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Saturday, March 26, 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने लेकर हम लौटे हैं इंदु जी के साथ जो है एक प्यारी माँ हम सब की

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, स्वागत है शनिवार के इस साप्ताहिक विशेषांक में। आज बारी 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की। आज बहुत दिनों के बाद हमारी प्रिय इंदु जी का ईमेल इसमें शामिल हो रहा है। आप में से बहुत से पाठकों को शायद याद होगा कि इंदु जी के एक पहले के ईमेल में उन्होंने एक बच्चे के बारे में बताया था। हम आप से यही गुज़ारिश करेंगे कि अगर आप ने उस समय उस ईमेल को नहीं पढ़ा था तो पहले यहाँ क्लिक कर उसे पढ़ के दुबारा यहीं पे वापस आइए। तो आज के ईमेल में भी इंदु जी ने उसी बच्चे के बारे में कुछ और बातें हमें बता रही हैं। जिस तरह से पिछले ईमेल ने हमारी आँखों को नम कर दिया था, आज के ईमेल को पढ़ कर भी शायद आलम कुछ वैसा ही होगा। आइए इंदु जी का ईमेल पढ़ा जाये!
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प्रिय सजीव और सुजॊय,

प्यार!
तुमने (आपने नही लिखूंगी सोरी न) कहा मैं अपनी पसंद का गाना बताऊँ तुम सुनोगे, सुनाओगे। हंसी तो नही उडाओगे न कि ये हरदम ........?????? मैंने एक बार बताया था न एक बच्चे के बारे में? नन्नू बुलाती थी मैं उसे; नन्हू से नन्नू बन गया था वो हम सबका। अपने से दूर करने के बारे में कभी सोचा भी नही था। किन्तु पिछले अठारह उन्नीस साल से डायबिटिक हूँ और उम्र के इस पडाव पर... उसे बड़ा करने और पैरों पर खड़ा होने तक कम से कम पच्चीस साल चाहिए.....इतना समय मेरे पास है? जिसे जीवन और खुशियाँ देना चाहती थी हो सकता है कल मेरे ना रहने पर उसका जीवन नर्क बन जाता.......... और इसीलिए हमे एक सख्त कदम उठाना पड़ा उसे अपने से दूर करने का। इससे पहले भी कई बच्चे मेरे जीवन में आये और अच्छे परिवारों में चले गये। घर नही आया था कोई। नन्नू चार महीने हमारे पास रहा। वो अब पलटी मारने लगा था। 'इन्हें' देखते ही पलटी मारना शुरू कर देता। 'ये' खूब हंसते -'ओ मेरा बेटा पलती माल लहा है गुड...गुड..वेरी गुड।' और वो जैसे समझने लगा था। इन्हें देखते ही इतराना चालू कर देता..............मगर उसे जाना था.....वो चला गया।

पन्द्रह दिन बाद हम उसे सँभालने उसके नए मम्मी पापा के घर गये। 'इनकी' गोदी में जाते ही नन्नू गोदी से लुढक गया और...पलटिया मारने लगा। हर पलटी के बाद इनके चेहरे की ओर देखता, इस बार वो मुस्करा नही रहा था और ना ही गोस्वामीजी बोले-'ओ मेरा बेटा पलती.....' ये बुरी तरह रोने लगे.......हम सब फूट फूट कर रोये जा रहे थे। हमने सोचा वो बहुत छोटा है, हमे क्या याद करता होगा, पर...क्या हमारे पहली बार छोड़ कर आने के बाद उसकी आँखों ने चारों ओर हमे नही ढूँढा होगा? हमे नही पा कर अंदर नही रोया होगा? क्या वो अपने दुःख को किसी को बता पाया होगा? या...कोई समझ पाया होगा? बाबू! ऐसे कई प्रश्न आज भी हमे घेरे रहते हैं....उस दिन को ले के... कृष्ण यशोदा को छोड़ कर एक बार गये। और कभी वापस नही आये। मेरे कृष्ण तो हर बार मेरी गोदी चुनते हैं और चले जाते हैं और फिर नये रूप में आ जाते हैं .... यही कारण है ये गीत मेरे दिल के इतना करीब हो गया है। इसमें मुझे मेरे नन्नू की आवाज आती है। जानती हूँ वो मुझे भूल चूका है। अब माँ नही नानी बोलता है। फोन करता है, 'नानी आओ.एपल,भुट्टा लाना'। किन्तु उस दिन को नही भूल पाती जब हम कार से गये तीन व्यक्ति थे और लौटे....दो।

इस गीत की पंक्तियाँ... 'प्यासा था बचपन, जवानी भी मेरी प्यासी, पीछे गमों की गली

आगे उदासी, मैं तन्हाई का राही, कोई अपना ना बेगाना अफ़साना, मुझे अब ना बुलाना ............. खुल कर ना रोया किसी काँधे पर झुक के'।

जितना चाहो पोस्ट कर देना बाकि को एडिट कर निकाल देना,जैसे सबने नन्नू को मेरे जीवन से निकाल दिया जबरन...पर मेरे दिल से.???? मेरे जीते जी....???...धुंधला सा भी कहीं क्यों हो उजाला! अब उन यादों से कह दो मेरी दुनिया में ना आना 'सुनो इसके एक एक शब्द। कहीं नन्नू, कहीं तुम्हारी दोस्त इंदु है इसमें।

प्यार

इंदु

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अब इसके बाद बिना कुछ कहे, आइए सुनते हैं फ़िल्म 'दादी माँ' का इंदु जी का चुना हुआ यह गीत "जाता हूँ मैं मुझे अब ना बुलाना"। आवाज़ मोहम्मद रफ़ी साहब की, गीत मजरूह सुल्तानपुरी साहब का, और संगीतकार रोशन साहब। यह १९६६ की फ़िल्म थी। आइए गीत सुना जाये!

गीत - जाता हूँ मैं मुझे अब ना बुलाना (दादी माँ)



और इंदु जी, अभी कुछ दिन पहले आपनें अफ़सोस जताया कि दुर्गा खोटे पर फ़िल्माया 'बिदाई' के जिस भजन को हमनें चुना था, उससे बेहतर भजन उसी फ़िल्म में मौजूद थी। आप ही के शब्दों में - "आपने शायद इस फिल्म का एक बेहद मधुर, मर्मस्पर्शी भजन नही सुना, अन्यथा उसे ही सुनाते, 'मैं जा रही थी मन लेके तृष्णा, अच्छे समय पे तुम आये, तुम आये, तुम आये कृष्णा'। एक एक शब्द भीतर तक एक हलचल सी मचा देता है। आँखें स्वयम मूँद जाती है और.... जैसे वो पास आके बैठ जाता और कहता है- 'तुम्हे छोड़ कर कहाँ जाता मैं इंदु? मुझे तो आना ही था। काश उस भजन को सुनाया होता। कहीं नही अड़ता, टिकता ये भजन उसके सामने। कहना नही चाहिए था। इतने दिनों बाद आई और उलाहने देने लगी। हा हा हा, क्या करूं ? ऐसिच हूँ मैं -झगडालू।" इंदु जी, आप बिल्कुल झगड़ालू नहीं हैं, बल्कि यकीन मानिये हमें कितनी ख़ुशी होती है यह देख कर कि कितने अपनेपन से आप सब 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को सुनते हैं, पढ़ते हैं, और शिकवे शिकायतें भी तो अपनों से ही की जाती है न? तो लीजिए आज हम आपकी इस प्यारी सी शिकायत को दूर किए देते हैं, फ़िल्म 'बिदाई' के इस भजन को यहाँ पर बजाकर। वाक़ई बेहद सुंदर रचना है आशा भोसले का गाया हुआ। गीतकार आनंद बक्शी और संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। आइए सुनें।

गीत - अच्छे समय पे तुम आये कृष्णा (बिदाई)



तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। इंदु जी की तरह आप भी अपने जीवन की एक ऐसी ही अविस्मरणीय घटना हमें इस स्तंभ के लिए लिख भेजिए oig@hindyugm.com के पते पर। अगले हफ़्ते एक ख़ास साक्षात्कार के साथ हम फिर उपस्थित होंगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में। अब मेरी और आपकी अगली मुलाक़ात होगी कल सुबह 'सुर-संगम' में। तब तक के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!

Saturday, October 2, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (१०) - ऐसीच हूँ मैं कहकर इंदु जी जीत लेती हैं सबका दिल

'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। "आज है २ अक्तुबर का दिन, आज का दिन है बड़ा महान, आज के दिन दो फूल खिले हैं, जिनसे महका हिंदुस्तान, नाम एक का बापू गांधी और एक लाल बहादुर है, एक का नारा अमन एक का जय जवान जय किसान"। समूचे 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और महान नेता लाल बहादुर शास्त्री को उनकी जयंती पर स्नेह नमन अर्पित करते हुए आज का यह अंक शुरु कर रहे हैं। 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', दोस्तों, यह 'आवाज़' का एक ऐसा साप्ताहिक स्तंभ है जिसमें हम आप ही की बातें करते हैं जो आप ने हमें ईमेल के माध्यम से लिख भेजा है। यह सिलसिला पिछले १० हफ़्तों से जारी है और हर हफ़्ते हम आप ही में से किसी दोस्त के ईमेल को शामिल कर आपके भेजे हुए यादों को पूरी दुनिया के साथ बाँट रहे हैं। आज के अंक के लिए हम चुन लाये हैं हमारी प्यारी इंदु जी का ईमेल और उनकी पसंद का एक निहायती ख़ूबसूरत गीत। आइए अब आगे का हाल इंदु जी से ही जानें।

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कुछ बड़े प्यारे गाने हैं, जिनको भी सुनाया, आश्चर्य! सबने कहा 'हमने इन्हें पहले नही सुने'। उस खजाने मे से अभी सिर्फ एक गीत आपको भेज रही हूँ। आप सुनिए और ओनेस्टली बताइए कि क्या आपने या सुजॉय ने इस गाने को पहले कभी सुना है? यह गाना है फ़िल्म 'दूज का चाँद' का, "चाँद तकता है इधर", मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर ने गाया है। अगर मुझसे पूछोगे कि ये गाना मुझे क्यों पसंद है? क्यों बताऊँ जी? ये कोई बात हुई? वृन्दावन गई थी, सोचा बरसाना भी हो आये 'वियोगिनी राधाजी' के दर्शन ही हो जाये? यूँ अपनी कल्पना और बनाई छवि के विपरीत पाया वहाँ सब। सिवाय प्रत्येक पेड़ पर लिखे 'राधे रानी' के नाम के। वर्तमान ब्रज से आँखें मूँद मैं 'उस' ब्रज में घूमती रही। कालिंदी के तट पर जा कर हम बैठ गए। तभी बड़े बेटे ने कहा -'मम्मी ! देखो कितना प्यारा गाना बज रहा है!' वो यही गाना था। "चाँद तकता है इधर आओ कही छुप जाए, कहीं लागे ना नजर आओ कही छुप जाएँ"। गाना मधुर था। प्रेम रस में डूबा हुआ। कहीं ऐसा कुछ नही था कि कोई गम्भीर हो जाये। मैं आँखें बंद कर कालिंदी के तट पर ये गीत सुनती रही। सुन रही थी, फिल्म या नायक नायिका के नाम से तक परिचित नही थी। इसलिए आँखों के सामने कोई नही आया। आया तो सिर्फ कृष्ण....... और मैं??? जैसे राधा थी उस पल। ऐसीच हूं मैं। जाने किस दुनिया की अजीब 'प्राणी'............ इस साधारण से प्रेम गीत ने मुझे भाव विभोर कर दिया और आज भी कर देता है। और मेरे आँसू तब भी नही रुके....आज भी नही रुकते। मैं नही रहती तब आपकी इस दुनिया का हिस्सा। इसीलिए मुझे पसंद है ये गाना, मुझे एकाकार कर देता है 'उससे', फिर मुझे किसी भजन या भक्ति गीत की आवश्यकता नही रहती बाबा! ऐसिच हूं मैं।

इंदु।

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वाह इंदु जी, आपके अंदाज़-ए-बयाँ के तो कहने ही क्या! एक बेहद सुमधुर गीत की तरफ़ आपने हमारा ध्यान आकृष्ट करवाया है। सिर्फ़ हम ही नहीं, इस गीत को बहुत लोगों ने एक लम्बे अरसे से नहीं सुना होगा। यह हमारी बदक़िस्मती ही है कि ऐसे और इस तरह के न जाने कितने सुरीले गीतों पर वक़्त का धूल चढ़ चुकी है। आइए हम सब मिल कर इस तरह के गीतों पर जमी मैल को साफ़ करें और उन्हें 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का हिस्सा बनायें। साहिर लुधियानवी के बोल, रोशन की तर्ज़, और आवाज़ को बता ही चुके हैं, रफ़ी और सुमन की। सुनते हैं फ़िल्म 'दूज का चाँद' का यह बेहद सुरीला नग़मा।

गीत - चाँद तकता है इधर (दूज का चाँद)


दोस्तों, इंदु जी की तरह अगर आप भी ऐसे ही किसी गीत की तरफ़ हमारा ध्यान आकृष्ट करवाना चाहते हैं तो हमें ईमेल करें oig@hindyugm.com के पते पर। इसके अलावा आप अपने जीवन की कोई यादगार घटना, कोई संस्मरण, या कोई ऐसा गीत जिसके साथ आपकी यादें जुड़ी हुई हैं, हमें लिख भेजें इस स्तंभ के लिए। ख़ास कर हमारे उन दोस्तों से, जिन्होंने अभी तक हमें ईमेल नहीं किया है, उनसे तो हमारा ख़ास निवेदन है कि इस स्तंभ में भाग लेकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' परिवार का हिस्सा बन जायें। साथ ही 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को और भी बेहतर बनाने के लिए अगर आपके पास कोई सुझाव हो, तो उसे भी आप oig@hindyugm.com पर लिख सकते हैं। तो इसी उम्मीद के साथ कि आप अपना साथ युंही बनाये रखेंगे, आज के लिए हम विदा लेते हैं, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमीत कड़ी के साथ हम फिर हाज़िर होंगे कल शाम भारतीय समयानुसार ६:३० बजे। नमस्कार!

प्रस्तुति: सुजॊय

Saturday, August 7, 2010

ओल्ड इस गोल्ड - ई मेल के बहाने यादों के खजाने - ०२

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' - 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस साप्ताहिक विशेषांक में आज दूसरी बार हमारी और आपकी मुलाक़ात हो रही है। आज की कड़ी के लिए हमने चुना है हमारी अतिपरिचित और प्यारी दोस्त इंदु पुरी गोस्वामी जी की फ़रमाइश का एक गीत। जी हाँ, वो ही इंदु जी जिनकी बातें हमारे होठों पर हमेशा मुस्कुराहट ले आती है। क्या ख़ूब तरीका है उनका 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के पहेलियों का पहेली के ही रूप में जवाब देने का! लेकिन आज वो ईमेल के बहाने जो गीत हमें सुनवा रही हैं और इस गीत से जुड़ी जो यादें हमारे साथ बांट रही हैं, वो थोड़ा सा संजीदा भी है और ग़मज़दा भी। दरअसल बात ऐसी थी कि बहुत दिनों से ही इंदु जी ने हमसे इस गीत को सुनवाने का अनुरोध एकाधिक बार किया था। लेकिन किसी ना किसी वजह से हम इसे सुनवा नहीं सके। कोई ऐसी शृंखला भी नहीं हुई जिसमें यह गीत फ़िट बैठता। और शायद इसलिए भी क्योंकि अब तक हमें यह नहीं मालूम था कि इंदु जी को यह गीत पसंद किसलिए है। अगर पता होता तो शायद अब तक हम इसे बजा चुके होते। ख़ैर, देर से ही सही, हम तो अब जान गए इस गीत को इतना ज़्यादा पसंद करने के पीछे क्या राज़ छुपा है, आप भी थोड़ी देर में जान जाएँगे। तो लीजिए, अब आगे की बातें पढ़िए इंदु जी के शब्दों में जो उन्होंने हमें लिख भेजा है हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर।

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प्रिय सुजोय जी,

नमस्ते!

कोई गाना हमे क्यों अच्छा लगने लगता है कई बार उसके पीछे कोई और कई कारण होते हैं, कई बार कोई भी कारण नही होता। बस अच्छे लगते हैं अपने खूबसूरत शब्दों के कारण, अपने मधुर संगीत के कारण। यह जो गाना है "युंही दिल ने चाहा था रोना रुलाना", इस गाने में ये दोनों चीजें तो है ही, दो कारण और भी हैं -

१. मेरा एक भतीजा था अविनाश- अविनाश पुरी गोस्वामी- २६ साल का। सुन्दर, स्मार्ट, कोंफ़िडेंट। प्यारा सा एक बच्चा भी है उसके, उस समय डेढ़-दो साल का ही था बच्चा। अविनाश को पुराने गानों में से ये गाना बहुत पसंद था। अविनाश अचानक चल बसा। इकलौता बेटा था...... जब भी ये गाना सुनती हूँ, जैसे वो पास आ बैठता है। लगता है यहीं कहीं है और मुझसे बोलेगा 'एक बार और लगाओ ना यही गाना बुआ!'

२. मैं समाजसेवी नही हूँ। किन्तु, कुछ करती रहती हूँ। ऐसा कुछ जो मुझे सुकून दे। अक्सर कहती भी रहती हूँ ना बहुत स्वार्थी औरत हूँ मैं। बस .....इसी कारण.....जिन बच्चों की किसी को जरूरत नही, जिन्हें मरने के लिए फेंक दिया जाता है, उन्हें लोगो को मोटिवेट कर के परिवार, माता-पिता मिल जाये ऐसा कुछ करती रहती हूँ। इन बच्चों को हॉस्पिटल से ही परिवार तक पहुँचाने में परिवार और प्रशासन के बीच जो भी रोल प्ले करना होता है करती हूँ। पिछले दिनों एक बच्चे को परिस्थितिवश घर लाना पड़ गया। 'वे' उसे मार देते या फेंक देते। चार महीने 'वो' नन्हा एंजिल मेरे पास रहा। मेरे पेट पर सोता, करवट लेने पर कमर पर लटका कर सुलाने की आदत डाल दी उसकी। इन सब की उससे ज्यादा मेरी आदत पड़ गई। पहचानने लगा था मुझे। हम सब उसे बहुत प्यार करने लगे थे। किन्तु..... उसके जवान होने और पैरों पर खड़े होने तक मुझे कम से कम जिन्दगी के बाईस पच्चीस साल चाहिए। परिवार की ख़ुशी के लिए भी कई बार...... और वो चला गया, एक बहुत अच्छे घर में जहाँ उसे सब पागलपन की हद तक कर प्यार करते हैं। किन्तु इसी जन्म में मुझे राधे, मीरा और यशोदा का जीवन दे गया। सुजॊय! ये सब तुम्हे मेरा पागलपन लगे किन्तु......हर बार कृष्ण ऩे मुझे और मेरी गोद को ही क्यों चुना या चुनते हैं और छोड़ कर चले जाते हैं कभी वापस ना लौटने के लिए? उसे याद करके रो भी नही सकती। मेरा ये सब काम करना बंद करवा देंगे सब मिल कर। इसलिए ये गाना एक बहाना बन जाता है मेरे लिए उसे याद करने का या फूट फूट कर रोने का। क्या कहूँ? नही मालूम ईश्वर क्या चाहता है मुझसे पर सोचती हूँ कैसे जी होगी यशोदा या राधा अपने कृष्ण के जाने के बाद? मैं तो जी रही हूँ....कि फिर ईश्वर किसी कृष्ण को मेरी गोद में भेजेगा और रोने के लिए यही गीत फिर एक बहाना बन जायेगा मेरे लिए कि "यूँही दिल ऩे चाहा था रोना रुलाना, तेरी याद तो बन गई एक बहाना"।

चाहो तो मेरी पसंद के ये कारण बता देना और चाहो तो एडिट कर कोई खूबसूरत बहाना बना देना, पर..........सच तो यही है.

प्यार,

तुम्हारी दोस्त,

इंदु



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इंदु जी, मेरे पास कोई शब्द नहीं है, मेरी उंगलियाँ की-बोर्ड पर नहीं चल पा रहे हैं। शायद ही कोई होगा जिसकी आँखें इस वक़्त आपकी इन बातों को पढ़कर नम नहीं हुई होंगी! हम आपके जिस इमेज से वाक़ीफ़ हैं, आपकी शख़्सीयत का यह दूसरा पहलू जानकर जितन आश्चर्य हुआ, उससे कई गुणा ज़्यादा हमारे दिल में आपकी इज़्ज़त और बढ़ गई। क्या कहूँ, यह गीत मुझे भी बेहद बेहद बेहद पसंद है (मैंने आपसे पहले भी ज़िक्र किया था इस बारे में), और हर बार इस गीत को सुनते हुए मेरी आँखें नम हो जाती रही हैं। लेकिन आज तो गीत सुने बग़ैर ही आँखें छलक रही हैं। अब तो इस गीत के साथ आपका नाम भी इस तरह से जुड़ गया है कि अब आगे से जब भी इस गीत को सुनूँगा, आपका ख़याल ज़रूर आएगा। आपके इन अनमोल बच्चों के लिए कुछ करने के प्रयास में अगर मैं आपकी कोई सहायता हर सकूँ तो मुझे अत्यन्त ख़ुशी होगी। लीजिए आप भी सुनिए और हमारे सभी श्रोताओं, आप सब भी सुनिए इंदु जी की पसंद पर फ़िल्म 'दिल ही तो है' से सुमन कल्याणपुर का गाया साहिर की रचना, संगीत रोशन का है। हम सभी की तरफ़ से अविनाश को स्मृति-सुमन और उस "नन्हे एंजिल" को एक उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएँ। और हाँ इंदु जी, एक और बात, आप जैसे लोग ही इस दुनिया में रहने के क़ाबिल भी हैं और हक़दार भी, यकीन मानिए.....

गीत - युंही दिल ने चाहा था रोना रुलाना


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। हमारे पास इंदु जी को शुक्रिया अदा करने के लिए शब्द नहीं है जिन्होंने अपने जीवन की ये महत्वपूर्ण अनुभव हम सभी के साथ बांटी।

दोस्तों, इंदु जी की तरह अगर आपके जीवन में भी इस तरह के ख़ास अनुभव है, जिन्हें अब तक आपने अपने दिल में ही छुपाए रखा, शायद अब वक़्त आ गया है कि आप पूरी दुनिया के साथ उन्हें बांटे और अपना जी हल्का करें। तो देर किस बात की, जल्द से जल्द हमें लिख भेजिए अपने जीवन के यादगार अनुभव, खट्टे-मीठे अनुभव, जो कभी आपको हँसाते भी हैं और कभी वो यादें आपको रुला भी जाती हैं। ज़िंदगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुक़ाम, वो फिर नहीं आते, लेकिन उनकी यादें तो हमेशा हमेशा के लिए हमारे साथ रह जाती हैं जिन्हे हम बार बार याद करके उन पलों को, उन लम्हों को, उन अनुभवों को जीते हैं। और इन्ही यादों के ख़ज़ाने को ईमेल के बहाने समृद्ध करने के लिए हमारा यह एक छोटा सा प्रयास है आपके मनपसंद स्तंभ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के टीम की तरफ़ से। हमें ईमेल कीजिए oig@hindyugm.com के पते पर। और याद रहे, हम आपके ईमेल का बेसबरी से इंतेज़ार कर रहे हैं। अब आज के लिए इजाज़त दीजिए, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमीत अंक के साथ पुन: हाज़िर होंगे, नमस्कार!

प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

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