Showing posts with label varshik geetmaala. Show all posts
Showing posts with label varshik geetmaala. Show all posts

Sunday, January 4, 2009

"हौले हौले" से "जय हो"...- सुखविंदर सिंह का जलवा

सुनिए गोल्डन ग्लोब के लिए नामांकित फ़िल्म स्लमडोग मिलनिअर का जबरदस्त गीत "जय हो..."

आवाज़ के टीम और श्रोताओं ने मिल कर जिस गीत को साल २००८ का सरताज गीत चुना वो है फ़िल्म "रब ने बना दी जोड़ी" का "हौले हौले..." . हौले हौले से जादू बिखेरने वाले इस गीत को गाया है "छैयां छैयां" से रातों रातों सुपर सिंगर बने सुखविंदर सिंह ने. तब से अब तक हर साल सुखविंदर अपने किसी न किसी गीत के माध्यम से टॉप सूची में रहते ही हैं. जहाँ इसी साल फ़िल्म टशन में उनका गाया "दिल हारा रे..." भी हमारी सूची में अपनी जगह बनने में कामियाब रहा वही बीते सालों पर नज़र डालें तो "दर्द-ऐ-डिस्को", "चक दे इंडिया" और ओमकारा के शीर्षक गीत के अलावा इसी फ़िल्म का "बीडी जलाई ले" खासा लोकप्रिय हुआ था. पर कई मायनों में अगर हम देखें तो "हौले हौले" उनकी परिचित शैली से बिल्कुल अलग तरह का गीत है और पहली बार सुनने पर यकीं ही नही होता कि ये वाकई सुखविंदर का गीत है.


और अब हॉलीवुड के सबसे बड़े निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म के लिए भी वो गा रहे हैं. ख़ुद सुखविंदर के शब्दों में "स्टीवन स्पीलबर्ग की टीम ने मुझसे संपर्क किया और ये गीत गाने की गुजारिश की, ये एक पारंपरिक लोक गीत है जो कच्छ गुजरात की मिटटी का है और ये गीत जीवन के उत्सव की बात करता है, वैसे मेरा हॉलीवुड कनेक्शन तो "स्लमडोग मिलनिअर" से ही शुरू हो चुका था जहाँ मैंने रहमान जी का स्वरबद्ध किया और गुलज़ार जी का लिखा "जय हो" गीत गाया था. ये गीत मेरा ख़ुद का बहुत पसंदीदा है, मैं जब भी इसे सुनता हूँ, मुस्कुराने लगता हूँ..."

गौरतलब है कि रहमान को इसी फ़िल्म के लिए गोल्डन ग्लोब का नामांकन मिला है. रहमान के बारे में सुखविंदर कहते हैं -"वो एक जीनिअस हैं जिन्होंने भारतीय संगीत को विश्व मंच दिया है. स्वभाव से भी वो बहुत शांत और जमीन से जुड़े हुए इंसान हैं, उन्हें कविता से प्रेम है और वह शख्स संगीत खाता है संगीत पीता है और संगीत से ही साँस लेता है, उनके रोम रोम में संगीत है और उनके जेहन में दिन रात बस संगीत का जनून छाया रहता है..."

बहरहाल इस नए साल में हम सब तो यही चाहेंगें कि रहमान साहब अपनी इस फ़िल्म के लिए गोल्डन ग्लोब जीते. ये भारतीय संगीत के लिए एक बड़ी घटना होगी. सुखविंदर भी इस साल अपने नए गीतों से हम सब को चकित करते रहें. आने वाली फ़िल्म "बिल्लू बार्बर" में उनके गाये गीत श्रोता जल्दी ही सुनेंगें, फिलहाल हम आपको सुनवाते हैं, गोल्डन ग्लोब के लिए नामांकित फ़िल्म "स्लमडोग मिलनिअर" से सुखविंदर का गाया गीत "जय हो...". कहते हैं जीनिअस के काम पहली बार में कम समझ आता है, पर हमारे शब्दों पर यकीन करें इस गीत को धैर्य के साथ ४-५ बार सुनें और अगर इसका जादू आपके सर चढ़ कर न बोले तो कहियेगा. तो सुनिए और दुआ कीजिये कि "जय हो" हमारे संगीत कर्णधारों की विश्व मंच पर भी.



Thursday, January 1, 2009

वार्षिक गीतमाला (पायदान २० से ११ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या २० से ११ तक

पिछले अंक में हम आपको ३०वीं पायदान से २१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

२० वीं पायदान - पिछले सात दिनों में(रॉक ऑन)

रॉक ऑन उन चुंनिदा फिल्मों में से एक है,जिसमें धुन तैयार होने से पहले गीतकार ने अपने गीत लिखे और फिर संगीतकार ने संगीत पर माथापच्ची की है, अमूमन इसका उल्टा होता है। गीत के बोल लीक से हटकर हैं। गाने की पहली पंक्ति हीं इस बात को पुख्ता करती है(मेरी लांड्री का एक बिल)। "दिल चाहता है","लक्ष्य", "डान" जैसी फिल्में बना चुके फरहान अख्तर ने इस फिल्म के जरिये अपने एक्टिंग कैरियर की शुरूआत की है। "अर्जुन रामपाल" को छोड़कर इस फिल्म में फिल्म-जगत का कोई भी नामी कलाकार न था,फिर भी "राक आन" बाक्स-आफिस पर अपना परचम लहराने में सफल हुई। इस फिल्म के सारे गीतों में संगीत दिया है शंकर-अहसान-लाय की तिकड़ी ने तो बोल लिखे हैं फरहान के पिता और जानेमाने लेखक एवं शायर जावेद अख्तर ने। इस गाने को गाया है खुद फरहान ने।



१९ वीं पायदान - खुदा जाने(बचना ऎ हसीनों)

यूँ तो इस फिल्म में रणबीर-दीपिका के सारे दृश्य सिडनी में फिल्माये गये हैं,लेकिन इस गाने की शुटिंग इटली के विशेष एवं चुने हुए लोकेशन्स पर की गई है। मनमोहक सीनरी के मोहपाश में बंधी दीपिका खुद इस बात का बखान करती नहीं थकती। अनविता दत्त गुप्तन की लेखनी का जादू भी कमाल का है और उस पर से विशाल-शेखर के संगीत का तिलिस्म। लेकिन इस गाने की खासियत और प्रमुख यु०एस०पी० है के०के० की आवाज। ऊपर के सुरों पर के०के० की आवाज नहीं फटती,जो अमूमन बाकी गायकॊं के साथ होता है।"एक लौ" फेम शिल्पा राव ने इस गाने में के०के० का बखूबी साथ दिया है।


१८ वीं पायदान - तू राजा की राजदुलारी(ओए लकी लकी ओए)

जबर्दस्त एवं अप्रत्याशित पब्लिक वोटिंग ने इस गाने को १८वीं पायदान पर पहुँचाया है। राजबीर की आवाज अलग ढर्रे की है,इसलिए कहा नहीं जा सकता कि किसे पसंद आ जाए या फिर कौन नापसंद कर जाए। मंगे राम ने इसके बोल लिखे हैं तो संगीत स्नेहा खनवल्कर का है। इस गीत को अभय देओल एवं नीतु चंद्रा पर बेहतरीन तरीके से फिल्माया गया है।


१७ वीं पायदान - फ़लक तक चल(टशन)

इस गाने के साथ उदित नारायण बहुत दिनों बाद सेल्युलायड पर नज़र आए। वैसे दिल को छूते बोल और मधुर संगीत से सजे गानों के लिए उदित नारायण परफेक्ट च्वाइस हैं। इस गाने में उनका साथ दिया है चुपचुप के(बंटी और बब्ली) और बोल न हल्के-हल्के(झूम बराबर झूम) फेम महालक्ष्मी अय्यर ने। अक्षय और करीना पर फिल्माया गया यह गीत निस्संदेह "टशन" का सबसे यादगार गीत है। इस गाने के बोल लिखे हैं कौसर मुनीर ने तो संगीत से सजाया है विशाल-शेखर की जोड़ी ने।


१६ वीं पायदान - पप्पू कान्ट डांस(जाने तू या जाने ना)

"लव के लिए साला कुछ भी करेगा" लिखकर फिल्म-इंडस्ट्री में प्रसिद्ध हुए अब्बास टायरवाला "पप्पू कान्ट डांस" से अपनी पुरानी शैली को दुहराते प्रतीत होते हैं। गाने के बोल कालेज जाने वाली जनता को आकर्षित करने में सफल है और गाने की तर्ज पार्टियों में लोगों को थिरकने पर मजबूर करती है।गाने में अंग्रेजी की पंक्तियाँ ब्लेज़ की हैं तो संगीत ए०आर०रहमान का है ।इस गाने को सात गायकों -अनुपमा देशपांडे, बेनी दयाल, ब्लेज़, दर्शना, मोहम्मद असलम (अजीम-ओ-शान शहंशाह फेम), सतीश सुब्रमन्यम एवं तन्वी, ने अपनी आवाजें दी है ।


१५ वीं पायदान - हाँ तू है(जन्नत)

इस गाने की भी सफलता का मुख्य श्रेय के०के० को जाता है। इस गाने में नब्बे की दशक के नदीम-श्रवण की धुनों की हल्की-सी छाप दीखती है। प्रीतम का संगीत इस गाने को रिवाइंड करके सुनने को बाध्य करता है। गाने के बोल लिखे हैं सईद कादरी ने। वैसे भट्ट कैंप के बारे में यह प्रचलित है कि फिल्म कैसी भी हो, फिल्म के गाने दर्शनीय एवं श्रवणीय जरूर होते हैं। पर्दे पर इमरान हाशमी एवं सोनल चौहान की मौजूदगी इस गाने को दर्शनीय बनाने में कहीं से भी कमजोर साबित नहीं होती।


१४ वीं पायदान - सोचा है(रॉक ऑन)

आसमां है नीला क्यों,पानी गीला-गीला क्यों, सरहद पर है जंग क्यों, बहता लाल रंग क्यॊं....... ऎसे प्रश्न लेकर जावेद अख्तर पहले भी कई बार आ चुके हैं। इस बार अलग यह है कि इन बातों की नैया की पतवार थामी है रौक म्युजिक ने। "राक आन" के आठ गानों में से पाँच गानॊं में पार्श्व गायन किया है स्वयं नायक फरहान ने। इस गाने में भी फरहान अख्तर की हीं आवाज़ है और रौक धुन से सजाया है शंकर-अहसान-लाय ने। वाकई फरहान अख्तर, अर्जुन रामपाल, ल्युक केनी और पूरब कोहली की रौक बैंड "मैजिक" का मैजिक बाक्स-आफिस के सर चढकर बोलता दिखा।


१३ वीं पायदान - ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा(जोधा-अकबर)

जोधा-अकबर फिल्म के लेखक "हैदर अली" चाहते थे कि इस फिल्म में उनकी कैमियो इंट्री हो,लेकिन माकूल रोल नहीं मिल रहा था। तभी फिल्म के निर्देशक "आशुतोष गोवारिकर" ने सुझाया कि "ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा" गाने में जो दरवेशों की टोली आती है,उसमें "हैदर अली" सबसे आगे रह सकते हैं और पूरा का पूरा गाना उन्हीं पर फिल्माया जा सकता है। विचार अच्छा लगा और ए०आर०रहमान की आवाज़ को "हैदर अली" का शरीर मिल गया। यह तो थी इस गाने के फिल्मांकन के पीछे की कहानी, अब बात करें गाने की तो गाने का संगीत दिया है "मोज़ार्ट आफ मद्रास" ए०आर०रहमान ने एवं बोल लिखे हैं जावेद अख्तर ने। यह गाना ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और हज़रत निजामुद्दीन औलिया को समर्पित है। "तेरे दरबार में ख़्वाजा , सर झुकाते हैं औलिया...चाहने से तुझको ख़्वाजा जी मुस्तफ़ा को है चाहा......."


१२ वीं पायदान - तुझमें रब दीखता है(रब ने बना दी जोड़ी)

शायद हीं कोई संगीत-प्रेमी होगा, जिसने फिल्म "अनवर" का गीत "आँखें तेरी" न सुना हो और जिसे यह गीत पसंद न हो। "रूप कुमार राठौर" की आवाज़ का यही असर है, जो आसानी से नहीं उतरता। फिल्म "वीर-ज़ारा" के "तेरे लिए" में लता मंगेशकर के साथ रूप कुमार राठौर की जुगलबंदी को कौन भुला सकता है। हाल में हीं प्रदर्शित हुई "रब ने बना दी जोड़ी" का यह गाना भी इसी खासियत के कारण चर्चा में है। वैसे इस गाने की प्रसिद्धि में एक बड़ा हाथ सलीम-सुलेमान के रूहानी संगीत और जयदीप साहनी( चख दे इंडिया फेम) के सरल एवं सुलझे हुए शब्दों का भी है। इस गाने का फिल्मांकन भी बड़ी हीं खूबसूरती से किया गया है।


११ वीं पायदान - कहने को जश्ने-बहारां है(जोधा-अकबर)

एक बार फिर ए०आर०रहमान। "कहने को जश्ने-बहारां है" सुनने वालों को सोनू निगम की आवाज़ का संदेह होना लाज़िमी है। दर-असल "जावेद अली" की आवाज़ सोनू निगम से बहुत हद तक मिलती है और इसी कारण जल्द हीं असर करती है। फिल्म-इंडस्ट्री में आए हुए जावेद अली के सात साल हो गए,लेकिन पहचान तब मिली जब उन्होंने "नक़ाब" का "एक दिन तेरी राहों में" गाया। फिर तो उनके खाते में कई सारे गाने जमा होते गए। "कहने को जश्ने-बहारां है" को अपने संगीत से सजाया है ए०आर०रहमान ने और बोल लिखे हैं जावेद अख्तर ने। नायक के दिल के दर्द और नायिका से दूरी को बेहतरीन तरीके से इस गाने में दर्शाया गया है। वाकई मुगलकालीन उर्दू का अंदाज-ए-बयाँ है कुछ और....।



साल २००८ के सर्वश्रेष्ठ १० गाने लेकर हम जल्द हीं हाज़िर होंगे। तब तक इन गानों का आनंद लीजिए।



चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

आप अपनी पसंद यहाँ टिपण्णी कर दे सकते हैं या फ़िर मेल करें podcast.hindyugm@gmail.com पर

Wednesday, December 31, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ३० से २१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ३० से २१ तक

पिछले अंक में हम आपको ४०वीं पायदान से ३१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

३० वीं पायदान - मेरी माटी (रामचंद पाकिस्तानी)

पाकिस्तान के जानेमाने निर्देशक महरीन जब्बार ,जिन्होंने पहचान, कहानियाँ, पुतली घर जैसे नामचीन टीवी धारावाहिकों एवं नाटकों का निर्देशन किया है, "रामचंद पाकिस्तानी" लेकर फिल्म-इंडस्ट्री में उपस्थित हुए हैं। यह फिल्म अपने अनोखे नाम के कारण दर्शकों को आकर्षित करती है। नगरपरकर गाँव में रहने वाली "चंपा"(नंदिता दास द्वारा अभिनीत) की जिंदगी में तब उथलपुथल मच जाता है,जब उसका पति एवं उसका लड़का "रामचंद" अनजाने हीं सरहद पारकर भारत आ जाता है और भारतीय फौज उन्हें घुसपैठिया मान लेती है। यह फिल्म उसी चंपा की दास्तान है। देबज्योति मिश्रा द्वारा संगीतबद्ध एवं अनवर मक़सूद द्वारा लिखित "मेरी माटी" गायकों (शुभा मुद्गल एवं शफ़क़त अमानत अली) की अनोखी जुगलबंदी के कारण श्रोताओं पर असर करने में कामयाब साबित होती है।



२९ वीं पायदान - बंदया(खुदा के लिए)

यूँ तो बुल्ले शाह की नज़्में साढे तीन सदियाँ पुरानी हैं,लेकिन उनकी नज़्मों का नूर अब भी ताज़ातरीन है। नब्बे की दशक में पाकिस्तानी रौक बैंड "जुनून" ने पहली मर्तबा बुल्ले शाह की नज़्मों को युवाओं के दरम्यान मौजूद कराया था,उसके बाद उनके कलामों पर सबसे ज्यादा काम "रब्बी शेरगिल" ने किया है। "बुल्ला की जाना" इसका जबर्दस्त उदाहरण है। "खुदा के लिए" का "बंदया" भी इसी कड़ी का एक अनमोल मोती है। इस गाने को अपने संगीत से संवारा है खवर जावेद ने तो अपनी गलाकारी से सजाया है खवर जावेद एवं फराह ज़ाला ने।


२८ वीं पायदान - जी करदा(सिंह इज किंग)

आलोचकों की मानें तो प्रीतम ने धुन की चोरी में अन्नु मल्लिक एवं बप्पी लहरी को अगर पीछे नहीं छोड़ा है तो बराबरी तो कर हीं ली है और अगर जनता की माने तो प्रीतम की धुन सबके दिलॊ को अपनी-सी लगती है। इसी उहाफोह के बीच का गीत है "जी करदा"। धुन कितनी मौलिक है,यह तो पता नहीं,लेकिन इसके सूत्रों का अब तक पता नहीं चला है और इसी कारण यह गीत हमारे गीतमाला में शामिल है। "सिंह इज किंग" यूँ तो हाँगकाँग की एक फिल्म "जी जी" की सर से पाँव तक नकल है ,लेकिन अक्षय कुमार की बिंदास अदायगी ने इसे इस साल की दूसरी सबसे बड़ी व्यावसायिक फिल्म बना दिया है। रही बात गाने की तो इस गाने के बोल लिखे हैं मयूर पुरी ने और इसे अपनी आवाज़ दी है लभ जंजुआ (सोणी दे नखरे, प्यार करके पछताया फेम) एवं सुज़ी ने।


२७ वीं पायदान -सीता राम सीता राम(वेलकम टू सज्जनपुर)

समानांतर-सिनेमा के बेताज बादशाह श्याम बेनेगल की पहली हल्की-फुल्की एवं पूर्णतया व्यावसायिक फिल्म "वेलकम टू सज्जनपुर" आशा के अनुरूप दर्शकों को गुदगुदाने में सफल साबित होती है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे - श्रेयस तालपडे एवं अमृता राव, लेकिन अपनी अदायगी से सबसे ज्यादा प्रभावित किया रवि झंकल ने। इस फिल्म में सामाजिक असामानता एवं राजनीतिक तनावों को हास्य का पुट देकर प्रस्तुत किया गया है एवं हँसाकर हीं सही फिल्म असर तो कर हीं जाती हई। "लगे रहो मुन्नाभाई","खोया खोया चाँद" एवं "लागा चुनरी में दाग" के बाद संगीतकार शांतनु मोइत्रा एवं गीतकार स्वानंद किरकिरे की जोड़ी एक बार फिर अपना कमाल दिखाती है। कृष्ण कुमार की आवाज झूमने पर मजबूर करती है।


२६ वीं पायदान -मम्मा(दसविदानिया)

दिल को छूता कैलाश, नरेश और परेश का संगीत एवं कैलाश के बोल किसी भी संवेदनशील इंसान को रूलाने के लिए काफी है। कैलाश की आवाज एक झटके में असर करती है। इस गाने का फिल्मांकन विनय पाठक, गौरव गेरा एवं सरिता जोशी पर किया गया है और जिस तरह से इन कलाकारों ने अपने इमोशन एक्सप्रेस किए हैं, देखकर हृदय रोमांचित हो जाता है। हैट्स आफ टू कैलाश एंड विनय पाठक..........


२५ वीं पायदान -दिल हारा(टशन)

यूँ तो टशन इस साल की सबसे बड़ी फ्लाप फिल्मों से एक है और आलोचकॊं की मानें तो यश राज फिल्म्स के लिए एक धब्बा है,लेकिन विशाल-शेखर का संगीत डूबते के लिए तिनका साबित होता है। यह साल विशाल-शेखर के लिए बहुत हीं सफल रहा है। "दिल से" एवं "मक़बूल" जैसे फिल्मॊं में अदायगी कर चुके एवं "लीजेंड और भगत सिंह" के पटकथा-लेखक "पियुष मिश्रा" ने इस फिल्म के गीत लिखे हैं। रही बात इस गाने की तो "छप्पन तारे तोर नाच लूँ" की स्वरलहरियाँ जैसे हीं हवाओं में उतरती है, "सुखविंदर" के अज़ीम-ओ-शान आगमन का अंदाजा हो जाता है।


२४ वीं पायदान -मन मोहना(जोधा अकबर)

कुछ सालों पहले जी०टी०वी० के "सा रे गा मा" में (जब सोनु निगम उद्घोषक हुआ करते थे) बेला शिंदे ने अपनी गायिकी से सबको मोहित किया था और विजेता भी हुई थी। लेकिन उसके बाद बेला शिंदे कुछ खास नहीं कर पाई। इस साल आई
"जोधा अकबर" से इस गायिका ने अपनी वापसी की है। "मन मोहना" यूँ तो एक भजन है,लेकिन जिस खूबी से जावेद अख्तर ने इसे लिखा है, निस्संदेह हीं नास्तिकों पर भी असर करने में यह समर्थ है। इस गाने से ए०आर०रहमान अपने रेंज का अनूठापन दर्शाते हैं।


२३ वीं पायदान -कभी कभी अदिति(जाने तू या जाने ना)

मीठी-सी पतली आवाज़ सुनकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि इस गाने को किसी २०-२२ साल के युवा ने आवाज़ नहीं दी,बल्कि ४२ साल के युवा(?) की मैच्युर आवाज़ है। जी हाँ, मैं रहमान की नई खोज राशिद अली की बात कर रहा हूँ। रहमान से राशिद अली की मुलाकात लगभग छह साल पहले हुई थी, बड़ी ही कैजुअल मुलाकात थी वह। इसके बाद रहमान के ट्रुप में राशिद गिटारिस्ट के तौर पर शामिल हो गए और "बाम्बे ड्रीम्स" की सफलता के भागीदार बने। यहाँ तक कि "कभी कभी अदिति" का गिटार पीस भी राशिद के म्युजिकल आईडियाज से प्रेरित है। इस गीत के बोल लिखे हैं "आती क्या खंडाला" फेम अब्बास टायरवाला ने।


२२ वीं पायदान -बाखुदा(किस्मत कनेक्शन)

आतिफ असलम(पहली नज़र फेम) की आवाज़ का जादू खुद हीं सर चढकर बोलता है,उस पर अल्का याग्निक की मीठी आवाज का तरका.... माशा-अल्लाह! इस गाने में प्रीतम अपने रंग में नज़र आते हैं। खुदा की गवाही देकर प्यार का इकरार करने की अदा काबिल-ए-तारीफ है, वैसे तो यह काम सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पहले हीं कर चुके हैं "खुदा गवाह" में। इस गीत के बोल लिखे हैं सब्बीर अहमद ने। वैसे तो यह फिल्म बाकस-आफिस पर कुछ खास नहीं कर सकी,लेकिन शाहरूख के बिना पहली मर्तबा अजीज मिर्जा को देखना अलग अनुभव दे गया। शाहिद और विद्या की जोड़ी भी लीक से हटकर लगी।


२१ वीं पायदान -जलवा(फैशन)

सलीम-सुलेमान जब "फैशन" के लिए टाईटल ट्रैक बना रहे थे, तब उन्हें महसूस हुआ कि "फैशन" से राईम करता हुआ (फैशन की तुक में) शब्द खोजना मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है, तभी सलीम ने "जलवा" शब्द सुझाया। वही से आगे बढते हुआ बना "फैशन का है यह जलवा" और यह पंक्ति कमाल कर गई। मज़े की बात यह है कि "फैशन" फिल्म की पूरी कहानी इसी पंक्ति के इर्द-गिर्द घुमती है। इस गाने के बोल लिखे हैं अतिथि गीतकार "संदीप नाथ" ने और अपनी आवाज़ से सुसज्जित किया है सुखविंदर सिंह, सत्या हिंदुजा और रोबर्ट बौब ओमुलो ने। रैंप पर चलती प्रियंका,कंगना,मुग्धा और पृष्ठभूमि में बजता यह गीत रोमांचित कर देता है।



बाकी के गीत लेकर हम जल्द हीं हाज़िर होंगे।

सभी गानों को यहाँ सुनें:


चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

आप अपनी पसंद यहाँ टिपण्णी कर दे सकते हैं या फ़िर मेल करें podcast.hindyugm@gmail.com पर

Tuesday, December 30, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ४० से ३१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ४० से ३१ तक

पिछले अंक में हम आपको ५०वीं पायदान से ४१वीं पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

४० वीं पायदान - आशियाना(फैशन)

४०वें पायदान पर फिल्म "फैशन" का गीत "आशियाना" काबिज़ है। इस गीत के बोल लिखे हैं इरफ़ान सिद्दकी ने और सुरबद्ध किया है सलीम-सुलेमान की जोड़ी ने। इस गीत को सलीम मर्चैंट(सलीम-सुलेमान की जोड़ी से एक) ने अपनी आवाज़ से जीवंत किया है। मधुर भंडारकर की यह फिल्म "फैशन" अपने विषय के साथ-साथ अपने गीतों के कारण भी चर्चा में रही है।



३९ वीं पायदान - अलविदा(दसविदानिया)

कैलाश खेर यूँ तो अपनी आवाज़ और संगीत के कारण संगीत-जगत में मकबूल हैं। लेकिन जो बात बहुत कम लोग जानते हैं, वह यह है कि अमूमन अपने सभी गानों के बोल कैलाश हीं लिखते हैं।अलविदा भी उनकी त्रिमुखी प्रतिभा का साक्षात उदाहरण है। "दसविदानिया" अपनी सीधी-सपाट कहानी, हद में किए गए अभिनय और "कौमन मैन" की छवि वाले नायक के कारण फिल्मी जगत के लिए मील का पत्थर साबित हुई है। जिन्हें "दसविदानिया" का अर्थ न मालूम हो या जिन्होंने जानने की कभी कोशिश न की हो, उन्हें बता दूँ कि "दसविदानिया" एक रसियन वर्ड है,जिसका अर्थ होता है "गुड बाय/अलविदा" ।


३८ वीं पायदान - ओए लकी लकी ओए(ओए लकी लकी ओए)

आजकल हिन्दी फिल्म-उद्योग में पंजाबी गानों की धूम मची हुई है।इसी का असर है कि पिछले साल आई "मौजा हीं मौजा" या फिर इस साल आए "सिंह इज किंग" में अपनी आवाज का लोहा मनवाए हुए मिका सिंह इस गाने में भी अपनी मौजूदगी का अहसास दिला जाते हैं। इस गीत को अपनी धूनों से सजाया है "स्नेहा खनवल्कर" ने, जिन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत राम गोपाल वर्मा के "गो" से की थी। निस्संदेह "गो" का किसी को पता नहीं,लेकिन "ओए लकी लकी ओए" से बालीवुड में स्नेहा की री-इंट्री कई उम्मीदें जगाती है। इस गीत के बोल लिखे हैं निर्देशक दिवाकर बनर्जी( खोसला का घोसला फेम), उर्मी जुवेकर एवं मनु ऋषि ने। तेज धुन की यह गीत झूमने पर मजबूर करती है।


३७ वीं पायदान - मन्नताँ(हीरोज)

यूँ तो "हीरोज" बाक्स-आफिस पर पीट गई,लेकिन फिल्म का यह गीत दर्शकों और श्रोताओं पर असर करने में कामयाब साबित हुआ। इसे सोनू निगम और कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ का जादू कहें , साजिद-वाजिद की स्वर-लहरियों का नशा या फिर जलीस शेरवानी-राहुल सेठ की कलम का हुनर,यह गीत कहीं से भी निराश नहीं करता। इस गाने की सबसे बड़ी खासियत है फिल्म इंडस्ट्री में कविता कृष्णमूर्ति की वापसी।


३६ वीं पायदान - सहेली जैसा सैंया(यू,मी और हम)

बाक्स आफिस के अब तक के रिकार्ड यही बताते हैं कि अजय देवगन ने अभिनय के अलावा जिस भी क्षेत्र में अपने कदम बढायें है, सौदा नुकसानदायक हीं साबित हुआ है, फिर चाहे वो फिल्म-निर्माण हो(राजू चाचा,यू मी और हम) या फिर निर्देशन(यू,मी और हम)। इस फिल्म में अजय देवगन सातवीं बार अपनी पत्नी काजोल के साथ अभिनय करते नज़र आए हैं,लेकिन इस बार "लेडी लक" भी अजय देवगन की नौका पार नहीं करा पाया। रही बात गाने की तो, इस गाने का मूल आकर्षण है "सुनिधि चौहान" की आवाज़। वैसे तो "मुन्ना धीमन" के अनकन्वेंशनल बोल एवं विशाल भारद्वाज का रूमानी संगीत भी बेहतरीन है,लेकिन "सुनिधि" का जादू हीं इस गाने की जान है।


३५ वीं पायदान - नज़रें मिलाना(जाने तू या जाने ना)

ए०आर० रहमान-- नाम हीं काफी है, किसी ने सच हीं कहा है। इस गाने की यू०एस०पी० का पूरा श्रेय ए०आर० रहमान को जाता है। फिल्म-इंडस्ट्री में यह विख्यात है कि जिस खूबी से रहमान गायकों का प्रयोग करते हैं,वैसा कोई भी संगीतकार नहीं कर पाता। इस गाने को सात गायकों ने अपनी आवाज़ दी है- अनुपमा देशपांडे, बेनी दयाल(आवाज़ हूँ मैं(युवराज),कैसे मुझे तू मिल गई(गज़नी) फेम),दर्शना, नरेश अय्यर(पाठशाला,रूबरू फेम), सतीश चक्रवर्ती, श्वेता भार्गवे एवं तन्वी। इस गाने के बोल लिखे हैं, इस फिल्म के लेखक एवं निर्देशक अब्बास टायरवाला ने। यह फिल्म अपनी अप्रत्याशित सफलता के कारण अब्बास टायरवाला के लिए निर्देशक के रूप में ड्रीम डेब्यु साबित हुई है।


३४ वीं पायदान - हा रहम(महफ़ूज़)(आमिर)

साधारण स्टार-कास्ट लेकिन असाधारण कहानी के साथ आई यह फिल्म सबों के दिल को छू गई। ऎसा लगा मानो अपनी हीं कहानी है। टीवी जगत से आए "राजीव खंडेलवाल" ने लाचार लेकिन आत्मविश्वासी "आमिर" के रूप में अपनी अदायगी से अपनी क्षमता का लोहा मनवा दिया। निर्देशन के क्षेत्र में पहली बार उतरे "राज कुमार गुप्ता" ने अपनी हीं कहानी "आमिर" को बड़े पर्दे पर बखूबी उतारा है। अमिताभ वर्मा के बोल और अमित त्रिवेदी के संगीत से सजे "महफ़ूज" में वह सारी बात है जो दिल को छूने के लिए काफ़ी होती है। गायकी में अमित और अमिताभ का साथ दिया है ए०आर०रहमान की खोज मुर्तजा कादिर( चुपके से(साथिया) फेम) ने।


३३ वीं पायदान - अल्लाह अल्लाह(खुदा के लिए)

"खुदा के लिए" एक पाकिस्तानी उर्दू फिल्म है,जिसे अपने लेखन एवं निर्देशन से संवारा है शोएब मंसूर ने।प्रमुख सितारे हैं- पाकिस्तान के सुपर स्टार शान, ईमान अली एवं फवाद खान। यह फिल्म पाकिस्तान की सबसे बड़ी व्यावसायिक फिल्म साबित हुई है।यह फिल्म अपने कंटेंट के कारण विवादों में रही और इस कारण इसके कई दृश्यों पर कैंची चली। इस बदकिस्मती की मार इस फिल्म के सबसे बेहतरीन सीन पर भी पड़ी,जिस कारण दर्शक नसीरूद्दीन शाह की लाजवाब अदायगी का जलवा देखने से वंचित रह गए। "अल्लाह-अल्लाह" गाने की बात करें , तो इसे संगीत से सजाया है खवर जवाद ने और आवाजें दी हैं सईन ज़हूर एवं ज़रा मदानी ने। इस गाने में "अल्लाह-अल्लाह" कहने का तरीका श्रोता को अंदर तक रोमांचित कर देता है।


३२ वीं पायदान - जाने तू मेरा क्या है(जाने तू या जाने ना)

फिर से ए०आर०रहमान एवं अब्बास टायरवाला का जादू। इस साल ए०आर०रहमान ने पाँच फिल्मों का संगीत-निर्माण किया और हर फिल्म के हर गीत का मूड दूजे से जुदा। इस गाने को अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है रूना रिज़वी ने। इस गाने के साथ एक दिलचस्प कहानी जुड़ी है। इस फिल्म के निर्माता आमिर खान, निर्देशक अब्बास टायरवाला एवं आमिर खान के भाई एवं इस फिल्म के निर्देशन-सहयोगी मंसूर खान इस गाने का वीडियो फिल्म में नहीं रखना चाहते थे,इसलिए फिल्म इस गाने के बिना हीं रीलिज की गई। इस बात का जिक्र आमिर ने खुद अपने ब्लाग पर किया है।एक सप्ताह बाद दर्शकों की माँग पर इस गाने को फिल्म में डाला गया। और लोगों की मानें तो इस गाने का पिक्चराईजेशन कमाल का है, काले लिबास में जेनेलिया को देखकर युवाओं की साँसें रूकी की रूकी रह जाती है।


३१ वीं पायदान - बहका(गज़नी)

इस गाने के साथ ए०आर०रहमान ने अलग हीं तरह का प्रयोग किया है,विशेषकर "धक-धक धड़कन" वाली पंक्ति में। चूँकि यह गाना नया है और कहा जाता है कि रहमान का संगीत शराब की तरह धीरे-धीरे चढता है,इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में यह गीत लोगों के सर चढ कर बोलेगा। प्रसून जोशी ने बेहतरीन बोल लिखे हैं। रंग दे बसंती के बाद प्रसून जोशी एवं रहमान की एक साथ यह दूसरी फिल्म है। गुलज़ार, जावेद अख्तर, महबूब जैसे दिग्गजों के साथ काम कर चुके स्वयं रहमान ने इस गाने में प्रसून की पंक्तियों एवं लेखन-कला की बड़ाई की है। इस गाने को अपनी आवाज़ से सजाया है साऊथ के सेनसेशन एवं रहमान के फेवरिट कार्तिक ने।


सभी गानों को यहाँ सुनें:


चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

आप अपनी पसंद यहाँ टिपण्णी कर दे सकते हैं या फ़िर मेल करें podcast.hindyugm@gmail.com पर

Sunday, December 28, 2008

वार्षिक गीतमाला (पायदान ५० से ४१ तक)

वर्ष २००८ के श्रेष्ट ५० फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या ५० से ४१ तक

५० वीं पायदान

नम्बर ५० पर है फ़िल्म "किड्नाप" का दर्द भरा गीत जिसे गाया है संदीप व्यास ने और वही इस गीत की सबसे बड़ी खासियत भी हैं. संगीत भी ख़ुद संदीप और उनके भाई संजीव का बनाया हुआ है, बोल भी ख़ुद संदीप और संजीव ने ही रचे हैं. संजय गाधवी की इस फ़िल्म को दर्शकों का प्यार नही मिला, इस साल के हॉट शॉट हीरो इमरान खान की खलनायकी भी इसे डूबने से नही बचा पायी. पर संगीत प्रेमियों के इस बेहद प्रभाशाली संगीत जोड़ी का काम अनदेखा नही होने दिया. "मिट जाए" मिट कर भी नही मिटा, तभी कोई इसे पचासवीं पायदान से नही पाया हटा.


४९ वीं पायदान

४९ वीं पायदान पर है अज़ीज़ मिर्जा के निर्देशन में बनी रोमांटिक फ़िल्म किस्मत कनेक्शन का गीत "कहीं न लागे मन", पहला नशा की तर्ज पर बने इस गीत में वही सवाल है जो हर नया नया प्रेमी ख़ुद से पूछता है यानी - क्या यही प्यार है. थीम वही पुराना है पर गीत फ़िर भी सुनने में मधुर लगता है. शब्बीर अहमद के बोलों को सुरों से सजाया है प्रीतम ने और आवाजें हैं श्रेया घोसाल और मोहित चौहान की. "डूबा डूबा" से शुरुआत करने वाले मोहित अब इंडस्ट्री में अपने पैर जमा चुके हैं, उनकी आवाज़ में मिठास भी है और मौलिकता भी. "कहीं न लागे मन" ने हासिल किया है ४९ वां स्थान, श्रेया और मोहित की आवाजों ने दिया गीत को नया आसमान...



४८ वीं पायदान

अन्विता दत्त गुप्तन के बोलों को विशाल शेखर ने संगीत से सजाया है और गाया है इसी जोड़ी ने विशाल ददलानी ने अपने अलग अंदाज़ में. दोस्ती और दोस्ताने पर पहले भी हिन्दी फिल्मों में ढेरों गीत लिखे जा चुके है. पर ये पूरी तरह से आज के दौर का गीत है. इसकी मौलिकता ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है. अभिषेक बच्चन, जॉन अब्राहम और प्रियंका चोपडा के अभिनय से सजी ये फ़िल्म बेहद मनोरंजक है. और ये गीत भी है कुछ विशिष्ट. ४८ वीं पायदान पर जमाया कब्जा दोस्ताना के दोस्ताने ने, फ़िल्म को भी खूब सराहा शहरों के जवानों ने....


४७ वीं पायदान

बच्चों के लिए एक बेहद मनोरंजक फ़िल्म आई थी साल के शुरू में, थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक. जिसके लेखक निर्माता और निर्देशक थे कुणाल कोहली. यश राज बैनर के तले बनी ये फ़िल्म कुणाल की पिछली फ़िल्म फ़ना जैसी कमियाबी तो नही पा सकी पर गीत सभी बेहद बेहद अच्छे बने थे इस फ़िल्म के. प्रसून जोशी यहाँ अपने तारे ज़मीन पर वाले फॉर्म में नज़र आए तो शंकर एहसान और लॉय का संगीत भी दमदार रहा, इस मधुर गीत की आवाज़ दी है ख़ुद शंकर महादेवन ने. "प्यार के लिए" थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक मांगता है, इस मधुर गीत में प्रसून में शब्दों का जादू बोलता है.



४६ वीं पायदान

एक कदम और आगे बढ़ते हैं. मुंबई हादसे के बाद इस गीत ने सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा. इस साल की एक बेहद चर्चित लीक से हट कर बनी फ़िल्म आमिर ने फ़िल्म निर्माण का एक नया पहलू दुनिया के लिए खोला. गीत को लिखा है अमिताभ वर्मा ने और स्वरबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने. अमिताभ वर्मा और शिल्पा राव की के गाये इस गीत में संवेदनाएं उभरकर सामने आती है. "एक लौ" ने रुलाया हर हिन्दुस्तानी को, सबने याद किया शहीदों की कुर्बानी को.


४५ वीं पायदान

जावेद जब्बार की लिखी एक बेहद सशक्त कहानी जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, को निर्देशित किया महरीन जब्बार ने और यकीन मानिये अपने पहली ही निर्देशित फ़िल्म में इस निर्देशक ने कमाल का काम किया है. जी हाँ हम बात कर रहे हैं फ़िल्म रामचंद पाकिस्तानी की जिसके इस नर्मो नाज़ुक गीत को बेहद उन्दा गाया है शफ़क़त अमानत अली ने. बोल लिखे हैं अनवर मक़सूद ने और संगीतकार हैं देब्याज्योती मिश्रा. "फ़िर वही रास्ते" गीत ने मिटाई सरहदी रेखा, रॉक बैंड फ़ुज़ोन के लीड गायक का एक नया रूप सबने देखा...



४४ वीं पायदान

तारा राम पम और सलाम नमस्ते जैसी फिल्में बनाने के बाद निर्देशक सिद्धार्थ आनंद ने अपनी नई फ़िल्म बचना ऐ हसीनों के लिए चुना रणबीर कपूर और दीपिका पदुकोन की चर्चित रोमांटिक जोड़ी को. हिट संगीत दिया एक बार फ़िर विशाल शेखर ने. अन्विता दत्त गुप्तन ने एक बार फ़िर कलम का जौहर दिखलाया. इस गीत की एक और खासियत है बहुत दिनों में सुनायी पड़ी लक्की अली की आवाज़, साथ में है श्रेया घोसाल. चढ़ता है नशा इस गीत का अहिस्ता अहिस्ता, सुन कर लक्की और श्रेया की मधुर आवाजें होश हो जाते हैं लापता...


४३ वीं पायदान

नीरज श्रीधर और सुनिधि चौहान का गाया "ख्वाब देखे" गीत है इस पायदान पर. संगीतकार हैं प्रीतम और लिखा है इसे समीर ने. इस तेज़ रफ़्तार फ़िल्म का संगीत भी काफी तेज़ रफ़्तार है. सितारों से भरी इस फ़िल्म की खासियत ये है की इस फ़िल्म में सभी किरदार नेगेटिव हैं. "ख्वाब देखे झूठे मूठे" गाया जब सुनिधि ने, जवान दिल झूम उठे वो समां बंधा सुनिधि ने.



४२ वीं पायदान

माँ दा लाडला एक साधारण गीत नही एक स्टेटमेंट है. बेशक फ़िल्म विदेश में शूट हुई है और अजय ब्रहमत जी ने इस कहा कि ये भारतीय परिवेश की फ़िल्म नही है. सही है, पर इस फ़िल्म में एक संवेदनशील मुद्दे को बेहद हलके फुल्के अंदाज़ में दिखाया गया है. बिगड़ रहे हैं कहीं न कहीं माँ दे लाडले अगर हम संकेत समझें इस गीत का. समीर मर्चंट के गाये इस गीत को लिखा है अन्विता दत्त गुप्तन ने और संगीत है एक बार फ़िर विशाल शेखर का. बिगड़ रहे हैं माँ दे लाडले संकेत है ऐसा मिलता, बिन आग के कभी धुवाँ नही उठता...


४१ वीं पायदान

साल की सबसे अन्तिम फ़िल्म गजिनी को मिला संगीतकार ऐ आर रहमान का साथ, प्रसून अपने बेहतरीन फॉर्म में नही हैं यहाँ पर रहमान के प्रिये गायक बेन्नी दयाल और श्रेया ने अपनी आवाजों से इस गीत में जान डाल दी है. फ़िल्म को खासी लोकप्रियता मिल रही है और संगीत भी लोगों की जुबान पे चढ़ रहा है. "कैसे मुझे तू मिल गयी" पुछा जब बेन्नी दयाल ने, गीत को पहुँचाया ४१ वीं पायदान पर रहमान के कमाल ने





चुनिए वर्ष के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, आवाज़ की टीम द्वारा चुने गए इन ४ नामों में से -

ऐ आर रहमान फ़िल्म जोधा अकबर के लिए

ऐ आर रहमान फ़िल्म जाने तू या जाने न के लिए

शंकर एहसान लॉय फ़िल्म रॉक ऑन के लिए और

सलीम सुलेमान फ़िल्म रब ने बना दी जोड़ी के लिए

या कोई अन्य

आप अपनी पसंद यहाँ टिपण्णी कर दे सकते हैं या फ़िर मेल करें podcast.hindyugm@gmail.com पर

Saturday, December 27, 2008

वार्षिक गीतमाला से पहले वो गीत वो टॉप ५० में स्थान नही पा सके.

इससे पहले कि हम अपनी वार्षिक गीतमाला का शुभारम्भ करें, कुछ बातें हम साफ़ कर देना चाहेंगें. टॉप ५० गीत को आवाज़ के एक पैनल ने बहुत सोच विचार के बाद चुना है जिसमें मुख्य रूप से चार बातों का ध्यान रखा गया है. गीत का नया पन, गीत की मौलिकता, गीत की रिपीट वैल्यू, और गीत की लोकप्रियता. गौर करें कि गीत की लोकप्रियता इन बताये गए चार घटकों में से एक ही है, अर्थात ये हो सकता है कि कोई गीत बहुत लोकप्रिय होने के बावजूद आपको टॉप ५० से नदारद मिले और कोई गीत बहुत कम सुना गया हो पर अपनी मौलिकता, नयेपन, लंबे समय तक सुने जा सकने की योग्यता के दम पर इस सूची में स्थान प्राप्त कर पाने में सफल रहा हो. गीतों की अन्तिम सारणी हमने अपने सुधी श्रोताओं के वोटिंग के आधार पर निर्धारित की है. अन्तिम दिन टॉप १० गीतों के साथ साथ हम अपने श्रोताओं को वर्ष के ५ गैर फिल्मी गीत भी सुनवायेंगे.

पर इससे पहले कि हम अपने टॉप ५० की तरफ़ बढ़ें सुन लेते हैं १० ऐसे गीत जो पिछले साल बेहद मकबूल हुए पर हमारे टॉप ५० में स्थान नही बना सके.

१०. टल्ली - अगली और पगली - पिछले साल ये गीत खूब बजा पर न तो गाने में कोई नयापन है न ही रिपीट वैल्यू.
९. ठ कर के - गोलमाल रिटर्न - ये फ़िल्म पिछले साल की सबसे कामियाब फिल्मों में से एक है, और इस गीत के फिल्मांकन में पानी की तरह पैसा बहाया गया है. गाने की रिपीट वैल्यू शून्य है.
८. तंदूरी नाइट्स - क़र्ज़ - एक बेहद कामियाब पुरानी फ़िल्म का बकवास रीमेक. फ़िल्म संगीत प्रधान होकर भी हिमेश कुछ भी नया नही कर पाये यहाँ. अब इस बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार को नए सिरे से अपना संगीत प्लान करने की बहुत सख्त ज़रूरत है. ये गीत हालाँकि खूब बजा पिछले साल पर इसकी धुन "रेस" के एक गीत "ज़रा ज़रा" से बहुत मिलती जुलती है हो सकता है दोनों गीत एक ही जगह से "प्रेरणा' लेकर गढे गए हों.
७. रेस सांसों की - रेस - इस फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए संगीतकार ने जम कर यहाँ वहां से धुन उठा कर हिट गीत दिए हैं. गीत सिर्फ़ आपके पैरों को थिरकाता है.
६. सिंग इस किंग - सिंग इस किंग - एक और चुराया हुआ गीत. फ़िल्म अक्षय कुमार के उत्कृष्ट अभिनय के लिए बरसों याद की जायेगी, फ़िल्म का संगीत ओवारोल अच्छा है, पर ये कॉपी गीत चाँद पर दाग जैसा है.
५. फ़िर मिलेंगें चलते चलते -रब ने बना दी जोड़ी - बॉलीवुड को यादगारी देते हुए बहुत गीत बन चुके हैं, फ़िल्म "ओम् शान्ति ओम्" के शीर्षक गीत के बाद ये गीत मात्र नक़ल ही लगता है. नयेपन का अभाव.
४. पहली नज़र में - रेस - बेअकल नक़ल, मौलिकता लेश मात्र भी नही....दुखद.
३. तू है मेरी सोणिये - किस्मत कनेक्शन - थिरकने पर मजबूर करने वाला गीत. पर मौलिकता और रिपीट वैल्यू का अभाव.
२.अक्सा बीच - गोड़ तुसी ग्रेट हो - नयापन नही है गाने में, पर हास्य का अच्छा पुट है शब्दों में और संगीत संयोजन भी उसे बढ़ावा देता है.
१. लेज़ी लम्हें - थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक - शब्द और संगीत का बढ़िया मेल. बेहद करीब रहा ये गीत टॉप ५० के.

सुनिए ये सभी गीत इसी क्रम में और तैयार हो जाईये हमारे टॉप ५० गीतों पर झूमने के लिए -

Sunday, December 7, 2008

कलाकार की कोई पार्टी नही होती - दलेर मेहंदी

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (६)

टेलंट शो कितने कारगर

एक ज़माने में हुए एक बड़ी "प्रतिभा खोज" के फलस्वरूप हमें मिले थे महेंद्र कपूर, सुरेश वाडकर जिनका हमने पिछले दिनों आवाज़ पर जिक्र किया था वो भी इसी रास्ते से फ़िल्म इंडस्ट्री में आए. १९९६ में "मेरी आवाज़ सुनो" की विजेता थी हम सब की प्रिय सुनिधी चौहान. इसी प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर रही वैशाली सावंत मानती है कि टेलंट शो मात्र आपको दुनिया के सामने प्रस्तुत कर देते हैं असली संघर्ष तो उसके बाद ही शुरू होता है. ख़ुद वैशाली को सात साल लगे प्रतियोगिता के बाद "आइका दाजिबा" तक का सफर तय करने में. रॉक ऑन ने गायन की शुरुआत करने वाली गायिका केरालिसा मोंटेरियो भी मानती हैं कि "आज भी बहुत से नए कलाकार पारंपरिक तरीके से शुरुआत करना पसंद करते हैं. अनुभव आपको इसी से मिलता है कि आप संगीतकारों से मिलें, बात करें और गानों के बनने की प्रक्रिया और उसका मर्म समझें. अक्सर इन प्रतियोगिताओं के विजेता ये मान बैठते हैं कि बस अब मंजिल मिल गई. पर ऐसा नही होता. एक बार शो खत्म होने के बाद उन्हें राह दिखाने वाला कोई नही होता." जो भी हो पर इतना तो तय है कि विभिन्न चैनलों पर चलने वाले इन प्रतियोगिताओं ने नई प्रतिभाओं के प्रति लोगों की सोच अवश्य ही बदली है. अब हर कोई सुनिधी या अभिजीत सावंत जैसा भाग्यशाली भी तो नही हो सकता न...


कलाकार की कोई पार्टी नही होती - दलेर मेहंदी

पिछले दिनों मीडिया ने दिखाया कि अपने दलेर मेहंदी साहब कहीं एक जगह किसी एक पार्टी विशेष का प्रचार कर रहे थे तो कुछ दिनों बाद वो दिखे एक विरोधी पार्टी का गुणगान गाते. ऐसा कैसे और क्यों दिलेर साहब.? पूछने पर दिलेर साहब ने संशय का निवारण किया. "रैली में जिन्हें मीडिया ने दलेर कह कर जनता को बरगलाया वो मेरा भाई शमशेर था, जो एक पार्टी विशेष से टिकट लेकर चुनाव लड़ रहे हैं, ये ठीक है कि बिल्कुल मेरे जैसे लगते हैं और मेरे अंदाज़ के कपड़े पहनते हैं पर रैली में कई बार उनके नाम की उद्घोषणा हुई पर मीडिया ने जान कर मुद्दे को तूल दिया और शमशेर का मायावती जी के पैर छूने की क्लिप्पिंग बार बार ये कह कर दिखाते रहे कि ये दलेर है." तो क्या दलेर साहब अब अपने भाई के उस पार्टी विशेष का प्रचार भी करेंगे. जवाब सुनिए ख़ुद उन्हीं की जुबानी - "कलाकार और डॉक्टर की कोई पार्टी या जात नही होती. मेरा सहयोग अच्छे उम्मीदवार के साथ रहेगा उनकी पार्टी से मुझे कुछ लेना देना नही". अच्छे विचार हैं दलेर जी...


वार्षिक गीतमाला आवाज़ पर

साल खत्म होने को है, इस वर्ष बाज़ार में आए तमाम फिल्मी और गैर फिल्मी गीतों की लम्बी फेहरिस्त में से शीर्ष ५० गीतों को क्रमबद्ध रूप से आपके लिए लेकर आयेंगे हम आवाज़ पर, दिसम्बर २७ तारिख से ३१ तक. आप भी अपने पसंदीदा गीतों की सूची podcast.hindyugm@gmail.com पर हमें भेज सकते हैं. कोशिश करें कि चुराए हुए धुनों पर आधारित गानों को पीछे रख अच्छे और ओरिजनल गीतों को हम इस गीतमाला में स्थान दें. इस सम्बन्ध में और अधिक जानकारी हम जल्द ही आपको उपलब्ध करवायेंगे.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ