में गुलज़ार की जादूगरी खुलकर नज़र आती है।

सब्जे में लिपटा हुआ कोई आ जाए अपना!

चंपा-सी तुम, तुम-सी चंपा,
फूलों से धोखा हुआ है..
ये तुम हो कि शम्मा जलाकर,
कोई लॉन में रख गया है।
एक लौ-सा जलता हुआ कोई आ जाए अपना!


जिस तरह से और जिन साज़ों के सहारे गाने की शुरूआत होती है, उसे सुनकर विशाल के संगीत की समझ का सही पता चलता है। चूँकि मुझे साज़ों की उतनी जानकारी नहीं, इसलिए ठीक-ठीक मैं यह कह नहीं सकता कि कौन-से साज़ इस्तेमाल हुए हैं। अगर आप जानते हों तो कृप्या हमें अवगत कराएँ। इस गाने में वाडेकर साहब "तेरे लिए" गाने के हैंग-ओवर में नज़र आते हैं। जब भी वे "कोई आ जाए अपना" कहते हैं तो सच में किसी अपने के आने की चाह खड़ी हो जाती है। "ऐसा तो होता नहीं है...सपनों से चलकर कोई आ जाए अपना"...इस पंक्ति के सहारे गुलज़ार साहब ने हर किसी की दिली-ख्वाहिश को एक झटके में हीं सच का आईना दिखा दिया है।

एलबम का तीसरा गाना है "तेरे नैन"। जहाँ पहला गाना राजस्थानी लोकगीत की याद दिलाता था, वहीं यह गाना खुद में पंजाबियत समेटे हुए है।

पीछ्छे पै गए तेरे नैन...

चले न मेरी मर्जी कोई,
जो कैंदे मैं करदा सोई,
दो दिन वीच मेरी सारी आकर,
कढ के लै गए तेरे नैन..

कोई पीर सयाना आवे,
आके मेरी जान छड़ावे,
मेरे सिरते इश्क़ दा टोना
कर के बै गए तेरे नैन..


गानों में नई सोच किस तरह डालते हैं, यह कोई गुलज़ार साहब से सीखे। "पीछ्छे पै गए तेरे नैन""... अब अगर किसी को अपनी माशूका की आँखों की तारीफ़ करनी होगी तो वह यह तो कतई नहीं कहेगा, क्योंकि उसे डर होगा कि उसकी माशूका कहीं बुरा न मान जाए। लेकिन गुलज़ार साहब जब यह कहते हैं तो उनके पास अपनी बात रखने और साबित करने के कई तरीके होते हैं.. तभी तो वह आराम से कह जाते हैं कि तुम्हारी आँखों ने मेरे सिर पर इश्क़ का टोना कर रखा है। इश्क़ की नई-नई अदाएँ कोई गुलज़ार साहब से सीखे। ऐसा मालूम पड़ता है जैसे गुलज़ार साहब के पास इश्क़ के कई सारे शब्दकोष हैं, जो इन्होंने खुद गढे हैं। इस गाने में विशाल और सुरेश वाडेकर की भागेदारी भी बराबर की है। गाने के बीच में तबले का बड़ा हीं सुंदर प्रयोग हुआ है। वाडेकर साहेब ने जिस तरह राजस्थानी ज़बान को अपना बना लिया था, अमूमन वैसी हीं महारत उनकी पंजाबी ज़बान में नज़र आती है।

तन्हाई में... देहों के टाँके टूटे..

पोर-पोर गुलमोहर खिल गए,
रग-रग में सूरज दहका रे,
साँसों की अंगनाई में..

ताप सहे कोई कितना,
रोम-रोम देह का पुकारे,
वो मंतर जाने सैयां,
तन-मन छांव उतारे,
रूह तलक गहराई में..


एक लंबे आलाप के साथ इस गाने की शुरूआत होती है। सुरेश वाडकर साहब शास्त्रीय संगीत में पारंगत है, इस बात का पता आलाप को सुनते हीं लग जाता है। "तन्हाई" कहते वक़्त ये अपनी आवाज़ में अजीब-सा भारीपन ले आते हैं, ताकि तन्हाई को महसूस किया जा सके। एकबारगी सुनने पर यह मालूम हीं नहीं किया जा सकता कि गुलज़ार साहब कहना क्या चाहते हैं, गाना है किस विषय पर? बात शुरू तो तन्हाई से होती है, लेकिन अगली हीं पंक्ति में "देहों के टाँके टूटे" कहकर गुलज़ार साहब प्यार के "अनमोल पल" की ओर इशारा करते हैं। आगे का हर-एक लफ़्ज़ यही बात दुहराता-सा लगता है। "रग-रग में सूरज दहका" या फिर "ताप सहे कोई कितना".. यहाँ किस ताप की बात हो रही है? क्या मैं वही समझ रहा हूँ, जो गुलज़ार साहब समझाना चाहते हैं या फिर मैं रास्ते से भटक गया हूँ? इस बात का फैसला कौन करेगा? अब जो भी हो, मुझे तो इस गाने में "प्यार..प्यार..प्यार.. और बस प्यार" हीं नज़र आ रहा है, तन्हाई के दर्द का कोई नामो-निशां नहीं है। और वैसे भी, तन्हाई से दर्द को जोड़ना सही नहीं, क्योंकि जब दो जिस्म एक हो जाते हैं, तो वह एक जिस्म-औ-जान अकेला हीं होता है, तन्हा हीं होता है। है या नहीं?

इस एलबम का अंतिम गाना है "ज़िंदगी सह ले"..

ज़िंदगी सह ले,
दर्द है.. कह ले।

पैरों के तले से जिस तरह ये
बर्फ़ पिघलती है, आ जा..
जंगलों में जैसे पगडंडी
पेड़ों से निकलती है, आ जा..


मेरे हिसाब से इस गाने का नाम "आ जा" रखा जाना चाहिए था, क्योंकि भले हीं मुखरे में ज़िंदगी को सह लेने की हिदायत दी जा रही है, लेकिन अंतरों में पुकार हीं पुकार है.. "आ जा" कहकर किसी को पुकारा जा रहा है। मुख्ररे के अंत में और अंतरों के बीच में एक शब्द है जिसे मैं सही से समझ नहीं पाया हूँ। "आ जा अभी/हबी आ सके.. तू आ".. यहाँ पर "अभी" है या "हबी"? अभी रखा जाए तो अर्थ सटीक बैठता है... अर्थ तब भी सही निकलता है, जब हबी हो, बस दिक्कत यह है कि "हबी" हिन्दी या उर्दू का शब्द नहीं, बल्कि अंग्रेजी का है.. हबी यानि कि हसबैंड। अब यह अगर यह फीमेल सॉंग होता तो मैं मान भी लेता कि हबी होगा, क्योंकि गुलज़ार साहब अंग्रेजी के शब्द गानों में इस्तेमाल करते रहते हैं, लेकिन यह तो मेल सॉंग है। एक तीसरा विकल्प भी है.. "हबीब", लेकिन "बीट्स" पर हबीब फिट नहीं बैठता। तो क्या हम मान लें कि वह शब्द "अभी" है? इस एलबम के किसी भी गाने का लिरिक्स इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं, इसलिए सही शब्द पता करना नामुमकिन हीं समझिए। खैर! जहाँ तक संगीत की बात है तो पहले बीट से लेकर अंतिम बीट तक विशाल श्रवणेन्द्रियों को थामे रखने में सफ़ल साबित हुए हैं। बस सुरेश वाडकर साहब से थोड़ी-सी चूक हो गई है। कुछेक शब्दों का उच्चारण साफ़ नहीं है.. इसलिए मज़ा हल्का-सा कम हो गया है।

कुल मिलाकर यह एलबम विविधताओं से भरा है और जैसा हम कहते हैं ना.. "विविधता में एकता"। तो ऐसा हीं कुछ यहाँ भी है। हर गाना अलग तरीके का है, लेकिन सबमें एक खासियत है और वह है "फ़ीलिंग".. "इमोशन्स".. "भाव"। इसलिए सभी गाने सुने जाने चाहिए। सुनकर अच्छा महसूस होगा, यकीन मानिए।

आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 8/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

वार्षिक गीतमाला (पायदान २० से ११ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या २० से ११ तक

पिछले अंक में हम आपको ३०वीं पायदान से २१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

२० वीं पायदान - पिछले सात दिनों में(रॉक ऑन)

रॉक ऑन उन चुंनिदा फिल्मों में से एक है,जिसमें धुन तैयार होने से पहले गीतकार ने अपने गीत लिखे और फिर संगीतकार ने संगीत पर माथापच्ची की है, अमूमन इसका उल्टा होता है। गीत के बोल लीक से हटकर हैं। गाने की पहली पंक्ति हीं इस बात को पुख्ता करती है(मेरी लांड्री का एक बिल)। "दिल चाहता है","लक्ष्य", "डान" जैसी फिल्में बना चुके फरहान अख्तर ने इस फिल्म के जरिये अपने एक्टिंग कैरियर की शुरूआत की है। "अर्जुन रामपाल" को छोड़कर इस फिल्म में फिल्म-जगत का कोई भी नामी कलाकार न था,फिर भी "राक आन" बाक्स-आफिस पर अपना परचम लहराने में सफल हुई। इस फिल्म के सारे गीतों में संगीत दिया है शंकर-अहसान-लाय की तिकड़ी ने तो बोल लिखे हैं फरहान के पिता और जानेमाने लेखक एवं शायर जावेद अख्तर ने। इस गाने को गाया है खुद फरहान ने।



१९ वीं पायदान - खुदा जाने(बचना ऎ हसीनों)

यूँ तो इस फिल्म में रणबीर-दीपिका के सारे दृश्य सिडनी में फिल्माये गये हैं,लेकिन इस गाने की शुटिंग इटली के विशेष एवं चुने हुए लोकेशन्स पर की गई है। मनमोहक सीनरी के मोहपाश में बंधी दीपिका खुद इस बात का बखान करती नहीं थकती। अनविता दत्त गुप्तन की लेखनी का जादू भी कमाल का है और उस पर से विशाल-शेखर के संगीत का तिलिस्म। लेकिन इस गाने की खासियत और प्रमुख यु०एस०पी० है के०के० की आवाज। ऊपर के सुरों पर के०के० की आवाज नहीं फटती,जो अमूमन बाकी गायकॊं के साथ होता है।"एक लौ" फेम शिल्पा राव ने इस गाने में के०के० का बखूबी साथ दिया है।


१८ वीं पायदान - तू राजा की राजदुलारी(ओए लकी लकी ओए)

जबर्दस्त एवं अप्रत्याशित पब्लिक वोटिंग ने इस गाने को १८वीं पायदान पर पहुँचाया है। राजबीर की आवाज अलग ढर्रे की है,इसलिए कहा नहीं जा सकता कि किसे पसंद आ जाए या फिर कौन नापसंद कर जाए। मंगे राम ने इसके बोल लिखे हैं तो संगीत स्नेहा खनवल्कर का है। इस गीत को अभय देओल एवं नीतु चंद्रा पर बेहतरीन तरीके से फिल्माया गया है।


१७ वीं पायदान - फ़लक तक चल(टशन)

इस गाने के साथ उदित नारायण बहुत दिनों बाद सेल्युलायड पर नज़र आए। वैसे दिल को छूते बोल और मधुर संगीत से सजे गानों के लिए उदित नारायण परफेक्ट च्वाइस हैं। इस गाने में उनका साथ दिया है चुपचुप के(बंटी और बब्ली) और बोल न हल्के-हल्के(झूम बराबर झूम) फेम महालक्ष्मी अय्यर ने। अक्षय और करीना पर फिल्माया गया यह गीत निस्संदेह "टशन" का सबसे यादगार गीत है। इस गाने के बोल लिखे हैं कौसर मुनीर ने तो संगीत से सजाया है विशाल-शेखर की जोड़ी ने।


१६ वीं पायदान - पप्पू कान्ट डांस(जाने तू या जाने ना)

"लव के लिए साला कुछ भी करेगा" लिखकर फिल्म-इंडस्ट्री में प्रसिद्ध हुए अब्बास टायरवाला "पप्पू कान्ट डांस" से अपनी पुरानी शैली को दुहराते प्रतीत होते हैं। गाने के बोल कालेज जाने वाली जनता को आकर्षित करने में सफल है और गाने की तर्ज पार्टियों में लोगों को थिरकने पर मजबूर करती है।गाने में अंग्रेजी की पंक्तियाँ ब्लेज़ की हैं तो संगीत ए०आर०रहमान का है ।इस गाने को सात गायकों -अनुपमा देशपांडे, बेनी दयाल, ब्लेज़, दर्शना, मोहम्मद असलम (अजीम-ओ-शान शहंशाह फेम), सतीश सुब्रमन्यम एवं तन्वी, ने अपनी आवाजें दी है ।


१५ वीं पायदान - हाँ तू है(जन्नत)

इस गाने की भी सफलता का मुख्य श्रेय के०के० को जाता है। इस गाने में नब्बे की दशक के नदीम-श्रवण की धुनों की हल्की-सी छाप दीखती है। प्रीतम का संगीत इस गाने को रिवाइंड करके सुनने को बाध्य करता है। गाने के बोल लिखे हैं सईद कादरी ने। वैसे भट्ट कैंप के बारे में यह प्रचलित है कि फिल्म कैसी भी हो, फिल्म के गाने दर्शनीय एवं श्रवणीय जरूर होते हैं। पर्दे पर इमरान हाशमी एवं सोनल चौहान की मौजूदगी इस गाने को दर्शनीय बनाने में कहीं से भी कमजोर साबित नहीं होती।


१४ वीं पायदान - सोचा है(रॉक ऑन)

आसमां है नीला क्यों,पानी गीला-गीला क्यों, सरहद पर है जंग क्यों, बहता लाल रंग क्यॊं....... ऎसे प्रश्न लेकर जावेद अख्तर पहले भी कई बार आ चुके हैं। इस बार अलग यह है कि इन बातों की नैया की पतवार थामी है रौक म्युजिक ने। "राक आन" के आठ गानों में से पाँच गानॊं में पार्श्व गायन किया है स्वयं नायक फरहान ने। इस गाने में भी फरहान अख्तर की हीं आवाज़ है और रौक धुन से सजाया है शंकर-अहसान-लाय ने। वाकई फरहान अख्तर, अर्जुन रामपाल, ल्युक केनी और पूरब कोहली की रौक बैंड "मैजिक" का मैजिक बाक्स-आफिस के सर चढकर बोलता दिखा।


१३ वीं पायदान - ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा(जोधा-अकबर)

जोधा-अकबर फिल्म के लेखक "हैदर अली" चाहते थे कि इस फिल्म में उनकी कैमियो इंट्री हो,लेकिन माकूल रोल नहीं मिल रहा था। तभी फिल्म के निर्देशक "आशुतोष गोवारिकर" ने सुझाया कि "ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा" गाने में जो दरवेशों की टोली आती है,उसमें "हैदर अली" सबसे आगे रह सकते हैं और पूरा का पूरा गाना उन्हीं पर फिल्माया जा सकता है। विचार अच्छा लगा और ए०आर०रहमान की आवाज़ को "हैदर अली" का शरीर मिल गया। यह तो थी इस गाने के फिल्मांकन के पीछे की कहानी, अब बात करें गाने की तो गाने का संगीत दिया है "मोज़ार्ट आफ मद्रास" ए०आर०रहमान ने एवं बोल लिखे हैं जावेद अख्तर ने। यह गाना ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और हज़रत निजामुद्दीन औलिया को समर्पित है। "तेरे दरबार में ख़्वाजा , सर झुकाते हैं औलिया...चाहने से तुझको ख़्वाजा जी मुस्तफ़ा को है चाहा......."


१२ वीं पायदान - तुझमें रब दीखता है(रब ने बना दी जोड़ी)

शायद हीं कोई संगीत-प्रेमी होगा, जिसने फिल्म "अनवर" का गीत "आँखें तेरी" न सुना हो और जिसे यह गीत पसंद न हो। "रूप कुमार राठौर" की आवाज़ का यही असर है, जो आसानी से नहीं उतरता। फिल्म "वीर-ज़ारा" के "तेरे लिए" में लता मंगेशकर के साथ रूप कुमार राठौर की जुगलबंदी को कौन भुला सकता है। हाल में हीं प्रदर्शित हुई "रब ने बना दी जोड़ी" का यह गाना भी इसी खासियत के कारण चर्चा में है। वैसे इस गाने की प्रसिद्धि में एक बड़ा हाथ सलीम-सुलेमान के रूहानी संगीत और जयदीप साहनी( चख दे इंडिया फेम) के सरल एवं सुलझे हुए शब्दों का भी है। इस गाने का फिल्मांकन भी बड़ी हीं खूबसूरती से किया गया है।


११ वीं पायदान - कहने को जश्ने-बहारां है(जोधा-अकबर)

एक बार फिर ए०आर०रहमान। "कहने को जश्ने-बहारां है" सुनने वालों को सोनू निगम की आवाज़ का संदेह होना लाज़िमी है। दर-असल "जावेद अली" की आवाज़ सोनू निगम से बहुत हद तक मिलती है और इसी कारण जल्द हीं असर करती है। फिल्म-इंडस्ट्री में आए हुए जावेद अली के सात साल हो गए,लेकिन पहचान तब मिली जब उन्होंने "नक़ाब" का "एक दिन तेरी राहों में" गाया। फिर तो उनके खाते में कई सारे गाने जमा होते गए। "कहने को जश्ने-बहारां है" को अपने संगीत से सजाया है ए०आर०रहमान ने और बोल लिखे हैं जावेद अख्तर ने। नायक के दिल के दर्द और नायिका से दूरी को बेहतरीन तरीके से इस गाने में दर्शाया गया है। वाकई मुगलकालीन उर्दू का अंदाज-ए-बयाँ है कुछ और....।



साल २००८ के सर्वश्रेष्ठ १० गाने लेकर हम जल्द हीं हाज़िर होंगे। तब तक इन गानों का आनंद लीजिए।



चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

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मंगलवार, 28 अक्तूबर 2008

दीपावली गली गली बन के खुशी आई रे...

आवाज़ के सभी साथियों और श्रोताओं को दीपावली के पावन पर्व की ढेरों शुभकामनाये,हमारे नियमित श्रोता गुरु कवि हकीम ने हमें इस अवसर पर अपना संदेश इस कविता के माध्यम से दिया -

दीप जले प्यार का
जीत का ना हार का
हर किसी के साथ का
हर किसी के हाथ का
दीप जले प्यार का
तोड़ दे दीवार कों
बीच में जो है खडी
स्नेह निर्मल की भीत तो
दीवार से भी है बड़ी
ये दीप ना थके कभी
प्रकाश ना रुके कभी
ये दीप ना बुझे कभी
हर किसी के द्वार का
दीप जले प्यार का
जीत का ना हार का .............
सुधि से सबके मन खिले
सिहर सिहर से ना मिले
पलक भीगी ना रहे
अलक झीनी ना रहे
उज्जवल विलास बन के वो
लौ ज्वाला की धार का
दीप जले प्यार का
जीत का ना हार का....

हिंद युग्म के आंगन में आज हमने कविताओं के दीप जलाये हैं. २४ कवियों की इन २४ कविताओं में गजब की विविधता है. अवश्य आनंद लें. बच्चों की आँखों से भी देखें दिवाली की जगमग.

आवाज़ पर हम अपने श्रोताओं के लिए लाये हैं, एक अनूठा गीत. टेलिविज़न पर एक संगीत प्रतियोगिता में चुने गए टॉप १० में से ५ प्रतिभागियों ने मिलकर दीपावली पर अपने श्रोताओं को शुभकामनायें देने के उद्देश्य से इस गीत को रचा. इन उभरते हुए गायक / गायिकाओं के नाम हैं - कविता, विशाल, संदीप, मीनल और अर्पिता. चूँकि आवाज़ का प्रमुख उद्देश्य नए कलाकारों को बढ़ावा देना है, हम उन प्रतिभाशाली कलाकारों का ये शुभकामनाओं से भरा गीत आपके सामने रख रहे हैं,आप भी इनका प्रोत्साहन बढाएं और अपने मित्रों और परिवारजनों के साथ मिलकर खुशी खुशी आज त्यौहार मनायें -




शुभ दीपावली

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