Showing posts with label meenu purushotham. Show all posts
Showing posts with label meenu purushotham. Show all posts

Friday, April 9, 2010

पीतल की मेरी गागरी....लोक संगीत और गाँव की मिटटी की महक से चहकता एक 'सखी सहेली' गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 399/2010/99

कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जिनमें इस मिट्टी की महक मौजूद होती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसी आवाज़ें इस मिट्टी से जुड़ी हुई लगती है, जिन्हे सुनते हुए हम जैसे किसी सुदूर गाँव की तरफ़ चल देते हैं और वहाँ का नज़ारा आँखों के सामने तैरने लगता है। जैसे दूर किसी पनघट से पानी भर कर सखी सहेलियाँ कतार बना कर चली आ रही हों गाँव की पगडंडियों पर। आज हमने जिस गीत को चुना है उसे सुनते हुए शायद आपके ज़हन में भी कुछ इसी तरह के ख्यालात उमड़ पड़े। जी हाँ, 'सखी सहेली' शृंखला की आज की कड़ी में प्रस्तुत है मिनू पुरुषोत्तम और परवीन सुल्ताना की आवाज़ों में फ़िल्म 'दो बूंद पानी' का एक बड़ा ही प्यारा गीत "पीतल की मेरी गागरी"। इसमें वैसे मिनू जी और परवीन जी के साथ साथ उनकी सखी सहेलियों की भी आवाज़ें मौजूद हैं, लेकिन मुख्य आवाज़ें इन दो गायिकाओं की ही हैं। संगीतकार जयदेव की इस रचना में इस देश की मिट्टी का सुरीलापन कूट कूट कर समाया हुआ है। लोक गीत के अंदाज़ में बना यह गीत कैफ़ी आज़मी साहब के कलम से निकला था। आपको याद होगा कि सन्‍ १९७१ में ख़्वाजा अहमद अब्बास ने यह फ़िल्म बनाई थी 'दो बूंद पानी' जिसमें राजस्थान में पानी की समस्या को केन्द्रबिंदु में रखा गया था। एक तरफ़ पानी की समस्या पर बना फ़िल्म और दूसरी तरफ़ यह गीत जिसमें पानी भर कर लाने का दृश्य, क्या कॊन्ट्रस्ट है! यह एक बड़ा ही दुर्लभ गीत है जो आज कहीं से सुनाई नहीं देता। आख़िरी बार मैंने इसे विविध भारती पर कई महीने पहले सुना था, शायद यूनुस ख़ान द्वारा प्रस्तुत 'छाया गीत' कार्यक्रम में। आज यह दुर्लभ गीत ख़ास आप के लिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर।

'दो बूंद पानी' के मुख्य कलाकार थे घनश्याम, जलाल आग़ा, सिमि गरेवाल और किरण कुमार। दोस्तों, यह ज़रूरी नहीं कि अच्छे गानें केवल कामयाब फ़िल्मों में ही मौजूद हों। ऐसे असंख्य फ़िल्में हैं जिसने बॊक्स ऒफ़िस पर भले ही झंडे ना गाढ़ें हों, लेकिन संगीत के मामले में उत्कृष्ट रहे हैं। "पीतल की मेरी गागरी" एक ऐसा कर्णप्रिय गीत है जिसे बार बार सुन कर भी जैसे मन नहीं भरता और इसे बार बार पूरे चाव से सुना जा सकता है। पीतल के गगरी की धुने, सखी सहेलियों की खिलखिलाती हँसी, राजस्थानी लोक धुन, कुल मिलाकर एक ऐसा ग्रामीण समां बांध देता है कि शहर के सारे तनाव और परेशानियाँ भूल कर दिल जैसे कुछ पल के लिए एक सुकूनदायक ज़मीन की ओर निकल पड़ता है। वैसे आपको बता दें कि इस गीत में कुल तीन अंतरे हैं, लेकिन रिकार्ड पर केवल दो ही अंतरों को रखा गया है। फ़िल्म के पर्दे पर जो तीसरा अंतरा है इस गीत का, उसे हम नीचे लिख रहे हैं:

इक दिन ऐसा भी था पानी था गाँव में,
लाते थे गागरी भर के तारों की छाँव में,
कहाँ से पानी लाएँ कहाँ ये प्यार बुझाएँ,
जल जल के बैरी धूप में कम ना आया रंग दुहाई रे,
पीतल की मेरी गागरी दिलदी से मोल मंगाई रे।

तो आइए इस गीत को सुनें और हमें पूरा विश्वास है कि इस गीत को सिर्फ़ एक बार सुन कर आपका दिल नहीं भरेगा, आप बार बार इसे सुनेंगे। और ख़ास कर आप में से जो भाई बहन राजस्थान के निवासी हैं और इन दिनों विदेश में हैं, उनकी तो यह गीत सुन कर आँखें ज़रूर नम हो जाएँगी! आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि 'दो बूंद पानी' फ़िल्म के लिए ख़्वाजा अहमद अब्बास को १९७२ में 'नरगिस दत्त अवार्ड' से सम्मानित किया गया था। अब्बास साहब को यही पुरस्कार १९७० में भी मिला था 'सात हिंदुस्तानी' फ़िल्म के लिए।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. शृंखला का ये अंतिम गीत है हिंदी फिल्म संगीत जगत की दो सबसे सफल गायिकाओं की आवाजों में इनके नाम बताएं-३ अंक.
2. इस मधुर गीत के गीतकार बताएं - २ अंक.
3. फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री के साथ अनुराधा पटेल ने इसे परदे पर निभाया है, किस प्रमुख अभिनेत्री ने इस फिल्म में काम कर खूब वाह वाही लूटी है -२ अंक.
4. एल पी का है संगीत, फिल्म के निर्देशक कौन हैं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
मुबारकबाद शरद जी, बस अब आप शतक से मात्र २ अंक पीछे हैं, पदम जी ने भी बहुत कम समय में अर्ध शतक पूरा किया है, इंदु जी और अवध जी को भी बधाई...पुरस्कार ?....इस बार ये एक सरप्रायिस है :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, February 7, 2010

नि मैं यार मानना नि चाहें लोग बोलियां बोले...जब मिलाये मीनू पुरषोत्तम ने लता के साथ ताल से ताल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 338/2010/38

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'हमारी याद आएगी' की आठवीं कड़ी में आज एक ऐसी गायिका का ज़िक्र जिन्होने कमल बारोट की तरह दूसरी गायिका के रूप में लता मंगेशकर और आशा भोसले के साथ कई हिट गीत गाईं हैं। मिट्टी की सौंधी सौंधी महक वाली आवाज़ की धनी मीनू पुरुषोत्तम का ज़िक्र आज की कड़ी में। युं तो मीनू पुरुषोत्तम ने बहुत सारे कम बजट की फ़िल्मों में एकल गीत गाईं हैं, लेकिन उनके जो चर्चित गानें हैं वह दूसरी गायिकाओं के साथ गाए उनके युगल गीत ही हैं। जैसे कि लता जी के साथ फ़िल्म 'दाग़' का थिरकता गीत "नि मैं यार मनाना नी, चाहे लोग बोलियाँ बोले", आशा जी के साथ 'ये रात फिर ना आएगी' का "हुज़ूर-ए-वाला जो हो इजाज़त", सुमन कल्य़ाणपुर के साथ गाया फ़िल्म 'ताजमहल' का गीत "ना ना ना रे ना ना, हाथ ना लगाना" (जिसे हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर बजा चुके हैं), परवीन सुल्ताना के साथ गाया फ़िल्म 'दो बूंद पानी' का गीत "पीतल की मेरी गागरी" आदि। मीनू जी के गाए ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लें भी काफ़ी मशहूर हैं। मीनू पुरुषोत्तम का जन्म २४ नवंबर १९४४ को पंजाब के पटियाला में एक कृषक परिवार में हुआ था। बचपन से ही संगीत में दिलचस्पी होने के कारण उन्होने शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल की सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और गुरु पंडित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले से। मीनू जी बम्बई आकर संगीत में विशारद, यानी की स्नातक की उपाधी प्राप्त की। जहाँ तक फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने की बात है, तो उन्हे केवल १६ वर्ष की आयु में ही इस क्षेत्र में क़दम रखने का मौका मिला, जब संगीतकार रवि ने पहली बार उन्हे अपनी फ़िल्म 'चायना टाउन' में रफ़ी साहब के साथ एक डुएट गाने का मौका दिया। १९६२ की इस फ़िल्म का वह गीत था "देखो जी एक बाला जोगी मतवाला"। यहीं से शुरुआत हुई मीनू पुरुषोत्तम के फ़िल्मी गायन की। फिर उसके बाद तो कई संगीतकारों ने उनसे गानें गवाए जिनमें कई बड़े नाम शामिल हैं जैसे कि रोशन, मदन मोहन, ओ. पी. नय्यर, जयदेव, और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल प्रमुख।

मीनू पुरुषोत्तम स्टेज पर बेहद सक्रीय रहीं हैं। देश और विदेश में बराबर उन्होने शोज़ किए हैं नामी गायकों के साथ, जिनमें शामिल हैं मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, तलत महमूद और महेन्द्र कपूर। ग़ज़ल और भजन गायकी में अपना एक अलग मुक़ाम हासिल करते हुए उनके कई एल. पी रिकार्ड्स बनें हैं जिनमें शामिल हैं, 'रंज में राहत', 'रहगुज़र', 'ओ सलौने सांवरिया', 'भक्ति रस', 'कृष्ण रास', 'दशावतार', 'गुजराती वैष्णव भजन', 'मनमन्दिर में साईं', और 'जागो जागो माँ जवालपा'। हिंदी और अपनी मातृभाषा पंजाबी के अलावा मीनू जी ने मराठी, बंगला, भोजपुरी, सिंधी जैसी भाषाओं में भी बहुत से गानें गाएं हैं। आज के लिए हमने चुना है लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत में १९७० की फ़िल्म 'दाग़' का वही सुपरहिट पंजाबी लोक रंग में रंगा गीत जिसे मीनू जी ने लता जी के साथ मिलकर गाया था, "नि मैं यार मनाना नी"। पंजाब की धरती में जन्मीं मीनू जी ने इस गीत में भी वही पंजाबी ख़ास लोक शैली का रंग भरा है अपनी आवाज़ से कि इसे सुनते हुए हम उसी रंगीले पंजाब के किसी गाँव में पहुँच जाते हैं। अगर आप इसे मेरी छोटी मुंह और बड़ी बात ना समझें तो मैं यह कहना चाहूँगा कि इस गीत में मीनू पुरुषोत्तम ने लता जी के साथ बराबर की टक्कर ली थी। एक तरफ़ लता जी की पतली मधुर आवाज़ और दूसरी तरफ़ मीनू जी की इस मिट्टी से जुड़ी लोक संगीत वाली आवाज़, कुल मिलाकर ऐसा कॊन्ट्रस्ट पैदा हुआ कि गीत में एक अलग ही चमक आ गई है। इस गीत को सुनते हुए आपके क़दम थिरके बग़ैर नहीं रह पाएँगे। तो आइए अब इस गीत का आनंद उठाते हैं, फ़िल्म 'दाग़' के बारे में हम आपको फिर किसी दिन तफ़सील से बताएँगे!



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

लिए हाथ में एक फूल गुलाब,
आएगा वो सपनों का राजकुमार,
कौन नहीं यहाँ उसका तलबगार,
बेकार नहीं दिल इतना बेकरार...

अतिरिक्त सूत्र- शैलेन्द्र ने लिखा है इस सरल मगर खूबसूरत गीत को

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी "सेज" की जगह पर "सूनी" बोल्ड हो गया :), पर एकदम सही जवाब...बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, May 29, 2009

ना ना ना रे ना ना ...हाथ ना लगाना... दो अलग अंदाज़ ओ आवाज़ की गायिकाओं का सुंदर मेल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 95

म तौर पर फ़िल्मी युगल गीत में एक गायक और एक गायिका की आवाज़ें हुआ करती हैं। लेकिन समय समय पर कुछ ऐसे युगल गीत भी बने हैं जिन्हे या तो दो गायकों ने गाये हैं या फिर दो गायिकाओं ने, और इनमें से बहुत सारे गानें बेहद कामयाब भी हुए हैं। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक ऐसा ही 'फ़िमेल डुएट' प्रस्तुत है। फ़िल्म संगीत के इतिहास मे अगर झाँका जाए तो हम पाते हैं कि ऐसी बहुत सारी फ़िल्में हैं जिनमें लता मंगेशकर ने नायिका का पार्श्वगायन किया है जब कि कुछ थोड़े से कमचर्चित गायिकाओं ने दूसरी चरित्र अभिनेत्रियों या फिर नायिका की सहेलियों, या फिर किसी जलसे या मुजरे के लिए अपनी आवाज़ें दी हैं। यह भी एक ऐसा ही गीत है जिसे दो बड़े ही अनोखी गायिकाओं ने गाया है। यह गीत है १९६३ की फ़िल्म ताजमहल का जिसे गाया है सुमन कल्याणपुर और मीनू पुरुषोत्तम ने। यूँ तो इस मशहूर फ़िल्म के बहुत से गीत बहुत ही कामयाब हुए, ख़ास कर लता-रफ़ी के गाए "जो वादा किया" और "पाँव छू लेने दो", और दूसरे कुछ गीत भी प्रसिद्ध हुए। उस दृष्टि से सुमन और मीनू का गाया यह गीत ज़रा कम सुना गया। इसीलिए हमने सोचा कि अगर 'ताजमहल' का ही गीत सुनवाना है तो क्यों न इसी कमसुने गीत को यहाँ बजाया जाए!

जैसा कि आप सभी जानते होंगे कि 'ताजमहल' के संगीतकार थे रोशन, जिन्होने समय समय पर सुमन कल्याणपुर से कई बेहतरीन गाने गवाये हैं। उदाहरण स्वरूप जो गीत मुझे इस वक़्त याद आ रहा है वह है फ़िल्म नूरजहाँ का "शराबी शराबी यह सावन का मौसम, ख़ुदा की क़सम ख़ूबसूरत न होता"। इस गीत को जयमाला कार्यक्रम में बजाने से पहले सुमनजी ने रोशन साहब के बारे में कहा था - "रोशनजी के साथ काम करने में एक अलग ही आनंद था। वो बहुत हँसाते थे। अगर कुछ 'चेंज' भी करना होता तो हँसी हँसी में समझाते थे जिससे कि गायक को ज़रा भी बुरा ना लगे। वो बहुत गुणी भी थे"। और दूसरी गायिका मीनू पुरुषोत्तम को 'ताजमहल' में गाने का अवसर देकर रोशन साहब ने इस नवोदित गायिका के कैरियर के लिए बड़ा महत्वपूर्ण काम किया। इस गीत से पहले मीनू ने १९६२ में 'चायना टाउन' फ़िल्म में रफ़ी साहब के साथ एक युगल गीत गाया था, लेकिन वह गीत ज़्यादा मशहूर नहीं हो पाया था। इसके बाद मीनू ने 'ताजमहल' का यह गीत गाया सुमन कल्याणपुर के साथ मिलकर जिसने उन्हे कुछ हद तक प्रसिद्धी दिलवायी। लोक संगीत के आधार पर बना यह गीत बड़ा ही मधुर है जिसमें इस दोनो होता गायिकाओं की अलग अलग क़िस्म की आवाज़ें गीत को और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत बना देती है। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में अगर ग़ज़ब की खनक और मिठास है तो मीनू पुरुषोत्तम की आवाज़ ज़रा सी 'हस्की' है जो सुमनजी की आवाज़ के साथ घुलमिलकर एक अलग ही समा बांध देती है। साहिर लुधियानवी के लिखे इस गीत को सुनिए और खो जाइए सुमन कल्याणपुर और मीनू पुरुषोत्तम की शोख़ी भरे अंदाज़-ओ-आवाज़ में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सी रामचंद्र और किशोर दा का एक जबरदस्त हास्य गीत.
२. शराब के दुष्परिणामों पर ध्यान आकर्षित किया है राजेंद्र कृष्ण के बोलों ने.
३. गाने में "चरणदास" की कहानी बयां हुई है.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
कमाल कर दिया शरद जी आपने तो, हमें उम्मीद कम थी कि कोई इस गीत को पकड़ पायेगा...बहुत बहुत बधाई...मनु जी, दिलीप जी, संगीत जी ख़ुशी हुई कि आप सब आये इस महफ़िल में.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ