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Saturday, May 21, 2016

"तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी...", दो दोस्तों के इस गीत के बहाने ज़िक्र आनन्द बक्शी और यश चोपड़ा के दोस्ती की


एक गीत सौ कहानियाँ - 82
 

'तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 82-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की मशहूर फ़िल्म ’चाँदनी’ के गीत "तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी..." के बारे में जिसे सुरेश वाडकर और नितिन मुकेश ने गाया था। बोल आनन्द बक्शी के और संगीत शिव-हरि का। 

  
फ़िल्म-संगीत में दोस्ती के गानें 70 के दशक में काफ़ी लोकप्रिय हुए थे। "यारी है इमान मेरा...", "ये दोस्ती
सुरेश वाडकर और नितिन मुकेश
हम नहीं तोड़ेंगे...", "तेरे जैसा यार कहाँ, कहाँ ऐसा याराना...", "बने चाहे दुश्मन ज़माना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा...", "दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं...", "सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी...", "एक रास्ता दो राही..." जैसे गाने अपने ज़माने के मशहूर गीत रहे हैं। 80 के दशक में भी दोस्ती भरे गीतों का सिलसिला जारी रहा। किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश और मन्ना डे ने रिले-रेस का बैटन अगली पीढ़ी के गायकों को सौंप दिया। मोहम्मद अज़ीज़, शब्बीर कुमार, सुरेश वाडकर, नितिन मुकेश, सूदेश भोसले जैसे गायक अब दोस्ती के गीत गाने लगे। "कुछ भी नहीं रहता दुनिया में लोगों रह जाती है दोस्ती" (ख़ुदगर्ज़), "तेरी मेरी यारी दोस्ती हमारी भगवान को पसन्द है अल्लाह को है प्यारी" (दाता), "इमली का बूटा बेरी का पेड़..." (सौदागर) आदि गीत भी ख़ूब चले थे। यश चोपड़ा की 1989 की फ़िल्म ’चाँदनी’ में भी दो दोस्तों पर एक गीत फ़िल्माया गया था, गीत दोस्ती पर तो नहीं था पर दो दोस्त एक दूसरे से अपनी अपनी प्रेम कहानी सुनाने का अनुरोध कर रहे हैं। गीत का महत्व है क्योंकि दोनों एक ही लड़की से प्यार कर रहे हैं पर इस बात से दोनों अनजान हैं। आनन्द बक्शी का लिखा हुआ नितिन मुकेश (ॠषी कपूर) और सुरेश वाडकर (विनोद खन्ना) का गाया यह गीत है "तू मुझे सुना मैं तुझे सुनाऊँ अपनी प्रेम कहानी, कौन है वो, कैसी है वो तेरे सपनों की रानी?" यह आश्चर्य की बात है कि सुरेश वाडकर कभी ॠषी कपूर का स्क्रीन वॉयस हुआ करते थे, इस हिसाब से सुरेश की आवाज़ ॠषी पर सजने चाहिए थे, पर इस गीत में ऐसा नहीं किया गया।


दोस्ती के इस गीत के बहाने आज चर्चा करने जा रहे हैं यश चोपड़ा और आनन्द बक्शी के दोस्ती की। बक्शी
साहिर लुधियानवी और यश चोपड़ा
साहब के पुत्र राकेश बक्शी के एक अंग्रेज़ी में लिखे लेख से इस दोस्ती का ख़ुलासा हुआ था। भले यश जी और बक्शी साहब ने साथ में 1989 में ही पहली बार काम किया ’चाँदनी’ में, पर दोनों एक दूसरे को बहुत पहले से ही जानते थे। अक्सर फ़िल्मी फ़ंक्शन और पार्टियों में दोनों की मुलाक़ातें होती थीं। उस समय दोनों स्थापित हो चुके थे। यश चोपड़ा का परिचय आनन्द बक्शी से एक नए अन्दाज़ में उस दिन हुआ जिस दिन यश जी के गीतकार साहिर लुधियानवी ने उनसे कहा कि कभी आप आनन्द बक्शी से भी गाने लिखवाइए, वो भी अच्छा लिखते हैं! यश साहब को हैरानी हुई कि साहिर साहब उनके चहेते गीतकार होते हुए भी वो बक्शी साहब का नाम सुझा रहे हैं उनकी फ़िल्मों के लिए। यश जी ने कभी उनसे किसी अन्य गीतकार की परामर्श नहीं माँगी थी और वो साहिर साहब के गीतों से बहुत संतुष्ट थे। और तो और बक्शी साहब ने भी कभी भी यश जी से उन्हें अपनी फ़िल्म में गीत लिखने का मौका देने के लिए कभी भी नहीं कहा। शायद बक्शी साहब यह जानते थे कि साहिर साहब यश जी के पसन्दीदा गीतकार हैं और दोस्त भी, और बक्शी साहब इस बात का सम्मान करते थे। यश चोपड़ा के शब्दों में "बक्शी जी एक बहुत नेक इंसान थे और सर्वोपरि गीतकार भी। बहुत अच्छे अच्छे कवि, शायर और गीतकार आए हैं, पर केवल एक फ़िल्मी गीतकार जो एक बेहतरीन शायर भी हैं, वो हैं सिर्फ़ आनन्द बक्शी!"


यश चोपड़ा के शब्दों में, "एक दिन मेरे पास एक गुल्शन राय आए जो मुझसे अपनी फ़िल्म निर्देशित करवाना
आनन्द बक्शी
चाहते थे। उसमें संगीत आर. डी. बर्मन का था। गुल्शन जी या फिर पंचम, मुझे अभी ठीक से याद नहीं, ने मुझे सुझाव दिया कि गाने लिखवाने के लिए आनन्द बक्शी साहब को साइन करवाया जाए। मुझे ख़ुशी हुई और मैं बक्शी साहब से मिल कर उन्हे इस फ़िल्म में गीत लिखवाने का न्योता दे आया। वो राज़ी भी हो गए बिना कोई सवाल पूछे। लेकिन जैसे ही मैं घर लौटा, मुझे अपराध बोध हुआ और साहिर साहब के लिए बुरा लगा। आख़िर साहिर साहब लम्बे समय से मेरे लिए गीत लिखते चले आ रहे थे और वो मेरे पुराने दोस्त भी थे। इसलिए मुझे उनके साथ ही काम करना चाहिए, ऐसा मुझे लगा, बावजूद इसके कि एक बार साहिर साहब ने ही मुझे बक्शी साहब से गीत लिखवाने के बारे में ज़िक्र किया था। मैं निर्णय ले लिया कि मैं बक्शी साहब के पास जाकर माफ़ी माँग लूँगा। शर्मिन्दा चेहरा लिए मैं बक्शी साहब के पास पहुँचा और माफ़ी माँगते हुए पूरी बात बताई। बक्शी साहब इतने अच्छे स्वभाव के थे कि वो ख़ुश होते हुए कहा कि मैं चाहता था कि आप साहिर साहब के साथ ही काम करें। मुझे लगता है कि साहिर साहब ने कभी बक्शी जी को गीत लेखन के बारे में बारीक़ियाँ बताई थी और उन्हें निर्माता-निर्देशकों से मिलवाया था 1956 से 1964 के दौरान जब बक्शी साहब संघर्षरत थे। बक्शी साहब ने आगे यह भी कहा कि भले हम साथ काम ना करें पर इससे हमारी दोस्ती में कोई असर नहीं पड़नी चाहिए, हम दोस्त बने रहेंगे। मैं तो यही कहूँगा कि मैंने आनन्द बक्शी जैसा आदमी अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा। उन्होंने कभी राजनीति नहीं की, कभी किसी के बारे में ख़राब बातें नहीं की, कभी दूसरे गीतकारों की आलोचना नहीं की। वो बस अपना गाना लिखते और चले जाते बिना इधर उधर की बातें किए। उपरवाले ने जब साहिर साहब को हमसे छीन लिया, तभी मैं दोबारा बक्शी साहब के दरवाज़े जा पहुँचा अपनी फ़िल्म में गीत लिखवाने के लिए। उनके साथ ’चाँदनी’ मेरी पहली फ़िल्म थी। और क्या गाने उन्होंने मुझे दिए इस फ़िल्म में! अविस्मरणीय! उन्होंने आगे चलकर मेरे कई फ़िल्मों में गाने लिखे, और मेरे बेटे आदित्य की पहली और दूसरी निर्देशित फ़िल्मों में भी। हमने साथ में ’चाँदनी’ (1989), 'लम्हे’ (1991), 'परम्परा’ (1992), ’डर’ (1993), ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ (1995), 'दिल तो पागल है’ (1997), 'मोहब्बतें’ (2000), और ’मुझसे दोस्ती करोगे!’ (2002) में काम किया। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, September 20, 2014

"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" - क्यों नहीं माने साहिर इस गीत की अवधि को छोटा करने के सुझाव को?


एक गीत सौ कहानियाँ - 41
 

तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 41वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'धूल का फूल' के सदाबहार युगल गीत "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." के बारे में। 

बी.आर.चोपड़ा व यश चोपड़ा

हिन्दी फ़िल्म जगत में कई मशहूर कैम्प रहे हैं, जैसे कि राज कपूर कैम्प, बी.आर. चोपड़ा कैम्प, ॠषीकेश मुखर्जी कैम्प आदि। कैम्प का अर्थ है उन कलाकारों का समूह जो हर फ़िल्म में स्थायी रहे। उदाहरणस्वरूप राज कपूर कैम्प में शंकर-जयकिशन, शैलेन्द्र-हसरत और मुकेश स्थायी सदस्य रहे हैं। वैसे ही बी. आर. चोपड़ा कैम्प में साहिर लुधियानवी, रवि और महेन्द्र कपूर ने लम्बी पारी खेली। बी. आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित दूसरी फ़िल्म 'नया दौर' में साहिर साहब ने गीत तो लिखे पर संगीतकार थे ओ. पी. नय्यर और गाने भी रफ़ी साहब ने गाये। उनकी अगली फ़िल्म 'साधना' में संगीतकार बने एन. दत्ता, गीतकार साहिर ही रहे। तीसरी फ़िल्म 'धूल का फूल' में साहिर और एन. दत्ता के साथ-साथ नवोदित गायक महेन्द्र कपूर की एन्ट्री हुई चोपड़ा कैम्प में। अगली फ़िल्म 'कानून' में कोई गीत नहीं था। और 1964 में फ़िल्म 'गुमराह' से बी. आर. चोपड़ा के स्थायी संगीतकार बने रवि। और इसी फ़िल्म से चोपड़ा कैम्प में रवि, साहिर लुधियानवी और महेन्द्र कपूर की तिकड़ी बनी जिसने एक लम्बे समय तक एक के बाद एक मशहूर नग़मे श्रोताओं को दिये। 'गुमराह', 'वक़्त', 'आदमी और इंसान', 'हमराज़', 'धुन्ध' आदि फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों से सभी अवगत हैं। आज ज़िक्र है 1959 की फ़िल्म 'धूल का फूल' के मशहूर युगल गीत "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." का। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह थी कि यह यश चोपड़ा निर्देशित पहली फ़िल्म थी और अभिनेत्री माला सिन्हा की शुरुआती कामयाब फ़िल्मों में से एक। इस गीत में नायक राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा स्टेज पर यह गीत गा रहे हैं, बल्कि यूँ कहें कि एक सुरीला मुकाबला हो रहा है, सवाल जवाब हो रहे हैं। इस गीत के निर्माण के साथ दो रोचक किस्से जुड़े हुए हैं।

बायें से - यश चोपड़ा, महेन्द्र कपूर, साहिर लुधियानवी, एन. दत्ता
पहला किस्सा है गायक महेन्द्र कपूर से जुड़ा हुआ। हुआ यूँ कि यश चोपड़ा को 'धूल का फूल' निर्देशित करने का मौका उनके बड़े भाई-साहब ने दिया। तो गीतों की रेकॉर्डिंग के लिए स्टुडियो बुक करने के लिए वो उस ज़माने के मशहूर रेकॉर्डिस्ट कौशिक साहब के पास पहुँचे। उसी दिन नवोदित गायक महेन्द्र कपूर ने उसी स्टुडियो में नौशाद के संगीत निर्देशन में 'सोहनी महिवाल' फ़िल्म का एक गीत रेकॉर्ड करवाया था जिसके बोल थे "चाँद छुपा और तारे डूबे..."। फ़िल्म के बाकी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में थे, बस यही गीत महेन्द्र कपूर से गवाया था नौशाद साहब ने क्योंकि महेन्द्र कपूर जिस प्रतियोगिता के विजेता बने थे उसके जज नौशाद साहब थे। पुरस्कारस्वरूप यह मौका उन्होंने दिया था महेन्द्र कपूर को। ख़ैर, तो यश चोपड़ा को कौशिक साहब ने महेन्द्र कपूर का उसी दिन रेकॉर्ड किया हुआ गीत बजा कर सुनवाया और साथ ही यश जी से पूछा कि बताइये ज़रा कि यह गायक कौन हैं? यश चोपड़ा ने कहा कि यह तो रफ़ी साहब की आवाज़ है, और किसकी? कौशिक साहब के यह कहने पर कि इसे रफ़ी साहब ने नहीं बल्कि महेन्द्र कपूर ने गाया है, यश चोपड़ा को यकीन ही नहीं हुआ। पर कौशिक साहब ने जब गीत को बार बार बजाकर सुनवाया तो यश साहब को आवाज़ में थोड़ा फ़र्क महसूस हुआ और मान गये। घर वापस आकर यश चोपड़ा ने बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा को जब यह बात बतायी तो बड़े भाई साहब को भी उत्सुकता हुई इस आवाज़ को सुनने की। यश जी ने उनसे यह भी कहा कि वो चाहते हैं कि 'धूल का फूल' में लता जी के साथ "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ" की जो परिकल्पना बन रही है, उसमें वो महेन्द्र कपूर की आवाज़ लेना चाहते हैं। बी. आर. चोपड़ा मान गये और तब दोनों भाइयों ने मिल कर महेन्द्र कपूर के साथ सम्पर्क स्थापित किया उनके सिनेमाटोग्राफ़र के ज़रिये जिनकी पत्नी महेन्द्र कपूर की माँ की सहेली हुआ करती थीं। टेलीफ़ोन पर न्योता मिलने के बाद महेन्द्र कपूर बी. आर. फ़िल्म्स के दफ़्तर में गये जो उस समय कारदार स्टुडियो के पास हुआ करता था। यश चोपड़ा उन्हें फ़िल्म के संगीतकार दत्ता नाईक, यानी एन. दत्ता के पास ले गये। ख़ूब गाने की रिहर्सल हुई और इस तरह से महेन्द्र कपूर ने पहली बार लता मंगेशकर के साथ युगल गीत गाया। ऐसा सुनने में आया था कि लता जी के साथ गाना है यह जान कर जहाँ एक तरफ़ महेन्द्र कपूर की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था, वहीं दूसरी ओर वो नर्वस भी बहुत हो गये थे लता जी को सामने देख कर। पर लता जी ने जब उन्हें साहस दिया और हौसला बढ़ाया, तब जा कर उन्हें थोड़ी शान्ति मिली। गीत की रेकॉर्डिंग के बाद लता जी ने उनकी तारीफ़ भी की थी। 'धूल का फूल' के सब गाने चल गये, और यहाँ का दस्तूर यही है कि अगर कोई फ़िल्म कामयाब होती है तो अगले फ़िल्म में वही टीम रिपीट की जाती है। और इस तरह से महेन्द्र कपूर को आगे भी बी. आर. फ़िल्म्स में गाने के मौके मिलते चले गये।

साहिर व यश चोपड़ा
और अब आते हैं इस गीत से जुड़े दूसरे किस्से पर। "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ..." गीत फ़ाइनल रिहर्सल हो कर रेकॉर्डिंग के लिए तैयार हो चुका था। तभी एन. दत्ता के सहायक ने उन्हें बताया कि इस गीत की अवधि ज़रूरत से ज़्यादा लम्बी हो गई है। उस ज़माने में किसी फ़िल्मी गीत की अवधि 3 मिनट से 5 मिनट तक की होती थी, क़व्वाली या कोई ख़ास गीत हो तो ही 6 या 7 मिनट की हो सकती थी, पर ऐसा बहुत कम ही था। ऐसे में "तेरे प्यार का आसरा...", जो कि एक सामान्य रोमांटिक युगल गीत था, इसकी अवधि हो गई थी कुल 6 मिनट और लगभग 40 सेकण्ड। सहायक की बात सुन कर एन. दत्ता को भी लगने लगा कि वाकई यह गीत काफ़ी लम्बा हो गया है। लेकिन किसी की क्या मजाल जो यह बात साहिर लुधियानवी को जाकर कहे। साहिर साहब अपने लिखे किसी भी गीत के साथ कोई छेड़-छाड़, काँट-छाँट या फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। ऐसे में एन. दत्ता कैसे उन्हे कहें कि गीत के कुछ अन्तरे काटने पड़ेंगे? इसलिए उन्होंने यह बात जाकर यश चोपड़ा को बताई। यश चोपड़ा ने गीत को सुना और उन्हे भी गीत काफ़ी लम्बा लगा, और उन्होंने तय किया कि वो ख़ुद साहिर साहब से बात करेंगे। जब साहिर साहब को उन्होंने बताया कि गीत के कुल सात अन्तरों में से दो अन्तरे कम करने पड़ेंगे तो साहिर ने उन्हें समझाया कि देखिये, यह किसी आम सिचुएशन का युगल गीत नहीं है, यह एक प्रतियोगितामूलक गीत है। स्टेज पर नायक और नायिका के बीच में लड़ाई चल रही है, इसलिए इसका थोड़ा लम्बा होना स्वाभाविक है। गीत को छोटा कर देंगे तो यह प्रतियोगितामूलक गीत नहीं बल्कि इस सिचुएशन का एक महज़ औपचारिक गीत बन कर रह जायेगा। सिचुएशन का इम्पैक्ट ही ख़त्म हो जायेगा। साहिर साहब के समझाने पर भी यश जी जब किन्तु-परन्तु करने लगे तो साहिर साहब ने थोड़े कड़े शब्दों में उनसे कहा कि अगर वाक़ई उन्हे लगता है कि गीत लम्बा हो गया है तो यह गीत उन्हे वापस दे दिया जाये, और इसके बदले वो कोई दूसरा गीत लिख कर दे देंगे, पर यह गीत ऐसे ही जायेगा, किसी भी तरह की कोई कटौती नहीं होगी इसमें। अब यश जी घबरा गये क्योंकि उन्हें यह गीत बहुत पसन्द था। गीत हाथ से निकल जायेगा सोच कर उन्होंने बात को यहीं ख़त्म करने की सोची और साहिर साहब से कहा कि वो इसी गीत को रखेंगे बिना किसी काट-छाँट के। इस तरह से गीत रेकॉर्ड हुआ और बेहद लोकप्रिय भी हुआ। फ़िल्म के पोस्टर पर भी लिखा गया "तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ"। लोग थिएटर से फ़िल्म देख कर निकलते वक़्त इसी गीत को गुनगुनाते हुए पाये गये। बस, इतनी सी है इस गीत की कहानी। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।

फिल्म - धूल का फूल : 'तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ...' : लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर : संगीत - एन. दत्ता : गीत - साहिर लुधियानवी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें  cine.paheli@yahoo.com  के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, March 29, 2014

अभिनेत्री नन्दा को श्रद्धांजलि आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में...


एक गीत सौ कहानियाँ - 26
 

‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम...’



"मुझे अभी-अभी पता चला कि अभिनेत्री नन्दा, जिसे हम बेबी नन्दा कहते थे, वो अब हमारे बीच नहीं रही। यह सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ। बेबी नन्दा जब 4-5 साल की थी, तब उसने 'मन्दिर' फ़िल्म में मेरे छोटे भाई की भूमिका निभायी थी। मैं नन्दा के पिताजी मास्टर विनायक जी की कम्पनी में बतौर बाल कलाकार 1943 से काम करती थी। मेरी और नन्दा और उसकी बड़ी बहन मीना के साथ बड़ी दोस्ती थी। नन्दा की पहली फ़िल्म 'तूफ़ान और दीया' से मैंने नन्दा के लिए प्लेबैक शुरु किया। बहुत अच्छी इंसान थी। भगवान उसकी आत्मा को शान्ति दे।" --- लता मंगेशकर


भिनेत्री नन्दा अब इस दुनिया में नहीं रहीं। लता जी के उपर्युक्त शब्दों से पता चलता है कि कितना अन्तरंग रिश्ता रहा होगा दोनों में। आज नन्दा जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए लता जी के गाये और नन्दा जी पर फ़िल्माये फ़िल्म 'हम दोनो' के भजन "अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम" से बेहतर कोई रचना नहीं होगी। गाँधीवादी विचारधारा लिये राग गौड़ सारंग आधारित इस भजन को सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे कोई पारम्परिक रचना होगी। पर नहीं, यह एक फ़िल्मी गीत है जिसे साहिर लुधियानवी ने लिखा है और जयदेव ने स्वरबद्ध किया है। फ़िल्मी भजनों की श्रेणी में शायद सर्वोपरि है यह भजन। यह केवल भजन ही नहीं, बल्कि साप्रदायिक एकता और अहिंसा का संदेश भी है। ख़ास बात यह है कि स्वतंत्र संगीतकार के रूप में यह जयदेव की पहली भक्ति रचना थी। जयदेव के ही शब्दों में, "बतौर स्वतन्त्र संगीतकार, मेरी पहली फ़िल्में थीं 'जोरु का भाई', 'किनारे-किनारे' और 'नवकेतन' की एक फ़िल्म, जो सारे के सारे नाकामयाब रहे। फिर मुझे मिला 'हम दोनो"। तो पहली ही भजन में इस तरह की सफलता यकायक देखने को नहीं मिलती। इस भजन की गायिका, स्वयं लता जी कहती हैं, "इस भजन को अगर सुबह और रात के वक़्त सुना जाये तो एक अजीब सी सुकून मिलता है" (जयमाला, विविध भारती)। लता जी को यह भजन इतना पसन्द है कि नूरजहाँ जब कई वर्ष बाद भारत आयीं थीं और उनके स्वागत में -'Mortal Men, Immortal Melodies' नामक शो आयोजित किया गया था, उस शो में लता जी ने इसे शामिल किया था। रूपक ताल में स्वरबद्ध यह भजन सुनने में कितना सीधा-सरल लगता है, ध्यान से सुनने पर अहसास होता है कि जयदेव ने कितनी मेहनत की होगी इस पर। गीत निचले स्वर से शुरू होकर क्रमश: ऊपर के स्वरों तक पहुंचता चला जाता है। एक तरफ़ लता की आवाज़ और दूसरी तरफ़ कोरस की आवाज़, इन दो आवाज़ों के साथ जयदेव ने क्या ख़ूब प्रयोग किया हैं। दो आवाज़ों को एक बार मिला दिया और फिर किस सुन्दरता से दोनों को अलग कर दिया, इन सब छोटी-छोटी बातों से भी इस भजन में निखार आया है।

केवल लता जी ही नहीं, इस भजन के कद्रदानों की संख्या बहुत बड़ी है। फ़िल्म-संगीत के पहले दौर के कलाकारों से लेकर आज के दौर के कलाकारों में इस भजन के चाहनेवाले शामिल हैं। तिमिर बरन और उमा देवी ने अपने अपने 'जयमाला' कार्यक्रमों में इस भजन को चुना था। कलात्मक फ़िल्मों के जाने-माने संगीतकार अजीत वर्मन ने इस भजन के बारे में अपने 'जयमाला' में फ़ौजी भाइयों से कहा है, "मेरे भाई, अभी जो गाना मैं सुनाने जा रहा हूँ, सच्ची, जब मैं अकेला, अकेला तो मैं हो ही नहीं सकता क्योंकि मेरा दिल मेरे साथ रहता है, my heart is my inspiration, हाँ तो यह गाना जयदेव का "अल्लाह तेरो नाम" इतना अच्छा भजन बहुत कम बना है। इतना सिम्पल वो ही बना सकता है जो बहुत लम्बी राह चला हो।" अनूप जलोटा द्वारा प्रस्तुत 'हिट सुपरहिट फ़ेवरिट फ़ाइव' कार्यक्रम में अपने मनपसन्द पाँच गीतों में सर्वप्रथम उन्होंने इसी भजन को चुना और कहा, "मुझे बहुत पसन्द है लता जी का गाया "अल्लाह तेरो नाम"। यह कहूँगा कि इसकी ख़ूबी है कि कितनी सरल कम्पोज़िशन और कितनी पावरफ़ुल कम्पोज़िशन है जिसे जयदेव जी ने बनायी है, लता जी ने गाया तो अच्छा ही है, लेकिन आपको एक छोटा सा उदाहरण दे दूँ इस गाने के बारे में, कि इससे ज़्यादा सरल क्या हो सकती है कम्पोज़िशन की कि इसका स्थायी और अन्तरा एक ही धुन पर है। सिर्फ़ "स" को "म" कर दिया।" इस भजन के कद्रदानों में कविता कृष्णमूर्ती, जावेद अख़्तर, शबाना आज़मी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, स्वानन्द किरकिरे और सोनू निगम भी शामिल हैं।

जयदेव और लता
फ़िल्म 'हम दोनों' में लता के गाये दो भजन हैं - एक तो "अल्लाह तेरो नाम" और दूसरा भजन है राग धानी आधारित "प्रभु तेरो नाम, जो ध्याये फल पाये"। कुछ लोगों के अनुसार "अल्लाह तेरो नाम" "प्रभु तेरो नाम" का ही एक दूसरा संस्करण है, पर सच्चाई यह है कि ये दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग, और स्वतंत्र रचनाएँ हैं। दोनों भजन नन्दा पर फ़िल्माया गया है। फिल्म के इन गीतों से एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। सचिनदेव बर्मन से कुछ मतभेद के कारण उन दिनों लता मंगेशकर ने उनकी फिल्मों में गाने से मना कर दिया था। बर्मन दादा के सहायक रह चुके जयदेव ने इस प्रसंग में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पहले तो लता जी ने जयदेव के संगीत निर्देशन में गाने से मना कर दिया, परन्तु जब उन्हें यह बताया गया कि यदि ‘हम दोनों’ के गीत लता नहीं गाएँगी तो फिल्म से जयदेव को ही हटा दिया जाएगा, यह जान कर लता जी गाने के लिए तैयार हो गईं। उन्हें यह भी बताया गया कि भक्तिरस में पगे इन गीतों के लिए जयदेव ने अलौकिक धुनें बनाई है। अब इसे लता जी की उदारता मानी जाए या व्यावसायिक कुशलता, उन्होने इन गीतों को अपने स्वरों में ढाल कर कालजयी बना दिया। "अल्लाह तेरो नाम" भजन में दो अन्तरे हैं। फ़िल्म के पर्दे पर और ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर, दोनों में दो अन्तरे सुनाई पड़ते हैं। पर एक बात ध्यान देने योग्य हैं कि जब जयदेव जी ने विविध भारती पर अपनी 'जयमाला' प्रस्तुत की थी, उसमें इस भजन को सुनवाते हुए कहा था, "फ़ौजी भाइयों, जो सेवा आप हमारी कर रहे हैं, इस देश की रक्षा कर रहे हैं, हम सब आप लोगों के शुक्रगुज़ार हैं, आप जहाँ भी हों, पहाड़ों में, सहराओं में, समन्दरों में, भगवान आप को ख़ुश रखें, आप के परिवारों को ख़ुशहाल रखें। इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान। सबको मिले सुख-शान्ति, यही है ईश्वर से मेरी प्रार्थना"। अगर आप इन शब्दों पर ग़ौर करें तो साफ़-साफ़ इस भजन का तीसरी अन्तरा हमारे सामने आ जाता है - "इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान, सबको सन्मति दे भगवान"। तो क्या यह तीसरा अन्तरा भी साहिर साहब ने लिखा था जिसे गीत में जगह नहीं मिली? या फिर ये शब्द जयदेव जी के ही थे इस कार्यक्रम के लिए? क्या पता!

साहिर
इस दौर के सुप्रसिद्ध गीतकार स्वानन्द किरकिरे ने हाल में इस भजन की सुन्दर स्मीक्षा की है, जिसका हिन्दी में अनुवाद कुछ इस तरह का है - "पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो अहसास होता है कि बहुत सालों तक मैंने सही मायने में इस भजन के शब्दों पर ग़ौर नहीं किया था। अपनी उम्र के तीसरे दशक में पाँव रखने के बाद मैं इस भजन के बोलों की ओर आकर्षित हुआ और समझ आया कि ये बोल क्या संदेश दे रहे हैं। मैंने आविष्कार किया कि "अल्लाह तेरो नाम" महज़ एक भजन नहीं है, यह युद्ध के ख़िलाफ़ एक दरख्वास्त है। कुछ तो बात है इस गीत में कि यह मेरे साथ रहा है इतने सालों से। इसे मैं गीत नहीं समझता, यह तो एक प्रार्थना है, श्लोक है, अमृत वाणी है, और मेरे अनुसार यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है। इस गीत के साथ मेरी जो सबसे पुरानी स्मृतियाँ हैं, वो ये कि इसे हमारे स्कूल में स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर गाया जाता था। और मेरी यह धारणा थी कि मैं इसे जानता हूँ, समझता हूँ। पर उस वक़्त मैं ग़लत था। बोलों की अगर बात करें तो मुझे नहीं लगता कि साहिर साहब से बेहतर कोई इसे लिख पाते, जिनकी शायरी ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है। यह उनका ही कमाल है कि एक साधारण प्रार्थना गीत में उन्होंने ऐसी सोच, ऐसे उच्च विचार भरे हैं कि यह एक यूनिवर्सल प्रेयर बन गया है। अगर पहला अन्तरा हीरा है तो दूसरे अन्तरे में तो साहिर साहब ने काव्य के गहराई की हर सीमा पार कर दी है। "ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले, बलवानों को दे दो ज्ञान" हमें एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। इसमें मीटर है, मेलडी है, अर्थ है, गहराई है। युद्ध में विश्वास रखने वालों और बिना कुछ जाने एक दूसरे को मारने वालों के लिए यह गीत जैसे एक व्यंग है, वार है। इस गीत का एक और आकर्षण है साज़ों का अरेन्जमेण्ट और कम्पोज़िशन। कमचर्चित संगीतकार जयदेव ने इस गीत में कई रागों को इस तरह से छिड़का है कि एक आकर्षण करने वाली ख़ुशबू सी आती है जब जब इसे सुनते हैं। इसे हर बार सुनते हुए मेरी आँखें भर आती हैं। लता जी ने यह गीत गाया है। सोनू निगम एक और गायक हैं जो इसे बहुत ख़ूबसूरती से गाते हैं। मैं जब भी उनसे मिलता हूँ, अपने दोस्तों के साथ बैठ जाता हूँ उनसे यह गीत सुनने के लिए। यह गीत एक बेहतरीन उदाहरण है एक सशक्त और सर्वव्यापी प्रार्थना का जो मुझे अपने जज़्बातों और देशभक्ति भावना को जगाने में मदद करती है। इस भजन के सुर मेरे विवेक में और मुझमें समाया हुआ है, हमेशा हमेशा।"

इसी गीत के माध्यम से 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से स्वर्गीय अभिनेत्री नन्दा को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे!

फिल्म - हम दोनों : अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम...' : लता मंगेशकर : संगीत - जयदेव : गीतकार - साहिर लुधियानवी 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज और आलेख - सुजॉय चटर्जी व कृष्णमोहन मिश्र
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Wednesday, March 7, 2012

"नीले गगन के तले धरती का प्यार पले" - कैसे न बनती साहिर और रवि की सुरीली जोड़ी जब दोनों की राशी एक है!!

मशहूर गीतकार - संगीतकार जोड़ियों में साहिर लुधियानवी और रवि की जोड़ी ने भी फ़िल्म-संगीत के ख़ज़ाने को बेशकीमती रत्नों से समृद्ध किया है। कैसे न बनती यह अनमोल जोड़ी जब दोनों की जन्मतिथि लगभग साथ-साथ हैं? ३ मार्च को रवि और ८ मार्च को साहिर के जन्मदिवस को ध्यान में रखते हुए आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' की दसवीं कड़ी में चर्चा इस जोड़ी की एक कलजयी रचना की, सुजॉय चटर्जी के साथ...


एक गीत सौ कहानियाँ # 10


फ़िल्म जगत में गीतकार-संगीतकार की जोड़ियाँ शुरुआती दौर से ही बनती चली आई हैं। उस ज़माने में भले स्टुडियो कॉनसेप्ट की वजह से यह परम्परा शुरु हुई हो, पर स्टुडियो सिस्टम समाप्त होने के बाद भी यह परम्परा जारी रही और शक़ील-नौशाद, शलेन्द्र-हसरत-शंकर-जयकिशन, मजरूह-नय्यर, मजरूह-सचिन देव बर्मन, साहिर-सचिन देव बर्मन, साहिर-रवि, गुलज़ार-पंचम, समीर-नदीन-श्रवण, स्वानन्द-शान्तनु जैसी कामयाब गीतकार-संगीतकार जोड़ियाँ हमें मिली। इस लेख में आज चर्चा साहिर-रवि के जोड़ी की। कहा जाता है कि जिन लोगों की राशी एक होती हैं, उनके स्वभाव में, चरित्र में, कई समानतायें पायी जाती हैं और एक राशी के दो लोगों में मित्रता भी जल्दी हो जाती है। यह बात ध्रुव सत्य हो न हो, पर अगर गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार रवि के लिए यह बात कही जा रही हो तो ग़लत नहीं लगता। रवि का जन्म ३ मार्च १९२६ में हुआ था और साहिर का ८ मार्च १९२१ को। अर्थात् साहिर रवि से ५ साल बड़े थे। मीन राशी वाले ये दोनों कलाकारों का फ़िल्मकार बी. आर. चोपड़ा के माध्यम से सम्पर्क हुआ और दोनों की जोड़ी बेहद कामयाब रही।

बी. आर. चोपड़ा से पहले भी रवि बहुत सी फ़िल्मों में संगीत दे चुके थे जिनमें देवेन्द्र गोयल की फ़िल्में प्रमुख थीं, पर रवि के करीयर का सफल मोड़ बी. आर. चोपड़ा ही ले आए और रवि का स्तरीय साहित्यिक संगीत हमें चोपड़ा कैम्प की फ़िल्मों में ही सुनने को मिला। रवि से पहले चोपड़ा कैम्प के गीतकार-संगीतकार हुआ करते थे साहिर लुधियानवी और एन. दत्ता। इनके बाद रवि का आगमन हुआ और साहिर-रवि की जोड़ी बनी। 'गुमराह' (१९६३), 'वक़्त' (१९६५), 'हमराज़' (१९६७), 'आदमी और इंसान' (१९६९) जैसी फ़िल्मों के गानें चोपड़ा कैम्प में बने तो चोपड़ा कैम्प के बाहर भी सातवें दशक में साहिर और रवि की जोड़ी ने कई फ़िल्मों में नायाब गानें तैयार किए जिनमें 'बहू बेटी' (१९६५), 'काजल' (१९६५), 'आँखें' (१९६५), 'नील कमल' (१९६५), 'दो कलियाँ' (१९६५) शामिल हैं। चोपड़ा कैम्प में बनने वाली फ़िल्मों में रवि ने मुख्य रूप से पहाड़ी और राग भूपाली का प्रयोग करते हुए बहुत ही सुरीली रचनाएँ बनाईं और साहिर के शाब्दिक सौंदर्य ने उन धुनों में जान डाल दी। 'गुमराह' के "इन हवाओं में इन फ़िज़ाओं में", "ये हवा ये फ़िज़ा ये हवा" और 'वक़्त' के "कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी", "दिन हैं बहार के", "हम जब सिमट के आपकी बाहों में आ गए", "आगे भी जाने न तू" जैसे गीत इस बात का उदाहरण है। 'हमराज़' के "नीले गगन के तले धरती का प्यार पले" गीत में तो पहाड़ी और भूपाली, दोनों के सुरों का मिश्रण सुनाई दे जाता है। प्रकृति की सुषमा का इस गीत से बेहतर फ़िल्मी संस्करण और दूसरा नहीं हो सकता।


"नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले, ऐसे ही जग में, आती हैं सुबहें, ऐसे ही शाम ढले", यह न केवल साहिर और रवि की जोड़ी का मील का पत्थर सिद्ध करने वाला गीत रहा, बल्कि इसके गायक महेन्द्र कपूर को भी इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था और फ़िल्म 'हमराज़' के गानें शायद महेन्द्र कपूर के करीयर के सबसे महत्वपूर्ण गीत साबित हुए। चोपड़ा कैम्प में शुरु शुरु में रफ़ी साहब ही गाया करते थे। महेन्द्र कपूर के मैदान में उतरने के बाद कुछ गीत उनसे भी गवाए जाने लगे। कहा जाता है कि १९६१ की फ़िल्म 'धर्मपुत्र' के एक क़व्वाली को लेकर रफ़ी साहब से हुए मनमुटाव के बाद बी. आर. चोपड़ा ने आने वाली सभी फ़िल्मों के लिए बतौर गायक महेन्द्र कपूर का चयन कर लिया। रफ़ी साहब की जगह महेन्द्र कपूर को लेकर न बी. आर. चोपड़ा पछताए और महेन्द्र कपूर को भी कुछ लाजवाब गीत गाने को मिले जो अन्यथा रफ़ी साहब की झोली में चले गए होते।

फ़िल्म 'हमराज़' के इस गीत की खासियत यह है कि यह गीत अन्य गीतों की तरह मुखड़ा-अंतरा-मुखड़ा शैली में नहीं रचा गया है। हर अंतरा भी एक मुखड़ा जैसा ही लगता है।

नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले,
ऐसे ही जग में, आती हैं सुबहें, ऐसे ही शाम ढले।

शबनम के मोती, फूलों पे बिखरे, दोनों की आस फले,
नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले।

बलखाती बेलें, मस्ती में खेलें, पेड़ों से मिलके गले,
नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले।

नदिया का पानी, दरिया से मिलके, सागर की ओर चले,
नीले गगन के तले, धरती का प्यार पले।



कितनी सादगी, कितनी सुन्दरता, कितनी सच्चाई है इन शब्दों में। बस एक सुरीली धुन, और कुछ सीधे-सच्चे बोल ही कैसे एक गीत को अमरत्व प्रदान कर देती है यह गीत इस बात का प्रमाण है। यह गीत भले धुन पे लिखा गया हो पर सुनने में आता है कि साहिर साहब यह बिल्कुल पसंद नहीं करते थे कि धुन पहले बना ली जाए और बोल बाद में लिखे जाए। रवि साहब से जब इसी बात की पुष्टि करने को कहा गया तो उन्होंने बताया, "यह मुझे पता नहीं पर एक बार फ़िल्म 'हमराज़' में ऐसा एक गाना बना था जिसका सिचुएशन कुछ ऐसा था कि पहाड़ों में गीत गूंज रहा है। तो मैंने उनको एक धुन सुनाया और कहा कि यह पहाड़ी धुन जैसा लगेगा और इसको हम गाने के रूप में डाल सकते हैं फ़िल्म में। अगले दिन वे गीत लिखकर ले आए "नीले गगन के तले धरती का प्यार पले"। इस गीत में कोई अंतरा नहीं है, अंतरे भी मुखड़े जैसा ही है। कमाल का गीत लिखा है उन्होंने। वो ही ऐसा लिख कर लाए थे, किसी ने ऐसा लिखने को नहीं कहा था।" इस तरह से बस एक ही धुन पर पूरा का पूरा गीत बन गया। राज कुमार और विम्मी पर फ़िल्माया यह गीत कालजयी बन गया है सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी सादगी की वजह से। यह गीत आज भी इसी बात की ओर इंगित करता है कि किसी गीत के कालजयी बनने के पीछे न तो साज़ों ले महाकुम्भ की ज़रूरत पड़ती है और न ही भारी-भरकम शायरी की; बस एक सच्ची सोच, एक प्यारी धुन, एक मधुर आवाज़, बस, ये बहुत है एक अच्छे गीत के लिए!


"नीले गगन के तले" सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें...



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Thursday, August 25, 2011

अब कोई गुलशन न उजड़े....एक आशावादी गीत आज के इस बदलते भारत की उथल पुथल में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 730/2011/170



शृंखला ‘वतन के तराने’ की समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। दोस्तों, स्वतन्त्रता की 64वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में यह श्रृंखला हमने उन बलिदानियों को समर्पित किया है, जिन्होने देश को विदेशी सत्ता से मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इनके बलिदानों के कारण ही 15अगस्त, 1947 को विदेशी शासकों को भारत छोड़ कर जाना पड़ा। आज़ादी के 64वर्षों में हम किसी विदेशी सत्ता के गुलाम तो नहीं रहे, किन्तु स्वयं द्वारा रची गई अनेक विसंगतियों के गुलाम अवश्य हो गए हैं। इस गुलामी से मुक्त होने के लिए हमे अपने पूर्वजों के त्याग और बलिदान का स्मरण करते हुए राष्ट्र-निर्माण के लिए नए संकल्प लेने पड़ेंगे।



श्रृंखला की इस समापन कड़ी में हम एक ऐसे बलिदानी का परिचय आपके साथ बाँटना चाहेंगे जो महान पराक्रमी, अद्वितीय युद्धविशारद, कुशल वक्ता के साथ-साथ प्रबुद्ध शायर भी था। उस महान बलिदानी का नाम है रामप्रसाद ‘बिस्मिल’। प्रथम विश्वयुद्ध के समय देश को गुलामी से मुक्त कराने का एक प्रयास हुआ था, जिसे ‘मैनपुरी षड्यंत्र काण्ड’ के नाम से जाना गया था। इस अभियान में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की सक्रिय भागीदारी थी, परन्तु पुलिस इन्हें पकड़ न सकी। 1921 में जब असहयोग आन्दोलन आरम्भ हुआ तब ‘बिस्मिल’ अशफाक़उल्ला के साथ आन्दोलन में कूद पड़े। उस दौर में उन्होने युवा पीढ़ी में स्वतन्त्रता के प्रति चेतना जागृत करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। असहयोग आन्दोलन स्थगित हो जाने के बाद ये लोग फिर अपने पुराने पथ पर लौट आए। युवा वर्ग इन्हें श्रद्धा और विश्वास से देखता था। नवयुवकों के सहयोग से ‘बिस्मिल’ क्रान्तिकारी संघ के कार्यों में तत्परता से जुट गए।



रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ एक अच्छे लेखक, कवि और वक्ता भी थे। उन्होने ‘मन की लहर’, ‘बोल्शेविकों की करतूत’ तथा ‘मैनपुरी षड्यंत्र का इतिहास’ नामक पुस्तकें लिखी। ‘अज्ञात’ छद्म नाम से वे ‘प्रभा’ और ‘प्रताप’ आदि पत्रों में उन्होने लेख भी लिखे। कुशल लेखक के साथ-साथ वे एक कुशल वक्ता भी थे। ‘काकोरी काण्ड’ में अंग्रेजों की अदालत में जिस तर्कपूर्ण ढंग से उन्होने अपना पक्ष रखा, उससे पूरी अंग्रेज़-सत्ता हतप्रभ रह गई। इस मुकदमे में ‘बिस्मिल’ को राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह के साथ फाँसी की सज़ा दी गई। सज़ा सुन कर अदालत में ही उन्होने ‘भारतमाता की जय’ और ‘भारतीय प्रजातन्त्र की जय’ के नारे लगाए और दो शे’र कहे-



‘हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को,

जीते-जी हमसे छुड़ाया उसी काशाने को।

दरो-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं,

खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं।




19 दिसम्बर, 1927 के दिन इस वीर सेनानी को गोरखपुर जेल में फाँसी दी गई थी। फाँसी से पहले उन्होने रोज की तरह पूजा की और अपनी माँ के नाम पत्र लिखा। सिपाहियों ने चलने का इशारा किया और मुस्कुराते हुए ‘वन्देमातरम’ का जयघोष करते हुए फाँसी स्थल की ओर चल पड़े। चलते-चलते बुलन्द आवाज़ में ‘बिस्मिल’ ने यह शे’र कहे और ‘आज़ाद भारत की जय’ कहते हुए भारतमाता के चरणों में स्वयं को बलिदान कर दिया।



मालिक! तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे,

बाकी न मैं रहूँ,, न मेरी आरज़ू रहे।

जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे,

तेरा ही ज़िक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे।




दोस्तों भारत की स्वतन्त्रता के लिए यूँ तो असंख्य बलिदानियों ने अपने प्राणो की आहुतियाँ देकर देश को स्वतंत्र कराया था। इस श्रृंखला में हमने केवल दस बलिदानियों की चर्चा आपसे की है। देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर देने वाले इन क्रान्तिवीरों ने आज़ाद भारत की जैसी परिकल्पना की थी, वैसी ही परिकल्पना आज प्रस्तुत किये जाने वाले गीत में भी की गई है। आज हम आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुझे जीने दो’ का वह गीत सुनवाते हैं जिसमे एक समृद्ध भारत की परिकल्पना की गई है। समाज की मुख्य धारा से कटे डाकुओं के पुनर्वास की समस्या पर बनी इस फिल्म के संगीतकार जयदेव हैं और गीतकार हैं साहिर लुधियानवी। आप यह गीत सुनिए और हमें श्रृंखला ‘वतन के तराने’ से आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिये। रविवार की शाम एक नई श्रृंखला में फिर हम-आप मिलेंगे।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



अब बताएं इस सवाल का जवाब

के एल सहगल की प्रशंसक रही इस गायिका का जन्म अमृतसर पंजाब में हुआ था, इनका नाम बताएं ?



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

अमित जी एक और शृंखला जीतने की बधाई...



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, August 11, 2011

आगे भी जाने न तू....जब बदलती है जिंदगी एक पल में रूप अनेक तो क्यों न जी लें पल पल को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 720/2011/160



जीव सारथी के लिखे कविता-संग्रह 'एक पल की उम्र लेकर' पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इसी शीर्षक से लघु शृंखला की आज दसवीं और अंतिम कड़ी है। आज जिस कविता को हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं, वह इस पुस्तक की शीर्षक कविता है 'एक पल की उम्र लेकर'। आइए इस कविता का रसस्वादन करें...



सुबह के पन्नों पर पायी

शाम की ही दास्ताँ

एक पल की उम्र लेकर

जब मिला था कारवाँ

वक्त तो फिर चल दिया

एक नई बहार को

बीता मौसम ढल गया

और सूखे पत्ते झर गए

चलते-चलते मंज़िलों के

रास्ते भी थक गए

तब कहीं वो मोड़ जो

छूटे थे किसी मुकाम पर

आज फिर से खुल गए,

नए क़दमों, नई मंज़िलों के लिए



मुझको था ये भरम

कि है मुझी से सब रोशनाँ

मैं अगर जो बुझ गया तो

फिर कहाँ ये बिजलियाँ



एक नासमझ इतरा रहा था

एक पल की उम्र लेकर।




ज़िंदगी की कितनी बड़ी सच्चाई कही गई है इस कविता में। जीवन क्षण-भंगुर है, फिर भी इस बात से बेख़बर रहते हैं हम, और जैसे एक माया-जाल से घिरे रहते हैं हमेशा। सांसारिक सुख-सम्पत्ति में उलझे रहते हैं, कभी लालच में फँस जाते हैं तो कभी झूठी शान दिखा बैठते हैं। कल किसी नें नहीं देखा पर कल का सपना हर कोई देखता है। यही दुनिया का नियम है। इसी सपने को साकार करने का प्रयास ज़िंदगी को आगे बढ़ाती है। लेकिन साथ ही साथ हमें यह भी याद रखनी चाहिए कि ज़िंदगी दो पल की है, इसलिए हमेशा ऐसा कुछ करना चाहिए जो मानव-कल्याण के लिए हो, जिससे समाज का भला हो। एक पीढ़ी जायेगी, नई पीढ़ी आयेगी, दुनिया चलता रहेगा, पर जो कुछ ख़ास कर जायेगा, वही अमर कहलाएगा। भविष्य तो किसी नें नहीं देखा, इसलिए हमें आज में ही जीना चाहिए और आज का भरपूर फ़ायदा उठाना चाहिए, क्या पता कल हो न हो, कल आये न आये! इसी विचार को गीत के रूप में प्रस्तुत किया था साहिर नें फ़िल्म 'वक़्त' के रवि द्वारा स्वरवद्ध और आशा भोसले द्वारा गाये हुए इस गीत में - "आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू, जो भी है बस यही एक पल है"।



इसी के साथ 'एक पल की उम्र लेकर' शृंखला का समापन करते हुए हम सजीव जी बधाई देते हैं इस ख़ूबसूरत काव्य-संकलन के प्रकाशन पर। इस संकलन में प्रकाशित कुल ११० कविताओं में से १० कविताओं को हमनें इस शृंखला में प्रस्तुत किया। इस पुस्तक के बारे में अतिरिक्त जानकारी के लिए या इसे प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें। और इसी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह ख़ास शृंखला समाप्त होती है, अपनी राय व सुझाव टिप्पणी के अलावा oig@hindyugm.com पर आप भेज सकते हैं। अगले सप्ताह एक नई शृंखला के साथ उपस्थित होंगे, और मेरी और आपकी अगली मुलाक़ात होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेषांक' में। अब आज के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - एक एतिहासिक फिल्म है जिसमें एक अमर योद्धा की शहादत का वर्णन है.

सूत्र २ - आवाज़ है मन्ना डे की.

सूत्र ३ - गीत में "जन्मभूमि" की महानता का जिक्र है.



अब बताएं -

गीतकार कौन है - ३ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

किसी सशक्त प्रतिद्वंधी की अनुपस्तिथि में अमित जी एक बार फिर विजयी हुए है, बहुत बधाई.



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 16, 2011

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला....पूरी तरह पियानो पर रचा बुना एक अमर गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 594/2010/294

'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़', इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है यह शृंखला, जिसमें हम आपको पियानो के बारे में जानकारी भी दे रहे हैं, और साथ ही साथ फ़िल्मों से चुने हुए कुछ ऐसे गानें भी सुनवा रहे हैं जिनमें मुख्य साज़ के तौर पर पियानो का इस्तमाल हुआ है। पिछली तीन कड़ियों में हमने पियानो के इतिहास और उसके विकास से संबम्धित कई बातें जानी, आइए आगे पियानो की कहानी को आगे बढ़ाया जाए। साल १८२० के आते आते पियानो पर शोध कार्य का केन्द्र पैरिस बन गया जहाँ पर प्लेयेल कंपनी उस किस्म के पियानो निर्मित करने लगी जिनका इस्तमाल फ़्रेडरिक चौपिन करते थे; और ईरार्ड कंपनी ने बनाये वो पियानो जो इस्तमाल करते थे फ़्रांज़ लिस्ज़्ट। १८२१ में सेबास्टियन ईरार्ड ने आविष्कार किया 'डबल एस्केपमेण्ट ऐक्शन' पद्धति का, जिसमें एक रिपिटेशन लीवर, जिसे बैलेन्सर भी कहा जाता है, का इस्तमाल हुआ जो किसी नोट को तब भी रिपीट कर सकता था जब कि वह 'की' अपने सर्वोच्च स्थान तक अभी वापस पहुंचा नहीं था। इससे फ़ायदा यह हुआ कि किसी नोट को बार बार और तुरंत रिपीट करना संभव हो गया, और इस साज़ के इजाद का श्रेय लिस्ज़्ट को दिया गया। जब यह आविष्कार बाहर निकला, हेनरी हर्ट्ज़ ने इसे रिवाइज़ किया, और यह 'डबल एस्केपमेण्ट ऐक्शन' सभी ग्रैण्ड पियानो का हिस्सा बन गया और अब तक यह पद्धति चली आ रही है।

कल की कड़ी में हमने ५० के दशक शुरुआती साल का एक गीत सुना था, आइए आज इसी दशक में थोड़ा और आगे बढ़ें और सुनें साल '५७ में निर्मित गुरु दत्त की यादगार फ़िल्म 'प्यासा' से हेमन्त कुमार का गाया "जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला, हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला"। साहिर लुधियानवी के बोल और सचिन देव बर्मन का सगीत। और सब से जो ख़ास बात इस गीत की, वह यह कि पूरे गीत को पियानो पर खड़ा किया गया है। अब तक हमनें जितने भी गानें पियानो के बजाये, उन सभी में अभिनेता या अभिनेत्री को किसी पार्टी में पियानो बजाते हुए और गीत गाते हुए देखा गया। लेकिन प्रस्तुत गीत की ख़ासीयत यह है कि गुरु दत्त साहब भले ही एक पार्टी में इस गीत को गा रहे हैं, लेकिन कोई पियानो बजाता हुआ नज़र नहीं आता। दर्द भरे गीतों की बात करें तो यह गीत बेहद उल्लेखनीय हो जाता है। साहिर साहब के शब्द जैसे नुकीले तलवार की तरह दिल पर चोट करते हैं, और क्यों ना करे, वो अपने निजी जीवन में भी तो व्यर्थ प्रेम के दर्द से गुज़रे थे। और ना ही पिता का प्यार उन्हें मिल सका था। हेमन्त दा की गम्भीर वज़नदार आवाज़ ने गीत को ऐसा पुर-असर बनाया कि आज ६ दशक बाद भी इस गीत को सुन कर दिल कांप उठता है। गीत को सुनकर एक पल में आभास होता है कि इसका संगीत भी हेमन्त दा का है, लेकिन दूसरे ही क्षण याद आता है कि 'प्यासा' का संगीत तो दादा बर्मन ने रचा था। तो आइए इस अनमोल नग़मे को सुना जाये, फ़िल्म के पर्दे पर गुरु दत्त गा रहे हैं माला सिंहा और रहमान द्वारा आयोजित एक पार्टी में।



क्या आप जानते हैं...
कि अमरीका में पहला पियानो सन् १७७५ में जोहान बेहरेण्ट ने बनाया था 'पियानो फ़ोर्त' के नाम से।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस अभिनेत्री पर है ये गीत फिल्माया - 3 अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - 2 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजना जी बधाई....३ अंक आपके....अमित जी और शरद जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, January 19, 2011

तुझको पुकारे मेरा प्यार.....पुनर्जन्म के प्रेमी की सदा रफ़ी साहब के स्वरों में भीगी हुई

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 574/2010/274

'मानो या ना मानो' शृंखला में पिछले तीन अंकों में हमने आपको बताया देश विदेश की कुछ ऐसी जगहों के बारे में जिन्हे हौण्टेड माना जाता है, हालाँकि ऐसा मानने के पीछे कोई ठोस वजह अभी तक विज्ञान विकसित नहीं कर पाया है। ख़ैर, आगे बढ़ते हैं इस शृंखला में और आज हम चर्चा करेंगे पुनर्जनम की। जी हाँ, पुनर्जनम, जिसे लेकर भी लोगों में उत्सुक्ता की कोई कमी नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में ५०% जनता पुनर्जनम में यकीन रखता है। क्या आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इसके पीछे क्या कारण है? शायद हिंदु आध्यात्म, और शायद समय समय पर मीडिया में पुनर्जनम के क़िस्सों का दिखाया जाना। भोपाल के Government Arts & Commerce College के प्रिंसिपल डॊ. स्वर्णलता तिवारी पुनर्जनम का एक मशहूर उदाहरण है। उनके पुनर्जनम की कहानी दुनिया की उन ७ पुनर्जनम कहानियों में से है जिन पर वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। एक मुलाक़ात में स्वर्णलता जी ने अपने तीन जन्मों के बारे में बताया है। आइए उनके इस दिलचस्प और रहस्यमय पुनर्जनम घटना क्रम को और थोड़ा करीब से देखा जाये। २ मार्च १९४८ में स्वर्णलता का जन्म हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता को उस समय भयभीत कर दिया जब उन्होंने उन्हें बताया कि उनका नाम दरअसल बिया पाठक है और वो पहले कटनी में रहती थीं। तफ़तीश करने पर पता चला कि बिया पाठक नाम की महिला का १९३९ में निधन हुआ था। बिया का फिर जनम हुआ कमलेश के नाम से सन् १९४० में असम के सिल्हेट में (सिल्हेट अब बंगलादेश का हिस्सा है), और बहुत ही कम उम्र में १९४७ में कमलेश का भी निधन हो गया। १९४८ में कमलेश ने फिर जनम लिया स्वर्णलता के रूप में मध्य प्रदेश के शाहपुर तिकमगढ़ ज़िले में। स्वर्णलता को अपने पहले के दोनों जन्मों की कहानी याद है और तीनों बार उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ है। उनके इस पुनर्जनम की कहानी का वर्जिनीया विश्वविद्यालय के मशहूर प्रोफ़ेसर डॊ. इयान स्टीवेन्सन ने तदंत किया और इस सिलसिले में वो १९९७ में भारत भी आये थे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में स्वर्णलता की कहानी को "authentically correct" करार दिया। वर्तमान में स्वर्णलता भोपाल में अपने पति के. पी. तिवारी के साथ रहती हैं जो एक सीनियर आइ. पी. एस. अफ़सर हैं। स्वर्णलता ख़ुद एक बोटानिस्ट हैं और उनके दो बेटे हैं। दोस्तों, स्वर्णलता के बारे में जानकर शायद आप में से जो लोग अब तक पुनर्जनम पर यकीन नहीं करते थे, हमारी इस रिपोर्ट ने आपको भी सोचने पर मजबूर कर दिया होगा। दोस्तों, अगर यह क़िस्सा किसी अनपढ़ गँवार ग्रामीण महिला से जुड़ा होता तो हम शायद यकीन ना करते, लेकिन जब किसी नामी कॊलेज के प्रिंसिपल ने ख़ुद यह बताया तो इसमें कुछ तो सच्चाई ज़रूर होगी। पुनर्जनम की दो और मशहूर क़िस्सों के बारे में हम कल की कड़ी में फिर से चर्चा करेंगे।

जहाँ तक पुनर्जनम का हिंदी फ़िल्मों से संबंध है, तो इस राह पर भी हमारे फ़िल्मकार चले हैं। 'महल' फ़िल्म की चर्चा हम कर चुके हैं। उसके बाद १९५८ में आयी थी फ़िल्म 'मधुमती' जिसने 'महल' के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिये। 'मधुमती' फ़िल्म के बारे में आप भी जानते हैं और हमने भी कई कई बार इस फ़िल्म को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में शामिल किया है। इसलिए आज 'मधुमती' की यादों को एक तरफ़ रखते हुए आगे बढ़ते हैं, और पहूँच जाते हैं ६० के दशक में। आपको याद होगा एक फ़िल्म आयी थी 'नीलकमल', जिसमें नीलकमल (वहीदा रहमान) का पुनर्जनम हुआ था सीता के नाम से। नीलकमल का प्रेमी था चित्रसेन (राजकुमार) और उस जनम में दोनों का मिलन नहीं हो पाया था, जिस वजह से चित्रसेन की आत्मा भटक रही थी महल में जो एक खण्डहर में परिवर्तित हो चुका था। उधर नीलकमल का दोबारा जन्म होता है सीता के रूप में। लेकिन उसे अपने पिछले जन्म के बारे में कुछ भी याद नहीं। सीता का राम (मनोज कुमार) से विवाह होता है, लेकिन जल्द ही उसे नींद में किसी के पुकारने की आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं। और वो नींद में ही उठकर घर से निकल जाती है, जैसे कोई उसे अपनी ओर खींच ले जा रहा हो। ऐसे में सीता के ससुराल वाले उस पर शक़ करते हैं कि रात के वक़्त नई नवेली बहू कहाँ जाती है! और एक रोज़ उसकी सास उसे घर से ही निकाल देती है। अंत में सीता उस महल में पहूँच जाती है जहाँ चित्रसेन की आत्मा उसका इंतज़ार कर रहा होता है। फ़िल्म का अंत कैसे होता है, यह तो आप ख़ुद ही देख लीजिएगा, हम तो बस इतना कहेंगे कि जिस गीत के माध्यम से चित्रसेन की आत्मा नीलकमल को अपनी ओर आकर्षित करती थी, वह गाना था "तुझको पुकारे मेरा प्यार, आजा मैं तो मिटा हूँ तेरी चाह में"। बहुत ही मशहूर गीत इस फ़िल्म का, और सिर्फ़ यह गीत ही क्यों, 'नीलकमल' के तमाम गीत हिट हुए थे। साहिर और रवि की जोड़ी का एक बेहद चर्चित फ़िल्म। रफ़ी साहब की आवाज़ में इस हौण्टिंग् नंबर के आनंद लेने का आज के अंक से बेहतर भला और कौन सा अंक हो सकता है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। तो आइए सुनते हैं चित्रसेन की सदा नीलकमल



क्या आप जानते हैं...
कि 'नीलकमल' का यह गीत "तुझको पुकारे मेरा प्यार" राग पहाड़ी पर आधारित है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इतना बहुत है इस यादगार गीत को पहचानने के लिए.

सवाल १ - किस मशहूर राग पर आधारित है ये गीत - 2 अंक
सवाल २ - इस फिल्म की सफल जोड़ी ने एक और पुनर्जन्म पर आधारित फिल्म में साथ काम किया था, उस फिल्म का नाम बताएं - 1 अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अमित जी और शरद जी का जलवा है, और अनजाना जी अनजान मत रहिये प्लीस

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, December 14, 2010

देखी ज़माने की यारी, बिछड़े सभी बारी बारी.....शब्द कैफी के और और दर्द गुरु दत्त का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 548/2010/248

गुरु दत्त के जीवन की कहानी इन दिनों आप पढ़ रहे हैं और उनकी कुछ महत्वपूर्ण फ़िल्मों के गानें भी सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' के चौथे खण्ड के अंतर्गत। कल हमने जाना कि गुरु दत्त साहब ने फ़िल्म 'प्यासा' की स्क्रिप्ट फ़िल्म के बनने से बहुत पहले, ४० के दशक में ही लिख ली थी। १० महीनों तक बेरोज़गार रहने के बाद गुरु दत्त को अमीय चक्रवर्ती की फ़िल्म 'गर्ल्स स्कूल' में बतौर सहायक निर्देशक काम करने का मौका मिला, और फिर १९५० में ज्ञान मुखर्जी के सहायक के रूप में फ़िल्म 'संग्राम' में। और आख़िरकार वह दिन आ ही गया जिसका उन्हें इंतज़ार था। १९५१ में उनके मित्र देव आनंद ने अपनी फ़िल्म 'बाज़ी' को निर्देशित करने के लिए गुरु दत्त को निमंत्रण दिया। फ़िल्म ने बेशुमार शोहरत हासिल की और गुरु दत्त का नाम रातों रात मशहूर हो गया। फ़िल्म 'बाज़ी' के ही मशहूर गीत "तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले" की रेकॊर्डिंग् पर ही गुरु दत्त की मुलाक़ात गायिका गीता रॊय से हुई, और दोनों में प्यार हो गया, और २६ मई १९५३ के दिन दोनों ने शादी कर ली। इस दम्पती ने तीन संतानों को जन्म दिया - तरुण, अरुण और नीना। लेकिन जल्दी ही उनके दाम्पत्य जीवन में जैसे विष घुल गया। और दोनों के बीच की दूरी और भी ज़्यादा बढ़ गई जब मीडिया ने यह ख़बर फैलानी शुरु कर दी कि गुरु दत्त का वैजयंतीमाला के साथ प्रेम संबंध है। निर्देशक के रूप में गुरु दत्त एक पर्फ़ेक्शनिस्ट थे जिन्होंने कभी भी क्वालिटी के साथ समझौता नहीं किया। संगीत, गीत-फ़िल्मांकन, छायांकन, इन सभी में वो पारदर्शी थे। गुरु दत्त ही पहले निर्देशक थे जिन्होंने लम्बे फ़ोकल लेंग्थ के लेन्स प्रयोग किए। 'बाज़ी' की कामयाबी के बाद १९५२ में उन्होंने 'जाल' निर्देशित की और एक बार फिर कामयाबी उनके क़दम चूमी। १९५६ की फ़िल्म 'सैलाब' पिट गई, जिसमें गीता रॊय के भाई मुकुल रॊय का संगीत था। बतौर नायक गुरु दत्त की पहली फ़िल्म थी 'बाज़' (१९५३) जो नहीं चली, लेकिन गानें चल पड़े थे। और इसी फ़िल्म से गुरु दत्त और नय्यर साहब सम्पर्क में आये थे। १९५४ गुरु दत्त के करीयर का एक बेहद महत्वपूर्ण साल रहा क्योंकि इस साल उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी की स्थापना की और अपने इस बैनर तले बनाई फ़िल्म 'आर-पार', जो एक ब्लॊकबस्टर सिद्ध हुई। नय्यर साहब के संगीत ने ऐसा ज़बरदस्त हंगामा किया कि जैसे रातों रात फ़िल्म संगीत संसार ने करवट ले ली हो। 'आर-पार' के बाद कुछ कुछ इसी शैली में उन्होंने बनाई 'मिस्टर ऐण्ड मिसेस ५५' और एक बार फिर सुपरहिट। फ़िल्म 'सी.आई.डी' के लिए गुरु दत्त ने निर्देशक चुना उन्हीं के सहायक के रूप में काम करने वाले राज खोसला को। १९५७ में गुरु दत्त ने बनाई 'प्यासा', जो भारतीय सिनेमा का एक मास्टरपीस माना जाता है। इस फ़िल्म ने उन्हें अपने करीयर के शीर्ष पर पहुँचा दिया। इस फ़िल्म में उन्होंने एक कवि विजय की भूमिका अदा की थी। तक़नीकी रूप से इस फ़िल्म के श्याम-श्वेत दृश्यों का इस्तेमाल फ़िल्म के मूड के मुताबिक किया गया है, जो बहुत ही प्रभावशाली बन पड़े थे। १९५८ में गुरु दत्त के अभिनय से सजी फ़िल्म आई '12 O'Clock' लेकिन ना तो वो इस फ़िल्म के निर्माता थे और ना ही निर्देशक।

बतौर निर्देशक गुरु दत्त की अंतिम फ़िल्म आई १९५९ में - 'कागज़ के फूल'। तकनीकी दृष्टि से यह फ़िल्म 'गुरु दत्त' की सब से बेहतरीन फ़िल्म थी, लेकिन उस समय फ़िल्म बुरी तरह से फ़्लॊप हो गई। अपनी इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म के पिट जाने का सदमा गुरु दत्त नहीं स्वीकार कर सके और मानसिक अवसाद से घिर गए। वो इतनी बुरी तरीके से मायूस हो चुके थे कि उन्होंने फिर उसके बाद कोई फ़िल्म निर्देशित नहीं की। व्यावसायिक असफलता और व्यक्तिगत जीवन में अशांति, कुल मिलाकर गुरु दत्त ज़िंदगी से हार मान चुके थे। यह बेहद अफ़सोस की बात है कि उनकी जिस 'कागज़ के फूल' को उस समय लोगों ने नकार दिया था, आज उसी फ़िल्म को हिंदी सिनेमा के क्लासिक फ़िल्मों में शामिल किया जा रहा है। रोशनी और छाया के ताल मेल का इससे अच्छा उदाहरण किसी फ़िल्म ने नहीं दिया। दोस्तों, 'कागज़ के फूल' की याद आते ही दिल जैसे ग़मगीन हो जाता है गुरु दत के बारे मे सोच कर। आइए आज गुरु दत्त साहब को याद करते हुए इस फ़िल्म से सुनते हैं रफ़ी साहब की आवाज़ में "देखी ज़माने की यारी, बिछड़े सभी बारी बारी"। ज़िंदगी की इस कड़वी सच्चाई को गीत की शक्ल में उजागर किया था गीतकार कैफ़ी आज़मी। संगीतकार थे सचिन देव बर्मन। बिना बीट वाले और बिना साज़ वाले इस गीत को रफ़ी साहब ने कुछ ऐसे गाया है कि आँखें नम हुए बगैर नहीं रहतीं। इस गीत को सुनते हुए जैसे हमारी आँखों के सामने कोई फ़्लैशबैक रील चल पड़ती है और हम अपने पीछे छोड़ आये पड़ावों को सोचने लग पड़ते हैं। गीत के दूसरे हिस्से में कोरस और कॊयर का सुंदर प्रयोग हुआ है। कुल ९ मिनट अवधि के इस ख़ास गीत को आइए आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शान बनाया जाए। सुनिए और आप भी याद कीजिए अपनी अपनी ज़िंदगी से जुड़े उन लोगों को जिन्हें आप पीछे छोड़ आये हैं और जिनके अब बस यादें शेष हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि गुरु दत्त की वास्तविक जीवन की घटनाओं को लेकर बनाई गई भारत की इस प्रथम सिनेमास्कोप फ़िल्म 'काग़ज़ के फूल' को 'प्यासा' के मुकाबले कम सफलता मिली, लेकिन "वक़्त ने किया क्या हसीं सितम" की कोमल संवेदनशील रचना आज तक इस गीत को गीता दत्त के श्रेष्ठतम गीतों में से एक के रूप में हमारे मन में बसाए हुए है। (सौजन्य: 'धुनों की यात्रा', पृष्ठ-३१८)

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 05
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - गायक कौन हैं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
भारतीय नागरिक जी, आपने सिर्फ एक सवाल का जवाब देना था, नियम तोडा आपने इसलिए अंक हम नहीं दे पायेंगें, श्याम जी ११ अंकों पर हैं बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, December 13, 2010

जाने क्या तुने कही, जाने क्या मैंने कही....और बनी बात बिगड गयी गीता और गुरु दत्त की

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 547/2010/247

'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला के चौथे व अंतिम खण्ड में कल से हमने शुरु की है गुरु दत्त के जीवन सफ़र की कहानी। कल हम उनके जन्म और पारिवार के बारे में जाना। आइए अब बात आगे बढ़ाते हैं। गुरु दत्त की बहन ललिता ने अपने भाई को याद करते हुए कहा था कि १४ वर्ष की आयु में ही गुरु दत्त अपनी उंगलियों के सहारे दीवार पर दीये की रोशनी से छवियाँ बनाते थे। बचपन में उन्हें नृत्य करने का भी शौक था। सर्पनृत्य (स्नेक डांस) करके एक बार उन्हें ५ रुपय का पुरस्कार भी जीता था। आर्थिक अवस्था ठीक ना होने की वजह से गुरु दत्त ने कॊलेज की पढ़ाई नहीं की। लेकिन वो उदयशंकर के नृत्य मंडली से जुड़ गए। तब उनकी आयु १६ वर्ष थी। १९४१ से १९४४ तक नृत्य सीखने के बाद वो बम्बई आ गए और पुणे में 'प्रभात फ़िल्म कंपनी' में तीन साल के लिए अनुबंधित हो गए। और यहीं पर गुरु दत्त की मुलाक़ात हुई दो ऐसे प्रतिभाओं से जिनका उनके फ़िल्मों में बहुत बड़ा योगदान रहा है - देव आनंद और रहमान। १९४४ की फ़िल्म 'चाँद' में गुरु दत्त ने श्री कृष्ण का एक छोटा सा रोल निभाया, और १९४५ में अभिनय के साथ साथ फ़िल्म 'लखारानी' में निर्देशक विश्राम बेडेकर के सहायक भी रहे। १९४६ में पी.एल. संतोषी की फ़िल्म 'हम एक हैं' में नृत्य निर्देशक और सहायक निर्देशक रहे। १९४७ में यह कॊन्ट्रौक्ट ख़त्म होने के बाद वो एक फ़्रीलान्स ऐसिस्टैण्ट बन तो गए, लेकिन अगले १० महीनों तक कोई काम ना मिला। इसी दौरान गुरु दत्त को लिखने का शौक पैदा हुआ और एक स्थानीय अंग्रेज़ी पत्रिका 'दि इलस्ट्रेटेड वीकली ऒफ़ इण्डिया' में लघु कहानियाँ लिखने लगे। कहा जाता है कि इसी समय उन्होंने अपनी फ़िल्म 'प्यासा' का स्क्रिप्ट लिखी होगी। 'प्यासा' का मूल नाम 'कश्मकश' था, जिसे फ़िल्म निर्माण के दौरान बदलकर 'प्यासा' कर दिया गया था।

दोस्तों, 'प्यासा' तो काफ़ी बाद में बनीं थी, लेकिन जब 'प्यासा' का ज़िक्र आ ही गया है तो क्यों ना आज इसी फ़िल्म का एक बड़ा ही मशहूर, शोख़, चंचल, नटखट गीत सुन लिया जाए। गीता दत्त की आवाज़ में "जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैने सुनी, बात कुछ बन ही गई"। कैफ़ी आज़्मी के बोल और सचिन देव बर्मन का संगीत। इस गीत के रिदम में सचिन दा की ख़ास पहचान शामिल है। वही किसी चिड़िया के बोलने की आवाज़ जैसी एक धुन वो इस्तेमाल करते थे और बहुत से गीतों में इसका प्रयोग महसूस किया जा सकता है। गुरु दत्त और उनकी पत्नी गीता दत्त का दाम्पत्य जीवन बहुत ज़्यादा दिनों तक सुखी नहीं रखा। आज के प्रस्तुत गीत को सुनते हुए भले ही इस बात की भनक तक ना पड़े किसी को, लेकिन हक़ीक़त तो यही है कि उन दोनों के बीच एक दीवार सी बन गई थी। गुरु दत्त के निधन के बाद एक बार गीता दत्त विविध भारती पर तशरीफ़ लेकर आई थीं। उस दिन भी फ़िल्म 'प्यासा' का एक गीत बजाते हुए उनके शब्दों से दर्द फूट पड़ा था। कुछ युं कहा था उन्होंने - "अब मेरे सामने है फ़िल्म 'प्यासा' का रेकॊर्ड। और इसी के साथ याद आ रही है मेरे जीवन की सुख भरी, दुख भरी यादें, लेकिन आपको ये सब बताकर क्या करूँगी! मेरे मन की हालत का अंदाज़ा आप अच्छी तरह लगा सकते हैं। इस फ़िल्म के निर्माता थे मेरे पतिदेव गुरु दत्त जी। सपनों की उड़ान का कोई अंत नहीं, कोई सीमा नहीं, न जाने यह मन क्या क्या सपने देख लेता है। और जब सपने भंग होते हैं, तो कुछ और ही हक़ीक़त सामने आती है।" दोस्तों, आइए इस ग़मगीन परिवेश से बाहर निकलकर गीता जी की चुलबुली आवाज़ में सुनें "जाने क्या तूने कही"....



क्या आप जानते हैं...
कि गुरु दत्त द्वारा अभिनीत अंतिम फ़िल्म थी 'सांझ और सवेरा' जो प्रदर्शित हुई थी १९६४ में। इसमें उनकी नायिका थीं मीना कुमारी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 05
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक क्लास्सिक फिल्म के एक सुपर क्लास्सिक गीत.

सवाल १ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - गायक कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह अवध जी, इंदु जी और प्रतिभा जी ने मिलकर तीनों सवालों का जवाब देकर साबित कर दिया कि श्याम जी, शरद जी और अमित जी का भी तोड़ उपलब्ध है बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, December 7, 2010

वो न आयेंगें पलट के, उन्हें लाख हम बुलाएं....मुबारक बेगम की आवाज़ में चंद्रमुखी के जज़्बात

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 543/2010/243

'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला के तीसरे खण्ड में इन दिनों आप सुन रहे हैं बिमल रॊय निर्देशित फ़िल्मों के गीत और बिमल दा के फ़िल्मी यात्रा का विवरण। कल बात आकर रुकी थी 'परिणीता' में। १९५४ से अब बात को आगे बढ़ाते हैं। इस साल बिमल दा के निर्देशन में तीन फ़िल्में आईं - 'नौकरी', 'बिराज बहू' और 'बाप-बेटी'। 'नौकरी' 'दो बीघा ज़मीन' का ही शहरीकरण था। फ़िल्म में किशोर कुमार को नायक बनाया गया था, लेकिन यह फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' जैसा कमाल नहीं दिखा सकी, हालाँकि "छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में" गीत ख़ूब लोकप्रिय हुआ। 'बिराज बहू' भी शरतचन्द्र की इसी नाम की उपन्यास पर बनी थी जिसका निर्माण किया था हितेन चौधरी ने। 'नौकरी' और 'बिराज बहू' में सलिल दा का संगीत था, लेकिन 'बाप-बेटी' में संगीत दिया रोशन ने। फिर आया साल १९५५ और एक बार फिर शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की लोकप्रिय उपन्यास 'देवदास' पर बिमल रॊय ने फ़िल्म बनाई। १९३५ में प्रमथेश चन्द्र बरुआ ने पहली बार न्यु थिएटर्स में 'देवदास' का निर्माण किया था और उस समय बिमल दा उनके सहायक थे। इसके २० साल बाद, १९५५ में बिमल दा ने अपने तरीक़े से 'देवदास' को फ़िल्मी पर्दे पर उतारा। सहगल साहब की छवि देवदास की भूमिका में सब के दिल में बैठ चुकी थी। ऐसे में फिर से 'देवदास' बनाना ख़तरे से ख़ाली नहीं था। लेकिन बिमल दा ने यह रिस्क लिया और दिलीप कुमार को देवदास के रूप में उतारा। वैसे भी दिलीप साहब के अलावा किसी और की कल्पना उस वक़्त देवदास के रूप में नहीं की जा सकती थी। सबकी उम्मीदों पर खरा उतरकर दिलीप साहब को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। सुचित्रा सेन और वैजयंतीमाला ने क्रम से पारो और चन्द्रमुखी की भूमिकाएँ निभाईं।

बिमल रॊय की शान में 'देवदास' के नायक दिलीप कुमार ने कहा है - "Nobody has ever mentioned that while shooting in the suburbs of Bombay – behind his own Mohan studio, in Andheri or other selected exteriors, Bimal Roy captured the very ethos of rural Bengal. He did not need to go there. To me it was an education to work with him. In my formative year it was important to work with a director who lead you gently under the skin of the character. Today we have institutions, they teach cinema, acting etc. We did not have these in our times. We had instead directors like Bimal Roy. Add to this my own application as an actor. Take making Devdas. The question often while doing my role was ‘not to do’ than do anything." फ़िल्म 'देवदास' के दो गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा चुके हैं - "जिसे तू क़ुबूल कर ले" और "आन मिलो श्याम सांवरे"। आज हम आपको सुनवा रहे हैं मुबारक़ बेगम की आवाज़ में "वो ना आएँगे पलटकर, उन्हें लाख हम बुलाएँ, मेरी हसरतों से यह कहदो मेरे ख़्वाब भूल जाए"। यह गीत मुबारक़ बेगम की सब से लोकप्रिय गीतों में से एक है, हालाँकि यह गीत भी मुबारक़ बेगम के कई फ़िल्मों के कईगीतों की तरह इस फ़िल्म में भी पूरा नहीं लिया गया। राग खमाज पर आधारित इस मुजरे में सारंगी का सुंदर इस्तेमाल सुनने को मिलता है। यकीनन इस गीत को चंद्रमुखी (वैजयंतीमाला) पर फ़िल्माया गया होगा। फ़िल्म 'देवदास' में बिमल दा ने अपने साथी सलिल चौधरी को ना लेकर संगीतकार के रूप में चुना सचिन देव बर्मन को और गीतकार के रूप में शैलेन्द्र की जगह ले ली साहिर लुधियानवी ने। तो लीजिए इस ख़ूबसूरत मुजरे को सुनिए मुबारक़ जी की मिट्टी की सौंधी सौंधी ख़ुशबूदार आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि गायिका मुबारक़ बेगम को पढ़ना लिखना नहीं आता था, रेकॊर्डिंग् में उनकी बेटी उनके साथ जाती थी और गीत लिख लेती थी।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०४ /शृंखला ०५
गीत का इंटर ल्यूड सुनिए-


अतिरिक्त सूत्र - बिमल रॉय की एक और नायाब फिल्म.

सवाल १ - गायिका कौन हैं इस गीत की - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी ने एक बार फिर बढ़त बना ली है, रोमेंद्र जी सही कहा आपने, वाकई इस देवदास का जवाब नहीं...इंदु जी आप पर इल्जाम लगाएं....इतनी हिम्मत कहाँ हमने...और वैसे भी आप है ही इतनी प्यारी कि एक दिन भी न दिखें तो हमें कमी खलती है :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, November 1, 2010

मैं जब भी अकेली होती हूँ...जब नुक्ते में नुक्स कर बैठी महान आशा जी भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 517/2010/217

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! एक दोहे मे कहा गया है कि "दोस (दोष) पराये देख के चला हसन्त हसन्त, अपनी याद ना आवे जिनका आदि ना अंत"। यानी कि हम दूसरों की ग़लतियों को देख कर उनका मज़ाक उड़ाते हैं, लेकिन अपनी ग़लतियों का कोई अहसास नहीं होता। अब आप अगर यह सोच रहे होंगे कि हमें दूसरों की ग़लतियाँ नहीं निकालनी चाहिए, तो ज़रा ठहरिए, क्योंकि कबीरदास के एक अन्य दोहे में यह भी कहा गया है कि "निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटि चवाय, बिना पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय"। यानि कि हमें उन लोगों को अपने आस पास ही रखने चाहिए जो हमारी निंदा करते हैं, ताकि इसी बहाने हमें अपनी ख़ामियों और ग़लतियों के बारे में पता चलता रहेगा, जिससे कि हम अपने आप को सुधार सकते हैं। आप समझ रहे होंगे कि हम ये सब बातें किस संदर्भ में कर रहे हैं। जी हाँ, 'गीत गड़बड़ी वले' शृंखला के संदर्भ में। क्या है कि हमें भी अच्छा तो नहीं लग रहा है कि इन महान कलाकारों की ग़लतियों को बार बार उजागर करें, लेकिन अब जब शृंखला शुरु हो ही चुकी है, तो इसे अंजाम भी तो देना पड़ेगा। तो चलिए सिलसिले को आगे बढ़ाते हैं। आज और कल के लिए हमने दो ऐसे गीत चुने हैं जिनमें किसी शब्द में नुक्ता लगा देने की वजह से ग़लत उच्चारण हो गया है। इस तरह की ग़लतियाँ उस समय होती है जब गीतकार रिहर्सल या रेकॊर्डिंग् पर मौजूद ना हों। आज का गीत है फ़िल्म 'धर्मपुत्र' का, जिसे आशा भोसले ने गाया है। गीत के बोल हैं "मैं जब भी अकेली होती हूँ, तुम चुपके से आ जाते हो, और झाँक के मेरी आँखों में, बीते दिन याद दिलाते हो"। इस गीत के अंतिम अंतरे के बोल हैं - "रो रो के तुम्हे ख़त लिखती हूँ, और ख़ुद पढ़ कर रो लेती हूँ, हालात के तपते तूफान में जज़्बात की कश्ती खेती हूँ"। आशा जी ने "ख़त" और "ख़ुद" शब्दों को तो नुक्ता के साथ सही सही गाया, लेकिन उन्होंने ग़लती से "खेती" शब्द में भी नुक्ता लगा कर उसे "ख़ेती" कर दिया। यह ग़लती ज़रूर "ख़त" और "ख़ुद" शब्दों की वजह से ही हुई होगी, जिनकी वजह से यकायक उनके मुख से "खेती" के बजाय "ख़ेती" निकल गया होगा। ख़ैर, कोई बात नहीं, इतने सुंदर गीत के लिए ऐसी छोटी सी ग़लती तो माफ़ की ही जा सकती है, है न?

'धर्मपुत्र' साल १९६१ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था बी. आर. चोपड़ा ने और उनके छोटे भाई यश चोपड़ा इस फ़िल्म के निर्देशक थे। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे शशि कपूर, माला सिंहा, रहमान, । आचार्य चतुरसेन शास्त्री की उपन्यास पर बनी इस फ़िल्म को लिखा था अख़्तर-उल-रहमान ने। फ़िल्म के गानें लिखे साहिर लुधियानवी ने और संगीत था एन. दत्ता का। साहिर और एन. दत्ता की जोड़ी इससे पहले बी. आर. फ़िल्म्स की ही 'धूल का फूल' में काम कर चुकी थी। आपको यह भी बता दें कि यश चोपड़ा ने 'धूल का फूल' निर्देशित कर अपने आप को बतौर निर्देशक स्थापित किया था, और 'धर्मपुत्र' उनकी निर्देशित दूसरी फ़िल्म थी। इन दोनों फ़िल्मों को देख कर लोगों को पता चल चुका था कि यश चोपड़ा फ़िल्मी दुनिया में लम्बी पारी खेलने के लिए ही उतरे हैं। 'धर्मपुत्र' के सिनेमाटोग्राफ़र थे धरम चोपड़ा और सहायक संगीत निर्देशक के रूप में फ़िल्म के संगीत सृजन में महत्वपूर्ण योगदान दिया यूसुफ़ आज़ाद ने। 'धुनों की यात्रा' किताब के लेखक पंकज राग के शब्दों में, "विभाजन की ख़ूनी पृष्ठभूमि में पनपते प्यार के क्षणों को पूरी फ़िल्म में संजोकर रखने में साहिर के गीतों और एन. दत्ता की धुनों ने बड़ा योअगदान दिया। बागेश्वरी का पुट देकर काफ़ी हाट में "मैं जब भी अकेली होती हूँ" में आशा की गायकी के द्वारा किस ख़ूबी से प्यार के लम्हों को जीवन्त करने में एन. दत्ता सफल रहे थे, यह इस गीत को सुन कर ही पता चलता है।" तो लीजिए दोस्तों, हम सब मिलकर सुनें फ़िल्म 'धर्मपुत्र' का यह ख़ूबसूरत गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि एन. दत्ता का पूरा नाम है दत्ता नाइक, और उनकी पहली दो फ़िल्में थीं 'मिलाप' और 'मैरीन ड्राइव', ये दोनों ही फ़िल्में १९५५ में प्रदर्शित हुई थीं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०८ /शृंखला ०२
लीजिए गीत का प्रिल्यूड और शुरूआती शेर भी सुन लीजिए-


अतिरिक्त सूत्र - ये आवाज़ थी लता मंगेशकर की.

सवाल १ - फिल्म का नाम और निर्देशक बताएं - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इस दूसरी शृंखला में श्याम कान्त जी और अमित जी अब ७-७ अंकों पर साथ साथ हैं, शरद जी ५ और बिट्टू जी ४ अंकों पर हैं, मुकाबल दिलचस्प है....आज के जवाब पर बहुत निर्भर करेगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


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