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Tuesday, November 16, 2010

हौले हौले रस घोले....महान महदेवी वर्मा के शब्द और जयदेव का मधुर संगीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 528/2010/228

हिंदी साहित्य छायावादी विचारधारा के लिए जाना जाता है। छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में एक स्तंभ का नाम है महादेवी वर्मा। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है हिंदी साहित्यकारों की फ़िल्मी रचनाओं पर आधारित लघु शृंखला 'दिल की कलम से' की आठवीं कड़ी में। महादेवी वर्मा ना केवल हिंदी की एक असाधारण कवयित्री थीं, बल्कि वो एक स्वाधीनता संग्रामी, नारीमुक्ति कार्यकर्ता और एक उत्कृष्ट शिक्षाविद भी थीं। महादेवी वर्मा का जन्म २६ मार्च १९०७ को फ़र्रुख़ाबाद में हुआ था। उनकी शिक्षा मध्यप्रदेश के जबलपुर में हुआ था। उनके पिता गिविंदप्रसाद और माता हेमरानी की वो वरिष्ठ संतान थीं। उनके दो भाई और एक बहन थीं श्यामा। महादेवी जी का विवाह उनके ९ वर्ष की आयु में इंदौर के डॊ. स्वरूप नारायण वर्मा से हुआ, लेकिन नाबालिक होने की वजह से वो अपने माता पिता के साथ ही रहने लगीं और पढ़ाई लिखाई में मन लगाया। उनके पति लखनऊ में अपनी पढ़ाई पूरी। महादेवी जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और १९२९ में बी.ए की डिग्री लेकर १९३३ में सम्स्कृत में एम.ए कर लीं। महादेवी वर्मा और उनके पति दांपत्य जीवन में ज़्यादातर अलग अलग ही रहे अपनी अपनी रुचियों के चलते। १९६६ में स्वरूप जी के निधन के बाद महादेवी स्थायी रूप से इलाहाबाद में रहने लगीं और आजीवन वहीं रहीं। महात्मा बुद्ध के विचारों का उन पर गहरा असर हुआ और एक समय उन्होंने एक बौध भिक्षुणी बनने की भी कोशिश की थी। इलाहाबाद महिला विद्यापीठ की वो प्रथम मुख्यशिक्षिका बनीं, जिसका मुख्य उद्येश्य था हिंदी माध्यम से लड़कियों को शिक्षा देना। आगे चलकर वो इस विद्यापीठ की चांसेलर भी बनीं। ११ सितंबर १९८७ के रात ९:२७ मिनट पर महादेवी वर्मा चिरनिद्रा में सो गईं।

महादेवी वर्मा द्वारा लिखित कविता संग्रह 'यामा' को बेहद सराहना मिली थी, जिसे ज्ञानपीठ पुरस्कर से सम्मानित किया गया था। १९५६ में भारत सरकार ने साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए महादेवी वर्मा को पद्म भूषण से सम्मानित किया था। इसके अलावा १९७९ में देश के सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। १९८८ में मरणोपरांत उन्हें पद्मविभुषण से सम्मानित किया गया था। महादेवी वर्मा की लिखी कविताएँ और कहानियाँ स्कूल कालेजों के पाठ्यपुस्तकों में स्थान पाते हैं। महादेवी वर्मा को एक फ़िल्मी गीतकार के रूप में पाना फ़िल्म जगत का सौभाग्य है। १९८६ की फ़िल्म 'त्रिकोण का चौथा कोण' में उनका लिखा एक गीत शामिल किया गया था। छाया गांगुली की आवाज़ में यह गीत एक अद्भुत रचना है जिसे जयदेव ने स्वरबद्ध किया था। दोस्तों, मैं कोई साहित्यकार नहीं जो इस गीत के साहित्यिक पक्ष पर कोई टिप्पणी कर सकूँ, लेकिन इतना ज़रूर महसूस कर सकता हूँ कि यह एक उत्कृष्ट रचना है। इस कमचर्चित फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे विजयेन्द्र घाटगे, स्वरूप सम्पत, प्रियदर्शिनी, प्रमुख। जैसा कि फ़िल्म के शीर्षक से ही प्रतीत होता है, विवाह से बाहर के संबंधों का ताना बाना बुना गया होगा इस फ़िल्म की कहानी में। आइए इस गीत को सुनते हैं,

हौले हौले रस घोले बोले मुझसे जिया,
पिया पिया पे क्या जादू पर मैंने क्या किया।

इठलाये, इतराये, इतराये, इठलाये, पूछे मुझसे जिया,
पिया पिया पे क्या जादू पर मैंने क्या किया।

ज़रा देखिए कि किस तरह से "इठलाये" और "इतराये" शब्दों को दूसरी बार आपस में बदल कर गीत के सौंदर्य को और भी बढ़ा दिया है। लीजिए यह गीत सुनिए और महसूस कीजिए कि छाया गांगुली ने कैसा ख़ूबसूरत अंजाम दिया है इस गीत को। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आज का यह अंक समर्पित है महान कवयित्री और साहित्यकार महादेवी वर्मा की पुण्य स्मृति को।



क्या आप जानते हैं...
कि छायावादी विचारधारा के चार स्तंभों में महादेवी वर्मा के अलावा बाकी तीन स्तंभ कौन से हैं? ये हैं सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', जयशंकर प्रसाद, और सुमित्रानंदन

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०९ /शृंखला ०३
ये प्रिल्यूड है गीत का -


अतिरिक्त सूत्र - ये कवि पिता भी हैं इंडस्ट्री के एक महानायक के.

सवाल १ - कवि / गीतकार का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - गायक बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी ने काफी अच्छी बढ़त बना ली है, लगता है एक और मुकाबला उनके नाम रहेगा. शरद जी और अमित को भी बधाई, अवध जी का आभार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, March 16, 2010

आपकी याद आती रही...छाया गांगुली की आवाज़ और जयदेव का संगीत गूंजता रहा रात भर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 375/2010/75

मानांतर सिनेमा की बात चल रही हो तो ऐसे में फ़िल्मकार मुज़फ़्फ़र अली का ज़िक्र करना बहुत ज़रूरी हो जाता है। मुज़फ़्फ़र अली, जिन्होने 'गमन', 'उमरावजान', 'अंजुमन' जैसी फ़िल्मों का निर्माण व निर्देशन किया, पटकथा और संवाद में भी मह्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अलावा समानांतर सिनेमा के दो और प्रमुख स्तंभ जिनके नाम मुझे इस वक़्त याद आ रहे हैं, वो हैं गोविंद निहलानी और श्याम बेनेगल। वैसे आज हम ज़िक्र मुज़फ़्फ़र अली साहब का ही कर रहे हैं, क्योंकि आज जिस गीत को हमने चुना है वह है फ़िल्म 'गमन' का। १९७८ की इस फ़िल्म को लोगों ने ख़ूब सराहा था। अपनी ज़िंदगी को सुधारने संवारने के लिए लखनऊ निवासी ग़ुलाम हुसैन (फ़ारुख़ शेख़) बम्बई आकर काम करने का निश्चय कर लेता है, अपनी बीमार माँ और पत्नी (स्मिता पाटिल) को पीछे लखनऊ में ही छोड़ कर। बम्बई आने के बाद उसका करीबी दोस्त लल्लुलाल तिवारी (जलाल आग़ा) उसके टैक्सी धोने के काम पर लगा देता है। काफ़ी जद्दोजहद करने के बाद भी ग़ुलाम इतने पैसे नहीं जमा कर पाता जिससे कि वह लखनऊ एक बार वापस जा सके। उधर लल्लुलाल भी अपनी परेशानियों से परेशान है। कई सालों से बम्बई में रहने के बावजूद वह अपनी प्रेमिका यशोधरा (गीता सिद्धार्थ) के लिए कोई ढंग का मकान किराए पे लेने में असमर्थ है, और वह एक ऐसी चाली में रहता है जिसे बम्बई नगर निगम तोड़ने वाली है। क्या होता है ग़ुलाम और लल्लुलाल के साथ, यही है 'गमन' की कहानी। महानगर की ज़िंदगी को बहुत ही सच्चाई के साथ चित्रित किया गया है इस फ़िल्म में और इसी फ़िल्म का तो एक गीत ही यही कहता है कि "सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है, इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है?" ख़ैर, आज हम इस ग़ज़ल को तो नहीं सुनने जा रहे, लेकिन ऐसा ही एक ख़ूबसूरत गीत जिसे गाया है छाया गांगुली ने। ग़ुलाम हुसैन बम्बई आ जाने के बाद उसकी पत्नी स्मिता पाटिल रात की तन्हाई में उदास बैठी हुई है, और पार्श्व में यह गीत गूंज उठता है। गीत को इतने असरदार तरीक़े से गाया गया है कि सुन कर जैसे लगता है कि वाक़ई किसी की याद में दिल रो रहा हो! मख़दूम मोहिउद्दिन के बोल है और जयदेव का संगीत।

फ़िल्म 'गमन' के इस गीत के लिए गायिका छाया गांगुली को सर्वश्रेष्ठ गायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। इसी से जुड़ी यादें बता रही हैं छाया जी विविध भारती के एक कार्यक्रम में - "इससे पहले मुझे ग़ज़ल गाने का कोई तजुर्बा नहीं था। इस अवार्ड से मुझे प्रोत्साहन मिला और अच्छे से अच्छा गाने का। यह उन्ही (जयदेव) की मेहनत और कोशिश का परिणाम है। उसी साल १९७९ को 'गमन' के लिए 'बेस्ट म्युज़िक डिरेक्टर' का अवार्ड भी मिला उनको। मैंने कभी सोचा नहीं था कि एक दिन फ़िल्म में गाउँगी क्योंकि उस तरह से कभी सोचा नहीं था। जयदेव जी बहुत ही उदार और मृदुभाषी थे। नए कलाकारों का हौसला बढ़ाते थे। उन्हे साहित्य, संगीत और कविता से बहुत लगाव था। गीत की एक पंक्ति को लेकर सिंगर से अलग अलग तरह से उसे गवाते थे। उनके पास जाने से ऐसा लगता है कि नर्वस हो जाउँगी। उनका घर मेरे ऒफ़िस के नज़दीक ही था। मैं ऒल इंडिया रेडियो में काम करती थी। तो उनका जब बुलावा आया तो पहले दिन तो मैं गई भी नहीं। फिर दूसरे दिन उनके सहायक प्यारेलाल जी बुलाने आए थे। तब मैं गई। वो सामनेवाले से इस तरह से बात करते थे 'that he will make you feel very much at ease'. उनके संगीत में भारतीय संगीत की मेलडी भी है, साथ ही मांड की लोक शैली भी झलकती है। कहीं ना कहीं उनके गीतों में भक्ति रस भी मिल जाता है। मेरा एक ऐल्बम निकला था 'भक्ति सुधा' के नाम से, जिसमें उनके भजन थे। उच्चारण सीखने के लिए वो मुझे पंडित नरेन्द्र शर्मा के पास ले गए। उन्हे साहित्य का ज्ञान था, पर फिर भी वो मुझे पंडित जी के पास ले गए ताकि मुझे उनसे कुछ सीखने का मौका मिले। उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला।" तो चलिए दोस्तों, इस ख़ूबसूरत गीत को सुना जाए!



क्या आप जानते हैं...
कि गीतकार अंजान का असली नाम लालजी पान्डेय था और उनका जन्म बनारस में २८ अक्तुबर १९३० को हुआ था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"हिलोर", गीत पहचानें-३ अंक.
2. किस महान साहित्यकार की कृति पर आधारित है ये फिल्म- २ अंक.
3. जिस गीतकार ने इसे रचा है उनके पुत्र भी इंडस्ट्री के नामी गीतकारों में हैं, मूल गीतकार का नाम बताएं-२ अंक.
4. फिल्म के संगीतकार भारतीय शास्त्रीय संगीत के शिरोमणी है, कौन हैं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी स्वागत है फिर आपका, इंदु जी, संगीता जी और पदम जी को बधाई
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, May 4, 2009

नाज़ था खुद पर मगर ऎसा न था......महफ़िल-ए-गज़ल में छाया की माया

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०

रीब एकतीस साल पहले मुज़फ़्फ़र अली की एक फ़िल्म आई थी "गमन"। फ़ारूख शेख और स्मिता पाटिल की अदाकारियों से सजी इस फ़िल्म में कई सारी दिलकश गज़लें थीं। यह तो सभी जानते हैं कि मुज़फ़्फ़र अली को संगीत का अच्छा-खासा इल्म है, विशेषकर गज़लों का। इसलिए उन्होंने गज़लों को संगीतबद्ध करने का जिम्मा उस्ताद अली अकबर खान के शागिर्द जयदेव वर्मा को दिया। और मुज़फ़्फ़र अली की दूरगामी नज़र का कमाल देखिए कि इस फ़िल्म के लिए "जयदेव" को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया। भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में अब तक केवल तीन हीं संगीतकार हुए हैं,जिन्हें तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार (रजत कमल पुरस्कार) पाने का अवसर मिला है: जयदेव, ए आर रहमान और इल्लैया राजा। हाँ तो हम "गमन" की गज़लों की बात कर रहे थे। इस फ़िल्म की एक गज़ल "आप की याद आती रही रात भर" ,जिसे "मक़दू्म मोहिउद्दिन" ने लिखा था, के लिए मुज़फ़्फ़र अली को एक नई आवाज़ की तलाश थी और यह तलाश हमारी आज की फ़नकारा पर खत्म हुई। इस गज़ल के बाद तो मानो मुज़फ़्फ़र अली इस नए आवाज़ के दिवाने हो गए। यूँ तो मुज़फ़्फ़र अली अपनी फ़िल्मों (गमन,उमराव जान) के लिए जाने जाते हैं,लेकिन कम हीं लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि इन्होंने कई सारी हीं गज़लों को संगीतबद्ध किया है। "रक़्स-ए-बिस्मिल","पैगाम-ए-मोहब्बत","हुस्न-ए-जानां" ऎसी हीं कुछ खुशकिस्मत गज़लों की एलबम हैं,जिन्हें मुज़फ़्फ़र अली ने अपनी सुरों से सजाया है। बाकी एलबमों की बात कभी बाद में करेंगे, लेकिन "हुस्न-ए-जानां" का जिक्र यहाँ लाजिमी है। अमिर खुसरो का लिखा "ज़िहाल-ए-मस्कीं" न जाने कितनी हीं बार अलग-अलग अंदाज़ में गाया जा चुका है, यहाँ तक कि "गुलामी" के लिए गुलज़ार साहब ने इसे एक अलग हीं रूप दे दिया था, लेकिन कहा जाता है कि इस गाने को हमारी आज की फ़नकारा ने जिस तरह गाया है,जिस अंदाज में गाया है, वैसा दर्द वैसा गम-ए-हिज्र आज तक किसी और की आवाज़ में महसूस नहीं होता। ऎसी है मुज़फ़्फ़र अली की परख और ऎसा है इस फ़नकारा की आवाज़ का तिलिस्म....। तो चलिए मैंने तो उस फ़नकारा के बारे में इतना कुछ कह दिया; अब आप की बारी है,पता कीजिए उस फ़नकारा का नाम..

उस फ़नकारा के नाम से पर्दा हटाने के पहले मैं आज की गज़ल से जुड़े एक और हस्ती के बारे में कुछ बताना चाहूँगा। आज की गज़ल को साज़ों से सजाने वाला वह इंसान खुद एक कामयाब गज़ल-गायक है। गज़लों से परे अगर बात करें तो कई सारे फ़िल्मी-गानों को उन्होंने स्वरबद्ध किया है। एक तरह से वे गु्लज़ार के प्रिय रहे हैं। "दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात-दिन", "नाम गुम जाएगा", "एक अकेला इस शहर में", "हुज़ूर इस कदर भी न इतराके चलिए" कुछ ऎसे हीं मकबूल गाने हैं,जिन्हें गुलज़ार ने लिखा और "भूपिन्दर सिंह" ने अपनी आवाज़ दी। जी हाँ,हमारी आज की गज़ल के संगीतकार "भूपिन्दर सिंह" जी ही है। तो अब तक हम गज़ल के संगीतकार से रूबरू हो चुके है, अब इस महफ़िल में बस गज़लगो और गायिका की हीं कमी है। दोस्तों...मुझे उम्मीद है कि मैने गायिका की पहचान के लिए जो हिंट दिए थे,उनकी मदद से आपने अब तक गायिका का नाम जान हीं लिया होगा। और अगर...अभी तक आप सोच में डूबे हैं तो मैं हीं बता देता हूँ। हम आज जिस फ़नकारा की बात कर रहे हैं, उनका नाम है "छाया गांगुली" । "छाया गांगुली" से जुड़ी मैने कई सारी बातें आपको पहले हीं बता दी हैं, अब उनके बारे में ज्यादा लिखने चलूँगा तो आलेख लंबा हो जाएगा। इसलिए अच्छा होगा कि मैं अब गज़ल की ओर रूख करूँ।

कई साल पहले "नाज़ था खुद पर मगर ऎसा न था" नाम से गज़लों की एक एलबम आई थी। आज हम उसी एलबम की प्रतिनिधि गज़ल आपको सुना रहे हैं.... । प्रतिनिधि गज़ल होने के कारण यह तो साफ़ हीं है कि उस गज़ल के भी बोल यही हैं..."नाज़ था खुद पर मगर ऎसा न था" । इस सुप्रसिद्ध गज़ल के बोल लिखे थे "इब्राहिम अश्क़" ने। कभी मौका आने पर "इब्राहिम अश्क" साहब के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगे..अभी अपने आप को बस इस गज़ल तक हीं सीमित रखते हैं। इस गज़ल की खासियत यह है कि बस चार शेरों में हीं पूरी दुनिया की बात कह दी गई है। गज़लगो कभी खुद पर नाज़ करता है, कभी जहां की तल्ख निगाहों का ब्योरा देता है तो कभी अपने महबूब पर गुमां करता है। भला दूसरी कौन-सी ऎसी गज़ल होगी जो चंद शब्दों में हीं सारी कायनात का जिक्र करती हो। शुक्र यह है कि इश्क-वालों के लिए कायनात बस अपने इश्क तक हीं सिमटा नहीं है। वैसे इसे शुक्र कहें या मजबूरी ...क्योंकि इश्क-वाले तो खुद में हीं डूबे होते हैं, उन्हें औरों से क्या लेना। अब जब औरों को इनकी खुशी न पचे तो ये दुनिया की शिकायत न करें तो क्या करें।

इश्क-वालों ने किए जब अलहदा हैं रास्ते,
राह-भर में खार किसने बोए इनके वास्ते।


तो लीजिए आप सबके सामने पेश-ए-खिदमत है आज की गज़ल...लुत्फ़ लें और अगर अच्छी लगे तो हमारे चुनाव की दाद दें:

नाज़ था खुद पर मगर ऎसा न था,
आईने में जब तलक देखा न था।

शहर की महरूमियाँ मत पूछिये,
भीड़ थी पर कोई भी अपना न था।

मंजिलें आवाज़ देती रह गईं,
हम पहुँच जाते मगर रस्ता न था।

इतनी दिलकश थी कहाँ ये ज़िंदगी,
हमने जब तक आपको चाहा न था।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

___ से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो,
आँधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा..


आपके विकल्प हैं -
a) दरख्त , b) गुल , c) टहनी, d) पंखुडी

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल का सही शब्द था "खुद", यानी कि शेर कुछ यूँ था-
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,
थोडी बहुत तो जेहन में नाराज़गी रहे...

सबसे पहले सही जवाब देकर मैदान मारा शन्नो जी ने. मनु जी और सलिल जी ने भी सही जवाब दिया. सलिल जी ने एक सदाबहार शेर याद दिलाया -
खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले,
खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है....

वाह...
नीलम जी ने भी सही जवाब दिया, और एक फ़िल्मी गाने को याद किया, पर गीत के बोल भूल गयी, जिसे बाद में मनु जी ने याद दिलवाया पर आदत अनुसार इस बार कोई शेर नहीं सुनाया उन्होंने.

पूजा जी, पहेली का अपना अलग मज़ा है, जो भी विकल्प आपको सही लगे उस पर कुछ सुनाया भी कीजिये. आपकी और सुशील जी की पसंद का गाना भी जल्द ही सुनवाने की कोशिश रहेगी. और चलते चलते सलिल जी का एक और शेर उसी महफिल से-
खुद को खुद पर हो यकीन तो दुनिया से लड़ जाईये,
मंजिलों की फ़िक्र क्यों हो, पैर- नीचे पाईये...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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