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बुधवार, 11 नवंबर 2009

कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है....कैफ़ इरफ़ानी के शब्दों में दिल का हाल कहा मुकेश ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५९

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शरद जी की पसंद की दूसरी नज़्म लेकर। इस नज़्म में जिसने आवाज़ दी है, उसके गुजर जाने के बाद बालीवुड के पहले शो-मैन राज कपूर साहब ने कहा था कि "मुकेश के जाने से मेरी आवाज और आत्मा,दोनों चली गई"। जी हाँ, आज की महफ़िल मुकेश साहब यानि कि "मुकेश चंद माथुर" को समर्पित है। यह देखिए कि शरद जी की बदौलत पिछली बार हमें मन्ना दा का एक गीत सुनना नसीब हुआ था और आज संगीत के दूसरे सुरमा मुकेश साहब का साथ हमें मिल रहा है। तो आज हम मुकेश साहब के बारे में, उनके पहले सफ़ल गीत, अनिल विश्वास साहब और नौशाद साहब से उनकी मुलाकात और सबसे बड़ी बात राज कपूर साहब से उनकी मुलाकात के बारे में विस्तार से जानेंगे।(साभार:लाइव हिन्दुस्तान) मुकेश चंद माथुर का जन्म २२ जुलाई १९२३ को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता लाला जोरावर चंद माथुर एक इंजीनियर थे और वह चाहते थे कि मुकेश उनके नक्शे कदम पर चलें. लेकिन वह अपने जमाने के प्रसिद्ध गायक अभिनेता कुंदनलाल सहगल के प्रशंसक थे और उन्हीं की तरह गायक अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे। लालाजी ने मुकेश की बहन सुंदर प्यारी को संगीत की शिक्षा देने के लिए एक शिक्षक रखा था। जब भी वह उनकी बहन को संगीत सिखाने घर आया करते थे, मुकेश पास के कमरे में बैठकर सुना करते थे और स्कूल में सहगल के अंदाज में गीत गाकर अपने साथियों का मनोरंजन किया करते थे। इस दौरान मशहूर संगीतकार रोशन हारमोनियम पर उनका साथ दिया करते थे। गीत-संगीत में रमे मुकेश ने किसी तरह दसवीं तक पढाई करने के बाद स्कूल छोड दिया और दिल्ली लोक निर्माण विभाग में सहायक सर्वेयर की नौकरी कर ली. जहां उन्होंने सात महीने तक काम किया। इसी दौरान अपनी बहन की शादी में गीत गाते समय उनके दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनी और प्रभावित होकर वह उन्हें १९४० में बम्बई ले आए और उन्हें अपने साथ रखकर पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत सिखाने का भी प्रबंध किया। इसी दौरान खूबसूरत मुकेश को एक हिन्दी फिल्म निर्दोष(१९४१) में अभिनेता बनने का मौका मिल गया, जिसमें उन्होंने अभिनेता-गायक के रूप में संगीतकार अशोक घोष के निर्देशन मेंअपना पहला गीत.दिल ही बुझ हुआ हो तो.भी गाया। इस फिल्म में उनकी नायिका नलिनी जयवंत थीं, जिनके साथ उन्होंने दो युगल गीत भी गाए। यह फिल्म फ्लाप हो गई और मुकेश के अभिनेता-गायक बनने की उम्मीदों को तगडा झटका लगा।

मुकेश का कैरियर जब डगमगाने लगा था, तभी मोतीलाल प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास के पास उन्हें लेकर गए और उनसे अनुरोध किया कि वह अपनी फिल्म में मुकेश से कोई गीत गवाएं। मुकेश को कामयाबी मिली निर्माता मजहर खान की फिल्म पहली नजर(१९४५) के गीत "दिल जलता है तो जलने दे" से जो संयोग से मोतीलाल पर ही फिल्माया गया था। अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में डा.सफदर सीतापुरी की इस गजल को मुकेश ने सहगल की शैली में ऐसी पुरकशिश आवाज में गाया कि लोगों को भ्रम हो जाता था कि इसके गायक सहगल हैं। और तो और खुद सहगल ने भी इस गजल को सुनने के बाद कहा था अजीब बात है। मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी यह गीत गाया है । इसी गीत को सुनने के बाद सहगल ने मुकेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। हालांकि इस गीत ने मुकेश को गायक के रूप में पहचान दिलाई लेकिन उन्हें यह कामयाबी इतनी आसानी से नहीं मिली। फिल्म जब रिलीज के लिए तैयार थी तब वितरकों और समालोचकों ने इसे देखने के बाद कहा कि गीत हीरो की छवि पर फिट नहीं बैठता है। उन्होंने इस गीत को फिल्म से हटाने का सुझाव दिया। यह सुनकर मुकेश की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने निर्माता मजहर खान से ही कोई सुझाव देने का अनुरोध किया। इस पर मजहर खान ने कहा कि यह गीत सिर्फ पहले शो के लिए फिल्म में रखा जाएगा। इस बारे अंतिम निर्णय दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने के बाद ही लिया जाएगा। दर्शकों से इस गाने को जब जबरदस्त तारीफ मिली और लोग यह गीत गाते हुए सिनेमाघर से निकलने लगे तब मजहर खान ने कहा मेरी बात याद रखना। एक दिन आएगा जब कोई मेरी फिल्म को याद नहीं रखेगा लेकिन तुम्हारा गीत हमेशा याद रखा जाएगा।
यह बात सच साबित हुई और आज देखिए भले हीं किसी को "पहली नज़र" की जानकारी हो या नहीं हो लेकिन "दिल जलता है तो जलने दे" हर किसी के दिल में जगह बनाए हुए है। और यह भी सच है कि आज ९०% लोग यही सोचते हैं कि इस गाने को खुद सहगल साहब ने गाया था। शायद यही कारण था कि मुकेश साहब अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे। अब इस प्रक्रिया में उनका साथ अनिल विश्वास साहब ने दिया या फिर नौशाद साहब ने, इसमें भयंकर मतभेद है। इसलिए हम दोनों का मत देख लते हैं।

बकौल अनिल विश्वास: मुकेश दूसरा कुंदनलाल सहगल बनने की चाह लिए मेरे पास आया था। उसने सहगल की आवाज में नौशाद का रिकार्ड सुना था, जो शाहजहां फिल्म का गीत "जब दिल ही टूट गया" था। इसलिए मैंने उससे पहली नजर में "दिल जलता है तो जलने दे" सहगल के अंदाज में गवाया। फिर मैंने मुकेश से कहा कि हमने यह बात साबित कर दी है कि हम एक और सहगल बना सकते हैं। पर अब यह साबित करना है कि मुकेश वास्तविक मुकेश है, सहगल की नकल भर नहीं है। मैंने मुकेश को सहगल के रूप में पेश किया और मैंने ही "अनोखा प्यार" में उसकी विशिष्ट आवाज में "जीवन सपना टूट गया" और "अब याद न कर भूल जा ऐ दिल वो फसाना" गवाकर उसे सहगल के प्रभाव से बाहर निकाला।

और नौशाद साहब की यह दलील थी:: मैंने दिलीप कुमार के लिए मेला और अंदाज में मुकेश से पहले-पहल उनकी विशिष्ट शैली में गवाया था। गायक बनने के प्रारंभिक दौर में मुकेश को शराब पीने की बडी हीं बुरी लत थी। एक दिन मैंने उन्हें कारदार स्टूडियो में दिन के समय नशे की हालत में पकड लिया। मैंने उनसे कहा मुकेशचंद तुम "दिल जलता है" से साबित कर चुके हो कि तुम सहगल बन सकते हो लेकिन अब क्या तुम साबित करना चाहते हो कि तुम पीने के मामले में भी सहगल को पछाड सकते हो। यह सुनकर मुकेश की आंखों में आंसू आ गए। मैंने कहा तुम्हारी अपनी अनूठी आवाज है तुम्हें अपनी गायकी को साबित करने के लिए सहगल या किसी दूसरे गायक की आवाज की नकल करने की जरूरत नहीं है।

अब चाहे इस बात का श्रेय जिसे भी मिले, लेकिन यह अच्छा हुआ कि हमें अनोखा एक मुकेश मिल गया जिसकी आवाज़ सुनकर हम आज भी कहीं खो-से जाते हैं, जो दूसरे गायकों को सुनकर कम हीं होता है। वैसे राजकपूर से मुकेश की मुलाकात की कहानी भी बड़ी हीं दिलचस्प है। १९४३ की बात है। उस समय राजकपूर सहायक निर्देशक हुआ करते थे। रंजीत स्टूडियो में जयंत देसाई की फिल्म "बंसरी" के सेट पर एक खूबसूरत नौजवान किन्हीं खयालों में खोया हुआ पियानो पर एक गीत गा रहा था। वहां से गुजर रहे राजकपूर उस गीत को सुनकर कुछ देर के लिए ठिठक गए। पूछने पर पता लगा कि वह युवक मुकेश है। आगे चलकर दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता हो गई और मुकेश आखिरी दम तक राजकपूर की आवाज बने रहे।

चलते-चलते हम मुकेश साहब के बारे में सलिल दा के ख़्यालात जान लेते हैं: जिस क्षण मैंने "सुहाना सफर" की रिकार्डिंग की, उसी समय मैं जान गया था कि मुकेश के स्वर ने "मधुमती" के इस गीत के अल्हड भाव को आत्मसात कर लिया है। मैं "जागते रहो" के "जिंदगी ख्वाब है" और "चार दीवारी" के "कैसे मनाऊं पियवा" को भी इस गीत से कमतर नहीं मानता हूं। बाद के वर्षों में मुकेश ने "आनन्द" के "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में भावनाओं की असीम गहराई को अपने मधुर स्वर से अभिव्यक्ति दी थी। इस गीत को मैं मुकेश के गाए गीतों में सर्वश्रेष्ठ मानता हूं। मुकेश साहब के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन बाकी बातें कभी दूसरे आलेख में करेंगे।

आज की नज़्म के रचनाकार कैफ़ इरफ़ानी साहब के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल नहीं हो पाई है। हाँ इतना मालूम हुआ है कि उन्होंने ५०-६० के दशक में बीस से भी ज्यादा फिल्मों में गीत लिखे थे। उनमें से कुछ फिल्मों की फेहरिश्त लगे हाथों पेश किए देता हूँ: आगोश, डाकू की लड़की, धुन, गुल सनोबर, जल तरंग, मल्हार, मिस-५८, नाच, राग-रंग, राजपूत, सरदार, शान, शीशम, शेरू, तराना, तूफ़ान। इन्हीं फिल्मों में से एक "डाकू की लड़की" के एक गीत की कुछ पंक्तियाँ हमारे दिल को छू गई, इसलिए आप सबके सामने उसे लाना लाज़िमी है:

नज़रों से छुप गया है तक़दीर का सवेरा
गिरता है जो भी आँसू लेता है नाम तेरा


दिल में कोई कसक महसूस हुई या नहीं। हुई ना! तो इस कसक को हजार-गुणा करने के लिए दर्द से लबरेज आज की नज़्म पेश-ए-खिदमत है। मुकेश साहब की आवाज़ में छुपी टीस का पान करने के लिए तैयार हो जाईये:

जियेंगे मगर मुस्कुरा ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है
लबों पे ____ अब आ ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है

बहारें चमन में जब आया करेंगी,
नज़ारों की महफ़िल सजाया करेंगी
नज़ारें भी हमको हँसा ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है

जवानी जो लायेगी सावन की रातें,
ज़माना करेगा मोहब्बत की बातें
मगर हम ये सावन मना ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मुकद्दर" और शेर कुछ यूं था -

ये जानके चुपचाप हैं मेरे मुकद्दर की तरह,
हमने तो इनके सामने खोला था दिल के राज को...

महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुए शरद कोकास साहब...शरद जी, आपका बहुत-बहुत स्वागत है। यह नज़्म है हीं कुछ ऐसी कि पसंद न आने का सवाल हीं नहीं उठता।

हालांकि महफ़िल की शुरूआत हो चुकी थी, लेकिन महफ़िल की विधिवत शुरूआत (शेर पेश करके) कुलदीप जी ने की। आपने साकी अमरोही साहब का यह शेर पेश किया:

काम आपने मुकद्दर का अँधेरा नहीं होता
सूरज तो निकलता है सवेरा नहीं होता। (साकी साहब के बारे में हमें अंतर्जाल पर कुछ नहीं मिला, आप अगर कुछ जानकारी मुहैया कराएँगे तो अच्छा होगा)

अंजुम साहब के बाद महफ़िल में नज़र आए शामिख जी। ये रहे आपके कुछ शेर:

ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र
आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी (निदा फ़ाज़ली)

हाथ में जाम जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जायेगा क़िस्मत का लिखा, जाम उठा (बशीर बद्र)

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर
रेखाओं से मात खा रहे हो (कैफ़ी आज़मी)

राज जी, आपके जैसे अगर कला के कद्रदान हों तो कोई खुद को अकेला कैसे महसूस कर सकता है। हौसला-आफ़ज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। आप इसी तरह महफ़िल में आते रहें और महफ़िल में चार चाँद लगाते रहें,यही आरजू है हमारी।

मंजु जी, क्या बात है!! वाह, बहुत उम्दा स्वरचित कहा है आपने:

मुकद्दर ने ही संघषों की अमावस्या - सी काली रात को ,
दीये की रोशनी की तरह जीवन में उजाला भर दिया है।

सीमा जी, देर हुई- कोई बात नहीं। शेर कहने से नहीं चूके आप, यह देखकर अच्छा लगा। यह रही आपकी पेशकश:

पेशानियों पे लिखे मुक़द्दर नहीं मिले,
दस्तार कहाँ मिलेंगे जहाँ सर नहीं मिले (राहत इन्दौरी)

क़फ़स में खींच ले जाये मुक़द्दर या नशेमन में।
हमें परवाज़ से मतलब है, चलती हो हवा कोई॥ (सीमाब अकबराबादी)

वाणी जी, आपको नज़्म पसंद आई, इसके लिए एक हीं आदमी हैं, जिनका शुक्रिया अदा करना चाहिए - शरद जी। लेकिन यह देखिए महफ़िल जिसके कारण मुमकिन हो पाई, वही नदारद हैं। कहाँ हैं शरद जी????

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

बुधवार, 27 अगस्त 2008

मैं तो दीवाना...दीवाना...दीवाना...मुकेश, एक परिचय

इससे पहले आपने पढ़ा हृदय नाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰' और सुने मुकेश के गाये ९ हिट गीत। संजय पटेल का आलेख 'दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश'। अब जानिए मुकेश के बारे में तपन शर्मा से।


मुकेश चंद्र माथुर का जन्म दिल्ली के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में जुलाई २२, १९२३ को हुआ। उन्हें अभिनय व गायन का बचपन से ही शौक था और वे के.एल. सहगल के प्रशंसक थे। मात्र दसवीं तक पढ़ने के बावजूद उन्हें लोक निर्माण कार्य में सहायक सर्वेक्षक विभाग में नौकरी मिल गई, जहाँ पर उन्होंने सात महीने तक काम किया। पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। दिल्ली में उन्होंने चुपके से कईं गैर-फिल्मी गानों की रिकार्डिंग करी। उसके बाद तो वे भाग कर मुम्बई में फिल्म-स्टार बनने के लिये जा पहुँचे। वे अपने रिश्तेदार व प्रसिद्ध कलाकार मोतीलाल के यहाँ ठहरने लगे।

मोतीलाल की मदद से वे फिल्मों में काम करने लगे। एक गायक के तौर पर उनका पहला गीत "निर्दोष" में "दिल ही बुझा हुआ..." रहा, उसके बाद उनका पहला युगल गीत फिल्म "उस पार" में गायिका कुसुम के साथ "ज़रा बोली री हो.." था। फिर उन्होंने फिल्म "मूर्ति" में "बदरिया बरस गई उस पार.." खुर्शीद के साथ गाया। उस समय तक उन्होंने सुनने वालों के मन में अपनी एक जगह बना ली थी। तब उनके जीवन में महत्त्व पूर्ण घटना घटी। साल था १९४५, जब अनिल बिस्वास ने उनसे फिल्म 'पहली नज़र' के लिये 'दिल जलता है तो जलने दे....' गाने के लिये कहा। ये वो गीत था जो मुकेश को पूरी तरह से लोगों की नजरों व प्रसिद्धि में ले आया। वे किंवदंति बन चुके थे और आने वाले कईं दशकों तक उनकी जादुई आवाज़ को पूरे देश ने ‘आग’, ‘अनोखी अदा’ और ‘मेला’ के गानों में सुना।


१९४९ में उन्होंने एक और मील का पत्थर पार किया। वो था उनका राज कपूर और शंकर-जयकिशन के साथ मिलन। राजकपूर उनसे और शंकर-जयकिशन से अपने आर.के. फिल्म्स के लिये गानों की फरमाईश करते रहते। उसके बाद तो 'आवारा' और 'श्री ४२०" जैसी फिल्मों में गाये गये 'आवारा हूँ..' व ' मेरा जूता है जापानी..' से उनकी आवाज़ ने देश ही नहीं विदेश में भी शोहरत पाई। रूस में तो "आवारा हूँ..." सड़कों पर सुनाई देने लगा था। राज कपूर जैसे चतुर निर्देशक व संगीत प्रेमी के साथ काम करने का मुकेश को फायदा मिला। राज कपूर फिल्मों में अच्छे गानों के पक्षधर रहे। शंकर जयकिशन की हर एक धुन को वे सुनते थे व उनके पास करने पर ही वो धुन रिकार्डिंग के लिये जाया करती थी। राज कपूर हर गाने की रिकार्डिंग के वक्त स्टूडियो में ही रहते थे व आर्केस्ट्रा की हौंसला अफजाई करते रहते। उनके संगीत के प्रति इसी समर्पण का असर आने वाली हर पीढी पर दिखा जो जब भी राज कपूर के गाने सुनती है तो हर बार नई ताज़गी सी मिलती है। ‘आह’, ‘आवारा’, ‘बरसात’, ‘श्री ४२०’, ‘अनाड़ी’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘मेरा नाम जोकर’ व अन्य कईं फिल्मों के गाने आज भी तरो-ताज़ा से लगते हैं। राज कपूर की सफलता के साथ मुकेश व शंकर जयकिशन की सफलता भी शामिल रही।

लेकिन उनका जीवन हमेशा आसान नहीं रहा। 'आवारा' की सफलता के बाद मुकेश ने दोबारा अभिनय के क्षेत्र में अपने आपको आजमाने का प्रयास किया और अपने गायन के करियर को हाशिये पर धकेल दिया। सुरैया के साथ ‘माशूका’ (१९५३) व ऊषा किरोन के साथ ‘अनुराग’ (१९५६) बहुत बुरी तरह से पिटी। उन्होंने राज कपूर की फिल्म ‘आह’ (१९५३) में एक तांगे वाले की छोटी सी भूमिका निभाई। उसी फिल्म के एक गाने- ‘छोटी सी ज़िन्दगानी’ को उन्होंने गाया भी। कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मुकेश ने पार्श्व गायन में दोबारा हाथ आजमाने का निश्चय किया। परन्तु तब उन्हें न के बराबर ही काम मिल रहा था। स्थिति इतनी गम्भीर हो चुकी थी कि उनके दोनों बच्चे नितिन और रितु को स्कूल छोड़ना पड़ा।

आखिरकार उन्होंने ‘यहूदी’ (१९५८) के गाने 'ये मेरा दीवानापन है..' से जोरदार वापसी करी। उसी साल आई ‘मधुमति’, ‘परवरिश’ और ‘फिर सुबह होगी’ के गाने इतने जबर्दस्त थे कि मुकेश ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। एस.डी बर्मन जिन्होंने तब तक मुकेश को अपने गानों में मौका नहीं दिया था, उनसे दो उत्कृष्ट गीत गवाये। वे गीत थे- फिल्म 'बम्बई का बाबू' (१९६०) से 'चल री सजनी...' और बन्दिनि (१९६३) से 'ऒ जाने वाले हो सके तो लौट के आना...'। उसके बाद तो मुकेश ६० और ७० के दशक में चमके रहे और उन्होंने 'हिमालय की गोद में'(१९६५) से 'मैं तो एक ख्वाब हूँ...', मेरा नाम जोकर से 'जीना यहाँ मरना यहाँ..' आनंद(१९७०) से 'मैंने तेरे लिये ही सात रंग के..' 'रोटी कपड़ा और मकान' से ' मैं न भूलूँगा..'जैसे असंख्य मधुर और दिल व आत्मा को छू जाने वाले गीत गाये। और उनके ‘कभी कभी’ (१९७६) के दो गानों 'मैं पल दो पल का शायर...' और 'कभी कभी मेरे दिल में..' को कौन भूल सकता है।

अन्य संगीत निर्देशक जिनके लिये मुकेश ने बेहतरीन गाने गाये, वे थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, सलिल चौधरी, ऊषा खन्ना, आर.डी.बर्मन वगैरह। फिल्म 'कभी कभी' में तो खय्याम के संगीत, साहिर लुधियानवी के गीत और मुकेश की आवाज़ ने तो जादू बिखेर दिया था।

१९७४ में मुकेश ने सलिल चौधरी द्वारा संगीतबद्ध, फिल्म रजनीगंधा में 'कईं बार यूँ भी देखा है...' गाया जिसके लिये उन्हें उस साल के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 'सत्यम शिवम सुंदरम'(१९७८) का गीत 'चंचल शीतल, कोमल' उनका आखिरी रिकार्ड किया गया गाना था। २७ अगस्त १९७६ में अमरीका के डेट्रोएट में संगीत समारोह के दौरान आये दिल के दौरे से उनका देहांत हो गया। मुकेश आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी अमर आवाज़ हमेशा हमेशा संगीत प्रेमियों को अपना दीवाना बनाती रहेगी, आज उनकी पुण्यतिथि पर हम याद करें उस अमर फनकार को, उनके यादगार गीतों को सुनकर, आईये, चलते चलते सुनें एक बार वही गीत जिसके लिए उन्हें रास्ट्रीय पुरस्कार मिला, फ़िल्म 'रजनीगंधा' के इस गीत को लिखा है योगेश ने, और संगीत है सलील दा का, इन दोनों के बारे में हम आगे बात करेंगे, फिलहाल सुनें मुकेश को, जिन्होंने इस गीत को भावनाओं के चरम शिखर पर बिठा दिया है अपनी आवाज़ के जादू से.



जानकारी सोत्र - इन्टरनेट.
संकलन - तपन शर्मा "चिन्तक"



इससे पहले आपने पढ़ा हृदय नाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰' और सुने मुकेश के गाये ९ हिट गीत। संजय पटेल का आलेख 'दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश'। अब जानिए मुकेश के बारे में तपन शर्मा से।

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