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Thursday, April 21, 2016

बम बम बम भोला..! रसन पिया अपनी रचना में गा कर सुनाते हैं शिव पार्वती विवाह वृत्तान्त के समय किस तरह नाग को देख पंडित तक काँप जाते हैं।

महफिले कहकशां (३)


उस्ताद अब्दुल रशीद साहब 
दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, महफिले कहकशां के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए उस्ताद अब्दुल रशीद खान उर्फ़ रसन पिया को श्रद्धांजलि उन्ही की गाई एक बंदिश से।  


मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी

Saturday, March 30, 2013

स्वाधीनता संग्राम और फ़िल्मी गीत (भाग-4)


विशेष अंक : भाग 4


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में फिल्म संगीत की भूमिका 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! मित्रों, इन दिनों हर शनिवार को आप हमारी विशेष श्रृंखला 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका' पढ़ रहे हैं। पिछले सप्ताह हमने इस विशेष श्रृंखला का तीसरा भाग प्रस्तुत किया था। आज प्रस्तुत है, इस श्रृंखला का चौथा व अन्तिम भाग।


अब तक आपने पढ़ा -
पहला भाग
द्रितीय भाग
तृतीय भाग
गतांक से आगे...

फ़िल्म जगत के संगीतकारों में एक उल्लेखनीय नाम चित्रगुप्त का भी रहा है। उनका संगीतकार बनने का सपना तब पूरा हुआ जबन्यू दीपक पिक्चर्सके रमणीक वैद्य ने 1946 की दो स्टण्ट फ़िल्मों में उन्हें संगीत देने का निमन्त्रण दिया। ये फ़िल्में थीं लेडी रॉबिनहुडऔरतूफ़ान क्वीन। इन दो फ़िल्मों के गीतकार थे क्रम से ए. करीम और श्याम हिन्दी। दोनों फ़िल्मों के मुख्य कलाकार लगभग एक ही थेनाडिया, प्रकाश, शान्ता पटेल, अनन्त प्रभु प्रमुख।लेडी रॉबिनहुडमें एक देशभक्ति गीत थाभारत की नारी जाग उठी, अब होगा देशोद्धार”। ‘कमल पिक्चर्स, बम्बई’ की ऐतिहासिक फ़िल्म ‘मगधराजमें मोहनतारा और हमीदा बानो के गाए गीतों के अलावा फ़िरोज़ दस्तूर का गाया एक देशभक्ति गीत थाजननी जन्म भूमि माता, तेरा नाता, गोद में तेरी खेलने वालेफ़िल्म के गीतकार थे पंडित इन्द्र और संगीतकार थे बुलो सी. रानी। ‘के. अब्दुल्ला प्रोडक्शन्सके बैनर तले निर्मित फ़िल्महमजोलीमें हफ़ीज़ ख़ान का संगीत था और अंजुम पीलीभीती के गीत थे। नूरजहाँ, जयराज और गुलाम मोहम्मद अभिनीत इस फ़िल्म में नूरजहाँ के गाये अन्य गीतों के अलावा एक देशभक्ति गीत भी थाये देश हमारा प्यारा हिन्दुस्तान जहान से न्यारा, हिन्दुस्तान के हम हैं प्यारे, हिन्दुस्तान हमारा प्याराइस गीत ने स्वाधीनता संग्राम के उस अंतिम चरण में लोगों के दिल को छूआ ज़रूर होगा, पर उस समय यह गीत नूरजहाँ के लिए एक उपहास सिद्ध हुआ क्योंकि अगले ही वर्ष स्वाधीनता के बाद उन्हें हिन्दुस्तान छोड़ पाक़िस्तान जा बसना पड़ा। नूरजहाँ और सुरैया उस ज़माने की सबसे मशहूर अभिनेत्री-गायिकाएँ थीं। इन दोनों ने साथ में 1946 की मशहूर फ़िल्म ‘अनमोल घड़ी’ में काम किया था। इसके अलावा एकल रूप से सुरैया इस वर्ष नज़र आईं ‘उमर ख़य्याम’, जग बीती’, ‘भटकती मैना’, ‘उर्वशी’ और ‘1957’ जैसी फ़िल्मों में। ‘1857’ एक ऐतिहासिक/ देशभक्ति फ़िल्म थी जिसका निर्माणमुरारी पिक्चर्सके बैनर तले हुआ था। सज्जाद हुसैन के संगीत में फ़िल्म के गीत लिखे मोहन सिंह, शेवन रिज़वी, पंडित अंकुर और अंजुम पीलीभीती ने। फ़िल्म में एक समूह गीत था “दिल्ली तेरे क़िले पर होंगे निशां हमारे”। और इसके अगले ही साथ दिल्ली के लाल क़िले की प्राचीर पर पंडित नेहरू ने तिरंगा फहराया।

1943 मेंराजकमल कलामन्दिरकी पहली कामयाब फ़िल्मशकुन्तलाके बाद 1946 में व्ही. शान्ताराम लेकर आएडॉ. कोटनिस की अमर कहानी’, जिसने उनकी प्रतिभा का एक बार फिर से लोहा मनवाया। वसन्त देसाई के संगीत में जयश्री का गाया एक देशभक्ति गीत थाचल आ, चल आ, ग़ुलामी और नहीं तू जोश में आ, ये देश है तेरा”, जिसके बोल और धुन मशहूर चीनी रण-गीतचिलाईपर आधारित था। राजकमलकी 1946 की एक और मशहूर फ़िल्म थीजीवन यात्राजिसके मुख्य कलाकार थे नयन तारा, याकूब, बाबूराव पेण्ढारकर, प्रतिमा देवी प्रमुख। मास्टर विनायक फ़िल्म के निर्देशक थे। आज़ादी के द्वार पर देश आ पहुँचा था। इसलिए फ़िल्मों में भी आज़ादी की ख़ुशी के गीत बनने शुरु होने लगे थे। मनमोहन कृष्ण और साथियों का गाया इस फ़िल्म का एक ऐसा ही गीत थाआओ आज़ादी के गीत गाते चलें, इक सुनहरा संदेसा सुनाते चलें। और फिर आया 15 अगस्त 1947 का वह ऐतिहासिक दिन जो भारत के इतिहास का एक सुनहरा दिन बन गया। एक तरफ़ आया ‘Freedom at Midnight’ और दूसरी तरफ़ प्रदर्शित हुई ‘फ़िल्मिस्तान’ की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ‘शहनाई’। यह फ़िल्म बम्बई के नोवेल्टी थिएटर में प्रदर्शित हुई थी जब पूरा देश आज़ादी की ख़ुशियाँ मना रहा था।शहनाईकी मंगलध्वनियाँ गली-गली गूंज उठीं अमीरबाई और शमशाद बेगम की आवाज़ों के साथ फ़िल्म के शीर्षक गीतहमारे अंगना हो हमारे अंगना, आज बाजे, बाजे शहनाईके रूप में।

ब्रिटिश राज के समाप्त होते ही 1948 में जैसे फ़िल्मों में देशभक्ति और सर चढ़ कर बोलने लगा। ‘हुआ सवेरा’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई, जिसका शीर्षक ही सब कुछ कह देता है। इस फ़िल्म में संगीतकार ज्ञान दत्त के संगीत में दो विजय गीत बने – “क़दम-क़दम पे क़ौम ने जो ज़िल्लतें सहीं.... हिन्दोस्ताँ आज़ाद” और “झण्डा हमारा ये सदा ऊँचा ही रहेगा”। ‘आज़ादी की राह पर’ फ़िल्म
के लगभग सभी गीत देशभक्ति के थे जैसे कि “जाग उठा है हिन्दुस्तान” (समूह गीत), “मेरे चरखे में जीवन का राग सखि” (कविता, साथी), “दिल फ़िदा करते हैं, कुर्बान जिगर करते हैं” (जी. एम. दुर्रानी), “बदल रही है ज़िंदगी” (बी. एस. नानजी), “भारत जननी तेरी जय हो, विजय हो” (नानजी, गान्धारी, साथी) और “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा” (बी. एस. नानजी, साथी)। साहिर लुधियानवी, राम प्रसाद बिस्मिल और श्याम लाल गुप्त की ये रचनाएँ थीं। ‘रोशन पिक्चर्स’ ने दो फ़िल्में बनाईं –‘आज़ाद हिन्दुस्तान’ और ‘देश सेवा’। दोनों के गीत पंडित अनुज ने लिखे और दोनों में संगीत था ए. आर. कुरेशी का। ‘आज़ाद हिन्दुस्तान’ में संदेश साम्प्रदायिक सदभाव की तरफ़ घूम गया और फ़िल्म में कुछ गीत थे “हे भारत के नर-नारी, कैसी बिगड़ी दशा तुम्हारी”, “आपस के झगड़े दूर करो, इन्सान बनो, इन्सान बनो”, “तुम गौर करो, गौर करो, हिन्दू-मुसलमान...”। ‘देश सेवा’ क गीतों में शामिल थे “जाग उठा है देश हमारा” और “आज़ाद हो गया है हिन्दुस्तान हमारा”। 1934 में ‘प्रभात फ़िल्म कंपनी’ संत एकनाथ पर फ़िल्म बनाना चाहते थे ‘महात्मा’ शीर्षक से। पर महात्मा गांधी से इस शीर्षक की समानता की वजह से ब्रिटिश राज की सम्भावित आपत्ति को ध्यान में रखते हुए सेन्सर बोर्ड ने इस शीर्षक की अनुमति नहीं दी, और अंत में फ़िल्म का नाम रखा गयाधर्मात्मा। पर देश आज़ाद होते ही 1948 में गांधी जी पर कम से कम दो फ़िल्में बनीं। एक ती ‘पटेल इण्डिया लिमिटेड, बम्बई’ की वृत्तचित्र ‘गांधीजी और दूसरी थी ‘डॉकुमेण्टरी फ़िल्म लिमिटेड, मद्रास’ की वृत्तचित्र ‘महात्मा गांधी’। इस फ़िल्म के गीतकार थे बी. राजरतनम, कु. प्रेमा और यशवंत भट्ट। ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘मजबूर’ में लता मंगेशकर और मुकेश का गाया नाज़िम पानीपती का लिखा व ग़ुलाम हैदर द्वारा स्वरबद्ध गीत था “अब डरने की बात नहीं अंग्रेज़ी छोरा चला गया”। इस गीत की कल्पना इसके बनने के एक साल पहले भी नहीं की जा सकती थी। मास्टर विनायक द्वारा निर्देशित अंतिम फ़िल्म ‘मंदिर’ में भी दो देश भक्ति गीत थे – “Quit India चले जाओ, हिन्द महासागर की लहरें...” और “जगमग भारत माँ का मंदिर”। इस फ़िल्म में लता मंगेशकर ने अभिनय किया था। क्या इन दो गीतों में उनकी आवाज़ शामिल थी, इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी है। और इसी साल आई शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के जीवन पर आधारित पहली फ़िल्म ‘शहीद’। ‘फ़िल्मिस्तान’ निर्मित इस फ़िल्म में दिलीप कुमार बने भगत सिंह। ग़ुलाम हैदर के संगीत में राजा मेहंदी अली ख़ान का लिखा मोहम्मद रफ़ी, ख़ान मस्ताना और साथियों का गाया देश भक्ति गीत “वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हों” पूरे देश में आग की तरह फैल गया।

50 और 60 के दशकों में बहुत सी देशभक्ति फ़िल्में बनीं और बहुत से फ़िल्मी देशभक्ति गीत बने, जिन्हें बेहद कामयाबी और लोकप्रियता हासिल हुई, जो आज तक राष्ट्रीय पर्वों पर बजाये जाते हैं। अफ़सोस की बात है कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान बनने वाले फ़िल्मी देशभक्ति गीतों को आज हम लगभग भुला चुके हैं और कहीं भी ये सुनाई नहीं देते, जबकि सच्चाई यह है कि इन्हीं गीतों ने स्वाधीनता संग्राम में देशवासियों में राष्ट्रीय एकता की उर्जा पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरफ़ जनसाधारण में राष्ट्रीयता के विचार जगाने का दायित्व और दूसरी तरफ़ ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबंध का डर। इस कठिन स्थिति में उस दौर के फ़िल्मकारों ने जो सराहनीय योगदान दिया है, इस लेख के माध्यम से उन्हें हम झुक कर प्रणाम करते हैं। हमारे स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में इन फ़िल्मी कलाकारों के योगदान को भी सम्माननीय स्थान मिलना ही चाहिए।

समाप्त


आपको हमारा यह विशेष अंक कैसा लगा, हमे अवश्य लिखिए। आपका प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिने-पहेली’ बहुत जल्द नई साज-धज के साथ पुनः आरम्भ होगा। आज के इस विशेष अंक के बारे में आप अपने विचार हमे radioplaybackindia@live.com के पते पर अवश्य अवगत कराएँ। 

शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी

Saturday, February 2, 2013

'सिने पहेली' में आज ताज महल का ज़िक्र


2 फ़रवरी, 2013
सिने-पहेली - 57  में आज 

याद कीजिये 'ताजमहल' वाले गीतों को


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, दुनिया के सात अजूबों में एक अजूबा है 'ताज महल'। ताज महल को प्रेम का स्मारक (Monument of Love) भी कहा गया है। इससे बेहतरीन प्यार की निशानी और कोई हो ही नहीं सकती। सन्‍ -1631 में जब मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की तीसरी पत्नी मुमताज़ महल की 14-वीं सन्तान (गौहरा बेगम) के जन्म के समय मृत्यु हो गई, तब शाहजहाँ शोक में डूब गए थे। मुमताज़ के प्रति उनके दिल में इतना प्यार था कि इसके अगली ही साल, 1632 में उन्होंने मुमताज़ की याद में 'ताज महल' के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया। इसका निर्माण 1648 में जा कर सम्पन्न हुआ, और इसके आस-पास की इमारतों और बगीचों के निर्माण में और 5 साल लग गए। शाहजहाँ ने ताज महल की कुछ इन शब्दों में व्याख्या की थी :


"Should guilty seek asylum here,
Like one pardoned, he becomes free from sin.
Should a sinner make his way to this mansion,
All his past sins are to be washed away.
The sight of this mansion creates sorrowing sighs;
And the sun and the moon shed tears from their eyes.
In this world this edifice has been made;
To display thereby the creator's glory."

दोस्तों, आप सोच रहे होंगे कि 'सिने पहेली' में अचानक आज ताज महल की बातें क्यों? दरसल बात ऐसी है कि आज की पहेली ताज महल के इर्द गिर्द ही घूमेगी। तो आइये, और समय गँवाये बिना सीधे पहुँच जाते हैं आज की पहेली पर।


आज की पहेली : ताज के तराने


दोस्तों, हमारी फ़िल्मों का आधार नायक-नायिका के प्रेम संबंध पर ही केन्द्रित होती आयी है। ऐसे में सबसे बड़ी प्रेम की निशानी, ताज महल, का उल्लेख और चित्रण भी फ़िल्मों में होता आया है। लेकिन अगर फ़िल्मी गीतों की बात करें तो कितने ऐसे गीत आप बता सकते हैं जिनमें 'ताज महल' का शाब्दिक उल्लेख हुआ है? चलिए ज़्यादा न सही, पर कम से कम पाँच गीत तो आप सुझा ही सकते हैं, क्यों? जी हाँ, यही है आज का सवाल। आपको पाँच ऐसे फ़िल्मी गीत बताने हैं जिनके मुखड़े या अन्तरे में 'ताज महल' शब्द आते हैं। हर सही गीत के लिए 2 अंक दिये जायेंगे।


जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 57" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 7 फ़रवरी  शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


पिछली पहेली का हल


1. "सुबह सवेरे सबसे पहले बोलो राम राम... मेरे देशवासियों, अपने देश को सम्भालो" (फ़िल्म: देशवासी, गायक: नितिन मुकेश, अनुराधा पौडवाल, साथी)

2. "चलो झूमते सर से बाँधे कफ़न, लहू माँगती है ज़मीने वतन" (फ़िल्म: काबुली ख़ान, अभिनेत्री: हेलेन)

3. "देखो वीर जवानो" (फ़िल्म 'आक्रमण') व "दे दी हमें आज़ादी" (फ़िल्म: 'जागृति')

4. "मेरे देश की धरती" (फ़िल्म: उपकार, गीतकार: गुल्शन बावरा)



पिछली पहेली का परिणाम

इस बार 'सिने पहेली' में कुल 7 प्रतियोगियों ने भाग लिया। सबसे पहली 100% सही जवाब भेज कर इस बार 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं बीकानेर के श्री विजय कुमार व्यास। विजय जी, बहुत बहुत बधाई आपको। इस बार हमें निराशा हुई कि नियमित खिलाड़ी क्षिति तिवारी जी प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकीं। फिर भी वो तीसरे पायदान पर विराजमान हैं। आइए अब नज़र डालते हैं इस सेगमेण्ट के अब तक के सम्मिलित स्कोरकार्ड पर।




नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।


कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। पाँचवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार। 

Monday, July 2, 2012

आपके नाम भी हो सकता है 5000 रुपये का इनाम, आज से ही भाग लीजिए 'सिने-पहेली' में


सिने-पहेली # 27 (2 जुलाई, 2012) 


'सिने पहेली' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हमारे कुछ प्रतियोगियों ने हमें यह सूचित किया है कि 'सिने पहेली' में सोमवार से शुक्रवार तक का समय होने की वजह से उन्हें जवाब भेजने में परेशानी हो रही है क्योंकि इनमें कोई छुट्टी का दिन शामिल नहीं है, इसलिए हमें 'सिने पहेली' का दिन इस तरह से निर्धारित करना चाहिए ताकि शनिवार और रविवार जवाब भेजने वाले दिनों में शामिल हो जाए। तो दोस्तों, इसके जवाब में हम फ़िलहाल यही कहना चाहेंगे कि ऐसा कर पाना अभी मुमकिन नहीं है क्योंकि 'सिने पहेली' पोस्ट करने के लिए हमें भी छुट्टी के दिन की ज़रूरत पड़ती है। हाँ, हम इतना ज़रूर कर सकते हैं कि शुक्रवार की जगह अब आप शनिवार शाम 5 बजे तक अपना जवाब भेज सकते हैं। इस तरह से अब आपको शनिवार का पूरा दिन मिल गया जवाबों को ढूंढ कर हमें भेजने के लिए। चलिए शुरू करते हैं आज की पहेली


आज की पहेली: गान पहचान 

दोस्तों, आज बहुत दिनों बाद हम रुख़ कर रहे हैं ऑडियो की तरफ़। हमने ख़ास आपके लिए तैयार किया है एक फ़िल्मी मेडली। सुनिए इस मेडली को और पहचानिए इस मेडली में शामिल गीतों को। हर सही गीत के पहचानने पर आपको मिलेंगे 1 अंक।





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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

२. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 27" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम व स्थान लिखें।

३. आपका ईमेल हमें शनिवार 7 जुलाई शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद की प्रविष्टियों को शामिल कर पाना हमारे लिए संभव न होगा।

४. आप अपने जवाब एक ही ईमेल में लिखें। किसी प्रतियोगी का पहला ईमेल ही मान्य होगा। इसलिए सारे जवाब प्राप्त हो जाने के बाद ही अपना ईमेल भेजें।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और 100 एपिसोड्स (10 सेगमेण्ट्स) के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा जिन्हे दिया जाएगा 5000 रुपये का नगद इनाम। 


और अब पिछले सप्ताह पूछे गए सवालों के सही जवाब...

'सिने पहेली - 26' के सही जवाब 




१) सलेटी (GREY) - छम छमा छम, आसमान और बाज़ - तीनों फिल्मों में ओ पी नैयर का संगीत था। ये तीनों नय्यर साहब की पहली तीन फ़िल्में थीं।

२) नारंगी (ORANGE) - काला पत्थर, क़ानून और अचानक - तीनों फ़िल्मों का पार्श्व संगीत सलिल चौधरी ने तैयार किया था। तीनों फिल्मों के मुख्य पात्र पर हत्या/ अपराध का आरोप है। तीनों फ़िल्मों के लिए फ़िल्म के निर्देशक को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का नामांकन मिला था फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार में।

३) लाल (RED) - "दीवाना मुझसा नहीं" जुमले वाला गीत शम्मी कपूर पर 'तीसरी मंज़िल' फ़िल्म में फ़िल्माया गया था, और आमिर ख़ान पर भी 'दीवाना मुझसा नहीं' फ़िल्म का शीर्षक गीत फ़िल्माया गया था जिसे उदित नारायण ने गाया था।

४) भूरा (BROWN) - शंकर राव, अविनाश और भरत - तीनों का पारिवारिक नाम व्यास है। 

५) गुलाबी (PINK) - सुधा मल्होत्रा, मुकेश और तलत महमूद - इन तीनों गायकों को हिन्दी फ़िल्म में प्लेबैक करने का पहला मौका संगीतकार अनिल बिस्वास ने दिया था।

६) नीला (BLUE) - कुदरत, मधुमती और नील कमल - तीनों फिल्मों की कहानी पुनर्जन्म पर आधारित है। 

७) आसमानी (SKY) - आतिफ़ असलम, ज़ेबा बख्तियार और राहत फ़तेह अली खां - तीनों पाकिस्तान से आये कलाकार हैं।

८) पीला (YELLOW) - रफू चक्कर, क़िस्मत और बाज़ी- तीनों फिल्मों के नायक स्त्री वेश में गाना गाते हैं। 

९) प्याजी (ONION)- तुम मिले, आप तो ऐसे न थे और साया - तीनों फिल्मों में एक गीत ऐसा है जिसके तीन संस्करण है - 'आप तो ऐसे न थे' में "तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है" को रफ़ी, हेमलता और मनहर ने गाया है। 'तुम मिले' का शीर्षक गीत जावेद अली, नीरज श्रीधर और शफ़कत अमानत अली ने गाया है। 'साया' का "दिल चुरा लिया" गीत सोनू निगम, श्रेया घोषाल और उदित-अलका ने गाया है।

१०) हरा (GREEN) - संगम, साजन और हम दिल दे चुके सनम - तीनों फ़िल्में प्रेम-त्रिकोण की कहानी पर आधारित है और एक नायक को अपने प्यार की कुर्बानी देनी पड़ती है।

चलिए अब 'सिने पहेली # 26' के विजेयताओं के नाम ये रहे -----

'सिने पहेली - 26' के विजेता 


1. शुभ्रा शर्मा, नयी दिल्ली --- 10 अंक 
2. सलमन ख़ान, अलीगढ़ --- 10 अंक 
3. अल्पना वर्मा, अल आइन, यू.ए.ई --- 10 अंक 
4. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 10 अंक 
5. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 10 अंक 
6. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 10 अंक 
7. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 10 अंक 
8. रीतेश खरे, मुंबई --- 10 अंक 
9. अमित चावला, दिल्ली --- 10 अंक 
10. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 5 अंक 
11. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 1 अंक 

पंकज मुकेश ने हमें सूचित किया है  वो पूरा सप्ताह थे, फिर भी 'सिने पहेली' के समय-सीमा समाप्त होने से थोड़ी देर पहली जितना हो सका उतने का जवाब भेज दिया। पंकज जी, हम आपके स्पोर्ट्समैनशिप की दाद देते हैं कि इस तरह की खेल भावना से इस प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं। चाहे प्रतियोगिता में जीत किसी की भी हो, असली जीत उसी की होती है जो एक सच्चे खिलाड़ी की मनोभावना से प्रतियोगिता में भाग लेता है। आपके जल्द कुशलता की हम कामना करते हैं।

'सिने पहेली' प्रतियोगिता के तीसरे सेगमेण्ट में अब तक का सम्मिलित स्कोर-कार्ड यह रहा...


इस तरह से हम देखते हैं कि अब तक की लड़ाई में प्रकाश गोविंद, सलमन ख़ान और क्षिति तिवारी सबसे उपर चल रहे हैं, और उनके बिल्कुल कंधे पर सांसें डाल रहे हैं शुभ्रा शर्मा और रीतेश खरे।गौतम केवलिया, पंकज मुकेश और शरद तैलंग ने भी अच्छी लड़ाई लड़ी है अब तक। देखते हैं तीसरे सेगमेण्ट का विनर कौन बनता है। बड़ा दिलचस्प मोड़ ले चुका है यह सेगमेण्ट!

सभी प्रतियोगियों को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। 

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी १००% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, आपकी और मेरी दोबारा मुलाक़ात होगी अगले सोमवार इसी स्तंभ में, नमस्कार!

Monday, February 13, 2012

सिने-पहेली # 7

सिने-पहेली # 7 (13 फ़रवरी 2012)

रेडियो प्लेबैक इण्डिया के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! दोस्तों, 'सिने-पहेली' की सातवीं कड़ी लेकर मैं हाज़िर हूँ। दोस्तों, 'सिने पहेली' के महाविजेता बनने की जो हमने योजना रखी है, उसमे थोड़ी तबदीली की ज़रूरत है, ऐसा हम सब महसूस कर रहे हैं। दरसल बात ऐसी है कि महाविजेता वही बनेगा जो ५०-वें अंक तक सबसे ज़्यादा अंक अर्जित करेगा। पर ज़रा सोचिए उन प्रतियोगियों का क्या जो २० या ४०-वे अंक से जुड़ने वाले होंगे। अब वो भला औरों के साथ कैसे कम्पीट करें? यानी कि ५० अंकों का जो सफ़र है महाविजेता बनने का, यह बहुत लम्बा है। इसलिए हमने यह निर्णय लिया है कि १० - १० अंकों में इस प्रतियोगिता को विभाजित कर दस अंकों के सेगमेण्ट्स बनाया जाए, और हर दसवें अंक के बाद उस सेगमेण्ट का विजेता घोषित कर दिया जाये। इस तरह से १००-वें अंक तक जो प्रतियोगी सबसे ज़्यादा सेगमेण्ट विजेता बना होगा, वही होगा 'सिने पहेली' का महाविजेता। आज सातवीं कड़ी है, देखते हैं दसवी कड़ी के बाद कौन बनता है इस पहले सेगमेण्ट का विनर? देखते हैं किसमे है दस का दम? चलिए शुरु किया जाए आज की 'सिने-पहेली'।


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सवाल-1: गोल्डन वॉयस

गोल्डन वॉयस में आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं हिन्दी फ़िल्मों के पहले दौर के एक जानेमाने गायक-अभिनेता की आवाज़। सुनिये गीत का यह अंश और पहचानिए गायक को।



सवाल-2: पहचान कौन!

दूसरे सवाल के रूप में आपको हल करने हैं एक चित्र पहेली का। नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए। चित्र देखकर आपको अंदाज़ा लगाना है गीत का। जी हाँ, बताइए यह किस गीत का दृश्य है? आपको बताने हैं गीत के बोल।



सवाल-3: सुनिये तो...


'सुनिये तो'.... में आज हम आपको सुनवा रहे हैं ९० के दशक के एक फ़िल्म के हिट गीत का शुरुआती संगीत। फ़िल्म में माधुरी दीक्षित ने अभिनय किया था। क्या आप बता सकते हैं यह कौन सा गीत है?



सवाल-4: बताइये ना!

और अब चौथा सवाल। हाल में "कोलावरी डी" ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया था। इस गीत का भावार्थ चाहे कुछ भी हो, क्या आप बता सकते हैं "कोलावरी डी" का क्या शाब्दिक अर्थ है? चलिए तीन ऑपशन्स आपको दे रहे हैं।
अ) प्रेम के लिए इतनी व्याकुलता क्यों है?
ब) हत्या करने के लिए इतना आक्रोश क्यों है?
स) हर तरफ़ जुदाई क्यों है?


सवाल-5: गीत अपना धुन पराई

और अब पाँचवा और आख़िरी सवाल। सुनिये इस विदेशी गीत को और बताइए कि वह कौन सा हिन्दी फ़िल्मी गीत है जिसकी धुन इस विदेशी लोक गीत की धुन से प्रेरीत है? और आपको यह भी बताना है कि मूल गीत किस देश का लोक गीत है। याद रहे दोनों जवाब सही होने पर ही अंक दिये जायेंगे।



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तो दोस्तों, हमने पूछ लिए हैं आज के पाँचों सवाल, और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. अगर आपको सभी पाँच सवालों के जवाब मालूम है, फिर तो बहुत अच्छी बात है, पर सभी जवाब अगर मालूम न भी हों, तो भी आप भाग ले सकते हैं, और जितने भी जवाब आप जानते हों, वो हमें लिख भेज सकते हैं।

२. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

३. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 7" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम, स्थान और पेशा लिखें।

४. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 17 फ़रवरी तक मिल जाने चाहिए।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और पचासवे अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा।

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और अब 6 फ़रवरी को पूछे गए 'सिने-पहेली # 6' के सवालों के सही जवाब---

१. पहले सवाल 'गोल्डन वॉयस' में हमने आपको जो आवाज़ सुनवाई थी, वह आवाज़ थी गायिका उषा तिमोथी की।

२. 'चित्र-पहेली' में दिखाए गए चित्र में मुकेश के सामने की पंक्ति में उनके बायीं ओर खड़ी हैं लता मंगेशकर और दायीं ओर मीना कपूर।

३. 'सुनिये तो' में जिस गीत का अंतरा सुनवाया गया था, उसका मुखड़ा है "जानेमन जानेजान"। यह १९८३ की अप्रदर्शित फ़िल्म 'चोर मंडली' का गीत है जिसे मुकेश ने किशोर कुमार और दिलराज कौर के साथ मिलकर गाया था।

४. 'भूले-बिसरे' में हमारा सवाल था कि मुकेश और लता मंगेशकर को साथ में किस संगीतकार ने सर्वप्रथम गवाया था। सही जवाब फ़िल्म 'मजबूर' के लिए मास्टर ग़ुलाम हैदर।

५. 'गीत अपना धुन पराई' में जो विदेशी गीत सुनवाया था, उससे प्रेरीत हिन्दी गीत है फ़िल्म 'जिस देश में गंगा बहती है' का "आ अब लौट चलें"।

और अब 'सिने पहेली # 6' के विजेताओं के नाम ये रहे -----

1. प्रदीप शर्मा, दिली --- 5 अंक
2. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 5 अंक
3. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 5 अंक
4. रीतेश खरे --- 2 अंक
5. क्षिति तिवारी, इन्दौर --- 1 अंक


आप सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आप को किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। जिन पाठकों नें इसमें भाग लिया पर सही जवाब न दे सके, उनका भी हम शुक्रिया अदा करते हैं और अनुरोध करते हैं कि अगली पहेली में भी ज़रूर भाग लीजिएगा। तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह आपसे इसी स्तंभ में दोबारा मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

Wednesday, January 18, 2012

"सैगल ब्लूज़" - सहगल साहब की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजली एक नए अंदाज़ में


कुंदनलाल सहगल को इस दुनिया से गए आज ६५ वर्ष हो चुके हैं, पर उनकी आवाज़ आज भी सर चढ़ के बोल रहा है। फ़िल्म 'डेल्ही बेली' में राम सम्पत और चेतन शशितल नें सहगल साहब को श्रद्धांजली स्वरूप जिस गीत की रचना की है, उसी की चर्चा सुजॉय चटर्जी के साथ, 'एक गीत सौ कहानियाँ' की तीसरी कड़ी में...

एक गीत सौ कहानियाँ # 3

हिन्दी सिनेमा के प्रथम सिंगिंग् सुपरस्टार के रूप में कुंदनलाल सहगल के नाम से हम सभी भली-भाँति वाक़िफ़ हैं। फ़िल्म-संगीत की जब शुरुआत हुई थी, तब वह पूर्णत: शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और नाट्य संगीत से प्रभावित थी। कुंदनलाल सहगल और न्यु थिएटर्स के संगीतकारों नें फ़िल्म-संगीत को अपनी अलग पहचान दी, और जनसाधारण में अत्यन्त लोकप्रिय बनाया। जब भी कभी फ़िल्म-संगीत का इतिहास लिखा जाएगा, सहगल साहब का नाम सबसे उपर स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। सहगल साहब की आवाज़ और गायकी का ३० और ४० के दशकों में कुछ ऐसा क्रेज़ था कि अगली पीढ़ी के नवोदित गायक उन्हीं की शैली को अनुकरण कर संगीत के मैदान में उतरते थे। तलत महमूद, मुकेश और किशोर कुमार तीन ऐसे बड़े नाम हैं जिन्होंने अपनी शुरुआत सहगल साहब को गुरु मान कर की थी। पर बाद में अपना अलग स्टाइल ज़रूर अख़्तियार कर लिया था। लेकिन अगर किसी गायक नें ता-उम्र सहगल साहब की शैली में गाते रहे, तो वो थे सी. एच. आत्मा। सिर्फ़ वो ही नहीं, उनके बेटे चन्द्रू आत्मा नें भी सहगल अंदाज़ में गीत गाए।

कुंदनलाल सहगल को गुरु मानने वाले या उनसे मुतासिर होने वालों की फ़ेहरिस्त तलत, मुकेश, किशोर, सी. एच. आत्मा और चन्द्रू आत्मा पर आकर ही समाप्त नहीं हो जाती, आज भी सहगल साहब के चाहने वालों की संख्या हज़ारों, लाखों में है। और इनमें एक हैं इस दौर के संगीतकार राम सम्पत। 'आमिर ख़ान प्रोडक्शन्स' की २०११ की चर्चित फ़िल्म 'डेल्ही बेली' में राम सम्पत नें कुंदनलाल सहगल को श्रद्धांजली स्वरूप एक गीत कम्पोज़ किया है "सैगल ब्लूज़" (Saigal Blues) शीर्षक से। सहगल को दर्द का पर्याय माना जाता है, इसलिए 'सैगल ब्लूज़' भी टूटे हुए दिल की ही पुकार है। सहगल शैली का आधुनिक रूप कहा जा सकता है 'सैगल ब्लूज़' को। सहगल शैली और ब्लूज़ जौनर का फ़्युज़न है यह गीत जिसे राम सम्पत और चेतन शशितल नें मिलकर लिखा है और चेतन शशितल नें बिल्कुल सहगल अंदाज़ में गाया है। गीटार पर कमाल किया है रूडी वलांग और हितेश धुतिया नें। जब भी इस तरह का कोई नवीन प्रयोग किया जाता है, और ख़ास कर किसी महान कलाकार का अनुकरण किया जाता है, तो उस पर मिली-जुली प्रतिक्रियायें मिलती हैं; इस गीत के साथ भी यही हुआ। यूं तो अधिकतर लोगों और समालचकों नें इस गीत को "थम्स-अप" ही दिया, पर कुछ लोगों को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। उन्हें यह सहगल का अपमान महसूस हुआ। इन्टरनेट को खंगालने पर मुझे इसके दो कारण हाथ लगे - पहला यह कि गायक नें सहगल के नैज़ल अंदाज़ की नकल की है, और दूसरी, सहगल शैली के गीत को पाश्चात्य रंग देकर (फ़्युज़न के ज़रिए) सहगल जौनर को दूषित किया है।

"दुनिया में प्यार जब बरसे, न जाने दिल यह क्यों तरसे, हाय, इस दिल को कैसे समझाऊँ, पागल को कैसे मैं मनाऊँ, इस दर्द की न है दवाई, मजनूं है या तू है कसाई...", यही है 'सैगल ब्लूज़' गीत के बोल। जब इसके संगीतकार राम सम्पत से इस बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब था - "मैं के. एल. सहगल साहब का बहुत बड़ा फ़ैन हूँ। मैं समझता हूँ कि सहगल साहब भारत का सबसे महान "ब्लूज़ सिंगर" हैं। मैंने 'डेल्ही बेली' फ़िल्म के निर्देशक अभिनय देव और गायक-गीतकार चेतन शशितल से इस बारे में कई साल पहले ही बात की थी कि मैं सहगल साहब को एक "ब्लूज़ ट्रिब्युट" देना चाहता हूँ। पर कोई सिचुएशन या फ़िल्म ऐसी नहीं बन रही थी जिसमें मेरा यह सपना सच हो सके। 'डेल्ही बेली' इस गीत को लौंच करने के लिए सटीक माध्यम मुझे महसूस हुआ। फ़िल्म का साउण्डट्रैक इस गीत के लिए पर्फ़ेक्ट था और आमिर ख़ान जैसे निडर निर्माता के होते मुझे किस बात की फ़िक्र थी! आमिर ख़ान को पुराने समय और इतिहास से बहुत लगाव है। मेरे इस सुझाव को उन्होंने हाथोंहाथ स्वीकार कर लिया। मुझे आशा है कि इस गीत के माध्यम से हम लोगों को, ख़ास कर इस पीढ़ी के लोगों को के. एल. सहगल की गायकी से अवगत करा पाएंगे।" एक अन्य इन्टरव्यू में राम सम्पत नें बताया कि यूं तो 'डेल्ही बेली' के कई गीत हिट हुए हैं जैसे कि "भाग डी के बोस", "स्विट्टी स्विट्टी", "आइ हेट यू", "बेदर्दी राजा", "जा चुड़ैल", लेकिन जो गीत उनके दिल के सबसे करीब है, वह है "सैगल ब्लूज़"। "मुझे ख़ास तौर से 'सैगल ब्लूज़' पर गर्व है क्योंकि लोग यह समझ रहे हैं कि यह सहगल साहब का ही गाया हुआ कोई गीत है जिसका रीमिक्स हुआ है, जबकि हक़ीक़त यह कि यह मेरा ऑरिजिनल कम्पोज़िशन है और गीत के बोल भी बिल्कुल नए हैं", राम सम्पत नें एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में बताया। सम्पत नें यह भी बताया कि इस फ़िल्म के संगीत निर्माण में आमिर ख़ान का भी बड़ा योगदान रहा है।

उधर चेतन शशितल का नाम बहुत अधिक लोगों नें नहीं सुना होगा। आपको याद होगा २००४ में ऐश्वर्या राय और विवेक ओबेरॉय की फ़िल्म आई थी 'क्यों.. हो गया न!', जिसमें एक गीत था "बात समझा करो", उस गीत में चेतन की आवाज़ थी शंकर महादेवन और जावेद अली के साथ। उसी साल 'दि किंग ऑफ़ बॉलीवूड' फ़िल्म के लिए भी उन्होंने गाया था। उसके बाद चेतन एक बार फिर से गुमनामी में चले गए, पर 'सैगल ब्लूज़' के साथ जैसे रातों रात वो छा गए। हालाँकि इस गीत को वह लोकप्रियता नहीं मिली, या यूं कहे कि इस गीत को फ़िल्म के दूसरे गीतों के मुकाबले कम प्रोमोट किया गया, पर इस फ़िल्म के संगीत से जुड़े सभी कलाकारों को यह गीत अत्यन्त प्रिय है। चेतन शशितल नें बताया कि इस गीत को उन्होंने दो साल पहले ही रेकॉर्ड कर लिया था। चेतन बताते हैं, "राम (सम्पत) 'डेल्ही बेली' के बैकग्राउण्ड पर काम कर रहे थे और वो मुझसे कुछ प्रयोगधर्मी चीज़ चाहते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि क्यों न मैं सहगल साहब की आवाज़ में गाऊँ? उस वक़्त हमें ज़रा सा भी अन्दाज़ा नहीं था कि यह बात हमें किस मुकाम तक ले जायेगी। शुरुआत में जब यह गीत रेकॉर्ड हुआ तो केवल वोकल और ड्रम्स का इस्तमाल हुआ था, पर सम्पत नें बाद में इसे जो रूप दिया, मैं तो हैरान रह गया। मुझे तो अन्त तक यह मालूम ही नहीं था कि इस गीत को 'डेल्ही बेली' के साउण्डट्रैक में शामिल कर लिया गया है। जब भी मेरी राम सम्पत से मुलाक़ात होती तो मैं यह ज़रूर पूछता कि अपने गाने का क्या हुआ? एक दिन उन्होंने मुझे आकर बताया कि आमिर ख़ान और अभिनय देव नें इस गीत को सुना है और उन्हें पसन्द भी आया है। मैंने जब गीत का फ़ाइनल वर्ज़न सुना तो वह बिल्कुल अलग ही बन चुका था।"

चेतन शशितल ख़ुद एक अच्छे गायक हैं, जो पिछले १७ वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत सीख रहे हैं। शशितल नें यह साफ़ बताया कि इस गीत को गाते हुए उनका यह कतई उद्देश्य नहीं था कि सहगल साहब जैसे महान कलाकार की नकल कर उन पर कोई व्यंग किया जाये या उनका मज़ाक उडाया जाये! यह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक श्रद्धांजली थी उस पूरे दौर के नाम। "यह गीत सुनने में बिल्कुल सहगल की शैली का लगता है। उस दौर की यही ख़ास बात थी कि गानें इसी अंदाज़ में गाए जाते थे। उस दौर के अन्य गायक, जैसे जगमोहन, श्याम और सुरेन्द्र, भी इसी अंदाज़ में गाया करते थे। अगर आप इस गीत को सुनें, तो शायद आपको सहगल साहब की याद आये, पर मेरे लिए यह गीत केवल सहगल साहब को ही नहीं, बल्कि उस पूरे दौर को श्रद्धांजली है। For me it was more about recreating the voice of that era. अफ़सोस की बात है कि जब लोग नकल करते हैं, तो वो उस कलाकार के कमी को ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं, और तब ऐसा लगता है जैसे उस कलाकार का व्यंग किया जा रहा हो। पर हमने ऐसा नहीं किया।" आज जहाँ सहगल की आवाज़ केवल 'विविध भारती' के 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम में ही सुनाई देती है, ऐसे में आज की युवा पीढ़ी को सहगल से मिलवाने में 'डेल्ही बेली' का यह गीत शायद ज़्यादा कारगर होगा। आज सहगल को गए ६५ वर्ष बीत चुके हैं, पर उनकी आवाज़ का जादू आज भी सर चढ़ कर बोलता है, और इसका प्रमाण है 'डेल्ही बेली' का "दुनिया में प्यार जब बरसे"।

फ़िल्म 'डेल्ही बेली' से "दुनिया में प्यार जब बरसे..." सुनने के लिए नीचे प्लेयर में क्लिक करें...



तो दोस्तों, आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर उपस्थित हो‍ऊंगा, अनुमति दीजिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

Monday, December 26, 2011

जीना क्या अजी प्यार बिना ....जीवन में नहीं कुछ भी इसके सिवा दोस्तों


आशा भोसले, किशोर कुमार और साथियों की आवाज़ों में राहुल देव बर्मन की यह कम्पोज़िशन बनी थी मजरूह सुलतानपुरी के बोलों पर। १९८० की इस फ़िल्म में ऋषी कपूर और नीतू सिंह की हिट जोड़ी नज़र आई थी। वैसे यह फ़िल्म 'खेल खेल में', 'दूसरा आदमी', 'रफ़ू चक्कर' जैसी फ़िल्मों की तरह सुपरहिट तो नहीं थी और न ही फ़िल्म के अन्य गीतों नें लोगों के दिलों में कुछ ख़ास जगह बनाई, पर फ़िल्म का यह शीर्षक गीत ख़ूब चला था।

Tuesday, November 29, 2011

ऐ मेरे उदास मन चल दोनों कहीं दूर चलें...येसुदास ने अपने सबसे बेहतरीन गीत गाये दादु के लिए

एक दिन बासु भट्टाचार्य जी ने येसुदास को लाकर कहा कि यह लड़का गाएगा, इसे सुन लो। हम लोग अमोल पालेकर के लिए एक नई आवाज़ की तलाश कर रहे थे, तो येसुदास जी की आवाज़ उन पर बिल्कुल फ़िट हो गई, बहुत ही अच्छे गुणी कलाकार हैं। और यह जो गाना है न, "जब दीप जले आना", इसकी धुन मैंने पहले कलकत्ते में तैयार किया था एक नाटक के लिए, 'मृच्छ कटिका'। इसके बाद हम तो चल पड़े, मंज़िल की जिसको धुन हो, उसे कारवाँ से क्या!" दोस्तों, इसी बात पर येसुदास का गाया फ़िल्म 'मान अभिमान' का वह गीत यकायक याद आ गया, जिसके बोल हैं "ऐ मेरे उदास मन चल दोनों कहीं दूर चलें, मेरे हमदम, तेरी मंज़िल, ये नहीं ये नहीं कोई और है

Tuesday, October 25, 2011

ज़िन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो....आशा के स्वर जगजीत के सुरों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 773/2011/213

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों हम श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह को, जिनका पिछले १० अक्टूबर को देहावसान हो गया। 'जहाँ तुम चले गए' शृंखला की कल की कड़ी में हमने लता जी का शोक-संदेश आप तक पहुंचाया था, आइए आज कुछ और शोक-संदेश पढ़ें। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नें कहा कि जगजीत सिंह अपने गोल्डन वायस के लिए हमेशा याद किए जायेंगे। उनके शब्दों में - "by making ghazals accessible to everyone, he gave joy and pleasure to millions of music lovers in India and abroad....he was blessed with a golden voice. The ghazal maestro’s music legacy will continue to “enchant and entertain” the people." गीतकार जावेद अख़्तर बताते हैं, "जगजीत सिंह की मृत्यु नें हिन्दी फ़िल्म और म्युज़िक इंडस्ट्री को कभी न पूरी होने वाले क्षति पहुँचाई है। मैंने उनको पहली बार स्कूल में रहते हुए सुना था जब मैं IIT Kanpur के एक कार्यक्रम में गया था, वह था 'Music Night by Jagjit Singh and Chitra'।" शास्त्रीय गायिका शुभा मुदगल नें कहा - "He was an icon. There is nothing I can say to console his wife (Chitra). All I can say is that he will never be forgotten. I pray to God to give her the strength to recover from the loss."

आज की कड़ी के लिए हमने जिस गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'राही' का। फ़िल्म में संगीत जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का था। 'राही' १९८७ की फ़िल्म थी जिसमें संजीव कुमार, शत्रुघ्न सिंहा और स्मिता पाटिल नें मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। लखन सिंहा निमित व रमण कुमार निर्देशित इस फ़िल्म में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह के गाये गीत तो थे ही, साथ ही आशा भोसले, सुरेश वाडकर, महेन्द्र कपूर, मीनू पुरुषोत्तम और भुपेन्द्र के गाये गीत भी शामिल थे। फ़िल्म ज़्यादा नहीं चली, इसके गानें भी अनसुने ही रह गए, पर एक गीत जो रेडियो पर काफ़ी गूंजा, वह था जगजीत जी की एकल आवाज़ में ज़िन्दगी से भरपूर "ज़िन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो, फ़ासले कम करो, दिल मिलाते रहो"। आज जब जगजीत जी हमारे बीच नहीं है, इस गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि वो यहीं कहीं आसपास हैं। यह गीत ही इतना आशावादी है, ज़िन्दगी से लवरेज़ है कि इस गीत को सुनते हुए यह कल्पना करना मुश्किल हो जाता है कि इसे गाने वाला शारीरिक रूप से हमारे साथ नहीं है। आइए इस गीत को सुनें और उनके कहेनुसार मुस्कुरायें और उनके मुस्कुराते हुए चेहरे को याद करें। गीतकार हैं नक्श ल्यालपुरी।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
आशा की आवाज़ में है ये गीत जगजीत द्वारा संगीतबद्ध

पिछले अंक में
एक बार फिर अमित जी एकदम सही हैं आप
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, October 24, 2011

सिंदूर की होय लम्बी उमरिया...जगजीत और लता जी की पहली भेंट

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 772/2011/212

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कल से हमने शुरु की है मशहूर ग़ज़ल गायक व संगीतकार स्वर्गीय जगजीत सिंह को श्रद्धांजली स्वरूप हमारी ख़ास शृंखला 'जहाँ तुम चले गए'। उनका जाना ग़ज़ल-जगत के लिए एक विराट क्षति है जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकती। स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर नें अपने शोक संदेश में एक निजी न्यूज़ चैनल को बताया, "इस बात का मुझे बहुत दुख है, बहुत ही ज़्यादा दुख है कि जगजीत जी आज हमारे बीच नहीं रहे। मैंने उनके साथ काम किया है, और एक ही रेकॉर्ड किया था, और वो उस वक़्त बहुत चला था। और मुझे वो सब बातें याद आती हैं कि कैसे उन्होंने वह गाना रेकॉर्ड किया था, कैसे वो मुझे सिखाते थे, क्या क्या बातें होती थीं, सब। पहले तो वो मुझे गानें पढ़ के सुनाये, ग़ज़लें जो थीं, फिर कहा कि जो पसन्द नहीं आती हैं, वो मत गाइए। मैंने कहा कि नहीं ऐसी बात नहीं है, सभी ग़ज़लें अच्छी हैं। और जब उन्होंने रिहर्सल्स शुरु किए तो एक चीज़ वो बताते थे कि ऐसा नहीं वैसा होना चाहिए, इस तरह से नहीं इस तरह से गाना चाहिए, मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं एक नई सिंगर आई हूँ और मुझे कोई सिखा रहा है। इस तरह से उन्होंने वो रेकॉर्ड किया था। और मेरे साथ बहुत अच्छी बात करते थे, हालाँकि हमारा मिलना नहीं होता था, बहुत कम मिलते थे, कभी-कभार, पर जब भी मिलते थे, बहुत अच्छी तरह से बात करते थे। उनकी ख़ास बात जो थी, वो क्लासिकल सिंगर थे, रियाज़ किया करते थे, अब तक वो रियाज़ करते थे, और रियाज़ करते हुए उन्होंने अपनी आवाज़ बदली और अपनी आवाज़ बदलकर वो गाने लगे, उन्होंने जो जो ग़ज़लें गाई हैं, वो सब बहुत अलग तरह से गाई हैं। उनके जैसा भारत में ग़ज़ल सिंगर और कोई है नहीं। उनकी बहुत सी ग़ज़लें हैं जो मुझे पसन्द है। "सरकती जाये है" जो उन्होंने गाई थी, शायद उनकी पहली ग़ज़ल थी, आपको याद होगा वह बहुत चली थी, बहुत अच्छा गाया था उन्होंने।"

'दि टाइम्स ऑफ़ इण्डिया' को दिए एक साक्षात्कार में लता जी नें कहा उन्होंने पहली बार जगजीत सिंह का नाम तब सुना जब वो संगीतकार मदन मोहन के लिए कोई गाना रेकॉर्ड कर रही थीं। लता जी नें बताया, "मैंने मदन भैया से पूछा कि वो क्यों इस नए गायक से अपनी ग़ज़लें नहीं गवाते? शायद उस वक़्त जगजीत जी की आवाज़ उस वक़्त के हीरोज़ को सूट नहीं करती थी। लेकिन जब मैंने उनकी आवाज़ सुनी तो हैरान रह गई। मैं उस वक़्त के संगीतकारों को बताया करती थी उनकी आवाज़ के बारे में। पर शायद उनकी आवाज़ ग़ैर फ़िल्म-संगीत के लिए ही बनी थी। लेकिन बाद में वो फ़िल्मों में भी गाए और कई अभिनेताओं के लिए गाए। शुरु शुरु में 'सजदा' में केवल मेरी आवाज़ और जगजीत जी का संगीत होना था। यह एक मौका था जब मुझे उस कलाकार के साथ काम करने का मौका मिला जिनकी आवाज़ मैं मैं बरसों से पसन्द करती आई थी। इसलिए मैं इस मौके को गँवाना नहीं चाहती थी। मैंने उनसे बस इतनी गुज़ारिश की कि वो मुझसे शराब और महख़ाने की ग़ज़लें न गवाएँ। जब मैंने "दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह" गाया तो वो बड़े भावुक हो गए थे। वो अपनी ज़िन्दगी के एक दर्दनाक हादसे से गुज़र रहे थे और इस ग़ज़ल नें उनके दिल को छू लिया था। लेकिन इस ऐल्बम के जिस ग़ज़ल को उन्हें और उनकी पत्नी चित्रा को सबसे ज़्यादा पसन्द आई, वो थी "धुआँ बनके फ़िज़ा में उड़ा दिया मुझको"। दोस्तों, लता जी नें बार बार कहा कि जगजीत जी के साथ उन्होंने केवल 'सजदा' में ही काम किया, पर जहाँ तक मेरा ख़याल है कि १९८९ में एक फ़िल्म आई थी 'कानून की आवाज़', जिसमें संगीत था जगजीत सिंह था और इस फ़िल्म में उन्होंने लता जी से एक गीत गवाया था "सिंदूर की होय लम्बी उमरिया, मेरा जुग जुग जिये सांवरिया"। इंदीवर का लिखा यह गीत जया प्रदा पे फ़िल्माया गया था। आइए आज इसी गीत का आनन्द लिया जाये।



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
खुद जगजीत की आवाज़ में ये गीत है जिसके मुखड़े में शब्द है - "फासले", गीतकार है नक्श ल्यालपुरी

पिछले अंक में
अमित जी सच बताईये क्या आपने ये गीत पहले सुना था, मैंने तो नहीं सुना था कभी :)
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, October 20, 2011

माँ ही गंगा...जात्रागान शैली का ये गीत नीरज की कलम से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 770/2011/210

पूर्वी और पुर्वोत्तर भारत के लोक-धुनों और शैलियों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'पुरवाई' की अन्तिम कड़ी में आप सभी का मैं सुजॉय चटर्जी, साथी सजीव सारथी के साथ फिर एक बार स्वागत करता हूँ। दोस्तों, सिनेमा के आने से पहले मनोरंजन का एक मुख्य ज़रिया हुआ करता था नाट्य, जो अलग अलग प्रांतों में अलग अलग रूप में पेश होता था। नाट्य, जिसे ड्रामा या थिएटर आदि भी कहते हैं, की परम्परा कई शताब्दियों से चली आ रही है इस देश में, और इसमें अभिनय, काव्य और साहित्य के साथ साथ संगीत भी एक अहम भूमिका निभाती आई है। प्राचीन भारत नें संस्कृत नाटकों का स्वर्ण-युग देखा। उसके बाद ड्रामा का निरंतर विकास होता गया। जिस तरह से अलग अलग भाषाओं का जन्म हुआ और हर भाषा का अपने पड़ोसी प्रदेश के भाषा के साथ समानताएँ होती हैं, ठीक उसी प्रकार अलग अलग ड्रामा और नाट्य शैलियाँ भी विकसित हुईं एक दूसरे से थोड़ी समानताएँ और थोड़ी विविधताएँ लिए हुए। पूर्वोत्तर के आसाम राज्य में “ओजापाली” का चलन हुआ, तो बंगाल में "जात्रा-पाला" का, पंजाब में "स्वांग" तो कश्मीर में "जश्न"। केरल के कथाकली नृत्य शैली से प्राचीन लोक-कथायों को साकार करने की परम्परा भी बहुत पुरानी है। बंगाल में प्रचलित 'जात्रा' का शाब्दिक अर्थ है यात्रा। मूलत: जात्रा में पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाओं को स्टेज पर नाट्य के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। संवाद और गीत-संगीत के माध्यम से जात्रा की अवधि लगभग ४ घंटे की होती है। क्योंकि प्राचीन काल में महिलाओं का नाटक और संगीत में आने नहीं दिया जाता था, इसलिए जात्रा पुरुष कलाकारों द्वारा निभाई जाती है और नारी चरित्र भी पुरुष ही निभाते हैं। १९-वीं सदी से महिलाएँ भी जात्रा के किरदार निभाने लगीं।

जात्रा में काफ़ी नाटकीयता होती है और कलाकार अपने संवाद और गीत ऊंची आवाज़ में बोलते/ गाते हैं। अलग अलग भावों को व्यक्त करने के लिए जात्रा के कलाकार ज़ोर से ज़ोर से हँसते, रोते, गाते, लड़ते हैं। सिनेमा के आने के बाद थिएटर का चलन थोड़ा कम हो गया है ज़रूर, पर ख़ास तौर से ग्रामीण इलाकों में जात्रा का आज भी ख़ूब चलन है। थिएटर कंपनियाँ आज भी गाँवों और छोटे शहरों में डेरा डालती है। जात्रा का मौसम सितम्बर से शुरु होता है; दुर्गा पूजा से जात्रा की शुरुआत होती है और अगले साल मानसून से पहले जाकर समाप्त होती है। यानि कि सितम्बर से लेकर अगले साल मई तक जात्रा आयोजित होते हैं। जात्रा की शुरुआत १६-वीं शताब्दी से मानी जाती है जब श्री चैतन्य महाप्रभु का भक्तिवाद चल रहा था। उस समय भगवान श्री कृष्ण के भक्तगण कीर्तन शैली के संवाद और गीतों के माध्यम से श्रीकृष्ण-नाम गाया करते थे। यहीं से जात्रा की शुरुआत होती है। आधुनिक काल में भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में जात्रा नें जनजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन जात्राओं को 'स्वदेशी जात्रा' कहा जाता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इप्टा नें भी कई जात्रा स्टेज किए। जात्रा में गाये जाने वाले गीतों को 'जात्रागान' कहते हैं। आज के अंक में हम जो गीत सुनवाने जा रहे हैं वह भी जात्रागान शैली की है। लता मंगेशकर, कमल बारोट, नीलिमा चटर्जी और साथियों की आवाज़ों में यह गीत है फ़िल्म 'मंझली दीदी' का गीतकार नीरज का लिखा हुआ। गीत में लवकुश की गाथा को दर्शाया जा रहा है। यह शरतचन्द्र की प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित मीना कुमारी - धर्मेन्द्र अभिनीत १९६७ की फ़िल्म है जिसमें संगीत था हेमन्त कुमार का। आइए सुना जाये बंगाल के ग्रामीण स्पर्श लिए जात्रा-संगीत पर आधारित यह गीत और इस शृंखला को समाप्त करने की दीजिए मुझे अनुमति, शृंखला के बारे में अपने विचार टिप्पणी में ज़रूर व्यक्त कीजिएगा, नमस्कार!



चलिए अब खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
जगजीत के स्वरों से महकी इस अमर गज़ल के एक शे'र में शब्द आता है -"जहर"

पिछले अंक में
एक बार फिर से बधाई अमित जी
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, October 18, 2011

धितंग धितंग बोले, मन तेरे लिए डोले....सलिल दा की ताल पर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 768/2011/208

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनो जारी लघु शृंखला 'पुरवाई' की आठवीं कड़ी में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। आज हम आपके लिए लेकर आये हैं बंगाल की एक लोकगाथा, या रूपकथा (fairy-tale) भी कह सकते हैं। इस कहानी का शीर्षक है 'सात भाई चम्पा और एक बहन पारुल'। चम्पा और पारुल बंगाल में पाये जाने वाले पेड़ हैं। बहुत समय पहले सुन्दरपुर में एक राजा अपनी सात रानियों के साथ रहता था। वह राजा बहुत ही नेक और साहसी था और इमानदारी को हर चीज़ से उपर रखता था। इसलिए प्रजा भी उन्हें बहुत प्यार करती थी। पर उनके पहली छह रानियाँ बहुत ही स्वार्थी और क्रूर थीं और छोटी रानी से जलती थीं क्योंकि वह राजा की प्यारी थी। राजा के मन में बस एक दुख था कि उनका कोई सन्तान नहीं था। किसी भी रानी से उन्हें सन्तान प्राप्ति नहीं हुई। जैसे जैसे दिन गुज़रते गए, राजा एक सन्तान की आस में बेचैन होते गए। जब एक दिन उन्हें पता चला कि छोटी रानी गर्भवती है, तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। राजा नें एक दिन छोटी रानी को सोने का एक घण्टा के साथ सोने की एक चेन बांध कर दिया और कहा कि जैसे ही बच्चे का जन्म हो तो इस घण्टे को बजाना, और मैं तुरन्त तुम्हारे पास आ जाउंगा। यह कह कर राजा अपने कक्ष में चला गया। उधर बच्चे के जन्म के समय बाकी छह रानियाँ वहाँ मौजूद थीं। उनसे छोटी रानी का सुख देखा नहीं गया। छोटी रानी नें सात लड़के और एक लड़की को जन्म दिया। छोटी रानी तो बेहोश थी, बाकी रानियों ने मिल कर नवजातों को बगीचे में ले जा कर दफ़ना दिया। वापस आकर उन दुष्ट रानियों नें छोटी रानी के बगल में सात चूहे और एक केंकड़ा रख दिया। बड़ी रानी नें फिर घण्टा बजाया और राजा दौड़ कर वहाँ आया। चूहों और केंकड़े को देख कर रजा गुस्से से तिलमिला उठा, छोटी रानी को जादूगरनी और चुड़ैल कहते हुए अपने महल से जिकाल दिया। इस दुखभरी कहानी का और कोई न सही पर प्रकृति चश्मदीद गवाह थी। प्रकृति को यह अन्याय सहन नहीं हुई। इसके विरोध में प्रकृति नें उस राज्य में पेड़ों पर फूल खिलाने बन्द कर दिए, नदियाँ सूख गईं। राज्य में सूखा पड़ गया, राजा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। फिर एक दिन सुबह राज-पुरोहित भागा भागा राजा के पास आया और कहा - "महाराज, आश्चर्य की बात है कि जहाँ पूरे राज्य में कहीं कोई फूल नहीं खिला है, केवल आपके बगीचे में सात चम्पा और एक पारुल फूल खिले हुए हैं। पर जैसे ही मैं फूल तोड़ने लगा तो ऊंचाई पर चढ़ गए और कहा कि केवल राजा उन्हें तोड़ सकता है।" राजा भागते भागते बगीचे में गए, और जैसे ही उन फूलों को देखा तो उन्हें ऐसा लगा कि जैसे वो उन्हीं की सन्तानें हैं। राजा को देख कर पारुल नें अपने साथ भाई चम्पा फूलों को भी जगाया। उन फूलों नें राजा को आदेश दिया कि उनकी छोटी रानी को बुलाया जाए, केवल वो ही उन्हें छू सकती हैं। छोटी रानी को ढूंढ़ कर लाया गया और एक एक कर सारे फूल उनकी कदमों में गिर गए; पारुल एक सुन्दर राजकुमारी में परिवर्तित हो गई और साथ चम्पा भाई रूपान्तरित हो गए सात सुन्दर राजकुमारों में। फिर राजा अपनी छोटी रानी और आठ बच्चों के साथ सुखी-सुखी जीवन बिताने लगे।

दोस्तों, आप शायद यह सोच रहे होंगे कि हमने आपको चम्पा और पारुल की यह कहानी क्यों सुनाई? वह इसलिए कि आज हम जिस गीत की धुन पर आधारित गीत सुनवाने जा रहे हैं उस मूल गीत में भी इन्हीं चम्पा भाइयों और पारुल का ज़िक्र है। बल्कि दो गीत हैं, पहला गीत है "धितांग धितांग बोले, ए मादोले तान तोले, कार आनोन्दे उच्छोले आकाश भोरे जोछोनाय..... आय रे आय, लगन बोये जाय, मेघ गुर गुर कोरे चाँदेर शिमानाय, पारुल बोन डाके चम्पा छुटे आए..."। और दूसरा गीत है "सात भाई चम्पा जागो रे जागो रे...." (पारुल अपने सात चम्पा भाइयों को जगाते हुए यह गीत गा रही है)। इस धितांग धितांग बोले गीत की धुन पर आधारित गीत सलिल चौधरी नें ज़िया सरहदी निर्देशित 'महबूब प्रोडक्शन्स' की फ़िल्म 'आवाज़' के एक गीत में किया था, जिसके बोल थे "धितंग धितंग बोले, मन तेरे लिए डोले"। प्रेम धवन के लिखे और लता मंगेशकर और साथियों के गाये इस गीत में जहाँ बंगाल के संगीत की छाया है, वहीं इसके संगीत संयोजन में सलिल दा नें कई प्रान्तों के संगीत का प्रयोग किया है। लावणी की ताल से शुरु कर गोवा के लोक-संगीत की रिदम की तरफ़ कितनी सुन्दरता से ले गए हैं। पंकज राज अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में इस गीत के बारे में लिखते हैं कि "कैरेबियन बीट २-४ इस गीत में दादरा ताल ६-८ मात्रा बन कर अचम्भित कर देती है। ढोलक की तेज़ गति से लावणी का आभास देकर झटके से कोमल सुरों के साथ एकॉर्डियन और हारमोनियम की तरंग और फिर कोरस के साथ "आए रे आए प्यार के दिन आए" के साथ लहराते सुरों में इस गीत को बांधना सलिल की रचनात्मकता का अनुपम उदाहरण है।" तो दोस्तों, आइए इस गीत का आनन्द लिया जाए।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
येसुदास की आवाज़ में ये गीत है जिसके मुखड़े में "मधुबन" शब्द आता है, पर ये पहला नहीं है

पिछले अंक में
अमित जी बहुत से हिंट दे देंगें तो आप पक्के हो जायेंगें कि फलां गीत है, जरा सा संशय रहने दीजिए, वैसे कल आपके बहुत सी कोशिशों में से एक सही निशाने पर टिका है बधाई
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, October 15, 2011

"पहला म्युज़िक विडियो प्लस चैनल नें ही बनाया नाज़िया हसन को लेकर"- अमित खन्ना

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 63
"मैं अकेला अपनी धुन में मगन" - भाग:२
पढ़ें भाग ०१ यहाँ

ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! पिछले अंक में आप मिले सुप्रसिद्ध गीतकार एवं फ़िल्म व टी.वी. प्रोड्युसर-डिरेक्टर अमित खन्ना से। अमित जी इन दिनों रिलायन्स एन्टरटेनमेण्ट के चेयरमैन हैं, इसलिए ज़ाहिर है कि वो बहुत ही व्यस्त रहते हैं। बावजूद इसके उन्होंने 'हिन्द-युग्म' को अपना मूल्यवान समय दिया, पर बहुत ज़्यादा विस्तार से बातचीत सम्भव नहीं हो सकी। और वैसे भी अमित जी अपने बारे में ज़्यादा बताने में उत्साही नहीं है, उनका काम ही उनका परिचय रहा है। आइए अमित जी से बातचीत पर आधारित शृंखला 'मैं अकेला अपनी धुन मे मगन' की दूसरी कड़ी में उनसे की हुई बातचीत को आगे बढ़ाते हैं। पिछली कड़ी में यह बातचीत आकर रुकी थी फ़िल्म 'चलते चलते' के शीर्षक गीत पर। अब आगे...

सुजॉय - अमित जी, 'चलते चलते' फ़िल्म का ही एक और गीत था लता जी का गाया "दूर दूर तुम रहे"।
अमित जी - जी हाँ, इस गीत के लिए उन्हें अवार्ड भी मिला था। इस गीत की धुन बी. जे. थॉमस के मशहूर गीत "raindrops keep falling on my head" की धुन से इन्स्पायर्ड थी।

सुजॉय - चलिए इस गीत को भी सुनते चलें।

गीत - दूर दूर तुम रहे पुकारते हम रहे (चलते चलते)


सुजॉय - अच्छा, 'चलते चलते' के बाद फिर आपकी कौन सी फ़िल्में आईं?
अमित जी - उसके बाद मैंने बहुत से ग़ैर-फ़िल्मी गीत लिखे, ८० के दशक में, करीब १००-१५० गानें लिखे होंगे। फ़िल्मी गीतों की बात करें तो 'रामसे ब्रदर्स' की ४-५ हॉरर फ़िल्मों में गीत लिखे, जिनमें अजीत सिंह के संगीत में 'पुराना मन्दिर' भी शामिल है।

सुजॉय - 'पुराना मन्दिर' का आशा जी का गाया "वो बीते दिन याद हैं" गीत तो ख़ूब मकबूल हुआ था। क्यों न इस गीत को भी सुनवाते चलें और बीते दिनों को यादों को एक बार फिर ताज़े किए जायें?
अमित जी - ज़रूर!

गीत - वो बीते दिन याद हैं (पुराना मन्दिर)


सुजॉय - अच्छा अमित जी, यह बताइए कि जब आप कोई गीत लिखते हैं तो आप की रणनीति क्या होती है, किन बातों का ध्यान रखते हैं, कैसे लिखते हैं?
अमित जी - देखिए मैं बहुत spontaneously लिखता हूँ। मैं दफ़्तर या संगीतकार के वहाँ बैठ कर ही लिखता था। घर पे बिल्कुल नहीं लिखता था। फ़िल्म में गीत लिखना कोई कविता लिखना नहीं है कि किसी पहाड़ पे जा कर या तालाब के किनारे बैठ कर लिखने की ज़रूरत है, जो ऐसा कहते हैं वो झूठ कहते हैं। फ़िल्मों में गीत लिखना एक बहुत ही कमर्शियल काम है, धुन पहले बनती है और आपको उस हिसाब से सिचुएशन के हिसाब से बोल लिखने पड़ते हैं। हाँ कुछ गीतकार हैं जिन्होंने नए नए लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया, जैसे कि राजा मेहन्दी अली ख़ाँ साहब, मजरूह साहब, साहिर साहब। इनके गीतों में आपको उपमाएँ मिलेंगी, अन्य अलंकार मिलेंगे।

सुजॉय - अच्छा अलंकारों की बात चल रही है तो फ़िल्म 'मन-पसन्द' में आपनें अनुप्रास अलंकार का एक बड़ा ख़ूबसूरत प्रयोग किया था, उसके बारे में बताइए।
अमित जी - 'मन-पसन्द' मैंने ही प्रोड्युस की थी। फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसा आया कि जिसमे छन्दों की ज़रूरत थी। देव आनद टिना मुनीम को गाना सिखा रहे हैं। तो मैंने उसमें जयदेव की कविता से यह लाइन लेकर गीत पूरा लिखा।

सुजॉय - बहुत सुन्दर!
अमित जी - मैं यह समझता हूँ कि जो एक गीतकार लिखता है उसपे उसके जीवन और तमाम अनुभवों का असर पड़ता है। उसके गीतों में वो ही सब चीज़ें झलकती हैं। सबकॉनशियस माइण्ड में वही सबकुछ चलता रहता है गीतकार के।

सुजॉय - वाह! चलिए 'मनपसन्द' का लता जी और किशोर दा का गाया यह गीत सुनते चलें।

गीत - चारू चन्द्र की चंचल चितवन... सा रे गा मा (मनपसन्द)


सुजॉय - 'मनपसन्द' के सभी गीत इतने सुन्दर हैं कि जी चाहता है कि सभी गीत सुनवाएँ। "सुमन सुधा रजनीगंधा" भी लाजवाब गीत है। इस गीत को हम फिर कभी अवश्य अपने श्रोताओं को सुन्वएंगें. राजेश रोशन और बप्पी लाहिड़ी के अलावा और किन किन संगीतकारों के साथ आपने काम किया है?
अमित जी - लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ फ़िल्म 'भैरवी' में काम किया, एक और फ़िल्म थी उनके साथ जो बनी नहीं। भूपेन हज़ारिका के साथ NFDC की एक फ़िल्म 'कस्तूरी' में गीत लिखे। दान सिंह के साथ भी काम किया है। जगजीत सिंह के साथ भी काम किया है, दूरदर्शन की एक सीरियल था जलाल आग़ा साहब का, उसमें। अनु मलिक की २-३ फ़िल्मों में गीत लिखे, रघुनाथ सेठ के साथ १-२ फ़िल्मों में। इस तरह से कई संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला।

सुजॉय - अमित जी, कई नए कलाकारों नें आप ही के लिखे गीत गा कर फ़िल्म-जगत में उतरे थे, उनके बारे में बताइए।
अमित जी - अलका याग्निक नें अपना पहला गीत 'हमारी बहू अलका' में गाया था जिसे मैंने लिखा था। उदित नारायण नें भी अपना पहला गीत रफ़ी साहब के साथ 'उन्नीस बीस' फ़िल्म में गाया था जो मेरा लिखा हुआ था। शरन प्रभाकर, सलमा आग़ा नें मेरे ग़ैर फ़िल्मी गीत गाए। पिनाज़ मसानी का पहला फ़िल्मी गीत मेरा ही लिखा हुआ था। शंकर महादेवन नें पहली बार एक टीवी सीरियल में गाया था मेरे लिए। सुनिता राव भी टीवी सीरियल से आई हैं। फिर शारंग देव, जो पंडित जसराज के बेटे हैं, उनके साथ मैंने २/३ फ़िल्मों में काम किया।

सुजॉय - जी हाँ, फ़िल्म 'शेष' में आप प्रोड्युसर, डिरेक्टर, गीतकार, कहानीकार, पटकथा, संवाद-लेखक सभी कुछ थे और संगीत दिया था शारंग देव नें।
अमित जी - फिर इलैयाराजा के लिए भी गीत लिखे। गायकों में किशोर कुमार नें सबसे ज़्यादा मेरे गीत गाये, रफ़ी साहब नें कुछ ८-१० गीत गाये होंगे। लता जी, आशा जी, मन्ना डे साहब, और मुकेश जी नें भी मेरे दो गीत गाये हैं, दोनों डुएट्स थे, एक बप्पी लाहिड़ी के लिए, एक राजेश रोशन के लिए। इनके अलावा अमित कुमार, शैलेन्द्र सिंह, कविता कृष्णमूर्ति, अलका, अनुराधा, उषा उथुप नें मेरे गीत गाये हैं। भीमसेन जोशी जी के बेटे के साथ मैंने एक ऐल्बम किया है। नॉन-फ़िल्म में नाज़िया हसन और बिद्दू नें मेरे कई गीत गाए हैं। मंगेशकर परिवार के सभी कलाकारों नें मेरे ग़ैर-फ़िल्मी गीत गाए हैं। मीना मंगेशकर का भी एक ऐल्बम था मेरे लिखे हुए गीतों का। मीना जी नें उसमें संगीत भी दिया था, वर्षा नें गीत गाया था।

सुजॉय - अमित जी, अब मैं जानना चाहूँगा 'प्लस चैनल' के बारे में।
अमित जी - 'प्लस चैनल' हमनें १९९० में शुरु की थी पार्टनर्शिप में, जिसने मनोरंजन उद्योग में क्रान्ति ला दी। उस समय ऐसी कोई संस्था नहीं थी टीवी प्रोग्रामिंग की। महेश भट्ट भी 'प्लस चैनल' में शामिल थे। हमनें कुछ १० फ़ीचर फ़िल्मों और ३००० घंटों से उपर टीवी प्रोग्रामिंग् और १००० म्युज़िक ऐल्बम्स बनाई। 'बिज़नेस न्यूज़', 'ई-न्यूज़' हमने शुरु की थी। पहला म्युज़िक विडियो हम ही नें बनाया नाज़िया हसन को लेकर।

सुजॉय - 'प्लस चैनल' तो काफ़ी कामयाब था, पर आपने इसे बन्द क्यों कर दिया?
अमित जी - रिलायन्स में आने के बाद बन्द कर दिया।

सुजॉय - क्या आपनें गीत लिखना भी छोड़ दिया है?
अमित जी - जी हाँ, अब बस मैं नए लोगों को सिखाता हूँ, मेन्टरिंग् का काम करता हूँ। रिलायन्स एन्टरटेन्मेण्ट का चेयरमैन हूँ, सलाहकार हूँ, बच्चों को सिखाता हूँ।

सुजॉय - अच्छा अमित जी, चलते चलते अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए।
अमित जी - मैं अकेला हूँ, मैंने शादी नहीं की।

सुजॉय - अच्छा अच्छा। फिर तो 'मनपसन्द' का गीत "मैं अकेला अपनी धुन में मगन, ज़िन्दगी का मज़ा लिए जा रहा था" गीत आपकी ज़िन्दगी से भी कहीं न कहीं मिलता-जुलता रहा होगा। ख़ैर, अमित जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका, इतनी व्यस्तता के बावजूद आपनें हमें समय दिया, फिर कभी सम्भव हुआ तो आपसे दुबारा बातचीत होगी। बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
अमित जी - धन्यवाद!

गीत - मैं अकेला अपनी धुन में मगन (मनपसन्द)


तो दोस्तों, यह था गीतकार और फ़िल्मकार अमित खन्ना से की हुई बातचीत पर आधारित शृंखला 'मैं अकेला अपनी धुन में मगन' का दूसरा और अन्तिम भाग। अगले शनिवार फिर एक विशेषांक के साथ उपस्थित होंगे, तब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित कड़ियों का आनन्द लेते रहिए, नमस्कार!

Wednesday, October 12, 2011

जाने क्या है जी डरता है...असम के चाय के बागानों से आती एक हौन्टिंग पुकार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 764/2011/204

सम के लोक-संगीत की बात चल रही हो और चाय बागानों के संगीत की चर्चा न हो, यह सम्भव नहीं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है शृंखला 'पुरवाई' में जिसमें इन दिनों आप पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत के लोक धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीत सुन रहे हैं। चाय बागानों की अपनी अलग संस्कृति होती है, अपना अलग रहन-सहन, गीत-संगीत होता है। दरअसल इन चाय बागानों में काम करने वाले मज़दूर असम, बंगाल, बिहार और नेपाल के रहने वाले हैं और इन सब की भाषाओं के मिश्रण से एक नई भाषा का विकास हुआ जिसे चाय बागान की भाषा कहा जाता है। यह न तो असमीया है, न ही बंगला, न नेपाली है और न ही हिन्दी। इन चारों भाषाओं की खिचड़ी लगती है सुनने में, पर इसका स्वाद जो है वह खिचड़ी जैसा ही स्वादिष्ट है। यहाँ का संगीत भी बेहद मधुर और कर्णप्रिय होता है। असम के चाय बागानों में झुमुर नृत्य का चलन है। यह नृत्य लड़कों और लड़कियों द्वारा एक साथ किया जाता है, और कभी-कभी केवल लड़कियाँ करती हैं झुमुर नृत्य। इस नृत्य में पाँव के स्टेप्स का बहुत महत्व होता है, एक क़दम ग़लत पड़ा और नृत्य बिगड़ जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि नृत्य करने वाले एक दूसरे की कमर को कस के पकड़े हुए होते हैं। और इस नृत्य के दौरान बजने वाला गीत-संगीत नृत्य को और भी ज़्यादा सुनद्र बना देते हैं। एक अजीब सुकून देने वाला यह संगीत है। आज के बड़े शहरों की तनाव से भरी ज़िन्दगी जीने वालों के लिए यह सुझाव देना चाहेंगे कि एक बार असम या उत्तर बंगाल के चाय बागानों की सैर कर आइए, यकीन दिलाते हैं कि आप एक नई ताज़गी और स्फूर्ति से भर उठेंगे। शायद वैसी ही ताज़गी जो यहाँ के चाय पत्तियों से बनी चाय की चुस्की लेते हुए आप महसूस करते हैं।

आज के अंक के लिए असम के चाय बागान के संगीत पर आधारित हमनें जिस गीत को चुना है, उसे भी कल की तरह भूपेन हज़ारिका नें ही स्वरबद्ध किया है। फ़िल्म 'एक पल' का यह गीत है "जाने क्या है जी डरता है, रो देने को जी करता है, अपने आप से डर लगता है, डर लगता है, क्या होगा"। लता मंगेशकर की आवाज़ है और गुलज़ार के बोल। यह १९८६ की कल्पना लाजमी निर्देशित फ़िल्म थी जो असम की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म थी। फ़िल्म के सभी गीतों में असमीया संगीत साफ़ सुनाई देता है, फिर चाहे आज का यह गीत हो या "मैं तो संग जाऊँ बनवास", विदाई गीत "ज़रा धीरे ज़रा धीमे" हो या फिर "फूले दाना दाना"। आज जो गीत आपको सुनवा रहे हैं, इसका असमीया गीत हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' के उषा मंगेशकर पर केन्द्रित अंक में सुनवा चुके हैं। याद है न "राधाचुड़ार फूल गूंजी राधापुरोर राधिका" गीत? यह एक झुमुर नृत्य शैली का लोक गीत है जिस पर आधारित यह असमीया गीत है। पर हिन्दी वर्ज़न में भूपेन हज़ारिका नें बीट्स कम कर के इसमें एक हौन्टिंग् टच ले आये हैं। गीत सुन कर वाक़ई ऐसा लगता है कि कोई डरा हुआ है। तो आइए आज असम के चाय बगानों की सैर की जाये लता मंगेशकर, भूपेन हज़ारिका और गुलज़ार के साथ फ़िल्म 'एक पल' के इस गीत के माध्यम से।



चलिए आज से खेलते हैं एक "गेस गेम" यानी सिर्फ एक हिंट मिलेगा, आपने अंदाजा लगाना है उसी एक हिंट से अगले गीत का. जाहिर है एक हिंट वाले कई गीत हो सकते हैं, तो यहाँ आपका ज्ञान और भाग्य दोनों की आजमाईश है, और हाँ एक आई डी से आप जितने चाहें "गेस" मार सकते हैं - आज का हिंट है -
काका बाबु और किम पर फिल्मांकित इस गीत का आरंभ होता है इस शब्द से -"संग"

पिछले अंक में
लगता है की अब सभी श्रोता हमारे इशारों में बात करते हैं :) सुजॉय की पुरवाई का असर है
खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Saturday, September 24, 2011

"हर इन्सान को अपनी ज़िंदगी जीने का पूरा हक़ है..."- युवा अभिनेता युवराज पराशर

अभिनेता युवराज पराशर के पसन्द के ५ लता नम्बर्स
ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 60

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का 'शनिवार विशेषांक' में। मैं, सुजॉय चटर्जी, हाज़िर हूँ फिर एक बार फिर एक साक्षात्कार के साथ। आज हम आपको मिलवा रहे हैं हाल में बनी फ़िल्म 'डोन्नो व्हाई न जाने क्यों' के नायक श्री युवराज पराशर से, जो बनाएंगे अपनी इस फ़िल्म के बारे में और साथ ही साथ हमें सुनवाएंगे लता जी के गाए हुए उनके पसन्दीदा पाँच गीत। आइए मिलते हैं युवा अभिनेता युवराज पराशर से।

सुजॉय - नमस्कार युवराज, स्वागत है आपका 'हिन्द-युग्म' के 'आवाज़' मंच पर और यह है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का साप्ताहिक विशेषांक।

युवराज - नमस्कार, और बहुत बहुत धन्यवाद आपका!

सुजॉय - युवराज, क्योंकि लता जी के जनमदिवस के उपलक्ष्य पर इस सप्ताह का यह विशेषांक प्रस्तुत हो रहा है, और आपका भी लता जी से एक तरह का सम्बंध हुआ है आपकी फ़िल्म के ज़रिए, इसलिए बातचीत का सिलसिला भी मैं लता जी से ही शुरु करना चाहूँगा। सबसे पहले तो अपने पाठकों को वह तस्वीर दिखा दें जिसमें आप और कपिल शर्मा लता जी के साथ नज़र आ रहे हैं।

चित्र-१: युवराज और कपिल के साथ स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर

सुजॉय - कैसा रहा वह अनुभव लता जी के साथ फोटो खिंचवाने का?

युवराज - Oh my God! जब मैंने उनकी शख़्सीयत को सामने से देखा तो ऐसा लगा कि जैसे मैं भगवान के सामने खड़ा हूँ, या कोई देवी मेरे सामने खड़ी हों। मैंने उनके पाँव छूए और उनसे आशीर्वाद लिया। मुझे लगता है कि वो कोई आम इंसान नहीं हैं, बल्कि माँ सरस्वती का अवतार हैं। मैं आपको बता नहीं सकता कि मुझे कैसा रोमांच महसूस हुआ जब उनके साथ फोटो खिंचवाने का मौका मिला। और मेरी पहली फ़िल्म का टाइटल गीत उन्होंने ही गाया है, इससे बड़ी ख़ुशी की बात और मेरे लिए क्या हो सकती है!

सुजॉय - वाह! वाक़ई बहुत भाग्यशाली हैं आप! अच्छा तो बताइए कि आपकी पसन्द पर लता जी का गाया हुआ कौन सा गीत आप सब से पहले सुनवाना चाहेंगे?

युवराज - इसी फ़िल्म का सुनवा दीजिए, 'डोन्नो व्हाई' का टाइटल ट्रैक।

गीत-१ - डोन्नो व्हाई न जाने क्यों (शीर्षक गीत)


सुजॉय - और इसी फ़िल्म में आपको एक और बड़ी हस्ती के साथ काम करने का भी मौका मिला, वो हैं ज़ीनत अमान जी। इस बारे में भी कुछ बताइए।

युवराज - ओह... ज़ीनत जी के साथ काम करना एक बहुत ही सुन्दर अनुभव रहा। उनका दिल भी उतना ही ख़ूबसूरत है जितनी ख़ूबसूरत वो दिखती हैं। उन्होंने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं न्युकमर हूँ। जब पहली बार 'डोन्नो व्हाई' के सेट पर मैं उनसे मिला तो उन्होंने मुझे देख कर यह कॉम्प्लिमेण्ट दिया कि मैं ब्रैड पिट जैसा दिखता हूँ। यह बात मैं कभी नहीं भूल सकता।

चित्र-२: ज़ीनत अमान की नज़र में युवराज हैं भारत के ब्रैड पिट

सुजॉय - युवराज, 'डोन्नो व्हाई...' फ़िल्म के बारे में बताइए। यह फ़िल्म थिएटरों में तो नहीं आई हमारे शहर में पर हमें पता है कि कई फ़िल्म-उत्सवों में इसने काफ़ी नाम कमाया है।

युवराज - 'डोन्नो व्हाई...' एक कहानी है रिश्तों की, कुछ ऐसे रिश्ते जिन्हें हमारा समाज स्वीकार नहीं करता। यह कहानी तीन रिश्तों की है, पहला रिश्ता एक 'सिन्गल मदर' का है जो अपने परिवार और अपने पति के परिवार के देखभाल के लिए कुछ भी कर सकती है; दूसरा रिश्ता है है एक जवान लड़की का जो अपने जीजाजी से प्यार करने लगती है; और तीसरा रिश्ता है एक शादीशुदा लड़के का सम्लैंगिक रिश्ता।

सुजॉय - यानि कि दूसरे शब्दों में यह एक बहुत ही बोल्ड फ़िल्म है। इसके लिए मैं आपको सलाम करता हूँ कि अपने करीयर के शुरु में आपने इतना बड़ा रिस्क लिया। कैसे मिला आपको यह रोल?

युवराज - धन्यवाद आपका! मुझे ऑडिशन के लिए बुलाया गया था और स्क्रीनटेस्ट के माध्यम से मुझे चुन लिया गया।

सुजॉय - इस फ़िल्म से जुड़ी कुछ और बातें आपसे करेंगे, लेकिन उससे पहले हम आपकी पसन्द का लता जी का गाया दूसरा गाना सुनना चाहेंगे।

युवराज - फ़िल्म 'लम्हे' का "कभी मैं कहूँ कभी तुम कहो"।

सुजॉय - वाह! मुझे भी यह गीत बहुत पसन्द है और एक समय में यह मेरा हैलो-ट्युन भी हुआ करता था। लता जी के साथ हरिहरण की आवाज़ में सुनते हैं 'लम्हे' का यह गीत।

गीत-२ - कभी मैं कहूँ कभी तुम कहो (लम्हे)


सुजॉय - अच्छा यह बताइए यह जो आपका रोल था, क्या आपको इसे स्वीकार करने में डर नहीं लगा या हिचकिचाहट नहीं हुई एक समलैंगिक चरित्र निभाने में?

युवराज - मैं समझता हूँ कि यह केवल एक चरित्र था जिसे मैंने निभाया और हर अभिनेता को हर किस्म का किरदार निभाना आना चाहिए। क्या मुझसे यही सवाल करते अगर मैंने किसी डॉन या बदमाश गुंडे का रोल निभाया होता? फ़िल्में और कुछ नहीं हमारे समाज का ही आईना हैं। मुझे फ़िल्म की कहानी बहुत पसन्द आई और मुझे लगा कि मेरा रोल अच्छा है, इसलिए मैंने किया।

सुजॉय - लेकिन मैंने सुना है कि इस रोल को निभाने की वजह से आपको एक भारी कीमत चुकानी पड़ी है। आपके परिवार नें आप से नाता तोड़ लिया था सिर्फ़ इस वजह से कि आपने एक समलैंगिक चरित्र निभाया है?

युवराज - हाँ यह सच है, जब मेरे पापा नें मेरे निभाये गये रोल के बारे में सुना तो वो बहुत बिगड़ गए थे। मैंने उन्हें समझाने की बहुत कोशिशें की पर उस वक़्त वो कुछ भी सुनना नहीं चाहते थे। पर अब सबकुछ ठीक है। ज़ीनत जी का भी एक बड़ा हाथा था उन्हें समझाने में कि यह केवल एक फ़िल्म मात्र है, हक़ीक़त नहीं। मैं सदा ज़ीनत जी का आभारी रहूंगा।

सुजॉय - युवराज, क्यों न यहाँ पर आपकी पसन्द का तीसरा गीत सुना जाये लता जी का गाया हुआ।

युवराज - ज़रूर! फ़िल्म 'लकी' का "शायद यही तो प्यार है" सुनवा दीजिए जिसे लता जी नें अदनान सामी के साथ मिलकर गाया है।

सुजॉय - वाह! युवराज, मानना पड़ेगा कि भले आप नए गीतों की फ़रमाइशें कर रहे हैं पर ये गानें लाजवाब हैं, एक से बढ़कर एक हैं, आइए सुनते हैं।

गीत-३ - शायद यही तो प्यार है (लकी)


सुजॉय - 'डोन्नो व्हाई...' में आपनें एक समलैंगिक चरित्र निभाया है। समलैंगिकता के बारे में आपके क्या निजी विचार हैं और आप समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

युवराज - मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि यह एक व्यक्तिगत पसन्द है और हर इन्सान को अपनी ज़िंदगी जीने का पूरा हक़ है, और समाज को चाहिए कि किसी भी इन्सान को इन्सान होने के नाते इज़्ज़त दें ना कि उसकी यौन प्रवृत्ति की जाँच पड़ताल कर।

सुजॉय - मीडिया में कुछ दिन पहले ख़बर आई थी कि आपनें एक जानेमाने फ़िल्मकार पर आप पर हुए यौन शोषण का आरोप लगाया है। पर उस फ़िल्मकार नें आप पर यह उल्टा आरोप लगाया कि आप दोनों में जो कुछ भी हुआ आपकी रज़ामन्दी से ही हुआ। 'हिन्द-युग्म' के माध्यम से कुछ कहना चाहेंगे अपनी सफ़ाई में?

युवराज - माफ़ कीजिए मैं इस विषय पर कुछ कहना नहीं चाहूंगा क्योंकि जब इस गंदे मुद्दे का समाधान हुआ था हमारे एक कॉमन फ़्रेण्ड के ज़रिए, हम दोनों नें यह वादा लिया था कि इस विषय पर हम कहीं भी अपनी ज़ुबान नहीं खोलेंगे। और मैं अपना वादा तोड़ना नहीं चाहता।

सुजॉय - पर युवराज आपने वादा तो हमसे भी किया है, उसका क्या?

युवराज - वह क्या?

सुजॉय - वही, लता जी के गाए अपनी पसन्द के पाँच गीत सुनवाने का?

युवराज - हा हा हा, जी हाँ, ज़रूर, चौथा गाना है फ़िल्म 'ग़ुलामी' का "ज़िहाले मिस्किन"।

सुजॉय - क्या बात है! यह तो मेरा भी पसन्दीदा गीत है और पता है इस गीत में लता जी के साथ शब्बीर कुमार हैं और शब्बीर साहब नें ख़ुद मुझे कहा था कि यह उनका सबसे पसन्दीदा गीत रहा है अपना गाया हुआ। चलिए सुनते हैं।

गीत-४ - ज़िहाले मिस्किन मुकुन ब रंजिश (ग़ुलामी)


सुजॉय - जब हमारी बातचीत समलैंगिकता के इर्द-गिर्द घूम ही रही है तो एक और बात जो आजकल चर्चा में आती रहती है कि नवोदित मॉडल और अभिनेताओं का यौन शोषण किया जाता है, जिसे हम 'कास्टिंग काउच' कहते हैं, पहले तो लड़कियों को ही इन सब से गुज़रना पड़ता था, पर अब तो सुनने में आता है कि लड़कों का भी यही अंजाम हो रहा है। आप तो इस ग्लैम वर्ल्ड से ताल्लुख़ रखते हैं। आप बताइए कि क्या यह सच है?

युचराज - यह एक कड़वा सच है जिसे हम सब जानते हैं कि यह होता है।

सुजॉय - और युवराज, अब हम बहुत पीछे की तरफ़ जाते हुए आपसे जानना चाहेंगे आपके बचपन के बारे में, और किस तरह से आप इस ग्लैम वर्ल्ड में आये?

युवराज - ह्म्म्म्म, मेरा बचपन आगरा में बीता है। बचपन से ही मुझे डान्स का बड़ा शौक था। और केवल शौक ही नहीं, मैंने बकायदा कई प्रकार के डान्स सीखे हैं जैसे कि कथक, साल्सा, हिप-हॉप और बॉलीवूड।

सुजॉय - वाह! युवराज, क्योंकि बात आपके बचपन की चल रही है, तो हम चाहेंगे कि आप अपने पसन्द का पाँचवा और अन्तिम गीत उसी ज़माने से हमें सुनवायें।

युवराज - 'आपकी कसम' फ़िल्म का "करवटें बदलते रहें सारी रात हम"

गीत-५ - करवटें बदलते रहें सारी रात हम (आपकी कसम)


सुजॉय - बहुत बहुत शुक्रिया युवराज, जो आपने अपनी व्यस्तताओं के बावजूद हमें समय दिया। 'हिन्द-युग्म' की तरफ़ से, अपने पाठकों की तरफ़ से और मैं अपनी तरफ़ से आपको धन्यवाद देता हूँ और आपको एक बेहद उज्वल भविष्य की शुभकामनाएं देते हुए इस बातचीत को यही विराम देता हूँ, नमस्कार!

युवराज - बहुत बहुत शुक्रिया आपका!

तो दोस्तों, यह था युवा फ़िल्म अभिनेता युवराज पराशर से एक मुलाक़ात और उनकी पसन्द के पाँच लता नम्बर्स। चलते चलते लता जी को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए आज की यह प्रस्तुति यहीं समाप्त करते हैं, कल यानि रविवार शाम ६:३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित महफ़िल में फिर भेंट होगी, नमस्कार!

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