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Thursday, April 12, 2018

चित्रकथा - 63: अभिनेता राज किशोर को श्रद्धांजलि

अंक - 63

अभिनेता राज किशोर को श्रद्धांजलि

नहीं रहे ’पड़ोसन’ के ’लाहौरी’





फ़िल्म जगत के जानेमाने चरित्र अभिनेता राज किशोर जी का 6 अप्रैल 2018 को 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने बहुत सी फ़िल्मों में छोटी पर यादगार भूमिकाएँ निभाई हैं। यह अफ़सोसजनक बात है कि आज उनके जाने के बाद अधिकांश लोगों ने केवल ’पड़ोसन’ और ’शोले’ के साथ उनके नाम को जोड़ा जबकि उनके द्वारा अभिनीत फ़िल्मों की सूची बहुत लम्बी है। 1949 से 1997 के बीच राज किशोर जी ने 90 से अधिक फ़िल्मों में अभिनय किया है। आइए आज ’चित्रकथा’ में हम एक नज़र डालें राज किशोर अभिनीत फ़िल्मों पर, और उनके द्वारा निभाए महत्वपूर्ण चरित्रों की बातें करें। ’चित्रकथा’ का आज का यह अंक समर्पित है स्वर्गीय राज किशोर की पुण्य स्मृति को!




कोई अभिनेता दर्शकों के दिलों पर राज करे, इसके लिए यह कत‍ई ज़रूरी नहीं है कि उस अभिनेता द्वारा निभाए गए किरदार लम्बी अवधि के हों। अगर अभिनेता में काबिलियत है तो चन्द मिनटों के अभिनय से ही वो बाज़ी मार सकते हैं। फ़िल्म जगत में ऐसे कई चरित्र अभिनेता हुए हैं जिन्होंने अपने छोटे पर असरदार अभिनय से लोगों के दिलों पर राज किया है। ऐसे ही एक अभिनेता रहे राज किशोर, जिन्होंने अपनी फ़िल्मों में छोटे किरदार निभाए, पर वो उतने ही यादगार रहे और आज भी अच्छे फ़िल्मों के शौकीन उन्हें याद करते हैं। वास्तविक जीवन में अत्यन्त मिलनसार राज किशोर ने अपनी ज़िन्दगी को बेहतरीन तरीके से जिया। राज किशोर की मृत्यु का समाचार देते समय Cine and TV Artists' Association (CINTAA) की सदस्या नुपुर अलंकार ने बताया। राज किशोर का अभिनय सफ़र शुरु हुआ था सन् 1949 में जब उन्होंने ’पतंगा’ और ’अपराधी’ फ़िल्मों में अभिनय किया। अगले पन्द्रह वर्षों तक उन्होंने कई फ़िल्मों में छोटे-मोटे किरदार निभाते हुए इंडस्ट्री में बने रहे। 1951 से 1963 के बीच उनके अभिनय वाली फ़िल्में थीं ’दामाद’, ’औरत’, ’बड़े सरकार’, ’तीन उस्ताद’, ’छोटे नवाब’, ’राष्ट्रवीर’, ’बिजली चमके जमना पार’ और ’एक दिल सौ अफ़साने’। इन सभी फ़िल्मों में उन्होंने जुनियर आर्टिस्ट के किरदार निभाए, कभी नौकर बने, कभी नकली डॉक्टर, कभी रेल-यात्री तो कभी चोर। इस दौर में उनकी सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और जैसा भी काम उन्हें मिलता, वो पूरी लगन और मेहनत से करते चले गए।

राज किशोर की मेहनत और लगन रंग लायी वर्ष 1965 में जब केवल कश्यप निर्मित एवं एस. राम शर्मा निर्देशित कालजयी फ़िल्म ’शहीद’ में उनका चुनाव हुआ। भगत सिंह की भूमिका में मनोज कुमार, राजगुरु की भूमिका में आनन्द कुमार, सुखदेव की भूमिका में प्रेम चोपड़ा, चन्द्रशेखर आज़ाद की भूमिका में मनमोहन जैसे कलाकार थे। भगत सिंह - राजगुरु - सुखदेव को जिस "अपराध" के लिए फाँसी की सज़ा हुई थी, उसका सीधा संबंध जय गोपाल नामक व्यक्ति का था। और इस महत्वपूर्ण चरित्र जय गोपाल के लिए चयन हुआ राज किशोर का। इस चरित्र के दो रूप थे - एक देशभक्त का और एक रूप ग़द्दार का। तीनों क्रान्तिकारियों ने जिस दिन स्कॉट को मारने की योजना बनाई, उस दिन जय गोपाल द्वरा उन्हें गोली चलाने के लिए हरी झंडी दिखाना था। लेकिन बदक़िस्मती से स्कॉट उस दिन छुट्टी पर रहे और जय गोपाल ने सौन्डर्स को स्कॉट समझ कर गोलियाँ बरसाने की हरी झंडी दिखा दी। भगत सिंह और राजगुरु की गोलियों से सौन्डर्स छलनी हो गए। यह जय गोपाल की पहली ग़लती थी, लेकिन उसकी दूसरी ग़लती क्षम्य नहीं थी जब उसने मामले के दौरान कोर्ट में यह गवाही दे दी कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने गोलियाँ चलाई थीं। उनके इस गवाही की वजह से 23 मार्च 1931 को तीनों क्रान्तिकारी शहीद हो गए। इस वजह से कहा जाता है कि सुखदेव इतने अधिक नाराज़ हो गए थे कि वो जेल में जय गोपाल के साथ कुछ समय अकेले में बिताना चाहते थे ताकि तो जय गोपाल का गला घोंट सके। जय गोपाल के इस महत्वपूर्ण चरित्र के लिए राज किशोर का चुनाव उनके लिए बड़ी बात थी। और उन्होंने इस चरित्र को सही अर्थ में साकार भी किया।


’शहीद’ के बाद अगले तीन सालों तक राज किशोर फिर से अलग अलग किरदारों में नज़र आने लगे। ’हमराज़’ में होटल रिसेप्शनिस्ट, ’राम और श्याम’ में रेस्तोरां का वेटर, ’मेहरबान’ में गधामहाराज जी के भक्त, ’हरे कांच की चूड़ियाँ’ में नायक का कॉलेज मित्र नट्टू, ’शिकार’ में एक डान्सर तथा ’हम कहाँ जा रहे हैं’ व ’साधु और शैतान’ में भी अभिनय करने के बाद 1968 में उनकी अगली बड़ी फ़िल्म आई ’पड़ोसन’ जिसमें उनके अभिनय ने दर्शकों को ख़ूब गुदगुदाया। इस फ़िल्म का पार्श्व तो सर्वविदित है। किशोर कुमार द्वारा अभिनीत विद्यापति का चरित्र एक संगीत गुरु का था, जिनके तीन भक्त या शागिर्द या चेले थे। इन तीनों के नाम शहरों के नामों पर आधारित थे - बनारसी, कलकत्तिया और लाहौरी। इन तीन छोटे पर महत्वपूर्ण किरदारों के लिए चयन हुआ मुकरी का बनारसी के लिए, केष्टो मुखर्जी का कलकत्तिया के लिए, और राज किशोर का लाहौरी के लिए। हालाँकि भोला के चरित्र में सुनिल दत्त, विद्यापति के चरित्र में किशोर कुमार, मास्टर पिल्लई की भूमिका में महमूद और बिंदु की भूमिका में सायरा बानो ही फ़िल्म के मुख्य पात्र थे, पर विद्यापति के किरदार को बूस्ट-अप करने के लिए इन तीन अतिरिक्त चरित्रों को रखा गया था और इन तीनों ने अपने अपने अंदाज़ से इन चरित्रों को साकार किया। किसी ने इस तिकड़ी के बारे में इंटरनेट पर कुछ यूं लिखा है - "Vidyapati manages a bizarre nautanki drama troupe consisting of a bunch of imbeciles called Banarasi, Kalkattiya and Lahori doing proud to their origins (Mukri, Keshto Mukherjee and Raj Kishore respectively), who don’t mind walking out of stage mid-way through their program unmindful of a hooting audience, when good friend Bhola gate-crashes into the stage seeking their help." निस्संदेह ’पड़ोसन’ राज किशोर के फ़िल्मी सफ़र का अब तक का सर्वाधिक लोकप्रिय चरित्र रहा है। 1969 से 1974 तक राज किशोर फिर से उन्हीं छोटे-मोटे किरदारों में नज़र आते रहे, कभी डाकू, कभी ज्योतिषी, कभी हवलदार तो कभी बार के वेटर के रूप में। ये फ़िल्में हैं ’माधवी’, ’यादगार’, ’शराफ़त’, ’भाई-भाई’, ’मेला’, ’प्रीतम’, ’रखवाला’, ’Johar Mehmood in Hong Kong', 'Bombay to Goa', 'गरम मसाला’, ’Double Cross', 'अनामिका’, ’Mr. Romeo', और 'माँ बहन और बीवी’। 1971 की देव आनन्द की कालजयी कृति ’हरे रामा हरे कृष्णा’ में राज किशोर ने ’सखी’ नामक चरित्र को निभाया था।  


1975 का वर्ष राज किशोर के लिए फिर एक बार स्वर्णिम वर्ष सिद्ध हुआ। इस साल उन्हें अमिताभ बच्चन अभिनीत तीन बेहद महत्वपूर्ण और बड़ी फ़िल्मों में अभिनय का मौका मिला। ये फ़िल्में थीं ’ज़मीर’, ’दीवार’ और ’शोले’। फ़िल्म ’दीवार’ में उन्होंने ’दर्पण’ नामक किरदार के ज़रिए अमिताभ बच्चन के साथ स्क्रीन शेअर किया। रमेश सिप्पी की कालजयी कृति ’शोले’ में हर एक चरित्र अपने आप में यादगार हो गया है और हर चरित्र की अपनी अलग पहचान बन गई है। इस फ़िल्म में जेल के दृश्यों का बड़ा महत्व रहा। असरानी ने ’ब्रिटिश के ज़माने के जेलर’ के रूप में ख़ूब वाहवाही बटोरी। उसी जेल में एक क़ैदी था जिसे समलैंगिक स्वभाव वाले हास्य चरित्र के रूप में दिखाया गया। राज किशोर अभिनीत इस चरित्र को वीरू (धर्मेन्द्र) की तरफ़ हास्यास्पद तरीके से कमेन्ट पास करता हुआ दिखाया गया। धर्मेन्द्र और अमिताभ के साथ उनका यह दृश्य आज भी दर्शकों को अच्छी तरह से याद है। इसी साल ’दो जासूस’ फ़िल्म में भी राज किशोर नज़र आए मुख्य खलनायक प्रेम चोपड़ा के सहयोगी के रूप में। एक सच्चे अभिनेता की यही पहचान है कि चाहे पात्र कोई भी हो, उसे वास्तविक रूप प्रदान करना ही उसका काम है। और हर बार राज किशोर ने यह सिद्ध किया है अपने जानदार अभिनय से। 1976 में ’दीवानगी’ में एक स्टेज ऐक्टर और ’बंडलबाज़’ में इन्सपेक्टर शर्मा, तथा 1977 में ’इमान धरम’ में मुंशी की भूमिकाएँ निभाने के बाद इसी साल राजेश खन्ना अभिनीत ’अनुरोध’ में वो नज़र आए शायर माहिर लखनवी के किरदार में।

80 के दशक में भी राज किशोर क आभिनय सफ़र जारी रहा। उनके अभिनय से सजी इस दशक की कुछ चर्चित फ़िल्मों के नाम हैं ’ख़ानदान’, ’मन पसंद’, ’आंचल’, ’सनम तेरी क़सम’, ’तेरी क़सम’, ’दर्द का रिश्ता’, ’कलाकार’, ’लव मैरेज’, ’करिश्मा कुदरत का’, ’लल्लु राम’, ’हुकूमत’, ’पुरानी हवेली’ और ’अव्वल नंबर’। 90 के दशक में ’King Uncle’, ’फूल और अंगार’, ’दलाल’ के बाद 1995 की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म ’करण-अर्जुन’ में राज किशोर ने जुगल का किरदार निभाया। राज किशोर के फ़िल्मी सफ़र की एक और ख़ास बात यह थी कि उन्होंने कई हॉरर और सस्पेन्स फ़िल्मों में अभिनय किया है। यह भी उनके अभिनय का ही कमाल था कि इस तरह की कहानियों में जिस तरह के भाव प्रकट होने चाहिए, वैसा वो सहजता से कर लेते थे। और यही कारण है कि हॉरर फ़िल्मों के लिए प्रसिद्ध बैनर ’रामसे ब्रदर्स’ तक ने उन्हें अपनी फ़िल्मों में अभिनय करवाया। इस श्रेणी की फ़िल्मों में उनकी उल्लेखनीय फ़िल्में हैं ’सनसनी - दि सेनसेशन’ (1981), 'Dial 100' (1982), 'काली बस्ती’ (1985), 'तहख़ाना’ (1986), 'ज़िन्दा लाश’ (1986), ’पुरानी हवेली’ (1989), 'अजूबा कुदरत का’ (1991)। 1997 में राज किशोर के अभिनय वाली आख़िरी फ़िल्म आई ’मिस्टर ऐण्ड मिसेस खिलाड़ी’। अक्षय कुमार - जुही चावला अभिनीत इस फ़िल्म में राज किशोर ने एक प्रकाशक का किरदार निभाया। इस फ़िल्म के बाद राज किशोर ने फ़िल्मों से सन्यास ले लिया। उस समय उनकी उम्र 64 वर्ष थी। अगले बीस सालों तक वो अपना "सेवा-निवृत्त" जीवन यापन कर रहे थे। शारीरिक रूप से सक्रीय राज किशोर पिछले कुछ दिनों से पेट की बीमारी से पीड़ित थे और कुछ ही रोज़ पहले उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। 

राज किशोर भी चले गए। एक एक कर सिनेमा के सुनहरे दौर के नक्षत्र अस्त होते जा रहे हैं। लेकिन उनकी चमक कभी कम नहीं होगी। आने वाली पीढ़ियाँ भी इनके द्वारा निभाए इन अमर किरदारों को देख कर चमत्कृत होती रहेंगी। राज किशोर जी की याद में जानेमाने फ़िल्म समीक्षक पवन झा ने ट्वीट किया - "Good Small-time actors are like the musical instruments in big orchestra who help to create & set ambiance for a scene & still manage to get a glance. RajKishore, 85, will remain a significant happy memory of Two great Ensembles of Hindi Cinema - Sholay & Padosan. Rest in Peace!" ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से हम स्वर्गीय राज किशोर को दे रहे हैं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि।

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





आलेख : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Wednesday, April 1, 2009

एक चतुर नार करके शृंगार - ऐसी मस्ती क्या कहने...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 39

ज तो 'ओल्ड इस गोल्ड' की महफ़िल में होने जा रहा है एक ज़बरदस्त हंगामा, क्योंकि आज हमने जो गीत चुना है उसमें होनेवाला है एक ज़बरदस्त मुक़ाबला. यह गीत ना केवल हंगामाखेज है बल्कि अपनी तरह का एकमात्र गीत है. इस गीत के बनने के बाद आज 40 साल गुज़र चुके हैं, लेकिन इस गीत को टक्कर दे सके, ऐसा कोई गीत अब तक ना बन पाया है और लगता नहीं भविष्य में भी कभी बन पाएगा. ज़्यादा भूमिका ना बढाते हुए आपको बता दें कि यह वही गीत है फिल्म "पड़ोसन" का जिसे आप कई कई बार सुन चुके होंगे, लेकिन जितनी बार भी आप सुने यह नया सा ही लगता है और दिल थाम कर गाना पूरा सुने बगैर रहा नहीं जाता. जी हाँ, आज का गीत है "एक चतुर नार करके शृंगार". 1968 में फिल्म पड़ोसन बनी थी जिसमें किशोर कुमार, सुनील दत्त, सायरा बानो और महमूद ने अभिनय किया था. अभिनय क्या किया था, इन कलाकारों ने तो जैसे कोई हास्य आंदोलन यानी कि 'लाफ रोइट्स' ही छेड दिया था. 'सिचुयेशन' यह थी कि सुनील दत्त अपनी पडोसन सायरा बानो पर मार मिटे थे लेकिन सायरा बानो उन्हे भाव भी नहीं दे रही थी. तो जब संगीत मास्टर के रूप में महमूद सायरा बानो को गाना सिखाने आते हैं तो सुनील दत्त अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्हे परेशान करते हैं. और इन दोस्तों में शामिल थे कोई और नहीं बल्कि हमारे किशोर-दा. ऐसे असाधारण 'सिचुयेशन' पर एक कामयाब गीत लिखना और उससे लोगों के दिलों तक पहुँचाना कोई आसान काम नहीं था. लेकिन पड़ोसन की पूरी 'टीम' ने जो कमाल इस गाने में कर दिखाया है उसका शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. इसका सिर्फ़ और सिर्फ़ सुनकर ही आनंद उठाया जा सकता है.

कहा जाता है कि भले ही राजेंदर कृष्ण ने यह गीत लिखा है और आर डी बर्मन ने संगीतबद्ध किया है, लेकिन इस गीत में किशोर कुमार ने भी कई चीज़ें अपनी ओर से डाली थी और इस गाने का जो अलग अंदाज़ नज़र आता है वो उन्ही की बदौलत है. इस गीत में मन्ना डे को महमूद के लिए 'प्लेबॅक' करना था. क्योंकि महमूद फिल्म में एक शास्त्रिया गायक के चरित्र में थे और उन दिनों मन्ना डे उनके लिए पार्श्वगायन किया करते थे, इसलिए जब महमूद और उस पर शास्त्रिया संगीत की बात आई तो मन्ना डे के अलावा किसी और के बारे में सोचा तक नहीं गया. लेकिन मन्ना डे को एक बात खटक रही थी की उस गीत में जो मुक़ाबला होता है उसमें महमूद हार जाते हैं. उन्हे यह बात ज़रा पसंद नहीं आई की एक अच्छा शास्त्रिया गायक होने के बावजूद उन्हे एक ऐसे गायक किशोर से हारना होगा जिसे शास्त्रिया संगीत नहीं आती. लेकिन वो आखिर मान गये और हमें मिला हास्य गीतों का यह सरताज गाना. एक बात और आपको यहाँ बता दें कि किशोर कुमार का जो चरित्र इस फिल्म में था वो प्रेरित था शास्त्रीय गायक धनंजय बेनर्जी से जो कि उन्ही के रिश्तेदार थे. लेकिन ऐसा भी पढ्ने सुनने में आता है कि किशोर ने अपनी आँखों की मुद्राएँ खेमचंद प्रकाश से नकल की, जो एक अच्छे नर्तक भी थे. और चलने का अंदाज़ उन्होने नकल किया बर्मन दादा, यानी कि एस डी बर्मन का. दोस्तों, आप शायद बेक़रार हो रहे होंगे इस गीत को सुनने के लिए, तो मैं और ज़्यादा आपका वक़्त ना लेते हुए पेश करता हूँ आज का 'ओल्ड इस गोल्ड', सुनिए...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ये वो ग़ज़ल है जिस पर नौशाद साहब मर मिटे थे.
२. लता - मदन मोहन की बेमिसाल टीम.
३. कुछ और कहने की जरुरत है क्या ? :)

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर पारुल ने सबको मात दी, पारुल के साथ साथ नीरज जी, मनु जी को भी सही गीत पहचानने की बधाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Tuesday, September 2, 2008

कोई हमदम न रहा... किशोर कुमार ( २ )

अवनीश तिवारी लिख रहे हैं हरफनमौला फनकार किशोर कुमार के सगीत सफर की दास्तान, जिसकी पहली कड़ी आप यहाँ पढ़ चुके हैं, अब पढ़ें आगे -

साथियों ,
इस महीने याद करेंगे किशोर कुमार के जीवन के उस दशक की जो उनके भीतर के कुदरती कला को प्रस्तुत कर उनको एक बेजोड़ कलाकार के रूप में स्थापित करता है. १९६०-१९७० का वह दशक हिन्दी फ़िल्म जगत में किशोर के नाम से छाया रहा चाहे अभिनय हो, संगीत बनाना हो या गाना गाना और या फ़िर फिल्मो का निर्देशन, लगभग फिल्मी कला के हर क्षेत्र में किशोर ने सफल प्रयोग किए. किसी साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि उन दिनों वे इतने व्यस्त थे कि एक स्टूडियो से दुसरे स्टूडियो जाते समय, चलती गाडी में ही अगले दिए गए कामों (assignments) की तैयारी करने लगते.

इस सुनहरे दशक में किशोर के अभिनय और आवाज़ की कुछ यादगार फिल्मे -

१. १९६० - बेवकूफ , गर्ल फ्रेंड
गर्ल फ्रेंड फ़िल्म सत्येन बोश की निर्देशित फ़िल्म थी जिसका एक गीत अपनी छाप छोड़ गया गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ गाया गीत " कश्ती का खामोश सफर है " यादगार रहा

२. १९६१ - झुमरू
किशोर के हरफनमौला होने का परिचय देती यह फ़िल्म कभी भुलाई नही जा सकती इसके योडेल्लिंग अंदाज़ में गाये सारे गीत आज भी ताजे हैं " कोई हम दम ना रहा , कोई सहारा ना रहा ..." यह गीत तो किशोर को भी बेहद पसंद था बड़े भाई अशोक कुमार भी इसी गीत से छोटे किशोर को याद कर लिया करते थे



३. १९६२ - बॉम्बे का चोर - माला सिन्हा के साथ अभिनय किया

४. १९६२ - Half Ticket - अभिनेत्री मधुबाला के साथ की यह फ़िल्म मस्ती और हंसी से भरपूर थी बच्चों की तरह शरारत करते किशोर को खूब पसंद किया गया

५. १९६४ - दूर गगन की छाँव में - " आ चल के तुझे मैं लेकर चलूं ..." यह मीठा गाना काफी लोकप्रिय हुया
यह फ़िल्म किशोर को भी प्रिय थी

६. १९६५ - श्रीमान फंटूस - यह नाम लेते ही गम से दिल को भर जाने वाला गाना याद आ जाता है गाना था - " वो दर्द भरा अफ़साना ..." जितने भी बड़े स्टेज शो हुए, लगभग सभी में किशोर ने इस गीत को दोहराया

६. १९६७ - हम दो डाकू

७. १९६८ - पडोसन - यह एक ऐसी दिलचस्प फ़िल्म है कि जिसे १०० बार देखने के बाद भी देखने का मन करे
साइड हीरो के रूप में किए गए अभिनय से किशोर ने इसे आज तक जवां रखा है
" एक चतुर नार..." इस भिडंत गाने के लिए सफल गायक मन्ना दे ने तक किशोर के हुनर की दाद दी
शास्त्रीय संगीत से बेखबर किशोर ने तैयारी कर कामयाबी से इस गीत को पूरा किया

८. अन्य फिल्मे -
१९६८ - श्रीमान , पायल की झंकार
१९७० - आंसू और मुस्कान आदि ...

गायक बना संगीतकार -

संगीत की समझ आने पर किशोर ने संगीतकार का भी काम किया उनका हुनर यहाँ भी हिट हुया

१९६२ - झुमरू में संगीत बनाया इतना ही नही तो गीत के बोल भी लिखे और सभी जानते है गानों से ही यह फ़िल्म आज भी देखी जाती है

१९६४ - दूर गगन की छाँव में और १९६७ - हम दो डाकू में भी संगीत दिया

किशोर कुमार आपने गानों में योडेलीन के अंदाज़ के कारण जाने जाते रहे. यह नुस्खा उन्होंने अपने मझले भाई अनूप कुमार के एक रिकॉर्डिंग से छिप कर सीखा था. अनूपजी ने इसे विदेश से लाये थे.
गीत और संगीत में किशोर इतने उलझे थे कि उनके अभिनय के गीत उस समय मोहम्मद रफी जी को गाने पड़े.

साथ का यह फोटो किशोर कुमार के अलग अलग पहलू को बता रहा है.




गायकी में सम्मान -

यह एक सफल और कई मायनो में याद गार फ़िल्म रही १९६९ में शक्ति सामंत की फ़िल्म "आराधना"
राजेश खन्ना पर फिल्माए गीतों ने तो हिन्दी फिल्मो में Romantic Songs की कड़ी में एक हलचल सी मचा दी "मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू ..." और "रूप तेरा मस्ताना ..." - आज भी सुपर हिट है
" रूप तेरा मस्ताना ..." - इस गीत के लिए किशोर को जीवन का पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला
यही फ़िल्म है जहाँ से मशहूर संगीतकार आर. डी. बर्मन ने अपने पिता की गैरमौजूदगी में ख़ुद ब ख़ुद काम संभाला और फ़िर बस आगे चलते ही गए.

राजेश खन्ना बताते हैं कि पहली बार उनके लिए गाने से पहले किशोर दा ने उन्हें बुलाया और उनसे सवाल-जवाब किए. गानों के बन जाने पर राजेश जी को पता चला कि किशोर उस मुलाक़ात में उनके बोलने के अंदाज़ की मालूमात कर रहे थे. बस इसके बाद किशोर और राजेश खन्ना एक दुसरे के लिए पर्याय से हो गए.

१९६० में उस जमाने की मशहूर और खुबसूरत आदकारा मधुबाला के साथ शादी के बंधन में बंधे पारिवारिक नाराजगी के चलते उन्हें इस सम्बन्ध में तकलीफों का सामना करना पडा दिल की मरीज़ मधुबाला के इलाज़ के लिए किशोर ने कोशिश की लेकिन १९६९ में यह साथ टूट गया और बिना साथी के किशोर फ़िर अकेले पड़े.

गैर हिन्दी गाने -

असल में किशोर बंगाली थे और बंगला में भी गाने गाये १९६४ में सत्यजीत रॉय जैसे सफल निर्देशक की फ़िल्म "चारुलता" में उन्होंने गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर के बंगला गीत " आमी चीनी गो चीनी तोमारे ..." गीत को गाकर यह साबित कर दिया कि वे एक प्रतिभाशाली ( versatile ) कलाकार थे वे सत्यजीत रॉय के करीब रहे और "पाथर पंचोली" फ़िल्म के निर्माण में उन्होंने रोय जी की आर्थिक मदद भी की

इस तरह से १९६०-१९७० का दशक किशोर कुमार को एक कुशल कलाकार के रूप में देखता है

इस महीने के इस किशोरनामे को मैं कुछ पंक्तियों से सलाम करता हूँ -

गजब के सूर थे और खूबसरत थी आवाज़ ,
लाजवाब अभिनय था और अलग ही अंदाज़ ,
छीडके थे जो बीज अपने हुनर के तुमने ,
बन चमन महका करती है वो आज





- अवनीश तिवारी

( जारी...)

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