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Sunday, March 29, 2020

राग बागेश्री : SWARGOSHTHI – 462 : RAG BAGESHRI






स्वरगोष्ठी – 462 में आज

काफी थाट के राग – 6 : राग बागेश्री

विदुषी मालिनी राजुरकर से राग बागेश्री में तराना और लता मंगेशकर व हेमन्त कुमार से फिल्मी गीत सुनिए




विदुषी मालिनी राजुरकर
हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में काफी थाट के जन्य राग बागेश्री पर चर्चा करेंगे। आज श्रृंखला की छठी कड़ी में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध विदुषी मालिनी राजुरकर से राग बागेश्री में निबद्ध तराना का रसास्वादन करा रहे हैं और फिर इसी राग पर आधारित 1953 में प्रदर्शित एक फिल्म “अनारकली” से श्रृंगार रस को उकेरता एक गीत हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इस फिल्म के संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं।


राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ लोग इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त है। इस राग को काफी थाट से सम्बद्ध माना जाता है। राग के वर्तमान प्रचलित स्वरूप के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कुछ प्रयोक्ता आरोह में पंचम स्वर वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्धति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन अथवा वादन उपयुक्त माना जाता है। इस राग में श्रृंगारपूर्ण रचनाएँ खूब फबतीं हैं।

अब हम आपको राग बागेश्री का एक आकर्षक तराना सुनवाते हैं, इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में गायन प्रस्तुत करने वाली, देश की सुविख्यात विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी राजुरकर का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी और दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही उन्हें दो विषयों; गणित और संगीत से गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु और शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत सम्मान “तानसेन सम्मान” से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ ही मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। मालिनी जी के स्वर में राग बागेश्री में निबद्ध तराना अब आप सुनिए।

राग बागेश्री : तीनताल में निबद्ध तराना : विदुषी मालिनी राजुरकर


राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। भारतीय फिल्म संगीत के बहुआयामी कलासाधकों की सूची में पार्श्वगायक और संगीतकार हेमन्त कुमार का नाम शिखर पर अंकित है। बाँग्ला और हिन्दी के गीतों के गायन और संगीतबद्ध करने में समान रूप से दक्ष हेमन्त कुमार का जन्म 16 जून, 1920 को बनारस स्थित उनके ननिहाल में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा बंगाल में हुई। परिवार में संगीत का शौक तो था, किन्तु इस व्यवसाय के तौर पर अपनाने के लिए कोई भी सहमत नहीं था। बालक हेमन्त के स्कूल से प्रायः यह शिकायत मिलती थी कि उनकी रुचि पढ़ाई की ओर कम और गाने में अधिक है। पिता के एक मित्र सुभाष मुखर्जी की सहायता से मात्र 13 वर्ष की आयु में रेडियो के बाल कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलने लगा। कुछ बड़े होने पर हेमन्त कुमार को कोलम्बिया कम्पनी के लिए रवीन्द्र संगीत रिकार्ड करने का अवसर मिला। कम्पनी के संगीत निर्देशक शैलेन दासगुप्त को इतना पसन्द आया कि एक वर्ष में हेमन्त कुमार के बारह रिकार्ड प्रकाशित किये। आगे चल कर हेमन्त कुमार, संगीतकार शैलेन दासगुप्त के सहायक बने और पहली बार बाँग्ला फिल्म ‘निमाई संन्यास’ में उन्हे पार्श्वगायन का अवसर मिला। वर्ष 1944 में उन्हें पं. अमरनाथ के संगीत निर्देशन में पहली बार हिन्दी फिल्म ‘इरादा’ में दो गीत गाने का अवसर मिला। अगले वर्ष ही हेमन्त कुमार को बाँग्ला फिल्म ‘पूर्वराग’ में संगीत निर्देशन का दायित्व मिल गया। इसके बाद उन्होने अनेक छोटी-बड़ी बाँग्ला फिल्मों का संगीत निर्देशन किया। परन्तु 1951 में हेमेन गुप्ता की बाँग्ला फिल्म ‘आनन्दमठ’ में हेमन्त कुमार का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। फिल्म की सफलता से उत्साहित होकर इसी वर्ष ‘आनन्दमठ’ का हिन्दी संस्करण भी बनाया गया। इस संस्करण में भी हेमन्त कुमार का संगीत था। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना ‘वन्देमातरम्’ की विलक्षण धुन और गायन के कारण हेमन्त कुमार की हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र में पार्श्वगायक के रूप में धाक जम गई। सचिनदेव बर्मन, सी. रामचन्द्र जैसे प्रतिष्ठित संगीतकारों के निर्देशन में हेमन्त कुमार के गाये अनेक गीत लोकप्रियता और गुणवत्ता की दृष्टि से शिखर पर रहे। आइए, अब हम आपको संगीतकार सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में हेमन्त कुमार का गाया एक सदाबहार गीत सुनवाते हैं। 1953 में प्रदर्शित, सी. रामचन्द्र के राग आधारित गीतों से सुसज्जित फिल्म ‘अनारकली’ में हेमन्त कुमार ने राग बागेश्री पर आधारित एक मनमोहक गीत गाया था। दादरा ताल में निबद्ध यह एक युगलगीत है, जिसमें हेमन्त कुमार का साथ लता मंगेशकर ने दिया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दें।

राग बागेश्री : “जाग दर्द-ए-इश्क़ जाग...” : हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर : फिल्म - अनारकली



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 462वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1943 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 4 अप्रैल, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 464 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 292 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ से एक राग केन्द्रित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मुल्तानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – उस्ताद अमीर खाँ

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों में से पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आप सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की हार्दिक बधाई।


संवाद


देशवासियों को कोरोना वायरस से बचाव के लिए भारत सरकार ने आपकी सुरक्षा के लिए सम्पूर्ण देश के लिए लॉक डाउन घोषित किया है। सभी देशवासियों से आग्रह है कि वे इसका निष्ठा के साथ पालन करें साथ ही अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा करें।  

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की छठी कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग बागेश्री का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने आज पहले हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर से राग बागेश्री में निबद्ध एक तराना का रसास्वादन कराया और फिर इसी राग पर आधारित 1953 में प्रदर्शित एक फिल्म “अनारकली” से श्रृंगार रस से परिपूर्ण एक गीत हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत किया। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण हैं और फिल्म के संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। संगीत प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग बागेश्री : SWARGOSHTHI – 462 : RAG BAGESHRI : 29 मार्च, 2020 

Saturday, November 16, 2019

राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 443 : RAG BASANT






स्वरगोष्ठी – 443 में आज


पूर्वी थाट के राग – 3 : राग बसन्त


पं. भीमसेन जोशी से राग बसन्त में खयाल और आशा भोसले व महेन्द्र कपूर से फिल्मी गीत सुनिए





पण्डित भीमसेन जोशी
महेन्द्र कपूर और आशा भोसले
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से छठा थाट पूर्वी है। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। इस श्रृंखला में हम पूर्वी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में पूर्वी थाट के जन्य राग बसन्त पर चर्चा करेंगे। आज हम श्रृंखला के इस तीसरे अंक में पहले हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी से इस राग में निबद्ध एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे और फिर इसी राग पर आधारित एक फिल्मी गीत आशा भोसले और महेन्द्र कपूर के स्वर में सुनवाएँगे। 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से भरत व्यास रचित और सी. रामचन्द्र का संगीतबद्ध किया एक गीत – “बसन्त है आया रंगीला...” का रसास्वादन भी आप करेंगे।


राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर मध्यम होता है। यह षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह में छह और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किया जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और दोनों मध्यम स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग के आरोह में पंचम स्वर वर्जित होता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि के चतुर्थ प्रहर में 3 बजे से साढ़े 4 बजे के मध्य है। परन्तु बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। इस राग के बाद ललित, भैरव आदि रागों का समय आरम्भ होता है। अब हम आपको राग बसन्त की एक रचना पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में सुनवाते हैं। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं; ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न के स्वर में एक रचना सुनते हैं। अब आप सुनिए; पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की तीनताल में निबद्ध यह मनोहारी प्रस्तुति। तबला पर पण्डित नाना मुले और हारमोनियम पर पुरुषोत्तम तलवलकर ने संगति की है।

राग बसन्त : ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ : पण्डित भीमसेन जोशी


राग बसन्त ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। अन्य अवसरों पर इस राग को रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- स, ग, म॑, ध(कोमल), नि, सं, तथा अवरोह के स्वर हैं- सं, नि, ध, प, म॑, ग, रे, स। इस राग में ललित अंग से दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित है। राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। कभी-कभी संवादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी होता है। यह एक प्राचीन राग है। ‘रागमाला’ में इसे हिंडोल का पुत्र कहा गया है। अब आप राग बसन्त पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनिए। वर्ष 1961 में वी. शान्ताराम की फिल्म “स्त्री” का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म का एक गीत; “बसन्त है आया रंगीला...” राग बसन्त पर आधारित है। गीत को स्वर दिया है आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों और संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बसन्त : “बसन्त है आया रंगीला...” : आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथी : फिल्म - स्त्री




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 443वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1951 में प्रदर्शित एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली का उत्तर प्राप्त होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है, हमें उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पुरानी पार्श्वगायिका का मुख्य स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 23 नवम्बर, 2019 की मध्यरात्रि तक भेज सकते हैं। इसके बाद आपका उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 445 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 441वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – पूरिया धनाश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद अमीर खाँ

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, डोम्बिबली, महाराष्ट्र से श्रीपाद बावडेकर, खण्डवा, मध्यप्रदेश से रविचन्द्र जोशी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने पूर्वी थाट के जन्य राग बसन्त का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस शैली के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में इस राग की एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। राग बसन्त पर आधारित रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए आशा भोसले और महेन्द्र कपूर के युगल स्वर में फिल्म “स्त्री” का एक गीत प्रस्तुत किया। अगले अंक में हम पूर्वी थाट के एक अन्य राग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है।
“फेसबुक” पर हमारी एक पाठक राजश्री चालसे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखती है; Rajashree Chalse सर तुम्हाला follow करते। तुमच्या रागांबद्दलच्या पोस्टस् खुप छान असतात।   
हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 443 : RAG BASANT : 17 नवम्बर, 2019


Sunday, December 30, 2018

राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 400 : RAG BASANT






स्वरगोष्ठी – 400 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 15 : राग बसन्त

पण्डित भीमसेन जोशी से बसन्त का खयाल और इसी राग पर आधारित फिल्म ‘स्त्री’ का गीत सुनिए




पण्डित भीमसेन जोशी
आशा भोसले और महेन्द्र कपूर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पन्द्रहवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की पन्द्रहवीं और समापन कड़ी में आज हमने राग बसन्त चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग बसन्त की एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे।



राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम है। इस राग के गायन-वादन का सटीक समय रात्रि के चतुर्थ प्रहर में 3 बजे से साढ़े 4 बजे के मध्य है। परन्तु बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। इस राग के बाद ललित, भैरव आदि रागों का समय आरम्भ होता है। पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार विरह या चिन्ताविकृति से ग्रस्त व्यक्ति, तनाव, कुण्ठा, फोबिया, पैनिकडिसार्डर, हिस्टीरिया, विषाद एवं अनेक मनोदैहिक विकृतियों का उपचार राग सोहनी से करने के बाद मन की शान्ति और निद्रा का अनुभव हो तो राग बसन्त का उपचार सर्वथा उपयोगी हो सकता है। रात्रि के चतुर्थ प्रहर में शान्त, शीतल और सुखदायी वातावरण में राग बसन्त का प्रभाव मन और शरीर पर अवश्य पड़ता है। ऐसा विश्वास है कि उपरोक्त समस्याओं के निदान में राग बसन्त का श्रवण करने पर काफी शान्ति व सुख की प्राप्ति हो सकती है। ‘नान रैपिड आई मूवमेंट स्लीप’ का आनन्द मरीज को प्राप्त हो सकता है। एक महीने तक रागात्मक प्रक्रिया के अन्तर्गत यदि उपचार किया जाए तो पीड़ित को इन समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। अब हम आपको राग बसन्त की एक रचना सुनवाते हैं। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं; ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न के स्वर में एक रचना सुनते हैं। अब आप सुनिए; पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की तीनताल में निबद्ध यह मनोहारी प्रस्तुति। तबला पर पण्डित नाना मुले और हारमोनियम पर पुरुषोत्तम तलवलकर ने संगति की है।

राग बसन्त : ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ : पण्डित भीमसेन जोशी


राग बसन्त ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। अन्य अवसरों पर इस राग को रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- स, ग, म॑, ध(कोमल), नि, सं, तथा अवरोह के स्वर हैं- सं, नि, ध, प, म॑, ग, रे, स। इस राग में ललित अंग से दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित है। राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। कभी-कभी संवादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी होता है। यह एक प्राचीन राग है। ‘रागमाला’ में इसे हिंडोल का पुत्र कहा गया है। अब आप राग बसन्त पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनिए। वर्ष 1961 में वी. शान्ताराम की फिल्म “स्त्री” का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म का एक गीत; “बसन्त है आया रंगीला...” राग बसन्त पर आधारित है। गीत को स्वर दिया है आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों और संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बसन्त : “बसन्त है आया रंगीला...” : आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथी




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 401 और 402 को हम पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों पर केन्द्रित रखेंगे। अतः अंक संख्या 400 और 401 में हम आपके लिए पहेली का प्रकाशन नहीं कर रहे हैं। पहेली का नियमित प्रकाशन हम अंक संख्या 402 से करेंगे। पहेली संख्या 399वें अंक की पहेली का सही उत्तर और विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 401 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

“स्वरगोष्ठी” की 398वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में निर्मित किन्तु अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” से राग की छाया लिये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – सिन्दूरा अथवा काफी कान्हड़ा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया। इस बार की पहेली में अधिकतर प्रतिभागी एक अप्रचलित राग को पहचानने में भ्रमित हुए हैं। ऐसे प्रतिभागियों ने थाट की सही पहचान अवश्य की है। जिन प्रतिभागियों ने राग काफी कान्हड़ा अथवा राग काफी के रूप में पहचान की है, हमने उन्हें पूरे-पूरे अंक दिये हैं। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पन्द्रहवीं और समापन कड़ी में आपने राग बसन्त का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार सी. रामचन्द्र द्वारा संगीतबद्ध 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से एक गीत आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों के स्वर में सुना। “स्वरगोष्ठी” के नये वर्ष 2019 के पहले और दूसरे अंक में हम पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियों को शामिल कर रहे हैं। अगले अंक में हम विजया राजकोटिया, शुभा खाण्डेकर और डॉ. किरीट छाया की प्रस्तुतियाँ उनके परिचय के साथ प्रकाशित कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 400 : RAG BASANT : 30 दिसम्बर, 2018

Sunday, September 2, 2018

राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 383 : RAG BASANT






स्वरगोष्ठी – 383 में आज


राग से रोगोपचार – 12 : ऋतु प्रधान राग बसन्त


गहरी निद्रा दिलाने में राग सोहनी का पूरक है राग बसन्त



पण्डित भीमसेन जोशी
आशा भोसले और महेन्द्र कपूर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गायन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हम राग बसन्त के स्वरों से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग बसन्त की एक खयाल रचना प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1961 में प्रदर्शित फिल्म “स्त्री” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।

राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम है। इस राग के गायन-वादन का सटीक समय रात्रि के चतुर्थ प्रहर में 3 बजे से साढ़े 4 बजे के मध्य है। परन्तु बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। इस राग के बाद ललित, भैरव आदि रागों का समय आरम्भ होता है। विरह या चिन्ताविकृति से ग्रस्त व्यक्ति, तनाव, कुंठा, फोबिया, पैनिकडिसार्डर, हिस्टीरिया, विषाद एवं अनेक मनोदैहिक विकृतियों का उपचार राग सोहनी से करने के बाद मन की शान्ति और निद्रा का अनुभव हो तो राग बसन्त का उपचार सर्वथा उपयोगी हो सकता है। रात्रि के चतुर्थ प्रहर में शान्त, शीतल और सुखदायी वातावरण में राग बसन्त का प्रभाव मन और शरीर पर अवश्य पड़ता है। ऐसा विश्वास है कि उपरोक्त समस्याओं के निदान में राग बसन्त का श्रवण करने पर काफी शान्ति व सुख की प्राप्ति हो सकती है। ‘नान रैपिड आई मूवमेंट स्लीप’ का आनन्द मरीज को प्राप्त हो सकता है। एक महीने तक रागात्मक प्रक्रिया के अन्तर्गत यदि उपचार किया जाए तो पीड़ितको इन समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। अब हम आपको राग बसन्त की एक रचना सुनवाते हैं। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं; ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न के स्वर में एक रचना सुनते हैं। अब आप सुनिए; पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की तीनताल में निबद्ध यह मनोहारी प्रस्तुति। तबला पर पण्डित नाना मुले और हारमोनियम पर पुरुषोत्तम तलवलकर ने संगति की है।

राग बसन्त : ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ : स्वर – पण्डित भीमसेन जोशी




राग बसन्त ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। अन्य अवसरों पर इस राग को रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- स, ग, म॑, (कोमल), नि, सं, तथा अवरोह के स्वर हैं- सं, नि, (कोमल), प, म॑, ग, रे, स। इस राग में ललित अंग से दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित है। राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। कभी-कभी संवादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी होता है। यह एक प्राचीन राग है। ‘रागमाला’ में इसे हिंडोल का पुत्र कहा गया है। अब आप राग बसन्त पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनिए। वर्ष 1961 में वी. शान्ताराम की फिल्म “स्त्री” का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म का एक गीत; “बसन्त है आया रंगीला...” राग बसन्त पर आधारित है। गीत को स्वर दिया है आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों और संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बसन्त : “बसन्त है आया रंगीला...” : आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 383वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत को किन युगल गायकों ने स्वर दिया है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 8 सितम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 385वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 381वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित फिल्म “मुगल-ए-आजम” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फिनिक्स, अमेरिका से मुकेश लढ़िया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की बारहवीं कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग बसन्त का परिचय प्राप्त किया। आपने पण्डित भीमसेन जोशी द्वारा प्रस्तुत राग बसन्त की एक रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने आशा भोसले, महेन्द्र कपूर और साथियों के स्वर में इस राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत फिल्म “स्त्री” से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   
रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग बसन्त : SWARGOSHTHI – 383 : RAG BASANT : 2 सितम्बर, 2018

Sunday, July 29, 2018

राग रागेश्वरी : SWARGOSHTHI – 378 : RAG RAGESHWARI









स्वरगोष्ठी – 378 में आज

राग से रोगोपचार – 7 : रात्रि के दूसरे प्रहर का राग रागेश्वरी

सकारात्मक ठहराव लाने और अनिद्रा के उपचार में सहायक है राग रागेश्वरी




परवीन सुल्ताना
लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज तथा मयूरवीणा के सुविख्यात वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के सातवें अंक में आज हम राग रागेश्वरी के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको सुविख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में राग रागेश्वरी में निबद्ध एक आकर्षक खयाल सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1953 में प्रदर्शित फिल्म “अनारकली” से इसी राग में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर की पद्धति के अनुसार राग रागेश्वरी के आरोह में सा, ग, म, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि॒, ध, म, ग, म, रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद होता है। इसका सटीक समय रात्रि 10 बजे से 11 बजे तक है। ग, म, रे, सा स्वरों द्वारा भावनात्मक व सकारात्मक ठहराव महसूस हो सकता है। इस प्रकार यह उपचार मरीज पर्याप्त शान्ति प्रदान कर सकता है। पीड़ित व्यक्ति को निद्रा का आनन्द प्रदान कराने के लिए रात्रि 11 से 12.30 बजे के मध्य राग मालकौंस का श्रवण लाभदायक हो सकता है। राग रागेश्वरी से भी निद्रा आ सकती है। इस राग में मध्यम स्वर का गाम्भीर्य एकाग्रता व निद्रा की स्थितियाँ ला सकता है। मनोभौतिक व्याधियों; धड़कन, उच्चरक्तचाप, उदर विकार आदि समस्याओं का निदान भी इस राग के स्वरात्मक व कलाकार के भावानुसार अभिव्यक्त सजीव सांगीतिक प्रभावों के द्वारा सम्भव हो सकता है।

अब हम आपको राग रागेश्वरी में निबद्ध एक मनमोहक रचना सुनवाते हैं। इसे विख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना ने प्रस्तुत किया है। खयाल, ठुमरी और भजन गायन में सिद्ध विदुषी परवीन सुल्ताना का जन्म 14 जुलाई, 1950 असम के नौगाँव जिलान्तर्गत डाकापट्टी नामक स्थान पर एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता इकरामुल मजीद और दादा मोहम्मद नजीब खाँ से प्राप्त हुई। बाद में 1973 से कोलकाता के सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से उन्हें संगीत का विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। पटियाला घराने के गायक उस्ताद दिलशाद खाँ से भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला। आगे चल इन्हीं दिलशाद खाँ से उनका विवाह भी हुआ। परवीन सुल्ताना ने पहली मंच-प्रस्तुति 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में दी थी। 1965 से ही उनके ग्रामोफोन रेकार्ड बनने लगे थे। उन्होने कई फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया है। फिल्म दो बूँद पानी, पाकीजा, कुदरत और गदर के गाये गीत अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे। 1976 में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा गया। 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ में गाये गीत के लिए परवीन जी को श्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1986 में उन्हें तानसेन सम्मान और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। इस वर्ष (2014) उन्हें ‘पद्मभूषण’सम्मान से अलंकृत किया गया। परवीन जी के गायन में उनकी तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती हैं। आइए इनकी आवाज़ में सुनते हैं राग रागेश्वरी में निबद्ध एक मोहक खयाल रचना।

राग रागेश्वरी : “देत बधाई साईं को...” : विदुषी परवीन सुलताना


राग रागेश्वरी खमाज थाट का राग माना जाता है। इसमें निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। राग में पंचम स्वर बिल्कुल वर्जित होता है और आरोह में ऋषभ वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति औड़व-षाड़व होती है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग रागेश्वरी के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। राग रागेश्वरी का एक दूसरा प्रकार भी होता है, जिसके आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है, किन्तु मन्द्र सप्तक में सदैव कोमल निषाद स्वर का प्रयोग किया जाता है। कोमल निषाद स्वर की रागेश्वरी अधिक प्रचलित है। इस राग में धैवत और गान्धार की संगति अत्यन्त मनोरंजक होती है। अवरोह में कभी-कभी गान्धार स्वर का वक्र प्रयोग कर लिया जाता है। राग बागेश्री और मालगुंजी इस राग के समप्रकृति राग हैं। राग रागेश्वरी पर आधारित एक फिल्मी गीत अब आप सुनिए। लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत इस गीत को हमने 1953 में प्रदर्शित फिल्म “अनारकली” से लिया है। फिल्म के संगीतकार सी. रामचन्द्र हैं। आप यह गीत सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दें।

राग रागेश्वरी : “मोहब्बत ऐसी धड़कन है...” : लता मंगेशकर : फिल्म – अनारकली



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 378वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 4 अगस्त, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 380वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 376वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म “प्राइवेट सेक्रेटरी” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – बागेश्री, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल एकताल और दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश से सत्येन्द्र दुबे, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की सातवीं कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग रागेश्वरी का परिचय प्राप्त किया। साथ ही आपने इस राग में निबद्ध एक खयाल विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में सुना। इस राग पर आधारित एक गीत फिल्म “अनारकली” से लता मंगेशकर के स्वर में भी सुना।

पेंसिलवेनिया, अमेरिका से हमारी एक नियमित पाठक विजया राजकोटिया ने लिखा है; "Maru Bihag gane ke saath meri chinta bhag gai. I am writing not as a joke, but it is true." 

हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग रागेश्वरी : SWARGOSHTHI – 378 : RAG RAGESHWARI : 29 जुलाई, 2018

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