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Sunday, November 9, 2014

‘आज गावत मन मेरो झूम के...’ : SWARGOSHTHI – 193 : RAG DESI


स्वरगोष्ठी – 193 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 2 : राग देसी

पण्डित पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ ने राग देसी के स्वरों में गाया फिल्म बैजू बावरा का युगल गीत





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी नई लघु श्रृंखला, जिसका शीर्षक है- ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के दूसरे अंक में आज हम आपसे 1953 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ पर चर्चा करेंगे। इस श्रेष्ठतम संगीत रचना का सृजन अपने समय की दो दिग्गज सांगीतिक विभूतियों, पण्डित डी.वी. (दत्तात्रेय विष्णु) पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ द्वारा किया गया था। यह गीत राग देसी अथवा देसी तोड़ी के फिल्मी प्रयोग का अच्छा उदाहरण है। इसके साथ ही राग देसी के स्वरूप को समझने के लिए इस अंक में हम आपको शाम चौरासी घराने के शीर्षस्थ युगल गायक उस्ताद सलामत अली खाँ और उस्ताद नज़ाकत अली खाँ की आवाज़ में राग देसी की एक मोहक खयाल रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 
 


हिन्दी फिल्मों के संगीत का इतिहास 1953 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘बैजू बावरा’ के उल्लेख के बिना अधूरा ही रहेगा। संगीतकार नौशाद को भारतीय संगीत के रागों के प्रति कितनी श्रद्धा थी, इस फिल्म के गीतों को सुन कर स्पष्ट हो जाता है। अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञों को फिल्म संगीत के मंच पर लाने में नौशाद अग्रणी रहे हैं। आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में हम फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत के माध्यम से प्रकृति के रंगों को बिखेरने में सक्षम राग ‘देसी’ अथवा ‘देसी तोड़ी’ पर चर्चा करेंगे।

पण्डित डी.वी. पलुस्कर 
उस्ताद अमीर खाँ 
अकबर के समकालीन कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और कुछ दन्तकथाओं के मिश्रण से बुनी 1953 में एक फिल्म- ‘बैजू बावरा’ प्रदर्शित हुई थी। ऐतिहासिक कथानक और उच्चस्तर के संगीत से युक्त अपने समय की यह एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म को आज छह दशक बाद भी केवल इसलिए याद किया जाता है कि इसका गीत-संगीत भारतीय संगीत के रागों पर केन्द्रित था। फिल्म के कथानक के अनुसार अकबर के समकालीन सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सर्वश्रेष्ठ थे। परन्तु उनके संगीत पर दरबारी प्रभाव आ चुका था। उन्हीं के समकालीन स्वामी हरिदास के ही शिष्य माने जाने वाले बैजू अथवा बैजनाथ थे, जिसका संगीत मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था। फिल्म के कथानक का निष्कर्ष यह था कि संगीत जब राज दरबार की दीवारों से घिर जाता है, तो उसका लक्ष्य अपने स्वामी की प्रशस्ति तक सीमित हो जाता है, जबकि मुक्त प्राकृतिक परिवेश में पनपने वाला संगीत ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण होता है। राग देसी के स्वरों से पगा जो गीत आज हमारी चर्चा में है, उसका फिल्मांकन बादशाह अकबर के दरबार में किया गया था। तानसेन और बैजू बावरा के बीच एक सांगीतिक प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। अकबर बादशाह ने श्रेष्ठता के निर्णय के लिए यह शर्त रखी कि जिसके संगीत के असर से पत्थर पिघल जाएगा वही गायक सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतियोगिता में तानसेन की तुलना में बैजू बावरा की श्रेष्ठता सिद्ध हुई थी। आज का गीत फिल्म के इसी प्रसंग में प्रस्तुत किया गया था। इस गीत में अपने समय के दो दिग्गज गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर ने अपना स्वर दिया था। आइए पहले इस गीत को सुनते हैं, फिर इस चर्चा को आगे बढ़ाएँगे।


राग – देसी : फिल्म – बैजू बावरा : ‘आज गावत मन मेरो झूम के...’: स्वर – पण्डित डी.वी. पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ





अभी आपने जो युगल गीत सुना, वह तीनताल में निबद्ध है। परदे पर तानसेन के लिए उस्ताद अमीर खाँ ने और बैजू बावरा के लिए पण्डित पलुस्कर जी ने स्वर दिया था। मित्रों, इन दोनों कलासाधकों का व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विशाल है कि ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में मात्र कुछ पंक्तियों में समेटा नहीं जा सकता। भविष्य में इन संगीतज्ञों पर हम अलग से चर्चा करेंगे। फिल्मी परम्पराओं के अनुसार इस गीत के रिकार्ड पर गीतकार, शकील बदायूनी और संगीतकार, नौशाद के नाम अंकित हैं। अपने समय के इन दो दिग्गज संगीतज्ञों की उपस्थिति में नौशाद साहब किस प्रकार उन्हें निर्देशित कर पाए होंगे यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। वर्षों पहले एक साक्षात्कार में नौशाद जी ने स्वयं इस गीत की चर्चा करते हुए बताया था कि उन्होने दोनों दिग्गज संगीतज्ञों को फिल्म के प्रसंग की जानकारी दी और गाने के बोल दिये। उन्होने आपस में सलाह-मशविरा कर राग-ताल तय किये और फिर रिकार्डिंग शुरू हो गई। इस गीत के आरम्भिक लगभग 1 मिनट 45 सेकेण्ड की अवधि में दोनों गायकों ने ‘तुम्हरे गुण गाउँ...’ पंक्तियों के माध्यम से विलम्बित खयाल की झलक और शेष भाग में द्रुत खयाल का रूप प्रदर्शित किया है। गीत के अन्तिम भाग में तानसेन के तानपूरा का तार टूट जाता है, जबकि बैजू द्रुत लय की तानें लगाते रहते हैं। फिल्म में उनकी तानों के असर से काँच के पात्र में रखा पत्थर पिघलने लगता है।

उस्ताद सलामत और नज़ाकत अली खाँ 
आइए, अब कुछ चर्चा राग देसी के बारे में करते है। दिन के दूसरे प्राहर में गाये-बजाये जाने वाले इस राग को देसी के अलावा देसी तोड़ी अथवा देस तोड़ी भी कहते हैं। यह आसावरी थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते है, जबकि धैवत और निषाद स्वर शुद्ध रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमे शुद्ध धैवत के स्थान पर कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है, शेष सभी स्वर राग देस के समान ही प्रयोग किया जाता है। फिल्म ‘बैजू बावरा’ में इस राग का संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त मुखर प्रयोग किया गया था। आइए, अब हम आपको शाम चौरासी घराने के संवाहक उस्ताद सलामत अली और नज़ाकत अली खाँ के युगल स्वरों में राग देसी में एक खयाल सुनवाते हैं। शाम चौरासी ध्रुपदियों का घराना रहा है। अविभाजित पंजाब का होशयारपुर ज़िला शाम चौरासी घराने का मुख्य केन्द्र था। सोलहवीं शताब्दी में मियाँ चाँद खाँ और मियाँ सूरज खाँ ने इस घराने की बुनियाद रखी थी। यह दोनों तानसेन के समकालीन थे। इसी घराने के उस्ताद विलायत अली खाँ के सुपुत्र थे, उस्ताद सलामत अली और नज़ाकत अली खाँ। इन दोनों भाइयों को युगल गायन में खूब प्रसिद्धि मिली। विभाजन के बाद यह दोनों भाई लाहौर चले गए। रागदारी संगीत की इस मशहूर जोड़ी की आवाज़ में अब आप सुनिए राग देसी का खयाल। तीनताल में निबद्ध इस खयाल के बोल हैं- ‘म्हारे घर आयो जी साँवरे...’। आप यह रचना सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग - देसी : ‘म्हारे घर आयो जी साँवरे...’ : तीनताल : उस्ताद सलामत अली खाँ और नज़ाकत अली खाँ






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 193वें अंक की पहेली में आज हम आपको लगभग छः दशक पुरानी एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 15 नवम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 195वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 191वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1943 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भीमपलासी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की पिछली श्रृंखला (अंक 181 से 190 तक) की संगीत पहेली के विभिन्न प्रतिभागियों के प्राप्तांकों का विवरण निम्नलिखित है। सर्वाधिक अंक के प्राप्तकर्त्ता इस श्रृंखला के विजेता घोषित किए जाते हैं।

1 – विजया राजकोटिया, पेंसिलवानिया, अमेरिका – 20 अंक – प्रथम

2 – क्षिति तिवारी, जबलपुर, मध्य प्रदेश – 20 अंक – प्रथम

3 – डी. हरिणा माधवी, हैदराबाद – 17 अंक – द्वितीय

4 - दिनेश कृष्णजोइस, मिन्नेसोटा, अमेरिका – 8 अंक – तृतीय

उपरोक्त सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार 16 नवम्बर 2014 को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


 

Sunday, November 2, 2014

वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : SWARGOSHTHI – 192 : RAG BHIMPALASI


स्वरगोष्ठी – 192 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 1 : राग भीमपलासी

संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास और गायिका सरस्वती राणे की जोड़ी ने राग भीमपलासी के स्वरों में रचा एक मधुर गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे है। इस श्रृंखला का शीर्षक है- ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम आपसे 1943 की फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ की चर्चा करेंगे। इस गीत का सृजन अपने समय की दो दिग्गज सांगीतिक विभूतियों, संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास और किराना घराने की चर्चित गायिका सरस्वती राणे द्वारा हुआ था। राग भीमपलासी के फिल्मी प्रयोग का यह एक अच्छा उदाहरण है। इसके साथ ही राग भीमपलासी स्वरूप को समझने के लिए इस अंक में हम आपको शीर्षस्थ गायिका गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की एक मोहक रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 
 


हात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘रामराज्य’ देखी थी। 1943 में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रकाश पिक्चर्स ने किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, व्यासजी की कुशलता केवल फिल्म संगीत निर्देशन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय गायन, संगीत शिक्षण और ग्रन्थकार के रूप में भी सुरभित हुई। फिल्म ‘रामराज्य’ में पण्डित जी ने राग भीमपलासी के स्वरों में एक गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ संगीतबद्ध किया था। इस गीत को किराना घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की सुपुत्री और सुप्रसिद्ध गायिका सरस्वती राणे ने स्वर दिया था। आज पहले हम इस गीत के संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास और उसके बाद विदुषी सरस्वती राणे के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चा करेंगे।

शंकरराव व्यास 
कोल्हापुर में 23 जनवरी, 1898 को पुरोहितों के परिवार में जन्मे शंकरराव व्यास के पिता गणेश पन्त, कथावाचक के साथ-साथ संगीत-प्रेमी भी थे। संगीत के संस्कार उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुए। दुर्भाग्यवश जब शंकरराव आठ वर्ष के थे तब उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के देहान्त के बाद वे अपने चाचा श्रीकृष्ण सरस्वती के आश्रित हुए। उन्हीं दिनों पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर भारतीय संगीत को उसकी दयनीय स्थिति से उबारने के लिए पूरे महाराष्ट्र में भ्रमण कर रहे थे और उनकी अगली योजना पूरे देश में संगीत के प्रचार-प्रसार की थी। बालक शंकरराव के संगीत-ज्ञान और उत्साह देख कर पलुस्कर जी ने उन्हें अपने साथ ले लिया। पलुस्कर जी द्वारा स्थापित गान्धर्व विद्यालय में ही उन्होने ९ वर्ष तक संगीत शिक्षा प्राप्त की और अहमदाबाद के राष्ट्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षक हो गए। इसी बीच पलुस्कर जी ने लाहौर में संगीत विद्यालय की स्थापना की और शंकरराव को वहीं प्रधानाचार्य के पद पर बुला लिया। लाहौर में संगीत विद्यालय विधिवत स्थापित हो जाने और सुचारु रूप से संचालित होने के बाद वे अहमदाबाद आए और यहाँ भी ‘गुजरात संगीत विद्यालय’ की स्थापना की। 1934 में उन्होने गन्धर्व संगीत महाविद्यालय स्थापित किया। इस बीच उन्होने संगीत शिक्षण के साथ-साथ संगीत सम्मेलनों में भाग लेना भी जारी रखा।

1938 में 40 वर्ष की आयु में शंकरराव व्यास ने फिल्म संगीत के क्षेत्र में पदार्पण किया। 1938 में रमणलाल बसन्तलाल के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘पूर्णिमा’ में कई गीत गाये थे। गायन के साथ-साथ फिल्मों की संगीत रचना के क्षेत्र में भी उनका वर्चस्व कायम हो चुका था। व्यास जी के संगीतबद्ध, भक्ति प्रधान और नीति पधान गीत गली-गली गूँजने लगे थे। 1940 में ‘सरदार’, ‘नरसी भगत’ और 1942 में ‘भरतमिलाप’ फिल्मों के गीत लोकप्रियता के शिखर पर थे। इसी समय 1943 में प्रकाश पिक्चर्स की फिल्म ‘रामराज्य’ प्रदर्शित हुई थी। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ में दर्शकों को गाँधीवादी रामराज्य की परिकल्पना परिलक्षित हो रही थी। इस फिल्म के राग आधारित गीत भी अत्यन्त जनप्रिय हुए थे, विशेष रूप से फिल्म में लव और कुश चरित्रों पर फिल्माया गया गीत ‘भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं...’ और राजमहल में फिल्माया गया गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’। पण्डित शंकरराव व्यास ने इन दोनों गीतों को क्रमशः काफी और भीमपलासी के स्वरों में बाँधा था। आज हमारी चर्चा में रमेश चन्द्र गुप्ता के लिखे, शंकरराव व्यास के संगीतबद्ध किए और सरस्वती राणे के गाये गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ ही है। आइए, पहले हम यह गीत सुनते हैं।


राग भीमपलासी : ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : फिल्म – रामराज्य : स्वर – सरस्वती राणे : संगीत – पण्डित शंकरराव व्यास





सरस्वती राणे 
अभी आपने जो गीत सुना वह अपने समय की विख्यात गायिका सरस्वती राणे के स्वरों में था। इनका जन्म 4 अक्टूबर, 1913 को महाराष्ट्र के मिरज में हुआ था। किराना घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ और तारा बाई की सन्तान सरस्वती राणे को संगीत विरासत में मिला था। 1930 में पति से अलग होने के बाद तारा बाई ने अपने पाँच सन्तानों का स्वयं पालन-पोषण किया। सरस्वती ने अपने पिता से प्राप्त संगीत शिक्षा को अपने बड़े भाई सुरेशबाबू माने और बड़ी बहन हीराबाई बड़ोदकर के मार्गदर्शन से आगे बढ़ाया। उन दिनों संगीत के मंचों पर हीराबाई और सरस्वती के जुगलबन्दी प्रस्तुतियाँ खूब चर्चित हो गई थी। सरस्वती राणे का मंच-पदार्पण सात वर्ष की आयु में संगीत प्रधान नाटकों के माध्यम से हुआ था। 1929 में मराठी रंगमंच के सितारे बालगन्धर्व जैसे कलाकारों के साथ अभिनय और गाने का उन्हें अवसर मिला। 1933 से रेडियो पर गाने का अवसर मिला जो 1990 तक जारी रहा। 1943 में जब उन्होने फिल्म ‘रामराज्य’ के लिए पार्श्वगायन किया था, उस समय सरस्वती राणे लोकप्रियता के शिखर पर थीं।

राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, (कोमल), म, प, नि (कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि (कोमल), ध, प, म (कोमल), रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। ‘भीमपलासी’ के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है।

गंगूबाई हंगल 

आइए, अब हम आपको राग भीमपलासी की ही एक आकर्षक बन्दिश सुनवाते हैं। यह किराना घराने की गायकी में शीर्षस्थ विदुषी गंगूबाई हंगल की एक रिकार्डिंग है। 5 मार्च, 1913 को धारवाड़, कर्नाटक में उनका जन्म हुआ था। बाल्यावस्था में उन्हें अपनी माँ से दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति की शिक्षा मिली। 1928 में उनका परिवार हुबली स्थानान्तरित हो गया। जाने-माने संगीतविद् सवाई गन्धर्व से उत्तर भारतीय संगीत में दक्षता प्राप्त करने से पूर्व किन्नरी वीणा वादक कृष्ण आचार्य और दत्तोपन्त देसाई से संगीत की शिक्षा ग्रहण की थी। पण्डित भीमसेन जोशी इनके गुरूभाई थे। गंगूबाई हंगल ने संगीत को आत्मसात करने के लिए कठिन साधना की थी। भारत के उच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से 1971 में और ‘पद्मविभूषण’ से 2002 में अलंकृत किया गया था। 21 जुलाई, 2009 को इस महान गायिका का हुबली में निधन हुआ था। अब आप विदुषी गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की यह खयाल रचना सुनिए। इस प्रस्तुति में उनके गायन में उनकी सुपुत्री कृष्णा हंगल ने सहयोग किया है। आप राग भीमपलासी का रसास्वादन कीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : ‘गरवा हरवा डारो री...’ : विदुषी गंगूबाई हंगल : तीनताल 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 192वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी पहले की एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग का आभास होता है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 194वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 190वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी राग भैरवी की ठुमरी ‘रस के भरे तोरे नैन...’ का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी गिरिजा देवी। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से नई लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ आरम्भ हुई है। पहले की तरह इस श्रृंखला के बारे में भी आपके सुझाव आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हों, हमे आविलम्ब लिखें। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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