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रविवार, 13 सितंबर 2020

थाट व राग आसावरी : SWARGOSHTHI – 479 : THAT & RAG ASAVARI




स्वरगोष्ठी – 479 में आज

आसावरी थाट के राग – 1 : राग आसावरी 

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से राग आसावरी में एक रागदारी रचना और हेमन्त कुमार से फिल्मी गीत सुनिए 






हेमन्त कुमार 

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के आश्रय अथवा जनक राग आसावरी का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औडव-सम्पूर्ण जाति के राग आसावरी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में राग आसावरी में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का कई फिल्मी गीतों में उपयोग किया गया है। राग आसावरी के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म "इंस्पेक्टर" से एस.एच. बिहारी का लिखा और हेमन्त कुमार का स्वरबद्ध किया एक गीत "दिल छेड़ कोई ऐसा नगमा..." सुनवा रहे हैं, जिसे स्वयं हेमन्त कुमार ने ही स्वर दिया है। 



थाट और राग आसावरी आज हमारी चर्चा का विषय है। इस थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒(कोमल), म, प ध॒,(कोमल), नि॒(कोमल) अर्थात आसावरी थाट में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आसावरी थाट का जनक अथवा आश्रय राग आसावरी ही कहलाता है। राग आसावरी के आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वरों का उपयोग किया जाता है। अर्थात यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग के आरोह में सा, रे, म, प, ध(कोमल), सां तथा अवरोह में; सां,नि(कोमल),ध(कोमल),म, प, ध(कोमल), म, प, ग(कोमल), रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। दिन के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सार्थक अनुभूति कराता है। परम्परागत रूप से सूर्योदय के बाद गाये-बजाए जाने वाले इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। अब हम आपके लिए संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा। 

राग आसावरी : "सजन घर लागे..." : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर 


राग आसावरी अपने थाट का आश्रय अथवा जनक राग है। इसका वादी स्वर धैवत है, जो सप्तक के उत्तर अंग में आता है। साथ ही इसका गायन समय दिन का दूसरा प्रहर है। यह भी दिन के उत्तरांग में आता है, फिर भी इसका चलन सप्तक के पूर्वांग में तथा मन्द्र सप्तक में अच्छी तरह से होता है। जब कोई संगीतज्ञ इस राग में शुद्ध ऋषभ के स्थान पर कोमल ऋषभ प्रयोग करते हैं तो इसे राग कोमल ऋषभ आसावरी कहा जाता है। राग आसावरी से मिलता-जुलता राग जौनपुरी है, जिसकी चर्चा हम अगले किसी अंक में करेंगे। अब हम आपको राग आसावरी पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते है। यह गीत "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक और शोधकर्त्ता श्री के.एल. पाण्डेय के सौजन्य से हम प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत 1956 में प्रदर्शित फिल्म "इंस्पेक्टर" से लिया गया है। गीतकार एस.एच. बिहारी हैं और संगीतकार हेमन्त कुमार हैं। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत में हेमन्त कुमार का ही स्वर है। इस गीत का दूसरा संस्करण लता मंगेशकर के स्वर में है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग आसावरी : "दिल छेड़ कोई ऐसा नगमा..." : हेमन्त कुमार : फिल्म - इंस्पेक्टर




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 479वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस विख्यात उस्ताद गायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 19 सितम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 481 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 477वें अंक में हमने आपको 1969 में प्रदर्शित फिल्म "तलाश" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - बरवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इस संक्रमण से स्वस्थ होने वाले लोगों के प्रतिशत में आशातीत वृद्धि हो रही है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जनक अथवा आश्रय राग आसावरी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए संगीतमार्तण्ड ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में राग आसावरी की एक रागदारी रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म "इंस्पेक्टर" से हेमन्त कुमार का संगीतबद्ध किया और एस.एच. बिहारी का लिखा एक गीत "दिल छेड़ कोई ऐसा नगमा..." प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत के स्वर स्वयं हेमन्त कुमार के हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
थाट व राग आसावरी : SWARGOSHTHI – 479 : THAT & RAG ASAVARI : 13 सितम्बर, 2020 


रविवार, 18 मार्च 2018

राग शिवरंजनी : SWARGOSHTHI – 361 : RAG SHIVARANJANI





स्वरगोष्ठी – 361 में आज


पाँच स्वर के राग – 9 : “कहीं दीप जले कहीं दिल...”


संजीव अभ्यंकर से राग शिवरंजनी में खयाल और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए





लता मंगेशकर
संजीव अभ्यंकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की नौवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की नौवीं और समापन कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग शिवरंजनी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पण्डित संजीव अभ्यंकर द्वारा प्रस्तुत एक भक्ति रचना के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग शिवरंजनी के स्वरों का फिल्मी गीतों में अधिकाधिक उपयोग किया गया है। राग शिवरंजनी के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म “बीस साल बाद” से हेमन्त कुमार द्वारा स्वरबद्ध किया एक गीत –“कहीं दीप जले कहीं दिल...” लता मंगेशकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



श्रृंखला “पाँच स्वरों के राग” पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कुल आठ कड़ियों में सम्पन्न होनी थी। पेंसिलवेनिया, अमेरिका की हमारी नियमित पाठक विजया राजकोटिया ने इस श्रृंखला में एक और राग शिवरंजनी को शामिल किये जाने का अनुरोध किया है। उन्हीं के अनुरोध पर आज हम इस श्रृंखला की समापन कड़ी में राग शिवरंजनी का परिचय और इस राग के दो उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। फिल्मों में राग शिवरंजनी पर आधारित कई गीत लोकप्रिय हुए हैं। इनमें से हमने 1961 में प्रदर्शित फिल्म “बीस साल बाद” का एक लोकप्रिय गीत –“कहीं दीप जले कहीं दिल...” चुना है। राग शिवरंजनी की छाया लिये इस गीत के संगीतकार हेमन्त कुमार थे और इसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। इस गीत के बारे में फिल्म संगीत के विख्यात इतिहासकार पंकज राग ने अपनी पुस्तक “धुनों की यात्रा” में लिखा है, - फिल्मिस्तान स्टूडिओ के बन्द होने के बाद संगीतकार हेमन्त कुमार ने स्वयं अपनी प्रोडक्शन कम्पनी बनाने की सोची। इस कम्पनी का नाम उन्होने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध रचना “गीतांजलि” से प्रेरित होकर गीतांजली पिक्चर्स रखा। हेमन्त कुमार ने इस नई प्रोडक्शन कम्पनी के बैनर तले रहस्य रोमांच से परिपूर्ण फिल्में बनाईं। इस श्रृंखला की पहली फिल्म थी सर आर्थर कॉनन डायल के प्रसिद्ध उपन्यास “The Hound of the Baskervilles” से प्रभावित “बीस साल बाद”। 1961 में बनी इस हिन्दी फिल्म में शरलक होम्स तो न थे, और चूँकि हिन्दी फिल्म थी, अतः रोमांस के अवयव भी डालने जरूरी थे। फिल्म के रहस्यमय वातावरण को जीवन्त करता गीत –“कहीं दीप जले कहीं दिल...” तो आज भी लता मंगेशकर के सर्वश्रेष्ठ रहस्य गीतों में अपना स्थान रखता है। यह गीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योकि इसी गीत से लता मंगेशकर के जीवन का एक बड़ा महत्वपूर्ण मोड़ जुड़ा है। दरअसल उन दिनों लता मंगेशकर काफी बीमार हो गईं थी और बीमारी से उठने के बाद उन्हें लगने लगा था कि उनकी आवाज़ पर भी बीमारी का बुरा असर पड़ा है। लता को लग रहा था कि रिहर्सलों में बात बन नहीं पा रही है। परन्तु हेमन्त कुमार ने उन्हें बिना बताए एक रिहर्सल को रिकार्ड कर लिया और उसी को रिकार्डिंग मान कर लता मंगेशकर को सुनाया और विश्वास दिला दिया कि उनकी आवाज़ पहले जैसी ही है। इस मुश्किल गीत को जब वे सफलतापूर्वक गा सकी तो उन्हें अपना खोया हुआ आत्मविश्वास वापस मिल गया। इस गीत को लता मंगेशकर द्वारा 1967 में उद्घोषित अपने दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में स्थान दिया। राग शिवरंजनी की छाया लिये यह गीत आज भी संगीतप्रेमियों को बेसुध कर देता है। फिल्म के गीतकार शकील बदायूनी ने दृश्य की माँग के अनुकूल गीत रचे और हेमन्त कुमार ने लगभग सभी गीतों में विभिन्न रागों का आधार दिया। लीजिए, अब आप फिल्म “बीस साल बाद” का राग शिवरंजनी का आधार लिये गीत –“कहीं दीप जले कहीं दिल...” सुनिए।

राग शिवरंजनी : “कहीं दीप जले कहीं दिल...” : लता मंगेशकर : फिल्म – बीस साल बाद


ग कोमल संवाद प स, म नि सुर दिए हटाय,
मध्य-रात्रि औड़व मधुर, शिवरंजनी सुहाय।
राग शिवरंजनी काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष पाँच स्वर होने के कारण यह औड़व-औड़व जाति का राग होता है। इस राग में गान्धार स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। आरोह के स्वर हैं; सा, रे, (कोमल), प, ध, सां और अवरोह के स्वर हैं; सां, ध, प, (कोमल), रे, सा। इस राग के कोमल गान्धार स्वर को यदि शुद्ध गान्धार बना कर प्रयोग किया जाए तो राग भूपाली की अनुभूति होगी। यह ठुमरी अंग का राग माना जाता है। अतः इस राग में ठुमरी, दादरा, सुगम संगीत और फिल्म संगीत अधिक गाये जाते हैं। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर से लेकर मध्यरात्रि तक किया जाना उपयुक्त होता है। परन्तु ठुमरी रात्रि के पहले प्रहर में भी गायी जा सकती है। राग शिवरंजनी में श्रृंगार, विरह और भक्तिरस की रचनाएँ खूब निखरती हैं। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम इस राग में एक भक्तिपरक् रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, युवा गायक पण्डित संजीव अभ्यंकर। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक से हम आपके अनुरोध पर एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे।

राग शिवरंजिनी : “तुम बिन कौन लेत खबर मोरी...” : पण्डित संजीव अभ्यंकर





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 361वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस प्रसिद्ध गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 24 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 363वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 359वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म “सुर संगम” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – कलावती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, बीकानेर, राजस्थान से लक्ष्मीनारायण सोनी, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की नौवीं और समापन कड़ी में आपने राग शिवरंजनी का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए पण्डित संजीव अभ्यंकर से एक खयाल रचना का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “बीस साल बाद” से राग शिवरंजनी के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला शुरू करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रविवार, 19 फ़रवरी 2017

सायंकालीन राग : SWARGOSHTHI – 305 : EVENING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 305 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 5 : रात के प्रथम प्रहर के राग

राग भूपाली की बन्दिश - ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- “राग और गाने-बजाने का समय” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के पाँचवें प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग भूपाली की बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ से राग केदार पर आधारित एक गीत भी सुनवा रहे हैं।



विदुषी किशोरी  अमोनकर
भारतीय संगीत के रागों के गाने-बजाने का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वर’ और ‘वादी संवादी स्वर’ सिद्धान्तों पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम पूर्वांग और उत्तरांग के सिद्धान्त पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। एक सप्तक के दो भाग किये जाते हैं। षडज से पंचम तक के स्वरों को पूर्वांग के स्वर और मध्यम से अगले सप्तक के षडज तक के स्वरों को उत्तरांग के स्वर कहे जाते हैं। जिस राग का पूर्वांग अधिक प्रधान होता है, वह मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच की अवधि में तथा जिस राग का उत्तर अंग अधिक प्रबल होता है, वह मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता है। राग केदार, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, भीमपलासी आदि पूर्वांग प्रधान राग दिन के 12 बजे से रात्रि 12 बजे से पूर्व गाये-बजाए जाते हैं। इसी प्रकार सोहनी, बसन्त, हिंडोल, बहार, जौनपुरी आदि उत्तरांग प्रधान राग मध्यरात्रि 12 बजे से मध्याह्न 12 बजे तक गाये-बजाए जाते हैं। इन्हें क्रमशः पूर्व राग और उत्तर राग कहा जाता है। पूर्व राग का वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग से तथा संवादी स्वर उत्तर अंग से लिया जाता है। रात्रि के प्रथम प्रहर अर्थात गोधूलि बेला से रात्रि 9 बजे तक ऐसे रागों को गाया-बजाया जाता है जिसमे ऋषभ और गान्धार स्वर शुद्ध होते हैं। राग भूपाली और केदार दो ऐसे राग हैं, जिनमें उपरोक्त दोनों सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। यह दोनों राग रात्रि के प्रथम प्रहर में खूब प्रचलित हैं। आज पहले हम आपको राग भूपाली और फिर राग केदार के उदाहरण सुनवाते हैं। राग भूपाली कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-औड़व होती है, अर्थात राग के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का प्रथम प्रहर इस राग का आदर्श गायन-वादन समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पूर्वांग में होता है। यदि भूपाली के स्वरों को उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए तो यह राग देशकार हो जाता है। इन्हीं स्वरों वाले राग को दक्षिण भारतीय संगीत में राग मोहनम् कहा जाता है। अब हम आपको राग भूपाली की एक लोकप्रिय बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में सुनवा रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं- ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’

राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत...” : विदुषी किशोरी अमोनकर




हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा 
रात्रि के पहले प्रहर में गाये-बजाये जाने वाले राग भूपाली के अलावा इस प्रहर के कुछ अन्य राग हैं, कामोद, चन्द्रकान्त, छायानट, देशकार, नटविहाग, पटविहाग, जैतकल्याण, बिहागड़ा, यमन, श्यामकल्याण, शुद्धकल्याण, श्रीकल्याण, हमीर, हंसध्वनि, केदार आदि। अब हम आपको राग केदार में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। राग केदार भी कल्याण थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-षाड़व होती है; अर्थात आरोह में ऋषभ और गान्धार और अवरोह में केवल गान्धार स्वर वर्जित होता है। इस राग में दोनों मध्यम और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। दोनों मध्यम के कारण ही कुछ विद्वान इस राग को बिलावल थाट तो कुछ कल्याण थाट का मानते हैं। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसे बिलावल थाट का राग माना है। परन्तु अधिकांश आधुनिक गायक इसे कल्याण थाट का राग मानते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। 1957 में प्रदर्शित फिल्म “नरसी भगत” का एक गीत राग केदार का अच्छा उदाहरण है। तीनताल में निबद्ध इस गीत की धुन संगीतकार रवि ने बनाई थी। इस गीत में तीन पार्श्वगायकों की आवाज़ है: हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा। हिन्दी के यशस्वी गीतकार गोपाल सिंह नेपाली ने इस गीत को लिखा है। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया जब ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने फिल्म 'स्लमडॉग मिलियोनार' का निर्माण किया था। ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया यही गीत हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप यह गीत सुनिए।

राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 305वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 25 फरवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 307वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 303 की संगीत पहेली में हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘सेहरा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर और गायक मुहम्मद रफी

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह पाँचवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। पिछले सप्ताह कुछ अपरिहार्य कारणों से हम ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित नहीं कर सके, जिसके लिए हमे खेद है। हमारे पिछले अंक के बारे में पेंसिलवानिया, अमेरिका से हमारी एक नियमित पाठक विजया राजकोटिया ने एक टिप्पणी की है –

Krishnamohan Ji, Ustad Rashid Khan has presented superb composition in Raag Marwa. The same composition is sung by Ustad Amir Khan. I just have a suggestion that it would have been appropriate to post Marwa by Amir Khan Ji as it was his death anniversary recently.

इस सुझाव के लिए विजया जी का हार्दिक आभार। यदि आप भी किसी राग, गीत, श्रृंखला अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


रविवार, 20 सितंबर 2015

सायंकालीन राग : SWARGOSHTHI – 236 : EVENING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 236 में आज

रागों का समय प्रबन्धन – 5 : रात के प्रथम प्रहर के राग

राग भूपाली की बन्दिश - ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के पाँचवें प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग भूपाली की बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ से राग केदार पर आधारित एक गीत भी सुनवा रहे हैं।


किशोरी अमोनकर
भारतीय संगीत के रागों के गाने-बजाने का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वर’ और ‘वादी संवादी स्वर’ सिद्धान्तों पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम पूर्वांग और उत्तरांग के सिद्धान्त पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। एक सप्तक के दो भाग किये जाते हैं। षडज से पंचम तक के स्वरों को पूर्वांग के स्वर और मध्यम से अगले सप्तक के षडज तक के स्वरों को उत्तरांग के स्वर कहे जाते हैं। जिस राग का पूर्वांग अधिक प्रधान होता है, वह मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच की अवधि में तथा जिस राग का उत्तर अंग अधिक प्रबल होता है, वह मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता है। राग केदार, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, भीमपलासी आदि पूर्वांग प्रधान राग दिन के 12 बजे से रात्रि 12 बजे से पूर्व गाये-बजाए जाते हैं। इसी प्रकार सोहनी, बसन्त, हिंडोल, बहार, जौनपुरी आदि उत्तरांग प्रधान राग मध्यरात्रि 12 बजे से मध्याह्न 12 बजे तक गाये-बजाए जाते हैं। इन्हें क्रमशः पूर्व राग और उत्तर राग कहा जाता है। पूर्व राग का वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग से तथा संवादी स्वर उत्तर अंग से लिया जाता है। रात्रि के प्रथम प्रहर अर्थात गोधूलि बेला से रात्रि 9 बजे तक ऐसे रागों को गाया-बजाया जाता है जिसमे ऋषभ और गान्धार स्वर शुद्ध होते हैं। राग भूपाली और केदार दो ऐसे राग हैं, जिनमें उपरोक्त दोनों सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। यह दोनों राग रात्रि के प्रथम प्रहर में खूब प्रचलित हैं। आज पहले हम आपको राग भूपाली और फिर राग केदार के उदाहरण सुनवाते हैं।

राग भूपाली कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-औड़व होती है, अर्थात राग के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का प्रथम प्रहर इस राग का आदर्श गायन-वादन समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पूर्वांग में होता है। यदि भूपाली के स्वरों को उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए तो यह राग देशकार हो जाता है। इन्हीं स्वरों वाले राग को दक्षिण भारतीय संगीत में राग मोहनम् कहा जाता है। अब हम आपको राग भूपाली की एक लोकप्रिय बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में सुनवा रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं- ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’


राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत...” : विदुषी किशोरी अमोनकर




गोपाल सिंह नेपाली 
रात्रि के पहले प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले राग भूपाली के अलावा इस प्रहर के कुछ अन्य राग हैं- कामोद, चन्द्रकान्त, छायानट, देशकार, नटविहाग, पटविहाग, जैतकल्याण, बिहागड़ा, यमन, श्यामकल्याण, शुद्धकल्याण, श्रीकल्याण, हमीर, हंसध्वनि, केदार आदि। अब हम आपको राग केदार में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। राग केदार भी कल्याण थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-षाड़व होती है, अर्थात आरोह में ऋषभ और गान्धार और अवरोह में केवल गान्धार स्वर वर्जित होता है। इस राग में दोनों मध्यम और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। दोनों मध्यम के कारण ही कुछ विद्वान इस राग को बिलावल थाट तो कुछ कल्याण थाट का मानते हैं। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसे बिलावल थाट का राग माना है। परन्तु अधिकांश आधुनिक गायक इसे कल्याण थाट का राग मानते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ का एक गीत- 'दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...' राग केदार का अच्छा उदाहरण है। तीनताल में निबद्ध इस गीत की धुन संगीतकार रवि ने बनाई थी। इस गीत में तीन पार्श्वगायकों की आवाज़ है- हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा। हिन्दी के यशस्वी गीतकार गोपाल सिंह नेपाली ने इस गीत को लिखा था। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया जब ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने फिल्म 'स्लमडॉग मिलियोनार' का निर्माण किया था। आस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया यही गीत हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 


राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत




संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 236वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक छः दशक पुरानी फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार,  26 सितम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 238वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 234 की संगीत पहेली में हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘सेहरा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर और गायक मुहम्मद रफी। इस बार की पहेली में हमारे दो नये पाठक / श्रोता शामिल हुए हैं। बठिण्डा, पंजाब से सोनू बामराह और किसी अज्ञात स्थान से देवेन श्रोफ। इन दोनों प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये है। परन्तु देवेन जी ने अपना उत्तर फेसबुक पर सार्वजनिक रूप से दिया था, जिसे हमने तत्काल हटा दिया था। पहेली का उत्तर फेसबुक पर भी दिया जा सकता है, किन्तु व्यक्तिगत संदेश के रूप में ही, सार्वजनिक नहीं। इनके अलावा हमारी नियमित प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह पाँचवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रविवार, 18 मई 2014

एक सुषिर लोकवाद्य बीन, महुवर अथवा पुंगी

स्वरगोष्ठी – 168 में आज

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 6

'मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार...'  नागों को भी झूमने पर विवश कर देने वाला वाद्य


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की छठीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे संगीत वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में शास्त्रीय या लोकमंचों पर प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का भी उल्लेख कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे एक ऐसे लोकवाद्य पर चर्चा करेंगे जो सुषिर वर्ग का वाद्य है, अर्थात बाँसुरी या शहनाई की तरह इस वाद्य को भी हवा से फूँक कर बजाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि बीन के स्वर से नाग मुग्ध होकर झूमने लगते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के हमारे साथी सुजॉय चटर्जी इस सुषिर वाद्य पर चर्चा कर रहे हैं। 


दोस्तों, आपने शास्त्रीय मंचों पर कई ऐसे वाद्य देखे-सुने होंगे जो मूलतः लोकवाद्य श्रेणी में आते हैं, किन्तु गुणी संगीतज्ञों ने उनमें आवश्यक परिमार्जन कर शास्त्रीय संगीत के उपयुक्त बनाया। आज हमारी चर्चा में एक ऐसा लोकवाद्य है जो आज भी अपने मौलिक रूप में लोकमंचों पर ही सुशोभित है। वह वाद्य बीन है, जो कोई शास्त्रीय साज़ नहीं है, बल्कि इसे हम लोक-साज़ ही कहेंगे, क्योंकि इसका प्रयोग लोक संगीत मे स्वरवाद्य के रूप में ही होता है। इस साज का सर्वाधिक प्रयोग एक समुदाय विशेष के लोग अपने जीविकोपार्जन के लिए करते हैं। यह सपेरों का समुदाय है। बीन को आज हम सपेरों और साँपों से जोड़ते हैं। बीन वाद्य को पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। उत्तर और पूर्व भारत में इसे पुंगी, तुम्बी, महुवर, नागासर और सपेरा बाँसुरी के नामों से पुकारा जाता है, तो दक्षिण में नागस्वरम, महुदी, पुंगी और पमबत्ती कुज़ल नाम से प्रचलित है। पुंगी या बीन को सपेरे की पत्नी का दर्जा दिया जाता है और इस साज़ का विकास शुरु में लोक संगीत के लिए किया गया था।

पुंगी या बीन के चाहे कितने भी अलग-अलग नाम क्यों न हो, इस साज़ की जो संरचना है, वह हर स्थान पर लगभग एक जैसा ही है। इसकी लम्बाई करीब एक से दो फुट होती है। पारम्परिक तौर पर बीन या पुंगी एक सूखी लौकी से बनाया जाता है, जिसका इस्तेमाल एयर रिज़र्वर के लिए किया जाता है। इसके साथ बाँस के दो पाइप लगाये जाते हैं जिन्हें जिवाला कहा जाता है। इनमें से एक पाइप मेलोडी के लिए और दूसरा ड्रोन इफ़ेक्ट के लिए होती है। सबसे उपर लौकी के सूखे खोल के अन्दर एक ट्यूब डाला जाता है। वादक बाँसुरी की तरह है इसके सिरे पर फूँक मारता है। लौकी के खोल के अंदर फूँकने पर इसमें हवा भरती है और नीचे के हिस्से में लगे जिवाला से बाहर निकलती है। इन दोनों पाइपों में एक 'बीटिंग रीड' होती है जो ध्वनि उत्पन्न करती है। हम पहले ही यह चर्चा कर चुके हैं कि एक पाइप से मेलोडी बजती है और दूसरे से ड्रोन इफ़ेक्ट आता है। आधुनिक संस्करण में बाँस की दो पाइप के अलावा एक लम्बे मेटलिक ट्यूब का इस्तेमाल होता है। यह भी ड्रोन का काम करता है। पुंगी या बीन बजाते वक़्त हवा की निरन्तरता जरूरी है। फूँक में कोई ठहराव मुमकिन नहीं है। इसलिए इसे बजाने का जो सबसे प्रचलित तरीका है, वह है गोलाकार तरीके से साँस लेने का, जिसे हम अंग्रेज़ी में 'सर्कुलर ब्रीदिंग' कहते हैं। आइए, अब हम आपको समूह में बीन वादन सुनवाते हैं। इसे राजस्थान के लोक कलाकारों ने प्रस्तुत किया है।


समूह बीन वादन : राजस्थानी लोक धुन




पुंगी या बीन साज़ का इस्तेमाल राजस्थान के विख्यात लोकनृत्य, कालबेलिया में अनिवार्य रूप से होता है। इस नृत्य का कालबेलिया नामकरण इसी नाम से पहचाने जाने वाली एक बंजारा जाति के नाम पर पर हुआ है। यह जाति प्राचीन काल से ही एक जगह से दूसरे जगह पर निरन्तर घूमती रहती है। जीविकोपार्जन के लिए ये लोग साँपों को पकड़ते हैं और उनके ज़हर का व्यापार करते हैं। शायद इसी वजह से कालबेलिया लोकनृत्य के पोशाक में और नृत्य की मुद्राओं में भी सर्पों की विशेषताएँ देखी जा सकती हैं। कालबेलिया जाति को सपेरा, जोगिरा, और जोगी भी कहते हैं और ये स्वयं को हिन्दू मानते है। इनके पूर्वज कांलिपार हैं, जो गुरु गोरखनाथ के बारहवें उत्तराधिकारी थे। कालबेलिया सबसे ज़्यादा राजस्थान के पाली, अजमेर, चित्तौड़गढ़ और उदयपुर ज़िलों में पाये जाते हैं। कालबेलिया नृत्य इनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसमें पुरुष संगीत का पक्ष संभालते हैं। और इस पक्ष को संभालने के लिए जिन साज़ों का वे सहारा लेते हैं, उनमें शामिल हैं बीन या पुंगी, डफ़ली, खंजरी, मोरचंग, खुरालिओ और ढोलक, जिनसे नर्तकियों के लिए रिदम उत्पन्न की जाती है। जैसे जैसे नृत्य आगे बढ़ता है, रिदम और तेज़ होती जाती है। इन नर्तकियों का शरीर इतना लचीला होता है कि देख कर ऐसा लगता है जैसे रबर के बनें हैं। जिस तरह से बीन बजाकर साँपों को आकर्षित और वश में किया जाता है, कालबेलिया की नर्तकियाँ भी उसी अंदाज़ में बीन और ढोलक के इर्द-गिर्द लहरा कर नृत्य प्रस्तुत करती हैं।

बीन का इस्तेमाल कई हिन्दी फ़िल्मी गीतों में भी हुआ है। और जब भी कभी साँपों के विषय पर फ़िल्म बनी तो बीन के पीसेस बहुतायत में शामिल हुए। कभी हारमोनियम और क्लेवायलिन से बीन की ध्वनि उत्पन्न की गई तो कभी कोई और सीन्थेसाइज़र से। क्योंकि मूल बीन बजाने में कठिन अभ्यास की जरूरत होती है, इसलिए ज़्यादातर गीतों में अन्य साज़ों पर मिलते-जुलते आवाज़ को उत्पन्न कर इस्तेमाल किया गया। किसी और साज़ के इस्तेमाल से बीन का ईफ़ेक्ट लाया गया है ज़्यादातर गीतों में। आइए, 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नागिन' का बेहद लोकप्रिय गीत सुनते हैं, लता मंगेशकर की आवाज़ में। इसके संगीतकार हेमन्त कुमार थे और गीत में बीन की आकर्षक धुन के वादक कल्याण जी थे। संगीतकार कल्याण जी-आनन्द जी जोड़ी के कल्याण जी उन दिनों हेमन्त कुमार के सहायक थे। गीत के शुरुआत में बीन की धुन का एक लम्बा टुकड़ा इस्तेमाल हुआ है। यह हिस्सा इतना अधिक लोकप्रिय हुआ था कि आज छः दशक बाद भी अगर किसी सन्दर्भ में बीन के धुन की ज़रूरत पड़ती है, तो इसी पीस का सहारा लिया जाता है। आप बीन की मोहक धुन से युक्त इस गीत का आनन्द लीजिए और हमें इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म - नागिन : ‘मन डोले मेरा तन डोले मेरे दिल का गया करार...’ : लता मंगेशकर : संगीत – हेमन्त कुमार





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 168वें अंक की पहेली में आज हम आपको लगभग छः दशक पुराने एक लोकप्रिय फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 170वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत के इस अंश में किस ताल वाद्य का प्रयोग किया गया है? ताल वाद्य का नाम बताइए।

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 166वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको प्राचीन सुरबहार वाद्य पर प्रस्तुत तालबद्ध रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न के रूप में हमने प्रस्तुत रचना का राग पूछा था, जिसका सही उत्तर है- राग जैजैवन्ती। पहेली के दूसरे दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- धमार ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के अन्तर्गत लोकवाद्य बीन के बारे में चर्चा की। अगले अंक में हम एक ऐसे लोक तालवाद्य की चर्चा करेंगे, जो आज शास्त्रीय मंचों पर भी शोभायमान हो चुका है। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 


शोध एवं आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

रविवार, 17 नवंबर 2013

‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...’ : राग केदार में भक्तिरस

 

स्वरगोष्ठी – 144 में आज

रागों में भक्तिरस – 12

राग केदार के स्वरों से अभिसिंचित एक कालजयी भक्तिगीत


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे राग केदार में उपस्थित भक्तिरस पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम तीन भक्तिरस से पगी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ का राग केदार पर आधारित एक प्रार्थना गीत और इसके बाद पण्डित जसराज के गायन और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन की आकर्षक जुगलबन्दी में एक भजन भी आप सुनेगे। 


न्द्रहवीं शताब्दी के वैष्णव भक्त कवि नरसी मेहता के जीवन पर हिन्दी में दो फिल्मों का निर्माण हुआ था। पहली फिल्म 1940 में बनी थी, जिसमें गायक-अभिनेता विष्णुपन्त पगणीस और अभिनेत्री दुर्गा खोटे ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थी। इस फिल्म के संगीत निर्देशक शंकरराव व्यास थे। दूसरी फिल्म 1957 में बनी थी। राग केदार पर आधारित जो भजन हम आज आपको सुनवा रहे हैं वह इसी फिल्म से है। गीत के बोल हैं- ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...’। इस गीत का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसके गीतकार सुप्रसिद्ध कवि और साहित्यकार गोपाल सिंह नेपाली थे।

गोपाल सिंह नेपाली का जितना योगदान साहित्य जगत में रहा है, फिल्मों के गीतकार के रूप में भी उनका योगदान अतुलनीय रहा है। पाँचवें से सातवें दशक तक वे फिल्मों में सफल गीतकार के रूप में सक्रिय रहे। नेपाली जी ने फिल्मों में लगभग 400 गीतों की रचना की थी। उन्होने अधिकतर धार्मिक और सामाजिक फिल्मों में गीत लिखे। अपने फिल्मी गीतों में भी उन्होने साहित्यिक स्तर में कभी समझौता नहीं किया। 1946 में सचिनदेव बर्मन के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म 'आठ दिन', 1953 में प्रदर्शित फिल्म 'नाग पंचमी', 1955 की फिल्म 'शिवभक्त', 1959 की फिल्म 'नई राह' तथा 1961 में प्रदर्शित फिल्म 'जय भवानी' के गीत गोपाल सिंह नेपाली की बहुआयामी प्रतिभा के उदाहरण हैं। फिल्म के इन गीतों के बीच 1957 में श्री नेपाली रचित एक ऐसा गीत फिल्म 'नरसी भगत' में शामिल हुआ जिसने लोकप्रियता के सारे कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया। संगीतकार रवि द्वारा स्वरबद्ध तथा हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा के स्वरों में वह गीत है। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया। ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने 'स्लमडॉग मिलियोनर' का निर्माण किया था। आस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया और हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप यही गीत सुनिए।



राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत




भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। षाड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह और अवरोह दोनों में छह-छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल आरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार में भक्तिरस के तत्त्व का अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित एक भक्तिपूर्ण रचना जुगलबन्दी रूप में सुनवाते हैं। गायन और बाँसुरी वादन की यह जुगलबन्दी प्रस्तुत कर रहे हैं, विश्वविख्यात संगीतज्ञ, पण्डित जसराज और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया। इस भक्ति-रचना के बोल हैं, ‘गोकुल में बाजत कहाँ बधाई...’। आप राग केदार की इस भक्ति-रचना का रसास्वादन करें और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग केदार : भजन जुगलबन्दी : ‘गोकुल में बाजत कहाँ बधाई...’ : पं. जसराज और पं. हरिप्रसाद चौरसिया




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 144वें अंक की पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवें सेगमेंट की चौथी पहेली है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस संगीत रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम लिख भेजिए।

2 – यह कौन सा संगीत वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 146वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 142वीं कड़ी में हमने आपको पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा तंत्रवाद्य मोहन वीणा पर बजाए राग मियाँ की मल्हार का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तंत्र वाद्य मोहन वीणा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हमारे एकमात्र प्रतिभागी जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने ही दिया है। डॉ. त्रिपाठी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग केदार के भक्तिरस के पक्ष पर चर्चा की। आगामी अंक में हम एक और भक्तिरस प्रधान राग में गूँथी रचनाएँ लेकर उपस्थित होंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की तेरहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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