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Sunday, December 2, 2012

स्वरगोष्ठी में आज : ठुमरी- ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की पहली वर्षगाँठ पर सभी पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक अभिनन्दन   


स्वरगोष्ठी-९८  में आज 

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी –९ 

श्रृंगार रस से परिपूर्ण ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’



फिल्मों में शामिल की गई पारम्परिक ठुमरियों पर केन्द्रित ‘स्वरगोष्ठी’ की लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, आज का यह अंक जारी श्रृंखला की ९वीं कड़ी है और आज की इस कड़ी में हम आपको पहले राग पीलू की ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन, काजर बिन कारे... ’ का पारम्परिक स्वरूप, और फिर इसी ठुमरी का फिल्मी स्वरूप प्रस्तुत करेंगे। इसके अलावा इस अंक में एकल तथा युगल ठुमरी गायन की परम्परा के बारे में आपके साथ चर्चा करेंगे। 


ज पीलू की यह ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ हम आपको सबसे पहले गायिका इकबाल बानो की आवाज़ में सुनवाते हैं। इकबाल बनो का जन्म १९३५ में दिल्ली के एक सामान्य परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर दिल्ली के उस्ताद चाँद खाँ ने उन्हें रागदारी संगीत का प्रशिक्षण देना आरम्भ किया। कुछ वर्षों की संगीत-शिक्षा के दौरान उस्ताद ने अनुभव किया कि इकबाल बानो के स्वरों में भाव और रस के अभिव्यक्ति की अनूठी क्षमता है। उस्ताद ने उन्हें ठुमरी, दादरा और गजल गायन की ओर प्रेरित और प्रशिक्षित किया। मात्र १४ वर्ष की आयु में इकबाल बानो ने दिल्ली रेडियो से शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय गायन आरम्भ कर दिया था। वर्ष १९५० में उन्हें देश की प्रख्यात गायिकाओं में शुमार कर लिया गया था। १९५२ में १७ वर्ष की आयु में उनका विवाह पाकिस्तान के एक समृद्ध परिवार में हुआ और उन्होने मुल्तान शहर को अपना नया ठिकाना बनाया। पाकिस्तान के संगीत-प्रेमियों ने इकबाल बानो को सर-आँखों पर बैठाया। शीघ्र ही वह रेडियो पाकिस्तान की नियमित गायिका बन गईं। यही नहीं उन्होने अनेक फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया। १९८५ में उन्हें फैज अहमद ‘फैज’ की नज़मों पर विशेष शोध और गायन के लिए विश्वस्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ था। २१ अप्रैल, २००९ को लाहौर में उनका निधन हो गया। इस अप्रतिम गायिका के स्वरों में ही है, आज की ठुमरी, लीजिए प्रस्तुत है।

पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ विदुषी इकबाल बानो



आम तौर पर मंच पर एकल ठुमरी गायन की ही परम्परा है। युगल ठुमरी गायन का उदाहरण कभी-कभी उस समय परिलक्षित होता है, जब युगल खयाल गायक खयाल के बाद अन्त में ठुमरी गाते है। इसके अलावा नृत्य के कार्यक्रम में भाव अंग के अन्तर्गत दो नर्तक या नृत्यांगना मंच पर जब भाव-प्रदर्शन करते हैं। बीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में संगीत के मंच पर जिन युगल गायकों का वर्चस्व था उनमें शामचौरासी घराने के उस्ताद नज़ाकत अली (१९२०-१९८४) और सलामत अली (१९३४-२००१) बन्धुओं का नाम शीर्ष पर था। देश के विभाजन के बाद ये दोनों भाई पाकिस्तान के प्रमुख युगल गायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इन्हीं के दो छोटे भाई अख्तर अली और ज़ाकिर अली हैं, जिनका ठुमरी-दादरा गायन संगीत के मंचों पर बेहद लोकप्रिय हुआ। आइए, अब हम आपको उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ की आवाज़ में राग पीलू की यही ठुमरी- 'गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...' सुनवाते हैं।

पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ



१९६४ में अजीत और माला सिन्हा अभिनीत फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का संगीत फिल्मों के एक कम चर्चित संगीतकार लच्छीराम तँवर ने तैयार किया था। लच्छीराम की स्वतंत्र रूप से प्रथम संगीत निर्देशित १९४७ की फिल्म थी ‘आरसी’। इस पहली फिल्म का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय भी हुआ, किन्तु १९४७ से १९६४ के बीच उन्हें साधारण स्तर की फिल्मों के प्रस्ताव ही मिले। इसके बावजूद उनकी प्रत्येक फिल्मों के एक-दो गीतों ने लोकप्रियता के मानक गढ़े। १९६४ की फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ उनकी अन्तिम फिल्म थी। इस फिल्म में लच्छीराम ने इस परम्परागत ठुमरी को आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी के स्वरों में प्रस्तुत किया। फिल्मों में प्रयोग की गई ठुमरियों में सम्भवतः पहली बार युगल स्वरों में किसी ठुमरी को शामिल किया गया था। फिल्म में नायक-नायिका अजीत और माला सिन्हा हैं, परन्तु इस ठुमरी को फिल्म के सह-कलाकारों, सम्भवतः केवल कुमार और निशी पर फिल्माया गया है। ठुमरी के अन्त में अभिनेत्री द्वारा तीनताल में कथक के तत्कार और टुकड़े भी प्रस्तुत किये गए हैं। मूलतः यह ठुमरी राग पीलू की है। परन्तु लच्छीराम ने इसे राग देस के स्वरों में बाँधा है। आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी ने गायन में राग देस के स्वरों को बड़े आकर्षक ढंग से निखारा है। रफ़ी ने इस गीत को सपाट स्वरों में गाया है किन्तु आशा भोसले ने स्वरों में मुरकियाँ देकर और बोलों में भाव उत्पन्न कर ठुमरी को आकर्षक रूप दे दिया है। आइए सुनते हैं, श्रृंगार रस से ओतप्रोत राग देस में यह फिल्मी ठुमरी। आप इस ठुमरी का रसास्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ : देस ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : आशा भोसले और मोहम्मद रफी



आज की पहेली

आज की संगीत पहेली में हम आपको एक पंजाब अंग के सुविख्यात गायक के स्वर में एक पारम्परिक ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


१- यह ठुमरी किस विख्यात गायक की आवाज़ में है?

२- आपने अभी जिस पारम्परिक ठुमरी का अंश सुना है, इसी ठुमरी का प्रयोग आठवें दशक की एक फिल्म में किया गया था। क्या आप उस फिल्म में शामिल ठुमरी के राग का नाम हमें बता सकते हैं?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०० वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के ९६वें अंक की पहेली में हमने आपको रसूलन बाई के स्वरों में भैरवी की पारम्परिक ठुमरी ‘जा मैं तोसे नाहीं बोलूँ...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ‘भैरवी’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- फिल्म ‘सौतेला भाई’। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, लखनऊ से प्रकाश गोविन्द और जौनपुर, उत्तर प्रदेश से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का



मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की शुरुआत हमने १९३६ की फिल्म ‘देवदास’ में शामिल पारम्परिक ठुमरी ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ से किया था। अब हम आ पहुँचे हैं, इस श्रृंखला के समापन की दिशा में। अन्तिम दो अंकों में हम आठवें दशक की फिल्मों में शामिल ठुमरियों पर चर्चा करेंगे। अगले अंक में हम आपके लिए एक और मनमोहक पारम्परिक ठुमरी लेकर उपस्थित होंगे। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर हमारी इस सुरीली गोष्ठी में आप अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज़ कराइएगा। अब हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र


Friday, April 24, 2009

हम देखेंगे... लाज़िम है कि हम भी देखेंगे...

पाकिस्तान से कोई ताज़ा ख़बर है?... ज़रूर कोई बुरी ख़बर होगी। याद नहीं पिछली बार कब इस मुल्क से कोई अच्छी ख़बर सुनने को मिली थी। करेले जैसी ख़बरें वो भी नीम चढ़ी कि उनपर अफ़सोस करने के लिये न तो दिमाग़ के पास फ़ालतू-दिमाग़ रह गया है और न दिल के पास वो धड़कनें जो आंसू में ढल जाती हैं। नहीं दोस्त ये वाक़ई बुरी ख़बर है... और फिर जो कुछ मोबाइल पर कहा गया वो वाक़ई यक़ीन करने वाला नहीं था। इक़बाल बानों नहीं रहीं।

हँसी कब ग़ायब हो गई, बेयक़ीनी कब यक़ीन में बदल गई, पता ही नहीं चला। एक ऐसे मुल्क में जहाँ ख़तरनाक ख़बरें रोज़मर्रा की हक़ीक़त बन चुकी हैं। जहां मौत तमाशा बन चुकी है वहां इक़बाल बानों की मौत ने उस आवाज़ को भी हमसे छीन लिया जो ज़ख़्म भरने का काम करती थी, जो रूह का इलाज थी। “दश्ते तंहाई में ऐ जाने जहां ज़िंदा हैं…” फ़ैज़ की ये नज़्म अगर सुननेवालों के दिलों में ज़िंदा है तो इसकी एक बड़ी वजह इक़बाल बानों की वो आवाज़ है जो इसका जिस्म बन गई। बहरहाल ये सच है कि 21 अप्रैल 2009 को इकबाल बानो अपने चाहने वालों को ख़ुदा हाफिज़ कहके हमेशा-हमेशा के लिये रुख़सत हो गईं। और इसी के साथ ठुमरी, दादरा, ख़याल और ग़ज़ल की एक बेहतरीन ख़िदमतगुज़ार एक न मिटने वाली याद बन कर रह गई।

“हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे... हम देखेंगे” यूनिवर्सिटी के ज़माने से लेकर अब तक जब कभी ये नज़्म गायी गई, बदन में सिरहन दौड़ा गई। कई बार टेप की हुई आवाज़ में इसे सुना और साथ ही सुनीं वो हज़ारों तालियाँ जो लय के साथ-साथ गीत को ऊँचा और ऊँचा उठाती रहीं। मेरी इस बात से आप भी सहमत होंगे कि इस नज़्म के अलावा शायद ही कभी किसी और गीत को जनता का, श्रोताओं का, दर्शकों का इतना गहरा समर्थन कभी मिला हो, हमने तो कभी नहीं देखा-सुना हालांकि सब कुछ देखने-सुनने का कोई दावा भी हम नहीं करते। अवाम की आवाज़ में हुक्मरानों के ख़िलाफ़ पंक्ति दर पंक्ति व्यंग्य की लज़्ज़त महसूस करना और ताली बजाकर उसके साथ समर्थन का रोमांच जिन श्रोताओं की यादों का हिस्सा है उन्हें इक़बाल बानो की मौत कैसे खल रही होगी इसका अंदाज़ा हम लगा सकते हैं।

पता नहीं कितनों को ये इल्म है कि इकबाल बानों की पैदाइश इसी दिल्ली में हुई। दिल्ली घराने के उस्ताद चाँद खान ने उन्हें शास्त्रीय संगीत और लाइट क्लास्किल म्यूज़िक में प्रशिक्षित किया। पहली बार उनकी आवाज़ को लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली से सुना। विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। अगर इजाज़त हो तो ये कहना चाहूँगा कि हमारे पास दो बेगम अख़्तर थीं, विभाजन में हमने एक पाकिस्तान को दे दी। 1952 में, 17 साल की उम्र में उनकी शादी एक ज़मींदार से कर दी गई। इक़बाल बानो की इस शर्त के साथ कि उनके शौहर उन्हें गाने से कभी नहीं रोकेंगे। ताज्जुब है कि मौसिकी के नाम पर, एक इस्लामी गणराज्य में, एक शौहर अपनहे वचन के साथ अंत तक बँधा रहा और इक़बाल बानो की आवाज़ के करिश्में दुनिया सुनती रहीं।
1957 से वो संगीत की अपनी प्रस्तुतियों के द्वारा लोकप्रियता की सीढियाँ चढ़ने लगीं। और जल्दी ही फ़ैज़ के कलाम को गाने की एक्सपर्ट कही जाने लगीं। प्रगतिशील आंदोलन के बैनर तले जब भी, कहीं भी, कोई भी आयोजन हुआ तो इक़बाल बानो की आवाज़ हमेशा उसमें शामिल रही। हर ख़ास और आम ने इस आवाज़ को सराहा, उसे दिल से चाहा। हिंद युग्म उन्हें अपना सलाम पेश करता है।

--नाज़िम नक़वी


दश्ते तंहाई में ऐ जाने जहां ज़िंदा हैं (फैज़ अहमद फैज़)


हम देखेंगे.....लाज़िम है कि हम भी देखेंगे (फैज़ अहमद फैज़)


गोरी तोरे नैना काजर बिन कारे (ठुमरी)

संगत- साबरी खान (सारंगी), ज़ाहिद खान (हारमोनियम), रमज़ान खान (तबला), अबदुल हमीद साबरी (सुरमनदल) और साईद खान (सितार)।


इक़बाल बानो को हिन्द-युग्म की श्रद्धाँजलि

हम देखेंगे का वीडियो

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