Showing posts with label rajendra krishan. Show all posts
Showing posts with label rajendra krishan. Show all posts

Monday, December 18, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 19 || राजेंद्र कृष्ण

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 19
Rajendra Krishan


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के 19 वें एपिसोड में सुनिए कहानी राजेंद्र कृष्ण की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Monday, August 15, 2011

जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा....सुनिए समृद्ध भारत की कहानी राजेंद्र कृष्ण की जुबानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 722/2011/162



ज स्वतन्त्रता दिवस के पावन पर्व पर आप सब संगीत-प्रेमियों को ‘आवाज़’ परिवार की ओर से बहुत-बहुत बधाई। आज के पावन दिन को ही ध्यान में रख कर हम ‘ओल्ड इज गोल्ड’ स्तम्भ पर श्रृंखला ‘वतन के तराने’ प्रस्तुत कर रहे हैं। दोस्तों, इस श्रृंखला में हम गीतों के बहाने कुछ ऐसे महान स्वतन्त्रता सेनानियों की चर्चा कर रहे हैं जिन्होने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी। आज के अंक में हम वीरांगना लक्ष्मीबाई के त्याग और बलिदान का स्मरण करेंगे और एक प्यारा सा गीत सुनेंगे, जिसमें अपने राष्ट्रीय गौरव का गुण-गान किया गया है।



19नवम्बर, 1835 को काशी (वाराणसी) में महाराष्ट्रीय ब्राह्मण मोरोपन्त और भगीरथ बाई के घर एक विलक्षण कन्या का जन्म हुआ। कन्या का नाम रखा गया- मनु। मनु के जन्म के कुछ ही समय बाद मोरोपन्त के आश्रयदाता चिमोजी अप्पा का निधन हो गया। चिमोजी अप्पा बिठूर (कानपुर) में निर्वासित जीवन बिता रहे पेशवा बाजीराव के भाई थे। अपने समय के सशक्त पेशवा का परिवार अंग्रेजों के षड्यंत्रके कारण ही छिन्न-भिन्न होकर अलग-अलग स्थानों पर निर्वासित जीवन बिता रहा था। चिमोजी अप्पा के देहान्त के बाद मोरोपन्त उनके भाई पेशवा बाजीराव के आश्रय मे बिठूर आकर रहने लगे। अभी मनु की आयु मात्र चार वर्ष की ही थी, तभी उसकी माँ भगीरथ बाई का निधन हो गया। मोरोपन्त ने धैर्य के साथ नन्ही मनु का पालन-पोषण किया। मनु को बचपन के खेल-खिलौने या गुड़ियों से खेलने मेंकोई रुचि नहीं थी। उसे तो तीर-तलवार से खेलना और साहसपूर्ण करतब ही भाते थे।



पेशवा बाजीराव मनु को पुत्रीवत मानते थे और उसे ‘छबीली’नाम से पुकारते थे। उन्होने राज परिवार के अन्य बालकों के साथ मनु की शिक्षा की व्यवस्था गंगा तट पर स्थित गुरु आश्रम में कर दी। गुरु केआश्रम में मनु, पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब, राव साहब और पाण्डुरंग राव (तात्या टोपे) के साथ शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा पाने लगी। धीरे-धीरे मनु दस वर्ष की हो चुकी थी। वह घुड़सवारी, भाला,तीर, तलवार आदि चलाने में अपने से बड़ी आयु के बालकों की तुलना में अधिक कुशल हो गई थी। इसके साथ ही धर्मग्रंथों के अध्ययन में भी ऐसी प्रवीण हुई कि पिता मोरोपन्त, पेशवा बाजीराव और स्वयं उसके गुरु भी चकित थे। एक दिन मनु ने गुरुदेव से प्रश्न किया –‘मुट्ठीभर अंग्रेज़ आज हमें हमारे ही देश में अपने इशारों पर नचा रहे हैं। क्या हम निर्बल हैं? क्या हमारी आत्मा मृत हो चुकी है?उस दिन गुरुदेव ने उन्हें हिंसा और अहिंसा का भेद समझाया और कहा कि आततायी के साथ अहिंसा की नीति अपनाना व्यर्थ है। उस दिन नाना साहब, तात्या टोपे और मनु ने प्रण किया- “हम स्वाधीन होने का प्रयत्न करेंगे। पराधीन होकर जीने से तो मर जाना अच्छा है।“ बचपन में लिया गया यह प्रण तीनों ने निभाया।



मनु जब तेरह वर्ष की हुई तो मोरोपन्त को उसके विवाह की चिन्ता हुई। एक दिन पेशवा बाजीराव ने मोरोपन्त को सूचित किया कि झाँसी के राजा गंगाधर राव का मनु से विवाह का प्रस्ताव आया है।दरअसल गंगाधर राव की कोई सन्तान नहीं थी। मनु से उनके विवाह करने का उद्देश्य था- झाँसी को अंग्रेजों की कुदृष्टि से बचाना। काफी विचार-विमर्श के बाद यह विवाह सम्पन्न हुआ और मनु झाँसी की रानी बन कर झाँसी के राजमहल में आ गई। विवाह के उपरान्त मनु का नामकरण हुआ लक्ष्मीबाई।दोस्तों, वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की गाथा के लिए सैकड़ों पृष्ठ भी कम होंगे, यह तो हमारी श्रृंखला का एक अंक मात्र है। आज के अंक में हमने लक्ष्मीबाई के जन्म से लेकर झाँसी की रानी बननेके प्रसंग और उस काल के राजनैतिक परिवेश का संकेत देने का प्रयास किया है। कल के अंक में हम आपसे रानी के सैन्य संगठन की क्षमता, युद्ध कौशल और बलिदान की गाथा की चर्चा करेंगे।



और अब हम स्वतन्त्रता की 64वीं वर्षगाँठ के पावन दिन‘सोने की चिड़िया’भारत के यथार्थ स्वरूप का दर्शन एक गीत के माध्यम से करेंगे। यह गीत 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘सिकन्दरे आजम’ से लिया गया है। पाँचवें और छठे दशक में राजेन्द्र कृष्ण फिल्म जगत के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतकार थे। उन्हीं के गीत –“जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़ियाँ करती हैं बसेरा, वह भारत देश है मेरा....” की संगीत रचना संगीतकार हंसराज बहल ने की थी। फिल्मी दुनिया में श्री बहल को ‘मास्टर जी’ के सम्बोधन से पुकारा जाता था। राग शुद्ध कल्याण की छाया लिये देश के इस गौरव गान को मुहम्मद रफी ने स्वर देकर इसे अमर कर दिया। लीजिए, आप भी सुनिए यह गौरव-गान-



फिल्म - सिकन्दरे आजम : ‘जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़ियाँ करतीं हैं बसेरा..' : गीतकार - राजेन्द्र कृष्ण





(समय के अभाव के चलते कुछ दिनों तक हम ऑडियो प्लेयर के स्थान पर यूट्यूब लिंक लगा रहे हैं, आपका सहयोग अपेक्षित है)



और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - स्वर है लता मंगेशकर का.

सूत्र २ - गीतकार दादा साहब फाल्के सम्मान से सम्मानित हैं.

सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है "कफ़न".



अब बताएं -

संगीतकार कौन है - ३ अंक

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

फिल्म के निर्देशक कौन हैं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

हिन्दुस्तानी जी भूल सुधरने के लिए धन्येवाद. और २ अंको की बधायी भी लें, सभी श्रोताओं को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ और हम सबके प्रिय शम्मी कपूर को भावभीनी श्रद्धाजन्ली...इस पूरे आलेख को भी पढ़ें



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 15, 2011

ऐ जान-ए-जिगर दिल में समाने आजा....पियानों के तार खनके और मुकेश की आवाज़ में गूंजा अनिल दा नग्मा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 593/2010/293

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार और स्वागत है आप सभी का इन दिनों चल रही लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' में। साल १७९० से लेकर १८६० के बीच मोज़ार्ट के दौर के पियानों में बहुत सारे बदलाव आये, पियानो का निरंतर विकास होता गया, और १८६० के आसपास जाकर पियानो ने अपना वह रूप ले लिया जो रूप आज के पियानो का है। पियानो के इस विकास को एक क्रांति की तरह माना जा सकता है, और इस क्रांति के पीछे कारण था कम्पोज़र्स और पियानिस्ट्स के बेहतर से बेहतर पियानो की माँग और उस वक़्त चल रही औद्योगिक क्रांति (industrial revolution), जिसकी वजह से उत्तम क्वालिटी के स्टील विकसित हो रहे थे और उससे पियानो वायर का निर्माण संभव हुआ जिसका इस्तमाल स्ट्रिंग्स में हुआ। लोहे के फ़्रेम्स भी बनें प्रेसिशन कास्टिंग् पद्धति से। कुल मिलाकर पियानो के टोनल रेंज में बढ़ौत्री हुई। और यह बढ़ौत्री थी मोज़ार्ट के 'फ़ाइव ऒक्टेव्स' से ७-१/४ या उससे भी ज़्यादा ऒक्टेव्स तक की, जो आज के पियानो में पायी जाती है। पियानो की शुरुआती विकास में एक और उल्लेखनीय नाम है ब्रॊडवूड कंपनी का; जॊन ब्रॊडवूड ने रॊबर्ट स्टोडर्ट और अमेरिकास बेकर्स के साथ मिलकर हार्प्सिकॊर्ड केस का इस्तमाल कर एक नये पियानो का निर्माण किया, और इसी से शुरुआत हुई 'ग्रैण्ड पियानो' की। यह सन् १७७७ की बात थी। इस टीम को जल्द ही ख्याति मिल गई क्योंकि इनके द्वारा निर्मित पियानो की ध्वनियाँ शक्तिशाली थीं, शार्प थीं। इन्होंने अपने पियानो जोसेफ़ हेडन और बीथोवेन को भेजे, और इनके पियानो में पहली बार पाँच से ज़्यादा ऒक्टेव्स की रेंज मौजूद थी। १७९० में पाँच ऒक्टेव, १८१० में छे ऒक्टेव और १८२० में सात ऒक्टेव वाले पियानो का निर्माण संभव हुआ। वियेनीज़ निर्माणकर्ताओं ने भी इस शैली को इख़्तियार कर पियानो निर्माण किया, लेकिन इन दोनों स्कूलों के पियानो में एक मूल फ़र्क था - ब्रॊडवूड पियानो ज़्यादा शक्तिशाली (robust) थे, जबकि वियेनीज़ पियानो ज़्यादा सेन्सिटिव हुआ करते थे। इस तरह से दोनों ही अपनी अपनी जगह कीमती सिद्ध हुए।

३० के दशक से सरस्वती देवी और ४० के दशक से आर. सी. बोराल के बाद आज 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला के लिए हमने चुना है ५० के दशक से संगीतकार अनिल बिस्वास की एक नायाब रचना। कल हमने आर. सी. बोराल साहब को 'फ़ादर ऒफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहकर संबोधित किया था। दरअसल ऐसा अनिल दा ने ही कहा था, और ख़ुद को उन्होंने 'अंकल ऒफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहा। तो दोस्तों, फ़ादर के बाद आज बारी अंकल की। अनिल के संगीत में हमने चुना है १९५१ की फ़िल्म 'आराम' का एक बेहद लोकप्रिय गीत मुकेश की आवाज़ में, "ऐ जान-ए-जिगर दिल में समाने आजा"। ४० के दशक के आख़िर तक फ़िल्म संगीत में पियानो का इस्तमाल बेहद लोकप्रिय हो चुका था और यह परम्परा ९० के दशक तक जारी रहा। हिंदी फ़िल्मों में पियानो पर रचे गीतों में अधिकतर गीत पार्टी गीत हुआ करते थे। अगर ख़ुशी की बात हुई तब तो कोई बात नहीं, लेकिन अक्सर ग़म में डूबा नायक भी पियानो पर कोई ग़मगीन नग़मा छेड़ देता है जिसका अर्थ केवल उसकी नायिका ही समझ सकती है और कोई नहीं। आज के प्रस्तुत गीत के फ़िल्मांकन में प्रेम नाथ साहब पियानो पर बैठे गाते हुए नज़र आते हैं। राजेन्द्र कृष्ण ने इस गीत को लिखा है। दोस्तों, अभी हाल ही में आपने संगीतकार तुषार भाटिया का साक्षात्कार पढ़ा होगा 'आवाज़' पर जो केन्द्रित था अनिल दा पर। बरसों पहले अनिल दा ने तुषार जी को एक एल.पी रेकॊर्ड उपहार में दिया था और उसके कवर पर बांगला में कुछ लिखा था, जो तुषार जी पढ़ नहीं पाये थे। अभी हाल में उनके इसी इंटरव्यु के दौरान उन्होंने वह कवर मुझे दिखाया और मुझसे उसका तर्जुमा करने को कहा। जब मैंने उन्हें बताया कि अनिल दा ने लिखा है, "तुषार को सस्नेह आशिर्वाद के साथ, अनिल दा", तो तुषार जी ने मुझे जवाब में कहा, "Dear Sujoy, You have made my day, missing dada more than ever before". और मैंने उनको जवाब दिया कि "what a privilege you have given me Tushar ji to translate something Anil da has written for you; cant ask for more!"। सच ही तो है दोस्तों, इतने सालों तक अनिल दा का लिखा वह जुम्ला अनपढ़ा रह गया और मुझे यह सौभाग्य नसीब हुआ कि उसे पढ़कर तुषार जी को बताऊँ कि अनिल दा ने उनको क्या लिखा था। तो आइए अनिल दा को समर्पित आज का यह पियानो गीत सुनते हैं मुकेश की आवाज़ में। और हाँ सब से उल्लेखनीय बात कहना तो मैं भूल ही गया; वह यह कि इस गीत में जो पियानो बजा है उसे बजाया था सनी कास्तेलीनो ने, जिनके लिए अनिल दा के दिल में बहुत सम्मान था।



क्या आप जानते हैं...
कि किसी भी पियानो को निर्माण के बाद पहले साल में चार बार ट्युन करना पड़ता है चार बार ऋतुओं के बदलाव के समय, और फिर दूसरे साल से दो बार प्रति वर्ष।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस अभिनेता पर है ये गीत फिल्माया - 3 अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - 2 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
तीनों महारथियों के स्कोर बराबर हैं....बढ़िया है मुकाबला...हिन्दुस्तानी जी भी हैं २ अंकों पर

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, January 3, 2011

दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम...क्या खूब प्रयोग किया राजेन्द्र कृष्ण साहब ने इस मुहावरे का गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 562/2010/262

'कितना हसीं है मौसम' - चितलकर रामचन्द्र के स्वरबद्ध और गाये गीतों की इस लघु शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। सी. रामचन्द्र का जन्म महाराष्ट्र के अहमदनगर के पुणेताम्बे में १२ जून १९१५ को हुआ था। उनके पिता रेल्वे में सहायक स्टेशन मास्टर की नौकरी किया करते थे। अपने बेटे की संगीत के प्रति लगाव और रुझान को देख कर उन्हें नागपुर के एक संगीत विद्यालय में भर्ती करवा दिया। फिर उन्होंने पुणे में विनायकबुआ पटवर्धन से गंधर्व महाविद्यालय म्युज़िक स्कूल में संगीत की शिक्षा प्राप्त की। उन दिनों मूक फ़िल्मों का दौड़ था, वे कोल्हापुर आ गये और कई फ़िल्मों में अभिनय किया। पर उनकी क़िस्मत में तो लिखा था संगीतकार बनकर चमकना। कोल्हापुर से बम्बई में आने के बाद सी. रामचन्द्र सोहराब मोदी की मशहूर मिनर्वा मूवीटोन में शामिल हो गए जहाँ पर उन्हें उस दौर के नामचीन संगीतकारों, जैसे कि हबीब ख़ान, हूगन और मीरसाहब के सहायक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हूगन से उन्होंने पाश्चात्य संगीत सीखा जो बाद में उनके संगीत में नज़र आने लगा, और शायद उनका यही वेस्टर्ण स्टाइल उन्हें क्रांतिकारी संगीतकार होने का गौरव दिलाया। सी. रामचन्द्र इस नाम से स्थापित होने से पहले तीन और नामों से संगीत दिए। श्यामू के नाम से 'ये है इण्डिया दुनिया' में, राम चितलकर के नाम से 'सुखी जीवन', 'बदला', 'मिस्टर झटपट', 'बहादुर' और 'दोस्ती' में, तथा अन्नासाहब के नाम से 'बहादुर प्रताप', 'मतवाले' और 'मददगार' में। संगीतकार के रूप में उन्हें पहली फ़िल्म मिली थी तमिल फ़िल्म 'जयक्कोडी' और 'वनमोहिनी'। अनिल बिस्वास, बसंत प्रकाश, धनीराम, वसंत देसाई और ओ. पी. नय्यर जैसे संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया और संगीत सृजन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सी. रामचन्द्र के संगीत से सजी पहली हिंदी फ़िल्म थी 'सुखी जीवन'। सचिन देव बर्मन, ओ. पी. नय्यर और दूसरे कई संगीतकारों ही की तरह उनकी शुरुआत भी सुखद नही रही। लोगों के दिलों में जगह बनाने के लिए उन्हें भी कड़ी मेहनत और जद्दोजहद करनी पड़ी। लेकिन एक बार कामयाबी की राह पर चल निकले तो फिर कभी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। वो कहते हैं न कि दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम। तो जो शोहरत, जो बुलंदी, चितलकर साहब के नसीब में लिखी थी, वो उन्हें मिली, और आज उनका नाम फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के अग्रणी संगीतकारों में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। दोस्तों, आज हमने जिस गीत को चुना है, उसके बोल अभी अभी हम बता चुके हैं। जी हाँ, "दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम, लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम"। यह गीत १८५७ की फ़िल्म 'बारिश' का है जिसे चितलकर ने अपनी एकल आवाज़ में गाया है। बोल सुन कर ऐसा लगता है जैसे कोई भक्तिमूलक रचना है, लेकिन सुनने पर पता चलता है कि पाश्चात्य ऒर्केस्ट्रेशन पर आधारित है यह गीत, लेकिन गीत में जो दर्शन छुपा हुआ है, उससे मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। राजेन्द्र कृष्ण साहब के लिखे इस गीत में वो कहते हैं कि "कभी गरमी की मौज कभी बारिश का रंग, ऐसे चक्कर को देख सारी दुनिया है दंग, चांद सूरज ज़मीन सारे उसके ग़ुलाम, लेने वाले करोड़ देने वाला एक राम"। भाव बस यही है कि सब कुछ उस एक आद्यशक्ति, उस एक सुप्रीम पावर द्वारा संचालित है, यह पूरी दुनिया, यह अंतरिक्ष, सब कुछ उस एक शक्ति का ग़ुलाम है। आइए इस गीत को सुनें, हमें यकीन है कि आपने बहुत दिनों से इस गीत को नहीं सुना होगा।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र ने हिंदी के अलावा ७ मराठी, ३ तेलुगु, ६ तमिल और कई भोजपुरी फ़िल्मों का भी संगीत तैयार किया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 03/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म के नायक बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इस गीत में अन्ना जिस गायक की आवाज़ इस्तेमाल करना चाह रहे थे खुद उसी गायक की शैली में उन्होंने इस गीत को गाया है, कौन थे वो गायक जो इस गीत को नहीं गा पाए- २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे अरे, लगता है कि आप लोग गलत गीत पर दाव खेल बैठे. शुरूआती धुन को सुनकर थोडा सा भरम होता है, पर हमने मुहावरे का भी हिंट दिया था, खैर अवध जी सही निकले, शरद जी और प्रतिभा जी बिना अंकों के ही संतुष्ट होना पड़ेगा. श्याम जी और अमित जी कहाँ गायब हैं ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, January 2, 2011

शाम ढले, खिडकी तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो....हिंदी फिल्म संगीत जगत के एक क्रान्तिकारी संगीतकार को समर्पित एक नयी शृंखला

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 561/2010/261

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और आप सभी को एक बार फिर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ! साल २०११ आपके जीवन में अपार सफलता, यश, सुख और शांति लेकर आये, यही हमारी ईश्वर से कामना है। और एक कामना यह भी है कि हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के माध्यम से फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के अनमोल मोतियों को इसी तरह आप सब की ख़िदमत में पेश करते रहें। तो आइए नये साल में नये जोश के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के कारवाँ को आगे बढ़ाया जाये। दोस्तों, फ़िल्म संगीत के इतिहास में कुछ संगीतकार ऐसे हुए हैं जिनके संगीत ने उस समय की प्रचलित धारा को मोड़ कर रख दिया था, यानी दूसरे शब्दों में जिन्होंने फ़िल्म संगीत में क्रांति ला दी थी। जिन पाँच संगीतकारों को क्रांतिकारी संगीतकारों के रूप में चिन्हित किया गया है, उनके नाम हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर, राहुल देव बर्मन और ए. आर. रहमान। इनमें से एक क्रांतिकारी संगीतकार को समर्पित है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की आज से शुरु होने वाली लघु शृंखला। ये वो संगीतकार हैं, जो फ़िल्म जगत में आये तो थे नायक बनने, कुछ फ़िल्मों में अभिनय भी किया, पर उनकी क़िस्मत में लिखा था संगीतकार बनना, सो बन गये एक क्रांतिकारी संगीतकार। इसके साथ साथ उन्होंने अपनी गायकी के जलवे भी दिखाये समय समय पर। जी हाँ, जिस फ़नकार पर केन्द्रित है यह लघु शृंखला, उन्हें हम संगीतकार के रूप में सी. रामचन्द्र के नाम से और गायक के रूप में चितलकर के नाम से जानते हैं। प्रस्तुत है अन्ना साहब, अर्थात् चितलकर नरहर रामचन्द्र, यानी सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध किए और गाये गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम'। इस शृंखला में हम ना केवल उनके गाये व संगीतबद्ध किए गीत सुनवाएँगे, बल्कि उनके जीवन और करीयर से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं से भी आपका परिचय करवाएँगे।

आइए इस शृंखला की पहली कड़ी में हम आपको सुनवाते हैं फ़िल्म 'अलबेला' से चितलकर और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ों में "शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो"। 'अलबेला' १९५१ की फ़िल्म थी और यह साल सी. रामचन्द्र के करीयर का एक महत्वपूर्ण साल साबित हुआ था। १९४२ में सी. रामचन्द्र ने हिंदी फ़िल्मों में बतौर संगीतकार पदार्पण किया था मास्टर भगवान की फ़िल्म 'सुखी जीवन' में। और इसके करीब १० साल बाद १९५१ में भगवान दादा की ही फ़िल्म 'अलबेला' में संगीत देकर सफलता के नये झंडे गाढ़े। मास्टर भगवान शकल सूरत से बहुत ही साधारण थे जहाँ तक फ़िल्म में नायक बनने की बात थी। लेकिन उन्होंने इतिहास कायम किया ना केवल इस फ़िल्म को प्रोड्युस व डिरेक्ट कर के, बल्कि फ़िल्म में गीता बाली के विपरीत नायक बन कर उन्होंने सब को चौंका दिया। इसमें कोई शक़ नहीं कि इस फ़िल्म की सफलता का एक मुख्य कारण इसका संगीत रहा। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण और संगीतकार सी. रामचन्द्र ने सर्वसाधारण के नब्ज़ को सटीक पकड़ा और हल्के फुल्के बोलों से तथा पाश्चात्य व शास्त्रीय संगीत के मिश्रण से लोकप्रिय गीत संगीत की रचना की। ये गानें थोड़े से पारम्परिक भी थे, थोड़े आधुनिक भी, थोड़े शास्त्रीयता लिये हुए भी और थोड़े पाश्चात्य भी। फ़िल्म का हर गीत हिट हुआ और ऐसा सुना गया कि जब यह फ़िल्म थिएटर में चलती थी तो जब जब कोई गाना शुरु होता, लोग खड़े हो जाते और डान्स करने लग पड़ते। अन्य गीतों के अलावा लता और चितलकर की आवाज़ों में इस फ़िल्म में कुछ युगल गीत थे जैसे कि "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के", "भोली सूरत दिल के खोटे", "मेरे दिल की घड़ी करे टिक टिक टिक" तथा राग पहाड़ी पर आधारित आज का प्रस्तुत गीत "शाम ढले खिड़की तले"। रोमांटिक कॊमेडी पर आधारित यह गीत ५० वर्ष बाद आज भी हमें गुदगुदा जाता है और यकायक हमारे होठों पर मुस्कान खिल उठता है। तो आइए आप भी मुस्कुराइए और सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर साल २०११ का पहला गोल्डन गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि १९ नवंबर १९४२ को सी. रामचन्द्र ने अपनी मकान-मालकिन की बेटी रतन ठाकुर से प्रेम-विवाह कर लिया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - खुद अन्ना ने गाया है इस गीत को.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम क्या है - १ अंक
सवाल ३ - गाने के शुरूआती बोल किस मुहावरे पर हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को २ अंक और श्याम जी को १ अंक की बधाई. इंदु जी जरा ध्यान से खेलिए

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, July 28, 2010

गोरे गोरे ओ बांके छोरे....प्रेरित धुनों पर थिरकने वाले गीतों की संख्या अधिक है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 449/2010/149

संगीतकार सी. रामचन्द्र को क्रांतिकारी संगीतकारों की सूची में शामिल किया जाता है। ४० के दशक में जब फ़िल्म संगीत पंजाब, बंगाल और यू.पी. के लोक संगीत तथा भारतीय शास्त्रीय संगीत में ढल कर लोगों तक पहुँच रही थी, ऐसे में सी. रामचन्द्र ने पाश्चात्य संगीत को कुछ इस क़दर इंट्रोड्युस किया कि जैसे फ़िल्मी गीतों की प्रचलित धारा का रुख़ ही मोड़ दिया। इसमें कोई शक़ नहीं कि उनसे पहले ही विदेशी साज़ों का इस्तेमाल फ़िल्मी रचनाओ में शुरु हो चुका था, लेकिन उन्होने जिस तरह से विदेशी संगीत को भारतीय धुनों में ढाला, वैसे तब तक कोई और संगीतकार नहीं कर सके थे। १९४७ की फ़िल्म 'शहनाई' में "आना मेरी जान मेरी जान सन्डे के सण्डे" ने तो चारों तरफ़ तहलका ही मचा दिया था। उसके बाद १९५० की फ़िल्म 'समाधि' में वो लेकर आए "ओ गोरे गोरे ओ बांके छोरे, कभी मेरी गली आया करो"। इस गीत ने भी वही मुक़ाम हासिल कर लिया जो "सण्डे के सण्डे" ने किया था। उसके बाद १९५१ में फ़िल्म 'अलबेला' में फिर एक बार "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के" ने भी वही कमाल किया। तो दोस्तों, आज हमने 'गीत अपना धुन पराई' के लिए चुना है फ़िल्म 'समाधि' के "ओ गोरे गोरे" गीत को। पता है इसकी धुन किस मूल धुन से प्रेरीत है? यह है एडमुण्डो रॊस की क्लासिक "चिको चिको ओ पोरटिको" से। वैसे यह भी कहना ज़रूरी है कि केवल मुखड़ा ही इस धुन से लिया गया है, अंतरे की धुन सी. रामचन्द्र की मौलिक धुन है। राजेन्द्र कृष्ण ने इस गीत को लिखा था और आवाज़ें है लता मंगेशकर, अमीरबाई कर्नाटकी और साथियों की। जैसे कि गीत के बोलों से ही ज़ाहिर है कि दो नायिकाओं में एक लड़की है तो दूसरी बनी है लड़का। लता ने लड़की का प्लेबैक दिया है तो अमीरबाई ने लड़के का। 'समाधि' रमेश सहगल निर्देशित फ़िल्म थी जिसके मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, नलिनी जयवन्त, कुलदीप कौर, श्याम, मुबारक़, एस.एल. पुरी, बद्री प्रसाद आदि। प्रस्तुत गीत फ़िल्माया गया है नलिनी जयवन्त और कुलदीप कौर पर जिनके किरदारों के नाम थे लिली डी'सूज़ा और डॊली डी'सूज़ा। १९५० की सब से ज़्यादा व्यापार करने वाली फ़िल्म साबित हुई थी 'समाधि' जिसने १,३५,००,००० र का व्यापार किया था।

आइए आज बात करें एडमुण्डो रॊस की जिनकी बनाई धुन पर आधारित है हमारा आज का गीत। ७ दिसंबर १९१० को पोट ऒफ़ स्पेन, त्रिनिदाद, वेस्ट इण्डीज़ में एडमुण्डो विलियम रॊस के नाम से जनम लेने के बाद १९३९ से लेकर १९७५ तक वो संगीत की दुनिया में सक्रीय रहे। आज भी वो १०० वर्ष की आयु में हमारे बीच मौजूद हैं। रोस ने अपने करीयर में एक बेहद लोकप्रिय लातिन-अमेरिकन ऒरकेस्ट्रा का निर्देशन किया, रेकॊर्डिंग् के क्षेत्र में भी लम्बी पारी खेली और लंदन के एक जाने माने नाइट क्लब के मालिक रहे। १९४० में उन्होने अपना बैन्ड बनाया जिसका नाम उन्होने रखा 'एडमुण्डो ओस ऐण्ड हिज़ रम्बा बैण्ड'। इस बैण्ड में धीरे धीरे १६ म्युज़िशिअन्स शामिल हुए। १९४९ में बना उनका गीत 'दि वेडिंग साम्बा' इतना ज़्यादा लोअक्प्रिय हुआ कि ३ मिलियन ७८-आर.पी.एम के रेकॊर्ड्स बिके। जहाँ तक "चिको चिको" गीत का सवाल है, यह एक क्यूबन गीत है, जो एडमुण्डो रॊस की 'दि क्यूबन लव सॊंग्‍ ऐल्बम' में शामिल किया गया है। जहाँ एक तरफ़ सी. रामचन्द्र ने इस धुन का इस्तेमाल १९५० की इस फ़िल्म में किया, वहीं अगले साल १९५१ में तमिल संगीतकार आर. सुदर्शनम ने तमिल फ़िल्म 'ओर इरवु' के गीत "अय्या सामी अवोजि सामी" में किया जिसे गाया था एम. एल. वसंतकुमारी ने। तो इन तमाम जानकारियों के बाद आप भी बेचैन हो रहे होंगे इस चुलबुले गीत को सुनने के लिए, तो सुनते हैं....



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'समाधि' की कहानी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की 'आज़ाद हिंद सेना' की पृष्ठभूमि पर बनाई गई थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. May be you'll fall in love with me domani से कुछ प्रेरित है ये गीत, कौन हैं इस मधुर गीत के गायक संगीतकार - ३ अंक.
२. गीतकार बताएं - २ अंक.
३. फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
४. इस फिल्म का और कौन स गीत है जो ओल्ड इस गोल्ड पर बज चुका है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ने कल लपक लिए ३ अंकों का सवाल. अवध जी भी चुस्त दिखे. किश और प्रतिभा जी (क्या हम इन्हें अलग अलग मानें? मान लेते हैं) भी ऑन स्पोट रहे. इंदु जी नयी तस्वीर में खूब लग रहीं हैं, राज जी आपकी फिल्म का इन्तेज़ार रहेगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, April 3, 2010

अपलम चपलम चपलाई रे....गुदगुदाते शब्द मधुर संगीत और मंगेशकर बहनों की जुगलबंदी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 393/2010/93

ज़ोहराबाई -शमशाद बेग़म और सुरैय्या - उमा देवी की जोड़ियों के बाद 'सखी सहेली' की तीसरी कड़ी में आज हम जिन दो गायिकाओं को लेकर उपस्थित हुए हैं, वो एक ऐसे परिवार से ताल्लुख़ रखती हैं जिस परिवार का नाम फ़िल्म संगीत के आकाश में सूरज की तरह चमक रहा है। जी हाँ, मंगेशकर परिवार। जो परम्परा स्व: दीनानाथ मंगेशकर ने शुरु की थी, उस परम्परा को उनके बेटे बेटियों, लता, आशा, उषा, मीना, हृदयनाथ, आदिनाथ, ने ना केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उसे उस मुकाम तक भी पहुँचाया कि फ़िल्म संगीत के इतिहास में उनके परिवार का नाम स्वर्णाक्षरों से दर्ज हो गया। आज इसी मंगेशकर परिवार की दो बहनों, लता और उषा की आवाज़ों में प्रस्तुत है एक बड़ा ही नटखट, चंचल और चुलबुला सा गीत सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा १९५५ की फ़िल्म 'आज़ाद' का वही सदाबहार गीत "अपलम चपलम"। कहा जाता है कि फ़िल्म 'आज़ाद' के निर्माता एस. एम. एस. नायडू ने पहले संगीतकार नौशाद को इस फ़िल्म के संगीत का भार देना चाहा, पर उन्होने नौशाद साहब के सामने शर्त रख दी कि एक महीने के अंदर सभी ९ गीत तय्यार चाहिए। नौशाद साहब ने यह शर्त मंज़ूर नहीं की। उनके बाद कोई भी संगीतकार इस चैलेंज को स्वीकार करने का साहस नहीं किया। आख़िरकार सी. रामचन्द्र ने चुनौती स्वीकारा और सच में उन्होने एक महीने के अंदर सभी गानें रिकार्ड करके ना केवल सब को चकित किया, बल्कि सारे के सारे गानें लोकप्रियता की बुलंदी तक भी पहुँचे। इस फ़िल्म से जुड़ी हुई एक और दिलचस्प बात भी आपको बताता चलूँ। 'दाग़', 'संगदिल', 'फ़ूटपाथ, और 'देवदास' जैसी दुखांत वाली फ़िल्में करने के बाद दिलीप कुमार मानसिक तौर से बिमार हो चले थे, और मानसिक अवसाद उन्हे घेरने लगी थी। ऐसे में उनके डॊक्टर ने उन्हे इस तरह की फ़िल्में करने से मना किया। जब नायडू साहब ने दिलीप साहब को 'आज़ाद' में एक बहुत ही अलग किस्म का सुपरहीरो का किरदार निभाने का अवसर दिया, तो धीरे धीरे वो फिर एक बार मानसिक तौर से चुस्त दुरुस्त हो गए।

लता जी और उषा जी ने इस फ़िल्म में दो हिट युगल गीत गाए, एक तो आज का प्रस्तुत गीत है, और दूसरा गाना था पंजाबी रंग का "ओ बलिए, चल चलिए, आ चलें वहाँ, दिल मिले जहाँ"। दोस्तों, भले ही लता जी और आशा जी के संबंध को लेकर हमेशा से लोगों में उत्सुकता रही है, लेकिन लता जी और उषा जी के बीच कभी कोई ऐसी वैसी बात नहीं सुनी गई। बल्कि लता जी और साथ उषा जी हमेशा साथ में रहती हैं। हाल के कुछ वर्षों में लता जी जिस किसी भी फ़ंक्शन में जाती हैं, उषा जी उनके साथ ही रहती हैं। उषा जी जब विविध भारती पर 'जयमाला' कार्यक्रम पेश करने आईं थीं, उसमें उन्होने लाता जी और आशा जी के सम्मान में बहुत सी बातें कीं थीं। आइए आज उसी कार्यक्रम के एक अंश को यहाँ पढ़ें, जिसमें उषा जी बता रही हैं लता जी के बारे में। "बचपन से ही मैं लता दीदी के साथ रिकार्डिंग् पर जाया करती थी। उस दौर में फ़िल्म के अलावा रिकार्ड के लिए अलग से दोबारा गाना पड़ता था। 'कठपुतली' फ़िल्म के एक गाने की रिकार्डिंग् दोपहर २ बजे तक चलती रही। बहुत गरमी थी, बजाने वाले भी गरमी से तड़प रहे थे और गाना बार बार रीटेक हो रहा था। लता दीदी २०-२५ बार गाने के बाद बेहोश हो कर गिर पड़ीं। फिर वो ठीक भी हो गईं, लेकिन इस हादसे से इतना ज़रूर अच्छा हुआ कि उस रिकार्डिंग् स्टुडियो में एयर कंडिशनर लगवा दिया गया। लता दीदी के बारे में कोई क्या कह सकता है! दुनिया जानती है कि ऐसी आवाज़ एक बार ही जनम लेती है। ऐसी आवाज़ जिसे सुन कर मन को सुकून और शांति मिलती है!" और अब दोस्तों, लता जी और उषा की शरारती अंदाज़ का नमूना, फ़िल्म 'आज़ाद' के इस मचलते, थिरकते गीत में, आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि उषा मंगेशकर ने शास्त्रीय नृत्य की तालीम भी ली थी, और गायन के अलावा उन्हे चित्रकारी का भी बहुत शौक रहा है।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"धूल", गीतकार बताएं -३ अंक.
2. गीता दत्त के साथ किस गायिका ने इस भजन में अपनी आवाज़ मिलायी है- २ अंक.
3. लीला चिटनिस के साथ कौन सी नायिका ने परदे पर निभाया है इस गीत को-२ अंक.
4. संगीतकार कौन है फिल्म के -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह वाह सब ने जबरदस्त वापसी की है इस बार. इंदु जी आपको ३ अंक और शरद जी, पदम जी और अनीता जी को २- २ अंकों की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, January 21, 2010

मेरी दास्ताँ मुझे ही मेरा दिल सुना के रोये कभी ...उषा खन्ना के संगीत में उभरा लता का दर्द

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 321/2010/21

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आज से एक बार फिर से छा रहा है फ़रमाइशी रंग। शरद तैलंग, स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा', पूर्वी, और पराग सांकला के बाद 'ओल्ड इज़ गोल्ड पहेली प्रतियोगिता' की विजेयता बनीं हैं हमारी इंदु जी। इसलिए आज से अगले पाँच दिनों तक हम सुनने जा रहे हैं इंदु जी की पसंद के पाँच गानें बिल्कुल बैक टू बैक। यकीन मानिए दोस्तों, कि इंदु जी ने ऐसे ऐसे नायाब गानें चुन कर हमें भेजे हैं कि इन्हे सुनवाते हुए हम जितना आनंद महसूस कर रहे हैं उतना ही मज़ा हमें आया इन गीतों पर आलेख लिखते हुए। तो शुरुआत करते हैं लता मंगेशकर के गाए फ़िल्म 'आओ प्यार करें' के एक बड़े ही ख़ूबसूरत गाने से, जिसके बोल हैं "मेरी दास्ताँ मुझे ही मेरा दिल सुना के रोये"। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के बोल और संगीतकार उषा खन्ना की तर्ज़। उषा जी के स्वरबद्ध किए उत्कृष्ट रचनाओं में से एक है आज का प्रस्तुत गीत। इस फ़िल्म के बारे में हम अभी बात करेंगे, लेकिन उससे पहले इंदु जी के चार शब्द भी जान लें कि इस गीत की उन्होने फ़रमाइश क्यों की हैं। इंदु जी लिखती हैं कि "यह फ़िल्म नहीं देखी पर जब भी खूब रोने की इच्छा होती है, इसे सुनती हूँ, ये गीत रुला देता है। जो गानों की ताकत, असर का एक उदहारण है कि हमारे गानें कितना भीतर तक उतरने की क्षमता रखते हैं। और रो लेने से मन हल्का हो जाता है यानि मन का ट्रीटमेंट गानों के द्वारा....हा हा हा हा।"

फ़िल्म 'आओ प्यार करें' सन् १९६४ में बन कर प्रदर्शित हुई थी, जिसका निर्देशन किया था आर. के. नय्यर ने। सायरा बानो, संजीव कुमार और जॊय मुखर्जी के अभिनय से सजी इस फ़िल्म को इसके संगीत की वजह से ही लोगों ने अब तक याद रखा है। आज के प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म में और जो सुरीले नग़में थे वे हैं लता जी की ही आवाज़ में "एक सुनहरी शाम थी", "तमन्नाओं को खिलने दे", लता-रफ़ी का गाया बड़ा ही शोख़ और नटखट डुएट "तुम अकेली तो कभी बाग़ में जाया ना करो", रफ़ी साहब की आवाज़ में "बहार-ए-हुस्न", "दिल के आने में", "दिलबर दिलबर हो दिलबर", "जिनके लिए मैं दीवाना बना" और "ये झुकी झुकी झुकी निगाहें तेरी", तथा महेन्द्र कपूर और उषा मंगेशकर का गाया फ़िल्म का शीर्षक गीत "आओ प्यार करें"। इन सुरीले गीतों का श्रेय बहुत हद तक उषा खन्ना जी को जाता है। दोस्तों, दिल के तमाम भावनाओं को व्यक्त करते हैं हमारे फ़िल्मी गीत। शायद ही ऐसा कोई भाव होगा जो किसी ना किसी फ़िल्मी गीत में उभरकर सामने ना आया हो। और ऐसी भावनाओं को काव्यात्मक तरीके से हमारे समक्ष प्रस्तुत करने में उन प्रतिभाशाली गीतकारों के साथ साथ उन गुणी संगीतकारों के मधुर धुनों का भी बहुत बड़ा योगदान है। संगीतकारों की धुनें ही उन भावनाओं, उन विचारों को कई गुणा ज़्यादा असरदार बना देते हैं। उषा खन्ना जी की धुनें भी इस क़दर सुंदर बन पड़ी है कि उसका जादू, उसका असर नए नए रूप लेकर हमारे सामने आते रहे हैं। आज का प्रस्तुत गीत भी उन्ही गीतों में से एक है। अच्छे संगीत की तारीफ़ करने के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि हमें संगीत का ज्ञान हो। हम अहसानमंद हैं हमारे फ़िल्म संगीतकारों के जिन्होने हमारे जीवन से जुड़ी धुनें देकर हमारे जीवन को आसान बनाया है, जिन्हे सुन कर हम अपने ग़म भूल जाते हैं या दुख बँट जाता है अपने आप ही। आइए सुनें आज का गीत जो कि एक ऐसा ही गीत है।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

बांका सजन न माने गुहार,
देखे हैं मस्त आँखों से मतवाला,
घबराहट में सूखी मेरी जान,
छलिये ने घूंघट मेरा उठा डाला..

अतिरिक्त सूत्र - इस गीत को लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने

पिछली पहेली का परिणाम-
बिलकुल सही है अवध जी..लगे रहिये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, January 7, 2010

मेरी जीवन नैय्या बीच भंवर में गुड़ गुड़ गोते खाए....कैसे रहेंगे मुस्कुराए बिना किशोर दा और पंचम दा के सदाबहार गीत को सुनकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 307/2010/07

'पंचम के दस रंग' शृंखला में आज है हमारी आपको गुदगुदाने की बारी। राहुल देव बर्मन ने बहुत सारी फ़िल्मों में हास्य रस के गानें बनाए हैं। इससे पहले कि हम आज के गीत पर आएँ, हम उन तमाम हिट व सुपरहिट गीतों का ज़िक्र करना चाहेंगे जिनमें पंचम ने हास्य रस के रंग भरे हैं। नीचे हम एक पूरी की पूरी फ़ेहरिस्त दे रहे हैं, ज़रा याद कीजिए इन गीतों को, इनमें से कुछ गीत आगे चलकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में भी शामिल होंगे ऐसी हम उम्मीद करते हैं।

१. कालीराम का फट गया ढोल (बरसात की एक रात)
२. गोलमाल है भई सब गोलमाल है (गोलमाल)
३. एक दिन सपने में देखा सपना (गोलमाल)
४. मास्टर जी की आ गई चिट्ठी (किताब)
५. कायदा कायदा आख़िर फ़ायदा (ख़ूबसूरत)
६. सुन सुन सुन दीदी तेरे लिए (ख़ूबसूरत)
७. नरम नरम गरम गरम (नरम गरम)
८. एक बात सुनी है चाचाजी (नरम गरम)
९. ये लड़की ज़रा सी दीवानी लगती है (लव स्टोरी)
१०. दुक्की पे दुक्की हो (सत्ते पे सत्ता)
११. जयपुर से निकली गाड़ी (गुरुदेव)

और इन सबसे उपर, फ़िल्म 'पड़ोसन' के दो गानें - "एक चतुर नार" तथा "मेरे भोले बलम"। और भी कई गीत हो सकते हैं जो इस वक़्त मेरे ज़हन में नहीं आ रहे हैं, लेकिन फ़िल्म 'पड़ोसन' के इन दो गीतों के सामने कोई और गीत टिक नहीं सकता ऐसा मेरा विचार है। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कालजयी "एक चतुर नार" आप सुन चुके हैं और गीत के पीछे की कहानी भी हमने आपको उस दिन विस्तार से बताई थी। आज आइए सुनते हैं दूसरा गीत "मेरे भोले बलम", किशोर दा की सिर्फ़ आवाज़ ही नहीं बल्कि उनका अंदाज़-ए-बयाँ ही इस गीत की जान है, इस गीत की शान है।

राहुल देव बर्मन ने सब से ज़्यादा जिन प्रमुख गीतकारों के साथ काम किया है, वे हैं मजरूह सुल्तानपुरी, आनंद बक्शी, गुलशन बवारा और गुलज़ार। लेकिन फ़िल्म 'पड़ोसन' में ये कालजयी गीत लिखे थे राजेन्द्र कृष्ण जी ने। वैसे इस तरह के हास्य रस वाले गीतों के लिए राजेन्द्र कृष्ण साहब बहुत पहले से ही जाने जाते रहे हैं। ख़ास कर ५० के दशक में सी. रामचन्द्र के साथ कई फ़िल्मों में उन्होने इस तरह के गुदगुदाने वाले गानें लिख चुके थे। आइए आज "मेरे भोले बलम" गीत का थोड़ा सा विश्लेषण किया जाए। गीत शुरु होता है किशोर दा के सचिन देव बर्मन वाले अंदाज़ से, जिस तरह से "धीरे से जाना बगियन में" में सचिन दा का अंदाज़ था। उसके तुरंत बाद बंगाल के कीर्तन के रीदम में प्रील्युड म्युज़िक शुरु होता है और पूरे गीत में यही वैष्णव कीर्तन का अंदाज़ छाया रहता है। और साज़ भी वो ही इस्तेमाल हुए हैं जैसे कि कीर्तन में होता है, खोल, एकतारा वगेरह। मुखड़े की पंक्ति है "मेरे भोले बलम, मेरे प्यारे रे बलम, मेरा जीवन तेरे बिना, मेरे पिया, है वो दीया के जिसमें तेल ना हो..."। अजीब-ओ-ग़रीब उपमाओं का इस्तेमाल होता है जो आपको हँसाए बिना नहीं रहते। ये पंक्तियाँ दरअसल किशोर गा रहे हैं सुनिल दत्त साहब को यह समझाते हुए कि नायिका सायरा बानु इस तरह से उनके लिए गाएँगी। तो अब इसके बाद सुनिल दत्त उर्फ़ भोला किशोर दा से पूछ ही लेते हैं कि "गुरु, जब वो ऐसा कहेगी न, तब मैं जवाब क्या दूँगा?" इस पर किशोर दा जिस तरह से हँसते हैं, और जिस अंदाज़ में इस सवाल का जवाब देते हैं, बस किशोर दा ही कर सकते हैं। वो कहते हैं "कहना अनुराधा...", यह उस अंदाज़ में कहते हैं जिस अंदाज़ में १९३७ की फ़िल्म 'विद्यापति' में के. सी. डे ने "गोकुल से गए गिरिधारी" गीत में कहा था। सुनिल दत्त साहब ग़लती सुधार देते हैं कि उनकी नायिका अनुराधा नहीं बल्कि बिंदु है। तब गीत "मेरे भोले बलम" से बदल कर हो जाता है "मेरी प्यारी बिंदु" और अंत तक यही रहता है। इस गीत में गायन के अलावा किशोर दा ने अभिनय करते वक़्त जिन दो कलाकारों के नकल उतारे वो हैं संगीतकार खेमचंद प्रकाश और सचिन देव बर्मन। सचिन दा के चलने का अंदाज़ और खेमचंद जी के आँखों में सूरमा लगाने की अदा को बख़ूबी उतारा जिनीयस किशोर दा ने। गीत के आख़िर में किशोर दा बहुत ही ऊँचे सुर में बिल्कुल उसी तरह से आवाज़ लगाते हैं जिस तरह से किसी वैष्णव कीर्तन के आख़िरी हिस्से में होता है। दोस्तों, अब आप यह गीत सुनिए और गीत को सुनते हुए इन पहलुओं पर ग़ौर कीजिएगा जो अभी हमने आप को बताए, तो गाना सुनने का मज़ा और भी बढ़ जाएगा। चलते चलते राजेन्द्र कृष्ण, राहुल देव बर्मन, और किशोर कुमार को सलाम इस मास्टरपीस के लिए!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

वो मुलाकातें याद है क्या,
जब हवाएं और भी रेशमी हो जाया करती थी, तुम्हारा बदन चूमकर,
और फूल खिलते थे तुम्हारी मुस्कराहट देखकर,
मौसम रंग बदलता था पाकर तुम्हारी आँखों के इशारे...

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी २ और अंक जुड़े आपके खाते में, अवध जी देखिये आज अच्छा मौका है, आज शायद शरद जी जवाब न दें क्योंकि उन्हें मात्र एक ही अंक मिलेगा, पर आप सही जवाब देकर २ अंक कमा सकते हैं आज. पारो जी, यूनी कवि प्रतियोगिता मासिक है, और यहाँ भी यदि कोई विजेता बन जाता है तो कम से कम अगले दो और विजेताओं के आने बाद या फिर कोई माईल स्टोन एपिसोड के बाद ही हम उन्हें दोबारा खेलने का मौका देते हैं, धुरंधरों से टकरायेंगे तभी तो आपको अपनी ताकत का अंदाजा होगा :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, December 17, 2009

बहाए चाँद ने आँसू ज़माना चांदनी समझा...हेमंत दा का गाया एक बेमिसाल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 293

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है पराग सांकला जी के चुने हुए गीतों को सुनवाने का सिलसिला। गीता दत्त और राजकुमारी के बाद आज जिस गायक की एकल आवाज़ इस महफ़िल में गूँज रही है, उस आवाज़ को हम सब जानते हैं हेमंत कुमर के नाम से। हेमंत दा की एकल आवाज़ में इस महफ़िल में आप ने कई गानें सुनें हैं जैसे कि कोहरा, बीस साल बाद, सोलवाँ साल, काबुलीवाला, हरीशचन्द्र, अंजाम, और जाल फ़िल्मों के गानें। आज पराग जी ने हेमंत दा की आवाज़ में जिस गीत को चुना है, वह है १९५५ की फ़िल्म 'लगन' का - "बहाए चाँद ने आँसू ज़माना चांदनी समझा, किसी की दिल से हूक उठी तो कोई रागिनी समझा"। इस गीत के बोल जितने सुंदर है, जिसका श्रेय जाता है गीतकार राजेन्द्र कृष्ण को, उतना ही सुंदर है इसकी धुन। हेमन्त दा ही इस फ़िल्म के संगीतकार भी हैं। हेमन्त कुमार और राजेन्द्र कृष्ण ने एक साथ बहुत सारी फ़िल्मों में काम किया है और हर बार इन दोनों के संगम से उत्पन्न हुए हैं बेमिसाल नग़में। आज का प्रस्तुत गीत भी उन्ही में से एक है। चाँद और चांदनी पर असंख्य गीत और कविताएँ लिखी जा चुकी हैं और आज भी लिखे जा रहे हैं। लेकिन शायद ही किसी और ने चांदनी को चाँद के आँसू के रूप में प्रस्तुत किया होगा। बहुत ही मौलिक और रचनात्मक लेखन का उदाहरण प्रस्तुत किया है राजेन्द्र जी ने इस गीत में। गीत का मूल भाव तो यही है कि किसी की मुस्कुराहटों के पीछे भी कई दुख तक़लीफ़ें छुपी हो सकती हैं जिसे दुनिया नहीं देख पाती। अगर इस गीत को 'छाया गीत' में शामिल किया जाए तो शायद उसमें जो अगला गीत बजेगा वह होगा "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो"। ख़ैर, ये तो बात की बात थी, आज हम बात करते हैं फ़िल्म 'लगन' की।

सन् १९५५ में हेमंत कुमार ने कुल चार फ़िल्मों में संगीत दिया था। ये फ़िल्में हैं 'बहू', 'बंदिश', 'भागवत महिमा', और 'लगन'। 'लगन' 'ओपी फ़िल्म्स' के बैनर तले बनी थी, जिसका निर्माण व निर्देशन किया था ओ. पी. दत्ता ने। सज्जन, नलिनी जयवंत और रणधीर इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार रहे। आइए आज कुछ बातें करें राजेन्द्र कृष्ण साहब के बारे में। पिछली बार जब हमने उनका ज़िक्र किया था तो उनके शुरुआती दिनों के बारे में आपको बताया था कि किस तरह से वे फ़िल्म जगत में शामिल हुए थे और १९४९ में संगीतकार श्यामसुंदर के लिए उन्होने लिखे थे 'लाहोर' फ़िल्म के गानें जो बेहद मक़बूल हुए थे। लगभग उसी समय फ़िल्म 'बड़ी बहन' आयी जिसमें संगीतकार थे हुस्नलाल भगतराम। एक बार फिर राजेन्द्र जी के गीत संगीत रसिकों के होठों पर चढ़ गये। राजेन्द्र साहब तमिल भाषा के भी अच्छे जानकार थे। इसलिए मद्रास की नामचीन कंपनी 'एवीएम' के वे पहली पसंद बन गए, और 'एवीएम' के साथ साथ और भी कई तमिल फ़िल्म कंपनियों के साथ जुड़ गए। उस समय इन कंपनियों की लगभग सभी फ़िल्मों की पटकथा के अलावा इन फ़िल्मों में उन्होने गीत भी लिखे। राजेन्द्र कृष्ण ने कुछ १०० फ़िल्मों के पटकथा लिखे, और ३०० से अधिक फ़िल्मों में गानें लिखे। अपने समय के लगभग सभी नामचीन संगीतकारों के साथ उन्होने काम किया है। लेकिन सी. रामचन्द्र, मदन मोहन और हेमन्त कुमार के साथ उनकी ट्युनिंग् सब से बढ़िया जमी और इन संगीतकारों के लिये उन्होने लिखे अपने करीयर के बेहतरीन गानें। राजेन्द्र कृष्ण कुछ हद तक 'अंडर-रेटेड' ही रह गए। उनकी उतनी ज़्यादा चर्चा नहीं हुई जितनी कि साहिर, शैलेन्द्र, मजरूह जैसे गीतकारों की हुई, लेकिन अगर उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी और म्युज़िकोग्राफी पर ध्यान दिया जाए तो पाएँगे कि एक से एक उत्कृष्ट गानें वो छोड़ गए हैं, जो किसी भी दृष्टि से इन दूसरे 'नामी' गीतकारों के मुक़ाबले कुछ कम नहीं थे। ख़ैर, आइए अब गीत सुना जाए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. अभिनेता शेखर के लिए तलत ने गाया है इसे.
२. संगीतकार वो हैं जिन्होंने तलत से उनका पहला गीत गवाया था.
३. मुखड़े में शब्द है -"जहर".

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी एक और सही जवाब, बधाई....आप यात्रा का आनंद लें और सकुशल लौटें....हम राह देखेंगें, ऐसा अपनों के साथ ही होता है न ?:)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, November 5, 2009

फिर वही शाम वही गम वही तन्हाई है...तलत की आवाज़ में डूबते शाम को तन्हा दिल से उठती टीस

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 253

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं पहेली प्रतियोगिता के तीसरे विजेयता पूर्वी जी के अनुरोध पर एक के बाद एक कुल पाँच गानें। आज है उनके चुने हुए तीसरे गीत की बारी। कल का गीत था ख़ुशरंग, आज उसके ठीक विपरित, यानी कि एक ग़मज़दा नग़मा। है तो ग़मज़दा लेकिन उतना ही मक़बूल और मशहूर जितना कि कोई भी दूसरा ख़ुशनुमा हिट गीत। आज हम सुनने जा रहे हैं तलत महमूद की मख़मली आवाज़ में फ़िल्म 'जहाँ आरा' का गीत "फिर वही शाम वही ग़म वही तन्हाई है, दिल को समझाने तेरी याद चली आई है"। तलत साहब के गाए सब से ज़्यादा हिट गीतों की फ़ेहरिस्त में शुमार होता है इस गीत का। राजेन्द्र कृष्ण के असरदार बोल और मदन मोहन का अमर संगीत। यह अफ़सोस की ही बात है दोस्तों कि मदन मोहन के संगीत वाली फ़िल्में बॉक्स ऒफ़िस पर ज़्यादा कामयाब नहीं हुआ करती थी। लेकिन उन फ़िल्मों का संगीत कुछ ऐसा रूहानी होता था कि ये फ़िल्में केवल अपने गीत संगीत की वजह से ही लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बस जाती थी। 'जहाँ आरा' भी एक ऐसी ही फ़िल्म थी। मैने यह कहीं पढ़ा है, पता नहीं सच है या ग़लत, कि 'जहाँ आरा' फ़िल्म कुछ इस क़दर फ़्लॊप हुई कि बहुत से सिनेमाघरों से इस फ़िल्म को उसी दिन उतार दिया गया जिस दिन यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी। यानी कि यह फ़िल्म एक डिसास्टर रही निर्माता के लिए। लेकिन संगीत रसिकों के लिए यह एक यादगार फ़िल्म है जिसकी मिठास दिन-ब-दिन बढ़ती चली जा रही है।

'जहाँ आरा' फ़िल्म बनी थी सन् १९६४ में। और १९६४ में ही आई थी मदन मोहन के संगीत में सुपरहिट फ़िल्म 'वो कौन थी'। अब इन दो फ़िल्मों में एक समानता देखिए। 'जहाँ आरा' में लता-तलत का गाया युगल गीत "ऐ सनम आज ये क़सम खाएँ" की धुन 'वो कौन थी' में लता-महेन्द्र के गाए युगल गीत "छोड़ कर तेरे प्यार का दामन" से कहीं कहीं बहुत मिलता जुलता है। ख़ैर, 'जहाँ आरा' के निर्देशक थे विनोद कुमार। मुग़ल पृष्ठभूमी पर आधारित इस फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की थी कि मिर्ज़ा युसूफ़ चंगेज़ी और जहाँ आरा बचपन के साथी थे। जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखते ही दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया। जहाँ आरा के वालिद और कोई नहीं बल्कि बादशाह शाहजहाँ थे, जिन्होने जहाँ का किसी भी ग़ैर पुरुष से मिलने जुलने पर पाबंदी लगा रखी थी। लेकिन जहाँ और मिर्ज़ा छुप छुप कर मिलते रहे और एक दूसरे से शादी करने का इरादा भी कर बैठे। बदक़िस्मती से जब मुमताज़ महल की मौत हो गई तो शाहजहाँ ने उनकी याद में ताजमहल बनाने की क़सम खाई। मृत्यु शय्या पर मुमताज़ महल ने अपनी बेटी जहाँ आरा से यह वचन लिया था कि उनके बाद वो अपने वालिद का ख़याल रखेगी। ऐसे में जहाँ और मिर्ज़ा का मिलन असंभव था। क्या हुआ फिर दोनो के प्यार का, क्या वो एक दूजे से मिल पाए, यह थी 'जहाँ आरा' फ़िल्म की कहानी। शाहजहाँ के किरदार में पृथ्वीराज कपूर, जहाँ आरा के किरदार में माला सिन्हा और मिर्ज़ा युसूफ़ चंगेज़ी की भूमिका में थे भारत भूषण। जाहिर सी बात है आज यह प्रस्तुत गीत फ़िल्म की कहानी के उस मोड़ पर फ़िल्माया गया होगा जब मिर्ज़ा और जहाँ का एक दूसरे से मिलना जुलना बंद हो गया था। तभी तो शाम की तन्हाइयों ने मिर्ज़ा को घेर लिया था। राजेन्द्र कृष्ण साहब ने क्या ख़ूब लिखा है कि "दिल को समझाने तेरी याद चली आई है"। "याद चली आई है", "याद आ रही है", "याद तेरी आएगी" जैसे बोल तो बार बार लिखे जा चुके हैं, लेकिन "दिल को समझाने तेरी याद चली आई है" में कुछ और ही बात है! तो चलिए सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (पहले तीन गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी और पूर्वी एस जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. राग पहाडी पर आधारित है ये गीत.
२. शकील बदायुनीं है गीतकार.
३. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"सितारे".

पिछली पहेली का परिणाम -

कमाल है इतने सूत्र देने के बाद भी कोई इस नायाब गीत की गुत्थी नहीं सुलझा पाया.....चलिए आज के लिए सबको शुभकामनाएँ

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, September 11, 2009

हम तो जानी प्यार करेगा, नहीं डरेगा....चितलकर और आशा ने जमाया जम कर रंग

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 199

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में जारी है '१० गायक और एक आपकी आशा'। आशा भोंसले की आवाज़ वो सुरीली आवाज़ है, जानी पहचानी सी, कुछ नई कुछ पुरानी सी, कभी कोमल कभी बुलंद सी। आवाज़ वही पर अंदाज़ हमेशा नया। आशा जी की आवाज़ और अंदाज़ सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं, विदेशों में भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ। हाल में उन्होने कई विदेशी बैंड्स से साथ मिल कर 'पॊप ऐल्बम्स' में गाने गाए हैं, जो दुनिया भर में ख़ूब सुने गए। आशा जी की आवाज़ को पाने के लिए संगीतकार और फ़िल्मकार आज भी आमादा रहते हैं जैसा कि गुज़रे ज़माने के संगीतकार और फ़िल्मकार रहते थे। फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों की बात करें तो जिन गीतों के लिए आशा जी को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का यह पुरस्कार मिला था, उनकी सूची इस प्रकार है -

१९६७ - ग़रीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा (दस लाख)
१९६८ - परदे में रहने दो (शिकारी)
१९७१ - पिया तू अब तो आजा (कारवाँ)
१९७२ - दम मारो दम (हरे रामा हरे कृष्णा)
१९७३ - होने लगी है रात (नैना)
१९७४ - चैन से हमको कभी आप ने जीने ना दिया (प्राण जाए पर वचन न जाए)
१९७८ - ये मेरा दिल यार का दीवाना (डॊन)

इसके बाद आशा जी ने यह पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया था। 'उमराव जान' के गानें और 'इजाज़त' का गीत "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है" के लिए उन्हे दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फ़िल्म जगत में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए आशा भोंसले को भारत सरकार ने दादा साहब फालके पुरस्कार और पद्मविभुषण से सम्मानित किया है।

आशा जी के गाए युगल गीतो की इस विशेष शृंखला में १० में से ८ गायकों के साथ उनके गाए युगल गीत आप सुन चुके हैं, आज बारी है एक बार फिर से एक गायक-संगीतकर की। गायक चितलकर और संगीतकार सी. रामचन्द्र। आशा और सी. रामचन्द्र के साथ का सब से महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है फ़िल्म 'नवरंग'। इस फ़िल्म में चितलकर ने आशा जी के साथ अपनी आवाज़ भी मिलाई "कारी कारी अंधियारी रात" गीत में। 'नवरंग' फ़िल्म आयी थी सन् १९५८ में। इसके पिछले साल, १९५७ में सी. रामचन्द्र के संगीत से सज कर जो फ़िल्में प्रदर्शित हुई थीं, उनके नाम हैं - आशा, बारिश, शारदा, तलाश, और नौशेरवान-ए-आदिल। इनमें से पहले तीन फ़िल्मों में आशा भोंसले के गाए गानें कामयाब रहे। ख़ास कर फ़िल्म 'आशा' का 'ईना मीना डीका' तो एक कल्ट सोंग बन कर रह गया। इस गीत की लोकप्रियता से प्रेरित होकर सी. रामचन्द्र ने उसी साल फ़िल्म 'बारिश' के लिए बना डाला "मिस्टर जौन, बाबा ख़ान, लाला रोशनदान"। इस गीत को भी आशा जी ने वही अंजाम दिया जो उन्होने 'ईना मीना डीका' को दिया था। फ़िल्म 'बारिश' में ही आशा जी ने एक युगल गीत गाया था सी. रामचन्द्र, यानी कि चितलकर के साथ। आज आइए सुनते हैं इसी गीत को। चितलकर जब भी माइक्रोफोन के सामने खड़े हुए हैं, अधिकतर समय उन्होने हल्के फुल्के और चुलबुले से गानें ही गाए हैं। प्रस्तुत गीत भी कुछ इसी अंदाज़ का है। "हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, नहीं डरेगा नहीं डरेगा"। सुनिए...



गीत के बोल:
चितलकर: जो सीने में न दिल होता
तो फिर हम तुम पे क्यूँ मरते
आँ बोलो ना
अरे जो सीने में न दिल होता
तो फिर हम तुम पे क्यूँ मरते

मोहब्बत जैसा घटिया काम
करते भी तो क्यूँ करते
हाय रे हाय रे
डॉज़ गाड़ी के इंजन की क़सम

हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार
अरे अरे अरे अरे
अरे दीवाने अबे मरेगा
नहीं डरेगा, नहीं डरेगा
हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार करेगा
हम तो जानी

आशा: (अभी है जवाँ दुनिया का कुछ नहीं है मज़ा चक्खा
चितलकर: प्यार नहीं तो दुनिया में फिर बोलो क्या है रक्खा ) \-2
रोक सको तो रोको हमको
रोक सको तो रोको हमको हम तो नैना चार करेगा
आशा: नहीं डरेगा
चितलकर: नहीं डरेगा
(हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार करेगा
हम तो जानी ) \-2

(दिल से दिल का सौदा करने ये है आया बंदा
मान भी जाओ प्यार से अच्छा नहीं है कोई धंधा ) \-2
आशा: जान की तेरी खैर नहीं है
चितलकर: अबे भाग जली
आशा: जान की तेरी खैर नहीं है अगर तू तकरार करेगा

चितलकर: नहीं डरेगा, नहीं डरेगा
(हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार करेगा
हम तो जानी ) \-2

आशा: (पहले तो दिल फेंक कभी ना देखा ऐसा वैसा
चितलकर: कभी हुआ है और ना होगा देखो मेरे जैसा ) \-2
मानो या ना मानो हम तो
मानो या ना मानो हम तो तुमको गले का हार करेगा

आशा: नहीं डरेगा
चितलकर: नहीं डरेगा
(हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार करेगा
हम तो जानी ) \-2
हाय हाय हाय हाय रे


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. रफी साहब के आलावा कौन हो सकते हैं ओल्ड इस गोल्ड के एतिहासिक अंक में आशा के जोडीदार.
२. इस फिल्म से मुकेश की आवाज़ में एक दर्द भरा विदाई गीत हम सुन चुके हैं.
३. एक अंतरे की दूसरी पंक्ति में इस शब्द पर ख़तम होती है -"पागल".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी आपकी कशमकश जायज़ थी, जिसके लिए हम माफ़ी चाहेंगें, लेकिन पराग जी को अंक मिलेंगें, आप भी अब २४ के स्कोर पर हैं....आज का गीत इतना मस्त है की इसे सुनकर आप सब भी गिले शिकवे भूल जायेंगें हमें यकीन है, पाबला जी....आप तो हमारे लिए यूं भी विजेता हैं...गीत के बोल देने का नेक काम जो करते हैं आप, और हाँ आपकी उलझन तो दिलीप जी ने सुलझा ही दी है, पूर्वी जी, आपके लिए एक बार फिर दुःख तो है पर अंक देने में हम असमर्थ हैं....:)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, July 11, 2009

जमीन से हमें आसमान पर बिठाके गिरा तो न दोगे....एक मासूम सा सवाल इस प्रेम गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 138

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप इन दिनों सुन रहे हैं 'मदन मोहन विशेष'। मदन मोहन का मनमोहक संगीत फ़िल्म संगीत के स्वर्णयुग का एक सुरीला अध्याय है। उनकी हर रचना बेजोड़ है, बावजूद इसके कि उन्होने दूसरे सफल संगीतकारों की तरह बहुत ज़्यादा फ़िल्मों में संगीत नहीं दिया है। उनके गीतों में हमारी संस्कृति की अनुगूँज सुनाई देती है। उनके संगीत में है रागों का अनुराग, संगीत का वह रस भरा संसार है कि जिसमें बार बार डुबकी लगाने को जी चाहता है। फ़िल्म संगीत की दुनिया से जुड़े संगीतकारों की इस दुनिया में मदन मोहन अलग ही नज़र आते हैं। संगीतकार बेशक़ एक दौर में अपनी संगीत यात्रा पूरी कर चला जाता है, लेकिन उनका संगीत काल और समय से परे होता है। मदन मोहन का संगीत भी कालजयी है और रहेगा जो साया बन हमेशा हमारे साथ चलेगा और बाँटता रहेगा हमारी ख़ुशियाँ, हमारे ग़म। मदन मोहन साहब को हम ने जिस क़दर अपने दिलों में बसा रखा है, वो कभी वहाँ से उतर नहीं पायेंगे। कुछ इसी तरह का भाव उनके उस गीत में भी है जो आज हम चुनकर लाये हैं इस महफ़िल के लिए। "ज़मीं से हमें आसमाँ पर बिठाके गिरा तो न दोगे, अगर हम यह पूछें कि दिल में बसा के भुला तो न दोगे"। मदन मोहन का संगीत न कभी आसमाँ से ज़मीं पर गिरेगा और न ही हम कभी उन्हे भुला पायेंगे। आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में राजेन्द्र कृष्ण का लिखा 'अदालत' फ़िल्म का यह युगल गीत आज पेश है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में।

सन्‍ १९५८ में मदन मोहन ने कुल ८ फ़िल्मों में संगीत दिया था और ख़ास बात यह कि ये आठों फ़िल्में अलग अलग बैनर की थीं। ये ८ फ़िल्में हैं - आखिरी दाव, एक शोला, नाइट क्लब, अदालत, चांदनी, जेलर, ख़ज़ांची, और खोटा पैसा। पहले तीन फ़िल्मों में गीतकार थे मजरूह सुल्तानपुरी और बाक़ियों में राजेन्द्र कृष्ण साहब। 'अदालत' क्वात्रा फ़िल्म्स की प्रस्तुति थी जिसके निर्देशक थे कालीदास, और मुख्य भूमिकायों में थे प्रदीप कुमार, नरगिस और प्राण। इस फ़िल्म में लता जी के गाये तीन ग़ज़लों ने फ़िल्म जगत में तहलका मचा दिया था और इसी फ़िल्म के बाद से मदन मोहन साहब को फ़िल्मी ग़ज़लों का शहज़ादा कहा जाने लगा था। लताजी की गायी हुई ये तीन ग़ज़लें थीं "युं हसरतों के दाग़ मोहब्बत में धो लिए", "जाना था हमसे दूर बहाने बना लिए" और "उनको यह शिकायत है के हम कुछ नहीं कहते"। लेकिन आशा जी और रफ़ी साहब का गाया प्रस्तुत युगल गीत भी उतना ही पुर-असर है। नर्मोनाज़ुक रोमांटिक गीतों में यह गीत एक बेहद सम्मानीय स्थान रखता है इसमें कोई दोराय नहीं है। आज जब आशा जी और मदन साहब की एक साथ बात चली है तो विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में आशा जी, पंचम दा और गुलज़ार साहब की बातचीत का एक अंश यहाँ पेश कर रहा हूँ जिसमें मदन मोहन का ज़िक्र छिड़ा है -

"आशा: एक बात है, मदन भ‍इया ने ग़ज़ल, ठुमरी, कजरी पर बहुत सारे गानें बनाये हैं।
पंचम: वो अख़तरी बाई, सिद्धेश्वरी बाई जैसे कलाकारों को इतना सुनते थे, और एक और बात वो खाना भी बहुत अच्छा बनाते थे, आप को पता है?
गुलज़ार: मैं तो स्वाद से बता देता था कि यह मदन भाईसाहब ने बनाया है।
पंचम: वो मेरे पिताजी के लिए बनाकर लाते थे, टिंडे-गोश्त।
आशा: मैने तो भिंडी-गोश्त खाया है!"


अब इससे पहले कि आप के मुँह में पानी आये (अगर आप नॊन-वेज हैं तो), आप को सुनवा रहे हैं यह गीत!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मदन साहब के लाजवाब संगीत से सजी फिल्म का है ये गीत.
2. राजा मेहंदी अली खान के हैं बोल इस दर्द भरे गीत में.
3. मुखड़े में शब्द है - "सितारे".

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी ने बहुत दिनों बाद बाज़ी मारी आपके अंक हुए ६. मंजू जी बस ज़रा सा पीछे रह गयी. शरद जी, मनु जी, तपन जी और शमिख जी सब आये सही जवाब की पड़ताल करने, दिलीप जी आपने बिलकुल सही कहा मदन साहब के इस गीत की और उनके संगीत जितनी तारीफ की जाए कम है, कल स्वप्न जी नज़र नहीं आई.....आपकी कमी खली....:)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, July 9, 2009

तू प्यार करे या ठुकराए हम तो हैं तेरे दीवानों में - मानते हैं आज भी मदन साहब के दीवाने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 136

'मदन मोहन विशेष' की दूसरी कड़ी में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। कल इसकी पहली कड़ी में मदन मोहन के संगीत में लताजी का गाया और राजेन्द्र कृष्ण का लिखा हुआ गीत आप ने सुना था। आज भी इसी तिकड़ी के स्वर गूँज रहे हैं इस महफ़िल में, लेकिन एक अलग ही अंदाज़ में। यूं तो आम तौर पर नायक ही नायिका के दिल को जीतने की कोशिश करता है, लेकिन हमारी फ़िल्मों में कभी कभी हालात ऐसे भी बने हैं कि यह काम नायक के बजाय नायिका के उपर आन पड़ी है। धर्मेन्द्र-मुमताज़ की फ़िल्म 'लोफ़र' में लताजी का ही एक गीत था "मैं तेरे इश्क़ में मर ना जाऊँ कहीं, तू मुझे आज़माने की कोशिश न कर", जो बहुत मक़बूल हुआ था। लेकिन आज जिस गीत की हम बात कर रहे हैं वह है १९५७ की फ़िल्म 'देख कबीरा रोया' का "तू प्यार करे या ठुकराये हम तो हैं तेरे दीवानों में, चाहे तू हमें अपना न बना लेकिन न समझ बेगानों में"। है न वही बात इस गीत में भी! वैसे यह गीत शुरु होता है एक शेर से - "न गिला होगा न शिकायत होगी, अर्ज़ है छोटी सी सुन लो तो इनायत होगी"। राजेन्द्र कृष्ण साहब ने भी एक अंतरे में क्या ख़ूब लिखा है कि "मिटते हैं मगर हौले हौले, जलते हैं मगर एक बार नहीं, हम शम्मा का सीना रखते हैं, रहते हैं मगर परवानों में"। वाह भई, इससे बेहतर अंतरा इस गीत में और क्या हो सकता था भला! वैसे शायरी के अच्छे जानकार तो मदन मोहन साहब भी थे, इस बारे में बता रहीं हैं ख़ुद लता जी - "यह मेरी आँखों देखी बात है कि कभी कभी मदन भ‍इया बस मिनटों में तर्ज़ बना देते थे। और तर्ज़ भी कैसी, वाह! शायरी पर वो बहुत ज़ोर देते थे। जब तक शब्दों में गहराई न हो, गीतकार को काग़ज़ लौटा देते थे। 'फिर कोशिश कीजिए, जब दिल से बात निकलेगी तब असर करेगी।'"

अमीय चक्रबर्ती के 'मार्स ऐंड मूवीज़' के बैनेर तले बनी इस कम बजट फ़िल्म 'देख कबीरा रोया' के मुख्य कलाकार थे अनीता गुहा, अमीता और अनूप कुमार। आज अगर यह फ़िल्म जीवित है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ इसके गीतों की वजह से। लता जी के गाये प्रस्तुत गीत के अलावा उनका गाया "मेरी वीणा तुम बिन रोये", मन्ना डे का गाया "कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिए" तथा तलत महमूद का गाया "हम से आया न गया तुम से बुलाया न गया" आदि खासे लोकप्रिय हुए थे और आज भी बड़े चाव से सुने जाते हैं। "मदन भ‍इया ज़िंदगी की इस महफ़िल से उठ कर कब के जा चुके हैं। उनके बाद आज जब उनके अफ़साने बयान कर रही हूँ, तो वो जहाँ भी हैं, मैं उन से यही कहूँगी कि 'मदन भ‍इया, बहारें आप को क्यों ढ़ूंढे, चाहे हज़ारों मंज़िलें हों, चाहे हज़ारों कारवाँ, अपने गीतों के साथ आप हमेशा बहार बन कर छाते रहेंगे, आप के संगीत प्रेमियों की वफ़ा कम नहीं होंगी, बल्कि बढ़ती ही जा रही है।" लता जी के इन्ही अनमोल शब्दों के साथ आइये सुनते हैं आज का यह गोल्डन गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मदन मोहन साहब के श्रेष्ठतम कामों में से एक.
2. हिंदी फिल्मों में बहुत कम नज़्म सुनने को मिलती है, ये एक बेहद मशहूर नज़्म है.
3. आखिरी पंक्ति में शब्द है -"यहाँ".

पिछली पहेली का परिणाम -
जिस दिन हमारे धुरंधर सोच में पड़ जाते हैं उस दिन हमें मज़ा आता है. स्वप्न मंजूषा जी के दोनों अंदाजे गलत निकले. पराग जी भी सोच में पड़ गए पर मान गए भाई शरद जी को. एक दम सही जवाब. ४० का आंकडा छू लिया आपने..बहुत बहुत बधाई...मनु जी आप आजकल उलझे उलझे ही मिलते हैं और मीत जी आपका भी महफिल में आने का आभार, आप तो धुरंधर संगीत प्रेमी हैं पहेली में भी हिस्सा लिया कीजिये.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, July 8, 2009

बैरन नींद न आये....मदन मोहन साहब की यादों को समर्पित ओल्ड इस गोल्ड विशेष.

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 135

जुलाई का महीना, यानी कि सावन का महीना। एक तरफ़ बरखा रानी अपने पूरे शबाब पर होती हैं और इस सूखी धरा को अपने प्रेम से हरा भरा करती है। लेकिन जुलाई के इसी महीने में एक और चीज़ है जो छम छम बरसती है, और वो है संगीतकार मदन मोहन की यादें। जी हाँ दोस्तों, करीब करीब ढाई दशक बीत चुके हैं, लेकिन अब भी दिल के किसी कोने में छुपी कोई आवाज़ अब भी इशारा करती है १४ जुलाई के उस दिन की तरफ़ जब वो महान संगीतकार हमें छोड़ गये थे। उनके जाने से फ़िल्म संगीत में जो शून्य पैदा हुआ है, उसे भर पाना अब नामुमकिन सा जान पड़ता है। मदन मोहन साहब की सुरीली याद में आज से लेकर अगले सात दिनों तक, यानी कि ८ जुलाई से लेकर १४ जुलाई तक, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सुनने वाले हैं 'मदन मोहन विशेष'। मदन मोहन के स्वरबद्ध गीतों में सर्वश्रेष्ठ सात गानें चुनना संभव नही है, और ना ही हम इसकी कोई कोशिश कर रहे हैं। हम तो बस उनके संगीत के सात अलग अलग रंगों से आपका परिचय करवायेंगे अगले सात दिनों में। तो तैयार हो जाइये दोस्तों, फ़िल्म जगत के अनूठे संगीतकार मदन मोहन साहब की धुनों में ग़ोते लगाने के लिए। मदन मोहन पर केन्द्रित किसी भी कार्यक्रम की शुरुआत लताजी के ही गाये गाने से होनी चाहिये ऐसा हमारा विचार है। कारण शायद बताने की ज़रूरत नहीं। तो लीजिये, आज भी हम इसी रवायत को जारी रखते हुए आप को सुनवाते हैं लता जी की आवाज़ में सन् १९५९ की फ़िल्म 'चाचा ज़िंदाबाद' से "बैरन नींद न आये"। जे. ओम प्रकाश निर्मित एवं निर्देशित इस हास्य फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे किशोर कुमार, अनीता गुहा, भगवान, अनूप कुमार, ओम प्रकाश और टुनटुन। गानें लिखे राजेन्द्र कृष्ण ने। फ़िल्म में कुल ८ गानें थे जिनमें से दो किशोर के एकल, दो आशा के एकल, दो किशोर-लता के युगल, एक लता-मन्ना डे के युगल, तथा एक लता जी की एकल आवाज़ में थे। इनमें से ज़्यादातर गीत हास्य और हल्के-फुल्के अंदाज़ वाले थे सिवाय लताजी के एकल गीत के, जिसमें मुख्यता विरह की वेदना का सुर था। और ख़ास बात यह कि इसी गीत ने सब से ज़्यादा वाह-वाही बटोरी। शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गीत के इंटर्ल्युड संगीत में सितार का अच्छा प्रयोग सुनने को मिलता है। यूं तो जब मदन मोहन और लता मंगेशकर की एक साथ बात चलती है तो लोग अपनी बातचीत का रुख़ ग़ज़लों की तरफ़ ले जाते हैं, लेकिन प्रस्तुत गीत प्रमाण है इस बात का कि सिर्फ़ ग़ज़लें ही नहीं, बल्कि गीतों को भी इन दोनों ने वही अंजाम दिया है।

क्योंकि आज का यह गीत शास्त्रीय संगीत पर आधारित है, तो इससे पहले कि आप यह गीत सुनें, क्यों न लता जी के उन शब्दों पर एक नज़र डालते चलें जो उन्होने अपने मदन भ‍इया के शास्त्रीय संगीत के ज्ञान के बारे में कहा था - "मदन भ‍इया ने शास्त्रीय संगीत सीखा भी था और महान गायकों को बहुत सुना भी था। संगीत की मज़बूत दुनिया इसी तरह बसती है। वो गाते थे और बड़े तैयार गले से। उनकी संगीत साधना और प्रतिभा से निखरे और स्वरों से सजे गीत, ग़ज़ल, भजन इसीलिए इतने पुर-असर होते थे। मदन भ‍इया सही माईनों में आर्टिस्ट थे और बड़े ही सुरीले थे।" तो लीजिए दोस्तों, पेश है 'मदन मोहन विशेष' की पहली कड़ी में उनके साथ साथ लता जी और राजेन्द्र कृष्ण का यह नायाब तोहफ़ा।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. संगीतकार मदन मोहन का रचा एक और उत्कृष्ट गीत.
2. लता की आवाज़ में है ये गीत.
3. गीत से पहले एक शेर है जिसमें "शिकायत" और "इनायत" का काफिया इस्तेमाल हुआ है.

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी आपने सही कहा, पहेली के सूत्र के मुताबिक दोनों ही गीत सही बैठते हैं. पर सही जवाब तो एक ही हो सकता है. अंत शरद जी के खाते में २ अंक और देने पडेंगें हमें,शरद के कुल अंक हुए ३८. पराग जी, आपको अंक न दे पाने का दुःख है पर हमें विशवास है कि आप बुरा नहीं मानेंगें. अब इतने सारे गीत हैं तो कभी कभी हमसे भी ऐसी भूल हो ही जाती है :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, May 30, 2009

चरणदास को जो पीने की आदत न होती...सामाजिक जिम्मेदारियों को भी निभाते थे "गोल्डन इरा" के गीतकार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 96

सी. रामचन्द्र और किशोर कुमार के संगम से बने दो "गोल्ड" गीत अब तक हमने इस शृंखला में शामिल किया हैं, एक फ़िल्म 'आशा' से और दूसरी फ़िल्म 'पायल की झंकार' से। इन दोनो गीतों का रंग एक दूसरे से बिलकुल अलग था। आज भी हम इन दो महान फ़नकारों की एक रचना पेश कर रहे हैं लेकिन यह गीत ना तो फ़िल्म 'आशा' के "ईना मीना डीका" से मिलता जुलता है और ना ही 'पायल की झंकार' के "मुखड़े पे गेसू आ ही गये आधे इधर आधे उधर" का इस पर कोई प्रभाव है। आज का यह गीत है १९५४ की फ़िल्म 'पहली झलक' का - "चरणदास को पीने की जो आदत ना होती, तो आज मिया बाहर बीवी अंदर ना सोती"। 'पहली झलक' के निर्देशक थे एम. वी. रमण और इसमें मुख्य भूमिकायें निभायी किशोर कुमार और वैजयंतीमाला ने। यह बताना ज़रूरी है कि रमण साहब ने १९५७ में जब 'ईना मीना डीका" वाली 'आशा' बनायी, तो उसमें भी किशोर कुमार और वैजयंतीमाला को ही कास्ट किया था। 'पहली झलक' में किशोर कुमार जैसे गायक अभिनेता के होने के बावजूद फ़िल्म में बस एक ही गीत उनकी आवाज़ में था, बाक़ी के ज़्यादातर गीत लताजी की आवाज़ मे थे और एक गीत हेमन्त कुमार ने गाया था।

किशोर कुमार की आवाज़ में फ़िल्म 'पहली झलक' का यह गीत लिखा था राजेन्द्र कृष्ण ने। हास्य रस पर आधारित इस गीत में राजेन्द्र कृष्ण ने कई ज़रूरी बातें हँसी हँसी और मज़ाक मज़ाक में कह गये, लेकिन अगर ग़ौर से इस गीत को सुना जाए तो आपको पता चल जाएगा कि किस ज़रूरी बात की तरफ़ इशारा किया गया है। जी हाँ, यह गीत एक व्यंगात्मक वार है शराबख़ोरी पर, इसके दुष्परिणामों पर व्यंग के ज़रिए तीर पे तीर चलाए गये हैं जैसे कि गीत में कहा गया है "उस पर मज़ा कि ख़ाली हो पाकिट", "मिट्टी के भाव जाके बेच आये मोती", "ज़ेवर से कपड़ा, कपड़े से बरतन, बोतल के पानी में डूब गया धन", "दिया ना साल भर किराया मकान का, चढ़ गया सर पर कर्ज़ा पठान का", "बेटा अमीर का ठनठन गोपाल हुआ", इत्यादि। दूसरे शब्दों में यह गीत एक आंदोलन है शराबख़ोरी के ख़िलाफ़। भले ही हास्य-व्यंग का सहारा लेकर किशोर कुमार की गुदगुदानेवाली अंदाज़ में इस गीत को पेश किया गया है, लेकिन सही अर्थ में यह गीत एक संदेश है आज की युवा पीढ़ी को कि किस तरह से शराब पूरे घर को नीलाम करके रख देती है। दोस्तों, ज़िंदगी बहुत ख़ूबसूरत है, नशीली है, इसका आनंद उठाइए ज़िंदगी के नशे में डूबकर, शराब के नशे में डूबकर नहीं। फिलहाल ये संजीदे बाते रहने देते हैं एक तरफ़ और मुस्कुराते हुए सुनते हैं किशोरदा का गाया यह गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस गीत की फिल्म का नाम "गीत" शब्द से ही शुरू होता है.
२. आशा भोंसले की आवाज़ के एक शानदार गीत.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"ख्यालों".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी अब हम की कहें...आपके प्रतिभागी भी आपका लोहा मानने लगे हैं...बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ