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Wednesday, April 4, 2018

चित्रकथा - 62: हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-1)

अंक - 62

हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-1)

"अंबर की एक पाक सुराही..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! फ़िल्म जगत एक ऐसा उद्योग है जो पुरुष-प्रधान है। अभिनेत्रियों और पार्श्वगायिकाओं को कुछ देर के लिए अगर भूल जाएँ तो पायेंगे कि फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में ना के बराबर रही हैं। जहाँ तक फ़िल्मी गीतकारों और संगीतकारों का सवाल है, इन विधाओं में तो महिला कलाकारों की संख्या की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। आज ’चित्रकथा’ में हम एक शोधालेख लेकर आए हैं जिसमें हम बातें करेंगे हिन्दी फ़िल्म जगत के महिला गीतकारों की, और उनके द्वारा लिखे गए यादगार गीतों की। आज का यह अंक समर्पित है महिला फ़िल्म गीतकारों को! 



गर यह पूछा जाए कि किस महिला गीतकार की रचनाएँ सबसे ज़्यादा फ़िल्मों में सुनाई दी हैं, तो
शायद इसका सही जवाब होगा मीराबाई। एक तरफ़ जहाँ यह एक सुन्दर और मन को शान्ति प्रदान करने वाली बात है, वहीं दूसरी ओर यह एक दुर्भाग्यजनक बात भी है कि जिस देश में मीराबाई जैसी कवयित्री हुईं हैं, उस देश में महिला गीतकारों की इतनी कमी है। हिन्दी सिने संगीत जगत की पहली महिला जिन्होंने गीतकारिता के लिए कलम उठाया था, वो हैं जद्दनबाई, जो फ़िल्म निर्माण के पहले दौर की एक गायिका, संगीतकार, अदाकारा और फ़िल्मकार रही हैं। 1892 में जन्मीं जद्दनबाई को भारतीय सिनेमा के अग्रदूतों में गिना जाता है। वो अभिनेत्री नरगिस की माँ थीं। 1935 की फ़िल्म ’तलाश-ए-हक़’ में संगीत देकर वो फ़िल्म जगत की पहली महिला संगीतकार बनीं। लेकिन इस फ़िल्म के गीतों के रिकॉर्ड के उपलब्ध ना होने की वजह से सरस्वती देवी को प्रथम महिला संगीतकार होने का गौरव मिला। इसके अगले ही साल 1936 में फ़िल्म ’मैडम फ़ैशन’ में एक गीत लिख कर जद्दनबाई बन गईं फ़िल्म जगत की प्रथम महिला गीतकार। गायक जुगल-किशोर की आवाज़ में जद्दनबाई की लिखी व स्वरबद्ध की हुई यह ग़ज़ल थी "यही आरज़ू थी दिल की कि क़रीब यार होता, और हज़ार जाँ से क़ुरबाँ मैं हज़ार बार होता"। इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन भी उन्होंने ही किया था। इसके बाद उनकी कुछ और फ़िल्में आईं जैसे कि ’हृदय मंथन’, ’मोती का हार’ और ’जीवन स्वप्न’, लेकिन उनका लिखा कोई गीत इनमें नहीं था। 

सरोज मोहिनी नय्यर
1936 में जद्दनबाई के लिखे उस गीत के बाद एक लम्बे समय तक किसी महिला गीतकार की रचना सुनाई नहीं दी। 50 के दशक के शुरू शुरू में संगीतकार ओ.पी. नय्यर की धर्मपत्नी सरोज मोहिनी नय्यर ने एक गीत लिखा "प्रीतम आन मिलो" जो एक प्राइवेट गीत था। सी. एच. आत्मा की आवाज़ में ओ. पी. नय्यर द्वारा स्वरबद्ध यह गीत इतना कामयाब हुआ कि नय्यर साहब की गाड़ी चल पड़ी। लेकिन इस गीत की मक़बूलियत से सी. एच. आत्मा को जितनी प्रसिद्धी मिली, सरोज मोहिनी नय्यर और उनके पति ओ. पी. नय्यर को नहीं मिली। अपनी पत्नी के लिखे इस गीत को उसका हक़ दिलाने के लिए नय्यर साहब ने ’Mr. and Mrs. 55’ फ़िल्म में इस गीत को रखने का निश्चय किया। इस फ़िल्मी संस्करण को गीता दत्त ने गाया था। आगे चल कर इस गीत का एक पैरोडी संस्करण गुलज़ार ने अपनी फ़िल्म ’अंगूर’ में रखा जिसे सपन चक्रवर्ती ने गाया था। जानीमानी अभिनेत्री और माँ की भूमिका में सर्वाधिक चर्चित अभिनेत्री निरुपा रॉय ने भी अपने करियर में कम से कम एक गीत ज़रूर लिखा था। 
निरुपा रॉय
1958 की फ़िल्म ’सम्राट चन्द्रगुप्त’, जो संगीतकार कल्याणजी वीरजी शाह की शुरुआती फ़िल्मों में से थी, में एक गीत लिखा "मुझे देख चाँद शरमाए, घटा थम जाए..."। लता मंगेशकर ने इसे गाया था। फ़िल्म के बाकी गीत भरत व्यास, इंदीवर और हसरत जयपुरी ने लिखे। निरुपा रॉय ने इस फ़िल्म में नायिका के किरदार में थीं और इस तरह से संभव है कि उन्होंने कोई गीत लिखा हो और फ़िल्म के निर्माता/निर्देशक/संगीतकार को वह पसंद आ गया हो और फ़िल्म में रख लिया गया हो। 1969 में एक ’शतरंज’ नाम की फ़िल्म आई जिसमें शंकर जयकिशन का संगीत था। हसरत जयपुरी, इंदीवर और एस. एच. बिहारी जैसे नामी गीतकारों के साथ साथ एक गीत किरण कल्याणी का लिखा हुआ भी फ़िल्म में सुनाई दिया, और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह गीत ज़बरदस्त हिट हुआ। मोहम्मद रफ़ी, शारदा और महमूद की आवाज़ों में "बदकम्मा बदकम्मा..." अपने ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। किरण कल्याणी ने आगे चल कर भी जितना काम किया, शंकर जयकिशन के लिए ही किया। 1971 की फ़िल्म ’एक नारी एक ब्रह्मचारी’ में रफ़ी साहब की आवाज़ में उनका लिखा गीत था "चिराग़ किस के घर का है तू, लाल किस के घर का है, कमल है कौन ताल का, तू किस चमन का फूल है"। किशोर कुमार - शंकर जयकिशन - किरण कल्याणी का कॉम्बिनेशन अजीब-ओ-ग़रीब कॉम्बिनेशन सा प्रतीत होता है, लेकिन 1974 की फ़िल्म ’वचन’ में यह तिकड़ी एक साथ आकर एक मस्ती भरे गीत की रचना की थी "ऐ हबीबा ख़ुशनसीबा, यार के दिल के क़रीब आ..."। मध्य-एशियाई संगीत के अंदाज़ में रचा यह गीत एक आइटम गीत होने की वजह से और फ़िल्म के पिट जाने से इस गीत को सफलता नहीं मिली। किरण कल्याणी फिर इसके बाद किसी फ़िल्म में गीतकार के रूप में नज़र नहीं आईं। 

प्रभा ठाकुर
किरण कल्याणी की तरह एक और महिला गीतकार जिन्होंने शंकर जयकिशन के साथ काम किया, वो हैं प्रभा ठाकुर। प्रभा ठाकुर ना केवल एक गीतकार हैं बल्कि एक जानीमानी कवयित्री भी हैं और साथ ही गायिका के रूप में भी उन्होंने गीत गाए हैं। प्रभा ठाकुर ने फ़िल्मी गीत लेखन 1974 में शुरू की कल्याणजी-आनन्दजी के संगीतबद्ध फ़िल्म ’अलबेली’ से। सुमन कल्याणपुर और कंचन का गाया वह गीत है "तनिक तुम हमरी नजर पहचानो"। कम बजट की फ़िल्म, उस पर फ़्लॉप, कुल मिला कर गीत कहीं खो गया और प्रभा ठाकुर भी। इस फ़िल्म के तीन साल बाद 1977 में शंकर जयकिशन के संगीत में फ़िल्म ’दुनियादारी’ में उन्होंने एक गीत लिखा जिसे लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने गाया। "प्यार करने से पहले ज़रूरी है ये, मैं तुझे जान लूँ, तू मुझे जान ले" गीत सुनने में बहुत मामूली लगता है, लेकिन ध्यान से पूरा गीत सुनने पर अहसास होता है कि कितने सीधे सरल शब्दों में प्रभा जी ने पते की बात बतायी हैं इस गीत में। और इस गीत से ख़ुश होकर ही तो शंकर जयकिशन की अगली फ़िल्म ’आत्माराम’ में भी उनसे एक और गीत लिखवाया गया। 1979 की इस फ़िल्म में प्रभा ठाकुर का लिखा गीत किशोर कुमार ने गाया - "चलते चलते इन राहों पर ऐसा भी कुछ हो जाता है, कोई अनचाहा मिल जाता है और मनचाहा खो जाता है..."। उनके अब तक के लिखे गीतों में यह सबसे अर्थपूर्ण गीत रहा है। शंकर-जयकिशन की एक और फ़िल्म ’पापी पेट का सवाल है’ (1984) में प्रभा ठाकुर ने एक गीत लिखा और उसे अपनी आवाज़ भी दी। लोक शैली में निबद्ध और हास्य रस लिए जया प्रदा पर फ़िल्माया यह गीत है "मोसे चटणी पिसावे, कैसा बेदर्दी समझे ना मेरे जी की बात..."। यह वह दौर था जब जयकिशन के बिना शंकर अकेले ही संगीत दे रहे थे। फ़िल्मों और फ़िल्म-संगीत के बदलते मिज़ाज की गति के आगे वो क्रमश: पीछे होते चले जा रहे थे और उनकी फ़िल्मों का संगीत उन कम बजट की फ़िल्मों की असफलता की वजह से ठंडे बस्ते में घुसते चले जा रहे थे। इसी दौरान 1983 में प्रभा ठाकुर ने उस दौर में अपना अन्तिम फ़िल्मी गीत लिखा कल्याणजी-आनन्दजी के लिए, फ़िल्म थी ’घुंघरू’। आशा भोसले की आवाज़ में यह मुजरा गीत है "तुम सलामत रहो यह है मेरी दुआ, मेरे दामन में है भी क्या दुआ के सिवा..."। प्रभा ठाकुर के लिखे इन सारे गीतों को ध्यान दें तो पता चलता है कि उनका लिखा हर गीत उनके लिखे पहले गीत से अलग है। उन्होंने कभी अपने गीतों को एक ही निर्दिष्ट शैली में बांधने की कोशिशें नहीं की। करीब 22 सालों तक फ़िल्म-संगीत से दूर रहने के बाद वर्ष 2006 में प्रभा ठाकुर के लिखे तीन गीत सुनाई दिए उत्तम सिंह के संगीतबद्ध फ़िल्म ’कच्ची सड़क’ में। पहला गीत है उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "इक तुमसे बात पूछूँ, बुरा नहीं मानो, पर यह बात जानो..."; और दूसरा गीत है उदित नारायण और विनोद राठौड़ की आवाज़ों में "हंगामा हंगामा"। तीसरे गीत के रूप में अदनान सामी की गायी मज़हबी क़व्वाली "ख्वाजा मेरे ख्वाजा" इन तीनों में से श्रेष्ठ रचना मानी जाएगी।

अमृता प्रीतम 
पंजाबी की पहली प्रसिद्ध महिला उपन्यासकार, लेखिका, कवयित्री और गीतकार के रूप में जो नाम सबसे पहले ध्यान में आता है, वह है अमृता प्रीतम का। पंजाबी भाषा की बीसवीं सदी की इस सशक्त कवयित्री को सरहद के दोनों तरफ़ से भरपूर मोहब्बत मिली। छह दशकों के करिअर में अमृता प्रीतम ने सौ से भी अधिक किताबें लिखीं, जिनमें पंजाबी लोक गीतों का संग्रह और उनकी आत्मकथा भी शामिल है जिसे कई भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उनकी लिखी कविता ’अज्ज आखां वारिस शाह नु’ (Today I invoke Waris Shah – "Ode to Waris Shah") कालजयी बन गई है जिसमें 1947 के बटवारे के मंज़र का मार्मिक वर्णन मिलता है। एक उपन्यासकार के रूप में ’पिंजर’ उनकी लिखी सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास रही जो उन्होंने 1950 में प्रकाशित की थीं। इस उपन्यास में बटवारे के समय औरतों के साथ होने वाले अत्याचारों का वर्णन मिलता है। इसी उपन्यास पर 2003 में फ़िल्म बन चुकी है। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। बटवारे के बाद अमृता प्रीतम लाहौर से भारत आ गईं, लेकिन वो ता-उम्र पाक़िस्तान में ज़्यादा लोकप्रिय रहीं अपने समकालीन मोहन सिंह और शिव कुमार बटालवी की तुलना में। ’साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ’ज्ञानपीठ पुरस्कार’, ’पद्मश्री’, ’पद्मविभूशण’ और ’साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप’ जैसे उच्चस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित अमृता प्रीतम की लेखनी कुछ एक बार फ़िल्मों में भी सुनाई दी गीतों के रूप में। पहली बार उनका लिखा गीत आया 1975 की फ़िल्म ’डाकू’ में। बासु भट्टाचार्य निर्देशित इस फ़िल्म में संगीत था श्यामजी-घन्श्यामजी का। फ़िल्म के गीतों के लिए हसरत जयपुरी, चमन लाहोरी, रमेश्वर त्यागी, साजन दहल्वी और अमृता प्रीतम को चुना गया। अमृता प्रीतम के लिखे पहले गीत को गाया लता मंगेशकर ने - "तू आज अपने हाथ से कुछ बिगडई संवार दे, ऐ ख़ुदा मेरे जिस्म से मेरा साया उतार दे"। बच्चे के जन्म के बाद माँ के दिल की पुकार है इस गीत के शब्द। और गीत को सुन कर अहसास हो जाता है कि एक बहुत अच्छा लेखक ही ऐसा गीत लिख सकता/सकती हैं। इस फ़िल्म में अमृता प्रीतम का लिखा एक और गीत था रफ़ी साहब की आवाज़ में - "ये दुनिया थी दिल की जो हमने बसाई, ये दुनिया है दिल की जो हमने लुटाई..."। 1976 में एक फ़िल्म आई थी ’कादम्बरी’ जिसमें उस्ताद विलायत ख़ाँ का संगीत था। इसमें अमृता प्रीतम का लिखा आशा भोसले का गाया गीत "अंबर की एक पाक सुराही बादल का एक जाम उठा कर..." एक कालजयी रचना है। इस तरह की काव्यात्मक रचना हिन्दी फ़िल्मों में बहुत कम ही सुना दी है। इन दो फ़िल्मों के बाद अमृता प्रीतम ने फिर किसी हिन्दी फ़िल्म के लिए गीत नहीं लिखे। 2003 में जब उनकी उपन्यास ’पिंजर’ पर फ़िल्म बनी तो इसमें उनका लिखा एक गीत रखा गया "चरखा चलाती माँ, धागा बनाती माँ, बुनती है सपनों की केसरी..."। उत्तम सिंह के संगीत में इसे गाया प्रीति उत्तम ने। यह एक बेहद मार्मिक लोरी है जिसका एक एक शब्द सीधे कलेजे को चीर के रख देती है। अमृता प्रीतम की ही लिखी मशहूर कविता "अज्ज आखां वारिश शाह नु" को भी इस फ़िल्म में शामिल किया गया जिसे वडाली ब्रदर्स और प्रीति उत्तम ने गाया। "वारिस शाह, बजा अखा वाले शाह नू कितो करा विचो बोले, आज अखा वाले शाह नु वाह दिसाऊ, कित्तो कब्रा विचो बोले, थी आज किताबे इश्क़ दा कोई अगला वर्ग फूल..."। 

फ़िल्म ’कादम्बरी’ में अमृता प्रीतम के अलावा एक और महिला गीतकार का लिखा गीत शामिल था। ये हैं गीतांजलि सिंह। संगीतकार अजीत सिंह के संगीत में पत्नी गीतांजलि ने यह गीत लिखा जिसे अजीत सिंह ने ही गाया। "क्यों हम तुम रहें अकेले, क्यों ना बाहों में बाहें ले ले, देखो ज़िंदगी के मेले..."। यह एक नशे से भरा क्लब सॉंग् है, अमृता प्रीतम के लिखे "अंबर की एक पाक सुराही" से बिल्कुल विपरीत। अजीत सिंह ने इसके बाद कई फ़िल्मों में संगीत दिया है, लेकिन गीतांजलि सिंह के लिखे गीत इसके बाद सिर्फ़ एक ही फ़िल्म में सुनाई दी, और वह फ़िल्म है 1999 की ’होश’। दरसल फ़िल्म ’होश’ में दो गीतकार थे, दोनों महिलाएँ - एक तो गीतांजलि सिंह थीं ही, दूसरी थीं आशा रानी। संगीतकार अजीत सिंह के संगीत में इन दो गीतकारों ने मिला-जुला कर कुल आठ गीत लिखे जिन्हें अजीत सिंह और तान्या सिंह ने गाए। तान्या सिंह अजीत सिंह की बेटी हैं। गीतकार आशा रानी ने भी अजीत सिंह के संगीत में एक और फ़िल्म में गाने लिखीं। यह फ़िल्म है 1989 की ’पुरानी हवेली’। अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में "कैसे मैं भुलाऊँ तेरा प्यार", सुरेश वाडकर की आवाज़ में "आता है मुझको याद तेरा प्यार" और "संगमर्मर सा था उसका बदन" आशा रानी की लिखी रचनाएँ हैं इस फ़िल्म की। 

महिला संगीतकारों में एक नाम शारदा राजन का रहा है। उनके द्वारा संगीतबद्ध 1976 की फ़िल्म ’ज़माने से पूछो’ में एक गीत शबनम करवारी का लिखा हुआ था। रफ़ी साहब की आवाज़ में यह गीत है "कहीं चमन खिला दिया, कहीं धुंआ उड़ा दिया, दिल में जो आय अपने किया पाप किया या पुण्य किया, हमसे ना पूछो, ज़माने से पूछो..."। इस तरह से फ़िल्म के शीर्षक गीत के गीतकार के रूप में शुरु हुई थी पारी महिला गीतकार शबनम करवारी की। 1979 में एक फ़िल्म बनी थी ’अरब का सोना: अबु कालिया’। जतिन-श्याम के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म के गीत ऐश कंवल और शबनम ने लिखे थे। फ़िल्म के गीतों में आवाज़ें थीं मोहम्मद रफ़ी, दिलराज कौर और नितिन मुकेश की। शबनम करवारी का लिखा और नितिन मुकेश का गाया एक गीत है "नेकी और बदी सब की एक दिन तोली जाएगी, पाप और पुण्य के पुस्तक सबकी एक दिन खोली जाएगी..."। इस सुंदर दार्शनिक गीत की ही तरह न जाने कितने गीत लोगों तक पहुँचने से वंचित रह गए होंगे सिर्फ़ इस वजह से कि ये फ़िल्में या तो सही तरीके से बन नहीं सकीं या फिर इन्हें प्रोमोट करने के लिए अर्थ का अभाव था।

यहाँ आकर पूरी होती है ’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ का पहला भाग जिसमें हमने बातें की जद्दन बाई, सरोज मोहिनी नय्यर, निरुपा रॉय, किरण कल्याणी, प्रभा ठाकुर, अमृता प्रीतम, गीतांजलि सिंह, आशा रानी और शबनम करवारी की। इस लेख के दूसरे भाग में हम कुछ और महिला गीतकारों और उनके लिखे गीतों की जानकारी लेकर उपस्थित होंगे। तब तक के लिए अपने दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, November 1, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : पहली महिला संगीतकार


भूली-बिसरी यादें

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आपके बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज मास का पहला गुरुवार है और इस दिन हम आपके लिए मूक और सवाक फिल्मों की कुछ रोचक दास्तान लेकर आते हैं। तो आइए पलटते हैं, भारतीय फिल्म-इतिहास के कुछ सुनहरे पृष्ठों को।


यादें मूक फिल्मों की : बम्बई, नासिक और मद्रास फिल्म निर्माण के शुरुआती केन्द्र बने 


 र्ष 1913 में दादा फालके द्वारा निर्मित और प्रदर्शित मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का नाम भारत के पहले कथा फिल्म के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो ही चुका था, इसी वर्ष दादा फालके की दूसरी फिल्म ‘भष्मासुर मोहिनी’ का प्रदर्शन हुआ। अगले वर्ष, अर्थात 1914 में भी दादा फलके का ही वर्चस्व कायम रहा, जब उनकी तीसरी फिल्म ‘सावित्री सत्यवान’ का प्रदर्शन हुआ। इन दो वर्षों में कुल तीन फिल्मों का प्रदर्शन हुआ और ये तीनों फिल्म फालके ऐंड कम्पनी द्वारा निर्मित थी। पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के निर्माण के समय कम्पनी का स्टूडिओ और कार्यालय मुम्बई में स्थापित था, किन्तु बाद की फिल्मों के निर्माण के समय दादा फालके ने अपना स्टुडियो और कार्यालय नासिक स्थानान्तरित कर दिया था। कम्पनी की स्थापना स्वयं फालके ने की थी, किन्तु नासिक स्थानान्तरित कर देने के बाद कम्पनी से कुछ साझीदार भी जुड़े। इनमें प्रमुख थे, वामन श्रीधर आप्टे, एल.बी. पाठक, गोकुलदास दामोदर, मायाशंकर भट्ट और माधवजी जयसिंह।

आर. नटराजा मुदालियर 
इसी बीच 1915 में एस.एन. पाटनकर नामक एक फ़िल्मकार ने भारत की दूसरी फिल्म कम्पनी, ‘पाटनकर यूनियन’ की स्थापना की। उन्होने इस कम्पनी की पहली और भारत की चौथी मूक फिल्म ‘मर्डर ऑफ नारायणराव पेशवा’ नामक ऐतिहासिक फिल्म का निर्माण किया। 6000 फीट लम्बाई की इस ऐतिहासिक फिल्म में जी. रानाडे, डी. जोशी और के.जी. गोखले मुख्य भूमिकाओं में थे। पाटनकर ने अपनी इस कम्पनी से दो फिल्मों का निर्माण करने के बाद 1917 में कम्पनी का नाम बदल कर ‘पाटनकर फ्रेंड्स ऐंड कम्पनी’ रख दिया।

मूक फिल्मों के निर्माण की श्रृंखला 1916 में जारी रही। इस वर्ष एक ही फिल्म ‘कीचक वध’ बनी, किन्तु यह बम्बई या नासिक में नहीं, बल्कि तत्कालीन मद्रास में बनी थी। वेल्लोर के रहने वाले आर. नटराजा मुदालियर ने ब्रिटिश कैमरामैन स्टीवर्ट से प्रशिक्षण लेकर मद्रास में ‘इण्डियन फिल्म कम्पनी’ स्थापित की और फिल्म ‘कीचक वध’ का निर्माण किया। 6000 फीट लम्बाई की यह फिल्म महाभारत के अज्ञातवास से सम्बन्धित एक प्रसंग पर आधारित थी। फिल्म का निर्देशन स्वयं आर. नटराजा मुदालियर ने किया था और मुख्य अभिनेता थे, राजा मुदालियर तथा जीवरत्नम। इस फिल्म ने भारतीय फिल्म निर्माण के क्षेत्र का विस्तार दक्षिण भारत में किया।

सवाक युग के धरोहर : पहली महिला संगीतकार कौन?

जद्दनबाई
ह 1934 का साल था जिसने पहली महिला संगीतकार देखा। इशरत सुल्ताना ने ‘अदले जहाँगीर’ में संगीत देकर यह ख़िताब अपने नाम कर लिया। लेकिन अफ़सोस की बात है कि इस फ़िल्म के गीतों को रेकॉर्ड नहीं किया गया था, और अब इस फ़िल्म की प्रिण्ट मिल पाना भी असम्भव ही है। वैसे प्रथम महिला संगीतकार कौन हैं, इस बात में कुछ संशय है। पहली महिला संगीतकार के रूप में आज हर जगह सरस्वती देवी का नाम सुनाई देता है, जिन्होंने 1935 में फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ में संगीत दिया था, पर साथ ही साथ यह सवाल भी तर्कसंगत है कि क्या सरस्वती देवी को ही भारत की पहली महिला संगीतकार कहा जाना चाहिए? इशरत सुलताना का ज़िक्र हम कर चुके हैं, साथ ही मुनीरबाई और जद्दनबाई ने भी संगीत तो दिया पर फ़िल्मों में नहीं। आगे चलकर जद्दनबाई ने 1935 की एक फ़िल्म 'तलाश-ए-हक़' में संगीत तो दिया पर वो गाने रेकॉर्ड पर नहीं उतर सके। रेकॉर्ड पर न उतर पाने की वजह से ज़्यादा लोगों को इनके गीत सुनने को नहीं मिले, और इनकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया। सरस्वती देवी वह प्रथम संगीतकार थीं जिनके गीत न केवल रेकॉर्ड हुए बल्कि एक चर्चित बैनर 'बॉम्बे टाकीज़' के साथ जुड़ने और फ़िल्मों के चलने से वो मशहूर हो गईं और जनता और इतिहास ने उन्हें ही प्रथम महिला संगीतकार होने का गौरव प्रदान कर दिया।

फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ का दृश्य 
1934 में हिमांशु राय व देविका रानी द्वारा गठित ‘बॉम्बे टाकीज़’ 1935 में अपनी पहली फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ के साथ उपस्थित हुई। यह एक मर्डर-मिस्ट्री थी। बोराल, मल्लिक, तिमिर बरन न्यू थिएटर्स में थे। उधर प्रभात में गोविन्दराव और केशवराव भोले जैसे संगीतकार थे। इन दिग्गजों से टक्कर लेने के लिए और ‘बॉम्बे टाकीज़’ के गीत-संगीत में अलग पहचान लाने के लिए हिमांशु राय को तलाश थी एक नए संगीतकार की। उनकी यह खोज उन्हें ले आई सरस्वती देवी के पास, जो बनीं भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार। उनका असली नाम था ख़ुर्शीद मिनोचर होमजी, जिनका जन्म एक पारसी परिवार में हुआ था। संगीत के प्रति लगाव को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें संगीत सीखने की अनुमति दी और वो विष्णु नारायण भातखण्डे की शिष्या बन गईं। मैट्रिक पास करने के बाद लखनऊ के प्रसिद्ध मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से शिक्षा प्राप्त की और वहीं अध्यापन भी किया। 1927 में रेडिओ की शुरुआत के बाद बम्बई में अपनी बहनों के साथ ‘होमजी सिस्टर्स’ के नाम से अपनी ऑरकेस्ट्रा पार्टी बनाई जो काफ़ी लोकप्रिय बन गई।

सरस्वती देवी
1933-34 में वो बम्बई में किसी जलसे में गाने गई थीं जहाँ पर हिमांशु राय से उनकी मुलाक़ात हुई। राय ने उन्हें ‘बॉम्बे टाकीज़’ में संगीतकार बनने और उनकी बहन माणिक को अभिनय और गायन करने का निमंत्रण दिया। कुछ हिचकिचाहट के बाद दोनों बहने राज़ी तो हो गईं, पर पारसी समाज ने इसका विरोध किया क्योंकि पारसी महिलाओं का फ़िल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। इस विरोध के चलते हिमांशु राय ने ही दोनों बहनों का नाम बदल कर एक को सरस्वती देवी तो दूसरी को चन्द्रप्रभा बना दिया। सरस्वती देवी को शुरु में देविका रानी को संगीत सिखाने का काम सौंपा गया, और इसी दौरान वो ‘जवानी की हवा’ के लिए भी धुने बनाने लगीं। फ़िल्म के गीत तैयार होने पर देविका रानी, चन्द्रप्रभा और नजमुल हसन से गवाये गये। केवल नाम बदलने से दोनों बहनों की मुसीबत नहीं टली। पारसी समाज के लोगों ने इनके ख़िलाफ़ मोर्चा निकाल कर इस फ़िल्म के प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की। पुलिस फ़ोर्स की निगरानी में इम्पीरियल सिनेमा में फ़िल्म को रिलीज़ किया गया। इस तरह के विरोध के मद्देनज़र ‘बॉम्बे टाकीज़’ के ‘बोर्ड ऑफ़ डिरेक्टर्स’ के चार सदस्य, जो पारसी थे, इन बहनों को कम्पनी से अलग कर देने का सुझाव दिया, पर हिमांशु राय अपने फ़ैसले में अटल थे। बहरहाल ‘जवानी की हवा’ के गाने लिखे थे जमुनास्वरूप कश्यप ‘नातवाँ’, बड़े आग़ा, नजमुल हुसैन और डी. के. मेहता ने। गीतों में आवाज़ें थीं देविका रानी, नजमुल हुसैन, मिस रिख मसीह और कश्यप की।

और अब हम आपको सरस्वती देवी का संगीतबद्ध और उन्हीं का गाया एक गीत सुनवाते हैं। गीत के बोल हैं- “कित गए हो खेवनहार...”। यह गीत फिल्म ‘अछूत कन्या’ में पर्दे पर उनकी बहन चन्द्रप्रभा पर फ़िल्माया जाना था। लेकिन शूटिंग के दिन चन्द्रप्रभा के गले में ख़राश आ गई और वो गाने की स्थिति में नहीं थीं। ऐसे में अपनी छोटी बहन के लिए सरस्वती देवी ने गीत को गाया जिस पर चन्द्रप्रभा ने केवल होंठ ही हिलाये।

फिल्म अछूत कन्या : “कित गए हो खेवनहार...” : सरस्वती देवी 




सरस्वती देवी का गाया और संगीतबद्ध किया एक और गीत सुनिए। इसे हमने 1936 की ही फिल्म ‘जन्मभूमि’ से लिया है।

फिल्म जन्मभूमि : “दुनिया कहती मुझको पागल... : सरस्वती देवी 



 इसी गीत के साथ आज हम ‘भूली-बिसरी यादें’ के इस अंक को यहीं विराम देते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का दूसरा गुरुवार होगा। इस दिन हम प्रस्तुत करेंगे एक बेहद रोचक संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 30 नवम्बर, 2012 है।

Sunday, October 21, 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – ४

     
स्वरगोष्ठी – ९३ में आज
रसूलन बाई, जद्दन बाई और मन्ना डे के स्वरों में एक ठुमरी

‘फूलगेंदवा न मारो लगत करेजवा में चोट...’


‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की चौथी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे पूरब अंग की एक विख्यात ठुमरी गायिका रसूलन बाई और जद्दन बाई के व्यक्तित्व पर और उन्हीं की गायी एक अत्यन्त प्रसिद्ध ठुमरी- ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट...’ पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस ठुमरी के फिल्मी प्रयोग पर भी आपसे चर्चा करेंगे।



बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पूरब अंग की ठुमरी गायिकाओं में विदुषी रसूलन बाई का नाम शीर्ष पर था। पूरब अंग की उप-शास्त्रीय गायकी- ठुमरी, दादरा, होरी, चैती, कजरी आदि शैलियों की अविस्मरणीय गायिका रसूलन बाई बनारस के निकट स्थित कछवा बाज़ार (वर्तमान मीरजापुर ज़िला) की रहने वाली थीं और उनकी संगीत शिक्षा बनारस (अब वाराणसी) में हुई थी। संगीत का संस्कार इन्हें अपनी नानी से विरासत में मिला था। रसूलन बाई के संगीत को निखारने में उस्ताद आशिक खाँ, नज्जू मियाँ और टप्पा गायकी के अन्वेषक मियाँ शोरी के खानदान के शम्मू खाँ का बहुत बड़ा योगदान था| पूरब अंग की भावभीनी गायकी की चैनदारी, बोल बनाव के लहजे, कहन के खास ढंग और ठहराव, यह सारे गुण रसूलन बाई की गायकी में था। टप्पा तो जैसे रसूलन बाई के लिए ही बना था। बारीक मुरकियाँ और मोतियों की लड़ियों जैसी तानों पर उन्हें कमाल हासिल था। उप-शास्त्रीय संगीत की आजीवन साधनारत रहने वाली इस स्वरसाधिका को खयाल गायन पर भी कमाल का अधिकार प्राप्त था, परन्तु उन्होने स्वयं को उप-शास्त्रीय शैलियों तक ही सीमित रखा और इन्हीं शैलियों दक्षता पाई। ग्रामोफोन कम्पनी ने रसूलन बाई के अनेक लोकप्रिय रिकार्ड बनाए। १९३५ में उनकी गायी ठुमरी- ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट...’ उनके सर्वाधिक लोकप्रिय रिकार्ड में से एक है। आइए, रसूलन बाई के स्वर में यह ठुमरी सुनते हैं-

ठुमरी भैरवी : ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट...’ : रसूलन बाई



भैरवी की इस ठुमरी को उस दौर की अन्य गायिकाओं ने भी स्वर दिया था। इन्हीं में एक थीं, गायिका जद्दन बाई। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध की ठुमरी गायिकाओं में जद्दन बाई का भी एक चर्चित नाम था। पूरब अंग की ठुमरी के अलावा गजल गायकी में कुशल जद्दन बाई के जन्म-वर्ष के बारे में मतभेद है। कुछ लोग उनका जन्म १८९२ में तो कुछ १९०८ में मानते हैं। उनका जन्म तो इलाहाबाद में हुआ था, परन्तु संगीत की शिक्षा कलकत्ता में ठुमरी के बादशाह भैया गणपत राव की देख-रेख में आरम्भ हुई। यह सिलसिला अधिक समय तक नहीं चला। भैया गणपत राव का १९१९ में निधन हो गया। इसके बाद जद्दन बाई की संगीत शिक्षा उस्ताद मोइनुद्दीन खाँ से प्राप्त हुई। कोलम्बिया ग्रामोफोन कम्पनी द्वारा बनाए उनके गज़लों के रिकार्ड बेहद लोकप्रिय हुए थे। १९३३ से जद्दन बाई फिल्मों में अभिनय, संगीत और निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय रहीं। सुप्रसिद्ध अभिनेत्री नरगिस, जद्दन बाई की ही पुत्री थीं। अब हम आपको जद्दन बाई की आवाज़ में भैरवी की यही ठुमरी सुनवाते हैं।

ठुमरी भैरवी : ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट...’ : जद्दन बाई



इसी परम्परागत ठुमरी को १९६४ में प्रदर्शित फिल्म ‘दूज का चाँद’ में संगीतकार रोशन ने शामिल किया था, जिसे बहुआयामी गायक मन्ना डे ने अपने स्वरों से एक अलग रंग दिया था। दरअसल संगीतकार रोशन की संगीत शिक्षा लखनऊ के तत्कालीन मैरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में हुई थी। वे तत्कालीन प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के प्रिय शिष्यों में रहे। लखनऊ में रह कर रोशन ने पूरब अंग की ठुमरियों का गहराई से अध्ययन किया था। फिल्म ‘दूज का चाँद’ के निर्देशक नितिन बोस एक हास्य प्रसंग में ठुमरी का प्रयोग करना चाहते थे। मूल ठुमरी श्रृंगार रस प्रधान है, किन्तु मन्ना डे ने अपने बोल बनाव के कौशल से इसे कैसे हास्यरस में अभिमंत्रित कर दिया है, इसका सहज अनुभव आपको ठुमरी सुन कर हो सकेगा। यह ठुमरी हास्य अभिनेता आगा पर फिल्माया गया है। फिल्म के इस दृश्य में आगा अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिए गीत के बोल पर ओंठ चलाते हैं और उनके दो साथी पेड़ के पीछे छिप कर इस ठुमरी का रिकार्ड बजाते हैं। बीच में दो बार रिकार्ड पर सुई अटकती भी है। इन क्षणों में मन्ना डे के गायन कौशल का परिचय मिलता है। सुनिए, इस परम्परागत ठुमरी का फिल्मी संस्करण और इसी के साथ आज के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।

फिल्म – दूज का चाँद : ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट...’ : मन्ना डे



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ पर आज की संगीत पहेली में एक बार फिर हम आपको एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। 


१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?
२ – यह पारम्परिक ठुमरी एक बेहद चर्चित फिल्म में भी शामिल किया गया था। क्या आप उस फिल्मी गीत की पार्श्वगायिका का नाम बता सकते है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९५वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ९१वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की आवाज़ में एक दादरा का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और तीसरे का सही उत्तर है- मन्ना डे। तीनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। जौनपुर, उत्तरप्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दो प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम आपसे हम एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी पर चर्चा करेंगे। आपके सम्मुख हम बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक काल से लेकर आधुनिक काल तक की अवधि में ठुमरी गायकी में आए बदलाव को भी रेखांकित करेंगे। आपकी स्मृतियों में यदि किसी मूर्धन्य कलासाधक की ऐसी कोई पारम्परिक ठुमरी या दादरा रचना हो जिसे किसी भारतीय फिल्म में भी शामिल किया गया हो तो हमें अवश्य लिखें। आपके सुझाव और सहयोग से इस स्तम्भ को अधिक सुरुचिपूर्ण रूप दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप अवश्य पधारिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र 

 
'मैंने देखी पहली फिल्म' : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।




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