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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

"गोरी हैं कलाइयाँ" -- यही था उस साल का सर्वश्रेष्ठ गीत; जानिये कुछ बातें इस गीत से जुड़े...


एक गीत सौ कहानियाँ - 29
 

गोरी हैं कलाइयाँ, तू ला दे मुझे हरी-हरी चूड़ियाँ...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 29-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'आज का अर्जुन' के गीत "गोरी हैं कलाइयाँ" के बारे में ... 



बप्पी दा और लता जी
प्पी लाहिड़ी को भले ही डिस्को किंग्‍ की उपाधि दी जाती है, पर उनकी ऐसी अनेक रचनायें हैं जिनमें शास्त्रीय संगीत, तथा बंगाल व अन्य प्रदेशों के लोक संगीत की झलक मिलती है। ऐसा ही एक गीत है 1990 की फ़िल्म 'आज का अर्जुन' का। राजस्थानी रंग में रंगा "गोरी हैं कलाइयाँ, तू ला दे मुझे हरी-हरी चूड़ियाँ" गीत उस दौर के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक था। 80 के दशक में बप्पी दा स्वरबद्ध फ़िल्मों में अधिकतर पाश्चात्य अंदाज़ के या फिर चल्ताऊ क़िस्म के गीत हुआ करते थे जिनमें महिला स्वर आशा भोसले, एस. जानकी, अलिशा चिनॉय आदि गायिकाओं के होते थे। लेकिन उनका हमेशा यह प्रयास होता था कि हर फ़िल्म में कम से कम एक गीत ऐसा बनायें जिसे वो लता मंगेशकर से गवा सके। अत: लता जी को राज़ी करने के लिए वो उन्हीं की शैली में गीत कम्पोज़ किया करते। फ़िल्म 'हिम्मतवाला' में "नैनों में सपना, सपनों में सजना", फ़िल्म 'तोहफ़ा' में "अल्बेला मौसम, कहता है स्वागतम", फ़िल्म 'पाप की दुनिया' में "बंधन टूटे ना सारी ज़िन्दगी", फ़िल्म 'थानेदार' में "और भला क्या माँगू मैं रब से मुझे तेरा प्यार मिला", फ़िल्म 'गुरु' में "ज‍इयो ना ज‍इयो ना हमसे दूर कभी ज‍इयो ना" की तरह फ़िल्म 'आज का अर्जुन' में भी उन्होंने लता जी को ध्यान में रखते हुए "गोरी हैं कलाइयाँ" की रचना की। शब्बीर कुमार और साथियों के साथ गाया लता जी का यह गीत उस वर्ष का चोटी का गीत सिद्ध हुआ।

1990 में एक से एक कामयाब म्युज़िकल फ़िल्में आईं, और अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'वार्षिक गीतमाला' में नामांकित होने वाले गीतों में 'किशन कन्हैया', 'चालबाज़', 'बहार आने तक', 'सौतन की बेटी', 'आशिक़ी', 'थानेदार', 'जीना तेरी गली में', 'तुम मेरे हो', 'चाँदनी', 'घर का चिराग', 'दिल', 'आयी मिलन की रात', 'मैंने प्यार किया', और 'हम' जैसी फ़िल्में शामिल थे, जिनके गानें सुपर-डुपर हिट हुए थे। ख़ुद बप्पी लाहिड़ी के तीन गीत चोटी का पायदान प्राप्त करने की लड़ाई में शामिल थे - "तम्मा तम्मा लोगे" (थानेदार), "तूतक तूतक तूतियाँ आइ लव यू" (घर का चिराग), और "गोरी हैं कलाइयाँ"। तमाम गीतों को पछाड़ता हुआ 'आज का अर्जुन' का यह गीत जा पहुँचा चोटी के पायदान पर और बन गया 'सॉंग्‍स ऑफ़ दि ईअर'। दूसरे पायदान पर "कबूतर जा जा" (मैंने प्यार किया) और तीसरे पायदान पर "मुझे नींद न आये" (दिल) गीत रहे।

'आज का अर्जुन' में अमिताभ बच्चन और जया प्रदा की जोड़ी नज़र आई। अभी हाल ही में फ़ेसबूक पर बिग बी ने इस गीत के बारे में अपना स्टेटस अपडेट करते हुए लिखा, "This was considered to be the piece de resistance of the movie and was filmed with such zest and energy that I had a trying time keeping in step with Jaya Prada. Bappi Lahiri’s music was winner. Gori hain kalaaiyan was such a hit in Rajasthan that I am told it was chanted throughout the streets and gullies of Jaipur, where the film producer KC Bokadia hails from." ("यह गीत इस फ़िल्म का मुख्य आकर्षण सिद्ध हुआ, और इस गीत को इतनी लगन और ऊर्जा के साथ फ़िल्माया गया कि मुझे जया प्रदा के साथ कदम से कदम मिलाने में बड़ी मुश्किल हुई। बप्पी लाहिड़ी का संगीत विजयी रहा। गोरी हैं कलाइयाँ राजस्थान में इतना ज़्यादा मक़बूल हुआ कि मुझे ऐसा बताया गया कि जयपुर की गलियों और मुहल्लों लगातार गाया गया जहाँ से के. सी. बोकाडिया ताल्लुख रखते थे")।

"गोरी हैं कलाइयाँ" गीत की एक बड़ी ख़ासीयत है मटकों का सुंदर प्रयोग। विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम को प्रस्तुत करते हुए बप्पी दा ने इस गीत के बारे में बताया, "इस गाने में मैंने पहली बार मटका, मिट्टी का, एक एक स्केल में यूज़ किया। लता जी जब स्टुडियो में आईं तो इतने सारे मटके देख कर कहा कि इतने मटके क्यों? मैंने कहा कि लता जी, मैं मटके से एक्स्पेरिमेण्ट कर रहा हूँ, तबला तरंग का। लता जी को भी बहुत पसंद आया, और यह गाना 1990 का नंबर वन सॉंग्‍ था। और आप लोगों को भी पसंद आया"। इस गीत में राजस्थानी लोक गीत "बन्ना रे बागा में झूला गाल्या" का प्रयोग किया गया है। कोरस इस पंक्ति को गाती हैं और इस पंक्ति के जवाब में लता जी गाती हैं "आया रे छैल भँवर जी आया"। "बन्ना रे..." गीत के साथ घूमर नृत्य शैली में नृत्य किया जाता है। घूमर नृत्य राजस्थान के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है। यह नृत्य राजस्थान में प्रचलित अत्यंत लोकप्रिय नृत्य है, जिसमें केवल स्त्रियाँ ही भाग लेती हैं। इसमें लहँगा पहने हुए स्त्रियाँ गोल घेरे में लोकगीत गाती हुई नृत्य करती हैं। जब ये महिलाएँ विशिष्ट शैली में नाचती हैं तो उनके लहँगे का घेर एवं हाथों का संचालन अत्यंत आकर्षक होता है। इस नृत्य में महिलाएँ लम्बे घाघरे और रंगीन चुनरी पहनकर नृत्य करती हैं। इसी सौन्दर्य को "गोरी हैं कलाइयाँ" गीत में दर्शाया गया है।
शब्बीर कुमार


"गोरी हैं कलाइयाँ" गीत के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए जब मैं इस गीत के गायक शब्बीर कुमार से फ़ेसबूक पर सम्पर्क किया तो कुछ और रोचक तथ्य सामने आ गए। शब्बीर कुमार ने बताया, "यह गीत किसी और ने गाया था। लेकिन शायद अमिताभ बच्चन जी ने मेरा नाम सजेस्ट किया कि यह गीत शब्बीर कुमार को लता जी के साथ गवाया जाए! और गीत का अन्तरा एक ही साँस में शब्बीर कुमार से रेकॉर्ड कराया जाए! वैसे मैं किसी भी सिंगर का रेकॉर्डेड गीत डब नहीं करता, यह मेरा उसूल है, लेकिन मुझे बाद में बताया गया कि यह गीत किसी जाने-माने गायक ने गाया था। यही इस गीत के पीछे की संक्षिप्त और सही जानकारी है।" शब्बीर कुमार ने उस गायक का नाम तो नहीं बताना चाहा, पर हम कुछ कुछ अंदाज़ा ज़रूर लगा सकते हैं। इस फ़िल्म में शब्बीर कुमार के अलावा दो गीतों में अमित कुमार की आवाज़ थी - "चली आना तू पान की दुकान में" और "ना जा रे ना जा रे"; तथा एक अन्य गीत में मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ थी। इसलिए हो न हो, इन दो गायकों में से किसी एक की आवाज़ में रेकॉर्ड हुई होगी। ख़ैर, जो भी है, अन्तिम सत्य यही है कि इस गीत ने अपार शोहरत हासिल की। यह गीत न तो लता मंगेशकर का गाया सर्वश्रेष्ठ गीत है, न शब्बीर कुमार का, और न ही इसके गीतकार अंजान या संगीतकार बप्पी लाहिड़ी की श्रेष्ठ रचना। फिर भी कुछ तो बात है इस गीत में जो इसे भीड़ से अलग करती है, और आज भी जब हम इस गीत को सुनते हैं तो जैसे दिल ख़ुश हो जाता है।



फिल्म - आज का अर्जुन : 'गोरी हैं कलाइयाँ तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियाँ...' : लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार : संगीत - बप्पी लाहिड़ी 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

मिष्टी दोई जैसी बप्पी दा की आवाज़ और "घंटी गीत" बना साल का पहला देशव्यापी हिट

ताज़ा सुर ताल - 2014 - 08 

बप्पी दा 
दोस्तों, साल 2014 के दो माह बीतने को हैं, और अब तक हम आपको 14 गीत सुनवा चुके हैं. आज हम आपको सुनवायेंगे दो ऐसे गीत जो लोकप्रियता के लिहाज से शीर्ष पायदानों पर विराजमान हैं, और ये दोनों ही गीत एक ही फिल्म से हैं. फिल्म "गुण्डे" के बारे में आपको बता दें कि ये फिल्म हिंदी के साथ साथ बांग्ला में भी बनी है. और इसका मशहूर घंटी गीत  बांग्ला में बप्पी दा ने गाया है. वैसे संगीतकार सोहैल सेन ने हिंदी संस्करण में भी बप्पी दा को क्रेडिट दिया है. हिंदी संस्करण आज पूरे भारत में धूम मचा रहा है, मगर हम आपको सुनवा रहे हैं गीत का बांग्ला संस्करण जिसे बप्पी दा से एकदम मस्त गाया है. सुनते सुनते झूमने लगो तो हमें दोष मत दीजियेगा...


नेहा बाशिन 
क्यों दोस्तों, मज़ा आया न...? चलिए अब बढते हैं गुण्डे  के एक और गीत की तरफ जो है एक कैब्रेट गीत. असलमे इश्कुम  फिल्माया गया है प्रियंका चोपडा पर और उनके लिए पार्श्व गायन किया है नेहा भासिन ने, जी हाँ वही जिनकी धुनकी  ने आपको दीवाना बना दिया था. नेहा आज की एक चर्चित आवाज़ का नाम है पर अपने आरंभिक दिनों को याद करते हुए एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि एक बार एक निर्माता के सामने ऑडिशन देते हुए उनसे पूछा गया कि कहीं आपकी आवाज़ बैठी हुई तो नहीं है, जवाब में नेहा डरते डरते बस यही कह पायी थी कि 'मेरी आवाज़ ही ऐसी है'...ये वो दौर था जब एक खास किस्म की आवाजें ही इंडस्ट्री में स्वीकार्य होती थी. दस साल में बहुत कुछ बदल चुका है, और नए अंदाज़ की आवाजें भी आज अपनी पहचान बना रही हैं. नेहा की सफलता इसका ही एक उदाहरण है. माईकल जेक्सन की मुरीद नेहा फिल्मों से इतर भी अपनी आवाज़ में गैर फिल्मों गीत रिलीस करती रहती हैं, और जल्दी ही उनका एक नया सिंगल भी आने वाला है. तो लीजिए फिलहाल सुनिए उनकी आवाज़ में इश्क को नशीला सलाम. 

सोमवार, 16 मई 2011

अलबेला मौसम कहता है स्वागतम....ताकि आप रहें खुश और तंदरुस्त

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 657/2011/97

फ़िल्म संगीत में हँसी मज़ाक की बात हो, और किशोर कुमार का नाम ही न आये, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है इस सुरीली महफ़िल में। इन दिनों इसमें जारी है शृंखला 'गान और मुस्कान' और जैसा कि आपको पता है इसमें हम ऐसे गानें शामिल कर रहे हैं जिनमें गायक गायिका की हँसी सुनाई देती है। किशोर कुमार नें बेहिसाब मज़ाइया और हास्य रस के गीत गाये हैं। उनके गाये हास्य गीतों को सुनते हुए कई बार हम हँसते हँसते पेट पकड़ लेते हैं। लेकिन अगर आपसे यह पूछें कि उनकी हँसी किस गीत में सुनाई पड़ी है, तो शायद आपको कुछ समय लग जाये याद करने में। सबसे पहले जो गीत ज़हन में आता है वह है फ़िल्म 'पड़ोसन' का "एक चतुर नार", जिसे हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर भी बजा चुके हैं। आज के अंक के लिए हमने किशोर दा का जो गीत चुना है, वह कोई हास्य गीत नहीं है, बल्कि यह एक फ़मिली सॉंग् है, एक पारिवारिक गीत। एक आदर्श छोटा परिवार, जिसमें है माँ-बाप और एक छोटा सा प्यारा सा बच्चा। कुछ इसी पार्श्व पर ८० के दशक का एक गीत है किशोर कुमार, लता मंगेशकर और बेबी कविता की आवाज़ों में फ़िल्म 'तोहफ़ा' में, "अलबेला मौसम, कहता है स्वागतम"। बप्पी लाहिड़ी का संगीत और इंदीवर के बोल। गाना फ़िल्माया गया है जीतेन्द्र और जया प्रदा पर। गीत के अंतरों से पहले बेबी कविता नर्सरी राइम बोलती है जिसके बाद किशोर दा और लता जी ज़ोर से हँसते हैं।

'तोहफ़ा' १९८४ की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी जिसके निर्देशक थे के. राघवेन्द्र राव। यह वह दौर था ८० के दशक का जब जीतेन्द्र, श्रीदेवी और जया प्रदा की तिकड़ी फ़िल्म जगत में ख़ूब शोर मचा रही थी। दक्षिण के बैनर तले निर्मित इस तरह की फ़िल्में ख़ूब चले थे। 'तोहफ़ा' के बाद 'मवाली', 'हिम्मतवाला', 'जस्टिस चौधरी', 'धर्माधिकारी', 'संजोग', 'सुहागन' आदि फ़िल्मों के नाम आज भी याद आते हैं। 'तोहफ़ा' एक तमिल ब्लॉकबस्टर फ़िल्म का रीमेक है जिसमे भी श्रीदेवी और जया प्रदा नें ही अभिनय किया था। 'तोहफ़ा' १९८५ के फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड फ़ंक्शन में नामांकनों में छायी रही, शक्ति कपूर को सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के लिए नामांकन मिला तो बप्पी लाहिड़ी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के लिए। गीतकार इंदीवर को भी "प्यार का तोहफ़ा तेरा" गीत के लिए नामांकन मिला था। इस फ़िल्म के अंत में जया प्रदा द्वारा निभाये किरदार की मौत हो जाती है, तभी प्रस्तुत गीत के अंतरे में बोल डाले गये हैं "क्यों पूजा के बाद ही बोलो माँग भरा करते हैं, लम्बी उमर सिंदूर की हो हम यह माँगा करते हैं, ये तो कहो जीवन के सफ़र की आखिरी आरज़ू क्या है, तुझसे पहले मैं उठ जाऊँ मैंने यह सोचा है, अगले जनम में दोनों मिलेंगे, अपना यह वादा है"। ८० के दशक के मध्य भाग में फ़िल्म संगीत सब से करुण स्थिति से गुज़र रही थी। ऐसे में यह गीत एक ख़ूशबूदार झोंके की तरह आया और मन को सुवासित कर गया। मुझे यह गीत बचपन में बहुत पसंद था और आज भी है। तो आइए इस गीत को सुनें और लता जी और किशोर दा की हँसी का एक साथ आनंद लें। क्या इस तरह का कोई और गीत है जिसमें लता और किशोर की हँसी सुनाई पड़ती है? मुझे लिख भेजिएगा ज़रूर!



क्या आप जानते हैं...
कि बप्पी लाहिड़ी नें केवल १६ वर्ष की आयु में एक बंगला फ़िल्म 'दादू' में संगीत दिया था जिसमें लता, आशा और उषा, तीनों मंगेशकर बहनों से गवाया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - प्रमुख गायक का साथ किस गायिका ने दिया है - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी और अनजाना जी एक बार फिर प्रमुख भूमिका में रहे, क्षिति जी ने हमेशा की तरह गेस्ट भूमिका अदा की और अविनाश जी ने कल डेब्यू किया.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

रविवार, 6 मार्च 2011

मैदान है हरा, भीड़ से भरा खेलने चल दिए ग्यारह....और रोमांच से भरे कई मुकाबले हम अब तक इस वर्ल्ड कप में देख ही चुके हैं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 606/2010/306

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक नए सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। सप्ताह नया ज़रूर है, लेकिन चर्चा वही है जो पिछले सप्ताह रही, यानी क्रिकेट विश्वकप की। 'खेल खेल में' लघु शृंखला में आइए आज सब से पहले बात करते हैं विश्वकप ट्रॊफ़ी की। ICC क्रिकेट विश्वकप की ट्रॊफ़ी एक रनिंग् ट्रॊफ़ी है जो विजयी टीम को दी जाती है। इसका डिज़ाइन गरार्ड ऐण्ड कंपनी ने दो महीने के अंदर किया था। असली ट्रॊफ़ी को ICC के दुबई हेडक्वार्टर्स में सुरक्षित रखा गया है जब कि विजयी दल को इसकी एक प्रति दी जाती है। असली और प्रति में फ़र्क बस इतना है कि असली ट्रॊफ़ी में पूर्व विजयी देशों के नाम खुदाई किए हुए है। और अब २०११ विश्वकप के प्राइज़ मनी की बात हो जाए! २०११ क्रिकेट विश्वकप का विजयी दल अपने साथ घर ले जाएगा ३ मिलियन अमरीकी डॊलर्स; रनर-अप को मिलेंगे १.५ मिलियन अमरीकी डॊलर्स। लेकिन सुनने में आया है कि ICC इस राशी को दुगुना करने वाली हैं इसी विश्वकप में। यह निर्णय दुबई में २० अप्रैल २०१० के ICC बोर्ड मीटिंग् में लिया गया था। २०११ विश्वकप में १८ अम्पायर खेलों का संचालन कर रहे हैं, और इनके अतिरिक्त एक रिज़र्व अम्पायर एनामुल हक़ को भी रखा गया है। २०११ विश्वकप में अम्पायरिंग् करने वाले अम्पायरों के नाम इस प्रकार है:

ऒस्ट्रेलिया - सायमन टॊफ़ेल, स्टीव डेविस, रॊड टकर, डैरील हार्पर, ब्रुस ऒग्ज़ेनफ़ोर्ड
न्यु ज़ीलैण्ड - बिली बाउडेन, टॊनी हिल
दक्षिण अफ़्रीका - मराइस एरस्मस
पाकिस्तान - अलीम दर, असद रौफ़
भारत - शवीर तारापुर, अमिष साहेबा
इंगलैण्ड - इयान गूल्ड, रिचार्ड केटलबोरो, नाइजेल लॊंग्
श्रीलंका - अशोक डी'सिल्वा, कुमार धर्मसेना
वेस्ट इंडीज़ - बिली डॊट्रोव

दोस्तों, क्रिकेट पर बनने वाली फ़िल्मों की जब बात आती है, तो जिन चंद फ़िल्मों के नाम सब से पहले ज़ुबान पर आते हैं, वो हैं 'मालामाल', 'ऒल राउण्डर', 'अव्वल नंबर', 'लगान', 'इक़बाल' और 'हैट्रिक'। हाल में रिलीज़ हुई 'पटियाला हाउस' भी इसी श्रेणी में अपना नाम दर्ज करवाने वाली है। ये सभी फ़िल्में उस दौर की हैं कि जब फ़िल्म संगीत का सुनहरा युग बीत चुका था। लेकिन दोस्तों, क्योंकि यह शृंखला २०११ क्रिकेट विश्वकप को केन्द्रबिंदु में रख कर प्रस्तुत किया जा रहा है, ऐसे में अगर एक गीत हम क्रिकेट के नाम ना करें तो कुछ मज़ा नहीं आ रहा। इसलिए आज के अंक के लिए हमने चुना है १९९० की फ़िल्म 'अव्वल नंबर' का एक गीत, जिसके बोल हैं "ये है क्रिकेट"। वैसे दोस्तों, ५० के दशक में कम से कम एक फ़िल्म ऐसी ज़रूर आयी थी जिसमें क्रिकेट खेल पर एक गीत था। आगे चलकर इस गीत को हम शामिल करेंगे एक ख़ास प्रस्तुति के रूप में। वापस आते हैं 'अव्वल नंबर' पर। 'अव्वल नंबर' देव आनंद की फ़िल्म थी, निर्देशन भी उनका ही था, और जिसमें उनके अलावा अभिनय किया था आमिर ख़ान, आदित्य पंचोली, एक्ता सोहिनी और नीता पुरी प्रमुख। फ़िल्म की कहानी क्रिकेट और क्रिकेटर्स पर ही केन्द्रित थी जिसे लिखा भी देव साहब ने ही था। फ़िल्म में संगीत था बप्पी लाहिड़ी का और फ़िल्म के तमाम गानें ख़ूब चले थे उस ज़माने में। अगर आपको याद नहीं आ रहा तो इस फ़िल्म का सब से हिट गीत था "पूछो ना कैसा मज़ा आ रहा है", अमित कुमार और एस. जानकी की आवाज़ों में। आज का प्रस्तुत गीत गाया है बप्पी लाहिड़ी, अमित कुमार और उदित नारायण ने। इस फ़िल्म में आमिर ख़ान का प्लेबैक अमित कुमार ने किया था, लेकिन इस गीत में अमित कुमार बने आदित्य पंचोली की आवाज़ और देव साहब के लिए गाया बप्पी दा ने। 'क़यामत से क़यामत तक' से आमिर ख़ान की आवाज़ बने उदित नारायण ने इस गीत में भी उनके लिए ही गाया था। "मैदान है हरा, भीड़ से भरा, खेलने चल दिए हैं ग्यारह, विकेट है गड़े, तैयार हम खड़े, खेल शुरु होगा पौने ग्यारह, ये है क्रिकेट, ये है क्रिकेट"। तो लीजिए क्रिकेट फ़ीवर को बरकरार रखते हुए सुनते हैं आज का यह गीत जिसे लिखा है गीतकार अमित खन्ना ने।



क्या आप जानते हैं...
कि १९९० और २००० के दशकों में देव आनंद ने जिन फ़िल्मों का निर्माण किया था, उनके नाम हैं - अव्वल नंबर (१९९०), प्यार का तराना (१९९३), गैंगस्टर (१९९४); मैं सोलह बरस की (१९९८), सेन्सर (२००१), लव ऐट टाइम्स स्कुएर (२००३), मिस्टर प्राइम मिनिस्टर (२००५), और चार्जशीट (२००९)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 11
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आसान है.

सवाल १ - किस खूबसूरत अभिनेत्री पर है ये गीत - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वही जबरदस्त मुकाबला जारी है....शानदार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२२), सभी श्रोताओं को क्रिसमस की शुभकामनाएँ

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शनिवार विशेष की २२ वीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। आप सभी को क्रिस्मस की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। इस साप्ताहिक विशेषांक में अधिकतर समय हमने 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया, जिसमें आप ही के भेजे हुए ईमेल शामिल हुए और कई बार हमने नामचीन फ़नकारों से संपर्क स्थापित कर फ़िल्म संगीत के किसी ना किसी पहलु का ज़िक्र किया। आज हम आ पहुँचे हैं इस साप्ताहिक शृंखला की २०१० वर्ष की अंतिम कड़ी पर। तो आज हम अपने जिस दोस्त के ईमेल से इस शृंखला में शामिल कर रहे हैं, वो हैं ख़ानसाब ख़ान। हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तारीफ़ की है और हमारा हौसला अफ़ज़ाई की है। लीजिए ख़ानसाब का ईमेल पढ़िए...

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आदाब,

नौ रसों की 'रस माधुरी' शृंखला बहुत पसंद आई। आपने केवल इन रसों का बखान फ़िल्मी गीतों के लिए ही नहीं किया, बल्कि हमारी ज़िंदगी से जोड़ कर भी आप ने इनको पूरे विस्तार से बताया, जिससे हमें हमारी ज़िंदगी से जुड़े पहलुओं को भी जानने को मिला। और हमें ज्ञात हुआ कि हमारे मन की इन मुद्राओं को भी फ़िल्मी गीतों में किस तरह से अभिव्यक्ति मिली है। आपके इन अथक प्रयासों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। और आपकी बात बिल्कुल सही है। मैं भी यह सोच रहा था कि "फिर छिड़ी रात बात फूलों की" ग़ज़ल और "फूल आहिस्ता फेंको" गीत के बोलों में, बड़े ही सुंदर तरीक़े से "फूल" शब्द का इस्तेमाल किया गया, जिसको सुनकर दिलों में भी फूलों की तरह नर्मोनाज़ुक अहसास पैदा हो जाते हैं। इससे ज़्यादा और किसी गीत की कामयाबी क्या होगी!

'ओल्ड इज़ गोल्ड - सफ़र अब तक' पढ़कर मज़ा आ गया। और हमारे जो साथी बाद में जुड़े थे, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, सब को मालूम हो गया कि पिछे का भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का सफ़र कितना शानदार रहा है। मैं एक दिन ऐसा सोच ही रहा था कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का पिछला सफ़र कैसा रहा होगा, इसमें किस तरह के और कौन कौन से गीत बजे होंगे, और आपने शायद मेरे मन की आवाज़ को सुन ली। क्योंकि हमारे इस महफ़िल का नाम भी तो आवाज़ ही है, जो कि पीछे की, आगे की, अभी की सारी आवाज़ों को अपने में शामिल किए हुए है। इसके लिए मैं आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। इसकी वजह से हम भी अब आवाज़ की इस महफ़िल से किसी भी तरह से अंजान नहीं रहे हैं।

धन्यवाद।

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वाह ख़ानसाब, और आपका बहुत बहुत शुक्रिया भी। आइए आज एक ऐसा गीत सुनते हैं जो आज के दिन के लिए बहुत ही सटीक है। आज क्रिसमस है और इस अवसर पर बनने वाले फ़िल्मी गीतों की बात करें तो सबसे पहले जिस गीत की याद आती है वह है फ़िल्म 'ज़ख़्मी' का "जिंगल बेल जिंगल बेल.... आओ तुम्हे चाँद पे ले जाएँ"। गौहर कानपुरी का लिखा और बप्पी लाहिड़ी का संगीतबद्ध किया हुआ यह गीत है जिसे लता मंगेशकर और सुषमा श्रेष्ठ ने गाया है। गीत फ़िल्माया गया है आशा पारेख और बेबी पिंकी पर। कहानी के सिचुएशन के मुताबिक़ गीत का फ़िल्मांकन दर्दीला है। गीत "जिंगल बेल्स" से शुरु होकर मुखड़ा "आओ तुम्हे चांद पे ले जाएँ, प्यार भरे सपने सजाएँ" पे ख़त्म होता है। अंतरों में भी एक सपनों की सुखद दुनिया का चित्रण है। गीत के फ़िल्मांकन से अगर बोलों की तुलना की जाये तो एक तरह से विरोधाभास ही झलकता है। राजा ठाकुर निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त, आशा पारेख, राकेश रोशन और रीना रॊय। तो आइए सुनते हैं यह गीत और आप सभी को एक बार फिर से किरस्मस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

गीत - जिंगल बेल्स... आओ तुम्हे चाँद पे (ज़ख़्मी)


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी के साथ आपसे कल फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

बुधवार, 11 अगस्त 2010

किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है...हसन कमाल ने कुछ यूँ रंगा ये हिज्र और वस्ल का समां कि आज भी सुनें तो एक टीस सी उभर आती है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 459/2010/159

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों जारी है ८० के दशक के दस चुनिंदा फ़िल्मी ग़ज़लों पर आधारित लघु शृंखला 'सेहरा में रात फूलों की'। ये दस ग़ज़लें दस अलग अलग शायरों के कलाम हैं। अब तक हमने इसमें जिन शायरों के कलाम सुनें हैं, वो हैं हसरत जयपुरी, शहरयार, नक्श ल्यालपुरी, इंदीवर, आरिफ खान, जावेद अख़्तर, इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिक़ी और कल आपने निदा फ़ाज़ली साहब की लिखी हुई ग़ज़ल सुनी। आज इस शृंखला की नवी कड़ी में पेश है शायर और गीतकार हसन कमाल का कलाम फ़िल्म 'ऐतबार' से। आशा भोसले और भूपेन्द्र की युगल आवाज़ों में यह ग़ज़ल है। और दोस्तों, पहली बार इस ग़ज़ल के बहाने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनाई दे रहा है संगीतकार बप्पी लाहिड़ी का संगीत। युं तो बप्पी दा डिस्को किंग् का इमेज रखते हैं, और ८० के दशक में फ़िल्म संगीत का स्तर गिराने वालों में उन्हे एक मुख्य अभियुक्त करार दिया जाता है, लेकिन यह बात भी सच है कि भले ही वो डिस्को और पाश्चात्य संगीत पर आधारित गानें ही ज़्यादा बनाए, लेकिन शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और सुगम संगीत पर भी उनकी पकड़ मज़बूत रही है। कुछ ऐसे गीतों की याद दिलाएँ आपको? फ़िल्म - 'आँगन की कली', गीत - "सइयां बिना घर सूना सूना", फ़िल्म - 'झूठी', गीत - "चंदा देखे चंदा तो ये चंदा शरमाए", फ़िल्म - 'मोहब्बत', गीत - "नैना ये बरसे मिलने को तरसे", फ़िल्म - 'अपने पराए', गीत - "हल्के हल्के आई चल के, बोले निंदिया रानी" और "श्याम रंग रंगा रे", फ़िल्म - 'टूटे खिलौने', गीत - "माना हो तुम बेहद हसीं", फ़िल्म - 'सत्यमेव जयते', गीत - "दिल में हो तुम आँख में तुम", फ़िल्म - 'लहू के दो रंग', गीत - "ज़िद ना करो अब तो रुको" और "माथे की बिंदिया बोले"। ऐसे और भी न जाने कितने गानें हैं बप्पी दा के जो बेहद सुरीले हैं और इस देश की ख़ुशबू लिये हुए है। आज फ़िल्म 'ऐतबार' के जिस ग़ज़ल की हम बात कर रहे हैं वह है - "किसी नज़र को तेरा इंतेज़ार आज भी है, कहाँ हो तुम के ये दिल बेक़रार आज भी है"। हसन कमाल की यह एक बेहद मक़बूल फ़िल्मी ग़ज़ल है, और उनके लिखे फ़िल्म 'निकाह' के ग़ज़लों के भी तो क्या कहने! नौशाद साहब की दूसरी आख़िरी फ़िल्म 'तेरी पायल मेरे गीत' में हसन कमाल ने गीत लिखे थे जिन्हे लता जी ने गाया था। और फिर फ़िल्म 'सिलसिला' का वह ख़ूबसूरत गीत भी तो है "सर से सरकी सर की चुनरिया लाज भरी अखियों में"। इसमें हसन कमाल ने "सरकी" और "सर की" का कितनी सुंदरता से प्रयोग किया था।

'ऐतबार' सन् १९८५ की रोमेश शर्मा की फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था मुकुल आनंद ने। डिम्पल कपाडिया, राज बब्बर, सुरेश ओबेरॊय और डैनी अभिनीत इस फ़िल्म में हसन कमाल के अलावा फ़ारुख़ कैसर ने भी गीत लिखे थे। यह फ़िल्म १९५४ में ऐल्फ़्रेड हिचकॊक की थ्रिलर फ़िल्म 'डायल एम फ़ॊर मर्डर' का रीमेक है। इस हिदी वर्ज़न में थोड़ी सी फेर बदल की गई है। फ़िल्म में सुरेश ओबेरॊय एक ग़ज़ल गायक हैं और उन्ही पर फ़िल्म के दो बेहतरीन गीत - प्रस्तुत ग़ज़ल और "लौट आ गईं फिर से उजड़ी बहारें" फ़िल्माया गया है। इस ग़ज़ल की बात करें तो इसके शायर हसन कमाल ने सच में कमाल ही किया है इसमें। कुल ६ शेर हैं इस ग़ज़ल में और उसके बाद ग़ज़ल को एक आख़िरी सातवें शेर से ख़त्म किया जाता है जिसका मीटर अलग है। ज़्यादातर इस तरह का शेर ग़ज़ल के शुरुआती शेर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन यहाँ ग़ज़ल के अंत में इसका प्रयोग हुआ है और वह भी फ़िल्म के शीर्षक को शेर में लाकर हसन साहब ने अपनी दक्षता का परिचय दिया है। हसन कमाल साहिर लुधियानवी के अनन्य भक्त थे और उन्हे बहुत मानते थे। हसन साहब सन् १९९९ में विविध भारती पर "मेरी यादों में साहिर लुधियानवी" शीर्षक से एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया था और साहिर साहब से जुड़ी उनकी तमाम यादों पर से परदा उठाया था। आइए उसी कार्यक्रम में से कुछ अंश यहाँ पेश करते हैं। हसन कमाल बता रहे हैं साहिर लुधियानवी से उनकी पहली मुलाक़ात के बारे में। "साहिर लुधियानवी साहब से मेरी पहली मुलाक़ात लखनऊ में हुई थी, जब मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी का स्टुडेण्ट था, और वो यूनिवर्सिटी के एक मुशायरे में पहली बार लखनऊ आ रहे थे। ये वो ज़माना था जब साहिर लुधियानवी का वो क्रेज़ था कि लोग कहते थे कि अगर कोई साहिर लुधियानवी का नाम नहीं जानता, तो या तो वो शायरी के बारे में कुछ नहीं जानता, या फिर वो नौजवान नहीं, क्योंकि साहिर साहब उस ज़माने में नौजवानों के मेहबूबतरीन शायर हुआ करते थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं उन्हे रिसीव करने के लिए दूसरे स्टुडेण्ट्स के साथ चारबाग़ पहुँचा, तो मेरी ख़ुशी का यह हाल था कि जैसे न जाने ये मेरी ज़िंदगी का कौन सा दिन है और किस हस्ती के दीदार होने वाले हैं कि जिसके दीदार के बग़ैर हमें यह लग रहा था कि ज़िंदगी अधूरी रहेगी। वो तशरीफ़ लाए, हम लोग उन्हे वहाँ से रिसीव करके लाए, और उन्हे एक होटल में ठहराया गया, और मेरा उनसे तारुफ़ यह कह कर करवाया गया कि 'साहिर साहब, ये हसन कमाल हैं, हमारे बहुत ही तेज़ और तर्रार क़िस्म के तालीबिल्मों में, स्टुडेण्ट्स में, और इनकी सब से बड़ी ख़ुसूसीयत यह है कि इन्हे आप की नज़्म 'परछाइयाँ', जो १९ पेजेस लम्बी नज़्म है, ज़बानी याद है'। साहिर साहब बहुत ख़ुश हुए, और शाम को जब हम उन्हे लेने गए तो वक़्त से कुछ पहले पहुँच गए थे, तो उन्होनें बात करते करते अचानक कहा कि 'भई, किसी ने मुझे बताया कि तुम्हे 'परछाइयाँ' पूरी याद है?' मैंने अर्ज़ किया कि 'जी हाँ'। कहने लगे कि 'अच्छा, सुनाओ'। और मैंने पूरी 'परछाइयाँ' नज़्म उनको एक ही नशिस्त में पढ़ कर सुना दी। और वो सुनते रहे। और जब नज़्म ख़त्म हुई तो उनका कमेण्ट यह था कि 'भई ऐसा है, कि मैं पंजाबी हूँ, और शेर बहुत बुरा पढ़ता हूँ, और आज जब तुमको अपनी नज़्म पढ़ते सुना, तो मुझे यह महसूस हो रहा है कि आज के मुशायरे में मेरे बजाए मेरी शायरी तुम ही सुनाना'।" कॊलेज स्टुडेण्ट हसन कमाल के लिए यह बहुत बड़ी बात थी कि साहिर जैसे शायर अपनी शायरी उनसे पढ़वाना चाहते थे। तो दोस्तों, आइए सुना जाए भूपेन्द्र और आशा भोसले की गाई इस जोड़े की सब से प्यारी ग़ज़ल "किसी नज़र को तेरा इंतेज़ार आज भी है"। शायद 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को भी इस ग़ज़ल का बहुत दिनों से इंतेज़ार था।

किसी नज़र को तेरा इंतेज़ार आज भी है,
कहाँ हो तुम के ये दिल बेक़रार आज भी है।

वो वादियाँ वो फ़ज़ाएँ के हम मिले थे जहाँ,
मेरी वफ़ा का वहीं पर मज़ार आज भी है।

न जाने देख के क्यों उनको ये हुआ अहसास,
के मेरे दिल पे उन्हे इख़्तियार आज भी है।

वो प्यार जिसके लिए हमने छोड़ दी दुनिया,
वफ़ा की राह में घायल वो प्यार आज भी है।

यकीं नहीं है मगर आज भी ये लगता है,
मेरी तलाश में शायद बहार आज भी है।

ना पूछ कितने मोहब्बत के ज़ख़्म खाए हैं,
के जिनके सोच में दिल सौगवार आज भी है।

ज़िंदगी क्या कोई निसार करे, किससे दुनिया में कोई प्यार करे,
अपना साया भी अपना दुश्मन है, कौन अब किसका ऐतबार करे।



क्या आप जानते हैं...
कि बप्पी लाहिड़ी ने केवल १६ वर्ष की आयु में एक बंगला फ़िल्म 'दादू' में संगीत दिया था जिसमें तीनों मंगेशकर बहनों (लता, आशा, उषा) से उन्होने गाने गवाए थे।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. शायर बताएं इस बेहद खूबसूरत गज़ल के - ३ अंक.
२. खय्याम साहब के संगीत से सजी इस गज़ल को किस फनकार ने अंजाम दिया है लता के साथ - २ अंक.
३. मतले में शब्द है -"बारात", फिल्म बताएं - १ अंक.
४. निर्देशक बताएं फिल्म के - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
३ अंक पवन कुमार जी लूट गए, शरद जी, प्रतिभा जी और किशोर जी भी सही जवाब के साथ मिले. शरद जी नेट पर डी गयी हर जानकारी सही नहीं होती. रोमेंद्र जी आप लेट हो गए. मनु जी, सुमित जी, शेयाला जी, और इंदु जी आप सब को यहाँ देख अच्छा लगा, और दिलीप जी, इंदु जी की शिकायत में हम अपनी भी आवाज़ मिलते हैं. :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

इश्क ने ऐसा नचाया कि घुंघरू टूट गए........"लैला" की महफ़िल में "क़तील"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #२७

धीरे-धीरे महफ़िल में निखार आने लगा है। भले हीं पिछली कड़ी में टिप्पणियाँ कम थीं,लेकिन इस बात की खुशी है कि इस बार बस "शरद" जी ने हीं भाग नहीं लिया, बल्कि "दिशा" जी ने भी इस मुहिम में हिस्सा लेकर हमारे इस प्रयास को एक नई दिशा देने की कोशिश की। "दिशा" जी ने न केवल अपनी सहभागिता दिखाई, बल्कि "शरद" जी से भी पहले उन्होंने दोनों सवालों का जवाब दिया और सटीक जवाब दिया, यानी कि वे ४ अंकों की हक़दार हो गईं। "शरद" जी को उनके सही जवाबों के लिए ३ अंक मिलते हैं। इस तरह "शरद" जी के हुए ७ अंक और दिशा जी के ४ अंक। "शरद" जी, आपने "इक़बाल बानो" की जिस गज़ल की बात की है, अगर संभव हुआ तो आने वाले दिनों में वह गज़ल हम आपको जरूर सुनवाएँगे। चूँकि किसी तीसरे इंसान ने अपने दिमागी नसों पर जोर नहीं दिया, इसलिए २ अंकों वाले स्थान खाली हीं रह गए। चलिए कोई बात नहीं, एक एपिसोड में हम ४ अंक से ३ अंक तक पहुँच गए तो अगले एपिसोड यानी कि आज के एपिसोड में हमें २ अंक पाने वाले लोग भी मिल हीं जाएंगे। वैसे "मज़रूह सुल्तानपुरी" साहब का एक शेर भी हैं कि "मैं अकेला हीं चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।" अब जब इस मुहिम की शुरूआत हो गई है तो एक न एक दिन सफ़लता मिलेगी हीं। इसी दृढ विश्वास के साथ आज की पहेलियों का दौर आरंभ करते हैं। उससे पहले- हमेशा की तरह इस अनोखी प्रतियोगिता का परिचय : २५ वें से २९ वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद ३ अंक और उसके बाद हर किसी को २ अंक मिलेंगे। जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है,मतलब कि उससे जुड़ी बातें किस अंक में की गई थी। इन ५ कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की तीन गज़लों की फरमाईश कर सकता है, जिसे हम ३०वीं से ३५वीं कड़ी के बीच में पेश करेंगे। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) महज़ "नौ" साल की उम्र में "महाराज हरि सिंह" के दरबार की शोभा बनने वाली एक फ़नकारा जो "अठारह" साल की उम्र में चुपके से महल से इस कारण भाग आई ताकि वह महाराज के "हरम" का एक हिस्सा न बन जाए।
२) एक फ़नकार जिन्हें जनरल "अयूब खान" ने "तमगा-ए-इम्तियाज", जनरल "ज़िया-उल-हक़" ने "प्राइड औफ़ परफारमेंश" और जनरल "परवेज मु्शर्रफ़" ने "हिलाल-ए-इम्तियाज" से नवाजा। इस फ़नकार की नेपाल के राजदरबार से जुड़ी एक बड़ी हीं रोचक कहानी हमने आपको सुनाई थी।


सवालों का पुलिंदा पेश करने के बाद महफ़िल की और लौटने में जो मज़ा है, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। वैसे आज की महफ़िल की बात हीं कुछ अलग है। न जाने क्यों कई दिनों से ये शायर साहब मेरे अचेतन मस्तिष्क में जड़ जमाए बैठे थे। यहाँ तक कि पिछली महफ़िल में हमने जो शेर डाला था, वो भी इनका हीं था। शायद यह एक संयोग है कि शेर डालने के अगले हीं दिन हमें उनकी पूरी की पूरी नज़्म सुनने को नसीब हो रही है। दुनिया में कई तरह के तखल्लुस देखे गए हैं, और उनमें से ज्यादातर तखल्लुस औरों पर अपना वर्चस्व साबित करने के लिए गढे गए मालूम होते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी शायर हुए हैं, जो अपने तखल्लुस के बहाने अपने अंदर बसे दर्द की पेशगी करते हैं। ऐसे हीं शायरों में से एक शायर हैं जनाब "क़तील शिफ़ाई"। क़तील का अर्थ होता है,वह इंसान जिसका क़त्ल हुआ हो। अब इस नाम से हीं इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायर साहब अपनी ज़िंदगी का कौन-सा हिस्सा दुनिया के सामने प्रस्तुत करना चाहते हैं।२४ दिसम्बर १९१९ को पाकिस्तान के "हरिपुर" में जन्मे "औरंगजेब खान" क़तील हुए अपनी शायरी के कारण तो "शिफ़ाई" हुए अपने गुरू "हक़ीम मोहम्मद शिफ़ा" के बदौलत। बचपन में पिता की मौत के कारण इन्हें असमय हीं अपनी शिक्षा का त्याग करना पड़ा। रावलपिंडी आ गए ताकि किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट पाल सकें। ६० रूपये के मेहनताने पर एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी कर ली। १९४६ में लाहौर के "अदब-ए-लतिफ़" से जब असिसटेंट एडिटर के पद के लिए न्यौता आया तो खुद को रोक न सके , आखिर बचपन से हीं साहित्य और शायरी में रूचि जो थी। इनकी पहली गज़ल "क़मर जलालाबादी" द्वारा संपादित साप्ताहिक पत्रिका "स्टार" में छपी। इसके बाद तो इनका फिल्मों के लिए रास्ता खुल गया। इन्होंने अपना सबसे पहला गाना जनवरी १९४७ में रीलिज हुई फिल्म "तेरी याद" के लिए लिखा। १९९९ में रीलिज हुई "बड़े दिलवाला" और "ये है मुंबई मेरी जान" तक इनके गानों का दौर चलता रहा। "क़तील" साहब की कई सारी नज़्में और गज़लें आज भी मुशायरों में गुनगुनाई जाती हैं , मसलन "अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको", "उल्फ़त की नई मंज़िल को चला तू", "जब भी चाहे एक नई सूरत बना लेते हैं लोग", "तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं" और "वो दिल हीं क्या तेरे मिलने की जो दुआ न करे"। क़तील साहब से जुड़ी और भी बातें हैं,लेकिन सब कुछ एकबारगी खत्म कर देना अच्छा न होगा, इसलिए बाकी बातें कभी बाद में करेंगे, अभी आज की फ़नकारा की ओर रूख करते हैं।

"मल्लिका पुखराज" और "फ़रीदा खानुम" के बाद आज हम जिन फ़नकारा को लेकर आज हाज़िर हुए हैं, गज़ल और नज़्म-गायकी में उनका भी अपना एक अलग रूतबा है। यूँ तो हैं वे बांग्लादेश की, लेकिन पाकिस्तान और हिंदुस्तान में भी उनके उतने हीं अनुपात में प्रशंसक हैं,जितने अनुपात में बांग्लादेश में हैं। अनुपात की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि हिंदुस्तान की जनसंख्या पाकिस्तान और बांग्लादेश से कहीं ज्यादा है, इसलिए प्रशंसकों की संख्या की तुलना बेमानी होगी। ७० के दशक में जब उन्होंने "दमादम मस्त कलंदर" गाया तो हिंदुस्तानी फिल्मी संगीत के चाहने वालों के दिलों में एक हलचल-सी मच गई। १९७४ में रीलिज हुई "एक से बढकर एक" के टाईटल ट्रैक को गाकर तो वे रातों-रात स्टार बन गईं। कई लोगों को यह भी लगने लगा था कि अगर वे बालीवुड में रूक गई तो मंगेशकर बहनों (लता मंगेशकर और आशा भोंसले) के एकाधिकार पर कहीं ग्रहण न लग जाए। लेकिन ऐसा न हुआ, कुछ हीं फ़िल्मों में गाने के बाद उन्होंने बंबई को छोड़ दिया और पाकिस्तान जा बसीं। वैसे बप्पी दा के साथ उनकी जोड़ी खासी चर्चित रही। "ई एम आई म्युजिक" के लिए इन दोनों ने "सुपर-रूना" नाम की एक एलबम तैयार की, जिसे गोल्ड और प्लैटिनम डिस्कों से नवाज़ा गया। पाकिस्तान के जानेमाने संगीत निर्देशक "नैयर" के साथ उनकी एलबम "लव्स आफ़ रूना लैला" को एक साथ दो-दो प्लैटिनम डिस्क मिले। अब तक तो आप समझ हीं गए होंगे कि हम किन फ़नकारा की बात कर रहे हैं। जी हाँ, हम "रूना लैला" की हीं बात कर रहे हैं, जिन्होंने आज तक लगभग सत्रह भाषाओं में गाने गाए हैं और जिन्हें १५० से भी ज्यादा पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। "रूना लैला" संगीत के क्षेत्र में कैसे उतरीं, इसकी बड़ी हीं मज़ेदार दास्तां है। "रूना" के लिए संगीत बस इनकी बड़ी बहन "दिना" की गायकी तक हीं सीमित था। हुआ यूँ कि जिस दिन "दिना" का परफ़ार्मेंस था,उसी दिन उनकी आवाज़ बैठ गई। आयोजन विफ़ल न हो जाए, इससे बचने के लिए "रूना" को उनकी जगह उतार दिया गया। उस समय "रूना" इतनी छोटी थीं कि सही से "तानपुरा" पकड़ा भी नही जा रहा था। किसी तरह जमीन का सहारा देकर उन्होंने "तानपुरा" पर राग छेड़ा और एक "ख्याल" पेश किया। एक छोटी बच्ची को "ख्याल" पेश करते देख "दर्शक" मंत्रमुग्ध रह गए। बस एक शुरूआत की देर थी ,फिर उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। आज वैसा हीं कुछ मनमोहक अंदाज लेकर हमारे सामने आ रही हैं "रूना लैला"। उस नज़्म को सुनने से पहले क्यों न हम आज के शायर "क़तील शिफ़ाई" का एक प्यारा-सा शेर देख लें:

तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में लगा रखा है
इक दिया है जो अँधेरों में जला रखा है


चलिए अब थोड़ा भी देर किए बिना आज की नज़्म से रूबरू होते हैं। इस नज़्म को संगीत से सजाया है "साबरी ब्रदर्स" नाम से प्रसिद्ध भाईयों की जोड़ी में से एक "मक़बूल साबरी" ने। "मक़बूल" साहब और "साबरी ब्रदर्स" की बातें किसी अगली कड़ी में। अभी तो बस ऐसा रक्श कि घुंघरू टूट पड़े:

वाइज़ के टोकने पे मैं क्यों रक्श रोक दूँ,
उनका ये हुक्म है कि अभी नाचती रहूँ।

मोहे आई न जग से लाज,
मैं इतनी जोर से नाची आज,
कि घुंघरू टूट गए।

कुछ मुझपे नया जोबन भी था,
कुछ प्यार का पागलपन भी था,
एक पलक पलक बनी तीर मेरी,
एक जुल्फ़ बनी जंजीर मेरी,
लिया दिल साजन का जीत,
वो छेडे पायलिया ने गीत
कि घुंघरू टूट गए।

मैं बसी थी जिसके सपनों में,
वो गिनेगा मुझको अपनों में,
कहती है मेरी हर अंगड़ाई,
मैं पिया की नींद चुरा लाई,
मैं बनके गई थी चोर,
कि मेरी पायल थी कमजोर
कि घुंघरू टूट गए।

धरती पर न मेरे पैर लगे,
बिन पिया मुझे सब गैर लगे,
मुझे अंग मिले परवानों के,
मुझे पंख मिले अरमानों के,
जब मिला पिया का गाँव,
तो ऐसा लचका मेरा पाँव
कि घुंघरू टूट गए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

रूह बेचैन है एक दिल की अजीयत क्या है,
दिल ही __ है तो ये सोज़े मोहब्बत क्या है...

आपके विकल्प हैं -
a) शोला, b) दरिया, c) शबनम, d) पत्थर

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था -"समुन्दर" और शेर कुछ यूं था-

मैं समुन्दर भी हूँ मोती भी हूँ ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको...

दिशा जी ने यहाँ भी बाज़ी मारी. बहुत बहुत बधाई सही जवाब के लिए, आपका शेर भी खूब रहा -

इश्क का समंदर इतना गहरा है
जो डूबा इसमे समझो तैरा है...

वाह....

शरद जी ने भी अपने शेर से खूब रंग जमाया -

अपनी बातों में असर पैदा कर
तू समन्दर सा जिगर पैदा कर
बात इक तरफा न बनती है कभी
जो इधर है वो उधर पैदा कर ।

रचना जी ने फरमाया -

समंदर न सही समंदर सा हौसला तो दे
ज़िन्दगी से रिश्ता हम को निभाना तो है

तू लिखता चल किनारे पर नाम उनका
समंदर की मौजों को उनसे टकराना तो है

तो सुमित जी ने कुछ त्रुटी के साथ ही सही एक बढ़िया शेर याद दिलाया -

मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे, जो समंदर मेरी तलाश में है....

मनु जी पधारे इस शेर के साथ -

समंदर आज भी लज्ज़त को उसके याद करता है
कभी इक बूँद छूट कर आ गिरी थी, दोशे -बादल से...

वाह...कुलदीप अंजुम जी ने तो समां ही बांध दिया ऐसे नायाब शेर सुनकर -

अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मैं मूझे डूब कर मार जाने दो

गुडियों से खेलती हुयी बच्ची की आंख में
आंसू भी आ गया तो समंदर लगा हमें

और

बड़े लोगो से मिलने में हमेशा फासला रखना
मिले दरिया समंदर में कभी दरिया नहीं रहता....

पर दोस्तों आप हमसे मिलने में कभी कोई फासला मत रखियेगा.....जो भी दिल में हो खुलकर कहियेगा....इसी इल्तिजा के साथ अगली महफिल तक अलविदा....

अहा! आपसे विदा लेने से पहले पूजा जी की टिप्पणी पर टिप्पणी करना भी तो लाज़िमी है। पिछली बार की उलाहनाओं के बाद पूजा जी ने शेर तो फरमाया, लेकिन यह क्या शब्द हीं गलत चुन लिया । सही शब्द पूजा जी अब तक जान हीं चुकी होंगी।

यह देखिए, पूजा जी ने मनु जी की खबर ली तो मनु जी एक नए शेर के साथ फिर से हाज़िर हो गए, शायद इसी को लाईन हाज़िर होना कहते हैं :) । वैसे मुझे लगता है कि मनु जी को भूलने की बीमारी लग गई है, हर बार अगला शेर डालने समय वे पिछले शेर को भूल चुके होते हैं और हर बार हीं उनका कहना होता है कि "ये भी नहीं के ये शे'र मैंने कब सुनाये हैं"...मनु जी सुधर जाईये........या फिर पता कीजिए कि आपके नाम से शेर कौन डाल जाता है।

चलिए अब बहुत बातें हो गईं। अगली कड़ी तक के लिए "खुदा हाफ़िज़"..
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

"मैं उस दिन गाऊंगा जिस दिन आप धारा प्रवाह हिन्दी बोल कर दिखायेंगे..."- प्रसून जोशी

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (५)

साहित्य और संगीत एक एल्बम में

हिंद युग्म का पहला एल्बम "पहला सुर" कई मायनों में अनोखा था. इसमें पहली बार साहित्य और संगीत को एक धागे में पिरोकर प्रस्तुत किया गया था. बेशक ये बहुत बड़े पैमाने पर नही था पर सोच अपने समय से आगे की थी. इस बात की पुष्टि करता है टाईम्स म्यूजिक का नया एल्बम "द म्यूजिक ऑफ़ सुपरस्टार इंडिया". जो कि शोभा डे की लिखी पुस्तक "सुपरस्टार इंडिया" से प्रेरित है.संगीत का मोर्चा संभाला है मिति अधिकारी और नील अधिकारी ने जो मिलकर बनते हैं MANA. बंगाल के बाउल और राजस्थान के लंगास के मन लुभावने संगीत के बीचों बीच आप सुन सकते हैं शोभा की आवाज़ में पुस्तक के अंश भी. इन पारंपरिक गीतों को MANA ने बहुत आधुनिक अंदाज़ में प्रस्तुत किया है, यहाँ लाउंज भी है, रेग्गे भी, ट्रांस भी और क्लब भी, जो शायद हर पीढी को संगीत का आनंद भरपूर दे पायेगी. दुर्लभ संगीत अल्बम्स के संकलन के शौकीन संगीत प्रेमी इसे अवश्य खरीदें.


"सॉरी भाई" ये मेरा गाना है...

संगीत की चोरी का मामला एक बार फ़िर प्रकाश में हैं, आपको याद होगा किस प्रकार संगीतकार राम सम्पंथ ने निर्देशक राकेश रोशन को अदालत का दरवाज़ा दिखलाया था जब संगीतकार राजेश रोशन ने राम सम्पथ की धुन चुरा कर फ़िल्म "क्रेजी ४" में इस्तेमाल किया था. पॉप और सूफी गायक रब्बी ने आरोप लगाया है फ़िल्म 'सॉरी भाई' के एक गाने की धुन उनकी रचना की हुबहू नक़ल है. फ़िल्म के संगीतकार हैं गौरव दयाल. अदालत ने फ़िल्म के प्रदर्शन पर से तो रोक हटा ली है पर निर्माता वाशु भगनानी से जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया है. वाशु का कहना है कि उन्हें इस बाबत जानकारी नही थी. उन्हें गौरव ने धुन अपनी कह कर सुनवाई थी, पर वो रब्बी को जरूरी मुहवाजा देने को तैयार हैं, यदि उनकी बात सही पायी गई तो. आए दिन आने वाली चोरी की इन खबरों से संगीत जगत स्तब्ध है.


प्रसून एक गायक भी

गीतकार प्रसून के लिखे गीतों से हम सब वाकिफ हैं, पर बहुत कम लोग जानते है कि वो उन्होंने उस्ताद हफीज अहमद खान से शास्त्रीय संगीत की दीक्षा भी ले रखी है.उनके उस्ताद उन्हें ठुमरी गायक बनाना चाहते थे. उन दिनों को याद कर प्रसून बताते हैं कि उनके पास रियाज़ का समय नही होता था, तो बाईक पर घर लौटते समय गाते हुए आते थे और उनका हेलमेट उनके लिए "अकॉस्टिक" का काम करता था. प्रसून संगीत को अपना उपार्जन नही बना पाये. उनके पिता उन्हें प्रशासन अधिकारी बनाना चाहते थे पर ये उनका मिजाज़ नही था, तो MBA करने के बाद आखिरकार विज्ञापन की दुनिया में आकर उनकी रचनात्मकता को जमीन मिली. बचपन से उन्हें हिन्दी और उर्दू भाषा साहित्य में रूचि थी. उनके शहर रामपुर के एक पुस्तकालय में उर्दू शायरों का जबरदस्त संकलन मौजूद था. मात्र १७ साल की उम्र में उनका पहला काव्य संकलन आया. कविता अभी भी उनका पहला प्रेम है. प्रसून मानते हैं कि यदि संगीत के किसी एक घटक की बात की जाए जो आमो ख़ास सब तक पहुँचता हो और जहाँ हमने विश्व स्तर की निरंतरता बनाये रखी हो तो वो गीतकारी का घटक है. ५० के दशक से आज तक फ़िल्म जगत के गीतकारों ने गजब का काम किया है. "हम तुम", "फ़ना" और "तारे जमीन पर" जैसी फिल्मों के गीत लिख कर फ़िल्म फेयर पाने वाले प्रसून तारे ज़मीन पर के अपने सभी गीतों को अपनी बेटी ऐश्निया को समर्पित करते हैं, और बताते हैं कि किस तरह एक ८० साल के बूढे आदमी ने उनके लिखे "माँ" गीत की तारीफ करते हुए उनसे कहा था कि वो अपनी माँ को बचपन में ही खो चुके थे, गाने के बोल सुनकर उन्हें उनका बचपन याद आ गया. ऐ आर रहमान के साथ गजिनी में काम कर रहे प्रसून से जब रहमान गीत को आवाज़ देने की "गुजारिश" की तो प्रसून ने बड़ी आत्मीयता से कहा कि जिस दिन आप धाराप्रवाह हिन्दी बोलने लगेंगे उस दिन मैं आपके लिए अवश्य गाऊंगा.देखते हैं वो दिन कब आता है.


मैं ऐक्टर तो नही....मगर...

लीजिये एक और गायक /संगीतकार का काम अब एक्टिंग की दुनिया से जुड़ने वाला है. विश्वास कीजिये हमारे बप्पी दा यानी कि मशहूर संगीतकार और गायक बप्पी लहरी अब फिल्मों में अभिनय करते नज़र आयेंगे. "इट्स रोक्किंग दर्द ऐ डिस्को" नाम से बन रही इस फ़िल्म में बप्पी दा प्रमुख किरदार निभा रहे हैं साथ ही गायन और संगीत भी उन्हीं का है. इसके अलावा वो सलमान और करीना की आने वाली फ़िल्म "मैं और मिसेस खन्ना" में भी एक प्रमुख रोल में नज़र आयेंगे. चौकिये मत अभी ये सूची और लम्बी होने वाली है. इंडियन आइडल अभिजीत सावंत नज़र आयेंगें आने वाली फ़िल्म "लूटेरे" में, तो आनंद राज आनंद और सुखविंदर के भी बारे में भी ख़बर आई है कि वो भी जल्द ही फिल्मों अपना अभिनय कौशल दिखलायेंगे. लगता है हमारे संगीत सितारों को "हिमेशिया सरूर" हो गया है

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