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Saturday, May 13, 2017

चित्रकथा - 18: उस्ताद रईस ख़ाँ के सितार का फ़िल्म संगीत में योगदान


अंक - 18

उस्ताद रईस ख़ाँ के सितार का फ़िल्म संगीत में योगदान

"मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


6 मई को सुप्रसिद्ध सितार वादक उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के निधन हो जाने से सितार जगत का एक उज्ज्वल नक्षत्र अस्त हो गया। शास्त्रीय संगीत जगत में उनका जितना योगदान रहा है, वैसा ही योगदान उन्होंने सिने संगीत जगत में भी दिया है। उनके सितार के टुकड़ों से सजे हिन्दी फ़िल्मी गीत जैसे खिल उठते थे। आइए आज ’चित्रकथा’ में उस्ताद रईस ख़ाँ साहब को याद करते हुए उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों की बातें करें जिनमें उन्होंने अपने सितार और उंगलियों के जादू चलाए थे। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है उस्ताद रईस ख़ाँ साहब की पुण्य स्मृति को।




उस्ताद रईस ख़ाँ
(25 नवंबर 1939 - 6 मई 2017)

2017 का वर्ष सितार जगत के लिए अब तक एक दुर्भाग्यपूर्ण वर्ष रहा है। 4 जनवरी को उस्ताद अब्दुल हलीम जाफ़र ख़ाँ, 12 अप्रैल को पंडित जयराम आचार्य, और अब 6 मई को उस्ताद रईस ख़ाँ साहब। सितार जगत के तीन तीन उज्वल नक्षत्र अस्त हो गए एक के बाद एक, और पैदा हो गया एक महाशून्य शास्त्रीय संगीत जगत में। हलीम जाफ़र ख़ाँ और जयराम आचार्य ही की तरह रईस ख़ाँ साहब का भी फ़िल्म संगीत में महत्वपूर्ण योगदान रहा। हालाँकि संगीतकार मदन मोहन के साथ ख़ाँ साहब ने सबसे उम्दा काम किया, और क्यों ना करते, दोनों जिगरी दोस्त जो थे, लेकिन अन्य संगीतकारों के लिए भी ख़ाँ साहब ने सितार बजाया और गीतों के अन्तराल संगीत को ऐसा सुरीला अंजाम दिया कि इन तमाम गीतों की इन सितार की ध्वनियों के बग़ैर कल्पना भी नहीं की जा सकती। सितार के इन स्वर्गिक ध्वनियों को अगर इन गीतों से निकाल दिया जाए तो शायद इन गीतों की आत्माएँ ही चली जाएँगी। 1964 की फ़िल्म ’ग़ज़ल’ की ग़ज़ल "नग़मा-ओ-शेर की सौग़ात किसे पेश करूँ" में साहिर के बोल, मदन मोहन की तर्ज़, और लता मंगेशकर की आवाज़ के साथ-साथ उस्ताद रईस ख़ान के सितार के टुकड़ों ने इस ग़ज़ल को अमर बना दिया। इसके इन्टरल्युड्स में सारंगी और वायलिन तो थे ही, पर सबसे ज़्यादा प्रॉमिनेन्स ख़ाँ साहब के सितार को ही मिला। 1966 की फ़िल्म ’मेरा साया’ में तो जैसे ख़ाँ साहब का सितार अपने पूरे शबाब पर था। "नैनों में बदरा छाये" का शुरुआती संगीत से भला कौन अंजान है! राजस्थान के किसी जलमहल का दृश्य है, सुनिल दत्त महल के छत पर धूप में लेटे हैं, छत से चारों तरफ़ झील के नज़ारे हैं। ऐसे में संतूर की ध्वनियाँ बजने लगती हैं और जल्द ही संतूर पर सितार के चमत्कारी तानें हावी हो जाते हैं। और फिर सितार पर शुरुआती धुन बजने के बाद गीत शुरु होता है "नैनों में बदरा छाए, बिजली सी चमके हाए"। इस गीत को सुनते हुए अगर यह शुरुआती संगीत ही न सुन पाए तो जैसे यह सुनना अधूरा ही रह गया। इन्टरल्युड्स में भी क्या ख़ूब संतूर और सितार की जुगलबन्दी है, जैसे कोई स्वर्गिक अनुभूति हो रही हो! जानकारी के लिए बता दें कि इस गीत में संतूर पंडित शिव कुमार शर्मा ने बजाया था। 1967 की फ़िल्म ’दुल्हन एक रात की’ के गीत "मैंने रंग ली आज चुनरिया सजना तोरे रंग में" में ख़ाँ साहब के सितार का जादू सुनाई देता है। नायिका को प्रेम हो गया है, इस सिचुएशन में यह गीत शुरु होता है सितार के एक पीस से। ख़ाँ साहब ने इस पीस के ज़रिए नायिका के मन के भाव को ऐसे उजागर किया है कि पीस सुनते ही जैसे नायिका का दिल हमें दिखाई देने लगता है। इस गीत के इन्टरल्युड्स और गीत के अन्त में भी सितार के पीसेस हैं, और अन्त में तो गीत के मुखड़े की धुन ही सितार पर बजती है। इसी फ़िल्म का अन्य गीत है "सपनों में अगर तुम मेरे आओ तो सो जाऊँ"। लता जी की आवाज़ में इस लोरी की शुरुआत ख़ाँ साहब के सितार से होती है। अन्तराल संगीत में सितार के साथ-साथ अन्य वाद्यों का भी प्रयोग हुआ है, पर सितार के टुकड़ों को सुनते हुए यकीन हो जाता है कि ज़रूर किसी उस्ताद की उंगलियाँ चली होंगी।

उस्ताद रईस ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और पहली बार सन 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में सितार बजाया था। विविध भारती के लोकप्रिय कार्यक्रम 'उजाले उनकी यादों के' के शीर्षक संगीत में इसी गीत के शुरुआती संगीत का अंश सुनाई देता है जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था। "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है..." की कहानी। गाना रेकॉर्ड हो चुका था और मदन मोहन इस गाने से बहुत ख़ुश भी थे। फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करने का फ़ैसला ले लिया? इस गीत में छोटे-छोटे इन्टरल्यूड्स रईस ख़ान ने बजाए। पर मुख्य रूप से पंडित शिव कुमार शर्मा के सन्तूर को बहुत प्रॉमिनेन्टली इस्तमाल किया गया। रेकॉर्डिंग् हो गई, सबकुछ सही हो गया। अब हुआ यूं कि एक दिन मदन मोहन ने यह गाना रईस ख़ान को दोबारा सुनवाया। गाने का टेप बज रहा था, तभी रईस ख़ान ने अपना सितार उठाया, और गाने के साथ सितार छेड़ने लगे। इस बार नए नए इन्टरल्यूड्स बजने लगे। नई सुर, नई तरकीबें। रईस ख़ान के सितार से इस तरह के सुर सुन कर मदन मोहन का दिल हो गया बाग़-बाग़। उन्होंने फ़ौरन AVM Productions को फ़ोन लगाया और कहा कि वो इस गाने को दोबारा रेकॉर्ड करना चाहते हैं। मदन मोहन रईस ख़ान के बजाए सितार के पीसेस से इतना मुतासिर हो गए कि जिस गाने को रेकॉर्ड करके मुतमाइन थे, उस गाने को एक बार फिर से रेकॉर्ड करने की ठान ली।

लता और मदन मोहन की ग़ज़लों को ख़ाँ साहब ने ख़ूबसूरत जामा तो पहनाया ही, कुछ रफ़ी साहब और मदन जी के नग़मों को भी उन्होंने सँवारा। 1967 की फ़िल्म ’नौनिहाल’ की ग़ज़ल "तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये में शाम कर लूँगा" के इन्टरल्युड्स में क्रम से वायलीन, सारंगी और सितार के पीसेस सुनाई पड़ते हैं, जिनमें सितार वाला हिस्सा सबसे लम्बा। मदन मोहन का यह सितार से इश्क़ और ख़ाँ साहब के हुनर पे ऐतबार का ही नतीजा था। 1969 की फ़िल्म ’चिराग़’ में "छायी बरखा बहार पड़े अंगना फुहार" एक दीर्घ गीत है जिसकी अवधि 7 मिनट से उपर है। इस गीत के दीर्घ शुरुआती संगीत में सितार नहीं है, पर पहले अन्तराल संगीत में ख़ाँ साहब तशरीफ़ लाते हैं और क्या ख़ूब लाते हैं! इसी तरह से 1970 की फ़िल्म ’हीर रांझा’ के ग़मज़दा नग़मे "दो दिल टूटे दो दिल हारे" में भी ख़ाँ साहब के सुन्दर सितार का प्रयोग हुआ है। 1970 में ’दस्तक’ फ़िल्म की ग़ज़ल "हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह" एक और कालजयी रचना है। वीणा और सितार की क्या ख़ूबसूरत समावेश है इस ग़ज़ल में। ख़ाँ साहब के सितार के इन्टरल्युड़्स ऐसे प्रॉमिनेन्टली उभर कर सामने आते हैं कि ग़ज़ल के बोल और गायकी को सीधा सीधा टक्कर देते हैं। इससे पहले जितनी रचनाओं की हमने बात की, उन सब में सारंगी, संतूर और वायलीन भी शामिल थे, पर ’दस्तक’ की यह ग़ज़ल पूर्णत: सितार पर आधारित है, हाँ, पार्श्व में वीणा का आधार ज़रूर है। इसी फ़िल्म की शास्त्रीय रचना "बैयाँ ना धरो हो बलमा" भी एक कालजयी गीत है और फ़िल्म-संगीत के शास्त्रीय आधारित गीतों में इसका शुमार शीर्ष के गीतों में होता है। और इस गीत में भी ख़ाँ साहब का सितार कूट कूट कर भरा हुआ है। सितार और तबला, बस! कितनी सीधी, कितनी सरल रचना है, वाद्यों का कुंभ नहीं, गायकी में कोई दिखावा नहीं, सुन्दर काव्यात्मक बोल, और क्या चाहिए एक सुरीले गीत में। 1973 में ’हँसते ज़ख़्म’ फ़िल्म की ग़ज़ल "आज सोचा तो आँसू भर आए" शुरु होती है उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के एक उदासी भरे तान से। ग़मज़दा इस ग़ज़ल के इन्टरल्युड़्स में मूड को बरकरार रखते हुए एक ऐसा दर्द भरा सुर छेड़ा जो बिल्कुल जैसे कलेजा चीर कर रख देता है। एक और ख़ास बात यह कि इस ग़ज़ल के तीन इन्टरल्युड्स में उन्होंने अलग अलग धु्ने बजाई है। एक और उल्लेखनीय लता - मदन मोहन गीत है जो किसी फ़िल्म में तो नहीं जा सका लेकिन 2009 में जारी ’तेरे बग़ैर’ ऐल्बम में इसे शामिल किया गया। राजेन्द्र कृष्ण का लिखा यह गीत है "खिले कमल सी काया तेरी"। इस गीत में ख़ाँ साहब ने सितार ने उतनी ही शहद घोली जितनी लता जी की आवाज़ ने। सुरीली आवाज़ और सुरीले साज़ का इससे बेहतर जुगलबन्दी कुछ और नहीं हो सकती।

1973 की फ़िल्म ’दिल की राहें’ की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्‍फत को निभाएं तो निभाएं कैसे में रईस खां साहब का सितार फिर एक बार अपने पूरे शबाब पर है। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी टीमिंग्‍ कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लत फ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया हमेशा के लिए। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात्‍ 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। नक्श साहब की ख़ुशक़िस्मती थी कि 1973 में 'दिल की राहें' बन गई और उनकी इस अमर ग़ज़ल को रईस ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगाये। "रस्म-ए-उल्फ़त" के अलग अलग अन्तरों  के इन्टरल्युड्स में सितार के अलग अलग तरह के टुकड़ों ने जैसे इस ग़ज़ल को ज़ेवर पहना दिए हों। जब ये टुकड़े बजते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई कॉनसर्ट सुन रहे हों! इस ग़ज़ल के आख़िर में जिस तेज़ रफ़्तार में ख़ाँ साहब की उंगलियाँ सितार पर चलती हैं, क्या समा बंध जाता है, क्या कलाकारी है, क्या हुनर है, वाह! हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी से पता चला कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमिम अहमद ख़ाँ से सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में अहमद साहब से बजवाया। लेकिन ऐसा क्या हुआ था कि उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के साथ मदन जी की बरसों की जोड़ी, बरसों की दोस्ती टूट गई? हुआ यूं कि एक मोड़ पर मदन मोहन को यह लगने लगा कि उनकी महफ़िलों में रईस ख़ान का सिर्फ़ दोस्ती की ख़ातिर सितार बजाना ठीक नहीं है। रईस ख़ान को वो इस तरह बुला कर, सितर बजवा कर दोस्ती का ग़लत फ़ायदा उठा रहे हैं। इसलिए उन्होंने रईस ख़ान को उनका वाजिब मेहनताना देने की सोची। मगर परेशानी यह थी कि अपने दोस्त से पैसों की बात कैसे करे? सो उन्होंने 1973 की एक महफ़िल के बाद अपने मैनेजर से कहा कि वो ख़ान साहब से उनकी फ़ीस के बारे में पूछेंगे। मैनेजर ने रईस ख़ान से पूछा। रईस ख़ान ने उस वक़्त तो कुछ नहीं कहा, मगर उन्हें यह बात बहुत चुभ गई और उन्होंने इसे अपना अपमान मान लिया। अपने दोस्त मदन मोहन से वो इस तरह की उम्मीद नहीं कर रहे थे। रईस ख़ान जितने बेहतरीन कलाकार थे उतने ही तुनक मिज़ाज भी थे। वो चुपचाप बैठने वाले नहीं थे। बात चुभ गई थी। उन्होंने कुछ दिन बाद मदन मोहन को फ़ोन किया और कहा कि उनके एक दोस्त के घर में एक शादी है और शादी के जलसे में गाने के लिए आपको बुलाया है। "तो मदन भाई, आप कितने पैसे लेंगे?" अब चौंकने की बारी मदन मोहन की थी। बहुत अजीब लगा मदन मोहन को कि रईस ख़ान ने उन जैसे कलाकार को शादी में गाने के लिए कह कर उनकी तौहीन कर रहा है। यह तौहीन अब मदन मोह बर्दाश्त नहीं कर सके। बस यहीं से दोनो के मन में ऐसी खटास पड़ी कि इन दोनों अज़ीम फ़नकारों का साथ सदा के लिए ख़त्म हो गया।

ऐसा नहीं कि उस्ताद रईस ख़ाँ साहब ने केवल मदन मोहन की रचनाओं में ही सितार का अमूल्य योगदान दिया हो। 1961 की फ़िल्म ’गंगा जमुना’ में नौशाद साहब का संगीत था। लता जी की आवाज़ में "ढूंढ़ो ढूंढ़ो रे साजना मोरे कान का बाला" बेहद लोकप्रिय रहा। गीत के शुरुआती संगीत में ख़ाँ साहब का सितार गीत का मूड तैयार कर देता है। अन्तराल संगीत में बांसुरी के साथ सितार का संगम भी बेहद दिलकश बन पड़ा है इस गीत में। 1972 में जब ’पाक़ीज़ा’ में ग़ुलाम मोहम्मद साहब के इन्तकाल के बाद नौशाद साहब फ़िल्म का संगीत पूरा कर रहे थे, तब पार्श्व-संगीत और शीर्षक-संगीत के लिए ख़ाँ साहब को ही चुना। क़रीब क़रीब चार मिनट का शीर्षक संगीत घुंघरू और तबले से शुरु ज़रूर होती है, लेकिन जल्दी ही ख़ाँ साहब का सितार हर अन्य वाद्य पर हावी हो जाता है। क्या फिरी हैं उनकी उंगलियाँ सितार पर, वाह! सारंगी, संतूर, घुंघरू और तबले के साथ सितार की यह महफ़िल फ़िल्म के नग़मों और ग़ज़लों से कम दिलकश नहीं है। और फिर सोने पे सुहागा, इस शीर्षक संगीत के मध्य भाग से लता जी की आवाज़ में आलाप और ताल गायन है जो इस पूरे आयोजन पे चार चाँद लगा देती है।

ओ. पी. नय्यर एक ऐसे संगीत रहे जिनके गीतों में आधुनिक शैली के होते हुए भी आत्मा हिन्दुस्तानी संगीत की ही रही और उन्होंने पाश्चात्य साज़ों के साथ-साथ भारतीय वाद्यों का भी बहुतायत में प्रयोग किया। 1962 की फ़िल्म ’एक मुसाफ़िर एक हसीना’ का गीत "आप यूंही अगर हमसे मिलते रहे, देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा" रफ़ी-आशा का एक यादगार डुएट है। इस गीत में सबसे उल्लेखनीय वाद्य हैं सारंगी और सितार, जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था।  "कैसी जादूगरी की अरे जादूगर" इस गीत की एक पंक्ति है; इस पंक्ति को सुनते हुए मन में यह ख़याल आता है कि यह शायद ख़ाँ साहब को ही कहा गया है। गीत के एक अन्तराल संगीत में पंख फैला कर एक मोर को नाचते हुए दिखाया जाता है जिसके पार्श्व में ख़ाँ साहब का सितार बज रहा है। मोर के साथ-साथ जैसे सितार की ध्वनियाँ भी झूम रही हैं। 1964 की फ़िल्म ’कशमीर की कली’ में एक बार फिर नय्यर साहब ने ख़ाँ साहब के सितार से सजाया "इशारों इशारों में दिल लेने वाले" गीत को। अन्तरालों में सितार और घुंघरू का एक साथ प्रयोग हुआ है। ये सभी टुकड़े जैसे इन गीतों की पहचान हैं। और नय्यर साहब के गीतों की यह ख़ासियत भी है कि उनके गीतों में हर साज़ और हर टुकड़ा बहुत ही प्रॉमिनेन्ट सुनाई देता है। इसी तरह से 1965 की फ़िल्म ’मेरे सनम’ का आशा भोसले का गाया सदाबहार गीत "जाइए आप कहाँ जाएंगी" में भी ख़ाँ साहब का सितार है। शुरुआती धुन में संतूर है, लेकिन अन्तराल संगीत में सितार के वो टुकड़े हैं जो इस गीत की पहचान भी हैं। 

1966 के वर्ष में रईस ख़ाँ साहब के सितार से सजे बहुत से गीत बने जिनमें से मदन मोहन की रचनाओं का ज़िक्र हम कर चुके हैं। इस वर्ष संगीतकार ख़य्याम के संगीत से सजी फ़िल्म आई ’आख़िरी ख़त’। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था "बहारों मेरा जीवन भी सँवारो"। पूरे गीत में सितार छाया हुआ है। मुखड़े में "बहारों" और "मेरा" शब्दों के बीच में सितार के छोटे टुकड़े का क्या सुन्दर प्रयोग हुआ है। अन्तराल संगीत में सितार और बांसुरी का सुन्दर संगम है। शंकर-जयकिशन के संगीत में पौराणिक विषय पर बनी फ़िल्म ’आम्रपाली’ को अपने गीत-संगीत के लिए याद किया जाता है। "तुम्हें याद करते करते जाएगी रैन सारी" गीत की जितनी तारीफ़ें की जाए कम होगी। क्या बोल, क्या धुन, क्या गायकी, क्या जज़्बात, सब लाजवाब; और उस पर उस्ताद ख़ाँ साहब के सितार का नशा जो अन्तरालों को एक अलग ही मुकाम तक लेकर गया है। यह संगीत जैसे स्वर्ग में रचा गया हो! ख़ाँ साहब के सितार ने हर जज़्बात को साकार किया है। कभी झूमते हुए मोर का उत्साह, कभी नए नए प्यार होने की ख़ुशी, और कभी बिरहा का दर्द, हर मौके के गीत में ख़ाँ साहब के सितार ने इतिहास रचा है। इसी वर्ष शंकर-जयकिशन के ही संगीत वाले एक और फ़िल्म ’तीसरी क़सम’ के एक गीत में ख़ाँ साहब का सितार सुनाई पड़ा। "सजनवा बैरी हो गए हमार" में मुकेश की आवाज़ ने जो दर्द पैदा की थी, उससे टक्कर लेकर ख़ाँ साहब के सितार ने भी दर्द भरे ऐसे तान छेड़े कि जिसने गीत के भाव, गीत के बोलों और गायकी को कॉम्प्लिमेण्ट किया।

संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनन्दजी ने भी ख़ाँ साहब के सितार को अपने गीतों में जगह दी। 1968 की कालजयी फ़िल्म ’सरस्वती चन्द्र’ के यादगार गीत "चंदन सा बदन चंचल चितवन" के शुरुआती संगीत में सितार का पीस इस गीत के पहचान और विशेषता है। इस गीत के दो संस्करण हैं और दोनों में उन्होंने दोनो में अलग अलग तरीक़े से सितार के सुरों को पिरोया है। संगीतकार जयदेव के सुरीले संगीत में 1977 की फ़िल्म ’आंदोलन’ में मीराबाई की लिखी एक सुन्दर रचना थी "पिया को मिलन कैसे होए री मैं जानु नाही"। नीतू सिंह पर फ़िल्माया यह ख़ूबसूरत गीत और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत बन पड़ा ख़ाँ साहब के दीर्घ सितार के टुकड़ों से। जयदेव के गीतों में हमें अनर्थक साज़ों की भीड़ नहीं मिलती, एक या दो साज़ों को लेकर उनकी सीधी सरल रचनाएँ सुनने वालों के दिलों में घर कर लेती है। आशा भोसले की आवाज़ में यह रचना भी उन्हीं गीतों में से एक है। मूलत: सितार पर आधारित यह रचना दर्द भरा होते हुए भी बेहद आकर्षक और सुरीला है। 

70 के दशक में धूम मचाने वाले संगीतकारों में एक नाम लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का है। 1971 की फ़िल्म ’महबूब की मेहन्दी’ आज केवल इसके गीतों के लिए याद की जाती है। फ़िल्म के लगभग सभी गीत मक़बूल हुए, जिनमें लता-रफ़ी के डुएट "इतना तो याद है मुझे कि उनसे मुलाक़ात हुई" को एल.पी के श्रेष्ठ लता-रफ़ी डुएट्स में गिना जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस लोकप्रिय गीत में भी उस्ताद रईस ख़ाँ साहब के सितार के टुकड़े थे। ख़ास कर गीत के दूसरे अन्तराल संगीत में लीना चन्दावरकर जब नृत्य कर रही है तब नृत्य-संगीत के रूप में ख़ाँ साहब का सितार ही बज रहा होता है। ख़ाँ साहब का पेशा भले सितार रहा है, लेकिन कई बार उन्होंने अपने सितार वादन के लिए निर्माता से अपनी पारिश्रमिक नहीं ली। ऐसा ही एक क़िस्सा जुड़ा है ’सत्यम शिवम् सुन्दरम्’ फ़िल्म के साथ। बात यह हुई कि एक सीन के लिए लक्ष्मी-प्यारे को उचित पार्श्व-संगीत नहीं सूझ रहा था। सीन शायद आपको याद हो, जब ज़ीनत अमान सुबह सुबह जलप्रपात के नीचे चल कर जाती हैं शशि कपूर से मिलने। उस समय वहाँ ख़ाँ साहब मौजूद थे जिन्होंने सितार पर एक पीस बजा कर सुनाया जिसे सुन कर राज कपूर सहित सभी लोग वाह वाह कर उठे। ’सत्यम शिवम सुन्दरम’ फ़िल्म के तमाम गीतों में भी ख़ाँ साहब के सुमधुर सितार की ध्वनियाँ शहद घोलती हुई सी लगती है। यह 1978 की फ़िल्म थी और इसी वर्ष लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के संगीत से सजी एक और फ़िल्म आई थी ’बदलते रिश्ते’। इसमें लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर का गाया एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना थी "मेरी साँसों को जो महका रही है"। गीत के पहले अन्तराल संगीत में अगर संतूर है तो दूसरे अन्तराल में मुख्यत: वायलिन है, लेकिन तीसरे अन्तराल में ख़ाँ साहब के सितार की लहरियाँ जैसे गीत का रुख़ ही मोड़ देती हैं। 

70 के दशक में ख़ाँ साहब ने शास्त्रीय संगीत के कॉनसर्ट्स में बजाना कुछ कम कर दिया था। लेकिन 80 के दशक के आते ही वो फिर एक बार उस तरफ़ सक्रीय हो उठे जब उस्ताद अली अकबर ख़ाँ साहब ने उन्हें अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में बजाने के लिए आमन्त्रित किया। रईस ख़ाँ साहब हिन्दी फ़िल्मों से धीरे धीरे सन्यास ले लिए। 1979 में उन्होंने चौथी शादी की पाक़िस्तानी गायिका बिलक़ीस ख़ानुम से और 1986 वो उनके साथ पाक़िस्तान जा कर बस गए। आज ख़ाँ साहब हमारे बीच नहीं हैं। उनके बजाए सितार के तमाम कॉन्सर्ट्स की रेकॉर्डिंग्स और स्टुडियो रेकॉर्डिंग्स तो हमारे पास हैं ही, इनके साथ-साथ वो तमाम फ़िल्मी गीत भी हैं जिन्हें उनके सितार ने चार चाँद लगाए। उस्ताद रईस ख़ाँ की पुण्य स्मृति को ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ का नमन!


आपकी बात

’चित्रकथा’ के पिछले दो अंकों में हमने गीतकार नक़्श ल्यालपुरी के लिखे मुजरों पर लेख प्रकाशित की थी जिस पर हमें हमारे पाठकों की प्रतिक्रिया प्राप्त हुई हैं। आदियोग जी ने इस लेख को "शानदार" कह कर टिप्पणी की है तो रमेश शर्मा जी लिखते हैं - "बेहतरीन... नायाब मोतियों का संग्रह... हार्दिक बधाई स्वीकारिए!" संज्ञा टंडन जी लिखती हैं - "ग़ज़ब का शोध सुजॉय जी। धन्यवाद इस शानदार जानकारी के लिए।" और सर्वोपरि नक़्श साहब के सुपुत्रा राजन ल्यालपुरी जी ने इस लेख पर कहा है - "मैंने पहला भाग पढ़ा है, बहुत अच्छा है और सही जानकारी है।"


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, April 15, 2017

चित्रकथा - 14: फ़िल्मी गीतों में सितार वादक जयराम आचार्य का योगदान


अंक - 14

सितार वादक जयराम आचार्य को श्रद्धांजलि

फ़िल्मी गीतों में जयराम आचार्य का योगदान 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



12 अप्रैल 2017 को सितार वादक, दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित, पंडित जयराम आचार्य का निधन हो जाने से फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध करने वाले उन तमाम गुमनाम टिमटिमाते सितारों में से एक सितारा हमेशा के लिए डूब गया। यह कटु सत्य ही है कि किसी फ़िल्मी गीत की सफलता के पीछे अक्सर गायक, संगीतकार और गीतकार के हाथ को स्वीकारा जाता है, और लोग भूल जाते हैं उन तमाम वादकों को जिनके वाद्यों के टुकड़ों से गीतों का श्रॄंगार होता रहा है, जिनसे गीतों की सुन्दरता बढ़ती रही है। जयराम जी भी ऐसे ही एक सितार वादक थे जिन्होंने बहुत से कामयाब गीतों में सितार के सुन्दर टुकड़े बजाए पर उन गीतों के साथ उन्हें लोगों ने कभी याद नहीं किया। आइए आज उनके जाने के बाद उन्हें याद करें उन गीतों का ज़िक्र करते हुए जिनमें उनकी उंगलियों का जादू चला था सितार के ज़रिए। पेश-ए-ख़िदमत है ’चित्रकथा’ के अन्तर्गत लेख ’फ़िल्म-संगीत में सितार वादक जयराम आचार्य का योगदान’।




जयराम आचार्य (4 जुलाई 1928 - 12 अप्रैल  2017)

यह एक कड़वा सच है कि फ़िल्मी गीतों में साज़ों को बजाने वाले साज़िन्दों को वह मुकाम नहीं दिया जाता जो मुकाम गायकों, संगीतकारों और गीतकारों को दिया जाता है जबकि सच यही है कि किसी भी गीत की सफलता के पीछे इन साज़िन्दों का भी बेशकीमती योगदान होता है। यहाँ तक कि कुछ गीत तो उसमें शामिल साज़ों के टुकड़ों की वजह से यादगार हो जाते हैं। फ़िल्म ’परख’ के "ओ सजना बरखा बहार आई" गीत के शुरुआत में बजने वाले सितार के पीस के बग़ैर इस गीत को सुनना बिल्कुल वैसा है जैसे कि किसी के शरीर से सर को अलग कर दिया गया हो। फ़िल्म ’परख’ के इस गीत में सितार बजाने वाले फ़नकार का नाम है पंडित जयराम आचार्य, जिनका 12 अप्रैल 2017 को निधन हो गया। अफ़सोस की बात यह है कि दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित होने के बावजूद उनकी मृत्यु की ख़बर अख़बारों में नहीं छपी, किसी रेडियो चैनल ने उन्हें याद नहीं किया। रेडियो पर शायद वो गाने बज रहे होंगे जिनमें उन्होंने सितार बजाए हैं, लेकिन न रेडियो प्रेज़ेन्टर को इस बात का पता है और न ही श्रोताओं को इस बात की ख़बर। जयराम आचार्य गुमनाम रह गए; और आज भी उनसे संबंधित अधिक जानकारी इन्टरनेट पर उपलब्ध नहीं है।



जयराम आचार्य का जन्म तमिल नाडु में 4 जुलाई 1928 को हुआ था। उन्हें संगीत विरासत में ही मिली। उनके पूर्वज सितार और वायलिन के वादक थे। वर्ष 1939 में जयराम बम्बई आए फ़िल्मों में एक गायक बनने का सपना लेकर। उस समय पार्श्वगायन का इजाद हो चुका था, इसलिए जयराम के मन में एक पार्श्वगायक बनने की ही लालसा थी। पर पार्श्वगायन के आने के बावजूद वह ज़माना सिंगिंग् स्टार्स का ही था। इसलिए इस क्षेत्र में पाँव जमाना आसान काम नहीं था। दो वर्ष तक संघर्ष करने के बाद जयराम को 1941 की फ़िल्म ’मेरा संसार’ में कोरस में गाने का मौक़ा मिला। गीत था "नया ज़माना आया लोगों"। इस गीत में मुख्य गायक थे अरुण कुमार और कवि प्रदीप। जयराम को समझ में आ चुका था कि गायकी में क़दम जमाना आसान नहीं। उधर उनके पिता चाहते थे कि जयराज दिलरुबा साज़ को अपनाए और उसी में उस्ताद बने। लेकिन युवा जयराम को सितार से प्यार था। पिता के सुझाव पर वो दिलरुबा बजाने तो लगे थे, पर घर पर एक सितार भी हुआ करता था। एक दिन जयराम ने सितार उठाया और उसके तार छेड़ दिए। सितार के तार छेड़ते ही उन्हें समझ आ गया कि यही वह साज़ है जो उनका हमसफ़र है। वर्ष 1946 में जयराम आचार्य HMV कंपनी से जुड़ गए और वहाँ उन्हें सितार के दिग्गजों जैसे कि पंडित रविशंकर के संस्पर्श में आने का मौक़ा मिला और सितार की बहुत सी बारीक़ियाँ सीखी।

आगे चलकर जयराम आचार्य वी. शान्ताराम के ’राजकमल कलामन्दिर’ से जुड़ गए। इस बैनर की 1953 की फ़िल्म ’तीन बत्ती चार रास्ता’ के दृश्य में सितार बजाने का मौका मिला जो उन्हीं पर फ़िल्माया गया। संगीतकार थे पंडित शिवराम कृष्ण। यह गीत था लता मंगेशकर का गाया "अपनी अदा पर मैं हूँ फ़िदा, कोई चाहे ना चाहे मेरी बला"। 1957 की फ़िल्म ’शारदा’ में सी. रामचन्द्र का संगीत था। इस फ़िल्म में लता और आशा का गाया एक यादगार डुएट था "ओ चाँद जहाँ वो जाए"। इस गीत में जयराम आचार्य ने सितार पर अपना कमाल दिखाया। इस तेज़ गति वाले गीत के रीदम और मिज़ाज के साथ ताल से ताल मिलाता हुआ उनके सितार ने एक अलग ही समा बांधा। 1958 में एक फ़िल्म आई थी ’अजी बस शुक्रिया’। इस फ़िल्म के लोकप्रिय गीत "सारी सारी रात तेरी याद सताये" गीत में जयराम आचार्य का सितार था। रोशन के संगीत में इस गीत के फ़िल्मांकन में नायिका जो एक गायिका हैं गीत गा रही हैं और बगल में तमाम साज़िन्दे अपने अपने वाद्य को बजा रहे हैं। तमाम साज़ों की भीड़ में जयराम जी का सितार भीड़ से अलग सुनाई देता है। 1960 की फ़िल्म ’परख’ के सदाबहार गीत "ओ सजना बरखा बहार आई" की बात हम कर चुके हैं। इस गीत में शैलेन्द्र, सलिल चौधरी और लता मंगेशकर की जितनी भूमिका, उतनी ही भूमिका जयराम आचार्य की भी है जिनकी जादुई सितार के टुकड़ों ने गीत को अमरत्व प्रदान कर दी है। 


यूं तो जयराम आचार्य ने समकालीन सभी बड़े संगीतकारों के साथ काम किया है, लेकिन राहुल देव बर्मन के साथ उनका रिश्ता कुछ अलग ही रहा है। पंचम के पहले पहले गीत "घर आजा घिर आए बदरा साँवरिया" में जो सितार के सुन्दर टुकड़े सुनने को मिलते हैं, वो जयराम जी की ही देन है। यह 1961 की फ़िल्म ’छोटे नवाब’ का गीत है जिससे पंचम ने अपनी फ़िल्मी सफ़र का आग़ाज़ किया था। मुख्यत: सितार, सारंगी और तबले से सुसज्जित इस गीत के इन्टरल्युड संगीत में सितार के बेहद ख़ूबसूरत टुकड़े सुनने को मिलते हैं। यह वह ज़माना था जब किसी भी गीत में तीन ट्रैक हुआ करते थे - एक गायक के लिए, एक परक्युशन के लिए और एक ऑरकेस्ट्रा के लिए। और इन तीनों ट्रैकों पर बजाने वाले साज़िन्दों को बेहद होशियार रहना पड़ता था ताक़ि वो अपने अपने पीस को पहली बार में ही बिल्कुल सही बजाएँ। और जयराम आचार्य इस बात को अच्छी तरह समझते थे। तभी उनके बजाए हुए पीसेस भीड़ में भी बिल्कुल साफ़ और प्रॉमिनेन्टली सुनाई देते हैं।


एक साक्षात्कार में जब जयराम आचार्य से पूछा गया कि वो आख़िर फ़िल्म-संगीत में ही क्यों आए तो इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि फ़िल्म-संगीत में साज़िन्दों को बहुत जल्दी पेमेन्ट मिल जाता था जबकि शास्त्रीय संगीत के वादकों को बहुत दिनों तक इन्तज़ार करना पड़ता। कितनी ईमानदारी से उन्होंने इस कटु सत्य को कह दिया था! कला होने के साथ साथ सितार उनका पेशा भी था। घर चलाने के लिए पैसों की ज़रूरत थी। ऐसे में फ़िल्मों में न बजाते तो कैसे घर चलता भला! राहुल देव बर्मन से उनकी मुलाक़ात सचिन देव बर्मन के एक रेकॉर्डिंग् पर हुई थी। पंचम को याद करते हुए वो कहते हैं कि पहली बार जब उन्होंने पंचम को "पंचम दा" कह कर बुलाया था, तब पंचम ने उनसे कहा था, "पंचम दा मत कहो, पंचम कहो।" 1967 की फ़िल्म ’चंदन का पलना’ में पंचम का संगीत था। इसमें लता मंगेशकर की आवाज़ में भक्तिमूलक गीत था "ओ गंगा मैया, पार लगा दे मेरी सपनों की नैया"। इस गीत को सुर्सिंगार पुरस्कार के लिए मनोनित किया गया था। इस गीत में भी जयराम जी के सितार के सुन्दर टुकड़े सुनने को मिलते हैं। पंचम की यह ख़ासियत थी कि परक्युशन और रीदम के प्रयोग के बावजूद उनके संगीत में भारतीय संगीत का जड़ होता था। 1969 की प्रसिद्ध फ़िल्म ’प्यार का मौसम’ के गीत "मैं ना मिलूंगी नज़र हटा लो" में भी सितार का सुन्दर प्रयोग सुनाई देता है। 1972 की फ़िल्म ’गोमती के किनारे’ के मुजरे "आज तो मेरी हँसी उड़ाई जैसे भी चाहा पुकारा" में भी जयराम आचार्य के सितार ने इस गीत को यादगार बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। 1975 की फ़िल्म ’आंधी’ के गीतों के लिए बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया, सरोद वादक ज़रीन दारुवाला और सितार के लिए जयराम आचार्य को चुना गया था। "इस मोड़ से जाते हैं" गीत में सितार और सरोद दोनों का प्रयोग है। "तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं" गीत में भी जयराम जी के सितार का हस्ताक्षर है। इस गीत के शुरुआती संगीत के रूप में सितार के टुकड़े जैसे इस गीत के संकेत धुन की तरह सुनाई पड़ते हैं। हम आए दिन इन गीतों को सुनते रहते हैं सभी रेडियो चैनलों पर, लेकिन शायद ही कभी इन दो वादकों को याद करते हैं इन गीतों के साथ। यह अफ़सोस की ही बात है।

1968 की फ़िल्म ’आशिर्वाद’ के गीत "झिर झिर बरसे सावनी अखियाँ" जैसा असर वो 1970 की फ़िल्म ’गुड्डी’ के गीत "बोल रे पपीहरा" में चाहते थे। इसलिए वो अपने उन कलाकारों को इकट्ठा किया जिन पर वो भरोसा करते थे। ऑरकेस्ट्रेशन के लिए सेबास्टिअन, तबले के लिए वसन्त आचरेकर, परक्युशन के लिए लाला सत्तार, सरोद के लिए ज़रीन दारुवाला और सितार के लिए जयराम आचार्य को चुना गया। पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के उपलब्ध ना होने की वजह से बांसुरी पर थे सुमन्त राज जी। जब ऐसे दिग्गज फ़नकार इस गीत से जुड़े थे, तब जादू तो चलना ही था। गायिका वाणी जयराम अपने आप को ख़ुशक़िस्मत मानती हैं जो इतने बड़े बड़े कलाकारों ने उनके गीत में वाद्य बजाए। और इसके गीत के इन्टरल्युड में सितार की ही प्रमुख भूमिका रही। 1970 की ही फ़िल्म ’दस्तक’ में मदन मोहन का संगीत था। मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी ग़ज़ल "हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह" एक सदाबहार ग़ज़ल है। इस ग़ज़ल के दोनों इन्टरल्युड्स में सिर्फ़ और सिर्फ़ जयराम आचार्य का सितार ही सुनाई देता है और क्या ख़ूब सुनाई देता है। लता जी की आवाज़ की मिठास के साथ सितार के टुकड़ों का रस, बस कमाल है! इसमें कोई शक़ नहीं कि इस ग़ज़ल को ख़ूबसूरती प्रदान करने में जयराम आचार्य का उतना ही हाथ है जितना हाथ लता-मजरूह-मदन मोहन का है। सितार के उन तमाम पीसेस के बिना यह ग़ज़ल उतनी ख़ूबसूरत न होती। 

1977 में फिर एक बार सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में जयराम आचार्य को सितार बजाने का मौक़ा मिला। फ़िल्म थी ’आनन्द महल’। शास्त्रीय संगीत आधारित यह रचना थी "नि सा ग म प रे सा रे गा"। यह फ़िल्म प्रदर्शित न हो सकी जिस वजह से इस गीत को बहुत अधिक नहीं सुना गया। उल्लेखनीय बात यह कि यह जेसुदास का गाया पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत था। इस गीत के इन्टरल्युड में सितार और सारंगी की ख़ूबसूरत जुगलबन्दी सुनने को मिलती है। जयराम आचार्य ने कई फ़िल्मों के पार्श्वसंगीत और शीर्षक संगीत में अमूल्य योगदान दिया। शंकर जयकिशन के संगीत में फ़िल्म ’ससुराल’ (1961) और ’ज़िन्दगी’ (1964) के टाइटल म्युज़िक में जयराम आचार्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। ’ससुराल’ फ़िल्म के टाइटल म्युज़िक में "तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे चश्मेबद्दूर" गीत की धुन सितार पर उन्होने बजायी। इसी तरह से ’ज़िन्दगी’ फ़िल्म के टाइटल म्युज़िक में जयराम आचार्य ने बजायी "पहले मिले थे सपनों में और आज सामने पाया हाय कुरबान जाऊँ" की धुन। इसी तरह से शंकर जयकिशन के कई और फ़िल्मों में उन्होंने बजाए।

80 के दशक के आते आते जयराम आचार्य ने फ़िल्मों के लिए बजाना कम कर दिया। उन्हीं के शब्दों में उन्होंने 80 के दशक से ही फ़िल्मी कलाकारों से किनारा कर लिया और 1995 में उन्होंने सितार बजाना ही छोड़ दिया। आज जयराम आचार्य हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन फ़िल्म संगीत के धरोहर को अपने सितार के सुरीले टुकड़ों से समृद्ध करने के उनके अमूल्य योगदान को हम कभी नहीं भुला सकते। जयराम आचार्य हमेशा ज़िन्दा रहेंगे इन गीतों के माध्यम से। जब जब ये गीत सुने जाएँगे, उनकी यादें ताज़ा हो जाएँगी। सितार नवाज़ जयराम आचार्य को नमन!




आपकी बात

पिछले अंक में तीसरे लिंग के सकारात्मक चित्रण वाले 1997 की तीन हिन्दी फ़िल्मों पर लेख का हमें अच्छी प्रतिक्रिया मिली, और शुक्रवार देर रात तक इस अंक की रीडरशिप रही 191।  यूंही हमारे साथ बने रहिए, धन्यवाद!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, October 23, 2016

राग पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 289 : RAG PAHADI




स्वरगोष्ठी – 289 में आज

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन – 2 : नूरजहाँ का गाया मोहक गीत

“जवाँ है मोहब्बत, हसीं है जमाना...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला का समापन हम आगामी 25 दिसम्बर को नौशाद अली के 98वीं जयन्ती के अवसर पर करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए माया नगरी बम्बई की ओर रुख किया।


नूरजहाँ
बसे पहले नौशाद को ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ में उस्ताद झण्डे खाँ के संगीत निर्देशन में पियानो वादक की नौकरी मिली थी। यहाँ उन्हें चालीस रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। नौशाद की अभिरुचि संगीत के साथ-साथ साहित्य में भी थी। उन्हीं दिनों नौशाद की मित्रता गीतकार पी.एल. सन्तोषी से हुई। सन्तोषी गीत लिखते समय प्रायः नौशाद से सलाह-मशविरा भी करते थे। उन दिनों नौशाद परेल की एक चाल में दस रुपये माहवार पर रहने लगे थे। उस दौर में ‘न्यू पिक्चर कम्पनी’ की फिल्म ‘सुनहरी मकड़ी’ का निर्माण हो रहा था। उस्ताद झण्डे खाँ की एक धुन से कम्पनी के मालिक हेनरी डोरग्वोच सन्तुष्ट नहीं हो रहे थे। नौशाद ने उस्ताद झण्डे खाँ से इजाज़त लेकर पियानो पर तुरन्त उस गीत को एक नई धुन में ढाल दिया। इस नई धुन को सुन कर हेनरी बहुत खुश हुए और नौशाद की तरक्की सहायक के रूप में हो गई। परन्तु वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई। फिल्म का संगीत पूरा होने बाद नौशाद का हिसाब चुकता कर कम्पनी से हटा दिया गया। फिर काम की तलाश शुरू हुई और इसी सिलसिले में नौशाद का दूसरा ठिकाना ‘फिल्म सिटी’ कम्पनी बनी। इस कम्पनी में नौशाद संगीतकार मुश्ताक हुसेन के सहायक बने। यहाँ उन्होने तीन फिल्मों में सहायक संगीतकार के रूप में काम किया। ‘फिल्म सिटी’ कम्पनी के बाद नौशाद ‘रणजीत फिल्म कम्पनी’ की पंजाबी फिल्म ‘मिर्ज़ा साहिबाँ’ के नायक और संगीतकार मनोहर कपूर के सहायक बन गए। यहीं उनकी मित्रता गीतकार डी.एन. मधोक से हो गई, जो आगे चल कर नौशाद के बहुत काम आई। 1939 में मधोक की सिफ़ारिश पर नौशाद को रणजीत कम्पनी की फिल्म ‘कंगन’ के संगीत निर्देशक के रूप में चुना गया। फिल्म का पहला गीत- “बता दो मोहे कौन गली गए श्याम...” उन्होने रिकार्ड तो करा दिया, किन्तु साजिन्दों के असहयोगात्मक रवैये के कारण मात्र एक गीत रिकार्ड करने के बाद नौशाद ने कम्पनी से त्यागपत्र दे दिया। मधोक की सिफ़ारिश पर नौशाद को ‘भवनानी प्रोडक्शन’ की 1940 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्रेम नगर’ में संगीतकार के रूप में नियुक्त किया गया। स्वतंत्र संगीतकार के रूप में नौशाद को अवसर तो 1939-40 में ही मिल चुका था। अपने शुरुआती दौर में उन्होने उत्तर प्रदेश की लोकधुनों का प्रयोग करते हुए अनेक लोकप्रिय गीत रचे। ऐसे गीतों में प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छटा थी। दरअसल नौशाद के ऐसे प्रयोगों से उन दिनों प्रचलित फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा मिला। आगे चल कर अन्य संगीतकारों ने भी प्रादेशिक और क्षेत्रीय लोक संगीत से जुड़ कर ऐसे ही प्रयोग किए।

आज के अंक में हम आपको नौशाद के संगीत निर्देशन में 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनमोल घड़ी’ से एक बेहद लोकप्रिय गीत सुनवाते हैं। ‘महबूब प्रोडक्शन’ की यह फिल्म व्यावसायिक दृष्टि से अत्यन्त सफल थी। नौशाद और गायिका-अभिनेत्री नूरजहाँ का अविस्मरणीय साथ इस फिल्म की यादगार उपलब्धि थी। इस फिल्म का एक गीत- “जवाँ है मोहब्बत, हसीं है जमाना...” राग पहाड़ी की छाया लिये हुए है। गीत को नूरजहाँ ने स्वर दिया है। गीत में कहरवा ताल में ढोलक का अत्यन्त आकर्षक प्रयोग किया गया है। राग पहाड़ी का अत्यन्त सरलीकृत और आकर्षक रूप आपको इस गीत में परिलक्षित होगा।

राग पहाड़ी : “जवाँ है मोहब्बत, हसीं है जमाना...” : नूरजहाँ : फिल्म – अनमोल घड़ी




पं. निखिल बनर्जी
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है कि इस चर-अचर में उपस्थित जो भी दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं। भारतीय संगीत के कई रागों का उद्गम लोक संगीत से हुआ है। इन्हीं में से एक है, राग पहाड़ी, जिसकी उत्पत्ति भारत के पर्वतीय अंचल में प्रचलित लोक संगीत से हुई है। राग पहाड़ी बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर बहुत अल्प प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग की जाति का निर्धारण करने में इन स्वरों की गणना नहीं की जाती और इसीलिए इस राग को औड़व-औड़व जाति का मान लिया जाता है। राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका चलन चंचल है और इसे क्षुद्र प्रकृति का राग माना जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, गीत, ग़ज़ल आदि रचनाएँ खूब मिलती हैं। आम तौर पर गायक या वादक इस राग को निभाते समय रचना का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए विवादी स्वरों का उपयोग भी कर लेते हैं। मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली से बचाने के लिए राग पहाड़ी के अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। मन्द्र धैवत पर न्यास करने से राग पहाड़ी स्पष्ट होता है। इस राग के गाने-बजाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का पहला प्रहर माना जाता है। राग पहाड़ी के स्वरूप को स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए अब आप इसी राग की एक रचना सितार पर सुनिए। वादक हैं, सुविख्यात सितार वादक पण्डित निखिल बनर्जी। इस प्रस्तुति में पण्डित जी पहले आलाप और फिर मध्यलय में एक गत का सम्मोहक वादन किया है। आप राग पहाड़ी की यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पहाड़ी : सितार पर राग पहाड़ी का आलाप और गत : पण्डित निखिल बनर्जी





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 289वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक से अधिक पुराने राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 290 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की झलक मिल रही है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 अक्तूबर, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 291वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता
‘स्वरगोष्ठी’ के 287वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको लगभग सात दशक पुराने, लोकप्रिय फिल्म ‘शाहजहाँ’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – कुन्दनलाल सहगल

इस बार की पहेली के प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात
मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में अपने सैकड़ों पाठकों के अनुरोध पर पिछले अंक से एक नई लघु श्रृंखला “नौशाद के गीतों में राग-दर्शन” आरम्भ किया है। इस श्रृंखला के लिए हमने संगीतकार नौशाद के आरम्भिक दो दशकों की फिल्मों के गीत चुने हैं। श्रृंखला का आलेख को तैयार करने में हमने फिल्म संगीत के जाने-माने इतिहासकार और हमारे सहयोगी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। गीतों के चयन के लिए हमने अपने पाठकों की फरमाइश का ध्यान रखा है। यदि आप भी किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


  

Sunday, August 26, 2012

उस्ताद विलायत खाँ : ८५वें जन्मदिवस पर एक स्वरांजलि


स्वरगोष्ठी – ८५ में आज

जिनके सितार-तंत्र बजते ही नहीं गाते भी थे

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, दो दिन बाद अर्थात २८अगस्त को भारतीय संगीत-जगत के विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ का ८५वाँ जन्म-दिवस है। इस अवसर पर आज हम इस महान कलासाधक के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करने के साथ उनकी कुछ विशिष्ट रचनाओं का रसास्वादन भी करेंगे।

न्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त सितारनवाज उस्ताद विलायत खाँ का जन्म २८अगस्त, १९२८ को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के गौरीपुर नामक स्थान पर एक संगीतकार परिवार में हुआ था। उनके पिता उस्ताद इनायत खाँ अपने समय के न केवल सुरबहार और सितार के विख्यात वादक थे, बल्कि सितार वाद्य को विकसित रूप देने में भी उनका अनूठा योगदान था। उस्ताद विलायत खाँ के अनुसार सितार वाद्य प्राचीन वीणा का ही परिवर्तित रूप है। इनके पितामह (दादा) उस्ताद इमदाद खाँ अपने समय के रुद्रवीणा-वादक थे। उन्हीं के मन में सबसे पहले सितार में तरब के तारों को जोड़ने का विचार आया था, किन्तु इसे पूरा किया, विलायत खाँ के पिता इनायत खाँ ने। उन्होने संगीत-वाद्यों के निर्माता कन्हाई लाल के माध्यम से इस स्वप्न को साकार किया। सितार के ऊपरी हिस्से पर दूसरा तुम्बा लगाने का श्रेय भी इन्हें है।

उस्ताद विलायत खाँ की आरम्भिक संगीत-शिक्षा उनके पिता इनायत खाँ साहब से प्राप्त हुई थी। परन्तु जब वे मात्र १२ वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। बाद में उनके चाचा वाहीद खाँ ने उन्हें सितार-वादन की शिक्षा दी। नाना बन्दे हुसेन खाँ और मामू जिन्दे हुसेन खाँ से उन्हें गायन की शिक्षा प्राप्त हुई। इनकी शिक्षा के प्रभाव से ही आगे चल कर उस्ताद विलायत खाँ ने गायकी अंग में अपने सितार-वादन को विकसित किया। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर उनके सितार-वादन का एक उत्कृष्ट उदाहरण सुनते हैं। आपके लिए हमने सबसे पहले उस्ताद विलायत खाँ का बजाया राग शंकरा चुना है। बिलावल थाट, षाडव जाति के इस राग में खाँ साहब द्वारा तीनताल में प्रस्तुत एक मधुर रचना और अन्त में अति द्रुत लय में झाला वादन का रसास्वादन आप भी करें। राग शंकरा की एक अत्यन्त प्रचलित बन्दिश है- ‘अब मोरी आली कैसे धरूँ धीर...’। खाँ साहब का वादन सुनते जाइए और साथ-साथ यह बन्दिश भी गुनगुनाते जाइए।

राग शंकरा : उस्ताद विलायत खाँ



उस्ताद विलायत खाँ के सितार-वादन में तंत्रकारी कौशल के साथ-साथ गायकी अंग की स्पष्ट झलक मिलती है। सितार वाद्य को गायकी अंग से जोड़ कर उन्होने अपनी एक नई वादन शैली का सूत्रपात किया था। वादन करते समय उनके मिज़राब के आघात से ‘दा’ के स्थान पर ‘आ’ की ध्वनि का स्पष्ट आभास होता है। उनका यह प्रयोग, वादन को गायकी अंग से जोड़ देता है। खाँ साहब ने सितार के तारों में भी प्रयोग किए थे। सबसे पहले उन्होने सितार के जोड़ी के तारॉ में से एक तार निकाल कर एक पंचम स्वर का तार जोड़ा। पहले उनके सितार में पाँच तार हुआ करते थे। बाद में एक और तार जोड़ कर संख्या छह कर दी थी। अपने वाद्य और वादन शैली के विकास के लिए वे निरन्तर प्रयोगशील रहे। एक अवसर पर उन्होने स्वीकार भी किया था कि वर्षों के अनुभव के बावजूद अपने हर कार्यक्रम को एक चुनौती के रूप में लेते थे और मंच पर जाने से पहले दुआ माँगते थे कि इस इम्तहान में भी वो अव्वल पास हों। आइए अब आप सुनिए, उस्ताद विलायत खाँ का बजाया, राग गारा। इस रचना में तबला संगति उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने की है।

राग गारा : उस्ताद विलायत खाँ



उस्ताद विलायत खाँ की उम्र तब मात्र बारह वर्ष थी जब उनके वालिद उस्ताद इनायत खाँ का इंतकाल हुआ था। आगे की संगीत-शिक्षा नाना बन्दे हुसेन खाँ और मामू जिन्दे हुसेन खाँ ने उन्हें दी। यह गायकों का घराना था। आरम्भ में विलायत खाँ का झुकाव गायन की ओर ही था, किन्तु उनकी माँ ने उन्हें अपनी खानदानी परम्परा निभाने के लिए प्रेरित किया। गायन की ओर उनके झुकाव के कारण ही आगे चल कर उन्होने अपने वाद्य को गायकी अंग के अनुकूल परिवर्तित करने का सफल प्रयास किया। यही नहीं, अपने मंच-प्रदर्शन के दौरान प्रायः गाने भी लगते थे। १९९३ में लन्दन के रॉयल फेस्टिवल हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में खाँ साहब ने राग हमीर के वादन के दौरान पूरी बन्दिश का गायन भी प्रस्तुत कर दिया था। लीजिए आप भी सुनिए।

राग हमीर : ‘अचानक मोहें पिया आके जगाये...’ : उस्ताद विलायत खाँ राग 



उस्ताद विलायत खाँ ने कुछेक विश्वविख्यात फिल्मों में भी संगीत दिया था। १९५८ में निर्मित सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’, १९६९ में मर्चेन्ट आइवरी की फिल्म ‘दि गुरु’ और १९७६ में मधुसूदन कुमार द्वारा निर्मित हिन्दी फिल्म ‘कादम्बरी’, उस्ताद विलायत खाँ के संगीत से सुसज्जित था। वे वास्तव में सरल, सहज और सच्चे कलासाधक थे। जन्मदिवस के अवसर पर उनकी स्मृतियों को यह स्वरांजलि अर्पित करते हुए हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। आइए, ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी को विराम देने से पहले संगीत-मंच की परम्परा का निर्वहन करते हुए, उस्ताद विलायत खाँ द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी की मधुर रचना सुनवाते है। इसे सुन कर आपका मन उन्नीसवीं शताब्दी के महान संगीतज्ञ और रचनाकार कुँवरश्याम की बेहद चर्चित ठुमरी- ‘बाट चलत मोरी चुनरी रंग डारी श्याम...’ गुनगुनाने का अवश्य करेगा।

राग भैरवी : उस्ताद विलायत खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की आज की संगीत-पहेली में हम पूर्व की भाँति संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछेंगे। ९०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी श्रृंखला के विजेता होंगे।


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह तराना किस राग में निबद्ध है?

२ - इस गीत की गायिका के स्वर आपने शास्त्रीय मंच के अलावा अनेकानेक बार सुना है। तो देर किस बात की, गायिका का नाम हमें लिख भेजें।
आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८७वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८३वें अंक में हमने आपको पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वर में एक दुर्लभ बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार और दूसरे का सही उत्तर है- तीनताल। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी, जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग का नाम पहचानने में भूल की, अतः उन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। विजेताओं को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ की विभिन्न कड़ियों को तैयार कराते समय हम आपके सुझावों और फरमाइशों का पूरा ध्यान रखते हैं। तो देर किस बात की, आज ही अपने सुझाव हमें मेल करें। ‘स्वरगोष्ठी’ के कई संगीत-प्रेमी और कलासाधक स्वयं अपना या अपनी पसन्द का आडियो हमें निरन्तर भेज रहे है और हम विभिन्न कड़ियों में हम उनका इस्तेमाल भी कर रहे हैं। यदि आपको कोई संगीत-रचना प्रिय हो और आप उसे सुनना चाहते हों तो आज ही अपनी फरमाइश हमें मेल कर दें। इसके साथ ही यदि आप इनसे सम्बन्धित आडियो ‘स्वरगोष्ठी’ के माध्यम से संगीत-प्रेमियों के बीच साझा करना चाहते हों तो अपना आडियो क्लिप MP3 रूप में भेज दें। हम आपकी फरमाइश को और आपके भेजे आडियो क्लिप को ‘स्वरगोष्ठी’ आगामी किसी अंक में शामिल करने का हर-सम्भव प्रयास करेंगे। आगामी अंक में हम एक ऐसी संगीत-साधिका के बारे में चर्चा करेंगे, जिन्हें आपने शास्त्रीय संगीत के मंच पर शायद न देखा हो, किन्तु वे बेहद लोकप्रिय हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र 

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