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Sunday, July 7, 2019

राग झिंझोटी : SWARGOSHTHI – 425 : RAG JHINJHOTI






स्वरगोष्ठी – 425 में आज

खमाज थाट के राग – 6 : राग झिंझोटी

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ से राग झिंझोटी में एक ठुमरी और मुकेश से फिल्मी गीत सुनिए




उस्ताद अब्दुल करीम खाँ
मुकेश
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट, रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से तीसरा थाट खमाज है। इस श्रृंखला में हम खमाज थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में खमाज थाट के जन्य राग “झिंझोटी” पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपको सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में प्रस्तुत राग झिंझोटी की प्रसिद्ध ठुमरी के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग झिंझोटी के स्वरों का फिल्मी गीतों में अधिक उपयोग किया गया है। इस राग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म “छोटी बहन” से शंकर जयकिशन का स्वरबद्ध किया एक गीत – “जाऊँ कहाँ बता ऐ दिल...” पार्श्वगायक मुकेश के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज के अंक में हम खमाज थाट के राग झिंझोटी के बारे में चर्चा कर रहे हैं। इस राग में प्रस्तुत की जाने वाली पारम्परिक ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ के गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ सम्पूर्ण भारतीय संगीत का प्रतिनिधित्व करते थे। वे उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु थे। उन्होने दक्षिण के कर्नाटक संगीत के कई रागों को उत्तर भारतीय संगीत में शामिल किया और सरगम के विशिष्ट अन्दाज को उत्तर भारत में प्रचलित किया। किराना घराने के इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं, वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत-सभाओं में गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। खाँ साहब खयाल गायकी के साथ ठुमरी, दादरा, भजन और मराठी नाट्य संगीत के गायन में भी दक्ष थे। वर्ष 1925-26 में उनकी गायी राग झिंझोटी की अत्यन्त लोकप्रिय ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ का रिकार्ड भी बना था। आइए, उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वर में सुनते हैं, राग झिंझोटी यही प्रसिद्ध ठुमरी।

राग झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ


राग झिंझोटी खमाज थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में निषाद स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। कभी-कभी कोमल गान्धार स्वर का प्रयोग भी कर लिया जाता है। आरोह और अवरोह दोनों में सात-सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसीलिए इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद माना गया है। वादी-संवादी में षडज-पंचम भाव स्थापित नहीं होता, क्योंकि निषाद स्वर कोमल है। राग झिंझोटी चंचल प्रवृत्ति का राग होता है। इसे मुख्यतः मध्य और मन्द्र सप्तकों में गाते-बजाते हैं। इस राग को गाने-बजाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। आइए, अब हम आपको राग झिंझोटी पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1959 में प्रदर्शित फिल्म “छोटी बहन” से लिया है। गीत के गायक मुकेश हैं। हसरत जयपुरी के लिखे गीत को शंकर जयकिशन ने संगीतबद्ध किया है। गीत में राग झिंझोटी के स्वर और कहरवा ताल उपस्थित है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग झिंझोटी : “जाऊँ कहाँ बता ऐ दिल...” : मुकेश : फिल्म – छोटी बहन



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 425वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1977 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 430वें अंक की पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 13 जुलाई, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 427 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 423वें अंक की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म “देख कबीरा रोया” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – तिलंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर श्रृंखला “खमाज थाट के राग” की छठी कड़ी में आज आपने खमाज थाट के जन्य राग “झिंझोटी” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में प्रस्तुत एक ठुमरी का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म “छोटी बहन” से एक मनमोहक गीत मुकेश के स्वरों में सुनवाया। संगीतकार शंकर जयकिशन ने इस गीत को राग झिंझोटी के स्वरों में पिरोया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग झिंझोटी : SWARGOSHTHI – 425 : RAG JHINJHOTI : 7 जुलाई, 2019

Sunday, December 23, 2018

राग सिन्दूरा : SWARGOSHTHI – 399 : RAG SINDURA






स्वरगोष्ठी – 399 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 14 : राग सिन्दूरा

मुकेश से फिल्म का एक गीत और पण्डित श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर से राग सिन्दूरा सुनिए




डॉ.श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर
मुकेश
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौदहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की चौदहवीं कड़ी में आज हमने राग सिन्दूरा चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज 1960 में निर्मित और अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” से मुकेश के स्वर में राग सिन्दूरा का स्पर्श करता एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ और लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय (तब – मैरिस म्यूजिक कालेज) के यशस्वी प्रधानाचार्य पण्डित (डॉ.) श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में राग सिन्दूरा की एक दुर्लभ रिकार्डिंग भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग सिन्दूरा को काफी थाट का जन्य राग माना जाता है। इसके आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित किया जाता है और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किया जाता है। इसलिए इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग में प्रयोग किया जाने वाला गान्धार और निषाद स्वर कोमल होता है। वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है, किन्तु इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। कुछ विद्वान इस राग को सैन्धवी कहते हैं। राजस्थान में इसे सिन्धोड़ा भी कहा जाता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है। इस राग के स्वर-समूह श्रृंगार रस, विशेष रूप से श्रृंगार रस के विरह पक्ष की सार्थक अनुभूति कराते है। राग के शास्त्रीय पक्ष को समझने के लिए अब हम आपके लिए सुविख्यात संगीतज्ञ और लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय (तब – मैरिस म्यूजिक कालेज) के तत्कालीन यशस्वी प्रधानाचार्य पण्डित (डॉ.) श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में राग सिन्दूरा की एक दुर्लभ रिकार्डिंग हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस रिकार्डिंग में उन्होने नोम-तोम का आलाप और फिर तीनताल की एक रचना प्रस्तुत की है।

राग सिन्दूरा : “विघ्नविनाशन चतुर्भुज एकदन्त लम्बोदर...” : डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर




इसराज और मयूर वीणा के सुविख्यात वादक, विद्वान संगीतज्ञ और संगीत से रोगोपचार विषय पर शोधकर्त्ता पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग सिन्दूरा की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। इस राग के न्यास का स्वर पंचम होता है और उपन्यास का स्वर षडज होता है। यह राग होली के दिनों में किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। यद्यपि परम्परा यह है कि अन्य दिनों में राग सिन्दूरा रात्रि के दूसरे प्रहर में गाया-बजाया जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि राग सिन्दूरा का गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है। इस राग में ऋषभ, मध्यम, पंचम और धैवत स्वर मुख्य रूप से प्रयुक्त होते हैं। यदि राग काफी के आरोह में से कोमल गान्धार और कोमल निषाद स्वर निकाल दिया जाए तो राग सिन्दूरा का स्वरूप दृष्टिगत होगा। इस राग की प्रकृति चंचल और श्रृंगारिक होती है। अब हम आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। इस गीत का चुनाव करने में “फिल्मी गीतों पर रागों का प्रभाव” विषयक सुप्रसिद्ध शोधकर्त्ता के.एल. पाण्डेय ने हमारा सहयोग किया है। यह गीत फिल्म “भूल न जाना” का है, जिसका निर्माण वर्ष 1960 में हुआ था, किन्तु फिल्म किन्हीं कारणों से प्रदर्शित नहीं हो सकी थी। प्रदर्शित न होने के बावजूद फिल्म के गीतों के रिकार्ड जारी हुए थे और लोकप्रिय भी हुए थे। इन्हीं गीतों में से एक गीत पार्श्वगायक मुकेश के स्वर में है, जिसके बोल हैं –“गम-ए-दिल किस से कहूँ...”। इसके गीतकार हरिराम आचार्य और संगीतकार दान सिंह हैं। लीजिए अब आप राग सिन्दूरा (काफी थाट) पर आधारित यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग सिन्दूरा : “गम-ए-दिल किस से कहूँ...” : मुकेश : फिल्म – भूल न जाना




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 399वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। वर्ष 2018 की इस अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में मुख्य स्वर किस पार्श्वगायिका के हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 दिसम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 401वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 397वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “साज और आवाज़” से राग की छाया लिये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मारवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और साथी

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; फरीदाबाद, हरियाणा की इन्दिरा वार्ष्णेय, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की चौदहवीं कड़ी में आपने राग सिन्दूरा का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुविख्यात शिक्षक और संगीतज्ञ गायक डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के स्वर में नोम-तोम का आलाप और एक बन्दिश का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार दान सिंह द्वारा संगीतबद्ध अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” से एक गीत मुकेश के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग सिन्दूरा : SWARGOSHTHI – 399 : RAG SINDURA : 23 दिसम्बर, 2018

Sunday, March 25, 2018

कल्याण थाट : SWARGOSHTHI – 362 : KALYAN THAAT




स्वरगोष्ठी – 362 में आज

दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 1 : राग कल्याण अर्थात यमन और भूपाली

विदुषी किशोरी अमोनकर से भूपाली का खयाल और मुकेश से कल्याण में एक फिल्मी गीत सुनिए




किशोरी अमोनकर
मुकेश
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही एक नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ के प्रथम अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पहला थाट कल्याण है। आज के अंक में कल्याण थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन और इस थाट के जन्य राग भूपाली पर चर्चा करेंगे।



कल्याण थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग, म॑, प ध, नि, अर्थात इस थाट में मध्यम स्वर तीव्र होता है और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग कल्याण अथवा यमन, कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। मध्यकालीन ग्रन्थों में इस राग का यमन नाम से उल्लेख मिलता है। परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में इसका नाम केवल कल्याण नाम से मिलता है। आधुनिक ग्रन्थों में यमन एक सम्पूर्ण जाति का राग है। यह कल्याण थाट का आश्रय राग होता है। आश्रय राग का अर्थ होता है, ऐसा राग, जिसमें थाट में प्रयुक्त स्वर की उपस्थिति हो। इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- यमन, भूपाली, हिंडोल, हमीर, केदार, कामोद, नन्द, मारू बिहाग, छायानट, गौड़ सारंग आदि। इस थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी छः स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। वादी स्वर गान्धार और संवादी निषाद होता है। इसका गायन-वादन समय गोधूली बेला अर्थात सूर्यास्त से लेकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक होता है। राग कल्याण अथवा यमन के आरोह के स्वर हैं- सा, रे, ग, म॑, प, ध, नि, सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, ध, प, म॑, ग, रे, सा होते हैं। अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग यमन के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। वर्ष 1961 में एक फिल्म प्रदर्शित हुई थी, जिसका नाम “संजोग” था। इस फिल्म में मदन मोहन ने राग कल्याण अथवा यमन को आधार बना कर एक गीत, “भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...” स्वरबद्ध किया था। यह गीत पार्श्वगायक मुकेश के स्वर में प्रस्तुत किया गया है। लीजिए प्रस्तुत है, राग कल्याण अथवा यमन पर आधारित वही गीत।

राग यमन : “भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...” : मुकेश : फिल्म – संजोग


कल्याण थाट के अन्य रागों में एक प्रमुख जन्य राग भूपाली है। यह औड़व-औड़व जाति का राग है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का पहला प्रहर इस राग के गायन-वादन का समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान होता है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पहले हिस्से में होता है। इन्हीं स्वरों को यदि उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए यह राग देशकार हो जाता है। इस राग में ध्रुवपद, खयाल और तराना गाया जाता है। राग भूपाली में ठुमरी नहीं गायी जाती। कुछ पुराने संगीतज्ञ इस राग में पंचम और ऋषभ स्वर की संगति करते है, किन्तु अधिकतर ऐसा नहीं करते। दक्षिण भारतीय संगीत में इस राग के समतुल्य राग मोहनम् होता है। अब हम आपको राग भूपाली के स्वरों में एक खयाल रचना सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने की विदुषी किशोरी अमोनकर। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं; “जब से तुम संग लागली प्रीत...”। आप राग भूपाली की इस रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत…” : विदुषी किशोरी अमोनकर



      


 संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 361वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस प्रसिद्ध गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 31 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 364वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 360वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1962 में प्रदर्शित फिल्म “बीस साल बाद” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – शिवरंजनी और कहीं-कहीं राग सोहनी का स्पर्श, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की पहली कड़ी में आपने कल्याण थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग कल्याण अथवा यमन पर आधारित एक फिल्मी गीत, पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में सुना। इसके साथ ही कल्याण थाट के जन्य राग भूपाली का शास्त्रीय स्वरूप सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में रसास्वादन किया। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक से हम इस श्रृंखला का अगला अंक प्रस्तुत करेंगे। इस नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

कल्याण थाट : SWARGOSHTHI – 362 : KALYAN THAAT : 25 Mar. 2018

Saturday, August 26, 2017

चित्रकथा - 33: ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में मुकेश के गाए गीत

अंक - 33

ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में मुकेश के गाए गीत


"ऊपर जाकर याद आई नीचे की बातें.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



कल 27 अगस्त फ़िल्म जगत की दो महान हस्तियों की पुण्यतिथि है। सदाबहार फ़िल्मों के सुप्रसिद्ध निर्देशक और निर्माता ॠषिकेश मुखर्जी, तथा सुनहरे दौर के महान पार्श्वगायक मुकेश, दोनों ने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा था 27 अगस्त के दिन; मुकेश 1976 में और ऋषी दा 2006 में। अपनी अपनी विधा के इन दो महान कलाकारों को एक साथ याद करने के लिए आज के ’चित्रकथा’ में प्रस्तुत है उन गीतों की बातें जिन्हें मुकेश ने ॠषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में गाया है। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है इन दो महान फ़नकारों की याद को।




30 सितंबर 1922 को जन्मे ॠषिकेश मुखर्जी ने अपने पूरे फ़िल्मी सफ़र में 42 फ़िल्में निर्देशित की और कई फ़िल्मों का निर्माण भी किया। 40 के दशक के अन्त में कलकत्ता में बी. एन. सरकार के ’न्यु थिएटर्स’ में एक कैमरामैन के रूप में अपना फ़िल्मी सफ़र शुरु करने के बाद वो बम्बई चले आए और बिमल रॉय के साथ फ़िल्म एडिटर व सहायक निर्देशक के रूप में अपना नया सफ़र शुरु किया। बिमल रॉय की कालजयी फ़िल्मों, ’दो बिघा ज़मीन’ और ’देवदास’, में ऋषी दा का भी महत्वपूर्ण योगदान था। 1957 में ऋषी दा ने स्वतन्त्र रूप से अपनी पहली फ़िल्म ’मुसाफ़िर’ का निर्माण व निर्देशन किया। फ़िल्म तो कुछ ख़ास नहीं चली पर फ़िल्म निर्माण में उनकी दक्षता को सब ने देखा और स्वीकारा। नतीजा यह हुआ कि 1959 की बी. लछमन की फ़िल्म ’अनाड़ी’ को निर्देशित करने का मौका उन्हें मिल गया। राज कपूर - नूतन अभिनीत यह फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई। उधर गायक मुकेश राज कपूर का स्क्रीन वॉयस थे और इस फ़िल्म से मुकेश और ऋषी दा का साथ भी शुरु हुआ। और मज़े की बात देखिए कि इसी फ़िल्म के गीत "सबकुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी" के लिए मुकेश को अपना पहला फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला। और उधर ऋषी दा को भी इस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों के तहत माननीय राष्ट्रपति के हाथों रजत मेडल मिला। इस फ़िल्म में मुकेश के गाए तीन गीत थे। शीर्षक गीत का उल्लेख कर चुके हैं, अन्य दो गीत हैं "किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार... जीना इसी का नाम है" और लता मंगेशकर के साथ गाया "दिल की नज़र से, नज़रों की दिल से..."। शंकर-जयकिशन के संगीत में शैलेन्द्र के सहज-सरल शब्दों में लिखे ये सभी गीत आज कालजयी बन चुके हैं। फ़िल्म-संगीत के इतिहास में ये गीत मील के पत्थर की तरह हैं और मुकेश के गाए गीतों में ये अहम जगह रखते हैं। 

’अनाड़ी’ के बाद मुकेश और ऋषिकेश मुखर्जी का एक बार फिर साथ हुआ 1961 की ऋषी दा निर्मित व निर्देशित फ़िल्म ’मेम दीदी’ में। फ़िल्म के संगीतकार थे सलिल चौधरी और गीत लिखे एक बार फिर शैलेन्द्र ने। सलिल दा के संगीत में मुकेश ने समय-समय पर एक से बढ़ कर एक गीत गाए हैं जिनमें से कई गीत ऋषी दा की फ़िल्मों के लिए हैं। ’मेम दीदी’ मुकेश-सलिल-ऋषी की तिकड़ी की पहली फ़िल्म है। इस फ़िल्म में कुल छह गीत हैं, लेकिन मुकेश की आवाज़ बस एक ही गीत में है लता मंगेशकर के साथ "मैं जानती हूँ तुम झूठ बोलते हो..."। केसी मेहरा और तनुजा पर फ़िल्माया यह गीत ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ, इसकी वजह शायद फ़िल्म का फ़्लॉप होना है। लेकिन इसी साल ए. वी. मय्यप्पम निर्मित और ऋषीकेश मुखर्जी निर्देशित फ़िल्म आई ’छाया’ जिसके गीतों ने लोकप्रियता की सारी सीमाएँ पार कर दी। सलिल चौधरी के संगीत में राजेन्द्र कृष्ण के लिखे गीत हर रेडियो स्टेशन से बजने लगे। हालाँकि लता और तलत महमूद का गाया "इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा" फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा, पर लता और मुकेश का गाया "दिल से दिल की डोर बांधे चोरी चोरी जाने हम तुम तुम हम संग संग चले आज कहाँ" भी ख़ूब सुना गया। इस गीत की धुन पर बनने वाला मूल बांग्ला गीत "दुरन्तो गुर्निर एइ लेगेछे पाक" हेमन्त मुखर्जी (हेमन्त कुमार) ने गाया था।


1962 में ऋषि दा को विजय किशोर दुबे व बनी रिउबेन निर्मित फ़िल्म ’आशिक़’ को निर्देशित करने का मौक़ा मिला। राज कपूर, पद्मिनी और नन्दा अभिनीत इस फ़िल्म के गीत-संगीत का भार शैलेन्द्र-हसरत-शंकर-जयकिशन पर था। लता और मुकेश ने फ़िल्म के गीतों को अंजाम दिया जो बेहद चर्चित हुए। मुकेश की एकल आवाज़ में कुल चार गीत थे - "तुम जो हमारे मीत न होते, गीत ये मेरे गीत न होते", "तुम आज मेरे संग हँस लो", "ये तो कहो कौन हो तुम", और फ़िल्म का शीर्षक गीत "मैं आशिक़ हूँ बहारों का, फ़िज़ाओं का, नज़ारों का..."। और लता मंगेशकर के साथ इस फ़िल्म में मुकेश के गाए दो गीत थे - "ओ शमा मुझे फूंक दे" और "महताब तेरा चेहरा किस ख़्वाब में देखा था"। ये सभी गीत अपने ज़माने के मशहूर नग़में रहे हैं और आज भी आए दिन रेडियो पर सुनने को मिल जाते हैं। इस फ़िल्म के बाद ऋषी दा और मुकेश जी का साथ कई बरसों के बाद हुआ। 1966 की फ़िल्म ’बीवी और मकान’ का निर्माण किया था गायक-संगीतकार हेमन्त कुमार ने। ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म का संगीत उन्होंने स्वयम् ही तैयार किया तथा फ़िल्म के निर्देशन के लिए ऋषीकेश मुखर्जी को साइन किया और फ़िल्म में गीत लिखवाए नवोदित गीतकार गुलज़ार से। फ़िल्म में कुल ग्यारह गीत थे और फ़िल्म के चरित्रों को ध्यान में रखते हुए कई गायक-गायिकाओं ने फ़िल्म के गीत गाए। मुकेश की आवाज़ फ़िल्म के दो गीत में थी। पहला गीत है "अनहोनी बात थी हो गई है, बस मुझको मोहब्बत हो गई है", इसमें मुकेश के साथ तलत महमूद, मन्ना डे, हेमन्त कुमार और जोगिन्दर की आवाज़ें भी शामिल हैं। यह एक हास्य गीत है जिसमें मुकेश ने आशिष कुमार का प्लेबैक किया है और मन्ना डे ने महमूद का। औरत बने बिस्वजीत और बद्री प्रसाद का पार्श्वगायन किया जोगिन्दर और हेमन्त कुमार ने। मुकेश इसमें अपने पहले गीत "दिल जलता है तो जलने दो" की लाइन भी गाई। और दूसरा गीत भी एक हास्य गीत है "आ था जब जनम लिया था पी होके मर गई" जिसमें मुकेश, हेमन्त कुमार और मन्ना डे की आवाज़ें हैं। समय के साथ-साथ फ़िल्मों और फ़िल्म-संगीत की धाराएँ भी बदलीं और नई नई धाराएँ इसमें मिलती चली गईं। 60 के दशक के अन्तिम सालों में संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल तेज़ी से उपर चढ़ रहे थे। 1969 की ऋषीकेश मुखर्जी निर्देशित फ़िल्म ’सत्यकाम’ में एल.पी का संगीत था और फ़िल्म के तीनों गीत लिखे कैफ़ी आज़मी ने। दो गीत लता की एकल आवाज़ में और तीसरा गीत है मुकेश, किशोर कुमार और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में एक जीवन दर्शन आधारित ख़ुशमिज़ाज गीत जिसे बस में सवार दोस्तों की टोली गाता है। "ज़िन्दगी है क्या बोलो" गीत में धर्मेन्द्र का पार्श्वगायन किया है मुकेश ने जबकि किशोर कुमार बने असरानी की आवाज़। महेन्द्र कपूर ने अन्य कलाकारों का प्लेबैक दिया।

1971, ऋषि दा के करीअर का शायद सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म, ’आनन्द’। ऋषी दा द्वारा निर्मित व निर्देशित ’आनन्द’ ने इतिहास रचा तथा राजेश खन्ना व अमिताभ बच्चन के फ़िल्मी सफ़र के भी मील के पत्थर सिद्ध हुए। फ़िल्म के सभी चार गीत सदाबहार नग़में हैं; मुकेश के गाए दो गीत "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" (योगेश) और "मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने" (गुलज़ार) उनके गाए 70 के दशक की दो बेहद महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। "कहीं दूर जब दिन ढल जाये, सांझ की दुल्हन बदन चुराये, चुपके से आये, मेरे ख़यालों के आंगन में कोई सपनों के दीप जलाये, दीप जलाये" - योगेश, सलिल चौधरी और मुकेश की तिकड़ी ने कई बार साथ में अच्छा काम किया है, पर शायद यह गीत इस तिकड़ी की सबसे लोकप्रिय रचना है। इस गीत से जुड़ा सबसे रोचक तथ्य यह है कि यह गीत इस सिचुएशन के लिए तो क्या बल्कि इस फ़िल्म तक के लिए नहीं लिखा गया था, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस गीत में फ़िल्म 'आनन्द' का पूरा सार छुपा हुआ है। इस गीत को गाने वाला आनन्द नाम का युवक यह जानता है कि मौत उसके घर के दरवाज़े पर दस्तक देने ही वाला है, आज नहीं तो बहुत जल्द, और दुनिया की कोई भी दवा उसे नहीं बचा सकती। फिर भी वो अपनी बची-खुची ज़िन्दगी का हर एक दिन, हर एक लम्हा पूरे जोश और उल्लास के साथ जीना चाहता है, और उसके आसपास के लोगों में भी ख़ुशियाँ लुटाना चाहता है। आनन्द अपनी प्रेमिका के जीवन से बाहर निकल जाता है क्योंकि वो नहीं चाहता कि उसकी मौत के बाद वो रोये। मौत के इतने नज़दीक होकर भी अपनों के प्रति प्यार लुटाना और आसपास के नये लोगों से उसकी दोस्ती को दर्शाता है "कहीं दूर जब दिन ढल जाये"। इस गीत के बोलों को पहली बार सुनते हुए समझ पाना बेहद मुश्किल है। हर एक पंक्ति, हर एक शब्द अपने आप में गहरा भाव छुपाये हुए है, और गीत को बार-बार सुनने पर ही इसके तह तक पहुँचा जा सकता है। यह गीत दरसल 1972 की फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए योगेश ने लिखा था। 'अन्नदाता' के निर्माता थे एल. बी. लछमन। 'अन्नदाता' के संगीतकार सलिल दा ही थे। एक दिन सलिल दा के यहाँ फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए इसी गीत की सिटिंग्‍ हो रही थी। एल. बी. लछमन, योगेश, सलिल चौधरी और मुकेश मौजूद थे। उसी दिन वहाँ फ़िल्म 'आनन्द' के लिए भी सिटिंग्‍ होनी थी। पहली सिटिंग्‍ चल ही रही थी कि 'आनन्द' की टीम आ पहुँची। निर्माता-निर्देशक ॠषिकेश मुखर्जी तो थे ही, साथ में राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन भी। जैसे ही इन तीनों ने यह गीत सुना, गीत इन्हें पसन्द आ गई। ऋषी दा ने लछमन साहब का हाथ पकड़ कर कहा कि यह गीत आप मुझे दे दीजिए! लछमन जी तो चौंक गए कि ये यह क्या माँग रहे हैं। अपनी फ़िल्म के लिए बन रहा गीत किसी अन्य निर्माता तो वो कैसे दे देते? उन्होंने ऋषी दा को मना कर दिया और माफ़ी माँग ली। पर ऋषी दा और राजेश खन्ना आसानी से कहाँ छोड़ने वाले थे? वो अनुरोध करते रहे, करते ही रहे। ऋषी दा ने यह भी कहा कि इस गीत के बोल उनकी फ़िल्म 'आनन्द' के एक सिचुएशन के लिए बिल्कुल सटीक है। इतने अनुनय विनय को देख कर न चाहते हुए भी लछमन जी ने कहा कि पहले आप मुझे वह सिचुएशन समझाइये जिसके लिए आप इस गीत को लेना चाहते हैं, अगर मुझे ठीक लगा तो ही मैं यह गीत आपको दे दूँगा। ऋषी दा ने इतनी सुन्दरता से सिचुएशन को लछमन साहब की आँखों के सामने उतारा कि लछमन जी काबू हो गये और उन्होंने यह गीत ऋषी दा को दे दी यह कहते हुए कि वाकई यह गीत आप ही की फ़िल्म में होनी चाहिए। यह बहुत बड़ी बात थी। दो निर्माताओं के बीच में साधारणत: प्रतियोगिता रहती है, ऐसे में लछमन साहब का ऋषी दा को अपना इतना सुन्दर गीत दे देना वाकई उनका बड़प्पन था। गीत तो 'अन्नदाता' की झोली से निकल कर 'आनन्द' की झोली में आ गया, पर लछमन साहब ने भी योगेश और सलिल चौधरी के सामने यह शर्त रख दी कि बिल्कुल ऐसा ही एक ख़ूबसूरत गीत वो 'अन्न्दाता' के लिए भी दोबारा लिख दें। कुछ-कुछ इसी भाव को बरकरार रखते हुए योगेश ने फ़िल्म 'अन्नदाता' के लिए फिर से गीत लिखा - "नैन हमारे सांझ सकारे, देखें लाखों सपने, सच ये कहीं होंगे या नहीं, कोई जाने ना, कोई जाने ना, यहाँ"। इन दोनों गीतों के भावों का अगर तुलनात्मक विश्लेषण किया जाये तो दोनों में समानता महसूस की जा सकती है।


’आनन्द’ के बाद मुकेश और ऋषी दा का अगला साथ हुआ 1974 की फ़िल्म ’फिर कब मिलोगी’ में जिसमें संगीतकार थे राहुल देव बर्मन। इस फ़िल्म में मुकेश ने बस एक गीत गाया लता के साथ "कहीं करती होगी वो मेरा इन्तज़ार..."। यह फ़िल्म फ़्लॉप थी और फ़िल्म के अन्य गीत भी ख़ास नहीं चले, पर इस गीत को काफ़ी मक़बूलियत मिली और आगे चल कर इस गीत का गायिका अनामिका ने रीमिक्स वर्ज़न भी बनाया और यह रीमिक्स वर्ज़न भी हिट हुआ। 1975 में ऋषी दा ने ’चुपके चुपके’ फ़िल्म का निर्माण किया। इसमें उन्होंने संगीत का भार सचिन देव बर्मन को दिया। फ़िल्म के कुल चार गीतों में एक गीत मुकेश और लता की युगल स्वरों में था - "बाग़ों में कैसे ये फूल खिलते हैं" जो धर्मेन्द्र और शर्मिला टैगोर पर फ़िल्माया गया था। 1976 में अचानक मुकेश की मृत्यु हो जाने से ऋषीकेश मुखर्जी की आने वाली फ़िल्मों से उनके गीत ग़ायब हो गए। लेकिन एक गीत जो पहले रेकॉर्ड हो चुका था, उसे 1978 की फ़िल्म ’नौकरी’ में शामिल किया गया और फ़िल्म की नामावली में "लेट मुकेश" लिखा गया। फ़िल्म के नायक थे राजेश खन्ना जिनका प्लेबैक दिया किशोर कुमार ने जबकि राज कपूर का प्लेबैक दिया मुकेश ने, शायद आख़िरी बार के लिए। आश्चर्य की बात है कि इस अन्तिम गीत का मुखड़ा था "उपर जाकर याद आई नीचे की बातें, होठों पे आई दिल के पीछे की बातें"। गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे मुकेश उपर जा कर अपने अज़ीम दोस्त राज कपूर के लिए यह गीत गा रहे हैं, और परदे पर भी इसे राज कपूर ही अदा कर रहे हैं। इसी गीत के साथ मुकेश का साथ राज कपूर और ऋषीकेश मुखर्जी से ख़त्म होता है। कल 27 अगस्त, मुकेश और ऋषीकेश मुखर्जी की याद का दिन है, और यह दिन हमें याद दिलाती है उन तमाम गीतों की जो इन दोनों के संगम से उत्पन्न हुई थी। मुकेश और ऋषीकेश मुखर्जी को सलाम करती है ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, April 30, 2017

राग गौड़ मल्हार : SWARGOSHTHI – 315 : RAG GAUD MALHAR




स्वरगोष्ठी – 315 में आज


संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 1 : राग गौड़ मल्हार का आकर्षक रूप


मालविका कानन और लता मंगेशकर से सुनिए –“गरजत बरसत भीजत आई लो...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की एक नई श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की पहली कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1949 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के घर में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने 1951 में प्रदर्शित फिल्म ‘मल्हार’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग गौड़ मल्हार के स्वरों में पिरोया है। यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही इसी राग की एक लोकप्रिय बन्दिश सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी मालविका कानन के स्वरों में हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



फिल्म जगत में रोशन के नाम से विख्यात संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। रोशन का प्रारम्भिक परिचय देते हुए उपरोक्त भूमिका में जैसा निवेदन किया गया है, उनका जन्म पंजाब के गुजरावालाँ (अब पाकिस्तान) में 14 जुलाई, 1917 को हुआ था। संगीत के प्रति उन्हें बचपन से ही लगाव था। देश के तत्कालीन वरिष्ठ संगीत गुरुओं से उनकी शिक्षा हुई। उन्होने पाठ्यक्रम पदयति से पाँच वर्ष तक मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से और गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत मैहर के उस्ताद अलाउद्दीन खाँ से संगीत का विधिवत प्रशिक्षण ग्रहण किया था। रोशन ने हर प्रकार का संगीत सीखा था, परन्तु उन्हें इसराज अथवा दिलरुबा वाद्य से विशेष लगाव था। यह वाद्य सारंगी वादन की तकनीक से मेल रखता है। इन वाद्यों का प्रभाव रोशन के स्वरबद्ध अधिकतर गीतों में मिलता है।

लता  मंगेशकर 
1948 में रोशन रेडियो की नौकरी छोड़ कर फिल्म संगीतकार बनने की लालसा लेकर मुम्बई (तब बम्बई) आ गए। थोड़े संघर्ष के बाद रोशन संगीतकार ख्वाजा खुर्शीद अनवर के सहायक बन गए। फिल्म ‘सिंगार’ में रोशन सहायक संगीतकार थे। कुछ समय बाद रोशन की भेंट फ़िल्मकार केदार शर्मा से हुई। उन्होने रोशन की प्रतिभा को पहचान कर फिल्म ‘नेकी और बदी’ के संगीतकार का दायित्व दे दिया। यह फिल्म 1949 में प्रदर्शित हुई थी, परन्तु व्यावसायिक दृष्टि से असफल रही। मधुबाला और गीताबाली अभिनीत और राजकुमारी, अमीरबाई कर्नाटकी और फिरोज दस्तूर के गाये गीतों के बावजूद टिकट खिड़की पर असफल रही फिल्म ‘नेकी और बदी’ से रोशन को कोई विशेष पहचान नहीं मिली। अगले वर्ष केदार शर्मा की ही फिल्म ‘बावरे नैन’ में भी रोशन का संगीत था। इस फिल्म में राज कपूर के लिए पार्श्वगायक मुकेश के गाये गीत –“तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं, वापस बुला ले...” के माध्यम से रोशन को अवश्य एक पहचान मिली। इस सदाबहार गीत ने उन दिनों तहलका मचा दिया था। इस गीत के अलावा फिल्म में मुकेश और गीता दत्त का गाया गीत –“ख़यालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते...” तथा मुकेश और राजकुमारी का गाया गीत –“मुझे सच सच बता दो...” भी पर्याप्त लोकप्रिय हुए थे। रोशन और मुकेश की जोड़ी ने इस फिल्म के सफल संगीत के मानक गढ़े थे। दोनों की मित्रता इस फिल्म से पहले की थी जब दोनों दिल्ली में रहते थे। इन दोनों की मित्रता की चर्चा श्रृंखला के आगामी किसी अंक में हम करेंगे। बहरहाल, फिल्म ‘बावरे नैन’ के संगीत की सफलता से रोशन को फिल्म जगत में स्थायित्व मिला। फिल्म ‘बावरे नैन’ की सफलता के कारण रोशन को ‘बेदर्दी’, ‘हमलोग’ और ‘मल्हार’ जैसी उल्लेखनीय फिल्में मिली। इन फिल्मों का प्रदर्शन वर्ष 1951 में हुआ था। फिल्म ‘बेदर्दी’ और ‘हमलोग’ में मुकेश के गाये गीत थे, जबकि ‘मल्हार’ स्वयं मुकेश द्वारा निर्मित फिल्म थी। फिल्म ‘मल्हार’ के शीर्षक संगीत के रूप में रोशन ने राग गौड़ मल्हार की एक प्रचलित बन्दिश का चुनाव किया। लता मंगेशकर ने फिल्म में शामिल इस बन्दिश को स्वर दिया था। अच्छे संगीत के बावजूद फिल्म ‘मल्हार’ व्यावसायिक रूप से असफल रही और गीत भी अनसुने रह गए। लगभग एक दशक बाद रोशन ने इसी धुन का 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘बरसात की रात’ में थोड़े शाब्दिक फेर-बदल के साथ दोबारा प्रयोग किया। फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी ने स्थायी और अन्तरे के शब्दों में बदलाव किए थे। जबकि फिल्म ‘मल्हार’ में गीत के शब्द पारम्परिक बन्दिश के अनुकूल थे। लगभग एक दशक बाद फिल्म ‘बरसात की रात’ और उसका संगीत, दोनों व्यावसायिक दृष्ठि से बेहद सफल सिद्ध हुआ। अब आपको हम लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘मल्हार’ का गीत सुनवाते हैं, जिसमें रोशन ने राग गौड़ मल्हार की बन्दिश का प्रयोग कर गीत को सदाबहार बना दिया। आप इस गीत को सुनिए ग्रीष्म ऋतु में वर्षा ऋतु का आनन्द लीजिए।

राग  गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म - मल्हार



मालविका कानन
राग गौड़ मल्हार में राग गौड़ और मल्हार अंग का अत्यन्त आकर्षक मेल होता है। यह मल्हार अंग के रागों में से एक है। इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सात-सात स्वरों का प्रयोग होता है। राग गौड़ मल्हार के आरोह और अवरोह में सभी शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। केवल अवरोह में धैवत के साथ कोमल निषाद स्वर का प्रयोग होता है। वक्र सम्पूर्ण जाति के इस राग में गान्धार स्वर का अत्यन्त विशिष्ट प्रयोग किया जाता है। राग गौड़ मल्हार के थाट के विषय में दो मत हैं। अधिकतर गायक-वादक खमाज थाट के अन्तर्गत, तो कुछ इसे काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित रामाश्रय झा तो इस राग को विलावल थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते थे। राग गौड़ मल्हार के बारे में विद्वानो का मत है कि इस राग के आरोह में शुद्ध गान्धार के साथ शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का यह स्वरूप अधिक प्रचलित है। जो गायक-वादक कोमल गान्धार का प्रयोग करते हैं वे इस राग को काफी थाट के अन्तर्गत प्रयोग करते हैं। इस राग में मध्यम पर न्यास करना और ऋषभ-पंचम की संगति आवश्यक होती है। यह प्रयोग मल्हार अंग का परिचायक होता है। राग गौड़ मल्हार में पण्डित विद्याधर व्यास और विदुषी किशोरी अमोनकर ने नि(कोमल),ध,नि,सा (मियाँ मल्हार) का जैसा मोहक परम्परागत प्रयोग किया है, वह सुनने योग्य है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है, किन्तु पावस ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। आइए अब हम आपको राग गौड़ मल्हार की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका मालविका कानन के स्वरों में सुनवाते हैं। उन्होने तीनताल में इसे एक अलग ही रस-रंग में प्रस्तुत किया है। आप राग गौड़ मल्हार की यह बन्दिश सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग गौड़ मल्हार : ‘गरजत बरसत भीजत आई लो...’ : विदुषी मालविका कानन : तीनताल




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 315वें अंक की पहेली में आज हम आपको 65 वर्ष से अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश में किस राग का आधार है? राग का नाम बताइए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 6 मई, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 317वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 312वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से एक शैली प्रधान और राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – तिलक कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – पार्श्वगायक मुकेश

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागियों ने दो-दो अंक अपने खाते में जोड़ लिये हैं। जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी. चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया इस सप्ताह के विजेता हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इस सप्ताह से हमारी नई श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हुआ है। इस अंक में हमने रोशन के संगीत से सजी फिल्म ‘मल्हार’ से राग गौड़ मल्हार में पिरोए एक गीत और इस राग के पारम्परिक स्वरूप पर चर्चा की है। आगामी अंक में हम रोशन के संगीत से सजे एक और राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। अगले अंक अथवा अगली श्रृंखला के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों से हम पुनः मिलेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, April 16, 2017

चैत्र की चैती : SWARGOSHTHI – 313 : CHAITRA KI CHAITI




स्वरगोष्ठी – 313 में आज

फागुन के रंग – 5 : चैती गीतों का लालित्य

विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में सुनिए – “चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा, पिया घर लइहें...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखला “फागुन के रंग” की पाँचवीं और समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। पिछले दिनों हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया था। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। अब तो चैत्र, शुक्ल प्रतिपदा अर्थात भारतीय नववर्ष और नवरात्रि का पर्व भी हम माना चुके हैं। इस परिवेश में लोक और उप-शास्त्रीय शैली में चैती गीतों का गायन किया जाता है। पिछले अंक में हमने धमार गीतों में होली की चर्चा की थी। आज के अंक में हम चैती गीतों की चर्चा करेंगे। आज हम विदुषी गिरिजा देवी और विदुषी निर्मला देवी के स्वरों में उपशास्त्रीय चैती और पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में एक फिल्मी चैती प्रस्तुत कर रहे हैं।



ज हम आपसे संगीत की एक ऐसी शैली पर चर्चा करेंगे जो मूलतः ऋतु प्रधान लोक संगीत की शैली है, किन्तु अपनी सांगीतिक गुणबत्ता के कारण इस शैली को उपशास्त्रीय मंचों पर भी अपार लोकप्रियता प्राप्त है। भारतीय संगीत की कई ऐसी लोक-शैलियाँ हैं, जिनका प्रयोग उपशास्त्रीय संगीत के रूप में भी किया जाता है। होली पर्व के बाद, आरम्भ होने वाले चैत्र मास से ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो जाता है। इस परिवेश में चैती गीतों का गायन आरम्भ हो जाता है। गाँव की चौपालों से लेकर मेलों में, मन्दिरों में चैती के स्वर गूँजने लगते हैं। उत्तर भारत में इस गीत के प्रकारों को चैती, चैता और घाटो के नाम से जाना जाता है। चैती गीतों की प्रकृति-प्रेरित धुनें, इनका श्रृंगार रस से ओतप्रोत साहित्य और चाँचर ताल के स्पन्दन में निबद्ध होने के कारण यह लोक गायकों के साथ-साथ उपशास्त्रीय गायक-वादकों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है।

गिरिजा देवी
चैती गीतों का मूल स्रोत लोक संगीत ही है, किन्तु स्वर, लय और ताल की कुछ विशेषताओं के कारण उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी बेहद लोकप्रिय है। इन गीतों के वर्ण्य विषय में श्रृंगार रस के संयोग और वियोग, दोनों पक्ष प्रमुख होते हैं। अनेक चैती गीतों में भक्ति रस की प्रधानता होती है। चैत्र मास की नौमी तिथि को राम-जन्म का पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही बासन्ती नवरात्र के पहले दिन अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय पंचांग के नए वर्ष का आरम्भ भी होता है। इसलिए चैती गीतों में रामजन्म, राम की बाल लीला, शक्ति-स्वरूपा देवी दुर्गा तथा नए संवत् के आरम्भ का उल्लास भी होता है। इन गीतों को जब महिला या पुरुष एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है, परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है। इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं। 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी भिन्न हो जाती है। इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं। कभी-कभी गायकों को दो दलों में बाँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी इन गीतों को प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘चैता दंगल' कहा जाता है। आइए, सबसे पहले चैती गीतों के उपशास्त्रीय स्वरूप पर एक दृष्टिपात करते है। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी एक चर्चित चैती से हम आज की इस संगीत सभा का शुभारम्भ करते हैं। यह श्रृंगार रस प्रधान चैती है जिसमें नायिका परदेश गए नायक के वापस घर लौटने की प्रतीक्षा करती है। इस चैती की भाव-भूमि तो लोक जीवन से प्रेरित है, किन्तु प्रस्तुति ठुमरी अंग से की गई है।

चैती गीत : ‘चैत मासे चुनरी रंगइबे हो रामा...’ : विदुषी गिरिजा देवी और साथी



निर्मला  देवी
यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि ‘लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है।‘ श्लोक का अर्थ है कि ‘इस चर-अचर की दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं।‘ चैती गीतों के लोक-रंजक-स्वरुप तथा स्वर और ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उपशास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका। लोक परम्परा में चैती 14 मात्रा के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में कहरवा ताल का प्रयोग होता है। पूरब अंग के बोल-बनाव की ठुमरी भी 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है। सम्भवतः चैती के इन्हीं गुणों ने ही उपशास्त्रीय गायक-वादकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा| आइए अब हम आपको एक ऐसी चैती सुनवाते हैं, जिसे अपने समय की सुप्रसिद्ध उपशास्त्रीय गायिका निर्मला देवी ने स्वर दिया है। निर्मला देवी ने उपशास्त्रीय मंचों पर ही नहीं बल्कि फिल्मी पार्श्वगायन के क्षेत्र में भी खूब यश प्राप्त किया था। आज के विख्यात फिल्म अभिनेता गोविन्दा, गायिका निर्मला देवी आहूजा के सुपुत्र हैं। उनकी गायी इस चैती में आपको लोक और शास्त्रीय, दोनों रंग की अनुभूति होगी।

चैती गीत : ‘यही ठइयाँ मोतिया हेरा गइल रामा...’ : गायिका निर्मला देवी



मुकेश
चैती गीतों की प्रचलित धुनों का जब सांगीतिक विश्लेषण किया जाता है तो हमे स्पष्ट अनुभव होता है कि प्राचीन चैती की धुन और राग बिलावल के स्वरों में पर्याप्त समानता है। आजकल गायी जाने वाली चैती में तीव्र मध्यम के प्रयोग की अधिकता के कारण यह राग यमनी बिलावल की अनुभूति कराता है। उपशास्त्रीय स्वरूप में चैती का गायन प्रायः राग तिलक कामोद के स्वरों में भी किया जाता है। परम्परागत लोक-संगीत के रूप में चैती गीतों का गायन चाँचर ताल में होता है, जबकि पूरब अंग की अधिकतर ठुमरियाँ 14 मात्रा के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती हैं। दोनों तालों की मात्राओं में समानता के कारण भी चैती गीत लोक और उपशास्त्रीय, दोनों स्वरूपों में लोकप्रिय है। भारतीय फिल्मों में चैती धुन का प्रयोग तो कई गीतों में किया गया है, किन्तु धुन के साथ-साथ ऋतु के अनुकूल साहित्य का प्रयोग कुछ गिनीचुनी फिल्मी गीतों में मिलता है। 1963 में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के बहुचर्चित उपन्यास ‘गोदान’ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। इस फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार वादक पण्डित रविशंकर थे, जिन्होंने फिल्म के गीतों को पूर्वी भारत की लोकधुनों में निबद्ध किया था। लोकगीतों के विशेषज्ञ गीतकार अनजान ने फिल्म के कथानक, परिवेश और चरित्रों के अनुरूप गीतों की रचना की थी। इन्हीं गीतों में एक चैती गीत भी था, जिसे मुकेश के स्वर में रिकार्ड किया गया था। गीत के बोल हैं- ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा…’। इस गीत में आपको चैती गीतों के समस्त लक्षण परिलक्षित होंगे। इस गीत में राग तिलक कामोद का आधार और दीपचन्दी ताल का स्पन्दन भी मिलेगा। आप इस गीत का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक में हम एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे।

चैती गीत : ‘हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा...’ : मुकेश : फिल्म – गोदान



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 313वें अंक की पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी अधिक पुरानी फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 22 अप्रैल, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 315वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 311वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको ध्रुपद गायक पण्डित आशीष सांकृत्यायन के स्वर में धमार गायकी का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – मिश्र खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – धमार (14 मात्रा) और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, शैली – धमार

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर देकर इस सप्ताह विजयी हुए हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ का यह समापन अंक था। इस अंक में हमने आपके लिए चैती गीतों का एक खूबसूरत गुलदस्ता प्रस्तुत किया। श्रृंखला में हमने आपसे बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा की। आगामी अंक में हम संगीत जगत की एक महान विदुषी श्रीमती किशोरी अमोनकर को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इसके उपरान्त आगामी 30 अप्रैल,2017 से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ करेंगे। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम फिल्म जगत के गुणी संगीतकार रोशन के राग आधारित गीतो पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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