रविवार, 28 जून 2020

राग वृन्दावनी सारंग : SWARGOSHTHI – 468 : RAG VRINDAVANI SARANG





स्वरगोष्ठी – 468 में आज

काफी थाट के राग – 12 : राग वृन्दावनी सारंग

विदुषी अश्विनी भिड़े से वृन्दावनी सारंग की एक बन्दिश और आशा भोसले व मुहम्मद रफी से फिल्मी गीत सुनिए





अश्विनी भिड़े देशपाण्डे

आशा  भोसले और मुहम्मद रफी

“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग वृन्दावनी सारंग को चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग वृन्दावनी सारंग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में राग वृन्दावनी सारंग की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में भी उपयोग किया गया है। राग वृन्दावनी सारंग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म "दिल दिया दर्द लिया” से नौशाद का स्वरबद्ध किया एक विख्यात गीत “सावन आए या न आए…”, आशा भोसले और मुहम्मद रफी के युगल स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग वृन्दावनी सारंग का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। कुछ विद्वान राग वृन्दावनी सारंग को खमाज थाट का राग मानते हैं, किन्तु इसे काफी थाट का राग मानना उचित है। “राग परिचय” ग्रन्थ के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार किसी भी राग का थाट निश्चित करने के लिए स्वर से अधिक महत्वपूर्ण राग का स्वरूप होता है। स्वरूप की दृष्टि से राग, खमाज की तुलना में काफी थाट के अधिक समीप है। सारंग के कई प्रकार हैं, जैसे शुद्ध सारंग, मियाँ की सारंग, मध्यमाद सारंग आदि। इस राग की रचना उत्तर प्रदेश के एक लोकगीत के आधार पर हुई है। साधारण बोल-चाल की भाषा में राग सारंग का अर्थ वृन्दावनी सारंग ही माना जाता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। रचना के बोल हैं; “सखी री मोरा जिया बेकल होत...”। यह रचना मध्यलय, मत्तताल में निबद्ध है।

वृन्दावनी सारंग : “सखी री मोरा जिया बेकल होत...” : अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


फिल्म संगीत में रागों का सर्वाधिक उपयोग यदि किसी संगीतकार ने किया है, तो वह हैं, नौशाद अली। फिल्म संगीत के क्षेत्र में नौशाद को उनके समय तक सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। नौशाद पहले संगीतकार थे जिन्होने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के बल पर फिल्म जगत में संगीतकार का दर्जा भी नायक या निर्देशक के समकक्ष ला खड़ा किया। नौशाद ऐसे संगीतकार थे, जिन्होने फिल्मों में अपनी रचनाएँ भारतीय संगीत पद्धति के अन्तर्गत विकसित की। उन्होने राग आधारित स्वरक्रम के साथ कभी तो विशुद्ध शास्त्रीय बन्दिशें सृजित की तो कभी शास्त्रीय संगीत के आधार में लोकसंगीत के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए बहुत ही सरस और मीठे गीत रचे। ऐसा ही एक राग आधारित गीत आज हम आपको सुनवा रहे हैं। 1966 में दिलीप कुमार और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के गीतकार शकील बदायूनी और संगीतकार नौशाद थे। फिल्म में नौशाद के स्वरबद्ध कई राग आधारित गीत हैं। इनमें से एक गीत “सावन आए या न आए...” राग वृन्दावनी सारंग के स्वरों पर आधारित इतनी विराट और कसी हुई रचना है कि फिल्मी गीतों में राग का इतना सफल रूपान्तरण बहुत कठिनाई से परिलक्षित होता है। “हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया” के ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग वृन्दावनी सारंग के साथ राग मेघ और शुद्ध सारंग का स्पर्श भी हुआ है। आइए सुनते हैं, राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित यह फिल्मी गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

वृन्दावनी सारंग : “सावन आए या न आए...” : मुहम्मद रफी और आशा भोसले : फिल्म - दिल दिया दर्द लिया




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 468वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1981 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस युगलगीत में किन गायक कलाकारो के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 4 जुलाई, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 470 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 466वें अंक में हमने आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालगुंजी और खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपक तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बारहवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग वृन्दावनी सारंग का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में राग वृन्दावनी सारंग की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म "दिल दिया दर्द लिया” से नौशाद का स्वरबद्ध किया एक विख्यात गीत “सावन आए या न आए…”, आशा भोसले और मुहम्मद रफी के युगल स्वर में प्रस्तुत किया। इस गीत के गीतकार शकील बदायूनी और संगीतकार नौशाद हैं।

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग वृन्दावनी सारंग : SWARGOSHTHI – 468 : RAG VRINDAVANI SARANG : 28 जून, 2018


रविवार, 21 जून 2020

राग मालगुंजी : SWARGOSHTHI – 467 : RAG MALGUNJI








स्वरगोष्ठी – 467 में आज

काफी थाट के राग – 11 : राग मालगुंजी

उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की वायलिन पर राग मालगुंजी और लता मंगेशकर से फिल्म का एक गीत सुनिए






उस्ताद अलाउद्दीन खान 
लता मंगेशकर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग मालगुंजी को चुना है। श्रृंखला की आज की इस कड़ी में राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने राग मालगुंजी चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आपको आज हम सबसे पहले राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझाने के लिए उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन पर बजाया राग मालगुंजी सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



राग मालगुंजी के मुख्य स्वर हैं; रे, नि॒, सा, रे, ग, म। इनसे इस राग का प्रारम्भिक दर्शन हो जाता है। इस राग को राग रागेश्वरी और राग बागेश्री का मिश्रण माना जाता है। आरोह में कहीं-कहीं रागेश्वरी तो अवरोह में कहीं-कहीं बागेश्री का आभास होता है। संगीत मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मतानुसार इस राग की प्रकृति न गम्भीर है और न तरल है। वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व, उलझन की स्थितियों में इस राग के स्वर संवेदनात्मक रूप में प्रेरणा तथा मनोबल को सुदृढ़ करने के साथ-साथ उन कष्टदायक स्थितियों का समाधान करने में सहयोगी सिद्ध हो सकते हैं। उलझनों तथा मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की स्थितियों के साथ-साथ इनके प्रभावानुसार उत्पन्न मनोभौतिक समस्याओं; उच्चरक्तचाप का बढ़ना, भूंख न लगना, अनिद्रा आदि का उपचार इस राग से सम्भव हो सकता है। राग मालगुंजी के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपके लिए मैहर घराने के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। यू-ट्यूब के सौजन्य से प्रस्तुत इस दुर्लभ वीडियो का अब आप रसास्वादन करें।

राग मालगुंजी : वायलिन वादन : उस्ताद अलाउद्दीन खाँ


राग मालगुंजी का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। शुद्ध निषाद का प्रयोग अति अल्प किया जाता है। अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। आरोह में पंचम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए यह षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग के गायन-वादन का अनुकूल समय रात्रि का दूसरा प्रहर है। सामान्यतः आरोह में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद तथा अवरोह में कोमल गान्धार और कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद का अति अल्प प्रयोग केवल तार सप्तक के साथ आरोह में किया जाता है। मन्द्र सप्तक के आरोहात्मक और अवरोहात्मक दोनों प्रकार के स्वरों में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान केवल कोमल निषाद प्रयोग करते हैं, शुद्ध निषाद लगाते ही नहीं। पंचम स्वर आरोह में वर्जित है और अवरोह में अल्प है। धैवत से मध्यम को आते समय पंचम का कण लिया जाता है। शुद्ध निषाद का अल्पत्व, कोमल निषाद की अधिकता, मध्यम स्वर का बहुत्व और पंचम स्वर का अल्पत्व तथा लगभग राग बागेश्री के समान चलन होने के कारण इसे बागेश्री अंग का राग कहा जाता है। राग मालगुंजी का वादी-संवादी क्रमशः मध्यम और षडज होने के कारण इसे रात्रि 12 बजे के बाद गाना-बजाना चाहिए, किन्तु इसे रात्रि 12 बजे से पूर्व गाया-बजाया जाता है। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं; राग मालगुंजी पर आधारित एक फिल्मी गीत। इसे हमने वर्ष 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से लिया है। लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत उस गीत के संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं। “हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया” के ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग मालगुंजी के साथ राग खमाज का स्पर्श भी हुआ है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग मालगुंजी : “घर आ जा घिर आई बदरा...” : लता मंगेशकर : फिल्म – छोटे नवाब




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 467वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस युगलगीत में किन गायको के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 27 जून, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 469 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 465 वें अंक में हमने आपको 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पटदीप, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपक तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “ स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की ग्यारहवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग मालगुंजी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का वायलिन पर बजाया राग मालगुंजी सुना। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में हमने प्रस्तुत किया। इस गीत के गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार राहुलदेव बर्मन हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट   http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मालगुंजी : SWARGOSHTHI – 467 : RAG MALGUNJI : 21 जून, 2018



मंगलवार, 16 जून 2020

ऑडियो: बोझ (साधना वैद)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में उन्हीं की लघुकथा विदेह का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं साधना वैद की कहानी "बोझ", जिसे स्वर दिया है, शीतल माहेश्वरी ने।

कहानी का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 9 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

साधना वैद
आकाशवाणी पर रचनाओं का प्रसारण। प्रकाशित पुस्तकें - संवेदना की नम धरा पर; एक फुट के मजनू मियाँ; तीन अध्याय; मौन का दर्पण। अनेक साझा काव्य संग्रहों में व साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"बड़े-बड़े बोरे कंधे पर लटकाए दोनों डम्पिंग ग्राउंड की ओर जा रहे थे।"
(साधना वैद की "बोझ " से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
बोझ mp3

#Fourteenth Story: Bojh; Author: Sadhna Vaid; Voice: Sheetal Maheshwari; Hindi Audio Book/2020/14.

रविवार, 14 जून 2020

राग पटदीप : SWARGOSHTHI – 466 : RAG PATADEEP





स्वरगोष्ठी – 466 में आज

काफी थाट के राग – 10 : राग पटदीप

उस्ताद राशिद खाँ से राग पटदीप की बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्म का एक गीत सुनिए






उस्ताद राशिद खाँ
लता मंगेशकर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग पटदीप को चुना है। श्रृंखला की आज की इस कड़ी में राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने राग पटदीप चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम सबसे पहले राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग पटदीप की एक बन्दिश हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके पश्चात सुविख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के स्वर में 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” से राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं।


राग पटदीप काफी थाट का राग माना जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं; नि, सा ग(कोमल), म, प, नि, सां और अवरोह के स्वर है; सां, नि, ध, प, म, ग(कोमल), रे सा। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार यदि व्यक्ति प्रयास करते करते निराश हो गया हो, डिप्रेशन की स्थिति में आ गया हो और अपने जीवन से निराश हो गया हो तो राग पटदीप के संवेदनापूर्ण स्वरों से उसे सहानुभूति प्रदान करते हुए प्रयास और कर्म के क्षेत्र में पूर्ण मनोयोग से संलग्न होने के लिए प्रेरणा देते हैं। राग पटदीप के उत्तरांग के स्वरों के द्वारा अन्तरात्मा की पुकार बलवती होगी और यह स्वर निराशा तथा क्लेश को हर लेती है और नवऊर्जा का संचार करेंगे। म, प, कोमल ग, म, प, नि, ध, प, कोमल ग, म, प, सां, ध, प, म, प, कोमल ग आदि सभी स्वर मथ–मथ कर आन्तरिक सभी गुबार, पीड़ा, निराशा, डिप्रेशन को बाहर का रास्ता दिखा देंगे। इन विकृतियों के बाहर हो जाने पर व्यक्ति सरल, सात्विक और संवेदनशील मनःस्थिति के साथ परोपकार और समस्याओं के समाधान के लिए प्रयासरत होगा। राग पटदीप में कोमल गान्धार स्वर मन को पिघलाता है। मध्यम और पंचम स्वर मनोबल में वृद्धि करता है। शुद्ध निषाद पुकार का भाव कायम करता है। अवरोह के स्वरों से सफलता प्राप्ति के पश्चात संवेदनपूर्ण शान्ति का दर्शन होता है। डिप्रेशन और चिन्ताविकृति से पीड़ित व्यक्ति को राग पटदीप का श्रवण 15 दिनों तक लगातार करना चाहिए।

राग पटदीप : “रंग रँगीला बनरा मोरा...” : उस्ताद राशिद खाँ


राग पटदीप का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत वर्जित है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। अतः यह औड़व- सम्पूर्णजाति का राग है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। इसमें केवल गान्धार स्वर कोमल और अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग पटदीप के गायन और वादन का उपयुक्त समय दिन का तीसरा प्रहर होता है। विद्वानों के अनुसार यह राग काफी थाट का राग माना गया है, किन्तु वास्तव में यह राग दस थाट में से किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है। क्योंकि वर्णित दस थाट में कोई भी ऐसा थाट नहीं है, जिसमें केवल गान्धार स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हों। इस राग की रचना राग भीमपलासी के कोमल निषाद को शुद्ध स्वर में परिवर्तन करने से हुई है। मध्य सप्तक में बढ़त करते समय बीच-बीच में शुद्ध निषाद की झलक दिखाना आवश्यक होता है। अन्यथा राग भीमपलासी की छाया दृष्टिगोचर होने लगती है। अब हम आपको राग पटदीप पर आधारित एक मधुर गीत सुनवाते हैं। यह गीत 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” से लिया गया है। इसके गीतकार गोपालदास नीरज, संगीतकार सचिनदेव बर्मन और गायिका लता मंगेशकर हैं। यह गीत रूपकताल में निबद्ध है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पटदीप : “मेघा छाए आधी रात बैरन बन गई...” : लता मंगेशकर : फिल्म – शर्मीली




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 466वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 20 जून, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 468 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 464 वें अंक में हमने आपको 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज की नाव” के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – आभोगी कान्हड़ा+बागेश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दीपचन्दी तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया,चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “ स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की दसवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग पटदीप का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खान के स्वर में राग पटदीप में एक द्रुत खयाल हमने प्रस्तुत किया। इसके साथ ही वर्ष 1971 में प्रदर्शित फिल्म “शर्मीली” से राग पटदीप पर आधारित एक गीत पार्श्वगायिका लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत किया। इस गीत के गीतकार गोपालदास नीरज और संगीतकार सचिनदेव बर्मन हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग पटदीप : SWARGOSHTHI – 466 : RAG PATADEEP : 14 जून, 2018



रविवार, 7 जून 2020

राग आभोगी कान्हड़ा : SWARGOSHTHI – 465 : RAG ABHOGI KANHADA





स्वरगोष्ठी – 465 में आज

काफी थाट के राग – 9 : राग आभोगी कान्हड़ा

विदुषी अश्विनी भिड़े से आभोगी कान्हड़ा की बन्दिश और आशा भोसले से फिल्म का एक गीत सुनिए





आशा भोसले 
अश्विनि भिड़े देशपांडे 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा को चुना है। श्रृंखला की आज की इस कड़ी में हम राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम सुविख्यात पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज की नाव” से राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इससे पहले राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में राग आभोगी कान्हड़ा की एक बन्दिश भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।




राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा को काफी थाट जन्य माना जाता है। इसमें गान्धार स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में पंचम और निषाद स्वर वर्जित होने से राग की जाति औड़व औड़व होती है। इस राग का गायन और वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में अधिक खिलता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षड्ज होता है। यह कर्नाटक पद्धति का एक मधुर राग है, जिसका प्रचार उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में अधिक हुआ है। कान्हड़ा का प्रकार होने के कारण अवरोह में गान्धार स्वर का वक्र प्रयोग किया जाता है, जैसे; कोमल ग, म, रे, सा। यह स्वर बार बार प्रयोग किया जाता है और कोमल गान्धार स्वर आन्दोलित होता है। ग्रन्थकार हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक “राग परिचय” के अनुसार राग आभोगी और राग आभोगी कान्हड़ा बहुत थोड़ा अन्तर होता है। राग आभोगी को आभोगी कान्हड़ा बनाने के लिए कोमल ग, म, रे, सा, स्वरसमूह का प्रयोग किया जाता है, अन्यथा सम्पूर्ण राग के चलन में कोई परिवर्तन नहीं होता। कुछ विद्वान इस भेद को नहीं मानते, उनका कहना है कि यह भेद करना ‘बाल की खाल निकालना’ है। आभोगी और आभोगी कान्हड़ा दोनों में रे, कोमल ग, म, कोमल ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है, केवल आभोगी कान्हड़ा में कान्हड़ा अंग लाने के लिए कोमल ग, म, रे, सा का प्रयोग करते हैं। परन्तु आभोगी में इन स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। कुछ विद्वानों का मत है कि आभोगी राग में आन्दोलित कोमल गान्धार स्वर से ही कान्हड़ा अंग स्पष्ट हो जाता है, चाहे वक्र कोमल गान्धार स्वर अवरोह में लें अथवा न लें। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में होता है। यह खयाल शैली का राग है, इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग का आलाप अत्यन्त कर्णप्रिय लगता है। राग आभोगी कान्हड़ा के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, इस राग में एक मोहक द्रुत खयाल, जिसे स्वर दे रही हैं, सुविख्यात गायिका अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। 

राग आभोगी कान्हड़ा : “रस बरसत तोरे घर...” : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे 





राग आभोगी का न्यास स्वर मध्यम और उपन्यास स्वर धैवत होता है। इस राग के गायन और वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि में 11 से 12 बजे के मध्य माना जाता है। इस राग के बारे में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र बताते हैं कि संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मतानुसार अवरोह में जब सां, ध, म, ग(कोमल), रे ,सा स्वरों का प्रयोग किया जाएगा तो यह राग आभोगी होगा। जब इसमें म, ग(कोमल), रे, सा के स्थान पर ग(कोमल), म, रे, सा स्वरो का प्रयोग करेंगे यह आभोगी कान्हड़ा बन जाता है। ये कान्हड़ा अंग के राग हैं। इस राग की प्रकृति शान्त व आत्मनिवेदन की होती है। आभोगी के श्रवण से भक्तिभाव की अभिव्यक्ति होगी तथा आभोगी कान्हड़ा के श्रवण से मन शान्त हो जाएगा। दोनों ही राग डिप्रेशन और चिन्ताविकृत को दूर का रास्ता दिखा कर गहन निद्रा का सुख प्रदान कर सकते हैं। कुछ विद्वान राग आभोगी और आभोगी कान्हड़ा में वादी और संवादी स्वरों का अन्तर भी मानते हैं। वे राग आभोगी में षडज और मध्यम तथा राग आभोगी कान्हड़ा में मध्यम और षडज को क्रमशः वादी और संवादी मानते हैं। इस परिवर्तन से राग आभोगी पूर्वांग और राग आभोगी कान्हड़ा को उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, परन्तु यह भेद उचित नहीं मालूम होता। शास्त्र सदैव क्रियात्मक संगीत का अनुसरण करता है। जो बातें क्रियात्मक संगीत में होती है, वही शास्त्र में शामिल की जाती है। क्रियात्मक संगीत में कोमल ग, म, रे, सा के अतिरिक्त कोई भेद दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए वादी और संवादी स्वरों के फलस्वरूप पूर्वांग और उत्तरांग का भेद न्यायसंगत नहीं है। अब हम आपको राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज की नाव” से एक गीत सुनवा रहे हैं। पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में प्रस्तुत इस गीत के शब्द नक्श लायलपुरी के उयर संगीत सपन जगमोहन का है। “हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया” के ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग आभोगी कान्हड़ा के साथ राग बागेश्री का स्पर्श भी हुआ है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग आभोगी कान्हड़ा : “ना जइयो रे सौतन घर...” : आशा भोसले : फिल्म : कागज की नाव 




संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 465वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1971 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 13 जून, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 467 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 463 वें अंक में हमने आपको 1960 में निर्मित किन्तु अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” के एक लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – सिन्दूरा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 

संवाद



मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास अधिक सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी" की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की नौवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में राग आभोगी कान्हड़ा में एक द्रुत खयाल हमने प्रस्तुत किया। इसके साथ ही वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज की नाव” से राग आभोगी कान्हड़ा का स्पर्श करता एक गीत पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में प्रस्तुत किया। इस गीत के गीतकार नक्श लायलपुरी और संगीतकार सपन जगमोहन हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा  radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग आभोगी कान्हड़ा : SWARGOSHTHI – 465 : RAG ABHOGI KANHADA : 7 जून, 2018




मंगलवार, 2 जून 2020

ऑडियो: विदेह (अनुराग शर्मा)

रेडियो प्लेबैक इंडिया के साप्ताहिक स्तम्भ 'बोलती कहानियाँ' के अंतर्गत हम आपको सुनवाते हैं हिन्दी की नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने देवेंद्र पाठक के स्वर में राजेंद्र देवधरे 'दर्पण की कथा "एक मज़दूर की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक लघुकथा "विदेह", अनुराग शर्मा ही के स्वर में।

कहानी "विदेह" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 45 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा "विदेह" का गद्य  बर्ग वार्ता पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।



मरेंगे हम किताबों में सफ़े होंगे कफ़न अपना
किसी ने न हमें जाना न पहचाना सुखन अपना
~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

हमारे घर के सब कमरे ग़ायब हो गये हैं, बस यह एक बैडरूम बचा है, यह भी कितना सिकुड़ गया है।
(अनुराग शर्मा की "विदेह" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
विदेह MP3

#Thirteenth Story, Videh: Anurag Sharma/Hindi Audio Book/2020/13. Voice: Anurag Sharma

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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