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Wednesday, April 6, 2016

आखिर मैंने संगीत के लिए सब कुछ छोड़ दिया - रफीक शेख - एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाक़ात ज़रूरी है (४)
गायक संगीतकार रफीक शेख से हमारे पुराने श्रोता भली भाति परिचित है, अभी हाल ही में रिलीस हुई है, रफीक के आवाज़ और संगीत से सजी ग़ज़ल एल्बम "हमनफस". इसके आलावा रफीक बतौर संगीतकार कुछ मराठी फ़िल्में भी कर रहे हैं. आज के "एक मुलाक़ात ज़रूरी है" कार्यक्रम में आईये कुछ और करीब से महसूस करें रफीक के अब तक के संगीत सफ़र की दिलचस्प दास्तान 


Saturday, February 18, 2012

कोई ग़ज़ल सुनाकर क्या करना....कहा रफीक शेख ने

एक अनाम शायर की मशहूर गज़ल को सुरों में ढालकर पेश कर रहे हैं रफीक शेख. सुनिए इस ताज़ा प्रस्तुति को -

कोई गज़ल सुनाकर क्या करना,
यूँ बात बढ़ाकर क्या करना


तुम मेरे थे, तुम मेरे हो,
दुनिया को बता कर क्या करना


दिन याद से अच्छा गुजरेगा,
फिर तुम को भुला कर क्या करना....

Saturday, February 4, 2012

लायी हयात आये...रफीक शेख की मखमली आवाज़ में ज़ौक की क्लास्सिक शायरी

रफीक शेख 

रफीक शेख रेडियो प्लेबैक के सबसे लोकप्रियक कलाकारों में से एक हैं, विशेष रूप से उनके गज़ल गायन के ढेरों मुरीद हैं. रेडियो प्लेबैक के ओरिजिनल एल्बम "एक रात में" में उनकी गाई बहुत सी गज़लें संगृहीत हैं. आज के इस विशेष कार्यक्रम में हम लाये हैं उन्हीं की आवाज़, एक नई गज़ल के साथ. वैसे गज़ल और गज़लकार के बारे में संगीत प्रेमियों को बहुत कुछ बताने की जरुरत नहीं है. इब्राहीम "ज़ौक" की इस मशहूर गज़ल से आप सब अच्छे से परिचित होंगें. इसे पहले भी अनेकों फनकारों ने अपनी आवाज़ में ढाला है, पर रेडियो प्लेबैक के किसी भी आर्टिस्ट के द्वारा ये पहली कोशिश है.

लायी हयात आये कज़ा ले चली चले
ना अपनी ख़ुशी आये ना अपनी ख़ुशी चले |

दुनिया ने किसका राहे-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो यूं ही जब तक चली चले |

कम होंगे इस बिसात पे हम जैसे बदकिमार
जो चाल हम चले वो निहायत बुरी चले |

Friday, November 5, 2010

शुभ दीपवाली - जब पूरा आवाज़ परिवार एक सुर हुआ रफ़ीक शेख के साथ आपको बधाई देने के लिए

आवाज़ महोत्सव ओरिजिनल संगीत में गीत # २१

दोस्तों, क्या आपने कभी महसूस किया है कि दीपावली के आते ही कैसे अपने आप ही हमारे अंदर एक नयी सी खुशी, नयी सी आशा का संचार हो जाता है. यही इन त्योहारों की खासियत है कि ये वातावरण में एक ऐसी सकरात्मक ऊर्जा को घोल देते हैं कि हर कोई खुश और मुस्कुराता नज़र आता है. दोस्तों यूँ तो आज आपका मोबाइल, ई मेल इन्बोक्स आदि शुभ संदेशों से भरे हुए होंगें, पर जिस अंदाज़ में आज आपको "आवाज़" शुभकामना सन्देश देने जा रहा है, वो सबसे अनूठा अनोखा है. हमने अपने पुराने साथी संगीतकार/गायक रफीक शेख के साथ मिलकर एक गीत खास आपके लिए बनाया है, दिवाली की बधाईयों वाला. शब्द पारंपरिक है और संगीत संयोजन खुद रफीक का है. तो इस गीत को सुनिए और मुस्कुरा कर इस पवन त्यौहार का आनंद लीजिए. इस बार जन्मी ये सकारात्मकता अब यूँहीं हम सब के अंग संग रहें. सुख समृधि और खुशियों से हम सबके जीवन सजे. एक बार फिर आप सबको सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ.



रफ़ीक़ शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।

Awaaz Originals # 21 - Shubh Deepwali
Lyrics - Traditional
Music & Voice - Rafique Sheikh

Creative Commons License
shubh deepawali-original song by Rafique Sheikh & Hind Yugm is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivs 3.0 Unported License.

Monday, May 31, 2010

रफ़ी साहब- एक ऐसी आवाज़ जिसने जाने कितनी बार हम सब के जज़्बात अपने स्वरों में उकेरे है

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ४१

ल ही हम यह बात कर रहे थे कि शक़ील साहब ने ज़्यादातर काम नौशाद साहब के साथ किया है, तो लीजिए इस मशहूर जोड़ी के नाम करते हैं आज की 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' कड़ी को। मुस्लिम सबजेक्ट पर बनी फ़िल्मों में 'मेरे महबूब' का शुमार उल्लेखनीय फ़िल्मों में होता है। इस फ़िल्म का गीत संगीत का पक्ष बेहद मज़बूत रहा और आज भी इसके गीतों इज़्ज़त से सुने जाते हैं। लीजिए आज इसी फ़िल्म का शीर्षक गीत पेश-ए-ख़िदमत है। क्योंकि आज हम इस गीत के रफ़ी साहब वाले वर्ज़न का रिवाइव्ड रूप सुनेंगे, इसलिए आइए एक बार फिर से रुख़ करते हैं नौशाद साहब द्वारा प्रस्तुत दो कार्यक्रमों की ओर जिनमें वो रफ़ी साहब की तारीफ़ कर रहे हैं अपने अंदाज़ में। विविध भारती के 'संगीत के सितारे' कार्यक्रम में नौशाद साहब ने रफ़ी साहब की तारीफ़ कुछ इस तरह से की थी - "एक फ़नकार को जो अहसासात होने चाहिये, वो रफ़ी साहब में भरपूर था। एक गीत था राग मधुमंती पर। गाना रिकार्ड होने के बाद रफ़ी साहब ने उसे सुना और बार बार सुनते रहे। बोले कि 'शोरगुल से हट कर यह गाना सितना सुकून दे रहा है!' मैने कहा कि 'पहले यह बताइये कि आप पैसे कितने लोगे?' उन्होने कहा कि 'इसके पैसे नहीं चाहिये, सुकून पैसे से नहीं मिलता है।' उनकी तारीफ़ मैं कहाँ तक बयान करूँ?" दोस्तों, एक बार और नौशाद साहब विविध भारती के 'नौशाद-नामा' कार्यक्रम में रफ़ी साहब के बारे में कुछ बातें कही थी जो इस तरह से हैं - "जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आये तो दूसरा विश्व युद्ध ख़तम होने की कगार पर था। मुझे साल याद नहीं है। उस वक़्त प्रोड्युसरों को कम से कम एक 'वार प्रोपागंडा फ़िल्म' बनानी ही पड़ती थी। रफ़ी साहब मेरे पास आये लखन‍उ से मेरे वालिद साहब से एक सिफ़ारिशी ख़त लिखवाकर। छोटा सा तम्बुरा हाथ में लिये खड़े थे मेरे सामने। मैने उनसे पूछा कि क्या उन्होने किसी से संगीत की तालीम ली है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ साहब से शास्त्रीय संगीत सीखा है। उस्ताद बरकत अली ख़ाँ साहब, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ साहब के छोटे भाई हैं। मैने उनसे कहा कि अभी मेरे पास कोई गीत नहीं है, लेकिन एक कोरस गीत है जिसमें वो अगर चाहे तो चंद लाइनें गा सकते हैं। श्याम, जी. एम. दुरानी और कुछ और लोग भी उसमें गा रहे थे। और वह गीत था "हिंदुस्ताँ के हम हैं हिंदुस्ताँ हमारा", फ़िल्म 'पहले आप'। रफ़ी साहब ने दो लाइनें गाई और उन्हे १० रूपए मिले।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -मेरे महबूब तुझे...
कवर गायन -रफीक शेख




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रफीक शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Monday, May 17, 2010

नौशाद - शकील की जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को जन जन का संगीत बनाया उसका सरलीकरण करके

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २७

'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में आज प्रस्तुत है शक़ील - नौशाद की एक रचना जिसे फ़िल्म के लिए मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। फ़िल्म 'दुलारी' का यह गीत है "सुहानी रात ढल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे"। १९४९ का साल शक़ील-नौशाद के लिए एक सुखद साल रहा। महबूब ख़ान की फ़िल्म 'अंदाज़', ताजमहल पिक्चर्स की फ़िल्म 'चांदनी रात', तथा ए. आर. कारदार साहब की दो फ़िल्में 'दिल्लगी' और 'दुलारी' इसी साल प्रदर्शित हुई थी और ये सभी फ़िल्मों का गीत संगीत बेहद लोकप्रिय सिद्ध हुआ था। आज ज़िक्र 'दुलारी' का। इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुरेश, मधुबाला और गीता बाली। फ़िल्म का निर्देशन कारदार साहब ने ख़ुद ही किया था। आज के प्रस्तुत गीत पर हम अभी आते हैं, लेकिन उससे पहले आपको यह बताना चाहेंगे कि इसी फ़िल्म में लता जी और रफ़ी साहब ने अपना पहला डुएट गीत गाया था, यानी कि इसी फ़िल्म ने हमें दिया पहला 'लता-रफ़ी डुएट' और वह गीत था "मिल मिल के गाएँगे दो दिल यहाँ, एक तेरा एक मेरा"। एक और ऐसा युगल गीत था "रात रंगीली मस्त नज़ारे, गीत सुनाए चाँद सितारे"। फिर उसके बाद लता और रफ़ी की आवाज़ों में कैसे कैसे युगल गीत आए, उनके बारे में बोलने लगें तो कई हफ़्ते गुज़र जाएँगे! मोहम्मद रफ़ी की एकल आवाज़ में "सुहानी रात ढल चुकी" राग पहाड़ी पर आधारित है। इसी फ़िल्म का गीत "तोड़ दिया दिल मेरा" भी इसी राग पर आधारित है। दोस्तों, यह राग जितना शास्त्रीय है, उससे भी ज़्यादा यह जुड़ा हुआ है पहाड़ों के लोक संगीत से। यह पहाड़ों का संगीत है, जिसमें प्रेम, शांति और वेदना के सुर सुनाई देते हैं। राग पहाड़ी पर असंख्य फ़िल्मी गानें बने हैं, लेकिन आज क्योंकि हम बात कर रहे हैं नौशाद साहब के गाने की, तो हम नज़र दौड़ाएँगे उन्ही के स्वरबद्ध कुछ ऐसे गीतों पर जो इस राग पर आधारित हैं।

१. आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले (राम और श्याम)
२. दिल तोड़ने वाले तुझे दिल ढ़ूंढ रहा है (सन ऒफ़ इंडिया)
३. दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन आज की रात (कोहिनूर)
४. जवाँ है मोहब्बत हसीं है ज़माना (अनमोल घड़ी)
५. कोई प्यार की देखे जादूगरी (कोहिनूर)
६. ओ दूर के मुसाफ़िर हम को भी साथ ले ले (उड़न खटोला)
७. तोरा मन बड़ा पापी साँवरिया रे (गंगा जमुना)

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -सुहानी रात ढल चुकी...
कवर गायन -रफीक शेख




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रफीक शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Wednesday, May 5, 2010

दर्द और मुकेश के स्वरों में जैसे कोई गहरा रिश्ता था, जो हर बार सुनने वालों की आँखों से आंसू बन छलक उठता था

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १५

हिंदी फ़िल्मों में विदाई गीतों की बात करें तो सब से पहले "बाबुल की दुयाएँ लेती जा" ज़्यादातर लोगों को याद आता है। लेकिन इस विषय पर कुछ और भी बहुत ही ख़ूबसूरत गीत बने हैं और ऐसा ही एक विदाई गीत आज हम चुन कर ले आये हैं। मुकेश की आवाज़ में यह है फ़िल्म 'बम्बई का बाबू' का गाना "चल री सजनी अब क्या सोचे, कजरा ना बह जाये रोते रोते"। मेरे ख़याल से यह गाना फ़िल्म संगीत का पहला लोकप्रिय विदाई गीत होना चाहिए। 'बम्बई का बाबू' १९६० की फ़िल्म थी। इससे पहले ५० के दशक में कुछ चर्चित विदाई गीत आये तो थे ज़रूर, जैसे कि १९५० में फ़िल्म 'बाबुल' में शमशाद बेग़म ने एक विदाई गीत गाया था "छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा", १९५४ में फ़िल्म 'सुबह का तारा' में लता ने गाया था "चली बाँके दुल्हन उनसे लागी लगन मोरा माइके में जी घबरावत है", और १९५७ में मशहूर फ़िल्म 'मदर इंडिया' में शमशाद बेग़म ने एक बार फिर गाया "पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली"। लेकिन मुकेश के गाये इस गीत में कुछ ऐसी बात थी कि गीत सीधे लोगों के दिलों को छू गई और आज भी इस गीत को सुनते ही जैसे दिल रो पड़ता है उस बेटी के लिये जो अपने बाबुल का घर छोड़ एक नये संसार में प्रवेश करने जा रही है। "बाबुल पछताए हाथों को मल के, काहे दिया परदेस टुकड़े को दिल के", "ममता का आँचल, गुड़ियों का कँगना, छोटी बड़ी सखियाँ घर गली अँगना, छूट गया रे" जैसे बोलों ने इस गीत को और भी ज़्यादा भावुक बना दिया है। मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत को लिखा था और संगीतकार थे हमारे बर्मन दादा। 'बम्बई का बाबु' के मुख्य कलाकार थे देव आनंद और सुचित्रा सेन। युं तो इस फ़िल्म के दूसरे कई गाने भी मशहूर हुए लेकिन इस गीत को सब से ज़्यादा लोकप्रिय इसलिये कहा जा सकता है क्योंकि अमीन सायानी के बिनाका गीतमाला के वार्षिक कार्यक्रम में इस फ़िल्म के केवल इसी गीत को स्थान मिला था और वह भी पाँचवाँ। फ़िल्म की कहानी के मुताबिक यह गीत फ़िल्म में ख़ास जगह रखती है। सीन ऐसा है कि सुचित्रा सेन की शादी हो जाती है और वो अपने बाबुल का घर छोड़ विदा होती है। यह बात इस गीत को और भी ज़्यादा ग़मगीन बना देती है कि सुचित्रा सेन की शादी फ़िल्म के नायक देव अनंद से नहीं बल्कि किसी और से हो रही होती है। इस गीत में बर्मन दादा ने 'कोरस' का इतना बेहतरीन इस्तेमाल किया है कि 'इन्टरल्युड म्युज़िक' केवल शहनाई और कोरल सिंगिं‌ग् से ही बनाया गया है।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - चल री सजनी...
कवर गायन - रफीक शेख




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रफ़ीक़ शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Monday, April 26, 2010

राजेश रोशन को था अपनी धुन पर पूरा विश्वास जिसकी बदौलत सुनने वालों को मिला एक बेहद मनभावन गीत

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०६

राजेश रोशन ने अपने करीयर में कई बार रबीन्द्र संगीत से धुन लेकर हिंदी फ़िल्मी गीत तैयार किया है। इनमें से सब से मशहूर गीत रहा है फ़िल्म 'याराना' का "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा"। आज इस गीत की बारी 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में। क्योंकि यह गीत अंजान ने लिखा है, तो आज जान लेते हैं इस गीत के बारे में अनजान साहब के बेटे समीर क्या कह रहे हैं विविध भारती पर। "उन्होने (अंजान ने) मुखड़ा मुझे सुनाया "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", मुझे लगा कि बहुत ख़ूबसूरत गाना बनेगा। मगर जब हम गाँव से वापस आए और सिटिंग् हुई और रिकार्डिंग् पर जब गाना पहुँचा तो संजोग की बात थी कि रिकार्डिंग् में जाने से पहले तक प्रोड्युसर ने वो गाना नहीं सुना था। और रिकार्डिंग् में जब प्रोड्युसर आया और उन्होने जैसे ही गाना सुना तो बोले कि रिकार्डिंग् कैन्सल करो, मुझे यह गाना रिकार्ड नहीं करना है। उन्होने कहा कि इतना बेकार गाना मैंने अपनी ज़िंदगी में नहीं सुना, इतना खराब गाना राजु तुमने हमारी फ़िल्म के लिए बनाया है, मुझे यह गाना रिकार्ड नहीं करना है। अब राजेश रोशन का दिमाग़ उस ज़माने में, उनको ग़ुस्सा बहुत आता था, उन्होने कहा कि गफ़्फ़ार भाई, उनका नाम था गफ़्फ़ार नाडियाडवाला, सूरज नाडियाडवाला, हमीद नाडियादवाला, हमीद उसके प्रोड्युसर थे, हमीद, यह फ़िल्म बने ना बने, यह गाना रहे ना रहे, लेकिन यह गाना मैं रिकार्ड करने जा रहा हूँ और यह गाना मैं अपने पैसे से रिकार्ड करने जा रहा हूँ। और तुम अभी इसी वक़्त इस रिकार्डिंग् स्टुडियो से निकल जाओ, मुझे तुम्हारी शकल नही देखनी है, तुमको यह गाना नहीं समझ में आएगा, मैं यह गाना रिकार्ड करूँगा, तुमको इसका पैसा नहीं देना है, मैं अपने पैसे से रिकार्ड करूँगा। और उस आदमी ने अपने पैसे से वह गाना रिकार्ड किया और गाना रिकार्ड होके जब अमिताभ बच्चन तक पहुँचा तो उन्होने यह बात कही थी कि अगर यह गाना नहीं होगा तो मैं यह फ़िल्म नहीं करूँगा। और वह गाना माइलस्टोन बना।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - छूकर मेरे मन को
कवर गायन - रफीक शेख




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


रफ़ीक़ शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।


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खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Friday, April 2, 2010

एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ...नए संगीत के तीसरे सत्र की शुरूआत, नजीर बनारसी के कलाम और रफीक की आवाज़ से

Season 3 of new Music, Song # 01

दोस्तो, कहते है किसी काम को अगर फिर से शुरू करना हो, तो उसे वहीं से शुरू करना चाहिए जहाँ पर उसे छोड़ा गया था. आज आवाज़ के लिए ख़ास दिन है. 29 दिसंबर को हमने जिस सम्मानजनक रूप से नए संगीत को दूसरे सत्र को अलविदा कहा था, उसी नायाब अंदाज़ में आज हम स्वागत करने जा रहे हैं नए संगीत के तीसरे सत्र का. हमने आपको छोड़ा था रफीक भाई की सुरीली आवाज़ पर महकती एक ग़ज़ल पर, तो आज एक बार फिर संगीत के नए उभरते हुए योद्धाओं के आगमन का बिगुल बजाया जा रहा हैं उसी दमदार मखमली आवाज़ से. जी हाँ दोस्तों, सीज़न 3 आरंभ हो रहा है नजीर बनारसी के कलाम और रफीक शेख की जादू भरी अदायगी के साथ. रफीक हमारे पिछले सत्र के विजेता रहे हैं जिनकी 3 ग़ज़लें हमारे टॉप 10 गीतों में शामिल रहीं, और जिन्हें आवाज़ की तरफ से 6000 रूपए का नकद पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था, इस बार भी रफीक इस शानदार ग़ज़ल के साथ अपनी जबरदस्त शुरूआत करने जा रहे हैं नए सत्र में। नजीर बनारसी की ये ग़ज़ल उन्हें उनके एक मित्र के माध्यम से प्राप्त हुई है, नजीर साहब वो उस्ताद शायर हैं जिनके बोलों को जगजीत सिंह और अन्य नामी फनकारों ने कई-कई बार अपने स्वरों से सजाया है, याद कीजिये "कभी खामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे..." या फिर "एक दीवाने को ये आये हैं समझाने..." जैसी उत्कृष्ट ग़ज़लें. दुर्भाग्यवश नजीर साहब के बारे बहुत अधिक जानकारी हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं, हम गुजारिश करेंगें कि यदि आप में से कोई श्रोता उनके बारे कोई जानकारी हमें दे सकतें हैं तो अवश्य दें. हालाँकि ये ग़ज़ल उनकी अनुमति के बिना ही संगीतबद्ध हो कर यहाँ प्रसारित हो रही है, पर हमें पूरा यकीन है कि इस ग़ज़ल को सुनने के बाद नजीर साहब या उनके चाहने वालों को इस गुस्ताखी पर शिकायत की बजाय ख़ुशी अधिक होगी। तो पेश है दोस्तों, ये ग़ज़ल "एक रात में ...."

ग़ज़ल के बोल -

एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ,
मुफलिस का दीया हूँ मगर आंधी से लड़ा हूँ.

वो आईना हूँ कभी कमरे में सजा था,
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ.

मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया,
सिर्फ इसलिए कतरा हूँ, समुन्दर से जुदा हूँ.

दुनिया से निराली है 'नजीर' अपनी कहानी,
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ.




मेकिंग ऑफ़ "एक रात में..." - रफीक शेख (गायक/संगीतकार) के शब्दों में
मुझे ये ग़ज़ल रफीक सागर जी , जो रजा हसन के पिताजी हैं, उन्होंने दी थी. ये इतनी प्यारी ग़ज़ल है और बहुत ही सीधी भाषा में है जो सबको समझ में आएगी, इसके हर शेर ऐसा है कि सबको लगता है कि बस मेरी ही कहानी बोली जा रही है. कामियाबी पाना इतना आसान नहीं है, फिर भी जब हम किसी कामियाब इंसान को देखते हैं तो बड़ी आसानी से कहते हैं, कि 'भाई साहब आपके तो मजे हैं, गाडी बंगला सब कुछ है आपके पास', मगर हम ये नहीं जानते हैं कि उन चीजों को हासिल करने के लिए उस शख्स को क्या क्या करना पड़ा होगा....उसी को शायर इस अंदाज़ में कहता है कि "एक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ, मुफलिस का दिया हूँ मगर आंधी से लड़ा हूँ...". इस ग़ज़ल का हर शेर लाजावाब तो है ही, मगर जो मक्ता है उसका क्या कहना...बड़ी सीधी भाषा में शायर कहता है कि "दुनिया से निराली है 'नजीर' अपनी कहानी, अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ...", उम्मीद करता हूँ कि आप सब को ये पेशकश पसंद आएगी...."



रफ़ीक़ शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।

Gazhal - Ek Raat Men...
Vocal - Rafique Sheikh
Music - Rafique Sheikh
Lyrics - Nazeer Banarasi


Song # 01, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

इस गीत का प्लेयर फेसबुक/ऑरकुट/ब्लॉग/वेबसाइट पर लगाइए

Monday, February 22, 2010

कविता और संगीत का अनूठा मेल है "काव्यनाद"

ताज़ा सुर ताल ०८/२०१०

सुजॉय- सजीव आज आपके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी है, इसकी वजह...
सजीव- हाँ सुजॉय मैं हिंद युग्म के अपने प्रोडक्ट "काव्यनाद" को विश्व पुस्तक मेले में मिली आपार सफलता और वाह वाही से बहुत खुश हूँ.
सुजॉय- हाँ सजीव मैंने भी यह अल्बम सुनी, और सच कहूँ तो ये मेरी अपेक्षाओं से कहीं बेहतर निकली, इतनी पुरानी कविताओं पर इतनी मधुर धुनें बन सकती है, यकीं नहीं होता.
सजीव- बिलकुल सुजॉय, ये इतना आसान हरगिज़ नहीं था, पर जैसा कि मैंने हमेश विश्वास जताया है युग्म के सभी संगीतकार बेहद प्रतिभाशाली हैं, ये सब कुछ संभव कर सकते हैं.
सुजॉय- तो इसका अर्थ है सजीव कि आज हम इसी अनूठी अल्बम को ताज़ा सुर ताल में पेश करने जा रहे हैं ?

सजीव- जी सुजॉय, काव्यनाद प्रसाद, निराला, दिनकर, महादेवी, पन्त, और गुप्त जैसे हिंदी के प्रतीक कवियों की ६ कविताओं का संगीतबद्ध संकलन है, ६ कविताओं को संगीत के अलग अलग अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है, कुल १४ गीत हैं, और सबसे अच्छी बात ये हैं कि सभी एक दूसरे से बेहद अलग ध्वनि देते हैं.
सुजॉय- सबसे पहले मैं इसमें से उस गीत को सुनवाना चाहूँगा जो मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद आया, धर्मेन्द्र कुमार सिंह की आवाज़ में पन्त की ये रचना बेहद मधुर बन पड़ी है. इसका रेट्रो फील मुझे बहुत भाया.
सजीव- धर्मेन्द्र हिंदी भोजपुरी के एक युवा गायक हैं, जिनमें बहुत संभावना नज़र आती है, संगीत संयोजन अखिलेश कुमार का है, सुनते हैं ये गीत

प्रथम रश्मि का आना (धर्मेन्द्र कुमार), पारंपरिक संस्करण....pratham reshmi (kavyanaad)


सुजॉय -बहुत खूब था ये गीत. धमेन्द्र की आवाज़ में मुकेश की गायिकी झलकती है कहीं न कहीं...
सजीव -हाँ, चलिए अब सुनते हैं जय शंकर प्रसाद की एक देशभक्ति रचना...
सुजॉय- इसे स्वप्न मंजूषा शैल ने भी बहुत अच्छा गाया है, पर आप शायद युवा गायक कृष्ण राज कुमार का संस्करण सुनवाने जा रहे हैं...ठीक ?
सजीव - हाँ, दरअसल कृष्ण एक ऐसे संगीतकार/गायक हैं जिनका दूसरे सत्र में योगदान मात्र एक गीत का था, कोई भी उनसे बहुत उम्मीद नहीं कर रहा था. पर देखिये न सिर्फ उन्होंने हर बार हिस्सा लिया, वो लगभग हर बार कोई न कोई सम्मान भी जीतते चले गए.
सुजॉय- सजीव काव्यनाद के बनने की कहानी भी ज़रा संक्षिप्त में हमारे श्रोताओं को बताईये.
सजीव- हाँ जरूर, दरअसल "पहला सुर" जो युग्म के संगीत का पहला प्रोडक्ट था के माध्यम से हमारे पास नए उभरते हुए कलाकारों का एक अच्छा ख़ासा पूल जमा हो गया था. युग्म से लंबे समय से जुड़े, रेडियो सलाम नमस्ते के उद्‍घोषक, कवि, वैज्ञानिक और हिन्दीकर्मी आदित्य प्रकाश ने इस बेमिसाल सुझाव को सामने रखा. शुरू में हम झिझक रहे थे कि कैसे हमारे नयी सदी के संगीतकार इन क्लास्सिक रचनाओं के साथ न्याय कर पायेंगें, इसलिए प्रतियोगिता का स्वरूप अपनाया, ताकि अधिक से अधिक प्रतिभागी हिस्सा लेने के लिए प्रेरित हों. इन विजेताओं को पुरस्कार दिए गए उस राशि को भी आदित्य प्रकाश जी, शेर बहादुर सिंह जी, डॉ॰ ज्ञान प्रकाश सिंह जी, अशोक कुमार जी, डॉ॰ कमल किशोर सिंह, दीपक चौरसिया 'मशाल', डॉ॰ शिरीष यकुन्डी, डॉ॰ प्रशांत कोले, डॉ॰ रघुराज प्रताप सिंह ठाकुर और शैलेश त्रिपाठी ने प्रायोजित किया.
सुजॉय- सजीव बातें बहुत से लोग कर लेते हैं, पर वास्तव में कुछ करना क्या होता है ये आदित्य जी और उनकी टीम ने सिखाया है, भाषा के इन सच्चे सपूतों को सलाम करते हुए सुनते हैं, ये गीत

गीत - अरुण ये मधुमय देश हमारा (कृष्ण राजकुमार) arun ye madhumay desh (kavyanaad)


सजीव- जो तुम आ जाते एक बार....
सुजॉय- किसकी बात कर रहे हो सजीव.
सजीव- महादेवी जी की इस अनमोल रचना के बारे में कुछ कहने को मेरे पास शब्द नहीं हैं...
सुजॉय- पर मेरे पास एक युवा गायिका, कुहू गुप्ता के बारे में कहने को बहुत कुछ है...पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 5 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं।
सजीव- हिंद युग्म पर आई सबसे सुरीली आवाजों में है कुहू गुप्ता की आवाज़. और देखिये तो ज़रा इस गीत में उन्होंने कितने खूबसूरत रंग भर दिए हैं. वैसे इस गीत के संगीतकार श्रीनिवास के बारे में भी थोडा सा बताना चाहूँगा. मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं।
सुजॉय- अब सुन लिया जाए ये गीत

गीत - जो तुम आ जाते एक बार (कुहू/श्रीनिवास) jo tum aa jaate ek baar (kavyanaad)


सजीव- कुहू की तरह ही एक और उभरते हुए गायक के साथ टीम बनायीं है श्रीनिवास ने अगले गीत के लिए.
सुजॉय- हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र में इनके 5 गीत (जीत के गीत, मेरे सरकार, ओ साहिबा, रूबरू और वन अर्थ-हमारी एक सभ्यता) ज़ारी हो चुके हैं। ओडिसा की मिट्टी में जन्मे बिस्वजीत शौकिया तौर पर गाने में दिलचस्पी रखते हैं। वर्तमान में लंदन (यूके) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कर रहे हैं। इनका एक और गीत जो माँ को समर्पित है, उसे हमने विश्व माँ दिवस पर रीलिज किया था।
सजीव- हाँ सुजॉय बिस्वजीत की आवाज़ के बहुत से प्रशंसक हैं पहले ही, तो बिना अधिक कुछ कहे सुन लेते हैं ते गीत

गीत - स्नेह निर्झर (बिस्वजीत/श्रीनिवास)...sneh nirjhar (kavyanaad)


सजीव- सुजॉय यहाँ मैं आदित्य जी एक और साथी और काव्यनाद के एक और प्रायोजक का जिक्र करना चाहूँगा. ये हैं डॉ॰ ज्ञान प्रकाश सिंह, जो पिछले 30 वर्षों से मानचेस्टर, यूके में प्रवास कर रहे हैं। कवि हृदयी, कविता-मर्मज्ञ और साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले- ये सभी इनके विशेषण हैं।
सुजॉय- जी बिकुल तभी तो इन्होने आगे बढ़ कर इस बड़े आयोजन में अपना योगदान दिया. इनके अलावा रिवरहेड, न्यूयार्क के कमल किशोर सिंह जी भी हैं जो पेशे से डॉक्टर हैं। हिन्दी तथा भोजपुरी में कविताएँ लिखते हैं। इन्होने गीतकास्ट प्रतियोगिता में हिस्सा भी लिया है हर बार. जीते तो नहीं पर फिर भी आयोजन की एक कड़ी को प्रायोजित कर स्पोर्ट्स मेन् शिप दिखाई और साहित्य सेवा में अपना समर्पण भी.
सजीव- राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता "कलम आज उनकी जय बोल" को स्वरबद्ध करना निश्चित ही आसान नहीं रहा होगा, पर एक बार हमारे संगीतकारों ने अपना लोहा मनवाया.
सुजॉय- इस गीत में एक और नयी आवाज़ सुनाई पड़ती है -प्रदीप सोम सुन्दरन की. जो लोग टीवी पर म्यूजिकल शो देखने के शौक़ीन हैं, उन्होंने भारतीय टेलीविजन पर पहले सांगैतिक आयोजन 'मेरी आवाज़ सुनो' को ज़रूर देखा होगा। प्रदीप सोमसुंदरन को इसी कार्यक्रम में सन 1996 में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक चुना गया था और लता मंगेशकर सम्मान से सम्मानित किया गया था।
सजीव- प्रदीप कनार्टक शास्त्रीय गायन के अतिरिक्त हिन्दी, मलयालम, तमिल, तेलगू, अंग्रेज़ी और जापानी आदि भाषाओं में ग़ज़लें और भजन गाते हैं। इन्होंने कई मलयालम फिल्मी गीतों में अपनी आवाज़ दी है। इस गीत में आप हिंद युग्मी निखिल आनंद गिरी की भी आवाज़ सुन सकते हैं.

गीत - कलम आज उनकी जय बोल (निखिल/प्रदीप/श्रीनिवास)... kalam aaj unki jai bol (kavyanaad)


सुजॉय- अब बारी आज के अंतिम गीत की. एक चिर प्रेरणा है इस गीत में, यूं तो इस गीत के भी सभी संस्करण बहुत खूब हैं, पर इस गीत के बहाने कुछ चर्चा कर लें रफीक शेख की भी, इन्हें तो आवाज़ के दूसरे सत्र में सर्वश्रेष्ठ गीत का पुरस्कार भी मिला है न ?
सजीव- जी सुजॉय, रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया।
सुजॉय- वाह, चलिए रफ़ीक भाई को सुनते हैं मगर उससे पहले दीपक मशाल और उनके साथियों का भी जिक्र कर दें जिन्होंने उस आयोजन को मुक्कमल करने में विद्यार्थी होने के बावजूद योगदान दिया.
सजीव- बिलकुल सुजॉय, अगर चाहत हो मन में तो सब कुछ संभव है....यही सीख है गुप्त जी की एक कविता में भी, सुनिए

गीत - नर हो न निराश करो (रफीक शेख) nar ho na niraash karo (kavyanaad)


"काव्यनाद" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
काव्यनाद एक अनूठी पहल है, बहुत कुछ नया है और प्रयोगात्मक भी. आज की पीढ़ी को लगभग १०० वर्ष पहले लिखी कविताओं को इस रूप में पेश करने का प्रयास सराहनीय है, पर अभी प्रस्तुति के मामले में सुधार की गुन्जायिश है, हिंद युग्म ने अपने पहले प्रोडक्ट से बेहतर काम दिखाया है इस बार, उम्मीद करेंगें कि आने वाले प्रोडक्ट्स और बेहतर साबित होंगें.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # २२- काव्यनाद के विमोचन के साथ साथ हिंद युग्म आवाज़ ने एक और अनूठी एल्बम को भी उतरा है, बीते पुस्तक मेले में इसकी भी खूब चर्चा रही, इस अल्बम का नाम बताएं.
TST ट्रिविया # २३ लन्दन ड्रीम्स में एक मशहूर गीत गाने वाले गायक की आवाज़ भी है "काव्यनाद" में, कौन हैं ये गायक ?
TST ट्रिविया # २४ एल्बम "काव्यनाद" का विमोचन किसी मशहूर हस्ती के हाथों हुआ


TST ट्रिविया में अब तक -
अनुराग जी दो सही जवाब मिले आपके और ४ अंकों से खाता खुला है आपका...बधाई

Tuesday, December 15, 2009

इस बार नर हो न निराश करो मन को संगीतबद्ध हुआ

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-6: नर हो न निराश करो मन को

आज हम हाज़िर हैं 6वीं गीतकास्ट प्रतियोगिता के परिणामों को लेकर और साथ में है एक खुशख़बरी। हिन्द-युग्म अब तक इस प्रतियोगिता के माध्यम से जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर और मैथिलीशरण गुप्त की एक-एक कविता संगीतबद्ध करा चुका है। इस प्रतियोगिता के आयोजित करने में हमें पूरी तरह से मदद मिली है अप्रवासी हिन्दी प्रेमियों की। खुशख़बरी यह कि ऐसे ही अप्रवासी हिन्दी प्रेमियों की मदद से हम इन 6 कविताओं की बेहतर रिकॉर्डिंगों को ऑडियो एल्बम की शक्ल दे रहे हैं और उसे लेकर आ रहे हैं 30 जनवरी 2010 से 7 फरवरी 2010 के मध्य नई दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाले 19वें विश्व पुस्तक मेला में। इस माध्यम से हम इस कवियों की अमर कविताओं को कई लाख लोगों तक पहुँचा ही पायेंगे साथ ही साथ नव गायकों और संगीतकारों को भी एक वैश्विक मंच दे पायेंगे।

6वीं गीतकास्ट प्रतियोगिता में हमने मैथिली शरण गुप्त की प्रतिनिधि कविता 'नर हो न निराश करो मन को' को संगीतबद्ध करने की प्रतियोगिता रखी थी। इसमें हमें कुल 9 प्रविष्टियाँ प्राप्त हुई। लेकिन इस बार हमारे निर्णायकों ने अलग-अलग प्रविष्टियों पर अपनी मुहर लगाई। तो निश्चित रूप से नियंत्रक के लिए मुश्किल होनी थी। अतः हमने तीन प्रविष्टियों को संयुक्त रूप से विजेता घोषित करने का निश्चय है। आइए मिलते हैं विजेताओं से और उनके हुनर से भी।


कृष्ण राज कुमार

कृष्ण राज कुमार ने इस प्रतियोगिता की हर कड़ी में भाग लिया है। जयशंकर प्रसाद की कविता 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' के लिए प्रथम पुरस्कार, सुमित्रा नंदन पंत की कविता 'प्रथम रश्मि' के लिए द्वितीय पुरस्कार, महादेवी वर्मा के लिए भी प्रथम पुरस्कार। निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' के लिए भी इनकी प्रविष्टि उल्लेखनीय थी। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कलम! आज उनकी जय बोल' के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। और इस बार भी इन्होंने पहला स्थान बनाया है। कृष्ण राज कुमार जो मात्र 22 वर्ष के हैं, और जिन्होंने अभी-अभी अपने B.Tech की पढ़ाई पूरी की है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक गायन की दीक्षा ले रहे हैं। इन्होंने हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र के संगीतबद्धों गीतों में से एक गीत 'राहतें सारी' को संगीतबद्ध भी किया है। ये कोच्चि (केरल) के रहने वाले हैं। जब ये दसवीं में पढ़ रहे थे तभी से इनमें संगीतबद्ध करने का शौक जगा।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 2000 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-




रफ़ीक़ शेख़

रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। गीतकास्ट प्रतियोगिता में ही रफ़ीक़ शेख़ ने निराला की कविता 'स्नेह निर्झर बह गया है' को संगीतबद्ध करके दूसरा स्थान बनाया था।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 2000 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-


(संगीत संयोजन, मिक्सिंग और और रिकॉर्डिंग- अनिमेश श्रीवास्तव)



श्रीनिवास / शम्पक चक्रवर्ती

श्रीनिवास

शम्पक
संगीतकार श्रीनिवास पांडा बहुत ही मेहनती संगीतकार हैं। हर बार किसी नये गायक को अपने कम्पोजिशन से जोड़ते हैं और उसे एक बड़ा मंच देते हैं। इस बार भी इन्होंने शम्पक चक्रवर्ती नामक युवा गायक को हिन्द-युग्म से जोड़ा है। शम्पक कोलकाता से ताल्लुक रखते हैं। 24 वर्षीय शम्पक के संगीत का शौक रखते हैं। बचपन से ही गा रहे हैं और मानते हैं कि यह कला उन्हें ईश्वरीय वरदान के रूप में मिली है।

मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं। गीतकास्ट में लगातार चार बार विजेता रह चुके हैं।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 2000 का नग़द पुरस्कार

गीत सुनें-


इनके अतिरिक्त हम प्रतीक खरे, प्रो॰ (डॉ॰) एन॰ पाण्डेय, मधुबाला श्रीवास्तव, शरद तैलंग, सुषमा श्रीवास्तव, ब्रजेश दाधीच इत्यादि के भी आभारी है, जिन्होंने इसमें भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन किया और इस प्रतियोगिता को सफल बनाया। हमारा मानना है कि यदि आप इन महाकवियों की कविताओं को यथाशक्ति गाते हैं, पढ़ते हैं या संगीतबद्ध करते हैं तो आपका यह छोटा प्रयास एक सच्ची श्रद्धाँजलि बन जाता है और एक महाप्रयास के द्वार खोलता है।


इस कड़ी के प्रायोजक आयरलैंड के क्विन्स विश्वविद्यालय के शोधछात्र दीपक मशाल और उनके कुछ साथी हैं। यह हिन्द-युग्म का सौभाग्य है कि इस प्रतियोगिता के आयोजन में ऐसे ही हिन्दी प्रेमियों की वजह से इस प्रतियोगिता के आयोजन में कभी कोई बाधा नहीं आई।

Monday, August 10, 2009

स्नेह निर्झर बह गया है कुछ यूँ संगीतबद्ध हुआ

गीतकास्ट प्रतियोगिता- परिणाम-3: स्नेह-निर्झर बह गया है

देखते-देखते आज वह समय भी आ गया, जब हम गीतकास्ट प्रतियोगिता के तीसरे अंक के परिणाम प्रकाशीत व प्रसारित कर रहे हैं। मई महीने में शुरू हुई इस प्रतियोगिता का एक मात्र उद्देश्य यही था कि हिन्दी कविता के प्रतिमानों या यूँ कह लें आधार-स्तम्भों को संगीत से जोड़ा जाये ताकि नई पीड़ी भी उन्हें गुनगुना सके और अपने मन के आँगन में एक स्थान दे सके। इस प्रतियोगिता की शुरूआती दो कड़ियाँ 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' और 'प्रथम रश्मि' बहुत सफल रहीं। श्रोताओं ने बहुत पसंद किया। प्रतिभागिता बढ़ी। उसी का फल है कि तीसरे अंक में जब हमने निराला की एक मुश्किल कविता 'स्नेह-निर्झर बह गया है' चुना तो भी इसमें 18 प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं। हमने तीसरे अंक के लिए प्रविष्टि जमा करने की आखिरी तिथि रखी थी 31 जुलाई 2009। 30 जुलाई तक हमें मात्र 1 प्रविष्टि मिली थी, लेकिन 31 तारीख को यह बढ़कर 18 हो गईं।

कविता मुश्किल तो थी ही, लेकिन हम पिछले 3 अंकों से एक और परेशानी का सामना कर रहे हैं, वह यह कि अलग-अलग प्रकाशन की पुस्तक में कविता की पंक्तियों का अलग-अलग होना। 'स्नेह-निर्झर बह गया है' गीत के दूसरे अंतरे में लोकभारती प्रकाशन, इलहाबाद द्वारा प्रकाशित और रामविलास शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक 'राग-विराग' में शब्द है 'प्रतिभा', तो वहीं वाणी प्रकाशन, दिल्ली से छपी 'निराला संचयिता' में शब्द है 'प्रभा'। गायन में भी उच्चारण की गलतियाँ हुईं, वह शायद इसलिए क्योंकि संस्कृठनिष्ठ शब्दों को सुर पर बिठाना ख़ासा मुश्किल काम है।

फिर भी पाँच जजों ने गीत में गायकी, संगीत, संगीत संयोजन, उच्चारण और प्रस्तुतिकरण जैसे मापदंडों पर इन्हें परखकर सभी के सकारात्मक पक्ष को सराहा। इस बार निर्णायकों में सजीव सारथी, अनुराग शर्मा, यूनुस खान, आदित्य प्रकाश और शैलेश भारतवासी सम्मिलित थे। इनके द्वारा दी गई प्रतिक्रियाओं के आधार पर श्रीनिवास पांडा द्वारा संगीतबद्ध और बिस्वजीत नंदा द्वारा गाई हुई प्रविष्टि प्रथम स्थान पर रखी गई है। यद्यपि गायक ने उच्चारण की कई गलतियाँ की हैं, फिर भी संगीत इतना अनुकूल है कि मन को मोह लेता है।


बिस्वजीत/श्रीनिवास

श्रीनिवास
बिस्वजीत
बिस्वजीत युग्म पर पिछले 1 साल से सक्रिय हैं। हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र में इनके 5 गीत (जीत के गीत, मेरे सरकार, ओ साहिबा, रूबरू और वन अर्थ-हमारी एक सभ्यता) ज़ारी हो चुके हैं। ओडिसा की मिट्टी में जन्मे बिस्वजीत शौकिया तौर पर गाने में दिलचस्पी रखते हैं। वर्तमान में लंदन (यूके) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कर रहे हैं। इनका एक और गीत जो माँ को समर्पित है, उसे हमने विश्व माँ दिवस पर रीलिज किया था।

श्रीनिवास हिन्द-युग्म के लिए बिलकुल नये संगीतकार हैं, आज हम इनकी पहली प्रस्तुति जारी कर रहे हैं। मूलरूप से तेलगू और उड़िया गीतों में संगीत देने वाले श्रीनिवास पांडा का एक उड़िया एल्बम 'नुआ पीढ़ी' रीलिज हो चुका है। इन दिनों हैदराबाद में हैं और अमेरिकन बैंक में कार्यरत हैं।

पुरस्कार- प्रथम पुरस्कार, रु 2000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-
64kbps

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दूसरे स्थान के विजेता भी एक दिग्गज हैं।


रफ़ीक़ शेख

रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था।

पुरस्कार- द्वितीय पुरस्कार, रु 1000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-

64kbps

128kbps



तीसरे स्थान के विजेता बॉलीवुड के गायक हैं।


अभिजीत घोषाल

अभिजीत घोषाल बॉलीवुड के उभरते हुए गायक हैं। अभिजीत को सारेगामा में लगातार 11 बार जीतने का और स्वेच्छा से पुरस्कार छोड़ देने का श्रेय प्राप्त हैं। इलाहाबाद से पढ़े-लिखे, पले-बढ़े अभिजीत स्कूल के दिनों में पढ़ने में चेम्पियन थे, बैंक में मैनेजरी भी की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की जैव विज्ञान शाखा के गोल्ड-मेडलिस्ट रहे। इनकी माँ को केंसर हो जाने के बाद ये इलाज हेतु उन्हें लेकर मुम्बई आ गये और मायानगरी के होकर रह गये। अभी हाल में इनका एक गीत 'झूमो रे झूमो' रीलिज हुआ जो फिल्म 'किसान' का हिस्सा है और डब्बू मल्लिक ने संगीत दिया है। गायक पं॰ अजॉय चक्रवर्ती से बहुत अधिक प्रभावित अभिजीत को मन्ना डे, मो॰ रफी, हरिहरन, सोनू निगम इत्यादि की गायन शैली पसंद है। अभिजीत को वियेना, ऑस्ट्रिया में हुए फेल्ड्करिच इंटरनेशनल संगीत महोत्वसव में दुनिया भर के संगीतकारों के साथ अपना हुनर दिखाने का मौका मिल चुका है। अभिजीत जिंगल-निर्माण से भी जुड़े रहे हैं, जैसे- 'गरमी अलविदा' (शाहरुख खान-नवरत्न ठंडा कूल-कूल), लुइज़ बैंक्स द्वारा संगीतबद्ध मध्य प्रदेश स्वर्ण जयंती वर्ष में, शान्तनु मोएत्रा द्वारा संगीतबद्ध बांग्लादेश के एकटेल मोबाइल के लिए और कैड्बरीज के लिए इत्यादि। इनके कुछ सोलो एल्बम भी आ चुके हैं; एचएमबी द्वारा प्रदर्शित बांग्ला-एल्बम 'ई प्रोथोम अभिजीत' , म्यूजिक टुडे द्वारा प्रदर्शित 'नीमराना'। प्रस्तुत प्रस्तुति में इनकी आवाज़ मन मोहने में कोई कसर नहीं छोड़ती।

पुरस्कार- तृतीय पुरस्कार, रु 1000 का नग़द पुरस्कार

विशेष- डैलास, अमेरिका के एफएम चैनल रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम में आदित्य प्रकाश से इस गीत पर सीधी बात।
गीत सुनें-

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इन तीनों के अतिरिक्त भी अन्य 4 प्रविष्टियों ने हमारे जजों का ख़ास ध्यान खींचा। एक जज को पारुल ही प्रविष्टि सर्वश्रेषठ लगी तो वहीं एक को कृष्ण राज कुमार की। रुपेश ऋषि के आवाज़ की तारीफ़ लगभग सभी निर्णायकों ने की। गिरीजेश कुमार से कम ही जज इस बार संतुष्ट दिखे क्योंकि उनकी पिछली प्रस्तुति के बाद उनसे उम्मीदें बढ़ गई थीं।


पारुल पुखराज


रुपेश ऋषि


कृष्ण राज कुमार


गिरीजेश कुमार



इनके अतिरिक्त हम कमल किशोर सिंह, रमेश धुस्सा, मनोहर लेले, देवेन्द्र अरोरा, शरद तैलंग, तरुण कुमार, आशुतोष-अभिषेक, नील श्रीवास्तव, अम्बरीष श्रीवास्तव, कवि मुक्तेश्वर बख्श श्रीवास्तव, अभिनव वाजपेयी इत्यादि के भी आभारी है, जिन्होंने इसमें भाग लेकर हमारा प्रोत्साहन किया और इस प्रतियोगिता को सफल बनाया। हमारा मानना है कि यदि आप इन महाकवियों की कविताओं को यथाशक्ति गाते हैं, पढ़ते हैं या संगीतबद्ध करते हैं तो आपका यह छोटा प्रयास एक सच्ची श्रद्धाँजलि बन जाता है और एक महाप्रयास के द्वार खोलता है। हम निवेदन करेंगे कि आप इसी ऊर्जा के साथ गीतकास्ट के अन्य अंक में भी भाग लेते रहें।


इस कड़ी के प्रायोजक हैं डॉ॰ ज्ञान प्रकाश सिंह, जो पिछले 30 वर्षों से मानचेस्टर, यूके में प्रवास कर रहे हैं। कवि हृदयी, कविता-मर्मज्ञ और साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले- ये सभी इनके विशेषण हैं। यदि आप भी इस आयोजन को स्पॉनसर करता चाहते हैं तो hindyugm@gmail.com पर सम्पर्क करें।

Tuesday, March 10, 2009

"तुझमें रब दिखता है..." रफीक ने दिया इस गीत को एक नया रंग

युग्म पर लोकप्रिय गीतों का चुनाव जारी है, कृपया इसे अचार संहिता का उल्लंघन न मानें. :) रफीक शेख दूसरे सत्र के गायकों में सबसे अधिक उभरकर सामने आये. अपनी तीन शानदार ग़ज़लों में उन्होंने गजब की धूम मचाई. हालांकि कभी कभार उन पर रफी साहब के अंदाज़ के नक़ल का भी आरोप लगा, पर रफीक, रफी साहब के मुरीद होकर भी अपनी खुद की अदायगी में अधिक यकीन रखते हैं. आप श्रोताओं ने अभी तक उनके ग़ज़ल गायन का आनंद लिया है, पर हम आपको बताते हैं कि रफीक हर तरफ गीतों को गाने की महारत रखते हैं.

आज हम श्रोताओं को सुनवा रहे हैं रफीक के गाया एक कवर वर्ज़न फिल्म "रब ने बना दी जोड़ी" से. गीत है "तुझ में रब दिखता है यारा मैं क्या करुँ...." मूल गीत को गाया है रूप कुमार राठोड ने. रफीक ने इस गीत से साबित किया है कि उनकी रेंज और आवाज़ से वो हर तरह के गानों में रंग भर सकते हैं. तो सुनते हैं रफीक शेख को एक बार फिर एक नए अंदाज़ में -

Monday, December 29, 2008

मैं पैयम्बर तो नहीं, मेरा कहा कैसे हो

दूसरे सत्र के २७ वें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज

अपनी पहली दो ग़ज़लों से श्रोताओं और समीक्षकों सभी पर अपना जादू चलाने के बाद रफ़ीक़ शेख लौटे हैं अपनी तीसरी और इस सत्र के लिए अपनी अन्तिम प्रस्तुति के साथ. शायर है इस बार मुंबई के दौर सैफी साहब, जिनके खूबसूरत बोलों को अपनी मखमली आवाज़ और संगीत से सजाया है रफ़ीक़ ने. तो दोस्तों आनंद लें हमारी इस नई प्रस्तुति का और हमें अपनी राय से अवश्य अवगत करवायें.

सुनने के लिए नीचे के प्लयेर पर क्लिक करें -





Rafique Sheikh is back again for the last time in this season with his new ghazal, "jo shajhar..." written by a shayar from Mumbai Daur Saifii Sahab, hope you enjoy this presentaion also as most of his ghazals so far has been loved by audiences and critics as well.

to listen, please click on the player below -




Lyrics - ग़ज़ल के बोल -

जो शज़र सूख गया है वो हरा कैसे हो,
मैं पैयम्बर तो नहीं, मेरा कहा कैसे हो.

जिसको जाना ही नही, उसको खुदा क्यों माने,
और जिसे जान चुके हैं वो खुदा कैसे हो,

दूर से देख के मैंने उसे पहचान लिया,
उसने इतना भी नही मुझसे कहा, कैसे हो,

वो भी एक दौर था जब मैंने तुझे चाहा था,
दिल का दरवाज़ा हर वक्त खुला कैसे हो.

SONG # 27, SEASON # 02, "JO SHAJHAR.." OPENED ON 29/12/2008 ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion.

Friday, October 24, 2008

तेरा दीवाना हूँ...मेरा ऐतबार कर...

दूसरे सत्र के सत्रहवें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज -

अपनी पहली ग़ज़ल "सच बोलता है..." गाकर रफ़ीक शेख ने ग़ज़ल गायन में अपनी पकड़ साबित की थी. आज वो लेकर आए हैं एक ताज़ी नज़्म -"आखिरी बार बस...". यह नज़्म रफ़ीक साहब की आवाज़ का एक नया अंदाज़ लिए हुए है, उनकी अब तक की तमाम ग़ज़लों से अलग इस नज़्म की नज़ाकत को उन्होंने बहुत बखूबी से निभाया है.रफ़ीक साहब की एक और खासियत ये है कि वो हमेशा नए शायरों की रचनाओं को अपनी आवाज़ में सजाते हैं. इस तरह वो हमारे मिशन में मददगार ही साबित हो रहे हैं. उनकी पिछली ग़ज़ल के शायर अज़ीम नवाज़ राही भी किसी ऐसे स्थान पर रहते हैं जहाँ इन्टरनेट आदि की सुविधा उपलब्ध नहीं है, यही कारण है कि हमें अब तक उनकी तस्वीर और अन्य जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हो पायी हैं. लेकिन इस बार के रचनाकार मोइन नज़र के विषय में हमारे बहुत से श्रोता पहले से ही परिचित होंगे। मोइन नज़र वही शायर हैं जिनका कलाम 'इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊँगा, अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाऊँगा' गाकर ग़ज़ल गायक गुलाम अली ने दुनिया में अपना परचम फहराया। मोइन नज़र साहब रेलवे में चाकरी करते हैं और फिलहाल मुम्बईवासी हैं। कहते हैं फनकार का काम बोलता है, तो आप भी सुनिए मोईन साहब ने क्या खूब बोल लिखे हैं यहाँ. अपने विचार देकर रफ़ीक शेख और नये शायर मोईन नज़र की हौसलाफजाई अवश्य करें.

नज़्म को सुनने के लिए प्लेयर पर क्लिक करें-



Here comes song no.17 for the season 2. "Akhiri baar bas..." is composed and rendered by Rafique Sheikh, and penned by a new writer Moin Nazar. This sad romantic nazm will surely touch your heart, so hear it and share your thoughts about it. Your valuable comments will help us to improvise.

To listen,please click on the player below -



बोल - Lyrics

आखिरी बार बस, तेरा दीदार कर,
मैं चला जाऊँगा, छोड़कर ये शहर,

अपनी चिलमन से बाहर निकल के ज़रा,
दुनिया वालों से छुप के संभल के ज़रा,
दो कदम आ मेरी सिम्त चल के ज़रा,
बैठ पहलु में मेरे, तू मचल के ज़रा,
तेरा दीवाना हूँ, तेरा दीवाना हूँ,
मेरा ऐतबार कर .....

तेरे जलवे चुरा लूँ, इन निगाहों में आ,
मैं तेरे हुस्न को, भर लूँ बाहों में आ,
साए में ताज के, चांदनी रात में,
दुधिया जिस्म को ले पनाहों में आ,
देख लूँ मैं तुझे, देख लूँ मैं तुझे,
आज भर के नज़र....

फ़िर उसके बाद मुलाकात न होगी शायद,
धड़कते दो दिलों में बात न होगी शायद,
जमीन प्यार की बंज़र मेरे हो जायेगी,
बरसों इन आँखों से बरसात न होगी शायद,
साथ मेरे तू चल, साथ मेरे तू चल,
ये सनम बाम पर...

SONG # 17, SEASON # 02, "AKHIRI BAAR BAS..." OPENED ON 24/10/2008 ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion

Tuesday, September 30, 2008

मिलिए ग़ज़ल गायकी की नई मिसाल रफ़ीक़ शेख से

कर्नाटक के बेलगाम जिले में जन्मे रफ़ीक़ शेख ने मरहूम मोहम्मद हुसैन खान (पुणे)की शागिर्दी में शास्त्रीय गायन सीखा तत्पश्चात दिल्ली आए पंडित जय दयाल के शिष्य बनें. मखमली आवाज़ के मालिक रफ़ीक़ के संगीत सफर की शुरुवात कन्नड़ फिल्मों में गायन के साथ हुई, पर उर्दू भाषा से लगाव और ग़ज़ल गायकी के शौक ने मुंबई पहुँचा दिया जहाँ बतौर बैंक मैनेजर काम करते हुए रफ़ीक़ को सानिध्य मिला गीतकार /शायर असद भोपाली का जिन्होंने उन्हें उर्दू की बारीकियों से वाकिफ करवाया. संगीत और शायरी का जनून ऐसा छाया कि नौकरी छोड़ रफ़ीक़ ने संगीत को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया.

आज रफ़ीक़ पूरे भारत में अपने शो कर चुके हैं. वो जहाँ भी गए सुनने वालों ने उन्हें सर आँखों पर बिठाया. २००४ में औरंगाबाद में हुए अखिल भारतीय मराठी ग़ज़ल कांफ्रेंस में उन्होंने अपनी मराठी ग़ज़लों से समां बाँध दिया, भाषा चाहे कन्नड़ हो, हिन्दी, मराठी या उर्दू रफ़ीक़ जानते हैं शायरी /कविता का मर्म और अपनी आवाज़ के ढाल कर उसे इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि सुनने वालों पर जादू सा चल जाता है, महान शायर अहमद फ़राज़ को दी गई अपनी दो श्रद्धांजली स्वरुप ग़ज़लों को सुनने के बाद आवाज़ के श्रोताओं ने भी इस बात को महसूस किया. हिंद युग्म पर मिली इस सफलता ने रफ़ीक़ को प्रेरित किया कि हिन्दी/उर्दू ग़ज़लों के एक एल्बम पर काम शुरू करें.


आल इंडिया रेडियो द्वारा सत्यापित कलाकार रफ़ीक़ चंदन टी वी और डी डी ०१ पर लाइव परफॉर्मेंस दे चुके हैं.अब तक उनकी एक मराठी एल्बम 'पाउस पहिला" और एक कन्नड़ एल्बम "नेने" बाज़ार में धूम मचा चुकी है. लता मंगेशकर और आशा भोंसले जैसे दिग्गजों के साथ गाने का इन्हे मौका मिला है जिसे रफ़ीक़ अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं.

हिंद युग्म से जुड़ कर रफ़ीक़ बेहद खुश हैं, उन्हें विश्वास है युग्म के साथ उन्हें अपने पहले उर्दू ग़ज़ल एल्बम के सपने को साकार करने में मददगार साबित होगा. बीते शुक्रवार आवाज़ पर ओपन हुई उनकी ग़ज़ल "सच बोलता है" बेहद सराही गई. युग्म परिवार इस बेहद प्रतिभाशाली और संगीत के प्रति समर्पित कलाकार को अपनी समस्त शुभकामनायें दे रहा है. रफ़ीक़ जल्दी ही कमियाबी की नई मंजिलें पायें, इसी कामना के साथ आईये एक बार फ़िर सुनें उनकी बारीक, सुरीली और सधी हुई आवाज़ में उन्ही के द्वारा स्वरबद्ध ये शानदार ग़ज़ल.

(सुनने के लिए नीचे के पोस्टर पर क्लिक करें. इस नए उभरते कलाकार को अपना प्रोत्साहन अवश्य दें)




आप भी इसका इस्तेमाल करें

देखिये रफ़ीक़ शेख का सफर इन चित्रों में -
(आशा जी के साथ रफ़ीक़)


(बप्पी लहरी के साथ)


(संगीतकार राम लक्ष्मण के साथ)


(और ये हैं आज के रफ़ीक़)

Friday, September 26, 2008

सच बोलता है मुंह पर, चाहे लगे बुरा सा

दूसरे सत्र के तेरहवें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज.

नए गीतों को प्रस्तुत करने के इस चलन में अब तक ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई कलाकार अपने पहले गीत के ओपन होने से पहले ही एक जाना माना नाम बन जाए कुछ इस कदर कि आवाज़ के स्थायी श्रोताओं को लगातार ये जानने की इच्छा रही कि अपने संगीत और आवाज़ से उन पर जादू करने वाले रफ़ीक शेख का गीत कब आ रहा है. तो दोस्तों आज इंतज़ार खत्म हुआ. आ गए हैं रफ़ीक शेख अपनी पहली प्रवष्टि के साथ आवाज़ के इस महा आयोजन में. साथ में लाये हैं एक नए ग़ज़लकार अजीम नवाज़ राही को, रिकॉर्डिंग आदि में मदद रहा अविनाश जी का जो रफ़ीक जी के मित्र हैं. दोस्तों हमें यकीन है रफ़ीक शेख की जादू भरी आवाज़ में इस खूबसूरत ग़ज़ल का जादू आप पर ऐसा चलेगा कि आप कई हफ्तों, महीनों तक इसे गुनगुनाने पर मजबूर हो जायेंगे. तो मुलाहजा फरमायें युग्म की नयी पेशकश,ये ताज़ा तरीन ग़ज़ल - " सच बोलता है ....."

ग़ज़ल को सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें -





After creating a lot of buzz by his rendition of Ahmed Faraz sahab's ghazals (as a musical tribute to the legend) singer/composer Rafique Sheikh, of Pune, Maharashtra is here with his first entry for this season. This ghazal "sach bolta hai" is penned by another new comer of this awaaz team Azeem Nawaaz Rahi, recording help has been done by another online friend of Rafique, Avinaash. So guys, just enjoy this beautiful ghazal today and please don't forget to spare a moment to give your valuable comments.

To listen to the ghazal, please click on the player below-




ग़ज़ल के बोल -

सच बोलता है मुंह पर, चाहे लगे बुरा सा,
किरदार उसका हमको लगता है आईना सा.

कहने को चंद लम्हें था साथ वो सफर में,
यूँ लग रहा था जैसे बरसों का है शनासा.

कलियाँ अगर न होती लफ्जों की मुट्ठियों में,
होता न जिंदगी का चेहरा कभी नया सा.

"राही" मुझे तसल्ली देते हैं मेरे आंसू,
जी हो गया है हल्का रोया जो मैं जरा सा.

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)




VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis



SONG # 13, SEASON # 02, "SACH BOLTA HAI..." OPENED ON AWAAZ HIND YUGM 26/09/2008.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion


ब्लॉग/वेबसाइट/ऑरकुट स्क्रैपबुक/माईस्पैस/फेसबुक में 'खुशमिज़ाज मिट्टी' का पोस्टर लगाकर नये कलाकारों को प्रोत्साहित कीजिए

Tuesday, September 23, 2008

जिंदगी से यही गिला है मुझे...

भारी फरमाईश पर एक बार फ़िर रफ़ीक शेख़ लेकर आए हैं अहमद फ़राज़ साहब का कलाम

पिछले सप्ताह हमने सदी के महान शायर अहमद फ़राज़ साहब को एक संगीतमय श्रद्धाजंली दी,जब हमारे संगीतकार मित्र रफ़ीक शेख उनकी एक ग़ज़ल को स्वरबद्ध कर अपनी आवाज़ में पेश किया. इस ग़ज़ल को मिली आपार सफलता और हमें प्राप्त हुए ढ़ेरों मेल और स्क्रैप में की गयी फरमाईशों से प्रेरित होकर रफीक़ शेख ने फ़राज़ साहब की एक और शानदार ग़ज़ल को अपनी आवाज़ में गाकर हमें भेजा है. हमें यकीन है है उनका ये प्रयास उनके पिछले प्रयास से भी अधिक हमारे श्रोताओं को पसंद आएगा. अपनी बेशकीमती टिप्पणियों से इस नवोदित ग़ज़ल गायक को अपना प्रोत्साहन दें.



ग़ज़ल - जिंदगी से यही...
ग़ज़लकार - अहमद फ़राज़.
संगीत और गायन - रफ़ीक शेख




ghazal - zindagi se yahi gila hai mujhe...
shayar / poet - ahmed faraz
singer and composer - rafique sheikh

जिदगी से यही गिला है मुझे,
तू बहुत देर से मिला है मुझे.

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल,
हार जाने का हौंसला है मुझे.

दिल धड़कता नही, टपकता है,
कल जो ख्वाहिश थी आबला है मुझे.

हमसफ़र चाहिए हुजूम नही,
एक मुसाफिर भी काफिला है मुझे.

ये भी देखें -

फ़राज़ साहब की शायरी का आनंद लें उनकी अपनी आवाज़ में

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