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Monday, December 11, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 18 || रविन्द्र जैन

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 18
Ravindra Jain


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के 18 वें एपिसोड में सुनिए कहानी रविन्द्र जैन की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Saturday, April 11, 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 01 (रवीन्द्र जैन)


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 01
 

मन की आँखें हज़ार होती हैं...!’
रवीन्द्र जैन




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी। आज से हम इसी शीर्षक से एक नई शृंखला शुरू कर रहे हैं जिसमें हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किए हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक समर्पित है गीतकार, संगीतकार, कवि और गायक रवीन्द्र जैन को।


28 फ़रवरी 1944 के दिन पंडित इन्द्रमणि ज्ञान प्रसाद जी के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। परिवार में ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। पर जल्द ही यह पता चला कि उस बच्चे की आँखें बन्द हैं। डॉ. मोहनलाल ने जन्म के अगले दिन एक ऑपरेशन किया, उन्होंने उस बच्चे की आँखें खोली। पर जाँच करने के बाद उन्होंने ज्ञान प्रसाद जी को यह कठोर सत्य बता ही दिया कि भले आँखों की रोशनी धीरे धीरे आ सकती है, पर पढ़ना मुनासिब नहीं रहेगा क्योंकि ऐसा करने पर नुकसान होगा। परिवार में जैसे अन्धेरा छा गया। इस नवजात शिशु का नाम रखा गया रवीन्द्र। उनके पिता ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए यह निर्णय लिया था कि अपने पुत्र के जीवन का लक्ष्य संगीत ही होगा और संगीत में ही उसकी पहचान बनेगी। और यही हुआ। अपनी इस कमी को रवीन्द्र जैन ने भी कभी अपने उपर हावी नहीं होने दिया और अपनी लगन और बुद्धि के सहारे वो ना केवल एक गायक-संगीतकार बने बल्कि काव्य और साहित्य के भी विद्‍वान बने। 80 के व्यावसायिक दशक में भी उन्होंने अर्थपूर्ण गीत लिखे और कभी पैसे के पीछे भाग कर सस्ते गीत नहीं लिखे। रवीन्द्र जैन का नाम सुनते ही दिल श्रद्धा से भर जाता है, उन्हें प्रणाम करने को जी चाहता है।

रवीन्द्र जैन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें कभी भी अपने नेत्रहीनता पर अफ़सोस नहीं हुआ। उन्हीं के शब्दों में, "मैं जानता हूँ कि दुनिया में हर आदमी किसी ना किसी पहलू से विकलांग है, चाहे वो शरीर से हो, मानसिक रूप से हो या कोई अभाव जीवन में हो। विकलांगता का मतलब यह नहीं कि शारीरिक असुविधा है, कहीं ना कहीं लोग मोहताज हैं, अपाहिज हैं, और उसी पर विजय पाना है। उससे निराश होने की ज़रूरत नहीं है। disability can be your ability also, उससे आपकी क्षमता दुगुनी हो जाती है।"

और यही संदेश उन्होंने एक बार अंध-विद्यालय के छात्रों को भी दिया। उन्हें एक बार एक ब्लाइन्ड स्कूल में मुख्य अतिथि के रूप में आमन्त्रित किया गया। जब उन्हें बच्चों को संबोधित करने को कहा गया, तो उन्होंने संदेश के रूप में यह कविता पढ़ी...

तन की आँखें तो दो ही होती हैं
मन की आँखें हज़ार होती हैं
तन की आँखें तो सो ही जाती हैं
मन की आँखें कभी ना सोती हैं।

चाँद सूरज के हैं जो मोहताज
भीख ना माँगो उन उजालों से,
बन्द आँखों से तुम वो काम करो
आँख खुल जाए आँख वालों की।

हैं अन्धेरे बहुत सितारे बनो
दूसरों के लिए किनारे बनो,
है ज़माने में बेसहारे बहुत
तुम सहारे ना लो, सहारे बनो।

’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ रवीन्द्र जैन जी को दिल से करती है सलाम!




खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Saturday, May 17, 2014

"मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" - फ़िल्म इतिहास में कोई रंग नहीं राज कपूर की फ़िल्मों के बिना


एक गीत सौ कहानियाँ - 31
 

मैं हूँ ख़ुशरंग हिना...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कम सुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 31वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'हिना' के लोकप्रिय शीर्षक गीत "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" के बारे में।


राज कपूर न केवल एक फ़िल्मकार थे, संगीत की समझ भी उनमें उतनी ही थी। और यही कारण था कि उनकी समस्त फ़िल्मों का संगीत सफल रहा है, सदाबहार रहा है। हिट फ़िल्मों की तो बात ही छोड़ देते हैं, उनकी असफल फ़िल्मों के गीत भी सदाबहार रहे हैं। हर गीत के लिए वो उतनी ही मेहनत करते थे जितनी मेहनत फ़िल्म के अन्य पक्षों के लिए। एक-एक गीत में वो ख़ुद लगे रहते थे गीतकार-संगीतकार के साथ। गीतकार और संगीतकार से हर गीत में फेर- बदल करवाते थे। आसानी से किसी गीत को स्वीकृति देना राज कपूर की आदत नहीं थी। इसके चलते उनके गीतकारों और संगीतकारों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती। गीतकार नक्श ल्यायलपुरी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वो जब फ़िल्म 'हिना' के लिए "चिट्ठिये दर्द फ़िराक़ वालिये" गीत लिख कर लाये, तो उसे पढ़ कर राज कपूर ने यह कहा कि यह पहला गाना है जिसे मैं बिना किसी फेर-बदल करवाये अप्रूव कर रहा हूँ। नक्श ल्यायलपुरी के लिए यह गर्व की बात थी। फ़िल्म 'हिना' की बात चली है तो बता दें कि 1985 में 'राम तेरी गंगा मैली' की अपार सफलता के बाद राज कपूर का अगला बड़ा प्रोजेक्ट था 'हिना'। यह फ़िल्म रिलीज़ तो हुई 1991 में, पर इसका निर्माण काफ़ी पहले से ही शुरू हो चुका था। बल्कि 'राम तेरी गंगा मैली' फ़िल्म के गीतों के रेकॉर्डिंग के समय से ही राज कपूर और रवीन्द्र जैन के बीच फ़िल्म 'हिना' के गीतों की चर्चा शुरू हो चुकी थी। 1988 में राज कपूर के निधन के बाद उनके बेटे रणधीर कपूर ने फ़िल्म की कमान सम्भाली और इसे पूरी सफलता के साथ अंजाम दिया और इसे एक यादगार फ़िल्म के रूप में स्थापित किया। राज कपूर अपनी फ़िल्मों को पर्फ़ेक्ट बनाने के लिए किस हद तक जा सकते थे, फ़िल्म 'हिना' से जुड़ी दो बातों से पता चलता है। पहली बात तो यह कि फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि नायक नदी में बह कर भारत से पाक़िस्तान जा पहुँचते हैं और वहीं एक पाक़िस्तानी लड़की के सम्पर्क में आते हैं। इस नायिका की भूमिका के लिए राज कपूर ने किसी भारतीय अभिनेत्री को न चुन कर एक लम्बी खोज के बाद पाक़िस्तानी नायिका ज़ेबा को चुना। इतना ही नहीं, पाक़िस्तानी किरदारों के संवाद लेखन के लिए पाक़िस्तान की जानी-मानी लेखिका हसीना मोइन को राज़ी करवाया। बहुत कम फ़िल्मकार इतनी दूर की सोचते हैं। 

और अब आते हैं दूसरे क़िस्से पर जो एक बार फिर साबित करेगा राज कपूर के अपने फ़िल्म-निर्माण के प्रति समर्पण को। इस क़िस्से के बारे में फ़िल्म के संगीतकार (व कुछ गीतों के गीतकार) रवीन्द्र जैन के अपने शब्दों में- 'हिना' के साथ भी बड़ा मज़ेदार क़िस्सा हुआ। वो किस्सा बयाँ करने से पहले मैं सागर साहब (रामानन्द सागर) को प्रणाम करता हूँ, कल तक हमारे साथ थे; 'रामायण' जो हमारा महाकाव्य, जिसको उन्होंने घर-घर पहुँचाया, अपने नाम के अनुरूप, राम का आनन्द और उसका सागर, आनन्द का सागर बहाने वाले, घर-घर पहुँचाने वाले रामानन्द सागर, उनका यह सीरियल कर रहा था मैं, 'रामायण'। तो उनका एक गाना रेकॉर्ड करके उसी दिन फिर मैंने वह गाना राज साहब को सुनाया। वह गाना था, सिचुएशन बहुत अजीब थी, कैकेयी और भरत के बीच में था, भरत ने कभी माँ बुलाया नहीं उनको, तो उनकी आपस में बातचीत हो रही थी कहीं, और एक फ़कीर को हमने गाना दिया, बैकग्राउण्ड से गा रहा था, "ओ मैया तैने का ठानी मन में, राम-सिया भेज देरी बन में"। मैंने यह गा कर राज साहब को सुनाया और कहा कि यह गाना आज मैंने रेकॉर्ड किया है। तो उन्होंने कहा कि देख देख देख, तूने यह गाना सुनाया न, मेरे रोंगटे खड़े हो गये, देख देख देख। यह सुन कर मुझे बड़ा अच्छा लगा, लेकिन अगले ही पल वो अपनी पत्नी की तरफ़ देख कर बोले कि अब ये 'हिना' नहीं कर सकता। मैंने सोचा कि मर गये, यह क्या हो गया! मैं सोच में पड़ गया कि क्या करें! फिर उस दिन तो मैं चला आया वहाँ से। मेरा बड़ा मन था कि यह इतना बड़ा प्रोजेक्ट मेरे हाथ से चला जायेगा! तो करीब-करीब सात दिन बाद मुझे इनका फोन आया, जो राज साहब के यहाँ प्रोडक्शन देखते थे, उन्होंने कहा कि राज साहब ने कहा है कि उनके साथ श्रीनगर चलना है। तो मैं, मेरी पत्नी दिव्या, राज जी और कृष्णा भाभी, हम लोग कश्मीर गये। कुछ नहीं साहब, कोई ज़िक्र नहीं फ़िल्म का, न गीत-संगीत का, बस चलो आज यहाँ, कल वहाँ, शिकारे में घूमो, यहाँ खाना खाओ, चलो ये करो वो करो, यही सब करते रहे पूरे 25 दिनों तक। और इधर मुंबई में मेरा सारा काम पेन्डिंग पड़ा हुआ है। तो 25 दिनों बाद मुम्बई लौटने पर मुझे पता चला कि यह सब ताम-झाम राज जी ने इसलिए किया ताकि मेरे दिमाग़ से 'रामायण' निकाल दे और 'हिना' डाल दे। ताकि मैं खुले दिमाग से 'हिना' के बारे में सोच सकूँ। इसके लिए इन्होंने इतनी कोशिश की, मुझे कश्मीर ले गये, लोगों से मिलवाया, कास्ट के जो लोग थे, बंजारे, उनको बुलाया, तो ये सब प्रयत्न  'हिना' के लिए था। आप ही बताइये उनके अलावा कौन सा फ़िल्मकार इस हद तक जा सकता है अपनी फ़िल्म के संगीत के लिए जो सर्वोत्तम है, वह सुनिश्चित करने के लिए!

2 जून 1988 को राज कपूर चल बसे। तब तक इस फ़िल्म के केवल तीन ही गीत रेकॉर्ड हुए थे - "चिट्ठिये दर्द फ़िराक वालिये", "देर न हो जाये कहीं" और एक तीसरा गाना था जिसे बाद में फ़िल्म से हटा दिया गया था। रवीन्द्र जैन से ही पता चला कि उस समय राज कपूर एक और फ़िल्म बनाने की सोच रहे थे 'घुंघट के पट खोल'। अपने अन्तिम दिनों में राज कपूर दिल्ली गये दादा साहब फालके पुरस्कार स्वीकार करने, पर वापस नहीं लौटे। उन्हें पुर्वाभास हो गया था। तभी दिल्ली जाते हुए अपनी पत्नी से कह गये कि 'I am going as a passenger but would return as a cargo!' उनके अन्तिम समय में रवीन्द्र जैन भी उनसे मिलने गये और उनसे वादा किया कि 'हिना' बन कर रहेगा। संगीतकार के साथ राज कपूर के काम करने के तरीके के बारे में रवीन्द्र जैन ने बताया, "राज साहब अपने कलाकारों को ख़ुश रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। उत्तम खाना-पीना, उत्तम होटल, वो कभी खर्चे की परवाह नहीं करते। हमेशा सम्मान से बात करते। उनका दिमाग़ बिल्कुल साफ़ रहता और वो जानते कि उन्हें क्या चाहिये। वो गीत के सिचुएशन को डिटेल में समझाते। वो कहते कि अगर तुम्हे और अधिक साज़िन्दे चाहिये तो ले लो, अगर ज़रूरत पड़ी तो फ़ेमस स्टुडियो की दीवारें भी तोड़ दी जाएगी, जगह बनाने के लिए, पर केवल उतने ही साज़िन्दे रखना जितनों की ज़रूरत है, न एक ज़्यादा, न एक कम।" फ़िल्म 'हिना' के शीर्षक गीत के लिए जब बातचीत चल रही थी, राज साहब समझाने लगे कि नायिका हिना का इन्ट्रोडक्शन सीन है जिसमें वो अपने बारे में ख़ुद बता रही है, इस सितुएशन पर गीत चाहिए। रवीन्द्र जैन लिख लाये "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना, ज़िन्दगानी में कोई रंग नहीं मेरे बिना"; यह सुन कर राज साहब बहुत ख़ुश हुए और कहा कि बिल्कुल ऐसे ही मुखड़े की उन्हें उम्मीद थी।

'हिना' फ़िल्म का यह शीर्षक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में है। रवीन्द्र जैन ने यह स्वीकार किया है कि लता जी के साथ उनका सम्बन्ध हमेशा तनावपूर्ण रहा है। उनके अनुसार लताजी शायद यह समझती थी कि वो नये गायिकाओं (हेमलता व आरती मुखर्जी) को बढ़ावा दे रहे हैं। पर सच्चाई यह थी कि रवीन्द्र जैन के फ़िल्मों के निर्माता छोटे बजट के निर्माता थे जो या तो लता जी को अफ़ोर्ड नहीं कर पाते या लता जी के डेट्स के लिए लम्बे समय तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। पर लता जी आख़िर तक रवीन्द्र जैन को ग़लत ही समझती रहीं, ऐसी धारणा है रवीन्द्र जैन साहब की। राज कपूर की फ़िल्म न होती तो शायद 'राम तेरी गंगा मैली' और 'हिना' के संगीतकार कोई और होते या फिर इन गीतों में आवाज़ किसी और गायिका की होती। वैसे लता जी की शान में रवीन्द्र जैन कहते हैं - "हमने पिछली सदी में देखा, और इस सदी में भी देख रहे हैं कि लता जी का कोई जोड़ नहीं है। ईश्वर प्रदत्त जो आवाज़ उन्होंने पायी है, वह आवाज़ फिर दोबारा किसी और को नहीं मिल सकती।" ख़ैर, "मैं हूँ ख़ुशरंग हिना" गीत का एक सैड वर्ज़न भी है जो फ़िल्म के अन्तिम सीन से पहले फ़िल्म में आता है। बोलों पर अगर ग़ौर करें तो अहसास होता है कि सैड वर्ज़न मुख्य गीत से बेहतर लिखा गया है। बहुत ही अर्थपूर्ण शब्दों में रवीन्द्र जैन ने इसे पिरोया है जिसमें लता के साथ मोहम्मद अज़ीज़ की भी आवाज़ शामिल है --

"किसलिए मासूम रूहों को तड़पने की सज़ा,
अपने बन्दों की ख़ुशी से क्यों जला करता है तू
मुनसिफ़ें तक़दीर मिल जायेगा तो पूछेंगे हम
किस बिना पे ज़िन्दगी का फ़ैसला करता है तू।"

इससे भी बेहतर अन्तिम अन्तरे के बोल हैं जिन्हें सुनते हुए आँखें नम हुए बिना नहीं रह पाते।

"हो वो औरत कि हिना, फ़र्क़ क़िस्मत में नहीं,
रंग लाने के लिए दोनों पीसती ही रही,
मिट के ख़ुश होने का दोनों का है इक ढंग हिना,
मैं हूँ ख़ुशरंग हिना, प्यारी ख़ुशरंग हिना।"

इन पंक्तियों के बाद कुछ और कहना अनावश्यक है। इस गीत ही की तरह राज कपूर के लिए भी हम यही कह सकते हैं फ़िल्मी इतिहास में भी कोई रंग नहीं उनकी फ़िल्मों के बिना। और साथ ही सलाम रवीन्द्र जैन साहब को भी! और अब आप इस गीत के दोनों संस्करण सुनिए। पहले में लता मंगेशकर की और दूसरे में लता जी के साथ मोहम्मद अजीज की आवाज शामिल है।

फिल्म - हिना : 'मैं हूँ खुशरंग हिना, प्यारी खुशरंग हिना...' : लता मंगेशकर और मोहम्मद अज़ीज़ : गीत-संगीत - रवीन्द्र जैन






अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Tuesday, November 22, 2011

तू जो मेरे सुर में सुर मिला दे...दादु के इस मनुहार को भला कौन इनकार कर पाये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 793/2011/233

"तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले, संग गा ले, तो ज़िन्दगी हो जाये सफल"। यह बात किसी और के लिए सटीक हो न हो, रवीन्द्र जैन के लिए १००% सही है क्योंकि उनके सुरों में जिन जिन नवोदित गायक गायिकाओं नें सुर मिलाया, उन्हें प्रसिद्धि मिली, उन्हें यश प्राप्त हुआ, उनका करीयर चल पड़ा। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार सुजॉय चटर्जी का और इन दिनों इस स्तंभ में जारी है लघु शृंखला 'मेरे सुर में सुर मिला ले' जिसमें आप सुन रहे हैं गीतकार-संगीतकार रवीन्द्र जैन की फ़िल्मी रचनाएँ और जान रहे हैं उनके जीवन की दास्तान उनकी ही ज़ुबानी विविध भारती की शृंखला 'उजाले उनकी यादों के' के सौजन्य से। कल की कड़ी में आपने जाना कि किस तरह से जन्म से ही उनकी आँखों की रोशनी जाती रही और इस कमी को ध्यान में रखते हुए उनके पिताजी नें उन्हें गीत-संगीत की तरफ़ प्रोत्साहित किया। अब आगे की कहानी दादु की ज़ुबानी - "तो यहाँ अलीगढ़ में नाटकों में मास्टर जी. एल. जैन संगीत निर्देशन किया करते थे, आर्य-जैन समाज के, और उन्होंने सबसे पहले जो ग़ज़ल मुझे सिखाई थी, उसका ख़याल मुझे आ रही है, (गाते हुए) "लबों पे तबस्सुम निगाहों में बिजली, क़यामत कहीं से चली आ रही है..."। जी. एल. जैन, यानि घमण्डी लाल जी, घमण्ड कुछ नहीं था, सीधे सादे व्यक्तित्व के धनि थे। उसके बाद पंडित जनार्दन शर्मा, जिन्होंने स्वर का ज्ञान कराया। बड़ी मेहनत कराई उन्होंने, उनका अभ्यास कराने का एक ढंग था, वो ऐसे नहीं कहते थे कि इतनी बार इसको गाना है तुमको, एक 'मैच-बॉक्स' ले लिया, माचिस की तीलियाँ निकाल के रख ली, उन्होंने कहा कि इसमें से आप एक एक तीली निकाल के रखते जाइए और १०-१० बार उन सरगमों को गाइए, अब किसको गिनना है कि उसमें कितनी तीलियाँ हैं और उतनी बार गाना है, क़ैद नहीं थी समय की। ऐसे ही एक कटोरी ले ली चने की, उसमें से एक एक चना निकालिए और गाइए उसको, सरगम गाते रहिए। इस तरह पूरा दिन निकल जाता था, कब दिन निकल गया पता भी नहीं चला। उस समय मेरी उम्र थी पाँच साल। मुझे एक छोटा सा हारमोनियम दिया था खिलौने के जैसा, क्योंकि बड़ा हारमोनियम तो हैण्डल नहीं कर सकता था, हाथ ही नहीं जाता था वहाँ तक, तो छोटा हारमोनियम दिया गया था और फिर पंडित जनार्दन शर्मा नें रागों से परिचित कराया, स्वर-ज्ञान कराया, और एक छोटा सा कोर्स है प्रयाग संगीत समिति का, फ़ॉरमल एडुकेशन जिसे हम कहते हैं, अलीगढ़ के ही पंडित नथुराम शर्मा, उनके साथ बैठ के फिर उनके शिक्षण में संगीत प्रभाकर की डिग्री हासिल की, फिर गुरुदेव नें कहा कि तुम्हारी अलीगढ़ की जो सीखना है वह हो चुका है, अब देशाटन करो और इस बीच में बड़े भैया के साथ, डी.के. जैन जी के साथ, इनका बड़ा योगदान है मेरे करीयर में, मेरे साहित्यिक प्रकाश में, ख़ास तौर से उन्होंने बड़ा योगदान दिया, तो उनके साथ नागपुर आया और इत्तेफ़ाक़ की बात है कि नागपुर से बम्बई की दूरी एक रात की थी। और रांची फिर गया, रांची से कलकत्ते की दूरी एक रात की थी, तो मेरे कज़िन थे जो मुझे कलकत्ते ले गए और कलकत्ते से ही जो मेरा फ़िल्मी करीयर और गैर-फ़िल्मी रेकॉरडिंग्स शुरु हुई।"

'मेरे सुर में सुर मिला ले' में आज हमने जिस गीत को चुना है, वह गीत है रवीन्द्र जैन के करीयर का एक बेहद उल्लेखनीय पड़ाव 'चितचोर' का। इस फ़िल्म में केवल चार ही गीत थे, पर चारों ही एक से बढ़ कर एक। येसुदास के गाये दो एकल गीत "गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा" और "आज से पहले आज से ज़्यादा" तथा येसुदास और हेमलता के गाये दो युगल गीत "जब दीप जले आना" और "तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले", इनमें से कौन किससे बेहतर है कहना आसान नहीं। हमनें इस अन्तिम गीत को आज की कड़ी के लिए चुना है। 'चितचोर' बासु चटर्जी निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें अमोल पालेकर और ज़रीना वहाब मुख्य कलाकार थे। 'सौदागर' और 'गीत गाता चल' ही की तरह 'चितचोर' भी राजश्री प्रोडक्शन्स की ही फ़िल्म थी। 'चितचोर' को बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी मिली और उस वर्ष कई पुरस्कारों के लिए मनोनित हुई। इस फ़िल्म से अमोल पालेकर नें अपनी डॆब्यु सिल्वर जुबिली हैट्रिक पूरी की - 'रजनीगंधा' (१९७४), 'छोटी सी बात' (१९७५) और 'चितचोर' (१९७६)। "गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा" गीत के लिए येसुदास को राष्ट्रीय पुरस्कार और आज के प्रस्तुत गीत के लिए हेमलता को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। हेमलता इस गीत के बारे में बताते हैं - "इस गीत की रेकॉर्डिंग् के दिन मैं स्टुडियो लेट पहुँची, किस कारण से लेट हुई थी, यह तो अब याद नहीं, बस लेट हो गई थी। वहाँ येसुदास जी आ चुके थे। गाने की रेकॉर्डिंग् के बाद दादु नें मुझसे कहा कि अगर तुम मेरे गुरु की बेटी नहीं होती तो वापस कर देता। यह सुन कर मैं इतना रोयी उस दिन। मुझे उन पर बहुत अभिमान हो गया, कि वो मुझे सिर्फ़ इसलिए गवाते हैं क्योंकि मैं उनके गुरु की बेटी हूँ? बर्मन दादा, कल्याणजी भाई, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल, ये सब भी तो मुझसे गवाते हैं, तो फिर उन्होंने ऐसा क्यों कह दिया? मुझे बहुत बुरा लगा और मैं दिन भर बैठ के रोयी। मैं दादु से जाकर यह कहा कि देर से आने के लिए अगर आप मुझे बाहर निकाल देते तो मुझे एक सबक मिलता, बुरा नहीं लगता पर आप ने ऐसा क्यों कहा कि अगर गुरु की बेटी न होती तो बाहर कर देता। तो उन्होंने मुझसे बड़े प्यार से कहा कि एक दिन ऐसा आएगा कि जब तुम्हारे लिए सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स वेट करेंगे, तुम नहीं आओगी तो रेकॉर्डिंग् ही नहीं होगी।" 'चितचोर' फ़िल्म की कई रीमेक भी बनी है। ॠतीक रोशन, करीना कपूर, अभिषेक बच्चन अभिनीत 'मैं प्रेम की दीवानी हूँ' के अलावा १९९० में मलयालम में 'मिन्दाप्पुचयक्कू कल्याणम्', तेलुगू में 'अम्मयी मनासू' और बंगला में 'शेदिन चैत्र मास' जैसी फ़िल्में इसी कहानी पर आधारित थीं। तो आइए रवीन्द्र जैन के सुरों में हम भी सुर मिलाते हैं और सुनते हैं यह अवार्ड-विनिंग् गीत जो आधारित है राग पीलू पर।



पहचानें अगला गीत - आवाज़ है महेंद्र कपूर की, गीत मूल रूप से एक प्रेरणादायक कविता से प्रेरित है

पिछले अंक में


खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, April 24, 2011

दूर है किनारा....आईये किनारे को ढूंढती मन्ना दा की आवाज़ के सागर में गोते लगाये हम भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 641/2010/341

'ओल्ड इस गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी का इस स्तंभ में फिर एक बार स्वागत करता हूँ। युं तो इस शृंखला का वाहक मैं और सजीव जी हैं, लेकिन समय समय पर आप में से कई श्रोता-पाठक इस स्तंभ के लिए उल्लेखनीय योगदान करते आये हैं, चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो! यह हमारा सौभाग्य है कि हाल में हमारी जान-पहचान एक ऐसे वरिष्ठ कला संवाददाता व समीक्षक से हुई, जो अपने लम्बे करीयर के बेशकीमती अनुभवों से हमारा न केवल ज्ञानवर्धन कर रहे हैं, बल्कि 'सुर-संगम' स्तंभ में भी अपना अमूल्य योगदान समय समय पर दे रहे हैं। और अब 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए एक पूरी की पूरी शृंखला के साथ हाज़िर हैं। आप हैं लखनऊ के श्री कृष्णमोहन मिश्र। मिश्र जी का परिचय कुछ शब्दों में संभव नहीं, इसलिए आप यहाँ क्लिक कर उनके बारे में विस्तृत रूप से जान सकते हैं। तो दोस्तों, आइए अगले दस अंकों के लिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आनंद लें श्री कृष्णमोहन मिश्र जी के साथ। एक और बात, कृष्णमोहन जी नें इस शृंखला के हर अंक में इतने सारे तथ्य भरे हैं कि अलग से "क्या आप जानते हैं?" की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। इसलिए इस शृंखला में यह सह-स्तंभ पेश नहीं होगा।
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'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों का मैं, कृष्णमोहन मिश्र स्वागत करता हूँ। भारतीय फिल्मों ने जब से बोलना सीखा, तब से ही गीत-संगीत उसकी आवश्यकता भी थी और विशेषता भी। पहले दशक (1931-1941) के संगीतकारों नें फिल्म संगीत में शास्त्रीय और लोक तत्वों का जो बीजारोपण किया, उसका प्रतिफल दूसरे और तीसरे दशक (1941-1961) की अवधि में खूब मुखर होकर सामने आया। दूसरे दशक में पुरुष गायक- मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार और तलत महमूद जैसे समर्पित गायकों का आगमन हुआ, जिन्होंने अगले कई दशकों तक फिल्म संगीत जगत पर एकछत्र शासन किया। इसी दशक की कोकिलकंठी लता मंगेशकर और वैविध्यपूर्ण गायन शैली के धनी मन्ना डे आज भी हमारे बीच फिल्म संगीत के सजीव इतिहास के रूप में उपस्थित हैं। ऐसे ही बहुआयामी प्रतिभा के धनी मन्ना डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह लघु श्रृंखला "अपने सुरों में मेरे सुरों को मिला लो" आज से शुरू हो रही है। रविवार 1 मई को मन्ना डे 92 वर्ष के हो जाएँगे। यह श्रृंखला हम उनके स्वस्थ रहने और दीर्घायु होने की कामना करते हुए प्रस्तुत कर रहे हैं |

1 मई 1919 को कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक सामान्य मध्यवर्गीय संयुक्त परिवार में जन्में मन्ना डे का वास्तविक नाम प्रबोधचन्द्र डे था। 'मन्ना' उनका घरेलू नाम था। आगे चलकर वो इसी नाम से प्रसिद्ध हुए। मन्ना डे के पिता का नाम पूर्णचंद्र डे, माता का नाम महामाया डे तथा चाचा का नाम कृष्णचंद्र डे (के.सी. डे) था जो एक संगीत शिक्षक के रूप में विख्यात थे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा इंदु बाबूर पाठशाला (इंदु बाबू की पाठशाला) से, माध्यमिक शिक्षा स्कोटिश चर्च कालेज से तथा स्नातक की पढ़ाई विद्यासागर कालेज से हुई। बचपन में मन्ना डे को खेलकूद में काफी रूचि थी। उनका प्रिय खेल फुटबाल, कुश्ती और मुक्केबाजी रहा। अपनी इस रूचि के कारण वो अपने साथियों के बीच काफी लोकप्रिय थे। मन्ना डे को संगीत के प्रति अनुराग चाचा के.सी. डे की प्रेरणा से ही विरासत में प्राप्त हुआ। इण्टरमिडिएट में पढाई के दिनों में उनके संगीत प्रतिभा की चर्चा साथियों के बीच खूब होती थी। होता यह था कि खाली समय या मध्यान्तर में मन्ना डे को उनके साथी कक्षा में घेर कर बैठ जाते थे। मन्ना डे मेज को ताल वाद्य बना लेते और फिर गाने का सिलसिला शुरू हो जाता। इसी दौरान मन्ना डे नें अन्तरविद्यालय संगीत प्रतियोगिता के तीन वर्गों में भाग लिया और तीनों वर्गों में उन्हें प्रथम स्थान मिला। पहले तो उन्हें चाचा के.सी. डे ही संगीत का पाठ पढ़ाते थे लेकिन उनकी बढ़ती रुझान देखते हुए चाचा ने उस्ताद दबीर खां से भी विधिवत संगीत शिक्षा दिलाने कि व्यवस्था कर दी। मन्ना डे पढाई में तो अच्छे थे ही, अच्छा गाने के कारण भी वो कालेज में खूब लोकप्रिय हो गए थे। स्नातक की परीक्षा में सफल होने के बाद मन्ना डे के सामने दो रास्ते खुले हुए थे। पहला यह कि कानून की पढाई कर बैरिस्टर बना जाये और दूसरा, चाचा की छत्र-छाया में संगीत क्षेत्र में भाग्य आजमाया जाये। काफी सोच-विचार के बाद मन्ना डे ने दूसरा रास्ता चुना और अपने चाचा के साथ माया नगरी मुम्बई की ओर चल पड़े |

यहाँ थोडा रुक कर हम मन्ना डे की उस समय की मनोदशा का अनुमान लगाते है- 'सौदागर' फिल्म के इस गीत के माध्यम से।

दूर है किनारा


1973 में प्रदर्शित इस फिल्म में मन्ना डे ने बंगाल की बेहद चर्चित भटियाली धुन (माँझी गीत) में इस गीत को गाया है| फिल्म के संगीतकार रवीन्द्र जैन हैं। टेलीविजन के एक चैनल पर 'इण्डियन एक्सप्रेस' के संपादक शेखर गुप्ता से अपने साक्षात्कार में मन्ना डे नें फिल्म 'सौदागर' के इस गीत के बारे में कहा था- "बचपन से ही हुगली नदी के प्रति मेरा विशेष लगाव रहा है। माँझी गीतों की लोक धुन बचपन से ही मन में बसी है। 'सौदागर' अमिताभ बच्चन की प्रारम्भिक फिल्मों मे से एक अच्छी फिल्म है। संगीतकार रवीन्द्र जैन की धुन भी बहुत अच्छी है | यह सब कुछ मेरे लिए इतना अनुकूल था कि सचमुच एक अच्छा गीत तैयार हो गया।"

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 15
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - मन्ना दा ने इस फिल्म में बेबी तारा के साथ एक युगल गीत भी गाया था.

सवाल १ - किस पौराणिक किरदार के लिए था मन्ना दा का ये गीत - २ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - ३ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी और अनजाना जी ने शानदार शुरुआत की है, प्रतीक जी और शरद जी भी खाता खोल चुके हैं, श्याम कान्त जी बहुत बहुत बधाई और स्वागत एक बार फिर हमें यकीन है अब मुकाबले में और रोचकता आ जायेगी

खोज व आलेख- कृष्णमोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, March 22, 2011

कहाँ से आये बदरा....एक से बढ़कर एक खूबसूरत फ़िल्में दी सशक्त निर्देशिका साईं परांजपे ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 618/2010/318

पार्श्वगायन को छोड़ कर हिंदी फ़िल्म निर्माण के अन्य सभी क्षेत्रों में पुरुषों का ही शुरु से दबदबा रहा है। लेकिन कुछ साहसी और सशक्त महिलाओं नें फ़िल्म निर्माण के सभी क्षेत्रों में क़दम रखा और दूसरों के लिए राह आसान बनायी. ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण महिला कलाकारों को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं' में आप सब का हम फिर एक बार स्वागत करते हैं। कल की कड़ी में हमने बातें की मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई की, और आज बातें फिर एक बार एक लेखि्का व निर्देशिका की। इन्होंने अपनी कलम को अपना 'साज़' बनाकर ऐसी 'कथा' लिखीं कि वह न केवल सब के मन को 'स्पर्श' कर गईं बल्कि फ़िल्म निर्माण को भी एक नई 'दिशा' दी। उनकी लाजवाब फ़िल्मों को देख कर केवल पढ़े लिखे लोग ही नहीं, बल्कि 'अंगूठा-छाप' लोगों ने भी एक स्वर कहा 'चश्म-ए-बद्दूर'!!! जी हाँ, हम आज बात कर रहे हैं साईं परांजपे की। १९ मार्च १९३८ को लखनऊ मे जन्मीं साईं के पिता थे रशियन वाटरकलर आर्टिस्ट यूरा स्लेप्ट्ज़ोफ़, और उनकी माँ थीं शकुंतला परांजपे, जो ३० और ४० के दशक की हिंदी और मराठी सिनेमा की जानीमानी अभिनेत्री थीं। वी. शांताराम की मशहूर फ़िल्म 'दुनिया न माने' में भी शकुंतला जी ने अभिनय किया था। बाद में शकुंतला जी एक लेखिका व समाज सेविका बनीं और राज्य सभा के लिए भी मनोनीत हुईं। वो १९९१ में पद्मभूषण से सम्मानित की गई। दुर्भाग्यवश सई के जन्म के कुछ दिनों में ही उनके माता-पिता अलग हो गए और सई को उनकी माँ ने बड़ा किया अपने पिता श्री आर. पी. परांजपे के घर में, जो एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और शिक्षाविद थे। इस तरह से साईं को बहुत अच्छी शिक्षा मिली और कई शहरों में रहने का मौका भी मिला, जिनमें पुणे का नाम उल्लेखनीय है। बचपन में सई अपने चाचा अच्युत राणाडे के पास जाया करतीं, जो ४० और ५० के दशकों के जानेमाने फ़िल्मकार थे। उन्हीं से साईं को पटकथा लेखन की पहली शिक्षा मिली। साईं ने भी लिखना शुरु किया और केवल आठ वर्ष की आयु में उनकी पहली पुस्तक 'मूलांचा मेवा' (मराठी) प्रकाशित हुई। १९६३ में साईं ने 'नैशनल स्कूल ऒफ़ ड्रामा' से स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

साईं परांजपे का करीयर आकाशवाणी पुणे से आरंभ हुआ बतौर उद्घोषिका, और जल्दी ही वहाँ के बाल-कार्यक्रम के माध्यम से लोकप्रियता हासिल कर लीं। साईं ने अपने करीयर में मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी में बहुत से नाटक लिखे और निर्देशित कीं। सई नें न केवल फ़ीचर फ़िल्मों का निर्माण किया बल्कि बच्चों की फ़िल्में और वृत्तचित्रों का भी निर्माण व निर्देशन किया। उनकी लिखी किताबों में ६ किताबों को राष्ट्रीय या राज्य स्तर के पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। दूरदर्शन के लिए साईं ने महत्वपूर्ण योगदान दिया और कई वर्षों तक बतौर प्रोड्युसर व डिरेक्टर जुड़ी रहीं। टीवी के लिए उनकी पहली फ़िल्म 'दि लिट्ल टी शॊप' को तेहरान में 'एशियन ब्रॊडकास्टिंग् युनियन अवार्ड' से सम्मानित किया गया था। बम्बई दूरदर्शन के सर्वप्रथम कार्यक्रम को प्रोड्युस करने का दायित्व उन्हें ही दिया गया था, जो उनके लिए बड़ा सम्मान था। ७० के दशक में साईं को दो बार 'चिल्ड्रेन फ़िल्म सोसायटी ऒफ़ इण्डिया' के सचिव के लिए चुना गया, और उस दौरान उन्होंने चार बाल-फ़िल्में बनाईं, जिनमें 'जादू का शंख' और 'सिकंदर' को पुरस्कृत किया गया था। उनकी पहली फ़ीचर फ़िल्म 'स्पर्श' (१९८०) को उस साल राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ साथ अन्य पाँच पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था। 'स्पर्श' के बाद दो हस्य फ़िल्में उन्होंने बनाईं - 'चश्म-ए-बद्दूर' (१९८१) और 'कथा' (१९८२)। उन्होंने १९८४ में 'अड़ोस-पड़ोस' और १९८५ में 'छोटे-बड़े' जैसी टीवी सीरियल्स बनाये। उनकी अन्य फ़िल्मों में शामिल हैं - 'अंगूठा छाप' (राष्ट्रीय साक्षरता मिशन पर केन्द्रित), 'दिशा' (स्थानांतरित मज़दूरों पर केन्द्रित), 'पपीहा' (जंगल पर केन्द्रित), 'साज़' (दो गायिका बहनों के जीवन की कहानी पर केन्द्रित), और 'चकाचक' (वातावरण-दूषण पर केन्द्रित)। इस तरह से साईं परांजपे एक ऐसी फ़िल्मकार हैं जिन्होंने हमेशा ही अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाईं हैं। सन् २००६ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। आइए आज उनको सलाम करते हुए सुनते हैं फ़िल्म 'चश्म-ए-बद्दूर' से एक बड़ा ही मशहूर गीत "कहाँ से आये बदरा, घुलता जाये कजरा"। हमनें इस गीत को इसलिए भी चुना क्योंकि इस गीत को लिखा है एक महिला गीतकार नें। इंदु जैन ने इस गीत को लिखा है और संगीत दिया है राजकमल साहब नें। युगल आवाज़ें हैं हेमंती शुक्ला और येसुदास के। महिला गीतकारों की अगर बात करें तो एक और नाम जो याद आता है, वह है माया गोविंद जी का। तो दोस्तों, 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की आज की कड़ी में हमनें जिन महिला कलाकारों का नाम लिया, वो हैं साईं परांजपे, शकुंतला परांजपे , इंदु जैन, माया गोविंद और हेमंती शुक्ला। सुनते हैं राग वृंदावनी सारंग पर आधारित इस सुमधुर गीत को।



क्या आप जानते हैं...
१९९३ में साईं परांजपे की फ़िल्म 'चूड़ियाँ' को 'National Film Award for Best Film on Social Issues' से सम्मानित किया गया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - नारी शक्ति की आवाज़ भी है ये गीत.

सवाल १ - हालाँकि एक मशहूर गायिका पे केंद्रित है ये कड़ी, पर इस फिल्म की नायिका का भी इसमें सम्मान है, कौन है ये जबरदस्त लाजवाब अभिनेत्री - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी २ अंको की बधाई के साथ जानकारी देने का आभार, अमित जी और अंजाना जी तो हैं ही सदाबहार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, July 11, 2010

वृष्टि पड़े टापुर टुपुर...टैगोर की कविता से प्रेरित होकर दादू रविन्द्र जैन ने रचा ये सदाबहार गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 436/2010/136

मस्कार दोस्तों! सावन की रिमझिम फुहारों का आनंद इन दिनों आप ले रहे होंगे अपनी अपनी जगहों पर। और अगर अभी तक बरखा रानी की कृपा दृष्टि आप के उधर नहीं पड़ी है, तो कम से कम हमारी इस लघु शॄंखला के गीतों को सुन कर ही बारिश का अनुभव इन दिनों आप कर रहे होंगे, ऐसा हमारा ख़याल है। युं तो बारिश की फुहारों को "टिप-टिप" या "रिमझिम" के तालों से ही ज़्यादातर व्यक्त किया जाता है, लेकिन आंचलिक भाषाओं में और भी कई इस तरह के विशेषण हो सकते हैं। जैसे कि बंगला में "टापुर टुपुर" का ख़ूब इस्तेमाल होता है। मेरे ख़याल से "टापुर टुपुर" की बारिश "टिप टिप" के मुक़ाबले थोड़ी और तेज़ वाली बारिश के लिए प्रयोग होता है। तो दोस्तों, धीरे धीरे आप समझने लगे होंगे कि हम किस गीत की तरफ़ बढ़ रहे हैं आज की इस कड़ी में। जी हाँ, रवीन्द्र जैन की लिखी और धुनों से सजी सन् १९७७ की फ़िल्म 'पहेली' का एक बड़ा ही ख़ूबसूरत गीत, सुरेश वाडकर और हेमलता की युगल आवाज़ों में - "सोना करे झिलमिल झिलमिल, रूपा हँसे कैसे खिलखिल, आहा आहा बॄष्टि पड़े टापुर टुपुर, टिप टिप टापुर टुपुर"। दोस्तों, हम एक तरह से आप से क्षमा ही चाहेंगे कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ४३५ कड़ियाँ पूरे हो चुके हैं और अब तक हमने रवीन्द्र जैन जी की कोई भी रचना आपको नहीं सुनवाई है। ऐसे गुणी कलाकार के गीतों से हमने आपको अब तक वंचित रखा, इसके लिए हमें अफ़सोस है। लेकिन देर आए पर दुरुस्त आए! हमारा मतलब है कि एक ऐसा गीत लेकर आए जिसे सुन कर मन यकायक प्रसन्न हो जाता है। पता नहीं इस गीत में ऐसा क्या ख़ास है कि सुनते ही जैसे मन पुलकित हो उठता है। शायद इस गीत की सरलता और सादगी ही इसकी विशेषता है।

रवीन्द्र जैन जी ने ये जो "टापुर टुपुर" का प्रयोग इस गीत में किया है, क्या आप जानते हैं इसकी प्रेरणा उन्हे कहाँ से मिली? आप को शायद मालूम हो कि जैन साहब एक लम्बे अरसे तक कलकत्ता में रहे थे, इसलिए उन्हे बंगला भाषा भी मालूम है, और एक बेहद गुणी इंसान होने की वजह से उन्होने वहाँ के साहित्य को पढ़ा है, वहाँ की संस्कृति को जाना है। उन्हे दरअसल "टापुर टुपुर" शब्दों को इस्तेमाल करने की प्रेरणा कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर की एक बेहद लोकप्रिय कविता (या फिर नर्सरी राइम भी कह सकते हैं) से मिली, जिसकी शुरुआती पंक्ति है "बॄष्टि पौड़े टापुर टुपुर नोदे एलो बान, शिब ठाकुरेर बिये हौबे, तीन कोन्ने दान"। अर्थात, टापुर टुपुर बारिश हो रही है, नदी में बाढ़ आई हुई है, ऐसे में शिव जी का ब्याह होने वाला है। विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में सन् २००७ में रवीन्द्र जैन जी से अमरकांत दुबे की बातचीत सुनवाई गई थी। उसमें नए गायक गायिकाओं के ज़िक्र के दौरान यकायक इस फ़िल्म का उल्लेख उभर आया था। आइए वही अंश यहाँ पर प्रस्तुत करते हैं।

प्र: दादु, ये जो बातचीत हमारी जारी है गायकों की, और इसमें आप ने बताया कि नए कलाकारों को कैसे आपने मौका दिया, और जो स्थापित कलाकार थे, उन्होने किस तरह से आपके साथ सहयोग किया, और किस तरह से आपकी रचनाओं ने उनको भी प्रसिद्धि दिलाई...

उ: नहीं, ऐसा अगर नहीं किया होता तो शायद नए कलाकार नहीं आए होते, उनके सहयोग ने ही ऐसा रास्ता खोला

प्र: अच्छा इसमें, इसी सिलसिले में आपकी एक फ़िल्म याद आती है दादु, 'पहेली'।

उ: जी जी, सुरेश वाडकर

प्र: सुरेश वाडकर को आप ने इसी फ़िल्म में पहली बार गवाया था।

उ: इसका एक गाना 'पॊपुलर' हुआ था।

प्र: वही "बृष्टि पड़े टापुर टुपुर"।

उ: ये, जैसे हमारी इंडस्ट्री में राइमिंग्स हैं ना, उसी तरह से बंगला में भी राइमिंग् है, उसको वहाँ "छौड़ा" बोलते हैं। "बॄष्टि पौड़े टापुर टुपुर नोदे एलो बान, शिब ठाकुरेर बिये हौबे, तीन कोन्ने दान"। एक पंच लाइन, तो वही इस्तेमाल किया। बहुत अच्छा गाया उन्होने, और साथ में हेमलता है। सुरेश को हम इसमें लेकर आए थे। बहुत ही गुणी और सीखे हुए कलाकार हैं, गुरु-शिष्य की परंपरा से सीखते हैं। सुरेश ने बृज मोहन जी की 'सुर सिंगार' प्रतियोगिता में भाग लिया था और उसमें विनर बने थे। फिर जयदेव जी ने उनको 'गमन' में गवाया "सीने में जलन" और हमने 'पहेली' में।

तो दोस्तों, अब वक्त है फ़िल्म 'पहेली' के इस गीत को सुनने का और गीत सुन कर आज की पहेलियों के जवाबों का अंदाज़ा लगाना ना भूलिएगा! फिर मिलेंगे कल की कड़ी में, धन्यवाद!



क्या आप जानते हैं...
कि १९६९ में निर्माता राधेश्याम झुनझुनवाला रवीन्द्र जैन को बम्बई ले आए फ़िल्म 'लोरी' में संगीत देने के लिए। यह फ़िल्म तो नहीं बनी लेकिन कुछ गीत अवश्य रिकार्ड किए गए जिनमें मुकेश के गाए दो अति सुंदर और अति दुर्लभ गीत थे "दुख तेरा हो कि मेरा हो" और "पल भर जो बहला दे"।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. राग पहाड़ी पर आधारित है ये गीत, संगीतकार बताएं -३ अंक.
२. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से "आँचल", गीतकार बताएं - २ अंक.
३. फिल्म के इस गीत के कई संस्करण हैं, गायिका बताएं - २ अंक.
४. फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को ३ और अवध जी, इंदु जी को २-२ अंक बधाई सहित.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, May 7, 2010

दादा रविन्द्र जैन ने इंडस्ट्री को कुछ बेहद नयी और सुरीली आवाजों से मिलवाया, जिसमें एक हेमलता भी है

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १७

'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की आज की कड़ी में आप सुनेंगे रवीन्द्र जैन के गीत संगीत में फ़िल्म 'अखियो के झरोखों से' का वही मशहूर शीर्षक गीत जिसे हेमलता ने गाया था और फ़िल्म में रंजीता पर फ़िल्माया गया था। गीत सुनने से पहले थोड़ी हेमलता की बातें हो जाए, जो उन्होने विविध भारती के एक मुलाक़ात में कहे थे। "कलकत्ता के रवीन्द्र सरोवर स्टेडियम में एक बहुत बड़ा प्रोग्राम हुआ था। डॊ. बिधान चन्द्र रॊय आए थे उसमें, दो लाख की ऒडियन्स थी। उस शो के चीफ़ कोर्डिनेटर गोपाल लाल मल्लिक ने मुझे एक गाना गाने का मौका दिया। उस शो में लता जी, रफ़ी साहब, उषा जी, हृदयनाथ जी, किशोर दा, सुबीर सेन, संध्या मुखर्जी, आरती मुखर्जी, हेमन्त दादा, सब गाने वाले थे। मुझे इंटर्वल में गाना था, ऐज़ बेबी लता (हेमलता का असली नाम लता ही था उन दिनों) ताकि लोग चाय वाय पी के आ सके। मेरे गुरु भाई चाहते थे कि इस प्रोग्राम के ज़रिए मेरे पिताजी को बताया जाए कि उनकी बेटी कितना अच्छा गाती है (हेमलता के पिता को यह मालूम नहीं था कि उनकी बेटी छुप छुप के गाती है)। तो वो जब जाकर मेरे पिताजी को इस फ़ंक्शन में आने के लिए कहा तो वो बोले कि मैं वहाँ फ़िल्मी गीतों के फ़ंक्शन में जाकर क्या करूँगा! बड़ी मुश्किल से मनाकर उन्हे लाया गया। तो ज़रा सोचिए, बिधान चन्द्र रॊय, सारे मिनिस्टेरिएल लेवेल के लोग, दो लाख ऒडियन्स, इन सब के बीच मेरे पिताजी बैठे हैं और उनकी बेटी गाने वाली है और यह उनको पता ही नहीं। उस समय मेरा आठवाँ साल लगा था। मैंने "जागो मोहन प्यारे", फ़िल्म 'जागते रहो', यह गाना गाया। जैसे ही मैंने वह आलाप लिया, पब्लिक ज़ोर से शोर करने लगी। मैंने सोचा कि क्या हो गया, फिर पता चला कि वो "आर्टिस्ट को ऊँचा करो" कह रहे हैं। फिर टेबल लाया गया और मैंने फिर से गाया, वन्स मोर भी हुआ। कलकत्ता की ऒडियन्स, दुनिया में ऐसी ऒडियन्स आपको कहीं नहीं मिलेगी, वाक़ई! फिर उस दिन मैंने एक एक करके १२ गीत गाए, सभी बंगला में, हिंदी में, जो आता था सब गा दिया। फिर शोर हुआ कि दीदी (लता जी) आ गईं हैं। बी. सी. रॊय ने बेबी लता के लिए गोल्ड मेडल अनाउन्स किया। पिता जी भी मान गए, उनको भी लगा कि उसकी प्रतिभा को रोकने का मुझे कोई अधिकार नहीं है, फिर राशी देख कर 'ह' से हेमलता नाम रखा गया और मैं लता से हेमलता बन गई।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - अखियों के झरोखों से...
कवर गायन - रश्मि नायर




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रश्मि नायर
इन्टरनेट पर बेहद सक्रिय और चर्चित रश्मि मूलत केरल से ताल्लुक रखती हैं पर मुंबई में जन्मी, चेन्नई में पढ़ी, पुणे से कॉलेज करने वाली रश्मि इन दिनों अमेरिका में निवास कर रही हैं और हर तरह के संगीत में रूचि रखती हैं, पर पुराने फ़िल्मी गीतों से विशेष लगाव है. संगीत के अलावा इन्हें छायाकारी, घूमने फिरने और फिल्मों का भी शौक है


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Wednesday, December 3, 2008

सांझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी...- सुरेश वाडकर

१९५४ में जन्में सुरेश वाडकर ने संगीत सीखना शुरू किया जब वो मात्र १० वर्ष के थे. पंडित जयलाल वसंत थे उनके गुरु. कहते हैं उनके पिता ने उनका नाम सुरेश (सुर+इश) इसलिए रखा क्योंकि वो अपने इस पुत्र को बहुत बड़ा गायक देखना चाहते थे. २० वर्ष की आयु में उन्होंने एक संगीत प्रतियोगिता "सुर श्रृंगार" में भाग लिया जहाँ बतौर निर्णायक मौजूद थे संगीतकार जयदेव और हमारे दादू रविन्द्र जैन साहब. सुरेश की आवाज़ से निर्णायक इतने प्रभावित हुए कि उन्हें फिल्मों में प्ले बैक का पक्का आश्वासन मिला दोनों ही महान संगीतकारों से, जयदेव जी ने उनसे फ़िल्म "गमन" का "सीने में जलन" गीत गवाया तो दादू ने उनसे "विष्टि पड़े टापुर टुपुर" गवाया फ़िल्म "पहेली" में. "पहेली" का गीत पहले आया और फ़िर "गमन" के गीत ने सब को मजबूर कर दिया कि यह मानने पर कि इंडस्ट्री में एक बेहद प्रतिभशाली गायक का आगमन हो चुका है.


उनकी आवाज़ और प्रतिभा से प्रभावित लता जी ने उन्हें बड़े संगीतकारों से मिलवाया. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने दिया उन्हें वो "बड़ा' ब्रेक, जब उन्होंने लता दी के साथ गाया फ़िल्म "क्रोधी" का वो दो गाना "चल चमेली बाग़ में" और फ़िर आया "मेघा रे मेघा रे" जैसा सुपरहिट गीत (एक बार फ़िर लता जी के साथ), जिसके बाद सुरेश वाडकर घर घर में पहचाने जाने लगे. कैरियर ने उठान ली फ़िल्म "प्रेम रोग" के जबरदस्त गीतों से. राज कपूर की इस बड़ी फ़िल्म के सभी गीत सुरेश ने गाये. संगीत था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का. फ़िल्म के हीरो ऋषि कपूर पर सुरेश की आवाज़ कुछ ऐसे जमी कि उसके बाद ऋषि की हर फ़िल्म के लिए उन्हीं को तलब किया जाने लगा. लक्ष्मी प्यारे के आलावा सुरेश ने अपने ज़माने के लगभग सभी बड़े संगीतकारों के निर्देशन में गीत गाये. "हाथों की चाँद लकीरों का"(कल्यानजी आनंदजी), "हुजूर इस कदर भी न"(आर डी बर्मन), "गोरों की न कालों की"(बप्पी लाहिरी), "ऐ जिंदगी गले लगा ले"(इल्लायाराजा) और "लगी आज सावन की'(शिव हरी), जैसे बहुत से गीत हैं जिन्हें सुरेश ने अपनी आवाज़ में कुछ ऐसे गाया है कि आज भी हम इन गीतों में किसी और गायक की कल्पना नही कर पाते.

प्रतिभा के धनी सुरेश की क्षमता का फ़िल्म जगत ने बहुत नाप तोल कर ही इस्तेमाल किया. उनके गीत कम सही पर अधिकतर ऐसे हैं जिन्हें संगीत प्रेमी कभी भूल नही सकेंगे. आर डी बर्मन और गुलज़ार साहब के साथ मिलकर उन्होंने कुछ गैर फिल्मी गीतों की अल्बम्स भी की,जो व्यवसयिक दृष्टि से शायद बहुत कामियाब नही हुईं पर सच्चे संगीत प्रेमियों ने उन्हें हमेशा अपने संकलन में शीर्ष स्थान दिया है. गुलज़ार साहब भी लता दी की तरह सुरेश से बहुत अधिक प्रभावित थे, तो जब उन्होंने लंबे अन्तराल के बाद फ़िल्म "माचिस' का निर्देशन संभाला तो विशाल भारद्वाज के निर्देशन में उनसे "छोड़ आए हम" और "चप्पा चप्पा" जैसे गीत गवाए. विशाल भारद्वाज के साथ सुरेश ने फ़िल्म "सत्या" और "ओमकारा" में कुछ बेहद अनूठे गीत गाये. उनके गीतों की विविधता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि एक तरफ़ "सुरमई शाम" जैसा राग आधारित गीत है तो दूसरी तरफ़ "तुमसे मिलके" जैसा रोमांस. एक तरफ़ "साँझ ढले" जैसे गम में डुबो देने वाला गीत है तो दूसरी तरफ़ "सपने में मिलती है" का अल्हड़पन. उनके गाये हिन्दी और मराठी भजनों की अल्बम्स जब भी बाज़ार में आती है हाथों हाथ बिक जाती है. बहुत कम समय में ही सुरेश वाडकर हिन्दी फ़िल्म और गैर फ़िल्म संगीत में अपनी गहरी छाप छोड़ने में कामियाब हुए हैं. संगीत के चाहने वालों को उनसे आगे भी ढेरों उम्मीदें रहेंगी.

आईये सुनते हैं सुरेश की आवाज़ में कुछ यादगार नगमें -





Tuesday, December 2, 2008

शुद्ध भारतीय संगीत को फिल्मी परदे पर साकार रूप दिया दादू यानी रविन्द्र जैन ने

अब तक आपने पढ़ा


वर्ष था १९८२ का. कवियित्री दिव्या जैन से विवाह बंधन में बंध चुके हमारे दादू यानी रविन्द्र जैन साहब के संगीत जीवन का चरम उत्कर्ष का भी यही वर्ष था जब "ब्रिजभूमि" और "नदिया के पार" के संगीत ने सफलता की सभी सीमाओं को तोड़कर दादू के संगीत का डंका बजा दिया था. और यही वो वर्ष था जब दादू की मुलाकात राज कपूर साहब से एक विवाह समारोह में हुई थी. हुआ यूँ कि महफ़िल जमी थी और दादू से गाने के लिए कहा गया. दादू ने अपनी मधुर आवाज़ में तान उठायी- "एक राधा, एक मीरा, दोनों ने श्याम को चाहा, अन्तर क्या दोनों की चाह में बोलो, एक प्रेम दीवानी एक दरस दीवानी...".राज साहब इसी मुखड़े को बार बार सुनते रहे और फ़िर दादू से आकर पुछा -"ये गीत किसी को दिया तो नही". दादू बोले- "दे दिया", चौंक कर राज साहब ने पुछा "किसे", दादू ने मुस्कुरा कर कहा "राजकपूर जी को".सुनकर राज साहब ने जेब में हाथ डाला पर सवा रूपया निकला टी पी झुनझुनवाला साहब की जेब से (टी पी साहब दादू के संगी और मार्गदर्शक रहे हैं कोलकत्ता से मुंबई तक). और यहीं से शुरू हुआ दादू से सफर का वो उत्कृष्ट दौर. फ़िल्म राम तेरी गंगा मैली की भी एक दिलचस्प कहानी है. राज साहब की उलझन थी की उन्होंने ही फ़िल्म "जिस देश में गंगा बहती है" बनाई थी, अब वही कैसे कहे "राम तेरी गंगा मैली". गंगा दर्शन को गए दादू और राज साहब जब गंगा किनारे बैठ इसी बात पर विचार कर रहे थे, दादू पर अचानक माँ सरस्वती की कृपा हुई, बाजा हाथ में था तो गाने लगे- "गंगा हमारी कहे बात ये रोते रोते...राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते धोते..". सुनकर राज साहब कुछ ऐसे प्रसन्न हुए जैसे किसी बालक को खेलने के लिए चन्द्र खिलौना मिल जाए, आनंदातिरेक में कहने लगे "बात बन गयी...अब फ़िल्म भी बन जायेगी". और ये हम सब जानते हैं की ये फ़िल्म कितनी बड़ी हिट थी, आगे बढ़ने से पहले लता जी की दिव्य आवाज़ में इस फ़िल्म का शीर्षक गीत अवश्य सुनेंगें.



इस फ़िल्म के दौरान ही अगली फ़िल्म "हिना" पर भी चर्चा शुरू हो चुकी थी हालाँकि राज साहब ये फ़िल्म ख़ुद पूरी नही कर पाये पर इस फ़िल्म का लाजवाब संगीत उन्हीं की निगरानी में रिकॉर्ड हुआ था. इसके बाद दादू ने कुछ और भी कामियाब फिल्में की जैसे "मरते दम तक", "जंगबाज़", "प्रतिघात" आदि पर उनकी अगली बड़ी कामियाबियाँ छोटे परदे से आई.महा धारावाहिक "रामायण" में उनका काम अलौकिक था. हर धारावाहिक में उन्होंने थीम के अनुसार यादगार संगीत दिया, फ़िर चाहे वो हेमा मालिनी कृत नृत्य आधारित नुपुर हो, या अद्भुत कथाओं की अलिफ़ लैला या फ़िर साईं बाबा का न भूलने वाला संगीत. जितने अच्छे संगीतकार हैं दादू उतने ही या कहें उससे कहीं बड़े गीतकार, कवि और शायर भी हैं वो, अपने अधिकतर गीत उन्होंने ख़ुद लिखे पर कभी कभी अन्य संगीतकारों के लिए भी गीतकारी की. कल्याण जी आनंद जी के साथ "जा रे जा ओ हरजाई..."(कालीचरण), उषा खन्ना के लिए "गड्डी जांदी है छलांगा मार दी" (दादा) आदि उन्हीं के लिखे गीत हैं. सुनते चलें दादू के दो और शानदार गीत -

पहला गीत दादू की अपनी ही आवाज़ में फ़िल्म "अखियों के झरोखों से".



दूसरा गीत सुनिए महेंद्र कपूर के स्वर में फ़िल्म "फकीरा" से.



एक और बड़ा श्रेय दादू को जाता है, इंडस्ट्री को गायकों और गायिकाओं से नवाजने का. आरती मुख़र्जी को उन्होंने कोलकत्ता से बुलाया फ़िल्म गीत गाता चल के "श्याम तेरी बंसी पुकारे.." के लिए तो इसी फ़िल्म जसपाल सिंह के रूप में उन्होंने एक नया गायक भी दिया. हेमलता, येसुदास और सुरेश वाडेकर ने भी उन्हीं की छात्र छाया में ही ढेरों कमाल के गीत गाये. गायक सुरेश वाडेकर मानते हैं कि आज वो जो भी हैं उसका पूरा श्रेय दादू को है. एक संगीत प्रतियोगिता के विजेता थे सुरेश और दादू निर्णायक. सुरेश की आवाज़ से प्रभावित दादू ने उन्हें फ़िल्म में मौका देने का वादा किया जो उन्होंने निभाया भी, सुरेश से फ़िल्म "पहेली" में गवा कर. दादू की और बातें करेंगे फ़िर कभी पर कल हम आपको मिलवायेंगे इस बेहद जबरदस्त गायक सुरेश वाडेकर से, फिलहाल हम छोड़ते हैं आपको सुरेश के गाये उस पहले गीत पर. फ़िल्म "पहेली" का ये गीत सुनिए और दादू के संगीत की मधुर मिठास का आनंद लीजिये.
"विष्टि पड़े टापुर टुपुर..."



रविन्द्र जैन पर हमारी इस श्रृंखला में सुनवाये गए सभी गीत और कुछ अन्य गीत भी आप इस प्लेयर पर सुन सकते हैं बिना रुके.


Monday, December 1, 2008

एक चित का चोर जो गायक भी है, गीतकार भी और संगीतकार भी....- रविन्द्र जैन


हमने आपको सुनवाया था येसुदास का गाया रविन्द्र जैन का स्वरबद्ध किया एक अनमोल गीत. चलिए अब बात करते हैं एक बेहद अदभुत संगीत निर्देशक, गीतकार और गायक रंविन्द्र जैन की, जिन्हें फ़िल्म जगत प्यार से दादू के नाम से जानता है. स्वर्गीय के सी डे के बाद वो पहले संगीत सर्जक हैं जिन्होंने चक्षु बाधा पर विजय प्राप्त कर अपनी प्रतिभा को दक्षिण एशिया ही नही, वरन संसार भर में फैले समस्त भारतीय परिवारों तक बेहद सफलता के साथ पहुंचाया. दादू के संगीत में अलीगढ की सामासिक संस्कृति, बंगाल के माधुर्य और हिंदू जैन परम्परा का अदभुत मिश्रण है. २८ फरवरी १९४४ में जन्में रविन्द्र जैन की फिल्मी सफर शुरू हुआ १४ जनवरी १९७२ के दिन जब कोलकत्ता से मुंबई पहुंचे दादू ने फ़िल्म सेण्टर स्टूडियो में अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया, गायक थे मोहम्मद रफी साहब. रफी साहब को जब ज्ञात हुआ की दादू अलीगढ से हैं तो उनसे ग़ज़ल सुनाने का आग्रह किया तो दादू ने पेश किया ये कलाम-
गम भी हैं न मुक्कमल, खुशियाँ भी हैं अधूरी,
आंसू भी आ रहे हैं, हंसना भी है जरूरी,
ग़ज़ल का मत्तला सुनते ही रफी साहब ने कहा की देखिये मास्टर जी, देखिये मेरे बाल खड़े हो गए...तब से दादू की हर रिकॉर्डिंग के बाद रफी साहब उसी ग़ज़ल को सुनाने की फरमाईश करते.
आगे बढ़ने से पहले क्यों न रफी साहब का गाया और दादू का स्वरबद्ध किया फ़िल्म "कांच और हीरा" का ये लाजवाब गीत -
"नज़र आती नही मंजिल...."



जिस फ़िल्म के लिए रफी साहब का गाया हुआ पहला गीत रिकॉर्ड किया, वह एक शायर की आत्मकथा थी, बाद में शायर की जगह चोर ने ले ली, और फ़िल्म का नाम हो गया "चोर मचाये शोर". चोर ने कुछ यूँ शोर मचाया की बेचारा शायर यह कहकर खामोश हो गया कि घुंघुरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं. गीत चूँकि सबको बहुत पसंद था तो फ़िल्म में उसकी सिचुएशन न होने पर भी उसे शामिल कर लिया गया. यह किशोर दा का पहला गाना था दादू के निर्देशन में. किशोर दा बड़े बड़े संगीतकारों को दाव दे जाते थे फ़िर रविन्द्र जैन तो एक नए नाम थे. सिप्पी साहब ने बंगाल की दुहाई देते हुए किशोर दा को फ़ोन किया "किशोरदा एक बार गाना सुन तो लो फ़िर निर्णय तुम्हारा है". जिस दिन स्टूडियो बुक था रिकॉर्डिंग के लिए उस दिन दादू का किशोर दा से संपर्क नही हो पा रहा था, तभी अचानक वहां किशोर दा अवतरित हो गए और बिना किसी औपचारिकता के सीधी आज्ञा दी कि "आगे गान सुनाओ". दादू अभी स्टूडियो पहुंचे ही थे, साजिंदों को आना था, गीत को संगीत से सजाना था. पर जैसे तैसे दादू ने किशोर दा को गीत सुनना शुरू किया पहली ही पंक्ति से किशोर दा उसे दोहराने लगे. दादू ने कहा "अभी तो समय लगेगा संगीत की ट्यूनिंग में." तब किशोर दा ने दादू की पीठ ठोंकी और कहा "तुम इत्मीनान से काम करो, मुझे कोई जल्दी नही है" शायद उन्हें भी कुछ ऐसा मिल गया था जिसे गाकर उन्हें बेहद आत्मसंतोष मिलने वाला था. तभी तो उन्होंने फ़ोन कर किसी अन्य संगीतकार की रिकॉर्डिंग कैंसल कर गाया फ़िल्म "चोर मचाये शोर" का वो अमर गीत. सुनते हैं -



किशोर दा ने उनके संगीत निर्देशन में एक और गजब का गीत गाया फ़िल्म "तपस्या" के लिए -"जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे". मन्ना डे का भी साथ मिला दादू को जब उन्होंने फ़िल्म सौदागर के लिए "दूर है किनारा" गीत गाया. राजश्री फ़िल्म के साथ उनका गठ बंधन बेहद कामियाब रहा. फ़िल्म सौदागर में लता जी ने गाया "तेरा मेरा साथ रहे..." तो वहीँ इसी फ़िल्म का एक और गीत था जिसे आशा ने बहुत खूबसूरत अंदाज़ में गाया. गीत अपनी आलंकारिक भाषा के लिए प्रसिद्ध हुआ- जिसमें एक शब्द के दो अर्थ थे- "सजना है मुझे सजना के लिए...". क्या हम कल्पना कर सकते हैं किसी और के स्वर में इस गीत की...सुनिए -



फ़िल्म "चोर मचाये शोर", "सौदागर" और "दो जासूस" के बाद दादू का सिक्का संगीत जगत में चल निकला. "चितचोर" के मधुर गीतों ने सब के चित चुरा लिए तो "फकीरा" और "दुल्हन वही जो पिया मन भाये" जैसी फिल्मों के संगीत ने उन्हें खासी ख्याति दी.

फिर दादू को साथ मिला राजकपूर का जिसका जिक्र पढ़िए-सुनिए अगले अंक में।

Wednesday, November 26, 2008

षड़ज ने पायो ये वरदान - एक दुर्लभ गीत


येसू दा का जिक्र जारी है, सलिल दा के लिए वो "आनंद महल" के गीत गा रहे थे, उन्हीं दिनों रविन्द्र जैन साहब भी अभिनेता अमोल पालेकर के लिए एक नए स्वर की तलाश में थे. जब उन्होंने येसू दा की आवाज़ सुनी तो लगा कि यही एक भारतीय आम आदमी की सच्ची आवाज़ है, दादा(रविन्द्र जैन) ने बासु चटर्जी जो कि फ़िल्म "चितचोर" के निर्देशक थे, को जब ये आवाज़ सुनाई तो दोनों इस बात पर सहमत हुए कि यही वो दिव्य आवाज़ है जिसकी उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए तलाश थी. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास बना. चितचोर के अविस्मरणीय गीतों को गाकर येसू दा ने राष्टीय पुरस्कार जीता और उसके बाद दादा और येसू दा की जुगलबंदी ने खूब जम कर काम किया.

वो सही मायनों में संगीत का सुनहरा दौर था. जब पूरे पूरे ओर्केस्ट्रा के साथ हर गीत के लिए जम कर रिहर्सल हुआ करती थी, जहाँ फ़िल्म के निर्देशक भी मौजूद होते थे और गायक अपने हर गीत में जैसे अपना सब कुछ दे देता था. येसू दा और रविन्द्र दादा के बहाने हम एक ऐसे ही गीत के बनने की कहानी आज आपको सुना रहे हैं. येसू दा की माने तो ये उनका हिन्दी में गाया हुआ सबसे बहतरीन गीत है. पर दुखद ये है कि न तो ये फ़िल्म कभी बनी न ही इसके गीत कभी चर्चा में आए.

राजश्री वाले एक फ़िल्म बनाना चाहते थे संगीत सम्राट तानसेन के जीवन पर आधारित, चूँकि पुरानी तानसेन काफी समय पहले बनी थी राजश्री ७०-८० के दशक के दर्शकों के लिए तानसेन को फ़िर से जिन्दा करना चाहते थे और उनके पास "तुरुप का इक्का" संगीतकार रविन्द्र जैन भी थे, तो काम असंभव नही दिखता था. बहरहाल काम शुरू हुआ. रविन्द्र जी ने गीत बनाया "षड़ज ने पायो ये वरदान" और सबसे पहले रफी साहब से स्वर देने का आग्रह किया. रफी साहब उन दिनों अपने चरम पर थे, तो हो सकता है बात समय के अभाव की रही हो पर उन्होंने दादा से बस यही कहा "रवि जी,मोहमद रफी इस जीवन काल में तो कम से कम ये गीत नही गा पायेगा...". दादा आज भी मानते हैं कि ये उनका बड़प्पन था जो उन्होंने ऐसा कहा. हेमंत दा से भी बात की गई पर काम कुछ ऐसा मुश्किल था कि हेमंत दा भी पीछे हट गए, यह कहकर कि इस गीत को गाने के बारे में सोचकर ही मैं तनावग्रस्त हो जाता हूँ. तब जाकर दादा ने येसू दा से इसे गाने के लिए कहा. दोनों महान कलकारों ने पूरे दो दिन यानी कुल ४८ घंटें बिना रुके, बिना भोजन खाए और बिना पानी का एक घूँट पिये काम करते हुए गीत की रिकॉर्डिंग पूरी की. ५९ वीं बार के "टेक" में जाकर गीत "ओके" हुआ. सुनने में असंभव सी लगती है बात, पर सच्चे कलाकारों का समर्पण कुछ ऐसा ही होता है.

फ़िल्म क्यों नही बनी और इसके गीत क्यों बाज़ार में नही आए इन कारणों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नही है, पर येसू दा अपने हर कंसर्ट में इस गीत का जिक्र अवश्य करते हैं, १९८६ में दुबई में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने इसे गाया भी जिस की रिकॉर्डिंग आज हम आपके लिए लेकर आए हैं....हमारे सुधि श्रोताओं के नाम येसू दा और रविन्द्र जैन "दादा" का का ये नायाब शाहकार -




दादा इन दिनों वेद् और उपनिषद के अनमोल बोलों को धुन में पिरोने का काम कर रहे हैं. और वो इस कोशिश में येसू दा को नए रूप में आज के पीढी के सामने रखेंगें. संगीत के कद्रदानों के लिए इससे बेहतर तोहफा भला क्या होगा. सोमवार को हम लौटेंगे और बात करेंगे रविन्द्र जैन साहब के बारे में, विस्तार से. बने रहिये आवाज़ पर.

Tuesday, November 25, 2008

"दासेएटन" (येसुदास) के हिन्दी गीतों की मिठास भी कुछ कम नहीं...


कल हमने बात की सलिल दा की और बताया की किस तरह उन्होंने खोजा दक्षिण भारत से एक ऐसा गायक जो आज की तारीख में मलयालम फ़िल्म संगीत का दूसरा नाम तो है ही पर जितने भी गीत उन्होंने हिन्दी में भी गाये वो भी अनमोल साबित हुए. आज हम बात करेंगे ४०.००० से भी अधिक गीतों को अपनी आवाज़ से संवारने वाले गायकी के सम्राट येसुदास की.
लगभग ४ दशकों से उनकी आवाज़ का जादू श्रोताओं पर चल रहा है, और इस वर्ष १० जनवरी को उन्होंने अपने जीवन के ६० वर्ष पूरे किये हैं. उनके पिता औगेस्टीन जोसफ एक मंझे हुए मंचीय कलाकार एवं गायक थे, जो हर हाल में अपने बड़े बेटे येसुदास को पार्श्वगायक बनाना चाहते थे. उनके पिता जब वो अपनी रचनात्मक कैरिअर के शीर्ष पर थे तब कोच्ची स्थित उनके घर पर दिन रात दोस्तों और प्रशंसकों का जमावडा लगा रहता था. पर जब बुरे दिन आए तब बहुत कम थे जो मदद को आगे आए. येसुदास का बचपन गरीबी में बीता, पर उन्होंने उस छोटी सी उम्र से अपने लक्ष्य निर्धारित कर लिए थे, ठान लिया था की अपने पिता का सपना पूरा करना ही उनके जीवन का उद्देश्य है. उन्हें ताने सुनने पड़े जब एक इसाई होकर वो कर्नाटक संगीत की दीक्षा लेने लगे. ऐसा भी समय था कि वो अपने RLV संगीत अकादमी की फीस भी बमुश्किल भर पाते थे और एक ऐसा भी दौर था जब चेन्नई के संगीत निर्देशक उनकी आवाज़ में दम नही पाते थे और AIR त्रिवेन्द्रम ने उनकी आवाज़ को प्रसारण के लायक नही समझा. पर जिद्द के पक्के उस कलाकार ने सब कुछ धैर्य के साथ सहा.

"एक जात, एक धर्म, एक ईश्वर" आदि नारायण गुरु के इस कथन को अपने जीवन मन्त्र मानने वाले येसुदास को पहला मौका मिला १९६१ में बनी "कलापदुक्कल" से. शुरू में उनकी शास्त्रीय अंदाज़ की सरल गायकी को बहुत से नकारात्मक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा पर येसु दा ने फ़िर कभी पीछे मुड कर नही देखा. संगीत प्रेमियों ने उन्हें सर आँखों पे बिठाया. भाषा उनकी राह में कभी दीवार न बन सकी. वो प्रतिष्टित पदमश्री और पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित हुए और उन्हें ७ बार पार्श्व गायन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, जिसमें से एक हिन्दी फ़िल्म "चितचोर" के गीत "गोरी तेरा गाँव" के लिए भी था.

मलयालम फ़िल्म संगीत तो उनके जिक्र के बिना अधूरा है ही पर गौरतलब बात ये है कि उन्होंने हिन्दी में भी जितना काम किया, कमाल का किया. सलिल दा ने उन्हें सबसे पहले फ़िल्म "आनंद महल" में काम दिया. ये फ़िल्म नही चली पर गीत मशहूर हुए जैसे "आ आ रे मितवा ...". फ़िर रविन्द्र जैन साहब के निर्देशन में उन्होंने चितचोर के गीत गाये. येसु दा बेशक कम गीत गाये पर जितने भी गाये वो सदाबहार हो गए. मलयालम फ़िल्म इंडस्ट्री में "दासेएटन" के नाम से जाने जाने वाले येसुदा की तम्मना थी कि वो मशहूर गुरुवायुर मन्दिर में बैठकर कृष्ण स्तुति गाये पर मन्दिर के नियमों के अनुसार उन्हें मन्दिर में प्रवेश नही मिल सका. और जब उन्होंने अपने दिल बात को एक मलयालम गीत "गुरुवायुर अम्बला नादयिल.." के माध्यम से श्रोताओं के सामने रखा, तो उस सदा को सुनकर हर मलयाली ह्रदय रो पड़ा था.

जैसा कि युनुस भाई ने भी अभी हाल ही में अपने चिट्टे में जिक्र किया था कि येसु दा के हिन्दी फिल्मी गीत आज भी खूब "डिमांड" में हैं, हम अपने संगीत प्रेमियों और श्रोताओं के लिए लाये हैं येसु दा के चुनिन्दा हिन्दी गीतों का एक गुलदस्ता. आनंद लें इस आवाज़ के जादूगर की खनकती आवाज़ में इन सदाबहार गीतों को सुनकर-



कल हम बात करेंगें येसु दा के एक खास "अनरिलीसड" गीत की और बात करेंगे एक और अदभुत संगीत निर्देशक की.



Sunday, November 9, 2008

रॉक ऑन के सितारे जुटे बाढ़ राहत कार्य में

आवाज़ ने संगीतप्रेमियों से इस फ़िल्म की सिफारिश की थी, और आज यह फ़िल्म साल की श्रेष्ट फिल्मों में एक मानी जा रही है. फ़िल्म के संगीत का नयापन युवाओं को बेहद भाया. फरहान अख्तर ने बतौर अभिनेता और गायक अपनी पहचान बनाई. बिहार में कोसी नदी में आई बाढ़ के पीडितों के लिए मुंबई में अभी हाल ही में इस फ़िल्म के सितारों और संगीत टीम के सदस्यों ने जबरदस्त शो किया और इस नेक काम के लिए धन अर्जित किया. "मेरी लौंड्री का एक बिल..." गीत जब ऋतिक रोशन थिरके तो दर्शक समूह झूम उठा. "रॉक ऑन" का संगीत वास्तव में रोक्किंग है.


रविन्द्र जैन की वापसी

लंबे समय के बाद सुप्रसिद्ध गीतकार संगीतकार रविन्द्र जैन फ़िल्म संगीत में वापसी कर रहे हैं. ७ नवम्बर को राजश्री प्रोडक्शन के साथ उनकी नई फ़िल्म "एक विवाह ऐसा भी" प्रर्दशित हो रही है. रविन्द्र जी ने राजश्री फ़िल्म्स के साथ लगभग १७ फिल्मों में काम किया है. "अबोध" की असफलता के लगभग २० वर्षों के बाद फ़िल्म "विवाह" से रविन्द्र जी ने बड़जात्या परिवार के साथ अपनी वापसी की थी. अब "एक विवाह ऐसा भी" से भी इसी तरह की सफलता की दर्शकों और श्रोताओं को उम्मीदें हैं.


नदीम श्रवण की जोड़ी दिखायेगी फ़िर से कमाल

आशिकी, दिल है कि मानता नहीं, सड़क, सजन, दीवाना, राजा हिन्दुस्तानी और परदेस जैसी फिल्मों से ९० के दशक में संगीत जगत पर राज करने वाली संगीतकार जोड़ी नदीम-श्रवण २००५ में हुए "स्प्लिट" के बाद अब फ़िर से एक होकर काम करेगी. धर्मेश दर्शन की "बावरा" और डेविड धवन की "डू नोट डिसटर्ब" होंगीं उनकी आने वाली फिल्में, जहाँ एक बार फ़िर क्रेडिट टाइटल में नदीम और श्रवण का नाम एक साथ देखा जाएगा. संगीत प्रेमियों के लिए यह निश्चित ही एक सुखद ख़बर है...उम्मीद करेंगें कि जतिन ललित की जोड़ी भी अपने मतभेद भूलकर एक साथ आयें जल्द ही...


एक दौर समाप्त

भारतीय फ़िल्म जगत के मशहूर निर्माता-निर्देशक बीआर चोपड़ा का लंबी बीमारी के बाद बुधवार सुबह मुंबई में निधन हो गया। फिल्मी दुनिया को 'नया दौर' देने वाले बलदेव राज चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल 1914 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था। ‘दादा साहब फाल्के’ पुरस्कार से सम्मानित चोपड़ा ने धूल का फूल’, ‘वक़्त’, ‘नया दौर’, ‘क़ानून’, ‘हमराज’, ‘इंसाफ़ का तराज़ू’ और ‘निकाह’ जैसी कई सफल फ़िल्में बनाई। 'आवाज़' की विनम्र श्रद्धाँजलि!!


पं॰ भीमसेन जोशी को दिया जायेगा भारत-रत्न

सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी को सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित करने का फ़ैसला किया है. किराना घराने के ८६ वर्षीय भीमसेन ने महज़ १९ वर्ष की उम्र से गाना शुरू किया था। कर्नाटक के गडक ज़िले के एक छोटे से शहर में वर्ष १९२२ में जन्मे और मुख्य रूप से खयाल शैली और भजन के लिए मशहूर पंडित जोशी को वर्ष १९९९ में पद्मबिभूषण, १९८५ में पद्मभूषण और १९७२ में पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।

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