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Monday, October 30, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 12 || शकील बदायूनी

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 12
Shakeel Badauni

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के बारहवें एपिसोड में सुनिए कहानी सहज शब्दों के जादूगर शकील बदायुनी की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Saturday, March 11, 2017

चित्रकथा - 9: शकील बदायूंनी के लिखे फ़िल्मी होली गीत


अंक - 9

शकील बदायूंनी के लिखे फ़िल्मी होली गीत

लायी है हज़ारों रंग होली...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ परिवार की तरफ़ से आप सभी को होली पर्व की अग्रिम शुभकामनाएँ। रंगों का यह त्योहार आप सभी के जीवन में ख़ुशियों के रंग भर दे, हम ईश्वर से यही कामना करते हैं। हमारी फ़िल्मों में होली गीतों की परम्परा शुरु से ही रही है और एक से बढकर एक होली गीत हमारी फ़िल्मों के लिए बने हैं। आज हम ’चित्रकथा’ के माध्यम से कुछ ऐसे होली गीतों की चर्चा करने जा रहे हैं जिन्हें लिखा है गीतकार शकील बदायूंनी ने। शकील साहब के लिखे तमाम होली गीतों का रंग इतने सालों बाद भी उतना ही पक्का है जितना उस ज़माने में था।




कील बदायूंनी ने फ़िल्म जगत में 1947 की फ़िल्म ’दर्द’ से क़दम रखा और अपने जीवन के अन्तिम
समय तक फ़िल्म-संगीत की सेवा करते रहे। 1952 की फ़िल्म ’बैजु बावरा’ में जब शकील बदायूंनी, नौशाद अली और मोहम्मद रफ़ी ने मिल कर "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" जैसी रचना का निर्माण किया, तब यह साम्प्रदायिक सदभाव का मिसाल बन गया। आगे चल कर भी शकील साहब ने श्री कृष्ण और राधा से संबंधित कई गीत लिखे। 1954 की फ़िल्म ’अमर’ में "राधा के प्यारे कृष्ण कन्हाई, तेरी दुहाई तेरी दुहाई" से इसकी शुरुआत हुई थी। और फिर जब उनकी कलम से होली के लिए गीत लिखे गए, तब उनमें केवल रंगों का ही नहीं बल्कि राधा-कृष्ण के रास का उल्लेख करते हुए इन गीतों को अमर कर दिया। शकील का लिखा पहला होली गीत था फ़िल्म ’मदर इंडिया’ में। शमशाद बेगम की खनकती आवाज़ में "होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बांसुरी" आज भी उसी ताज़गी से सुना जाता है जितना उस ज़माने में यह गीत मशहूर हुआ था। और मज़े की बात देखिए कि इस गीत में भी वही ’बैजु बावरा’ वाले गीत जैसा संयोग। शकील, नौशाद और शमशाद बेगम ने फिर एक बार धर्मनिरपेक्षता का मिसाल कायम किया। इस गीत को हिन्दी सिनेमा का पहला सुपरहिट होली गीत माना जाएगा। हालाँकि इससे पहले भी कुछ होली गीत फ़िल्मों में आ चुके थे, उदाहरणत: "होरी आई रे कान्हा बृज के बसिया" (जीवन प्रभात, 1937), "मोपे डार गयो सारी रंग की गागर" (कॉमरेड्स, 1939), "फागुन की रुत आई रे, ज़रा बाजे बांसरी" (होली, 1940), "भिगोई मोरी सारी (साड़ी) रे, देखो भीगे न चोली" (शादी, 1941), पर इनमें से किसी को भी वह सफलता नहीं मिली जितना ’मदर इंडिया’ के गीत को मिली। इस गीत के अन्तरे में शकील साहब लिखते हैं "बरसे गुलाल रंग मोरे आंगनवा, अपने ही रंग में रंग दे मोहे सजनवा"। किसी के रंग में रंगने की बात इसके बाद फिर कई गीतों में सुनने को मिली। इसी तरह से दूसरे अन्तरे में उन्होंने लिखा "छूटे ना रंग ऐसी रंग दे चुनरिया, धोबनिया धोये चाहे सारी उमरिया"। चुनरिया को प्रेम के रंग में रंगने की बात भी समय समय पर हमें सुनने को मिला है। फ़िल्म के सितुएशन के मुताबिक नरगिस के मन की पीड़ा को तीसरे अन्तरे में क्या ख़ूब उभारा है शकील साहब ने जब वो लिखते हैं "होली घर आयी तू भी आजा मुरारी, मन ही मन राधा रोये बिरहा की मारी"। यूं तो इस गीत का अधिकांश भाग कुमकुम पर फ़िल्माया गया है, पर शुरुआती नृत्य संगीत में प्रख्यात कथक नृत्यांगना सितारा देवी का नृत्य भी शामिल है जिसमें वो पुरुष वेश में कुमकुम के साथ नृत्य करते हैं।

1960 में शकील बदायूंनी साहब का लिखा दूसरा होली गीत आया। फ़िल्म ’कोहिनूर’, गीत "तन रंग लो
जी आज मन रंग लो, खेलो उमंग भर रंग प्यार के ले लो"। नौशाद के संगीत में मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर और साथियों का गाया यह गीत दिलीप कुमार और मीना कुमारी पर फ़िल्माया गया है। भले यह फ़िल्म श्याम-श्वेत थी, पर शकील साहब ने अपने शब्दों से इस गीत में ऐसे रंग भरे हैं कि इसे सुनते हुए हमारी आंखों के सामने होली का रंगीन दृश्य साकार हो उठता है। होली का त्योहार सिर्फ़ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि हँसी-मज़ाक, मीठी नोक-झोक और छेड़-छाड़ का भी है। इसलिए होली गीतों में अक्सर हमें प्रेमियों के आपसी छेड़-छाड़ के प्रसंग सुनने को मिलते हैं। शकील साहब ने इस गीत में छेड़-छाड़ के लिए लिखते हैं "आज मुखड़े से घुंघटा हटा लो जी, हो ज़रा सजना से अखियाँ मिला लो जी", जिसके जवाब में नायिका कहती हैं "रंग झूठे मोरे तन पे ना डालो जी, मन प्यार में साजन रंग लो"। यानी कि फिर से बात प्यार के रंग पे आकर टिकटी है। जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि शकील साहब के लिखे होली गीतों में राधा-कृष्ण का प्रसंग ज़रूर आता है, इस गीत के चौथे अन्तरे में भी उन्होंने बड़ी सुन्दरता से लिखा है "राधा संग होली खेले बनवारी रे हो, अंग अंग पे चलाए पिचकारी हो, कहे बैंया पकड़ के अनारी, दिल रंग लो जी धड़कन रंग लो"। फ़िल्म-संगीत समीक्षक कार्तिक जी ने इस गीत के बारे में कहा है कि श्याम-श्वेत फ़िल्मों में आनेवाली होली गीतों में यह गीत सबसे ज़्यादा रंगीन है, और बिल्कुल जिस तरह से उत्तर भारत में होली खेली जाती है, ठीक वैसे ही इस फ़िल्माया गया है। "आज मुखड़े से घुंघटा..." में जो रोमान्स है, वह कमाल का है। उन्होंने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि यह गीत और ’मदर इंडिया’ का गीत "दुख भरे दिन बीते रे भैया", ये दोनों गीत शकील-नौशाद का गीत है और दोनों गीतों को मेघ मलहार राग पर आधारित किया गया है। यह वह राग है जो वर्षा ऋतु में गाया जाता है। अत: यह दिलचस्प बात है कि किसी होली गीत को मेघ मलहार पर आधारित किया जाए! कार्तिक जी आगे लिखते हैं कि इन दो गीतों में जो समानता है, वह यह है कि भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश रहा है जहाँ वर्षा को ख़ुशी का प्रतीक माना जाता है। और क्योंकि होली भी ख़ुशी का त्योहार है, इसलिए ये दोनों गीत आपस में जुड़े हुए हैं। "दुख भरे दिन..." में भी शकील साहब लिखते हैं, "सावन के संग आए जवानी, सावन के संग जाए..."।

वर्ष 1966 में एक फ़िल्म आई थी ’फूल और पत्थर’। धर्मेन्द्र - मीना कुमारी अभिनीत इस फ़िल्म ने धर्मेन्द्र
को स्टार बना दिया। इस फ़िल्म ने उस साल कई पुरस्कार भी जीते। फ़िल्म में संगीत था रवि का और गीत लिखे शकील ने। नौशाद साहब के बाद शकील ने जिन संगीतकारों के साथ सबसे ज़्यादा काम किया है, उनमें से एक थे रवि साहब। ’फूल और पत्थर’ में आशा भोसले और साथियों का गाया एक होली गीत था "लायी है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिए, कोई मन के लिए"। गीत लक्ष्मी छाया पर फ़िल्माया गया था। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि हालातों ने शाका (धर्मेन्द्र) को एक असामाजिक तत्व (डाकू) बना दिया था। जब एक महामारी ने पूरे कस्बे को ख़ाली करवा दिया, तब शाका को एक घर में डकैती करने का मौका मिल गया। लेकिन घर के अन्दर घुस कर उसे कुछ नहीं मिला सिवाय शान्ति के - शान्ति (मीना कुमारी) एक विधवा औरत, जिसे उसके निर्दयी रिश्तेदारों ने उसे मरने के लिए छोड़ गए। शाका उसका देखभाल कर उसे स्वस्थ कर देता है। जब घरवाले वापस आकर शान्ति को जीवित देखते हैं तो ख़ुश नहीं होते। और तो और घर में पराए मर्द को देख कर शान्ति के चरित्र पर सवाल उठाते हैं। शाका और शान्ति वहाँ से भाग कर शाका के घर में अपना नया संसार सजाने की कोशिश करते हैं। पर समाज की नज़रों उन्हें चैन से जीवन व्यतीत करने नहीं देते। इस बीच दोनों में प्रेम के पुष्प खिलते हैं। इस होली गीत का सिचुएशन ऐसा है कि होली की सुबह है, शाका बिस्तर पर बीमार बैठा है, उसके सर पर पट्टी बंधी हुई है। ऐसे में शान्ति उसके लिए प्लेट पर कुछ लाती है। प्लेट लेते हुए शाका शान्ति के हाथों में अपना हाथ फेर कर अपने प्यार का इज़हार करता है। शान्ति शर्माकर खिड़की की तरफ़ जाती है और बन्द खिड़की को खोल देती है। नीचे झाँकती है तो होली की टोली हुड़दंग मचा रही है। गीत शुरु होता है "लाई है हज़ारों रंग होली"। नीचे होली खेलटी खुले में हँस खेल रही है और उपर शान्ति मन ही मन मुस्कुरा रही है। इसी दृश्य को समझाने के लिए शकील साहब ने "कोई तन के लिए" और "कोई मन के लिए" का कितना सुन्दर प्रयोग किया है! पूरा का पूरा गीत सिम्बॉलिक यानी कि प्रतीकात्मक है। पहले अन्तरे में शकील लिखते हैं "कोई तो मारे भर पिचकारी, कोई रंग डाले नज़र मतवाली, कोई भीगे बदन हिचकोले पवन बोले, कहीं मचले जिया साजन के लिए"। शान्ति की जिया भी शाका के लिए मचल रहा है जो शान्ति के मुखमंडल पर साफ़ दिख रहा है। दूसरे अन्तरे में शान्ति की आंखों में पिया-मिलन की आस को दर्शाने के लिए शकील लिखते हैं "प्यार में लगे मधुर जोरा-जोरी, रंग बरसाये कन्हैया गोरा गोरी, ओ रूप देखो रचे है कैसे कैसे सजे हैं कैसे कैसे, अरमान भरी अखियों के लिए, लायी है हज़ारों रंग होली"। और तीसरे अन्तरे में तो बिल्कुल साफ़-साफ़ कहा गया कि "तन पे रंग हो तो सारा जग जाने, मन के रंग को तो कोई ना पहचाने, कहीं पायल छन छन बाजे, किसी का दिल नाचे, आई कैसी ख़ुशी जीवन के लिए"। शान्ति के मन में हज़ारों रंग जैसे एक साथ उछल पड़े हों, नीचे नाचती गाती लड़कियों के पायल बज रहे हैं और उपर शान्ति का मन ख़ुशी से नृत्य कर रहा है। कुल मिला कर फ़िल्म की कहानी और सिचुएशन के हिसाब से शकील साहब ने कमाल का लिखा है यह प्रतीकात्मक होली गीत।

शकील बदायूंनी साहब के साहबज़ादे हैं जावेद बदायूंनी जो इन्टरनेट के सोशल नेटवर्किंग् पर सक्रीय हैं।
उनसे मेरी पुरानी जान-पहचान होने के नाते मैंने उनसे पूछा कि बचपन में उनकी कैसे यादें हैं होली की? जावेद साहब ने बताया कि संगीतकार रवि साहब के घर पर होली बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता था और शकील साहब वहाँ हर साल जाते थे। फ़िल्म इंडस्ट्री के बहुत लोग वहाँ इकट्ठा होकर होली खेलते। लेकिन शकील साहब रंगों से दूर रहतेअ उर ना ही भंग या शराब पीते। आगे जावेद साहब ने बताया कि रवि साहब के साथ फ़िल्म ’फूल और पत्थर’ का यह होली गीत उनके दिल के बहुत क़रीब था। शकील साहब 1970 में बहुत कम उम्र में इस दुनिया से चले गए, नहीं तो शायद और भी बेमिसाल कुछ होली गीत उनके कलम से निकलते। लेकिन सच्चाई यह है कि शकील साहब ने जो तीन होली गीत हमें दिए हैं, वो अमर हो गए हैं, और हर साल होली में ये गीत कहीं ना कहीं से सुनाई दे ही जाते हैं और आगे भी देते रहेंगे।



आपकी बात


’चित्रकथा’ स्तंभ में हम आठ अंक पूरे कर चुके हैं और आज इसका नवा अंक प्रस्तुत हुआ है। पिछले आठ अंकों में प्रकाशित लेखों को आप सभी पाठकों ने सम्मान दिया, इसके लिए हम आपके अत्यन्त आभारी हैं। आँकड़ों के अनुसार बीते आठ कड़ियों की मिली-जुली रीडरशिप 2500 पार कर चुकी है। आपका यह स्नेह और स्वीकृति इसी तरह बना रहे और आगे भी आप इसी तरह इस स्तंभ से जुड़े रहें, यही हमारी कामना है। आप सभी का शुक्रिया।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, June 16, 2016

खुशी ने मुझको ठुकराया है... आइये, सुनते हैं आज बेगम अख्तर की जीवन यात्रा!


दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए शकील बदायूनीं की ग़ज़ल बेगम अख्तर की पुरकशिश आवाज़ में.

मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी

Saturday, June 21, 2014

"कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा...", क्या अपने अन्तिम समय का आभास हो चला था शक़ील बदायूंनी को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 34
 

‘आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 34-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'राम और श्याम' के गीत "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" के बारे में। 



जावेद बदायूंनी
हिन्दी सिने संगीत जगत में गीतकार-संगीतकार जोड़ियों की परम्परा कोई नई बात नहीं है। शुरुआती दौर से लेकर आज तक यह परम्परा जारी है, पर व्यावसायिक सम्बन्ध के साथ-साथ पारिवारिक सम्बन्ध भी इन जोड़ियों में हो, ऐसा हर जोड़ी में नहीं देखा गया। गीतकार शक़ील बदायूंनी और संगीतकार नौशाद की जोड़ी एक ऐसी जोड़ी थी जो केवल गीतों के बनने तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि एक दूसरे के सुख-दुख में, एक दूसरे के परिवार की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रही। शक़ील और नौशाद की दोस्ती की मिसाल सच्ची दोस्ती की मिसाल है, जिसे शक़ील के इन्तकाल के बाद भी नौशाद ने निभाया। शक़ील साहब के बेटे जावेद बदायूंनी ने फ़ेसबुक के माध्यम से मुझे एक बार बताया था कि किस प्रकार शक़ील साहब की मौत के बाद भी नौशाद साहब उनके घर पर समय-समय पर आया करते और उनके परिवार के सभी सदस्यों का हालचाल पूछते। उन्हीं के शब्दों में- “शक़ील साहब और नौशाद साहब वेयर ग्रेटेस्ट फ़्रेण्ड्स! यह हक़ीक़त है कि शक़ील साहब नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों की आपस की ट्यूनिंग ग़ज़ब की थी और यह ट्यूनिंग इनके गीतों से साफ़ झलकती है। शक़ील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारी हौसला अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार दिया करते थे।” मजरूह सुल्तानपुरी और ख़ुमार बाराबंकवी की ही तरह नौशाद और ए.आर. कारदार ने किसी मुशायरे में शक़ील बदायूनी को कलाम पढ़ते सुना और उन्हें भी अपने साथ कर लिया। शक़ील – नौशाद की जोड़ी फ़िल्म जगत की एक प्रसिद्ध गीतकार – संगीतकार जोड़ी रही है। फ़िल्म ‘दर्द’ के सभी 10 गीत लिखते हुए शक़ील ने अपने फ़िल्मी गीत लेखन के पारी की शुरुआत की। शक़ील के आने के बाद और शक़ील की मृत्यु से पहले नौशाद ने अपने फ़िल्मी सफ़र में केवल एक फ़िल्म ऐसी की जिसके गानें शक़ील ने नहीं लिखे। बड़े ही वफ़ादारी के साथ नौशाद ने शक़ील का साथ निभाया।

नौशाद, रफ़ी और शक़ील
फ़िल्म 'राम और श्याम' के इस गीत "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" को अगर करीब से महसूस करना हो तो शक़ील साहब के जीवन के अन्तिम समय की तरफ़ झाँकना होगा कि किन हालातों में उन्होंने यह गीत लिखा था। यह बात है सन् 1967-68 की। शक़ील बदायूंनी की उम्र केवल 50 वर्ष की थी कि टी.बी जैसी भयानक बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया। उनकी वित्तीय अवस्था उतनी मज़बूत नहीं थी कि वो अपना इलाज किसी बेहतरीन अस्पताल में करवाते। टी.बी. की संक्रामकता के चलते उन्हें पंचगनी स्थित एक सैनिटोरियम में भेज दिया गया इलाज के लिए। नौशाद साहब को जैसे ही इस बात का पता चला कि शक़ील साहब बीमार हैं और उनके पास इलाज के लिए पर्याप्त धन नहीं है, उन्हें बहुत ज़्यादा तकलीफ़ हुई, दुख हुआ। नौशाद साहब को पता था कि शक़ील साहब इतने ख़ुद्दार इंसान हैं कि किसी से पैसे वो नहीं लेंगे, यहाँ तक कि नौशाद से भी नहीं। इसलिए नौशाद साहब ने एक दूसरा रास्ता इख़्तियार किया। वो पहुँच गये कुछ फ़िल्म निर्माताओं के पास और शक़ील साहब की हालत का ब्योरा देते हुए उनके लिए हासिल कर लिए तीन फ़िल्मों में गीत लिखने का कॉण्ट्रैक्ट। यही नहीं, उस समय शक़ील किसी फ़िल्म के लिए जितने रकम लिया करते थे, उससे दस गुना ज़्यादा रकम पर नौशाद ने उन फ़िल्म निर्माताओं को राज़ी करवाया। उसके बाद नौशाद ख़ुद जा पहुँचे पंचगनी जहाँ शक़ील का इलाज चल रहा था। जैसे ही उन्होंने शक़ील को उन तीन फ़िल्मों में गाने लिखने और पेमेण्ट की रकम के बारे में बताया तो शक़ील समझ गये कि उन पर अहसान किया जा रहा है। और उन्होंने नौशाद साहब से वो फ़िल्में वापस कर आने को कहा। पर नौशाद साहब ने भी अब ज़िद पकड़ ली और शक़ील साहब को गाने लिखने पर मजबूर किया। जानते हैं ये तीन फ़िल्में कौन सी थीं? 'राम और श्याम', 'आदमी', और 'संघर्ष'। फ़िल्म 'राम और श्याम' के इस ख़ास गीत "आज की रात मेरे" शक़ील बदायूंनी ने पंचगनी के अस्पताल के बेड पर बैठे-बैठे लिखा था। अपनी दिन-ब-दिन ढलती जा रही ज़िन्दगी को देख कर उन्हें शायद यह अहसास हो चला था कि अब वो ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेंगे, कि उनका अन्तिम समय अब आ चला है, शायद इसीलिए उन्होंने इस गीत में लिखा कि "कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा, शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा, आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले"। 

नौशाद साहब अपने जीवन के अन्त तक जब भी इस गीत को सुनते थे, उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे शक़ील को याद करके। उन्हें ऐसा लगता था, उन्हें यह महसूस होता था कि शक़ील ने यह गीत उन्हीं को ही लिखा है नायिका की आड़ लेकर। नौशाद साहब ने बड़े मन से इस गीत को राग पहाड़ी, कहरवा ताल में बाँधा था। जिस तरह से शक़ील ने नौशाद साहब को अपनी ग़रीबी के बारे में नहीं बताया, अपना अन्तिम समय आने के बारे में नहीं बताया और चुपचाप पंचगनी के अस्पताल में चले गये, और जिस तरह से नौशाद उन पर तरस खाकर उनके लिए दस गुना ज़्यादा फ़ीस का इन्तज़ाम कर लाये, और शक़ील साहब के मना करने के बावजूद ज़बरदस्ती इन तीन फ़िल्मों को दस गुना ज़्यादा रकम में करने का ज़िद किया, ये सब बातें शक़ील को अन्दर ही अन्दर खाये जा रहा था, और उनके दिल की यही कश्मकश इस गीत के एक अन्तरे में फूट पड़ी- "मैंने चाहा कि बता दूँ मेरी हक़ीक़त अपनी, तू ने लेकिन न मेरा राज़-ए-मोहब्बत समझा, मेरी उलझन मेरी हालात यहाँ तक पहुँचे, तेरी आँखों ने मेरे प्यार को नफ़रत समझा, अब तेरी राह से बेगाना चला जायेगा, शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा..."। और अपने दिल की सलामी दे कर यह परवाना 20 अप्रैल 1970 को सचमुच दुनिया के इस बज़्म से हमेशा हमेशा के लिए चला गया, और नौशाद साहब के दिल में गूंजने लगे ये बोल-

तू मेरा साथ न दे राह-ए-मोहब्बत में सनम,
चलते चलते मैं किसी राह पे मुड़ जाऊँगा।
कहकशां चाँद सितारे तेरे चूमेंगे क़दम,
तेरे रस्ते की मैं एक धूल हूँ उड़ जाऊँगा।
साथ मेरे मेरा अफ़साना चला जायेगा,
कल तेरी बज़्म से दीवाना चला जायेगा,
शम्मा रह जायेगी परवाना चला जायेगा।


फिल्म - राम और श्याम : 'आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले...' : गायक - मुहम्मद रफी : संगीत - नौशाद : गीत - शकील बदायूँनी


 

अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Thursday, August 15, 2013

इस स्वतंत्रता दिवस आईये नज़र डालें देश के हाल पर

1962 में बनी इस फिल्म के प्रस्तुत गीत में देश के उस वक्त के हाल का बखान था, पर वास्तव में देखा जाए तो आज के हालत भी कुछ बहुत बेहतर नहीं हैं. ओल्ड इस गोल्ड सीरिस (यादों का पोडकास्ट) में आज आवाज़ है लिंटा मनोज की और हम याद कर रहे हैं कमचर्चित गायिका शान्ति माथुर के गाए इस खास गीत की.

 

Thursday, March 28, 2013

तन रंग लो जी आज मन रंग लो... होली के गीतों से तन मन भीगोने वाला गीतकार




भारतीय सिनेमा के सौ साल – 40
कारवाँ सिने-संगीत का 

होली के हजारों रंग भरने वाले गीतकार शकील बदायूनी के सुपुत्र जावेद बदायूनी से बातचीत

‘लाई है हज़ारों रंग होली...’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का रस-रंग के उल्लासपूर्ण परिवेश में हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। परन्तु आज होली पर्व के विशेष अवसर के कारण हम दो वर्ष पूर्व सुजॉय चटर्जी द्वारा सुप्रसिद्ध गीतकार शकील बदायूनी के बेटे जावेद बदायूनी से की गई बातचीत का पुनर्प्रकाशन कर रहे हैं। आप जानते ही हैं कि शकील बदायूनी ने फिल्मों में कई लोकप्रिय होली गीत रचे थे, जो आज भी गाये-गुनगुनाए जाते हैं। 

होली है!!! 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के दोस्तों, नमस्कार, और आप सभी को रंगीन पर्व होली पर हमारी ढेर सारी शुभकामनाएँ। तो कैसा रहा होली का दिन? ख़ूब मस्ती की न? हमनें भी की। हमारी टोली दिन भर रंग उड़ेलते हुए, मौज-मस्ती करते हुए, लोगों को शुभकामनाएँ देते हुए, अब दिन ढलने पर आ पहुँचे हैं एक मशहूर शायर व गीतकार के बेटे के दर पर। ये उस अज़ीम शायर के बेटे हैं, जिस शायर नें अदबी शायरी के साथ-साथ फिल्म-संगीत में भी अपना अमूल्य योगदान दिया। हम आये हैं, शक़ील बदायूनी के साहबज़ादे जावेद बदायूनी के पास, उनके पिता के बारे में थोड़ा और क़रीब से जानने के लिए। इस बातचीत के साथ ही हम शक़ील साहब के लिखे कुछ बेमिसाल होली गीत भी आपको सुनवायेंगे।

सुजॊय- जावेद बदायूनी साहब, नमस्कार, और 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

जावेद- बहुत-बहुत शुक्रिया, और आपको भी होली की शुभकामनाएँ।

सुजॊय- आज का दिन बड़ा ही रंगीन है और हमें बेहद ख़ुशी है कि आज के दिन आप हमारे पाठकों से रू-ब-रू हो रहे हैं।

जावेद- मुझे भी बेहद खुशी है, अपने पिता के बारे में कुछ बताने का मौका पाकर। 
 
सुजॊय- जावेद साहब, इससे पहले कि मैं आप से शक़ील साहब के बारे में कुछ पूछूँ, मैं यह बताना चाहूँगा कि उन्होंने कुछ शानदार होली गीत लिखे हैं, जिनका शुमार सर्वश्रेष्ठ होली गीतों में होता है। ऐसा ही एक होली गीत है फ़िल्म 'मदर इण्डिया' का, "होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे जरा बाँसुरी...”। आइए, शमशाद बेगम की आवाज़ में इस गीत को पहले सुनते हैं, फिर बातचीत को आगे बढ़ाते हैं।

जावेद- जरूर साहब, सुनवाइए। 


फिल्म मदर इण्डिया : ‘होली आई रे कन्हाई रंग बरसे...' : शमशाद बेगम और साथी



सुजॊय- जावेद साहब, यह बताइए कि जब आप छोटे थे, तब पिता के रूप में शक़ील साहब का बरताव कैसा हुआ करता था? घर-परिवार का माहौल कैसा था?

जावेद- एक पिता के रूप में उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था और सिर्फ मेरे साथ ही नहीं, अपने सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे और सबसे हँस-खेल कर बातें करते थे। यानी कि घर का माहौल बड़ा ही ख़ुशनुमा हुआ करता था।

सुजॊय- जावेद जी, घर पर शायरों का आना जाना लगा रहता होगा?

जावेद- जी हाँ, बिलकुल। शक़ील साहब के दोस्त लोगों का आना-जाना लगा ही रहता था, जिनमें बहुत से शायर भी होते थे। घर पर ही शेर-ओ-शायरी की बैठकें हुआ करती थीं।

सुजॊय- जावेद साहब, शक़ील साहब के अपने एक पुराने इंटरव्यु में ऐसा कहा था कि उनके करीयर को चार पड़ावों में विभाजित किया जा सकता है। पहले भाग में 1916 से 1936 का समय जब वे बदायूँ में रहा करते थे। फिर 1936 से 1942 का समय अलीगढ़ का और फिर 1942 से 1946 तक दिल्ली का उनका समय। और अन्त में 1946 के बाद बम्बई का सफ़र। हमें उनकी फ़िल्मी करीयर, यानी कि बम्बई के जीवन के बारे में तो फिर भी पता है, क्या आप पहले तीन के बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद- बदायूँ में जन्म और बचपन की दहलीज़ पार करने के बाद शकील साहब ने अलीगढ़ से अपनी ग्रैजुएशन पूरी की और दिल्ली चले गये, और वहाँ पर एक सरकारी नौकरी कर ली। साथ ही साथ अपने अंदर शेर-ओ-शायरी के जज्बे को कायम रखा और मुशायरों में भाग लेते रहे। ऐसे ही किसी एक मुशायरे में नौशाद साहब और ए.आर. कारदार साहब भी गए थे। उन्होने शकील साहब को नज़्म पढ़ते हुए सुना। उन पर शक़ील साहब की शायरी का इतना असर हुआ कि उसी वक़्त उन्हें फ़िल्म 'दर्द' के सभी गानें लिखने का ऒफ़र दे दिया।

सुजॊय- 'दर्द' का कौन सा गीत सबसे पहले उन्होंने लिखा होगा, इसके बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद- उनका लिखा ‘हम दर्द का फसाना...’ पहला गीत था, और दूसरा गाना था ‘अफसाना लिख रही हूँ...’, उमा देवी का गाया हुआ।

सुजॊय- इस दूसरे गीत को हम अपने श्रोताओं को सुनवा चुके हैं। क्योंकि आज होली का अवसर है, आइए यहाँ पर शक़ील साहब का लिखा हुआ एक और शानदार होली गीत सुनते हैं। फ़िल्म 'कोहिनूर' से जिसका संगीत नौशाद साहब ने तैयार किया था।

जावेद- ज़रूर सुनवाइए।


फिल्म कोहिनूर : ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो...’ : मोहम्मद रफी और साथी


सुजॊय- जावेद साहब, क्या शक़ील साहब कभी आप भाई-बहनों को प्रोत्साहित किया करते थे लिखने के लिए?

जावेद- जी हाँ, वो प्रोत्साहित भी करते थे और जब हम कुछ लिख कर उन्हें दिखाते तो वो ग़लतियों को सुधार भी दिया करते थे।

सुजॊय- शक़ील बदायूनी और नौशाद अली, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू थे। ये दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे। क्या शक़ील साहब आप सब को नौशाद साहब और उस दोस्ती के बारे में बताया करते थे? या फिर इन दोनों से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाकया याद है आपको?

जावेद- यह हक़ीक़त है कि शकील साहब और नौशाद साहब ग्रेटेस्ट फ्रेंड थे। शक़ील साहब, नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों के आपस की ट्युनिंग् ग़ज़ब की थी और यह ट्युनिंग इनके गीतों से साफ़ झलकती है। शक़ील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारा हौसला-अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार दिया करते थे।

सुजॊय - यानी कि शक़ील साहब एक पिता के रूप में जिस तरह से आपको गाइड करते थे, उनके जाने के बाद वही किरदार नौशाद साहब ने निभाया और आपको पिता के समान स्नेह दिया।

जावेद- इसमें कोई शक नहीं।

सुजॊय- जावेद साहब, बचपन की कई यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। शक़ील साहब से जुड़ी आप के मन में भी कई स्मृतियाँ होंगी। उन स्मृतियों में से कुछ आप हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

जावेद- शकील साहब के हम सब प्रायः रेकार्डिंग पर जाया करते थे और कभी-कभी तो वो हमें शूटिंग् पर भी ले जाते। फ़िल्म 'राम और श्याम' के लिए वो हमें मद्रास ले गये थे। 'दो बदन', 'नूरजहाँ' और कुछ और फ़िल्मों की शूटिंग् पर हम सब गये थे। वो सब यादें अब भी हमारे मन में ताज़ा हैं जो बहुत याद आते हैं।

सुजॊय- अब मैं आपसे जानना चाहूँगा कि शक़ील साहब के लिखे कौन कौन से गीत आपको व्यक्तिगत तौर पे सब से ज़्यादा पसंद हैं?

जावेद- उनके लिखे सभी गीत अपने आप में मासटरपीस हैं, चाहे किसी भी संगीतकार के लिए लिखे गये हों।

सुजॊय- निस्सन्देह।

जावेद- यह बता पाना नामुमकिन है कि कौन सा गीत सर्वोत्तम है। मैं कुछ फ़िल्मों के नाम ज़रूर ले सकता हूँ, जैसे कि 'मदर इण्डिया', 'गंगा जमुना', 'बैजु बावरा', 'चौदहवीं का चांद', 'साहब बीवी और ग़ुलाम', और ‘मुगल-ए-आजम’।

सुजॊय- वाह! आपने फिल्म मुगल-ए-आजम का ज़िक्र किया, और आज हम आप से शक़ील साहब के बारे में बातचीत करते हुए उनके लिखे कुछ होली गीत सुन ही रहे हैं, तो मुझे एकदम से याद आया कि इस फ़िल्म में भी एक ऐसा गीत है जिसे हम पूर्णतः होली गीत तो नहीं कह सकते, लेकिन क्योंकि उसमें राधा और कृष्ण के छेदछाड़ का वर्णन है इसलिए इसे यहाँ पर बजाया जा सकता है। मूलतः यह गीत लखनऊ कथक घराने के संस्थापक बिंदादीन महाराज की एक ठुमरी रचना है, जिसे फिल्म के नृत्य निर्देशक लच्छू महाराज और संगीत निर्देशक नौशाद ने शकील साहब से फिल्म के लिए पुनर्लेखन कराया था।

जावेद- जी बिलकुल ठीक फरमाया आपने। सुनने वालों को यह होली गीत जरूर सुनवाइये।


फिल्म मुगल-ए-आजम : ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे...’ : लता मंगेशकर और साथी


सुजॊय- अच्छा जावेद साहब, हम शक़ील साहब के लिखे गीतों को हर रोज़ ही कहीं न कहीं से सुनते हैं, लेकिन उनके लिखे गैर-फिल्मी नज़मों और गज़लों को कम ही सुना जाता है। इसलिए मैं आप से उनकी लिखी अदबी शायरी और प्रकाशनों के बारे में जानना चाहूँगा।

जावेद- मैं आपको बताऊँ कि भले ही वो फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में पहले वो एक लिटररी फ़िगर थे और बाद में फ़िल्मी गीतकार। फ़िल्मों में गीत लेखन वो अपने परिवार को चलाने के लिये किया करते थे। जहाँ तक ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का सवाल है, उन्होंने ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों के पाँच दीवान लिखे हैं, जिनका अब ‘कुलयात-ए- शकील’ के नाम से संकलन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन काल में 500 से ज़्यादा ग़ज़लें और नज़्में लिखे होंगे जिन्हें आज भारत, पाक़िस्तान और दुनिया भर के देशों के गायक गाते हैं।

सुजॊय- आपने आँकड़ा बताया तो मुझे याद आया कि हमनें आप से शक़ील साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या नहीं पूछी। कोई अंदाज़ा है आपको कि शक़ील साहब ने कुल कितने फ़िल्मी गीत लिखे होंगे?

जावेद- उन्होने 108 फिल्मों में लगभग 800 गीत लिखे थे। इनमें से 5 फिल्में अनरिलीज़्ड भी हैं।

सुजॊय- वाह! जावेद साहब, यहाँ पर हम शक़ील साहब का लिखा एक और बेहतरीन होली गीत सुनना और सुनवाना चाहेंगे। नौशाद साहब के अलावा जिन संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है रवि साहब का। अभी कुछ देर पहले आपने 'दो बदन' और 'चौदहवीं का चाँद' फ़िल्मों का नाम लिया जिनमें रवि का संगीत था। तो रवि साहब के ही संगीत में शक़ील साहब नें फ़िल्म 'फूल और पत्थर' के भी गीत लिखे जिनमें एक होली गीत था- ‘लाई है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिए...’ आइए सुनते हैं इस गीत को।


फिल्म फूल और पत्थर : ‘लाई है हज़ारों रंग होली...’ : आशा भोसले और साथी


सुजॊय- अच्छा जावेद साहब, अब एक आख़िरी सवाल आप से। शक़ील साहब नें जो मशाल जलाई है, क्या उस मशाल को आप या परिवार का कोई और सदस्य उसे आगे बढ़ाने में इच्छुक हैं?

जावेद- मेरी बड़ी बहन रज़ीज़ को पिता जी के गुण मिले हैं और वो बहुत खूबसूरत शायरी करती हैं।

सुजॊय- बहुत-बहुत शुक्रिया जावेद साहब। होली के इस रंगीन पर्व को आप ने शक़ील साहब की यादों से और भी रंगीन किया, और साथ ही उनके लिखे होली गीतों को सुन कर मन ख़ुश हो गया। भविष्य में हम आपसे शक़ील साहब की शख्सियत के कुछ अनछुये पहलुओं पर चर्चा करना चाहेंगे। आपको एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामना देते हुए अब विदा लेते हैं, नमस्कार।

जावेद- आपको और सभी पाठकों / श्रोताओं का बहुत-बहुत शुक्रिया और होली की मुबारकबाद अदा करता हूँ।

तो दोस्तों, होली पर ये थी 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की ख़ास प्रस्तुति जिसमें हमनें शक़ील बदायूनी के लिखे होली गीत सुनने के साथ-साथ थोड़ी बातचीत की, उन्हीं के बेटे जावेद बदायूनी से। आपको आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए  radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें। आप सभी को एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामनाएँ, नमस्कार!

Wednesday, August 24, 2011

अपनी आजादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं - शकील ने लिखी दृढ संकल्प की गाथा इस गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 729/2011/169



‘ओल्ड इज गोल्ड’ पर जारी श्रृंखला ‘वतन के तराने’ की नौवीं कड़ी में एक और बलिदानी की अमर गाथा और अपनी आज़ादी की रक्षा का संकल्प लेने वाले एक प्रेरक गीत के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र आपके सम्मुख उपस्थित हूँ। आज के अंक में हम आपको फिल्म जगत के जाने-माने शायर और गीतकार शकील बदायूनी का एक संकल्प गीत सुनवाएँगे और साथ ही स्वतन्त्रता संग्राम के एक ऐसे सिपाही का स्मरण करेंगे जिसे जीते जी अंग्रेज़ गिरफ्तार न कर सके। उस वीर सपूत को हम चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से जानते हैं।



लोगों ने आज़ाद को 1921 के असहयोग आन्दोलन से पहचाना। उन दिनों अंग्रेज़ युवराज के बहिष्कार का अभियान चल रहा था। काशी (वाराणसी) में पुलिस आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर रही थी। पुलिस ने एक पन्द्रह वर्षीय किशोर को पकड़ा और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। कम आयु देख कर मजिस्ट्रेट ने पहले तो चेतावनी देकर छोड़ दिया, किन्तु जब वह किशोर दोबारा पकड़ा गया तो मजिस्ट्रेट ने उसे 15 बेंतों की सजा दी। मजिस्ट्रेट के नाम पूछने पर उस किशोर ने ‘आज़ाद’ और निवास स्थान पूछने पर उसने उत्तर दिया था ‘जेलखाना’। यही किशोर आगे चलकर चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से जाना गया और क्रान्तिकारियों के प्रधान सेनापति के पद पर प्रतिष्ठित हुआ। असहयोग आन्दोलन से स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी की भूमिका अदा करने वाले चन्द्रशेखर आज़ाद आन्दोलन स्थगित हो जाने पर बहुत निराश हुए और सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग पर बढ़ चले।



शीघ्र ही आज़ाद की भेंट प्रणवेशकुमार चटर्जी से हुई और वे ‘भारतीय प्रजातन्त्र संघ’ के सदस्य बन गए। संगठन में रह कर आज़ाद ने अपने साहस और अपने पावन चरित्र के बल पर कई महत्त्वपूर्ण अभियान का सफलता के साथ संचालन किया। 9अगस्त, 1925 को शाम का समय था, 8 डाउन पैसेंजर लखनऊ की ओर चली आ रही थी। गाड़ी अभी काकोरी स्टेशन चली थी कि अचानक चेन खींच कर रोक दी गई। दरअसल इस ट्रेन में सरकारी खजाना ले जाया जा रहा था, जिसे क्रान्तिकारियों ने लूट कर अंग्रेजों को सीधी चुनौती दी थी। ‘काकोरी षड्यंत्र काण्ड’ में शामिल क्रान्तिकारियों में से रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फाँसी की सजा दी गई थी। शेष क्रान्तिकारियों को आजीवन कारावास से लेकर पाँच वर्ष तक की कारावास की सजा दी गई थी। इस अभियान में चन्द्रशेखर आज़ाद भी सम्मिलित थे, किन्तु अंग्रेज़ उन्हे पकड़ न सके।



इस अभियान के बाद आज़ाद ने अप्रैल 1928 के साँडर्स को ‘जलियाँवाला बाग नरसंहार’ की सज़ा देने और ब्रिटिश संसद में बम फेकने के अभियान में सम्मिलित थे। (स्वतन्त्रता संग्राम के इन दोनों अभियानों की चर्चा हम इस श्रृंखला की छठी कड़ी में कर चुके हैं।) 1925 से 1931 तक क्रान्ति के जितने भी अभियान हुए, उन सब में आज़ाद की भूमिका प्रमुख थी। परन्तु आज़ाद सदा आज़ाद ही रहे। फरवरी 1931 में अपने एक विश्वासघाती साथी की गद्दारी से इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सशस्त्र पुलिस द्वारा घेर लिये गए। उनके पिस्तोल में जब तक गोलियाँ थीं तब तक मुक़ाबला किया और जब एकमात्र गोली बच गई तो स्वयं अपने ऊपर चला ली। अंग्रेजों की गोली से मरने के बजाय आज़ाद ने आत्मघात कर लेना उचित समझा। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महानायक बलिदानी चन्द्रशेखर आज़ाद आजीवन आज़ाद ही रहे।



दोस्तों, आज हम आपको एक ऐसे गीतकार का देशभक्ति गीत सुनवाएँगे जिन्हें 1961 से 1963 तक लगातार तीन वर्षों तक वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ था। आज के गीतकार हैं; शकील बदायूनी और फिल्म है; ‘लीडर’। 1964 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीत निर्देशक नौशाद हैं और गीत के बोल हैं- ‘अपनी आज़ादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं...’। इस गीत में अपनी आज़ादी की रक्षा का संकल्प है और देश के दुश्मनों को चेतावनी। आइए सुनते हैं जोश से भरपूर यह गीत-







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - साहिर के हैं शब्द.

सूत्र २ - आज़ाद भारत की मधुर कल्पना है गीत में.

सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "गंगा" .



अब बताएं -

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

गायक बताएं - २ अंक

संगीतकार बताएं - ३ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -





खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, March 19, 2011

होली के हजारों रंग अपने गीतों में भरने वाले शकील बदायूनीं साहब को याद करें हम उनके बेटे जावेद बदायूनीं के मार्फ़त

होली है!!! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और आप सभी को रंगीन पर्व होली पर हमारी ढेर सारी शुभकामनाएँ। तो कैसा रहा होली से पहले का दिन? ख़ूब मस्ती की न? हमनें भी की। और 'आवाज़' की हमारी टोली दिन भर रंग उड़ेलते हुए, मौज मस्ती करते हुए, लोगों को शुभकामनाएँ देते हुए, अब दिन ढलने पर आ पहुँचे हैं एक मशहूर शायर व गीतकार के बेटे के दर पर। ये उस अज़ीम शायर के बेटे हैं, जिस शायर नें अदबी शायरी के साथ साथ फ़िल्म-संगीत में भी अपना अमूल्य योगदान दिया। हम आये हैं शक़ील बदायूनी के साहबज़ादे जावेद बदायूनी के पास उनके पिता के बारे में थोड़ा और क़रीब से जानने के लिए और साथ ही शक़ील साहब के लिखे कुछ बेमिसाल होली गीत भी आपको सुनवायेंगे।

सुजॊय - जावेद बदायूनी साहब, नमस्कार, और 'हिंद-युग्म' परिवार की तरफ़ से आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जावेद बदायूनी - शुक्रिया बहुत बहुत, और आपको भी होली की शुभकामनाएँ!

सुजॊय - आज का दिन बड़ा ही रंगीन है, और हमें बेहद ख़ुशी है कि आज के दिन आप हमारे पाठकों से रु-ब-रु हो रहे हैं।

जावेद बदायूनी - मुझे भी बेहद ख़ुशी है अपने पिता के बारे में बताने का मौका पाकर।

सुजॊय - जावेद साहब, इससे पहले कि मैं आप से शक़ील साहब के बारे में कुछ पूछूँ, मैं यह बताना चाहूँगा कि उन्होंने कुछ शानदार होली गीत लिखे हैं, जिनका शुमार सर्वश्रेष्ठ होली गीतों में होता है। ऐसा ही एक होली गीत है फ़िल्म 'मदर इण्डिया' का, "होली आई रे कन्हाई, रंग छलके, सुना दे ज़रा बांसुरी"। शम्शाद बेगम की आवाज़ में इस गीत को आइए पहले सुनते हैं, फिर बातचीत आगे बढ़ाते हैं।

जावेद बदायूनी - ज़रूर साहब, सुनवाइए!

गीत - होली आई रे कन्हाई (मदर इण्डिया)


सुजॊय - जावेद साहब, यह बताइए कि जब आप छोटे थे, तब पिता के रूप में शक़ील साहब का बरताव कैसा हुआ करता था? घर परिवार का माहौल कैसा था?

जावेद बदायूनी - एक पिता के रूप में उनका व्यवहार दोस्ताना हुआ करता था, और सिर्फ़ मेरे साथ ही नहीं, अपने सभी बच्चों को बहुत प्यार करते थे और सब से हँस खेल कर बातें करते थे। यानी कि घर का माहौल बड़ा ही ख़ुशनुमा हुआ करता था।

सुजॊय - अच्छा जावेद जी, क्या घर पर शायरों का आना जाना लगा रहता था?

जावेद बदायूनी - जी हाँ जी हाँ, शक़ील साहब के दोस्त लोगों का आना जाना लगा ही रहता था जिनमें बहुत से शायर भी होते थे। घर पर ही शेर-ओ-शायरी की बैठकें हुआ करती थीं।

सुजॊय - जावेद साहब, शक़ील साहब के अपने एक पुराने इंटरव्यु में ऐसा कहा था कि उनके करीयर को चार पड़ावों में विभाजित किया जा सकता है। पहले भाग में १९१६ से १९३६ का समय जब वे बदायूँ में रहा करते थे। फिर १९३६ से १९४२ का समय अलीगढ़ का; १९४२ से १९४६ का दिल्ली का उनका समय, और १९४६ के बाद बम्बई का सफ़र। हमें उनकी फ़िल्मी करीयर, यानी कि बम्बई के जीवन के बारे में तो फिर भी पता है, क्या आप पहले तीन के बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद बदायूनी - बदायूँ में जन्म और बचपन की दहलीज़ पार करने के बाद शक़ील साहब नें अलीगढ़ से अपनी ग्रैजुएशन पूरी की और दिल्ली चले गये, और वहाँ पर एक सरकारी नौकरी कर ली। साथ ही साथ अपने अंदर शेर-ओ-शायरी के जस्बे को क़ायम रखा और मुशायरों में भाग लेते रहे। ऐसे ही किसी एक मुशायरे में नौशाद साहब और ए. आर. कारदार साहब भी गये हुए थे और इन्होंने शक़ील साहब को नज़्म पढ़ते हुए सुना। उन पर शक़ील साहब की शायरी का इतना असर हुआ कि उसी वक़्त उन्हें फ़िल्म 'दर्द' के सभी गानें लिखने का ऒफ़र दे दिया।

सुजॊय - 'दर्द' का कौन सा गीत सब से पहले उन्होंने लिखा होगा, इसके बारे में कुछ बता सकते हैं?

जावेद बदायूनी - "हम दर्द का फ़साना" उनका लिखा पहला गीत था, और दूसरा गाना था "अफ़साना लिख रही हूँ", उमा देवी का गाया हुआ।

सुजॊय - इस दूसरे गीत को हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं। क्योंकि आज होली है, आइए यहाँ पर शक़ील साहब का लिखा हुआ एक और शानदार होली गीत सुनते हैं। फ़िल्म 'कोहिनूर' से "तन रंग लो जी आज मन रंग लो"। संगीत नौशाद साहब का।

जावेद बदायूनी - ज़रूर सुनवाइए।

गीत - तन रंग लो जी आज मन रंग लो (कोहिनूर)


सुजॊय - जावेद साहब, क्या शक़ील साहब कभी आप भाई बहनों को प्रोत्साहित किया करते थे लिखने के लिये?

जावेद बदायूनी - जी हाँ, वो प्रोत्साहित भी करते थे और जब हम कुछ लिख कर उन्हें दिखाते तो वो ग़लतियों को सुधार भी दिया करते थे।

सुजॊय - शक़ील बदायूनी और नौशाद अली, जैसे एक ही सिक्के के दो पहलू। ये दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे। क्या शक़ील साहब आप सब को नौशाद साहब और उस दोस्ती के बारे में बताया करते थे? या फिर इन दोनों से जुड़ी कोई यादगार घटना या वाकया ?

जावेद बदायूनी - शक़ील साहब और नौशाद साहब वर ग्रेटेस्ट फ़्रेण्ड्स! यह हक़ीक़त है कि शक़ील साहब नौशाद साहब के साथ अपने परिवार से भी ज़्यादा वक़्त बिताया करते थे। दोनों के आपस की ट्युनिंग् ग़ज़ब की थी और यह ट्युनिंग् इनके गीतों से साफ़ छलकती है। शक़ील साहब के गुज़र जाने के बाद भी नौशाद साहब हमारे घर आते रहते थे और हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते थे। यहाँ तक कि नौशाद साहब हमें बताते थे कि ग़ज़ल और नज़्म किस तरह से पढ़ी जाती है और मैं जो कुछ भी लिखता था, वो उन्हें सुधार दिया करते थे।

सुजॊय - यानी कि शक़ील साहब एक पिता के रूप में जिस तरह से आपको गाइड करते थे, उनके जाने के बाद वही किरदार नौशाद साहब ने निभाया और आपको पिता समान स्नेह दिया।

जावेद बदायूनी - इसमें कोई शक़ नहीं!

सुजॊय - जावेद साहब, बचपन की कई यादें ऐसी होती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। शक़ील साहब से जुड़ी आप के मन में भी कई स्मृतियाँ होंगी। उन स्मृतियों में से कुछ आप हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?

जावेद बदायूनी - शक़ील साहब के साथ हम सब रेकॊर्डिंग् पर जाया करते थे और कभी कभी तो वो हमें शूटिंग् पर भी ले जाते। फ़िल्म 'राम और श्याम' के लिए वो हमें मद्रास ले गये थे। 'दो बदन', 'नूरजहाँ' और कुछ और फ़िल्मों की शूटिंग् पर सब गये थे। वो सब यादें अब भी हमारे मन में ताज़े हैं जो बहुत याद आते हैं।

सुजॊय - अब मैं आप से जानना चाहूँगा कि शक़ील साहब के लिखे कौन कौन से गीत आपको व्यक्तिगत तौर पे सब से ज़्यादा पसंद हैं?

जावेद बदायूनी - उनके लिखे सभी गीत अपने आप में मास्टरपीस हैं, चाहे किसी भी संगीतकार के लिये लिखे गये हों।

सुजॊय - निसंदेह!

जावेद बदायूनी - यह बताना नामुमकिन है कि कौन सा गीत सर्वोत्तम है। मैं कुछ फ़िल्मों के नाम ज़रूर ले सकता हूँ, जैसे कि 'मदर इण्डिया', 'गंगा जमुना', 'बैजु बावरा', 'चौदहवीं का चांद', 'साहब बीवी और ग़ुलाम', और 'मुग़ल-ए-आज़म'।

सुजॊय - वाह! आप ने 'मुग़ल-ए-आज़म' का ज़िक्र किया, और आज हम आप से शक़ील साहब के बारे में बातचीत करते हुए उनके लिखे कुछ होली गीत सुन रहे हैं, तो मुझे एकदम से याद आया कि इस फ़िल्म में भी एक ऐसा गीत है जिसे हम पूर्णत: होली गीत तो नहीं कह सकते, लेकिन क्योंकि उसमें राधा और कृष्ण के छेड़-छाड़ का वर्णन है, इसलिए इसे यहाँ पर बजाया जा सकता है।

जावेद बदायूनी - "मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे"।

सुजॊय - जी हाँ, आइए इस गीत को सुनते हैं, संगीत एक बार फिर नौशाद साहब का।

गीत - मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे (मुग़ल-ए-आज़म)


सुजॊय - अच्छा जावेद साहब, आप से अगला सवाल पूछने से पहले हम अपने श्रोता-पाठकों के लिए एक सवाल पूछना चाहेंगे। अभी जो हमनें गीत सुना "मोहे पनघट पे", इसी गीत का एक अन्य संस्करण भी हमारे हाथ लगा है। इस वर्ज़न को हम यहाँ पर सुनवा रहे हैं और हमारे श्रोताओं को हमें लिख भेजना है कि यह किनकी आवाज़ में है।

गीत - मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे - अन्य संस्करण (मुग़ल-ए-आज़म)


सुजॊय - जावेद साहब, हम शक़ील साहब के लिखे गीतों को हर रोज़ ही कहीं न कहीं से सुनते हैं, लेकिन उनके लिखे ग़ैर-फ़िल्मी नज़्मों और ग़ज़लों को कम ही सुना जाता है। इसलिए मैं आप से उनकी लिखी अदबी शायरी और प्रकाशनों के बारे में जानना चाहूँगा।

जावेद बदायूनी - मैं आपको बताऊँ कि भले ही वो फ़िल्मी गीतकार के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, लेकिन हक़ीक़त में पहले वो एक लिटररी फ़िगर थे और बाद में फ़िल्मी गीतकार। फ़िल्मों में गीत लेखन वो अपने परिवार को चलाने के लिये किया करते थे। जहाँ तक ग़ैर फ़िल्मी रचनाओं का सवाल है, उन्होंने ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों के पाँच दीवान लिखे हैं, जिनका अब 'कुल्यात-ए-शक़ील' के नाम से संकलन प्रकाशित हुआ है। उन्होंने अपने जीवन काल में ५०० से ज़्यादा ग़ज़लें और नज़्में लिखे होंगे जिन्हें आज भारत, पाक़िस्तान और दुनिया भर के देशों के गायक गाते हैं।

सुजॊय - आपनें आंकड़ा बताया तो मुझे याद आया कि हमनें आप से शक़ील साहब के लिखे फ़िल्मी गीतों की संख्या नहीं पूछी। कोई अंदाज़ा आपको कि शक़ील साहब ने कुल कितने फ़िल्मी गीत लिखे होंगे?

जावेद बदायूनी - उन्होंने १०८ फ़िल्मों में लगभग ८०० गीत लिखे हैं, और इनमें ५ फ़िल्में अनरिलीज़्ड भी हैं।

सुजॊय - वाह! जावेद साहब, यहाँ पर हम शक़ील साहब का लिखा एक और बेहतरीन होली गीत सुनना और सुनवाना चाहेंगे। नौशाद साहब के अलावा जिन संगीतकारों के साथ उन्होंने काम किया, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है रवि साहब का। अभी कुछ देर पहले आपने 'दो बदन' और 'चौदहवीं का चाँद' फ़िल्मों का नाम लिया जिनमें रवि का संगीत था। तो रवि साहब के ही संगीत में शक़ील साहब नें फ़िल्म 'फूल और पत्थर' के भी गीत लिखे जिनमें एक होली गीत था "लायी है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिये, कोई मन के लिये"। सुनते हैं इस गीत को।

गीत - लायी है हज़ारों रंग होली (फूल और पत्थर)


सुजॊय - दोस्तों, आपने ग़ौर किया कि इस गीत में और 'कोहिनूर' के होली गीत में, दोनों में ही "तन" और "मन" शब्दों का शक़ील साहब ने इस्तमाल किया है। अच्छा जावेद साहब, अब एक आख़िरी सवाल आप से। शक़ील साहब नें जो मशाल जलाई है, क्या उस मशाल को आप या कोई और रिश्तेदार उसे आगे बढ़ाने में इच्छुक हैं?

जावेद बदायूनी - मेरी बड़ी बहन रज़ीज़ शक़ील को शक़ील साहब के गुण मिले हैं और वो बहुत ख़ूबसूरत शायरी लिखती हैं।

सुजॊय - आप किस क्षेत्र में कार्यरत है?

जावेद बदायूनी - मैं ३२ साल से SOTC Tour Operators के साथ था, और अब HDFC Standard Life में हूँ, मुंबई में स्थित हूँ।

सुजॊय - बहुत बहुत शुक्रिया जावेद साहब। होली के इस रंगीन पर्व को आप ने शक़ील साहब की यादों से और भी रंगीन किया, और साथ ही उनके लिखे होली गीतों को सुन कर मन ख़ुश हो गया। भविष्य में हम आप से शक़ील साहब की शख्सियत के कुछ अनछुये पहलुयों पर चर्चा करना चाहेंगे। आपको एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामना देते हुए अब विदा लेते हैं, नमस्कार!

जावेद बदायूनी - बहुत बहुत शुक्रिया आपका!

तो दोस्तों, होली पर ये थी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास प्रस्तुति जिसमें हमनें शक़ील बदायूनी के लिखे होली गीत सुनने के साथ साथ थोड़ी बहुत बातचीत की उन्हीं के बेटे जावेद बदायूनी से। आशा है आपको यह प्रस्तुति अच्छी लगी होगी। ज़रूर लिख भेजिएगा अपने विचार oig@hindyugm.com के पते पर। अब आज के लिए हमें इजाज़त दीजिए, 'आवाज़' पर 'सुर-संगम' लेकर सुमित हाज़िर होंगे कल सुबह ९ बजे, पधारिएगा ज़रूर। आप सभी को एक बार फिर होली की हार्दिक शुभकामनाएँ, नमस्कार!

Monday, January 31, 2011

तेरा ख्याल दिल से भुलाया न जायेगा....वाकई सुर्रैया को कभी भी भुला नहीं पायेगें हिंदी फिल्म संगीत के रसिक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 582/2010/282

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! आज ३१ जनवरी है। आज के ही दिन सन् २००४ में गायिका-अभिनेत्री सुरैया इस दुनिया-ए-फ़ानी को हमेशा के लिए छोड़ कर चली गईं थीं। सुरैया ने गीत गाना ६० के दशक में ही छोड़ दिया था, लेकिन उनकी आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि आज इतने दशकों बाद भी उनके गाये गीतों को हमने अपने कलेजे से लगा रखा है। 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से सुरैया जी को हम श्रद्धांजली अर्पित करते हैं और उन्हीं पर केन्द्रित लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' को आगे बढ़ाते हैं। सच ही तो कहा है इस गीत के गीतकार शक़ील बदायूनी ने कि "तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा, उल्फ़त की ज़िंदगी को मिटाया ना जाएगा"। सुरैया की सुंदरता, अभिनय और गायन, इन तीनों आयामों में ही सुरैया अपने दौर में सब से उपर रहीं। और क्यों ना हो जब उनका नाम ही "सुर" से शुरु होता है! युं तो हर फ़िल्म कलाकार के अपने प्रशंसक होते हैं, 'फ़ैन फ़ॊलोविंग्' होती है, पर अगर कलाकार में रूप के साथ-साथ स्वर का भी संगम हो, बड़ी-बड़ी नशीली आँखों के साथ-साथ शहद जैसी मीठी आवाज़ हो, तो प्रशंसकों और चाहनेवालों की संख्या कई गुणा बढ़ जाती है। धड़कते दिल लिए सिने-प्रेमी भीतर के तरफ़ जैसे खींचे चले जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे सुरैया के ही गाये एक गीत के बोल हैं - "धड़कते दिल की तमन्ना हो, मेरा प्यार हो तुम"। ख़ैर, आज के अंक के लिए सुरैया जी को श्रद्धांजली स्वरूप हमने जो गीत चुना है, वह वही गीत है जो शीर्षक है इस लघु शृंखला का - "तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा"। १९४९ की फ़िल्म 'दिल्लगी' का यह गीत है, शक़ील साहब के बोल और नौशाद साहब का संगीत।

फ़िल्म 'दिल्लगी' के मशहूर गीत "तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी" से हमने लघु शृंखला 'प्योर गोल्ड' का समापन किया था (अंक-३५०)। इस शुंखला में हमनें ४० के दशक के १० सालों के दस सुपरहिट गीत शामिल किए थे। और १९४९ के साल को रिप्रेज़ेण्ट करने के लिए हमने इस सुरैया - श्याम डुएट को चुना था। 'दिल्लगी' ए. आर. कारदार की फ़िल्म थी और १९४९ में उनकी एक और फ़िल्म 'दुलारी' भी आई थी जिसमें भी शक़ील-नौशाद ने कुछ यादगार रंग भरे। १९४९ का यह साल सुरैया के लिए जितना सुखदायी सिद्ध हुआ, उतना ही सफल रहा नौशाद साहब के लिए भी। 'दिल्लगी' और 'दुलारी' के अलावा महबूब साहब की फ़िल्म 'अंदाज़' और ताजमहल पिक्चर्स की फ़िल्म 'चांदनी रात' के गानें भी ख़ूब चर्चा में रहे। फ़िल्म 'दिल्लगी' के शीर्षक गीत और आज के प्रस्तुत गीत के अलावा भी सुरैय्या के गाए कुछ और बेहद हिट गानें थे इस फ़िल्म में, जैसे कि "मुरलीवाले मुरली बजा सुन सुन मुरली को नाचे जिया", "चार दिन की चांदनी थी फिर अंधेरी रात है", "निराला मोहब्बत का दसतूर देखा", "लेके दिल चुपके से किया मजबूर हाए" और "दुनिया क्या जाने मेरा अफ़साना क्यों गाए दिल उल्फ़त का तराना"। हर गीत में उनका अलग अंदाज़ सुनने को मिला। सुरैया के साथ साथ नौशाद साहब को भी हम सलाम करते हैं जिन्होंने ऐसी ऐसी धुनें बनाईं कि जिनके बारे में आज इतने सालों बाद उल्लेख करते हुए भी अजीब ख़ुशी महसूस हो रही है। दोस्तों, कल हमने शृंखला की शुरुआत की थी कारदार साहब की ही फ़िल्म 'शारदा' के गीत से, जिससे सुरैया जी के फ़िल्मी गायन का शुभारंभ हुआ था, और आगे चलकर सुरैया-कारदार की जोड़ी ने 'दर्द', 'दिल्लगी', 'दास्तान' और 'दीवाना' जैसी चर्चित फ़िल्में हमें दी। तो आइए आज सुरैया की पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए सुनते हैं "तेरा ख़याल दिल से भुलाया न जाएगा"। हमें पूरा यकीन है कि आप सब भी इस वक़्त यही सोच रहे होंगे कि वाक़ई सुरैया जी का ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा। 'आवाज़' परिवार की ओर से सुरैया की की स्मृति को श्रद्धा सुमन!



क्या आप जानते हैं...
कि गायिका-अभिनेत्रिओं में सुरैया ने सब से ज़्यादा फ़िल्में की और सब से ज़्यादा गानें गाये।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 03/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - ये एक युगल गीत है.

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - सह गायक कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह मुकाबला दिलचस्प है, अंजाना जी और अमित जी को २-२ अंक मिलेंगें, अवध जी और रोमेंद्र सागर जी सही जवाब लाये हैं बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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