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Wednesday, June 10, 2009

जाने कहाँ गए वो दिन कहते थे तेरी राहों में....वाकई कहाँ खो गए वो दिन, वो फनकार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 107

'राज कपूर के फ़िल्मों के गीतों और बातों को सुनते हुए आज हम आ पहुँचे हैं 'राज कपूर विशेष' की अंतिम कड़ी मे। आपको याद होगा कि गायक मुकेश हमें बता रहे थे राज साहब के फ़िल्मी सफ़र के तीन हिस्सों के बारे में। पहला हिस्सा हम आप तक पहुँचा चुके हैं जिसमें मुकेश ने 'आग' का विस्तार से ज़िक्र किया था। दूसरा हिस्सा था उनकी ज़बरदस्त कामयाब फ़िल्मों का जो शुरु हुआ था 'बरसात' से। 'बरसात' के बारे में हम बता ही चुके हैं, अब आगे पढ़िये मुकेश के ही शब्दों में - "ज़बरदस्त, अमीन भाई, फ़िल्में देखिये, 'आवारा', 'श्री ४२०', 'आह', 'जिस देश में गंगा बहती है', और 'संगम'।" एक सड़कछाप नौजवान, 'आवारा', जिस पर दिल लुटाती है एक इमानदार लड़की, 'हाइ सोसायटी' के लोगों का पोल खोलता हुआ 'श्री ४२०', 'आह' मे मौत के साये में ज़िंदगी को पुकारता हुआ प्यार, डाकुओं के बीच घिरा हुआ एक सीधा सच्चा नौजवान, 'जिस देश में गंगा बहती है', और मोहब्बत का इम्तिहान, 'संगम', और उसके बाद शुरु होता है तीसरा हिस्सा, बता रहें हैं एक बार फिर मुकेश - "अब होता है अमीन भाई, जोकर का दौर शुरु। आप सब को मालूम ही है कि जोकर सबको हँसाता है और ख़ुद रोता है। देखिये, जोकर के साथ क्या क्या गुज़रा। पहले इनके साथी शैलेन्द्र चले गये। उसके बाद शैलेन्द्र का ग़म भूल भी न पाये थे,कि जयकिशन। उसके बाद पापाजी की बीमारी और यह डर कि यह साया भी हमारे सर से उठ जानेवाला है। फिर 'मेरा नाम जोकर' रिलीज़ हुई, वह भी लोगों को पसंद नही आयी! कर्ज़ा, अमीन भाई, सिर्फ़ पैसों का नहीं था, लेकिन एक फ़िल्म बनानेवाले की हैसीयत से जो अपने चाहनेवालों का कर्ज़ा था, वो उन्हे पूरा मार डाला। हालाँकि कमर टूट चुकी थी, मगर जनाब हिम्मत नहीं हारे। जस्बा वही था कि 'द शो मस्ट गो औन', और तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए उन्होने 'बॉबी' शुरु किया। रेज़ल्ट क्या हुआ मुझे बताने की ज़रूरत नहीं है।"

'मेरा नाम जोकर' को लेकर राज कपूर की बहुत सारी आशायें थीं। इस फ़िल्म मे उन्होने अपना सारा पैसा भी लगा दिया था। रूस से सर्कस के कलाकार बुलाये गये। यहाँ के बड़े बड़े अभिनेता अभिनेत्रियों को लिया गया। लेकिन इस फ़िल्म के बुरी तरह से पिट जाने से उन्हे बेहद धक्का लगा। लेकिन उन्होने अपने आप को संभाल लिया और आगे चलकर 'बौबी', 'सत्यम शिवम् सुन्दरम‍', 'प्रेम रोग', 'राम तेरी गंगा मैली', और 'हिना' जैसी सफल फ़िल्में बनायी। आज राज कपूर साहब को समर्पित इस ख़ास शृंखला को समाप्त करते हुए आपको सुनवा रहे हैं १९७० की फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' से एक बड़ा ही दिल को छू लेनेवाला गीत "जाने कहाँ गये वो दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछायेंगे।" राग भैरवी के साथ साथ राज कपूर और शंकर जयकिशन ने मिलकर राग शिवरंजनी का भी बहुत इस्तेमाल अपने गीतों में किया है, और यह गीत भी उन्ही में से एक है। इस फ़िल्म में शैलेन्द्र और हसरत के साथ साथ नीरज ने भी कुछ गानें लिखे थे। यह गीत हसरत साहब का लिखा हुआ है। जब भी यह गीत मैं सुनता हूँ न दोस्तों, हर बार मेरी आंखें भर आती हैं, क्यों...मैं नहीं जानता! शायद आपके साथ भी ऐसा होता होगा। हम बस इतना ही कहेंगे कि राज कपूर ने फ़िल्म जगत को जो योगदान दिया है उसका मोल कोई नहीं चुका सकता। आज ना तो राज कपूर हैं, ना शैलेन्द्र, ना हसरत हैं, ना शंकर जयकिशन, और ना ही मुकेश। हम इस पूरी टीम के लिए बस इतना ही कह सकते हैं कि "चाहे कहीं भी तुम रहो, चाहेंगे तुमको उम्र भर, तुमको न भूल पायेंगे"। हिंद युग्म की तरफ़ से राज कपूर और उनकी पूरी टीम को शत शत नमन!

गीत सुनने के बाद आप हमें यह बताइयेगा कि इस गीत के शुरूआती संगीत को आगे चलकर किस संगीतकार ने अपने किस गीत के शुरूआती संगीत के रूप में इस्तेमाल किया था। और यह भी बताइयेगा कि राज कपूर के किस फ़िल्म के पार्श्व संगीत यानी कि 'बैकग्राउंड म्युज़िक' में इस गाने का इंटरल्यूड बजाया गया है। अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालिये और बने रहिये हिंद-युग्म के संग।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सुनील दत्त इस फिल्म में डाकू जरनैल सिंह बने थे.
२. साथ थी वहीदा रहमान.
३. आशा भोंसले की आवाज़ में इस गीत में श्याम से विनती की जा रही है.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मंजू जी फिल्म का नाम जरूर सही है पर गाना गलत, अरे शरद जी आपसे कैसे भूल हो गयी. रचना जी ने भी खाता खोलने का अच्छा मौका हाथ से गँवा दिया और बाज़ी मारी "डार्क होर्से" सुमित जी ने. सुमित जी २ अंक मिले आपको बधाई. प्रकाश गोविन्द जी पूरी जानकारी दे दी आपने. धन्येवाद, नहीं नहीं कहानी मत सुनाईये, बस ज़रा सी फुर्ती और दिखाईये और विजेता बन जाईये

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



Listen Sadabahar Geetओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



Tuesday, June 9, 2009

लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया...राज का अभिनय अपने चरम पे था इस फिल्म में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 106

'राज कपूर विशेष' मे आज गीतकार शैलेन्द्र और राज कपूर के साथ की बात। शैलेन्द्र एक ऐसे रोशन सितारे हैं जो अपने बहुत छोटे से संगीत सफ़र में ही न जाने कितने अमर गीत हमें दे गये हैं। उनके ये अमर गीत दुनिया के होंठों पर सदियों तक थिरकते रहेंगे। शैलेन्द्र भाषा और साहित्य के विद्वान थे। रूसी साहित्य जानने के लिए उन्होने रूसी भाषा सीखा। रबींद्रनाथ टैगोर की नोबल जयी कृति 'गीतांजली' को समझने के लिए उन्होने बंगला भी सीखा। राज कपूर उन्हे पुश्किन कहा करते थे। सन् १९६६ मे शैलेन्द्र निर्माता बने और फणीश्वर नाथ रेणु की एक कहानी 'मारे गये गुलफ़ाम' को सेल्युलायड के परदे पर उतारा 'तीसरी क़सम' के शीर्षक से। यह फ़िल्म 'सेल्युलायड' के परदे पर लिखी गयी एक कविता है। आज इस फ़िल्म को फ़िल्म इतिहास का एक सुनहरा अध्याय के रूप मे भले ही स्वीकारा जाये, उस समय यह फ़िल्म बुरी तरह पिट गयी थी और इस फ़िल्म से निर्माता शैलेन्द्र को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। कई कड़वे अनुभवों से उन्हे गुज़रना पड़ा था। कुछ ऐसे लोग जिन पर उन्हे बहुत भरोसा था, उन्ही लोगों ने उनको पहुँचाया भारी नुकसान। शैलेन्द्र की इस महत्वाकांशी फ़िल्म को बाद मे राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, लेकिन अफ़सोस, वह दिन देखने के लिए शैलेन्द्र जीवित नहीं थे। बासु भट्टाचार्य निर्देशित और राज कपूर - वहीदा रहमान अभिनीत इस फ़िल्म का एक गीत आज सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे। आशा भोंसले और साथियों की आवाज़ों में यह गीत आपको सुदूर किसी गाँव मे हो गयी किसी के बिटिया की शादी मे ले जायेगा। लोक रंग मे रंगा यह गीत बेहद सुरीला है, मिट्टी की ख़ुशबू लिए हुए है जिसकी महक आज भी वैसी भी बरकरार है। संगीतकार और कोई नहीं, शंकर जयकिशन ही हैं।

दोस्तों, ३० अगस्त २००६ को शैलेन्द्र के जन्मदिवस के उपलक्ष पर दुबई स्थित '१०४.४ आवाज़ FM' रेडियो चैनल पर शैलेन्द्र के बेटे मनोज शैलेन्द्र से एक मुलाक़ात प्रसारित हुआ था, जिसका एक अंश मैं यहाँ पर प्रस्तुत करना चाहता हूँ, जिसे पढ़कर आप को शैलेन्द्र, राज कपूर और 'तीसरी क़सम' से जुड़ी कई बातें जानने को मिलेंगी।

प्रश्न: अच्छा मनोज साहब, मैं आपसे यह सवाल करना चाहूँगा कि फ़िल्म 'तीसरी क़सम' बाबा (शैलेन्द्र) की ज़िंदगी में एक अजीब मोड़ लेकर आयी और यही फ़िल्म कारण बनी उनके इस दुनिया से जाने का, बल्कि मैने यहाँ तक पढ़ा है कि जब यह फ़िल्म 'रिलीज़' हुई तो उसके 'प्रिमीयर' मे भी बाबा नहीं गये थे।

मनोज: जी हाँ, यह सच है। बाबा तो एक कलाकार थे और जज्बातों में बह जाया करते थे। उनको हरदम यह था कि जब फ़िल्म बनने लगी, तो काफ़ी परेशानियाँ झेलनी पड़ी। राज कपूर अपनी फ़िल्मों में काफ़ी बिज़ी थे, पहले 'संगम', फिर 'मेरा नाम जोकर', इसलिए उनसे डेट्स मिलना मुश्किल हो रहा था। और ख़ास तौर से इसी वजह से फ़िल्म मे देर होती चली गयी। और बाबा ठहरे कलाकार आदमी, दूसरे निर्मातायों की तरह उन्होने किसी फ़िल्म वितरक से पैसे नहीं लिए अपनी फ़िल्म को प्रायोजित करने के लिए। बल्कि उन्होने अपना जमा पूंजी लगा दी और ख़ुद पैसे उधार लिए अधिक ब्याज पर। जितनी फ़िल्म देर होती चली गयी, ब्याज और बढ़ता चला गया। जैसे जैसे फ़िल्म बनती गयी, उन्होने देखा कि उनके सारे दोस्त उन्हे हतोत्साहित करने मे लगे हैं। बाबा ने हमें बताया था कि जब फ़िल्म पूरी बन गयी तब राज कपूर ने उन्हे फ़िल्म के क्लाइमैक्स को बदलने का सुझाव दिया क्योंकि उन्हे लगा कि एक दुखद अंत फ़िल्म को कामयाब नहीं बना सकती। राज साहब ने अपनी फ़िल्म 'आह' का उदाहरण भी दिया जो दुखद अंत की वजह से फ्लॉप हो गयी थी। लेकिन बाबा कहानी मे कोई फेर बदल नहीं करना चाहते थे। राज साहब ने फिर उनसे उस फ़िल्म को 'आर.के' बैनर तले रिलीज़ करने का सुझाव दिया ताकी फ़िल्म वितरक जुटाने मे सुविधा हो। बाबा इस बात को भी नहीं माने और 'इमेज मेकर्स' के साथ ही बने रहे। यह बहुत ग़लत धारणा लोगों में फैली है कि 'तीसरी क़सम' के फ़्लाप हो जाने से जो आर्थिक क्षति हुई थी, उसने बाबा की जान ले ली। यह ग़लत है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस वक्त मै १५ साल का था और एक दिन बाबा अपने कमरे मे अकेले बैठे थे। मैं उनके कमरे मे गया और मालूम नहीं क्यों उन्होने मुझसे कहा कि 'देखो, मैं अपने हर गीत के लिए बहुत बड़ा पारिश्रमिक लेता हूँ, आज शंकर जयकिशन के हाथ ५० फ़िल्में हैं, और उनमें हर फ़िल्म मे अगर मैं एक गीत भी लिखूँ तो इतना कमा सकता हूँ कि सारा कर्ज़ अदा हो जाये।' इससे यह साबित होता है कि आर्थिक कारण नहीं था बाबा के गुजर जाने का।"

दोस्तों, इस इंटरव्यू का पूरा आलेख मेरे पास उपलब्ध है जिसे हम 'हिन्द-युग्म' पर ज़रूर प्रकाशित करने की कोशिश करेंगे, फिलहाल 'तीसरी क़सम' की याद ताज़ा कीजिये यह गीत सुनकर।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. "दा शो मस्ट गो ऑन" यही नारा था इस अमर फिल्म का.
२. मुकेश की आवाज़ में राज का दर्द.
३. दूसरे अंतरे की अंतिम पंक्ति में ये शब्द है -"साया".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह शरद जी पूरे दस अंकों के लिए बधाई आपको और भूल सुधार के लिए धन्यवाद. जी हाँ ये एक कहानी ही है, लिखते समय उपन्यास लिखा गया गलती से. पराग जी आपने सही कहा, ये गीत अन्य गीतों के मुकाबले कम ही सुना गया है पर जैसा मनु ने कहा मधुर धुन, शब्द और फिल्मांकन के कारण वाकई ये गीत बेहद मीठा और प्यारा लगता है. रचना जी और निर्मला जी आप भी बने रहिये इस महफिल में.

राजकुमार जी ने शरद तैलंग जी को सही पदवी दी और एक पहेली उन्होंने भी पूछ डाली। हम तो राज जी को होस्ट के तौर पर लायेंगे और चाहेंगे कि प्रस्तुतिकरण को और दिलकश बनायें।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी

Listen Sadabahar Geetओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.



Monday, June 8, 2009

मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के...सफलता की राह में मुड़ कर न देखा राज ने कभी पीछे

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 105

'राज कपूर को समर्पित इन विशेषांकों में हम न केवल राज साहब के फ़िल्मों के गाने आप तक पहुँचा रहे हैं, बल्कि उनके साथ अन्य कलाकारों से जुड़ी बातें भी साथ साथ बताते जा रहे हैं। इसी अंदाज़ को क़ायम रखते हुए आज हम बात करेंगे राज कपूर और मन्ना डे के साथ की। उन दिनों मुकेश राज कपूर का प्लेबैक कर रहे थे। ऐसे मे मन्ना डे किस तरह से राज कपूर की आवाज़ बने, पढ़िये मन्ना डे साहब के ही शब्दों में जो उन्होने विविध भारती को एक बार बताया था - "संगीतकार शंकर मुझसे हमेशा कहते थे कि आप की आवाज़ को संगीतकारों ने ठीक से 'एक्सप्लायट' नहीं कर पाये; जब भी सही मौका आयेगा, मैं आपको गवाउँगा। और वह फ़िल्म थी 'चोरी चोरी'। जब मैं 'चोरी चोरी' फ़िल्म का एक गीत गाने के लिए 'रिकॉर्डिंग स्टूडियो' पहुँचा, लताजी भी वहीं पर थीं। फ़िल्म के निर्माता चेटानी साहब ने शंकर से कहा कि 'यह बहुत 'इम्पार्टेंट' गाना है, मुकेश को क्यों नहीं बुलाया?' यह सुनकर मेरा तो दिल बिल्कुल बैठ गया। शंकर जयकिशन ने उन्हे समझाया कि मन्ना डे की आवाज़ मे यह गीत ज़्यादा अच्छा लगेगा। जब गाना 'रिकार्ड' हुआ तो राज कपूर साहब ने मुझे कहा कि 'मुझे पता ही नहीं था कि आप इतना अच्छा गाते हैं।' और इस तरह से मेरी 'एंट्री' 'रोमांटिक' गानों में हुई, 'थैंक्स टू शंकर'!" तो देखा दोस्तों आपने कि किस तरह से मन्ना दा राज कपूर की टोली में शामिल हुए थे! यह तो थी फ़िल्म 'चोरी चोरी' के "ये रात भीगी भीगी" गीत के 'रिकॉर्डिंग‍' का क़िस्सा। लेकिन आज राज कपूर और मन्ना डे की जोड़ी का जो गीत हम लेकर आये हैं वह है फ़िल्म 'श्री ४२०' का। आशा भोंसले, मन्ना डे और साथियों की आवाज़ों में बेहद लोकप्रिय यह क्लब गीत है "मुड़ मुड़ के ना देख मुड़ मुड़ के"।

'श्री ४२०' १९५५ की सबसे बड़ी ब्लाकबस्टर फ़िल्म थी। राज कपूर, नरगिस, नादिरा और ललिता पवार के जानदार अभिनय तो थे ही, साथ ही शंकर जयकिशन और हसरत-शैलेन्द्र के धूम मचाते गीत संगीत ने इस फ़िल्म को अमर बना दिया है। फ़िल्म का हर एक गीत कहानी के साथ कहानी को आगे बढ़ाते हुए ले जाता है। गीतों के मूड और रफ़्तार भी किरदारों के मन की स्थिति को बयाँ करते हैं। जैसे कि इसी गीत को ले लीजिये, गीत शुरु होता है नादिरा की धीमी नशीली चाल के साथ, लेकिन बाद मे राज कपूर वाले हिस्से मे उसकी रफ़्तार तेज़ हो जाती है जो उनके दिल की हलचल और बेक़रारी की स्थिति को दर्शाता है। ऐसा कहा जाता है कि यह गीत शुरु मे फ़िल्म मे नही था। लेकिन राज कपूर को जब नादिरा की नृत्यकला के बारे मे पता चला तो उन्होने ख़ास उनके नृत्य को फ़िल्म मे जगह देने के लिए एक 'सिचुयशन' बनाया और शंकर जयकिशन से गाना तैयार करने को कहा। नादिरा फ़िल्म मे खलनायिका की भूमिका मे थीं, इसलिए उसी अंदाज़ में यह गाना लिखा गया, संगीतबद्ध किया गया और उसी मादक अंदाज़ मे गाया भी गया। ट्रम्पेट साज़ का बेहद ख़ूबसूरत इस्तेमाल इस गीत मे सुनने को मिलता है। तो अब और देरी किस बात की, सुनिए और झूमिये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. एक मशहूर साहित्यकार के मशहूर उपन्यास पर आधारित थी ये फिल्म.
२. फिल्म के निर्माता ने अपना सब कुछ झोंक दिया इस फिल्म में, पर फिल्म को मिले राष्ट्रपति सम्मान को पाने के लिए जीवित न रह सके.
३. इस लोक गीत रुपी गीत के मुखड़े में शब्द है -"पियारी".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आपका स्कोर ८ पर आ गया है बधाई...आपने अपने बारे में जो बताया उसे जानकार ख़ुशी हुई, अपने अनुभव कभी हम सब के साथ बांटिएगा. पराग जी आपकी स्पिरिट कबीले तारीफ है. बहुत बहुत शुभकामनाएं. मनु जी और मनोज मिश्र जी बने रहिये इस महफ़िल में.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Sunday, June 7, 2009

ओ बसन्ती पवन पागल न जा रे न जा रोको कोई...मगर रोक न पायी कोई सदा राज को जाने से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 104

'राज कपूर विशेष' की चौथी कड़ी मे आप सभी का स्वागत है। राज कपूर कैम्प की एक मज़बूत स्तम्भ रहीं हैं लता मंगेशकर। दो एक फ़िल्मों को छोड़कर राज साहब की सभी फ़िल्मों की नायिका की आवाज़ बनीं लताजी। राज कपूर और लताजी के संबंध भी बहुत अच्छे थे। इसी सफल फ़िल्मकार-गायिका जोड़ी के नाम आज के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह शाम! दोस्तों, २ जुन १९८८ को राज कपूर इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ गये थे। इसके कुछ ही दिन पहले लताजी का एक कॊन्‍सर्ट लंदन मे आयोजित हुआ था जिसका नाम था 'लता - लाइव इन इंगलैंड'। इस कॊन्‍सर्ट की रिकार्डिंग मेरे पास उपलब्ध है दोस्तों, और उसी मे लताजी ने राज कपूर की दीर्घायू कामना करते हुए जनता से क्या कहा था वो मैं आपके लिए यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ - "भाइयों और बहनों, हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रोड्युसर, डायरेक्टर, हीरो, और किसी हद तक मैं कहूँगी म्युज़िक डायरेक्टर भी, राज कपूर साहब बहुत बीमार हैं दिल्ली में, मैं आप लोगों से यह प्रार्थना करूँगी कि आप लोग उनके लिए ईश्वर से प्रार्थना करें कि उनकी तबीयत ठीक हो जायें। हम लोगों ने कम से कम ४० साल एक साथ काम किया है, और हमारा मन वही है, रोज़ ही हमें मालूम हो रहा है कि आज तबीयत कैसी है, कैसी है, बस यही दुआ चाहते हैं सबसे की वो ठीक हो जायें"। जब लताजी की ये बातें चल रही थीं उस कॊन्‍सर्ट मे, वहीं 'बैकग्राउंड' में राज कपूर की रिकार्डेड आवाज़ भी साथ साथ गूँजती सुनाई दे रही थी जिसमें वो लताजी की तारीफ़ें कर रहे थे। और उनकी वो तारीफ़ें ख़त्म हुई इस पंक्ति से - "ख़ूशनसीब हूँ मैं कि अब तक मुझमें साँस हैं, जान है, और इनसे कह सकता हूँ कि सुन साहिबा सुन प्यार की धुन, मैनें तुझे चुन लिया तू भी मुझे चुन"। यह सुनते ही लताजी के साथ साथ पूरा स्टेडियम हँस पड़ा। दोस्तों, लताजी और तमाम लोगों की प्रार्थना ईश्वर ने नहीं सुनी और राज साहब हमेशा के लिए हमसे दूर चले गये। इस जाते हुए बसंती पवन को कोई नहीं रोक सका। राज कपूर की याद में आज इस शृंखला मे सुनिए सन् १९६० की फ़िल्म 'जिस देश मे गंगा बहती है" फ़िल्म का गीत लताजी की आवाज़ में - "ओ बसंती पवन पागल ना जा रे ना जा"। शैलेन्द्र का गीत और शंकर जयकिशन का संगीत। गीत आधारित है राग बसंत मुखारी पर और फ़िल्माया गया है फ़िल्म की नायिका पद्मिनी पर।

गीत सुनने से पहले लताजी और जयकिशन से जुड़ा एक क़िस्सा आपको बताना चाहेंगे। हुआ युँ कि 'बरसात' की प्लानिंग ज़ोर शोर से चल रही थी। एक दिन राज कपूर ने १९ वर्षीय जयकिशन से कहा कि वो लता के घर जाकर उसे अपने साथ ले आये क्यूंकि वो 'बरसात' के गानों की रिकॉर्डिंग करना चाहते हैं अपने चेम्बूर के स्टूडियो मे। लता उस समय तारदेव मे एक कमरे के एक मकान मे रहती थीं जो चेम्बूर से लगभग १५ मील दूर था। तो जयकिशन उनके घर जा पहुँचे और दरवाज़े पर खड़े हो गये। ख़ूबसूरत और जवान जयकिशन को देखकर लता पहले यह समझीं कि वो राज कपूर के कोई रिश्तेदार होंगे। जयकिशन ने भी अपना परिचय नहीं दिया और लता को लेकर पृथ्वी स्टूडियो पहुँच गये। जयकिशन लता को रिकॉर्डिंग रूम मे ले गये और हारमोनियम को अपने पास खींचकर लता को धुन समझाने लगे। लता तो बिल्कुल हैरान रह गयीं यह देखकर कि १९ साल का वो लड़का ना तो राज कपूर का कोई रिश्तेदार था और ना ही उनका कोई संदेशवाहक, बल्कि वो था फ़िल्म का संगीतकार! तो लीजिए राज कपूर, शैलेन्द्र और शंकर जयकिशन की याद में सुनिए लताजी की मधुर आवाज़ में आज का यह गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. राज की सफलतम फिल्मों में से एक.
२. इस युगल गीत में मन्ना डे ने दी थी राज कपूर को आवाज़.
३. मुखड़े में शब्द है -"हमसफ़र".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी, लगातार तीसरा सही जवाब और आपके अंक हो गए हैं- 6. लगे रहिये, नीरज जी जानकारी के लिए धन्येवाद. शमिख जी, संगीता जी, मनु जी थोडी सी और फुर्ती दिखाईये. पराग जी यदि कोई ग़लतफ़हमी रह गयी हो तो माफ़ी चाहेंगें, यदि आप आवाज़ पर साइड में लगे राज कपूर के पोस्टर पर भी देखेंगें तो वहां भी यही लिखा है कि राज साहब पर फिल्माए गए गीत होंगें, फिल्माए जाने का मतलब ये ज़रूरी नहीं है कि उसी कलाकार ने गीत की लिप्सिंग की हो, "जिंदगी ख्वाब है" गीत में राज साहब मौजूद हैं, ठीक वैसे ही जैसे "ओ बसंती" में, जो कि पूरी तरह पद्मिनी द्वारा ही फिल्म में गाया गया है. इसे आप खेल भावना से ही लीजिये. आप शरद जी को जबरदस्त टक्कर दे सकते हैं. अभी सफ़र लम्बा है...शुभकामनायें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Saturday, June 6, 2009

जिंदगी ख्वाब है....राज कपूर ने जिसे जिया एक सिल्वर स्क्रीन ख्वाब की तरह

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 103

'राज कपूर विशेष' जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे। दोस्तों, कल हमारा अंक ख़त्म हुआ था मुकेशजी की बातों से जिनमें वो बता रहे थे राज कपूर के बारे मे। वहीं से बात को आगे बढ़ाते हुए सुनते हैं कि मुकेश ने आगे क्या कहा था अमीन सायानी को दिये उस पुराने साक्षात्कार मे - "अमीन भाई, एक दिन हम रणजीत स्टूडियो मे बैठे थे। हज़रत के पास एक टूटी-फूटी फ़ोर्ड गाड़ी हुआ करती थी उन दिनों। तो उसमे बिठाया हमें और ले गये बहुत दूर एक जगह। वहाँ ले जाकर अपना फ़ैसला सुनाया कि 'हम एक फ़िल्म 'आग' बनाना चाहते हैं'। तो कुछ 'सीन्स‍' भी सुनाये। 'सीन्स' तो पसंद आये ही थे मगर मुझे जो ज़्यादा बात पसंद आयी, वह थी कि जिस जोश के संग वो बनाना चाहते थे 'आग' को।" लेकिन 'आग' बनाते समय राज कपूर को काफ़ी तक़लीफ़ों का सामना करना पड़ा था, इस सवाल पर मुकेश कहते हैं - "काफ़ी तकलीफ़ें, अमीन भाई कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता। पैसे की तकलीफ़ें, डेटों की तकलीफ़ें, यानी कि फ़िल्म बनाते समय जो जो तकलीफ़ें आ सकती हैं एक 'प्रोड्युसर' को। वह इम्तिहान था राज कपूर का। फ़िल्म बन भी गयी तो कोई ख़रीदार नहीं। ख़रीदार आये तो हमारा मज़ाक उड़ाया करे। एक ने तो यहाँ तक भी कहा कि 'राज साहब, अगर 'आग' आप ने बनायी है तो अपना थियटर भी बना लीजिये, ताकी आग लगे तो आप ही के थियटर मे लगे।' और आग की जलन मिटाने के लिए फिर 'बरसात' बनी। 'आग' के फ़ेल हो जाने के बावजूद राज कपूर पास हो गये। देखिये कैसे, ये बहुत बड़े 'फ़ाइनन्सर' यु. वी, पुरी, वो आये, और तमाम बिज़नस की ज़िम्मेदारी अपने उपर ले ली, 'डिस्ट्रिब्युशन' की, 'फ़ाइनन्स' की, और राज कपूर के उपर यह ज़िम्मेदारी डाल दी कि 'तुम एक अच्छा युनिट बनाओ और एक बेहरतरीन फ़िल्म बनाओ'। राज लग गये साहब, अब देखिये, फ़िल्म का युनिट बनाने के लिए फ़िल्म लेखक के साथ हर एक 'वर्कर' का तार मिलना चाहिए, यानी सुर मिलना चाहिए। देखिए कैसे कैसे आदमी उन्होने चुने, लेखन के लिए ख़्वाजा अहमद अब्बास, रामानंद सागर, इंदर राज आनंद, शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, 'फ़ोटोग्राफी' मे जल मिस्त्री, राधू परमारकर, तरु दत्त, 'आर्ट डिरेक्‍शन' मे आचरेकर, 'साउंड रिकॉर्डिंग‍' मे अल्लाउद्दिन, और 'लास्ट बट नौट द लीस्ट' 'म्युज़िक' मे शंकर जयकिशन और लता मंगेशकर।" तो दोस्तों, यूं बनी थी राज कपूर की टीम जिसका एक महत्वपूर्ण स्तम्भ ख़ुद मुकेश भी थी।

आज जो गीत हम राज साहब को समर्पित कर रहे हैं वह है आर.के बैनर के तले राज कपूर द्वारा निर्मित १९५६ की फ़िल्म 'जागते रहो' का। मुकेश की आवाज़ है और एक बार फिर शैलेन्द्र ने इस गीत मे भी ज़िंदगी के सच्चे रंग भरे हैं। इस फ़िल्म मे राज कपूर, प्रदीप कुमार, सुमित्रा देवी, स्मृति बिस्वास, सुलोचना और पहाड़ी सान्याल मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म की आख़री सीन मे नरगिस नज़र आयीं थीं अतिथि कलाकार के रूप मे। आपको यह बता दें कि इसी साल यानी कि १९५६ मे ही प्रदर्शित फ़िल्म 'चोरी चोरी' में राज कपूर और नरगिस की जोड़ी आख़री बार नज़र आयी थी। शोम्भु मित्रा और अमित मित्रा निर्देशित 'जागते रहो' के लेखक थे ख़्वाजा अहमद अब्बास। फ़िल्म मे संगीत, जी नहीं, शंकर जयकिशन का नहीं था, बल्कि संगीत था सलिल चौधरी का, और शैलेन्द्र के साथ साथ प्रेम धवन ने भी फ़िल्म मे गाने लिखे थे। इस फ़िल्म को १९५७ मे चेकोस्लोवाकिया के कारलोवी वारी इंटरनैशनल फ़िल्म महोत्सव मे 'क्रीस्टल ग्लोब ग्रांड प्रिक्स' का ख़िताब हासिल हुआ था। तो लीजिए सुनिए 'ज़िंदगी ख़्वाब है'।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. पद्मिनी पर फिल्माया गया है ये गीत.
२. राज कपूर की एक और सफल फिल्म.
३. दूसरा अंतरा शुरू होता है इन शब्दों से -"याद कर"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
कमाल हो गया. पराग जी ने गलत जवाब दिया और मज़े की बात कि बाकी सब भी उनकी हाँ में हाँ मिला गए. "बॉबी" राज कपूर द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्म है और यहाँ इस शृंखला में हम राज कपूर पर फिल्माए गए गीतों की बात कर रहे हैं. अफ़सोस किसी को भी इस क्लासिक फिल्म की याद नहीं आई और सलिल चौधरी को भी भूला दिया. पराग जी नकारात्मक मार्किंग नहीं है इसलिए आप बच गए :) स्कोर अब भी वही है. आज के लिए सभी को शुभकामनायें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Friday, June 5, 2009

आवारा हूँ...या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ....कभी कहा था खुद राज कपूर ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 102

'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे चल रहा है 'राज कपूर विशेष'। कल के अंक मे राज कपूर के शुरूआती दिनों का ज़िक्र करते हुए हम आ पहुँचे थे सन् १९४९ की फ़िल्म 'बरसात' तक। 'बरसात' के गीतों से शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के गीतों की ऐसी बरसात शुरु हुई जो अगले तीन दशकों तक लगातार चलती रही और उस बरसात का हर एक बूँद जैसे एक अनमोल मोती बनकर बरसी। उधर चारली चैपलिन की छाप राज कपूर के 'मैनरिज़्म' पर पड़ी और वो कहलाये 'इंडियन चैपलिन'। उनके इस अंदाज़ की पहली फ़िल्म थी सन् १९५१ की 'आवारा'। उनकी यही 'इमेज' आज भी हमारी आँखों में बसी हुईं हैं। और उनके इसी चैपलिन वाले अंदाज़ को इस फ़िल्म के शीर्षक गीत मे भी उभारा गया और यही गीत आज सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे गायक मुकेश की आवाज़ मे। 'आवारा' पहली फ़िल्म थी जिसमें राज कपूर और उनके पिता पृथ्वीराज कपूर साथ साथ परदे पर नज़र आये थे। और दोस्तों यही वह फ़िल्म थी जिसने राज कपूर और नरगिस की जोड़ी को घर घर में लोकप्रिय बना दिया था और फ़िल्म इतिहास की पहली लोकप्रिय 'ऑन-स्क्रीन' जोड़ी के रूप में सामने आयी। 'बरसात' के बाद 'आवारा' में शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, शंकर जयकिशन, मुकेश और लता मंगेशकर एक बार फिर इकट्ठे हुए और एक बार फिर से वही संगीतमय कामियाबी की कहानी दोहरायी गयी।

राज कपूर और मुकेश के साथ के बारे मे शायद मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नही है। बस इतना ही कहूँगा कि अगर राज कपूर काया थे तो मुकेश उनकी छाया। अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'संगीत के सितारों की महफ़िल' शृंखला मे मुकेश पर केन्द्रित कार्यक्रम मे अमीन भाई ने उनके किसी पुराने साक्षात्कार की झलकियाँ पेश की थी जिसमे मुकेश ने राज कपूर के बारे मे कुछ बातें कहे थे, वही मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ - "जिस मोती के बारे मे मै आज ज़िक्र कर रहा हूँ अमीन भाई, उस मोती का नाम है राज कपूर। और मैं राज के ज़िंदगी से ही तीन हिस्से पेश करूँगा। बिल्कुल साफ़ है अमीन भाई, पहले हिस्से को कहूँगा 'आग', दूसरे को 'बरसात से संगम', और तीसरे को 'जोकर से बॉबी'। मैं उस ज़माने की बात कर रहा हूँ जब रणजीत स्टूडियो के अंदर हम लोग 'ट्रेनिंग‍' किया करते थे। राज कपूर को लेकर चंदुलालजी के पास आये पापाजी। पापाजी यानी कि पृथ्वीराज साहब। और कहने लगे कि 'देखिये, यह मेरे साहबज़ादे हैं, यह फ़िल्म मे जाना चाहता है, और मै चाहूँगा कि यह 'फ़िल्म-मेकिंग‍' के हर एक 'ब्रांच' को सीखे और कुली के काम से शुरु करे'। अमीन भाई, ऐसा है कि पापाजी ने राज मे कुछ गुण तो देख ही लिये थे पृथ्वी थियटर्स मे काम करते वक़्त, तो वो चाहते थे कि जब यह फ़िल्म मे जा ही रहा है तो पूरी पूरी तरह से सारा काम सीखे। तो वो बन गये वहाँ किदार शर्मा साहब के सहायक। वह क्या था कि शर्मा जी ने सहायक के अंदर 'हीरो' भी देख लिया, और शर्माजी ने उन्हे 'नीलकमल' मे 'हीरो' बना दिया।" दोस्तों, मुकेश की बातें अभी ख़त्म नही हुईं हैं, आगे का हिस्सा जारी रहेगा कल के अंक मे। लीजिए अब आज का गीत सुनिए, मुकेश की आवाज़, शैलेन्द्र के बोल, और एक बार फिर राग भैरवी का इस्तेमाल शंकर जयकिशन के संगीत में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. राज कपूर की इस फिल्म में शंकर जयकिशन का संगीत नहीं था.
२. इस फिल्म के लेखक थे ख्वाजा अहमद अब्बास.
३. मुखड़े में शब्द है -"झूठ".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी बहुत अच्छे. ४ अंकों के साथ आपने बढ़त बना ली है. नीलम जी, रचना जी, मनु जी और फ़राज़ जी जवाब तो सही है पर शरद जी सी फुर्ती भी दिखाईये ज़रा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Thursday, June 4, 2009

छोड़ गए बालम मुझे हाय अकेला छोड़ गए....एक टीस सी छोड़ जाता है "बरसात" का ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 101

दोस्तों, कल हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की हीरक जयंती मनायी। और उससे एक दिन पहले यानी कि २ जून को फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार राज कपूर साहब की पुण्यतिथि भी थी। 'शोमैन औफ़ दि मिलेनियम' राज कपूर को हम श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं हिंद युग्म के इसी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के माध्यम से। आज से लेकर अगले सात दिनों तक यह शृंखला समर्पित रहेगी राज कपूर की पुण्य स्मृति को। अर्थात, अगले सात अंकों में आप सुनने जा रहे हैं राज साहब की फ़िल्मों के सदाबहार गानें। राज कपूर की हर एक फ़िल्म अमर हो गयी है अपने सुमधुर गीत संगीत की वजह से। उनकी कोई भी फ़िल्म चाहे बौक्स औफ़िस पर चले या ना चले, लेकिन उनके हर फ़िल्म का संगीत राज करता है लोगों के दिलों में आज तक। और यही कारण है कि हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक पूरा का पूरा हफ़्ता मनाने वाले हैं 'राज कपूर विशेष'। गाने सुनवाने के साथ साथ हम आपको राज साहब से जुड़ी कई बातें भी बताएँगे, और अगर आपको भी उनके बारे मे कोई दिलचस्प बात का पता हो तो हमारे साथ ज़रूर बाँटें।

१४ दिसम्बर १९२४ को पेशावर मे जन्मे राज कपूर का पूरा नाम था रणबीर राज कपूर। पिता पृथ्वीराज कपूर और माँ रमा देवी के चार संतानों में राज सबसे बड़े थे। शम्मी कपूर और शशी कपूर उनके दो भाई थे और उनकी एक बहन थीं उर्मिला सियाल। पिता थियटर और फ़िल्मों से जुड़े हुए ही थे, और शायद इसी वजह से राज मे भी फ़िल्मों के प्रति लगाव पनपा। उन्होने अपना फ़िल्मी कैरियर 'क्लैपिंग बॉय' की हैसीयत से शुरु किया फ़िल्मकार किदार शर्मा के पास। ११ वर्ष की आयु मे वो पहली बार किसी फ़िल्म के परदे पर नज़र आये, फ़िल्म थी 'इन्कलाब', साल था १९३५। अगले १२ साल तक कई फ़िल्मों में छोटे मोटे रोल करने के बाद राज कपूर को नायक के रूप मे अपना पहला ब्रेक मिला किदार शर्मा की ही फ़िल्म 'नील कमल' मे जो बनी थी १९४७ मे। इस फ़िल्म में मधुबाला उनकी 'हीरोइन' बनीं। इसके बाद अगले ही साल, यानी १९४८ मे राज कपूर ने इतिहास रचा अपने समय का सबसे कम उम्र का फ़िल्म निर्माता व निर्देशक बनकर। जी हाँ, १९४८ मे राज कपूर ने स्थापना की 'आर.के. फ़िल्म्स' की और बना डाली फ़िल्म 'आग' जिसमे वो पहली बार नरगिस के साथ नज़र आये थे। इस जोड़ी का ज़िक्र हम अगले अंक मे भी करेंगे। 'आग' तो ज़्यादा नहीं चली, लेकिन 'आर.के' बैनर की गाड़ी ज़रूर चल पड़ी। 'आग' के पिट जाने के बाद राज कपूर ने अपनी पूरी की पूरी टीम ही बदल डाली। संगीतकार राम गांगुली के जगह आ गये शंकर-जयकिशन, गीतकार के रूप मे लिया गया शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी को, और मुकेश और लता मंगेशकर बने 'आर.के. फ़िल्म्स' के मुख्य गायक और गायिका। इस नयी टीम को लेकर १९४९ मे राज कपूर ने बनायी 'बरसात'। नायिका के रूप मे राज कपूर ने लौन्च किया वहीदन बाई की बेटी निम्मी को। यह फ़िल्म इतनी कामयाब रही कि इस फ़िल्म से जुड़े हर कलाकार के लिए यह फ़िल्म मील का पत्थर साबित हुआ। शंकर जयकिशन और शैलेन्द्र - हसरत की यह पहली फ़िल्म थी और पहली ही फ़िल्म मे इन्होनें ऐसे गानें बनाये कि हर गली, हर चौराहे, और हर घर में बस इसी फ़िल्म के गीतों की गूँज सुनायी देने लगी। भले ही लताजी का पहला हिट गीत फ़िल्म 'महल' मे आ चुका था, लेकिन 'बरसात' मे उनके गाये तमाम गीतों की लोकप्रियता ने उन्हे शीर्ष पर पहुँचा दिया। तो आइए 'राज कपूर विशेष' के अंतर्गत आज का गीत सुनते हैं इसी फ़िल्म 'बरसात' से जिसे मुकेश और लता ने गाया है, "छोड़ गये बालम, मुझे हाये अकेला छोड़ गये"। गीत राग भैरवी पर आधारित है, आपको शायद पता हो कि यह राग शंकर जयकिशन का सबसे चहेता राग रहा है, इतना ज़्यादा कि जयकिशन ने अपनी बेटी का नाम भी भैरवी रखा है। गीत को ग़ौर से सुनिएगा दोस्तों क्यूंकि इस गीत के इंटरलिउड़ म्युज़िक आपको राज कपूर की एक अन्य फ़िल्म 'श्री ४२०' के "प्यार हुआ इक़रार हुआ" मे भी सुनायी देता है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. राज कपूर की एक और बेहद सफल फिल्म का गीत.
२. राग भैरवी पर ही आधारित इस गीत में स्वर है मुकेश का.
३. पहले अंतरे की दूसरी पंक्ति में शब्द है -"इकरार".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
हमने पहेली को थोड़ा मुश्किल किया लेकिन शरद तैलंग जी ने फिर भी बाजी मार ली। इन्हें मिलते हैं 2 अंक। बिलकुल सही जवाब। शामिख फ़राज़ और निर्मला कपिला जैसे कुछ नये श्रोता भी दिख रहे हैं। लग रहा है आगे का मुक़ाबला और भी दिलचस्प होने वाला है।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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