Showing posts with label emailkebahaneyaadonkekhazane. Show all posts
Showing posts with label emailkebahaneyaadonkekhazane. Show all posts

Saturday, March 26, 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने लेकर हम लौटे हैं इंदु जी के साथ जो है एक प्यारी माँ हम सब की

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, स्वागत है शनिवार के इस साप्ताहिक विशेषांक में। आज बारी 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की। आज बहुत दिनों के बाद हमारी प्रिय इंदु जी का ईमेल इसमें शामिल हो रहा है। आप में से बहुत से पाठकों को शायद याद होगा कि इंदु जी के एक पहले के ईमेल में उन्होंने एक बच्चे के बारे में बताया था। हम आप से यही गुज़ारिश करेंगे कि अगर आप ने उस समय उस ईमेल को नहीं पढ़ा था तो पहले यहाँ क्लिक कर उसे पढ़ के दुबारा यहीं पे वापस आइए। तो आज के ईमेल में भी इंदु जी ने उसी बच्चे के बारे में कुछ और बातें हमें बता रही हैं। जिस तरह से पिछले ईमेल ने हमारी आँखों को नम कर दिया था, आज के ईमेल को पढ़ कर भी शायद आलम कुछ वैसा ही होगा। आइए इंदु जी का ईमेल पढ़ा जाये!
**************************************
प्रिय सजीव और सुजॊय,

प्यार!
तुमने (आपने नही लिखूंगी सोरी न) कहा मैं अपनी पसंद का गाना बताऊँ तुम सुनोगे, सुनाओगे। हंसी तो नही उडाओगे न कि ये हरदम ........?????? मैंने एक बार बताया था न एक बच्चे के बारे में? नन्नू बुलाती थी मैं उसे; नन्हू से नन्नू बन गया था वो हम सबका। अपने से दूर करने के बारे में कभी सोचा भी नही था। किन्तु पिछले अठारह उन्नीस साल से डायबिटिक हूँ और उम्र के इस पडाव पर... उसे बड़ा करने और पैरों पर खड़ा होने तक कम से कम पच्चीस साल चाहिए.....इतना समय मेरे पास है? जिसे जीवन और खुशियाँ देना चाहती थी हो सकता है कल मेरे ना रहने पर उसका जीवन नर्क बन जाता.......... और इसीलिए हमे एक सख्त कदम उठाना पड़ा उसे अपने से दूर करने का। इससे पहले भी कई बच्चे मेरे जीवन में आये और अच्छे परिवारों में चले गये। घर नही आया था कोई। नन्नू चार महीने हमारे पास रहा। वो अब पलटी मारने लगा था। 'इन्हें' देखते ही पलटी मारना शुरू कर देता। 'ये' खूब हंसते -'ओ मेरा बेटा पलती माल लहा है गुड...गुड..वेरी गुड।' और वो जैसे समझने लगा था। इन्हें देखते ही इतराना चालू कर देता..............मगर उसे जाना था.....वो चला गया।

पन्द्रह दिन बाद हम उसे सँभालने उसके नए मम्मी पापा के घर गये। 'इनकी' गोदी में जाते ही नन्नू गोदी से लुढक गया और...पलटिया मारने लगा। हर पलटी के बाद इनके चेहरे की ओर देखता, इस बार वो मुस्करा नही रहा था और ना ही गोस्वामीजी बोले-'ओ मेरा बेटा पलती.....' ये बुरी तरह रोने लगे.......हम सब फूट फूट कर रोये जा रहे थे। हमने सोचा वो बहुत छोटा है, हमे क्या याद करता होगा, पर...क्या हमारे पहली बार छोड़ कर आने के बाद उसकी आँखों ने चारों ओर हमे नही ढूँढा होगा? हमे नही पा कर अंदर नही रोया होगा? क्या वो अपने दुःख को किसी को बता पाया होगा? या...कोई समझ पाया होगा? बाबू! ऐसे कई प्रश्न आज भी हमे घेरे रहते हैं....उस दिन को ले के... कृष्ण यशोदा को छोड़ कर एक बार गये। और कभी वापस नही आये। मेरे कृष्ण तो हर बार मेरी गोदी चुनते हैं और चले जाते हैं और फिर नये रूप में आ जाते हैं .... यही कारण है ये गीत मेरे दिल के इतना करीब हो गया है। इसमें मुझे मेरे नन्नू की आवाज आती है। जानती हूँ वो मुझे भूल चूका है। अब माँ नही नानी बोलता है। फोन करता है, 'नानी आओ.एपल,भुट्टा लाना'। किन्तु उस दिन को नही भूल पाती जब हम कार से गये तीन व्यक्ति थे और लौटे....दो।

इस गीत की पंक्तियाँ... 'प्यासा था बचपन, जवानी भी मेरी प्यासी, पीछे गमों की गली

आगे उदासी, मैं तन्हाई का राही, कोई अपना ना बेगाना अफ़साना, मुझे अब ना बुलाना ............. खुल कर ना रोया किसी काँधे पर झुक के'।

जितना चाहो पोस्ट कर देना बाकि को एडिट कर निकाल देना,जैसे सबने नन्नू को मेरे जीवन से निकाल दिया जबरन...पर मेरे दिल से.???? मेरे जीते जी....???...धुंधला सा भी कहीं क्यों हो उजाला! अब उन यादों से कह दो मेरी दुनिया में ना आना 'सुनो इसके एक एक शब्द। कहीं नन्नू, कहीं तुम्हारी दोस्त इंदु है इसमें।

प्यार

इंदु

*************************************************
अब इसके बाद बिना कुछ कहे, आइए सुनते हैं फ़िल्म 'दादी माँ' का इंदु जी का चुना हुआ यह गीत "जाता हूँ मैं मुझे अब ना बुलाना"। आवाज़ मोहम्मद रफ़ी साहब की, गीत मजरूह सुल्तानपुरी साहब का, और संगीतकार रोशन साहब। यह १९६६ की फ़िल्म थी। आइए गीत सुना जाये!

गीत - जाता हूँ मैं मुझे अब ना बुलाना (दादी माँ)



और इंदु जी, अभी कुछ दिन पहले आपनें अफ़सोस जताया कि दुर्गा खोटे पर फ़िल्माया 'बिदाई' के जिस भजन को हमनें चुना था, उससे बेहतर भजन उसी फ़िल्म में मौजूद थी। आप ही के शब्दों में - "आपने शायद इस फिल्म का एक बेहद मधुर, मर्मस्पर्शी भजन नही सुना, अन्यथा उसे ही सुनाते, 'मैं जा रही थी मन लेके तृष्णा, अच्छे समय पे तुम आये, तुम आये, तुम आये कृष्णा'। एक एक शब्द भीतर तक एक हलचल सी मचा देता है। आँखें स्वयम मूँद जाती है और.... जैसे वो पास आके बैठ जाता और कहता है- 'तुम्हे छोड़ कर कहाँ जाता मैं इंदु? मुझे तो आना ही था। काश उस भजन को सुनाया होता। कहीं नही अड़ता, टिकता ये भजन उसके सामने। कहना नही चाहिए था। इतने दिनों बाद आई और उलाहने देने लगी। हा हा हा, क्या करूं ? ऐसिच हूँ मैं -झगडालू।" इंदु जी, आप बिल्कुल झगड़ालू नहीं हैं, बल्कि यकीन मानिये हमें कितनी ख़ुशी होती है यह देख कर कि कितने अपनेपन से आप सब 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को सुनते हैं, पढ़ते हैं, और शिकवे शिकायतें भी तो अपनों से ही की जाती है न? तो लीजिए आज हम आपकी इस प्यारी सी शिकायत को दूर किए देते हैं, फ़िल्म 'बिदाई' के इस भजन को यहाँ पर बजाकर। वाक़ई बेहद सुंदर रचना है आशा भोसले का गाया हुआ। गीतकार आनंद बक्शी और संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल। आइए सुनें।

गीत - अच्छे समय पे तुम आये कृष्णा (बिदाई)



तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। इंदु जी की तरह आप भी अपने जीवन की एक ऐसी ही अविस्मरणीय घटना हमें इस स्तंभ के लिए लिख भेजिए oig@hindyugm.com के पते पर। अगले हफ़्ते एक ख़ास साक्षात्कार के साथ हम फिर उपस्थित होंगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में। अब मेरी और आपकी अगली मुलाक़ात होगी कल सुबह 'सुर-संगम' में। तब तक के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!

Saturday, February 5, 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - हमारी ही मुठ्ठी में आकाश सारा...फिर क्यों ये नन्हीं जानें भटकने को मजबूर हैं बेसहारा

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। इस साप्ताहिक विशेषांक को हम सजाते हैं या तो आप ही के भेजे हुए प्यारे प्यारे ईमेल से 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के रूप में, या किसी कलाकार से आपको मिलवाया जाता है, या फिर कोई विशेषालेख पेश होता है। आज बारी है 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की। आज एक ऐसा ईमेल पेश हो रहा है जिसे पढ़ कर हम सब थोड़ा सोचने पर भी मजबूर हो जाएँगे, थोड़ी सी उदासी भी छायेगी, और थोड़ा सा आशावादी स्वर भी गूंजेगा। लीजिए पहले ईमेल पढ़िए जिसे लिख भेजा है मेरे प्रिय दोस्त सुमित चक्रवर्ती ने चण्डीगढ़ से। यह उनका भेजा हुआ दूसरा ईमेल है जिसे हम शामिल कर रहे हैं।

*******************************************

प्रिय सुजॊय दा

'ई-मेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में मेरे पिछ्ले ई-मेल को शामिल करने का शुक्रिया। आज मैं आपको अपने एक अनोखे अनुभव के बारे में बताने जा रहा हूँ।

किसी ने सच ही कहा है कि बच्चे ईश्वर का रूप होते हैं| एक नन्हे सदस्य के आते ही पूरे घर का माहौल बदल जाता है| उनकी नन्ही-नन्ही किलकारियाँ और नटखट अटखेलियाँ घर-आँगन में गूंजने लगती हैं| वह घर के सभी सदस्यों की आँखों का तारा बन जाता है| बच्चे के अभिभावक तभी से उसके भविष्य के लिए सोचने में जुट जाते हैं| उसे पौष्टिक आहार दिया जाता है, अच्छी शिक्षा दी जाती है ताकि वह बड़ा होने पर अपने पैरों पर खड़ा हो सके और एक ज़िम्मेदार नागरिक बनकर अपने माता-पिता का नाम रौशन करे| हमारे समाज तथा गृह-व्यवस्था की ये छवि कितनी सुखद लगती है| परंतु इसके ठीक विपरीत हमारे समाज की एक सच्चाई ऐसी भी ही है जो हमें सोचने पर विवश कर देता है| मैं उस स्थिति की बात कर रहा हूँ जिसमे एक नन्ही सी जान को पैदा होते ही ठुकरा दिया जाता है केवल इसलिए की उसने एक कन्या के रूप में जन्म लिया, या फिर वह स्थिति जिसमें बच्चों को पूर्ण पोषण नहीं मिलता, भूख व गरिबी के कारण उन्हें बाल-मज़दूरी की ओर धकेल दिया जाता है - उनका शोषण किया जाता है|

आप भी सोच रहे होंगे की मैं अचानक इतनी गहरी व मर्मशील बातें क्यूँ कर रहा हूँ? ऐसा इसलिए कि हाल ही में मैं कुछ ऐसे ही बच्चों से रू-ब-रू हुआ जिन्हें हमारे समाज ने नहीं अपनाया| ये मौका मुझे मिला जब मैं अपने कुछ दोस्तों तथा सहकर्मियों के साथ मदर टेरेसा द्वारा स्थापित संस्था "मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी" गया| चंडीगढ़ में कुछ एन.जी.ओ'ज़ से ज़ुड़े होने के कारण हम कई ऐसी संस्थाओं में जाते रहते हैं| वहाँ बुज़ुर्गों से बातें करते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं और कई बार संगीत व नृत्य का रंगारंग कार्यक्रम आयोजित करते हैं| पिछली बार 'मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी' का अनुभव बेहद अनूठा रहा| अब इसे संयोग ही कहिए की जिस दिन हम वहाँ गये, उस दिन महान गायक मन्ना डे साहब का जन्मदिन था, यानि १ मई| अब मज़े की बात ये थी कि मिशनरीज़ के बच्चों ने भी उस दिन एक संगीत का कार्यक्रम मन्ना दा के सम्मान में प्रस्तुत किया| उनकी जो प्रस्तुति मुझे सबसे अधिक छू गयी वह थी तीन नेत्रहीन बालिकाओं द्वारा गाया वह गीत जिसे फिल्म "प्रहार" में मन्ना दा और कुछ बच्चों ने गाया था| गीत है - "हमारी ही मुठ्ठी में आकाश सारा, जब भी खुलेगी चमकेगा तारा"। सच मानिये उनके इस गीत को सुनकर हम अपने आँसू रोक न सके। उन बच्चों के साथ समय बिता कर जो संतुष्टि हमारे मन को मिली उसे शब्दों में व्यक्त करना शायद मुश्किल होगा। ये बच्चे भी अपने पांव पर खड़ा होना चाहते हैं और उन्हें पूरा हक़ भी है। ज़रूरत है उन्हें तो सिर्फ़ हमारे सहयोग की, थोड़े प्यार की, जिससे वे वंचित रह गये। आशा करता हूं कि हिन्द-युग्म जैसे प्रबल मंच द्वारा मेरा यह लेख शायद जागृति का दिया जला सके ताकि ये बच्चे भी हमारे देश का नाम रौशन करें।

धन्यवाद।
आपक प्रिय अनुज

सुमित

************************************************
सचमुच आँखें नम हो गईं। हम अक्सर अनाथ बच्चों के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करते हैं, लेकिन बहुत से बच्चे ऐसे भी हैं जो माता पिता के होते हुए भी अनाथ होने के बराबर हैं। इससे शर्मनाक और दुखदायी बात और क्या हो सकती है। इस मंच के सभी पाठकों से बस यही निवेदन कर सकते हैं कि "आइए हाथ बढ़ाएँ हम भी!!!"

मन्ना डे और बच्चों द्वारा गाये फ़िल्म 'प्रहार' के इस आशावादी रचना को सुनते हैं, जिसे लिखा है मंगेश कुल्कर्णी नें और संगीत है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का। वैसे तो यह एक प्रार्थना के रूप में गाया गया है, लेकिन पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष, केवल आशावादी।

गीत - हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा (प्रहार - मन्ना डे, साथी)


इन्हीं आवाज़ों में सुनते हैं इस गीत का सैड वर्ज़न भी।

गीत - हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा - सैड (प्रहार - मन्ना डे, साथी)


इस गीत को कविता कृष्णमूर्ती और बच्चों ने भी गाया था जिसे बहुत ज़्यादा नहीं सुना गया। आज जब कि हम ख़ास इस गीत की चर्चा कर रहे हैं, तो आइए कविता जी की आवाज़ में भी इस गीत का आनंद लें।

गीत - हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा (प्रहार - कविता कृष्णमूर्ती, साथी)


और अब इस गीत की धुन भी सुनिए माउथ ऒर्गैन पर बजाया हुआ।

गीत - हमारी ही मुट्ठी में आकाश सारा (प्रहार - इन्स्ट्रुमेण्टल)


तो ये था इस सप्ताह का 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष'। आशा है आपको अच्छा लगा होगा। सुमित की तरह आप भी अपने जीवन के यादगार लम्हों को हमारे साथ बाँट सकते हैं हमें oig@hindyugm.com के पते पर ईमेल भेज कर। किसी यादगार घटना या संस्मरण को हमारे साथ बाँटिए 'आवाज़' के उस स्तंभ के ज़रिए जिसका नाम है 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। आज बस इतना ही, फिर मुलाक़ात होगी कल सुबह 'सुर संगम' में। नमस्कार, शुभ रात्री।

Saturday, January 15, 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२५), आईये आपका परिचय कराएँ सुजॉय के एक खास मित्र से

'ओल्ड इस गोल्ड' के सभी दोस्तों को हमारा नमस्कार! इस शनिवार विशेष प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है| जिस तरह से 'ओल्ड इज गोल्ड' का नियमित स्तम्भ ५६० अंक पूरे कर चूका है, वैसे ही यह शनिवार विशेष भी आज पूरा कर रहा है अपना २५-वां सप्ताह| शनिवार की इस ख़ास प्रस्तुति में आपने ज़्यादातर 'ईमेल के बहाने यादों के खजाने' पढ़े और इस और आप सब का भरपूर सहयोग हमें मिला जिस वजह से हम इस साप्ताहिक पेशकश की आज 'रजत जयंती अंक' प्रस्तुत कर पा रहे हैं| आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद, और उन दोस्तों से, जो हमारी इस महफ़िल में शामिल तो होते हैं, लेकिन हमें इमेल नहीं भेजते, उनसे ख़ास गुजारिश है की वो अपने जीवन की खट्टी मीठी यादों को संजो कर हमें ईमेल करें जिन्हें हम पूरी दुनिया के साथ बाँट सके|

दोस्तों, आज मैं जिस ईमेल को यहाँ शामिल कर रहा हूँ, उसके लिखने वाले के लिए मुझे किसी औपचारिक भाषा के प्रयोग करने की कोई ज़रुरत नहीं है, क्योंकि वह शख्स मेरा बहुत अच्छा दोस्त भी है और मेरा छोटा भाई भी, जिसे कहते हैं 'फ्रेंड फिलोसोफर एंड गाइड'| आईये आज मेरे इस दोस्त सुमित चक्रवर्ती का ईमेल पढ़ा जाए|

************************************************************

प्रिय सुजोय दा

आपको आपके अनुज का स्नेह भरा प्रणाम|

सर्वप्रथम मैं आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ५५० अंक पूरे होने पर हार्दिक बधाई देना चाहूँगा| मैं आपके द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले 'ई-मेल के बहाने यादों के तराने' का बहुत बड़ा फ़ैन हो गया हूँ तथा इसे नियमित रूप से पढ़ता हूँ| मधुर गीतों से जुड़ी लोगों की यादों और भावनाओं को जानकार बहुत ही आनंद मिलता है| इसी तरह मैने भी सोचा कि क्यों न मैं भी अपने बचपन की एक ऐसी ही याद को न केवल आपके, अपितु यदि हो सके तो आवाज़ के अन्य पाठकों के समक्ष रखूं| मैं भली-भाँति जानता हूँ कि आपको लगातार पाठकों के ई-मेल मिलते होंगे, मुझे आपको यह लिखते हुए बहुत ही संकोच हो रहा है परंतु यदि आप उचित समझें तो इसे 'ई-मेल के बहाने यादों के तराने' शृंखला में पेश कर दीजिएगा| यदि न हो सके तो भी मुझे कोई अफ़सोस न होगा, और न ही मेरा स्नेह कभी आपके लिए कम होगा|

हाल ही में मैं फ़िल्म 'वीर-ज़ारा' के संगीत रचना का वीडियो देख रहा था| हम सब जानते हैं कि इस फ़िल्म में स्वर्गीय मदन मोहन जी द्वारा कृत संगीत का प्रयोग किया गया है, ऐसा संगीत जिसने इस फ़िल्म को सिनेमा जगत में एक मील का पत्थर साबित कर दिया| इसी वीडियो में दो ऐसी शख्सियतों का साक्षात्कार भी पाया जिन्होंने इसमे "आया तेरे दर पर दीवाना" क़व्वाली गाई है, वे हैं - उस्ताद अहमद हुसैन तथा उस्ताद मोहम्मद हुसैन| वे बता रहे थे की किस तरह वे स्वयं को भाग्यशाली समझते हैं जो उन्हें स्वर्गीय मदन मोहन साहब की तरन्नुम पर गाने का सौभाग्य मिला| हुसैन भाईयों को पर्दे पर देख मुझे अपने बचपन का एक वाक़िया याद आ गया| बात तब की है जब मैं नौवीं कक्षा में पढ़ता था| संगीत में अत्याधिक रूचि होने के कारण मैं अक्सर स्कूल तथा चंडीगढ़ ऐडमिनिस्ट्रेशन द्वारा आयोजित कई गायन प्रतियोगिताओं में भाग लेता था| ऐसी ही एक प्रतियोगिता में उस्ताद एहमद हुसैन तथा उस्ताद मोहम्मद हुसैन निर्णायक बनकर आए थे| मैने प्रतियोगिता में लता दीदी तथा भूपेंद्र जी का गाया हुआ, फ़िल्म 'सितारा' का गीत "थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा आसमाँ" गाया था| पहली बार इतने विशिष्ट ग़ज़ल गायकों के समक्ष गाने के कारण मैं काफ़ी नर्वस भी हुआ| परंतु मेरे होंश तब उड़ गये जब उन दोनो ने मंच पे आकर अपना निर्णय सुनाया| उस प्रतियोगिता में मैं सिल्वर सर्टिफिकेट पाकर दूसरे स्थान पर रहा| मेरी तो जैसे ख़ुशी की सीमा ही न रही| मेरे बचपन की यह घटना मेरे हृदय के बेहद क़रीब है| आपसे निवेदन है कि आप इन दोनो गीतों को अपनी अगली प्रस्तुति में सुनायें|

आपसे सदैव स्नेह करने वाला, आपका अनुज,

सुमित

*********************************

सुमित, तुमसे और क्या कहूं, तुम्हे मेरी तरफ से और पूरे 'हिंद युग्म' की तरफ से एक उज्वल भविष्य की शुभकामना ही दे सकता हूँ| और ये रहे तुम्हारी पसंद के ये दो गीत, पहला गीत है फिल्म 'सितारा' का, और दूसरा फिल्म 'वीर जारा' की कव्वाली. सुनो और हमेशा खुश रहो|

गीत - थोड़ी सी ज़मीन (सितारा)


गीत - आया तेरे दर पे दीवाना (वीर जारा)


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के खजाने' जो आज रोशन हुआ सुमित चक्रवर्ती के बचपन की एक ख़ास याद के उजाले से| अगले हफ्ते फिर हाज़िर होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, और कल सुबह 'सुर संगम' में ज़रूर पधारिएगा, नमस्कार!

Saturday, January 8, 2011

ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने....मिलिए महेंद्र कपूर के बेटे रोहन कपूर से सुजॉय से साथ

महेन्द्र कपूर के बेटे रोहन कपूर से सुजॊय की बातचीत

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार और स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। युं तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' रविवार से लेकर गुरुवार तक प्रस्तुत होता रहता है, लेकिन शनिवार के इस ख़ास पेशकश में कुछ अलग हट के हम करने की कोशिश करते हैं। इस राह में और हमारे इस प्रयास में आप पाठकों का भी हमें भरपूर सहयोग मिलता रहता है और हम भी अपनी तरफ़ से कोशिश में लगे रहते हैं कि कलाकारों से बातचीत कर उसे आप तक पहूँचाएँ। दोस्तों, आज ८ जनवरी है, और कल, यानी ९ जनवरी को जयंती है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर जी का। उनकी याद में और उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप हमने आमंत्रित किया उन्हीं के सुपुत्र रोहन कपूर को अपने पिता के बारे में हमें बताने के लिए। ज़रिया वही था, जी हाँ, ईमेल। तो लीजिए ईमेल के बहाने आज अपने पिता महेन्द्र कपूर की यादों से रोशन हो रहा है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह महफ़िल।

*******************************************
सुजॊय - रोहन जी, जब हर साल २६ जनवरी और १५ अगस्त के दिन पूरा राष्ट्र "मेरे देश की धरती" और "है प्रीत जहाँ की रीत सदा" जैसे गीतों पर डोलती है, और आप ख़ुद भी इन गीतों को इन राष्ट्रीय पर्वों पर अपने आसपास के हर जगह से सुनते हैं, तो किस तरह के भाव, कैसे विचार आपके मन में उत्पन्न होते हैं?

रोहन - उनकी आवाज़ को सुनना तो हमेशा ही एक थ्रिलिंग् एक्स्पीरिएन्स रहता है, लेकिन ये दो दिन मेरे लिये बचपन से ही बहुत ख़ास दिन रहे हैं। उनकी जोशिली और बुलंद आवाज़ उनकी मात्रभूमि के लिये उनके दिल में अगाध प्रेम और देशभक्ति की भावनाओं को उजागर करते हैं। और उनकी इसी खासियत ने उन्हें 'वॊयस ऒफ़ इण्डिया' का ख़िताब दिलवाया था। वो एक सच्चे देशभक्त थे और मुझे नहीं लगता कि उनमें जितनी देशभक्ति की भावना थी, वो किसी और लीडर में होगी।

सुजॊय - महेन्द्र कपूर जी एक बहुत ही मृदु भाषी और मितभाषी व्यक्ति थे, बिल्कुल अपने गुरु रफ़ी साहब की तरह। आप ने एक पिता के रूप में उन्हें कैसा पाया? किस तरह के सम्बन्ध थे आप दोनों में? मित्र जैसी या थोड़ी औपचारिक्ता भी थी उस रिश्ते में?

रोहन - 'He was a human par excellence'। अगर मैं यह कहूँ कि वो मेरे सब से निकट के दोस्त थे तो ग़लत ना होगा। I was more a friend to him than anybody on planet earth। हम दुनिया भर में साथ साथ शोज़ करने जाया करते थे और मेरे ख़याल से हमने एक साथ हज़ारों की संख्या में शोज़ किये होंगे। वो बहुत ही मिलनसार और इमानदार इंसान थे, जिनकी झलक उनके सभी रिश्तों में साफ़ मिलती थी।

सुजॊय - क्या कभी उन्होंने आपके बचपन में आपको डाँटा हो या मारा हो जैसे बच्चों को उनके माता-पिता कभी कभार मार भी देते हैं? या कोई ऐसी घटना कि जब उन्होंने आपकी बहुत सराहना की हो?

रोहन - सराहना भी बहुत की और उतनी ही संख्या है उनकी नाराज़गी की। वो ख़ुद भी बहुत अनुशासित थे और हम सब से भी हमारी आदतों और पढ़ाई में उसी अनुशासन की उम्मीद रखते थे। लेकिन इसके बाहर वो बहुत ही मज़ाकिया और हँसमुख और मिलनसार इंसान थे। वो कभी शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते थे डाँटने के लिए, उनका चेहरा ही काफ़ी होता था मुझे और मेरी बहनों को सतर्क करने के लिए।

सुजॊय - जब आप छोटे थे, या जब बड़े हो रहे थे, क्या वो चाहते थे कि आप भी उनकी तरह एक गायक बनें?

रोहन - Probably in my sub conscience …yes, but never dared to tell him that I wanted to। बल्कि जब मैं नौ साल का था, तब उन्होंने ही मुझे गाने के लिए प्रोत्साहित किया और मैं उनके साथ साउथ अफ़्रीका में स्टेज पर गाने लगा।

सुजॊय - आप अपने पिता पर गर्व करते होंगे, और गर्व होनी ही चाहिए। लेकिन क्या आपको वाकई लगता है कि इस इण्ड्रस्ट्री ने उन्हें वो सब कुछ दिया है जिसके वो सही मायनो में हकदार थे?

रोहन - वो हमेशा यही मानते थे कि किसी को जीवन में जो कुछ भी मिलना है, वो सब उपरवाला निर्धारित करता है, और हम कोई नहीं होते उसकी इच्छा को चैलेंज करने वाले। इसलिए यह सवाल ही अर्थहीन है कि वो क्या चाहते थे या उन्हे क्या मिला या नहीं मिला।

सुजॊय - महेन्द्र कपूर जी से जुड़ी कोई ख़ास घटना याद आती है आपको जो आप हमारे पाठकों के साथ बाँटना चाहें?

रोहन - मैं हमेशा उनके साथ उनकी रेकॊर्डिंग्स पर जाया करता था बचपन से ही। ऐसी ही एक रेकॊर्डिंग् की बात बताता हूँ। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए रेकॊर्डिंग् थी, फ़िल्म 'क्रान्ति' का गीत "दुर्गा है मेरी माँ, अम्बे है मेरी माँ"। महबूब स्टुडिओज़ में रेकॊर्डिंग् हो रही थी। यह एक मुश्किल गाना था जिसे बहुत ऊँचे पट्टे पर गाना था और ऒर्केस्ट्रा भी काफ़ी भारी भरकम था। जब रेकॊर्डिंग् OK हो गई, और वो बाहर निकले तो लक्ष्मी-प्यारे जी और मनोज कुमार जी, सबके मुख से उनके लिए तारीफ़ों के पुल बांधे नहीं बंध रहे थे। वो लगातार उनकी तारीफ़ें करते गये और पिता जी एम्बैरेस होते रहे। जैसे ही हम कार में बैठे वापस घर जाने के लिए, वो कार को सीधे हनुमान जी के मंदिर में लेके गये और ईश्वर को धन्यवाद दिया। वो हमेशा कहा करते थे कि यह ईश्वर की शक्ति या कृपा ही है जो हमें हमारे काम को अच्छा बनाने में मदद करता है। It’s the Devine Grace which gives you excellence in your work।

सुजॊय - रोहन जी, बस आख़िरी सवाल। वह कौन सा एक गीत है महेन्द्र कपूर जी का गाया हुआ जो आपको सब से ज़्यादा पसंद है? या जिसे आप सब से ज़्यादा गुनगुनाया करते हैं?

रोहन - किसी एक गीत का नाम लेना तो असम्भव है, लेकिन हाँ, कुछ गीत जो मुझे बेहद पसंद है, उनके नाम गिनाता हूँ। "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों", "अंधेरे में जो बैठे हैं, नज़र उन पर भी कुछ डालो, अरे ओ रोशनी वालों", लता जी के साथ उनका गाया "आकाश पे दो तारे", आशा जी के साथ "रफ़्ता रफ़्ता आप मेरे दिल के महमाँ हो गये", और "यकीनन "मेरे देश की धरती"।

सुजॊय - वाह, एक से एक लाजवाब गीत हैं ये सब! चलिए हम यहाँ पर "अंधेरे में जो बैठे हैं" गीत सुनवाते हैं अपने श्रोताओं व पाठकों को। यह फ़िल्म 'संबंध' का गीत है। १९६९ की यह फ़िल्म थी जिसमें संगीत था ओ. पी. नय्यर का, और इस गीत को लिखा है कवि प्?दीप ने।

गीत - "अंधेरे में जो बैठे हैं" (संबंध)


सुजॊय - रोहन जी, बहुत अच्छा लगा, आपने अपने पिता और महान गायक महेन्द्र कपूर जी की शख़्सीयत के बारे में हमें बताया, बहुत बहुत धन्यवाद आपका। फिर किसी दिन आपसे और भी बातें हम करना चाहेंगे। मैं अपनी तरफ़ से, 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से, और हमारे तमाम पाठकों व श्रोताओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूँ, नमस्कार!

रोहन - बहुत बहुत शुक्रिया आपका।
******************************************

तो दोस्तों, ये था इस सप्ताह का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', कल महेन्द्र कपूर जी के जन्मदिवस पर हम 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। और अब आज के इस प्रस्तुति को समाप्त करने की इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

सुजॉय चट्टर्जी

Saturday, January 1, 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (23), फिर एक बार साल की शुरूआत हो रही है मन्ना दा की स्वर साधना से

नमस्कार! पूरे 'आवाज़' और 'हिंद-युग्म' परिवार की तरफ़ से आप सभी को नववर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। २०११ का यह नया साल आप सब के जीवन में ढेरों ख़ुशियाँ व सफलताएँ लेकर आए, यह हमारी शुभेच्छा है आप सब के लिए। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शनिवार की विशेष प्रस्तुति 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में आप सभी का स्वागत है। इस साप्ताहिक स्तंभ के ज़रिए आप अपनी खट्टी मीठी यादों को पूरी दुनिया के साथ बाँट सकते हैं, या फिर कोई ख़ास गीत अगर आप सुनवाना चाहें, या 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए अपनी राय और सुझाव भेजना चाहें, उनकी भी व्यवस्था है इस साप्ताहिक पेशकश में। किसी दायरे में हमने इस विशेषांक को नहीं बांधा है, इसलिए आप अपने तरीके से कुछ भी इसमें भेज सकते हैं जो आपको लगे कि सब से साथ बांटा जा सकता है। आज हम हमारे जिन दोस्त का ईमेल शामिल कर रहे हैं, वो हैं कृष्णमोहन मिश्र, जिनके मनपसंद गायक हैं मन्ना डे। तो चलिए आज का यह अंक कृष्णमोहन जी और मन्ना दा के नाम करते हैं।

******************************

प्रिय सजीव सारथी एवं सुजॉय चटर्जी,

आप दोनों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ; इसलिए कि आप फिल्म संगीत के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह शृंखला भावी शोधार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, नई पीढ़ी के लिए धरोहर भी है।

मैं, कृष्णमोहन मिश्र, लखनऊ-वासी, ६३ वर्षीय संगीत-प्रेमी हूँ। विगत ३८ वर्षों से संगीत की मंच-प्रस्तुतियों की समीक्षा-कार्य करता रहा हूँ। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का अभी कुछ मास पूर्व ही सदस्य बना हूँ। 'फ्लेशबैक एपिसोड' (सफ़र अब तक) पढ़ने के बाद लगा कि आपने फिल्म-संगीत के खजाने को टटोलने का प्रयास किया तो है, किन्तु अभी बहुतेरे कोण टटोलने शेष हैं।

फिल्म एवं सुगम संगीत क्षेत्र में आदरणीय मन्ना डे का योगदान अविस्मरणीय है। एक शृंखला तो उनके जन्मदिवस या किसी अन्य अवसर पर प्रस्तुत की जा सकती है। मैं इस हेतु आपका सहयोग कर सकता हूँ। मैंने शास्त्रीय तथा उपशास्त्रीय रागों पर आधारित पुराने फिल्मी गीतों को सूचीबद्ध किया है। आपने राग आधारित १० गीतों की शृंखला प्रस्तुत किया ही है, मेरी इस सूची से कुछ और श्रृंखलाएँ भी बन सकती हैं। कृपया इस दिशा में मेरा मार्गदर्शन कर मेरे अल्पज्ञान का उपयोग करें।

कृष्णमोहन मिश्र

************************************************

कृष्णमोहन जी, सब से पहले तो बहुत बहुत धन्यवाद आपके इस ईमेल के लिए। बहुत अच्छा लगा आपके बारे में जानकर। आपने जिन शब्दों में 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तारीफ़ की है, हमारा हौसला बढ़ाया है, उसके लिए हम आपके आभारी हैं। इसमें कोई शक़ या दोराय नहीं कि मन्ना डे का संगीत जगत में अद्वितीय योगदान रहा है। वो एक सुर-गंधर्व हैं जिन्होंने फ़िल्म संगीत को शास्त्रीयता से समृद्ध करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। १ मई को मन्ना दा का जन्मदिवस है, उस समय हम उन पर १० अंकों की एक लघु शृंखला अवश्य प्रस्तुत करेंगे, ऐसा हम आपसे वादा करते हैं। आप ने शास्त्रीय रागों को सूचीबद्ध करने की जो बात लिखी है, आप बेशक़ हमें इसे भेज सकते हैं हमारे oig@hindyugm.com के पते पर। वैसे आपको यह बता दें कि कल, यानी २ जनवरी से हर रविवार सुबह हम शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक नया स्तंभ शुरु कर रहे हैं, जिसमें भी आपके इस सूची में से गानें चुनने की गुंजाइश रहेगी। ज़रूर भेजिएगा अपनी सूची।

आइए अब आज के गीत पर आते हैं। क्योंकि ज़िक्र मन्ना डे का आया है इस अंक में, तो क्यों ना उनका गाया एक दुर्लभ गीत सुना जाए। दुर्लभ इसलिए कहा क्योंकि इस गीत में मन्ना दा के साथ और भी दो गायकों की आवाज़ें शामिल हैं - किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी। १९८१ में किशोर कुमार की एक फ़िल्म आयी थी 'चलती का नाम ज़िंदगी' जिसमें उन्होंने अभिनय और गायन तो किया ही था, फ़िल्म को निर्देशित भी किया था। अशोक कुमार, अनूप कुमार और अमित कुमार ने भी अभिनय किया था इस फ़िल्म में। इस फ़िल्म में किशोर दा ने एक ऐसा गीत बनाया जिसे उन्होंने मन्ना दा और रफ़ी साहब के साथ मिलकर गाया, जिसके बोल थे "बंद मुट्ठी लाख की"। आपको शायद याद हो 'चलती का नाम गाड़ी' में "बाबू समझो इशारे" गीत में "बंद मुट्ठी लाख की" का इस्तेमाल हुआ था। शायद वहीं से आज के इस प्रस्तुत गीत का आइडिया आया होगा। और दोस्तों, इत्तेफ़ाक़ देखिए, पिछले साल, इसी दिन, यानी १ जनवरी २०१० को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर मन्ना डे साहब का ही गाया गीत बजा था फ़िल्म 'जुर्माना' का - "ए सखी राधिके बावरी हो गई"। याद है न? और इस साल के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शुरुआत भी इस सुर-गंधर्व की आवाज़ के साथ हो रही है। एक नहीं, बल्कि तीन तीन सुरसाधकों की आवाज़ों से। तो लीजिए नये साल के जश्न को और भी शानदार और जानदार बनाते हुए सुनते हैं मन्ना डे, किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी का गाया 'चलती का नाम ज़िंदगी' फ़िल्म का यह गीत।



सुजॉय चट्टर्जी

Saturday, December 25, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२२), सभी श्रोताओं को क्रिसमस की शुभकामनाएँ

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शनिवार विशेष की २२ वीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। आप सभी को क्रिस्मस की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। इस साप्ताहिक विशेषांक में अधिकतर समय हमने 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया, जिसमें आप ही के भेजे हुए ईमेल शामिल हुए और कई बार हमने नामचीन फ़नकारों से संपर्क स्थापित कर फ़िल्म संगीत के किसी ना किसी पहलु का ज़िक्र किया। आज हम आ पहुँचे हैं इस साप्ताहिक शृंखला की २०१० वर्ष की अंतिम कड़ी पर। तो आज हम अपने जिस दोस्त के ईमेल से इस शृंखला में शामिल कर रहे हैं, वो हैं ख़ानसाब ख़ान। हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तारीफ़ की है और हमारा हौसला अफ़ज़ाई की है। लीजिए ख़ानसाब का ईमेल पढ़िए...

******************************

आदाब,

नौ रसों की 'रस माधुरी' शृंखला बहुत पसंद आई। आपने केवल इन रसों का बखान फ़िल्मी गीतों के लिए ही नहीं किया, बल्कि हमारी ज़िंदगी से जोड़ कर भी आप ने इनको पूरे विस्तार से बताया, जिससे हमें हमारी ज़िंदगी से जुड़े पहलुओं को भी जानने को मिला। और हमें ज्ञात हुआ कि हमारे मन की इन मुद्राओं को भी फ़िल्मी गीतों में किस तरह से अभिव्यक्ति मिली है। आपके इन अथक प्रयासों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। और आपकी बात बिल्कुल सही है। मैं भी यह सोच रहा था कि "फिर छिड़ी रात बात फूलों की" ग़ज़ल और "फूल आहिस्ता फेंको" गीत के बोलों में, बड़े ही सुंदर तरीक़े से "फूल" शब्द का इस्तेमाल किया गया, जिसको सुनकर दिलों में भी फूलों की तरह नर्मोनाज़ुक अहसास पैदा हो जाते हैं। इससे ज़्यादा और किसी गीत की कामयाबी क्या होगी!

'ओल्ड इज़ गोल्ड - सफ़र अब तक' पढ़कर मज़ा आ गया। और हमारे जो साथी बाद में जुड़े थे, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, सब को मालूम हो गया कि पिछे का भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का सफ़र कितना शानदार रहा है। मैं एक दिन ऐसा सोच ही रहा था कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का पिछला सफ़र कैसा रहा होगा, इसमें किस तरह के और कौन कौन से गीत बजे होंगे, और आपने शायद मेरे मन की आवाज़ को सुन ली। क्योंकि हमारे इस महफ़िल का नाम भी तो आवाज़ ही है, जो कि पीछे की, आगे की, अभी की सारी आवाज़ों को अपने में शामिल किए हुए है। इसके लिए मैं आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। इसकी वजह से हम भी अब आवाज़ की इस महफ़िल से किसी भी तरह से अंजान नहीं रहे हैं।

धन्यवाद।

************************************************
वाह ख़ानसाब, और आपका बहुत बहुत शुक्रिया भी। आइए आज एक ऐसा गीत सुनते हैं जो आज के दिन के लिए बहुत ही सटीक है। आज क्रिसमस है और इस अवसर पर बनने वाले फ़िल्मी गीतों की बात करें तो सबसे पहले जिस गीत की याद आती है वह है फ़िल्म 'ज़ख़्मी' का "जिंगल बेल जिंगल बेल.... आओ तुम्हे चाँद पे ले जाएँ"। गौहर कानपुरी का लिखा और बप्पी लाहिड़ी का संगीतबद्ध किया हुआ यह गीत है जिसे लता मंगेशकर और सुषमा श्रेष्ठ ने गाया है। गीत फ़िल्माया गया है आशा पारेख और बेबी पिंकी पर। कहानी के सिचुएशन के मुताबिक़ गीत का फ़िल्मांकन दर्दीला है। गीत "जिंगल बेल्स" से शुरु होकर मुखड़ा "आओ तुम्हे चांद पे ले जाएँ, प्यार भरे सपने सजाएँ" पे ख़त्म होता है। अंतरों में भी एक सपनों की सुखद दुनिया का चित्रण है। गीत के फ़िल्मांकन से अगर बोलों की तुलना की जाये तो एक तरह से विरोधाभास ही झलकता है। राजा ठाकुर निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त, आशा पारेख, राकेश रोशन और रीना रॊय। तो आइए सुनते हैं यह गीत और आप सभी को एक बार फिर से किरस्मस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

गीत - जिंगल बेल्स... आओ तुम्हे चाँद पे (ज़ख़्मी)


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी के साथ आपसे कल फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Saturday, December 18, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२१), जब नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया पार्श्वगायिका शारदा ने

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। आज फिर एक बार बारी 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की। और आज का ईमेल भी बहुत ही ख़ास है। दोस्तों, २३ दिसम्बर २००० को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ इस दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ कर अपनी अनंत यात्रा पर निकल गईं और पीछे छोड़ गईं अपने गाये गीतों के अनमोल ख़ज़ाने को। आज पूरी दुनिया में नूरजहाँ जी के असंख्य चाहनेवाले हैं। और उनके इन तमाम चाहनेवालों में से एक उल्लेखनीय नाम पार्श्वगायिका शारदा का भी है। जी हाँ, वो ही शारदा जिन्होंने "तितली उड़ी", "दुनिया की सैर कर लो", "चले जाना ज़रा ठहरो", "वो परी कहाँ से लाऊँ", "जानेचमन शोला बदन", "जब भी ये दिल उदास होता है", "देखो मेरा दिल मचल गया" और ऐसे ही बहुत से कामयाब गीतों को गाकर ६० के दशक में फ़िल्म संगीत जगत पर छा गईं थीं। हमें जब उनकी किसी इंटरव्यु से पता चला कि उनकी मनपसंद गायिका नूरजहाँ रहीं हैं, हमने सोचा कि क्यों ना उनसे ईमेल के ज़रिए सम्पर्क स्थापित कर इस बारे में पूछा जाए। तो लीजिए आज 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में पढ़िए शारदा जी द्वारा नूरजहाँ जी के बारे में कही हुई बातें। २३ दिसंबर को नूरजहाँ जी की पुण्यतिथि पर यह 'आवाज़' मंच की श्रद्धांजली है।

सुजॊय - शारदा जी, आशा है आप सकुशल हैं। २३ दिसंबर को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की बरसी है। हम 'हिंद-युग्म' के 'आवाज़' मंच की तरफ़ से उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करने की कामना रखते हैं। हमें पता चला है कि नूरजहाँ जी आपकी मनपसंद गायिका रही हैं। इसलिए हम आपसे इस बारे में जानना चाहेंगे। आप हमें और हमारे पाठकों को बताएँ कि आपके दिल में उनके लिए किस तरह के विचार हैं, उनकी गायकी में क्या ख़ास बात आपको नज़र आती है जो उन्हें औरों से अलग करती है?

शारदा - नूरजहाँ जी को मैं एक बेहतरीन गायिका के रूप में याद करती हूँ। मैंने अपने जीवन में जो पहला हिंदी गीत सुना था, वह नूरजहाँ जी का ही गाया हुआ था और उस सुहाने याद को मैं अब तक महसूस करती हूँ और बार बार जीती हूँ। उसके बाद हर बार जब भी मैं उनके गाये हुए गीत सुनती हूँ, मैं यही पता लगाने की कोशिश करती हूँ कि बोल, संगीत और आवाज़ के अलावा वह कौन सी "एक्स्ट्रा" चीज़ वो गाने में डालती हैं कि जिससे उनका गाया हर गीत एक अद्‍भुत अनुभव बन कर रह जाता है, जो दिल को इतना छू जाता है। मेरी ओर से नूरजहाँ जी को भावभीनी श्रद्धांजली।

सुजॊय - उनके कौन से गानें आपको सब से ज़्यादा पसंद हैं?

शारदा - नूरजहाँ और रफ़ी साहब की, वह "यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है" सुनने के लिए मरती थी, क्योंकि वहाँ ना रेडियो था, ना कुछ था सुनने के लिए, और हमारे गली के पीछे चाय की दुकान थी। तो उधर बजाते थे। एक दिन मैं खाना खा रही थी, तो खाना छोड़ कर उपर टेरेस पर भागी सुनने के लिए, और पूरा सुन कर ही नीचे आयी। माँ ने कहा कि क्या हो गया तुमको? मैं खाने के जूठे हाथ से ही खड़ी रही और पूरा सुनकर ही वापस आयी। नूरजहाँ जी से कभी मुलाक़ात नहीं हो पायी। फिर एक और गाना है "आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे"। रेडियो पर जब गाना आता था तो भाग भाग कर लिखती थी, समझ में भी नहीं आता था तब, हिंदी भी बोलना नहीं आता था।

तो दोस्तों, शारदा जी के बताये इन दो गीतों में से दूसरा जो गीत है, "आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे", आइए आज इस गीत के ज़रिए नूरजहाँ जी को हम अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करें। फ़िल्म 'अनमोल घड़ी', संगीत नौशाद साहब का, और गीतकार हैं तनवीर नक़वी।

गीत - आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे (अनमोल घड़ी)


तो ये था इस सप्ताह का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', जो रोशन हो रही थी पार्श्वगायिका शारदा के यादों के उजालों से। २३ दिसंबर को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर यह अंक उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप प्रस्तुत किया गया। अब आज बस इतना ही, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित अंक के साथ हम पुन: उपस्थित होंगे, इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Saturday, December 11, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२०) - जब के सुजॉय से सवालों का जवाब दिया महान लता जी ने

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का यह साताफिक स्तंभ पूरा कर रहा है अपना बीसवाँ हफ़्ता। इसी ख़ुशी में आज कुछ बेहद बेहद ख़ास पेश हो रहा है आपकी ख़िदमत में। दोस्तों, आपको मैं बता नहीं सकता कि आज का यह अंक प्रस्तुत करते हुए मैं किस रोमांच से गुज़र रहा हूँ। वो एक आवाज़, जो पिछले ६० सालों से दुनिया की फ़िज़ाओं में अमृत घोल रही है, जिसे इस सदी की आवाज़ होने का गौरव प्राप्त है, जिस आवाज़ में स्वयं माँ सरस्वती निवास करती है, जो आवाज़ इस देश की सुरीली धड़कन है, उस कोकिल-कंठी, स्वर साम्राज्ञी, भारत रत्न, लता मंगेशकर से बातचीत करना किस स्तर के सौभाग्य की बात है, उसका अंदाज़ा आप भली भाँति लगा सकते हैं। जी हाँ, मेरी यह परम ख़ुशनसीबी है कि ट्विटर के माध्यम से मुझे भी लता जी से चंद सवालात करने के मौके नसीब हुए, और उससे भी बड़ी बात यह कि लता जी ने किस सरलता से मेरे उन चंद सवालों के जवाब भी दिए। जितनी मेरी ख़ुशकिस्मती है, उससे कई गुना ज़्यादा बड़प्पन है लता जी का कि इतनी महान कलाकार होते हुए भी वो अपने चाहने वालों के सवालों के जवाब इस सादगी, सरलता और विनम्रता से देती हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि फलदार पेड़ हमेशा झुके हुए ही होते हैं। तो आइए, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में मेरे सवाल और लता जी के जवाब प्रस्तुत करते हैं।

सुजॊय - लता जी, बहुत बहुत नमस्कार, ट्विटर पर आपको देख कर हमें कितनी ख़ुशी हो रही है कि क्या बताऊँ! लता जी, आप ने शांता आप्टे के साथ मिलकर सन्‍ १९४६ की फ़िल्म 'सुभद्रा' में एक गीत गाया था, "मैं खिली खिली फुलवारी"। तो फिर आपका पहला गीत १९४७ की फ़िल्म 'आपकी सेवा में' का "पा लागूँ कर जोरी रे" को क्यों कहा जाता है?

लता जी - नमस्कार! मैंने १९४२ से लेकर १९४६ तक कुछ फ़िल्मों में अभिनय किया था जिनमें मैंने गानें भी गाये थे, जो मेरे उपर ही पिक्चराइज़ हुए थे। १९४७ में 'आपकी सेवा में' में मैंने पहली बार प्लेबैक किया था।

सुजॊय - लता जी, पहले के ज़माने में लाइव रेकॊर्डिंग् हुआ करती थी और आज ज़माना है ट्रैक रेकॊर्डिंग् का। क्या आपको याद कि वह कौन सा आपका पहला गाना था जिसकी लाइव नहीं बल्कि ट्रैक रेकॊर्डिंग् हुई थी?

लता जी - वह गाना था फ़िल्म 'दुर्गेश नंदिनी' का, "कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफ़िर, सितारों से आगे ये कैसा जहाँ है", जिसे मैंने हेमन्त कुमार के लिए गाया था।

सुजॊय - लता जी, "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत से पंडित नेहरु की यादें जुड़ी हुई हैं। क्या आपको कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी से भी मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है?

लता जी - आदरणीय बापू को मैं मिल ना सकी, लेकिन उन्हें दूर से दर्शन दो बार हुए। आदरणीय पंडित जी और आदरणीया इंदिरा जी को प्रत्यक्ष मिलने का सौभाग्य मुझे कई बार प्राप्त हुआ है।

सुजॊय - लता जी, क्या इनके अलावा किसी विदेशी नेता से भी आप मिली हैं कभी?

लता जी - कई विदेशी लीडर्स से भी मिलना हुआ है जैसे कि प्रेसिडेण्ट क्लिण्टन और क्वीन एलिज़ाबेथ। क्वीन एलिज़ाबेथ ने मुझे चाय पे बुलाया था और मैं बकिंघम पैलेस गई थी उनसे मिलने, श्री गोरे जी के साथ मे, जो उस समय भारत के राजदूत थे।

सुजॊय - लता जी, विदेशी लीडर्स से याद आया कि अगर विदेशी भाषाओं की बात करें तो श्रीलंका के सिंहली भाषा में आपने कम से कम एक गीत गाया है, फ़िल्म 'सदा सुलग' में। कौन सा गाना था वह और क्या आप श्रीलंका गईं थीं इस गीत को रेकॊर्ड करने के लिए?

लता जी - मैंने वह गीत मद्रास (चेन्नई) में रेकॊर्ड किया था और इसके संगीतकार थे श्री दक्षिणामूर्ती। गीत के बोल थे "श्रीलंका त्यागमयी"।

सुजॊय - लता जी, आपने अपनी बहन आशा भोसले और उषा मंगेशकर के साथ तो बहुत सारे युगल गीत गाए हैं। लेकिन मीना जी के साथ बहुत कम गीत हैं। मीना मंगेशकर जी के साथ फ़िल्म 'मदर इण्डिया' फ़िल्म में एक गीत गाया था "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा"। क्या किसी और हिंदी फ़िल्म में आपने मीना जी के साथ कोई गीत गाया है?

लता जी - मैं और मीना ने 'चांदनी चौक' फ़िल्म में एक गीत गाया था, रोशन साहब का संगीत था, और उषा भी साथ थी।

तो दोस्तों, ये थे चंद सवाल जो मैंने पूछे थे लता जी से, और जिनका लता जी ने बड़े ही प्यार से जवाब दिया था। आगे भी मैं कोशिश करूँगा कि लता जी से कुछ और भी ऐसे सवाल पूछूँ जो आज तक किसी इंटरव्यु में सुनने को नहीं मिला। लेकिन फिलहाल आपको सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'दुर्गेश नंदिनी' का वह प्यारा सा गीत "कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफ़िर"। यह लता जी का गाया पहला ट्रैक पे रेकॊर्ड किया हुआ गीत है जैसा कि उपर इन्होंने कहा है। यह १९५६ की फ़िल्म है और इस गीत को लिखा है राजेन्द्र कृष्ण नें।

गीत - कहाँ ले चले हो बता दो मुसाफ़िर (दुर्गेश नंदिनी)


तो ये थी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक बेहद ख़ास प्रस्तुति जब हमने बातें की सुर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर से ट्विटर पर। आज बस इतना ही, रविवार की शाम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित कड़ी के साथ फिर हाज़िर होंगे, तब तक के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!

Saturday, December 4, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (१९) - ई मेल तो नहीं पर आज बात एक खत की जो किशोर दा ने लिखा था लता को

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। युं तो हम इसमें 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया करते हैं, लेकिन आज इसमें हम आपके लिए कुछ अलग चीज़ लेकर आये हैं। यह ईमेल तो नहीं है, लेकिन ख़त ज़रूर है। वही ख़त, जिसे हम काग़ज़ पर लिखा करते हैं। और पता है आज जिस ख़त को यहाँ हम शामिल करने वाले हैं, उसे किसने लिखा है और किसको लिखा है? यकीन करेंगे आप अगर हम कहें कि किशोर कुमार ने यह ख़त लिखा है लता मंगेशकर को? दिल थाम के बैठिए दोस्तों, पिछले दिनों लता जी ने किशोर दा के एक ख़त को स्कैन कर ट्विटर पर अपलोड किया था, तो मैंने सोचा कि क्यों ना उसे डाउनलोड करके अपनी उंगलियों से टंकित कर आपके लिए इस स्तंभ में पेश करूँ। तो चलिए अब मैं बीच में से हट जाता हूँ, ये रहा किशोर दा का ख़त लता जी के नाम...

***************************************

28.11.65

बहन लता,

अच्छी तो हो! अचानक एक मुसीबत में आ फंसा हूँ। तुम ही मेरी जीवन नैय्या पार लगा सकती हो। घबराने की बात नहीं पर घबराने की बात भी है!!! सुनो, ज़िंदगी में पहली मर्तबा फ़ौजी भाइयों की सेवा करने जा रहा हूँ। तुम तो जानती हो कि मैं कभी किसी समारोह या गैदरिंग् में भाग नहीं लेता, लेकिन यह एक ऐसा अवसर है जिसे मैं टाल नहीं पा रहा हूँ ... हाँ, तो मैं कह रहा था कि अगर आज का गाना तुम अपनी मर्ज़ी से किसी दूसरी तारीख़ पे रखवा दो तो मैं तुम्हारा उपकार ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा... यह एक भाई की विनती है अपनी बहिन से। आशा है तुम मेरी बात को समझ गई होगी। महाराज कल्याणजी आनंदजी के साथ मुझे गाने का बेहद शौक है और साथ में तुम हो तो सोने पे सुहागा। कैसा अच्छा है ये प्रेम का धागा... टूटने ना पाए.. अंग्रेज़ी में लिखना चाहता था मगर एक हिंदुस्तानी होने के नाते मैंने हिंदी में ही लिखना उचित समझा। मैं जानता हूँ तुम्हे कठिनाई होगी, लेकिन मेरे लिए किसी प्रकार बात को बना दो। और क्या लिखूँ, बस तुम सब सम्भाल लेना। दिसंबर दो, तीन, चार, पाँच तक किसी भी दिन, किसी भी वक़्त रिकार्डिंग् रखवा दो। मैंने रात को फ़ोन किया था लेकिन तुम निद्रा में मग्न थी। मैंने जगाना उचित नहीं समझा।

अच्छा बहन, लौटने के बाद फिर भेंट होगी। मेरा प्यार, बड़ों को प्रणाम, छोटों को स्नेहाशीष,

तुम्हारा ही भाई,

किशोर दा
"गड़बड़ी"


**************************************

दोस्तों, देखा आपने लता जी और किशोर दा के बीच किस तरह का भाई-बहन का रिश्ता था! आइए इसी रिश्ते को सलाम करते हुए आज आपको दो ऐसे गीत सुनवाए जाएँ जो अपने आप में बेहद अनूठे हैं। अनूठे इसलिए कि पहले गीत के संगीतकार हैं लता मंगेशकर और गायक हैं किशोर कुमार, और दूसरे गीत के संगीतकार हैं किशोर कुमार और गायिका हैं लता मंगेशकर। क्यों, एक बार फिर से चौंक गए ना आप? हिंदी में तो नहीं, लेकिन बंगला के दो ऐसे गीत ज़रूर हैं। तो लीजिए एक के बाद एक इन दोनों गीतों को सुनिए, हमें पूरी उम्मीद है कि अलग ही अनुभूति आपको मिलेगी।

पहले ये रहा लता जी के संगीत निर्देशन में किशोर दा की आवाज़...

गीत - तारे आमि चोखे देखिनी, तार ऒनेक गॊल्पो शुनेछी


इस गीत के मुखड़े का तरजुमा कुछ इस तरह का है - "उसे मैंने अपनी आँखों से तो नहीं देखा, पर उसकी बहुत सारी बातें लोगों से सुनी है, और इन बातों को सुनने के बाद मैं उससे थोड़ा थोड़ा प्यार करने लगा हूँ"।

और ये है किशोर दा के संगीत में लता जी की आवाज़...

गीत - की लिखी तोमाये, तुमि छाड़ा आर कोनो किछु भालो लागेना आमार


गीत के मुखड़े का भाव यह था कि "क्या लिखूँ तुम्हे, तुम्हारे बिना और कुछ भी मुझे अच्छा नहीं लगता, क्या लिखूँ तुम्हे"। देखिए दोस्तों, हमने किशोर दा के लिखे ख़त से शुरुआत की थी, और अब इस अंक का समापन भी एक ऐसे गीत से हुआ जिसमें भी ख़त में कुछ लिखने की बात कही गई है। आप भी हमें ज़रूर लिख भेजिएगा कि कैसा लगा आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आज का यह साप्ताहिक विशेषांक। हमारी कोशिश हमेशा यही रहती है कि अच्छे से अच्छा और मनोरंजक प्रस्तुति हम आपके लिए तैयार कर सकें। इसमें आप भी अपना अमूल्य योगदान हमें दे सकते हैं बस एक ईमेल के बहाने। तो लिख भेजिएगा अपनी यादों के ख़ज़ाने oig@hindyugm.com के पते पर। अगले शनिवार आपसे फिर मुलाक़ात होगी इस साप्ताहिक विशेषांक में, लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी के साथ कल शाम को ही हम हाज़िर होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

सुजॉय चट्टर्जी

Saturday, November 27, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (१८).....जब अश्विनी कुमार रॉय ने याद किया नौशाद साहब को

नमस्कार! 'ओल इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों, सभी चाहनेवालों का हम फिर एक बार इस साप्ताहिक विशेषांक में हार्दिक स्वागत करते हैं। हफ़्ते दर हफ़्ते हम इस साप्ताहिक स्तंभ में आपके ईमेलों को शामिल करते चले आ रहे हैं। और हम आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं कि आपने हमारे इस नए प्रयास को हाथों हाथ ग्रहण किया और अपने प्यार से नवाज़ा, और इसे सफल बनाया। हमारे वो साथी जो अब तक इस साप्ताहिक स्तम्भ से थोड़े दूर दूर ही रहे हैं, उनसे भी हमारी ग़ुज़ारिश है कि कम से कम एक ईमेल तो हमें करें अपनी यादें हमारे साथ बांटें। और कुछ ना सही तो किसी गीत की ही फ़रमाइश हमें लिख भेजें बस इतना लिखते हुए कि यह गीत आपको क्यों इतना पसंद है। oig@hindyugm.com के पते पर हम आपके ईमेलों का इंतज़ार किया करते हैं। और आइए अब पढ़ें कि आज किन्होंने हमें ईमेल किया है....
**********************************************
महोदय,

नमस्कार!

वास्तव में पहले से ही मालूम था कि हमारी सभ्यता और संस्कृति सब से महान थी और आज भी है, आने वाले समय में भी इसकी बराबरी शायद ही कोई कर पाए। जो संगीत मैंने बचपन में सुना था वह आज इंटरनेट के माध्यम से हिन्दयुग्म पर देख और सुन सकता हूँ। इसके लिए आपको बहुत बहुत बधाई। हमारा शास्त्रीय संगीत सचमुच एक अमूल्य धरोहर है तथा आज भी एक ध्रुव तारे की तरह हमारा मार्ग-दर्शन कर रहा है। यदि पुराने संगीतकारों की तुलना आजकल वालों से करें तो पता चलता है कि पश्चिम की अनाप शनाप नक़ल करके हम अपने शुद्ध भारतीय संगीत से विमुख होते जा रहे है। इसमें दिनों दिन सुरीलापन भी कम होने लगा है जो चिंता की बात है। आप 'हिन्दयुग्म' के माध्यम से आजकल की पीढी को पुराने गीतों से जोड़ने का सार्थक प्रयास कर रहे हैं जो प्रशंसनीय है। पुराने गीत आज भी उसी आकर्षण के साथ सुने जाते हैं जैसे पहले सुने जाते थे। आधुनिक संगीतकारों को सुन कर मुझे फैज़ अहमद फैज़ कि लिखी वह शायरी याद आने लगती है जिसमें उन्होंने कहा था, "कैसे कैसे लोग देखो ऐसे वैसे हो गए .....ऐसे वैसे लोग देखो कैसे कैसे हो गए"। एक दिन शायद ऐसा भी हो जब इतने अमूल्य संगीत को सुनने वाला कोई भी न हो। भगवान न करे कभी ऐसा दिन देखने को मिले। आपके प्रयास सार्थक हों, यही मेरी शुभकामना है।

सादर,

अश्विनी कुमार रॉय


************************************
अश्विनी जी, बहुत बहुत शुक्रिया आपका इस ईमेल के लिए, और आपका बहुत बहुत स्वागत है 'आवाज़' के इस 'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ पर। यकीन मानिए, नये नये दोस्तों से जुड़कर हमें बेहद आनंद आता है, आगे भी युंही हमारे साथ सम्पर्क बनाये रखिएगा। इसमें कोई शक़ नहीं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत सबसे ज़्यादा कर्णप्रिय है और इसके वैज्ञानिक पक्ष और औषधिक गुणवत्ता को तो अब पश्चिम ने भी स्वीकारा है। जहाँ तक नये संगीतकारों के बारे में आपके विचार हैं, अब क्या किया जा सकता है, समय समय की बात है। अब देखिए ना, हम भी तो कागज़ पर ख़त लिखना छोड़ कर ईमेल के माध्यम से अपने विचार प्रकट कर रहे हैं। ईमेल में वह बात कहाँ, वह जज़्बात कहाँ जो कागज़ पर लिखे ख़त में होते हैं। ठीक कहा ना? लेकिन क्या किया जाये, समय के साथ भी तो चलना है। अगर समय के साथ ना चलें तो समय ख़ुद ही हमें पीछे छोड़ देता है। हमें ऐसा लगता है कि दौर का संगीत अपने अपने जगह पर हैं। पुराने गानें बेहद सुरीले और अर्थपूर्ण हैं, इसमें कोई शक़ नहीं। ऐसा कभी नहीं होगा कि भविष्य में इन्हें सुनने वाले ना हों। अच्छे चीज़ की क़दर हर युग में बनी रहेगी, यही हमारा विश्वास है। और फिर साहिर साहब ने भी कहा है कि "कल और आयेंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले, मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले"।

अश्विनी जी, आपने आगे अपने ईमेल में फ़िल्म 'सोहनी महिवाल' का गीत सुनना चाहा है महेन्द्र कपूर की आवाज़ में। आपने इस गीत के बारे में लिखा है कि यह महेन्द्र कपूर के करीयर का पहला महत्वपूर्ण गीत रहा है। इस गीत के अवधि करीब करीब ८ मिनट की है, जो उस समय के लिहाज़ से काफ़ी लम्बी है। पूरे गीत में बदलते दृश्यों के हिसाब से संगीत संयोजन में भी काफ़ी विविधता है, जिसके लिए श्रेय जाता है संगीतकार नौशाद साहब को। नौशाद साहब ने इस गीत के लिए ११०-पीस ऒर्केस्ट्रा का इस्तेमाल किया था। तो आइए आपके अनुरोध पर सुनते हैं शक़ील बदयूनी की यह रचना।

गीत - रात ग़ज़ब की आई (सोहनी महिवाल)


तो बस आज इतना ही, अगले हफ़्ते का अंक बेहद बेहद बेहद ख़ास होगा। कैसे होगा, यह तो उसी दिन आपको पता चलेगा। तो उत्सुक्ता के जस्बे को बनाये रखिए और आज के लिये मुझे इजाज़त दीजिए। कल फिर मुलाक़ात होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी में, नमस्कार!

सुजॉय चट्टर्जी

Saturday, November 20, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (१७)...वादियों में मिले जब दो चाहने वाले तो इस गीत ने दी उनके प्रेम को परवाज़

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, बहुत बहुत स्वागत है आप सभी का इस शनिवार विशेषांक में। इसमें हम आपके लिए लेकर आते हैं 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', जिसमें आप ही में से किसी ना किसी दोस्त के यादों को पूरी दुनिया के साथ बांटा करते हैं जिन्हें आपने हमसे शेयर किए हैं एक ईमेल के माध्यम से। आज भी एक बड़ा ही दिल को छू लेनेवाला ईमेल हम शामिल कर रहे हैं। हाँ, इस ईमेल को पेश करने से पहले आपको बता दें कि जिस शख़्स ने हमें यह ईमेल भेजा है, इन्होंने ना तो अपना नाम लिखा है और ना ही हमारे oig@hindyugm.com के पते पर इसे भेजा है, बल्कि एक गुमनाम आइ.डी से सीधे मेरे व्यक्तिगत ईमेल आइ.डी पर भेज दिया है। कोई बात नहीं, आपके जज़्बात हम तक पहुँच गए, यही बहुत है हमारे लिए। तो ये रहा आपका ईमेल...


***************************************************
प्रिय सुजॊय जी,
मैं अपना यह ईमेल आप के ईमेल पते पर भेज रहा हूँ, ताकि आप पहले यह जाँच लें कि यह पोस्ट करने लायक है भी या नहीं। अगर सही लगे तो शामिल कर लीजिएगा।

मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का 'ईमेल के बहाने...' बहुत ध्यान से पढ़ता हूँ और सब के अनुभवों से भावुक भी हो जाता हूँ। हाल में मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही क़िस्सा हुआ जिसे मैं आप सब के साथ शेयर करना चाहता हूँ। क़िस्सा कहना शायद ग़लत होगा, यु कहिए कि मेरी ज़िंदगी के साथ मुलाक़ात हो गई। मैं ३३ साल का युवा हूँ, और आज की पीढ़ी का तो आप जानते ही हैं कि प्रेम संबंध कितने जल्द बनते हैं और टूटते भी हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। लेकिन इतने सालों में मुझे अब जाकर एक ऐसा साथी मिला जिसे पाकर जैसे मेरी दुनिया ही बदल गई। मैंने यह जाना है कि शारीरिक मिलन से बहुत बहुत ज़्यादा बढ़के होता है मन से मन का मिलन। लगता है कि मुझे भी अपना मन का मीत मिल ही गया। हमारे ना केवल ख़यालात मिलते जुलते हैं, बल्कि हर चीज़ में टेस्ट बिल्कुल एक जैसा है। भले ही हमारे बीच उम्र का लगभग ८-९ साल का फ़ासला है, लेकिन मन-मस्तिष्क बिल्कुल समान आयुवर्ग जैसा ही लगता है। और तो और, फ़िल्मी-गीतों में भी हमारी पसंद बिल्कुल एक जैसी है। हमारी जिस दिन पहली मुलाक़ात हुई थी, एक गाना बज रहा था, "दिखाई दिए युं कि बेख़ुद किया, हमें आप से भी जुदा कर चले"। गाना तो अपने समय से ख़्तम हो गया, पर इसका असर गहरा था। हम अपने अपने घर चले गए, और घर पहुँचकर मेरे साथी ने एस.एम.एस पर इस गीत का मुखड़ा लिख कर भेजा। क्योंकि मुझे बहुत जल्द ही यह शहर छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए चले जाना था, मैंने जवाब में लिख दिया, "बहुत आरज़ू थी गली की तेरी, सो यास-ए-लहू में नहा कर चले"। और बस, हमें एक दूसरे से प्यार हो गया। फ़ोन पर देर तक हम रोते रहे, रोते ही रहे।

हमारी मुलाक़ातें होती रहीं। ऐसे ही किसी दिन हमने गाना सुन लिया "दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन"। गीत कुछ ऐसा भाया कि बार बार रिवाइण्ड कर सुनते रहे और जैसे गीत के तीसरे अंतरे की तरफ़ सचमुच किसी बर्फ़ीली पहाड़ी में पहूँच गए। उस रात मेरे साथी ने भी सपने में देखा कि हम दोनों किसी पहाड़ पर किसी झरने के बगल में हाथों को हाथों में लिए बैठे हुए हैं। बस फिर क्या था, मेरे मन में आया कि क्यों ना हमेशा के लिए इस जगह को छोड़ने से पहले एक बार किसी हिल-स्टेशन की सैर कर उस साथी के सपने को पूरा किया जाए, इसे अपने जीवन की एक अविस्मरणीय यात्रा बना ली जाए। बस, गुलज़ार साहब के चमत्कृत कर देने वाले बोलों के सहारे हम भी चल पड़े उस बर्फ़ीली सर्दी वाले पहाड़ की तरफ़, जहाँ पर ख़ामोशियाँ गूंजती हुई सुनाई देती हो। और जहाँ तक आँखों में भीगे भीगे लम्हों का सवाल था, उसकी कसर हम दोनों ने पूरी कर दी। ख़ूब रोये हम एक दूसरे के कंधों पर सर रख कर। इस समाज व्यवस्था के लिए हम दोनों का अकेले इस तरह से जाने को शायद मान्यता ना मिले, लेकिन हमारा प्यार कितना पवित्र है, यह बस हम ही जानते हैं और हमें किसी को कोई कैफ़ीयत देने की ज़रूरत नहीं। तो हम पहुँच गए अपने गंतव्य स्थल, और जिस गीत को अब तक हज़ारों बार सुना था, ऐसा लगा कि पहली बार इसे हम जी रहे हों। "बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर, वादी में गूँजती हुई ख़ामोशियाँ सुनें, आँखों में भीगे भीगे से लम्हे लिए हुए..."। हम वापस भी आ गए और अब बस दो तीन रोज़ में मैं जा रहा हूँ यहाँ से, लेकिन गुलज़ार साहब का लिखा यह गीत हमेशा हमेशा के लिए जैसे मेरे दिल में, आँखों में क़ैद हो गया।

और पता है हम दोनों ने मिलकर इसी गीत को आगे बढ़ाते हुए कुछ लिखा भी है इस गीत की ही शैली में। गुलज़ार साहब का तो कोई भी मुक़ाबला नहीं कर सकता, बस युंही हमने कुछ लिख दिया यहाँ वहाँ से लफ़्ज़ जुटा कर। तो पहले पढ़िए कि मेरे साथी ने क्या लिखा है...

"या रिमझिम बरसात में झरोखे से ताक कर,
युंही काले बादलों की गड़गड़ाहट सुनें,
बूंदों को हथेलियों पर देखें टपकते हुए,
दिल ढ़ूंढ़ता है..."

और फिर मैंने भी तो कुछ लिखा था...

"सर्पीले रास्तों पे किसी कारवाँ में बैठकर,
नग़में प्यार के सुनें कांधों पे रख के सर,
पोंछते रहें अश्क़ों को मुस्कान लिए हुए,
दिल ढ़ूंढ़ता है..."

बस इतना ही कहना था मुझे। हमारे प्यार को भले ही स्वीकृति ना मिले लेकिन हम दोनों को पता है कि हमारे बीच किस तरह का मधुर रिश्ता है और वही हमारे लिए बहुत है। आप हम दोनों की तरफ़ से फ़िल्म 'मौसम' के इसी गीत को सुनवा दीजिएगा।

बहुत बहुत धन्यवाद!

**************************************************

दोस्त, आप ने अपना नाम तो नहीं लिखा, ना ही उस हिलस्टेशन का नाम लिखा जहाँ पर आप गए थे, लेकिन फिर भी आपके ईमेल ने हमारे दिल को छू लिया और यही हमारे लिए बहुत है। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं ज़िंदगी में जिन्हें कोई नाम नहीं दिया जा सकता। अब देखिए, गुलज़ार साहब ने ही तो लिखा था ना कि "हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ूशबू, हाथ से छू के इसे रिश्तों का इलज़ाम ना दो, सिर्फ़ अहसास है यह रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो"। तो आइए फ़िल्म 'मौसम' के उस गीत को सुनते हैं लता मंगेशकर और भूपेन्द्र की आवाज़ों में जो अब आपके जीवन का एक हिस्सा बन चुका है। आपने इस गीत के साथ जुड़ी अपनी भावनाओं को तो व्यक्त कर दिया, अब हमें भी मौक़ा दीजिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के रवायत के मुताबिक़ इस गीत से जुड़ी कुछ तथ्य बताने का। विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में आशा भोसले और आर. डी. बर्मन से बातचीत करते हुए गुलज़ार साहब ने इस गीत के बारे में कहा था - "इस गाने के बारे में एक बात कह दूँ कि इस गाने का जो मुखड़ा है, जो पहली लाइन है, "दिल ढ़ूंढ़ता है फिर वोही फ़ुरसत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुर-ए-जाना किए हुए", यह दरअसल ग़ालिब का शेर है। तो कुछ शेरों में मैंने नज़्में कही है इस तरह कि वो फ़ुरसत के कौन से दिन थे, किस तरह का मूड होगा, जिसकी तलाश ग़ालिब कर रहे थे जब उन्होंने यह शेर कहा था। और यह सिचुएशन मेरे हाथ में थी कि यह आदमी छुट्टियों की तलाश कर रहा है, इसलिए मैंने ग़ालिब की इस शेर को ले लिया।" तो आइए मदन मोहन के संगीत निर्देशन में इस कालजयी रचना का आनंद लेते हैं। गीत तो उत्कृष्ट है ही, लता जी की आवाज़ में गीत का शुरुआती आलाप से ही जैसे इश्क़ हो जाता है, और मन कहीं दूर निकल जाता है फ़ुरसत के लम्हों की तलाश में। आप सब इस गीत के साथ अपने फ़ुरसत के उन मीठे लम्हों को दुबारा जी लीजिए और मुझे फिलहाल इजाज़त दीजिए कल तक के लिए, नमस्कार!

गीत - दिल ढ़ूंढ़ता है (मौसम, लता-भूपेन्द्र)


सुजॉय चट्टर्जी

Saturday, November 13, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - जब खान साहब ने की हमारी हौंसला अफजाई

नमस्कार दोस्तों! स्वागत है एक बार फिर आप सभी का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साप्ताहिक विशेषांक 'ईमेल के बहाने, यादों के ख़ज़ाने' में। यह एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम वही छापते हैं जो आप हमें ईमेल के माध्यम से लिख भेजते हैं। आप में से कुछ अपने फ़रमाइशी नग़में हमें लिख भेजते हैं तो कुछ किसी गीत से जुड़ी अपनी यादें। कुछ हमरे दोस्त ऐसे भी हैं जो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' और 'आवाज़' की प्रस्तुतियों से इतने प्रभावित हैं कि 'हिंदयुग्म' के इस प्रयास को बढ़ावा देने हेतु अंशदान भी करने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं। हम आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। जिस किसी तरह से भी आप हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते हैं, हम उसे अपना सौभाग्य समाझते हैं। आप में से कुछ दोस्त हमारी लघु शृंखलाओं की भी समय समय पर तारीफ़ करते हैं, जिससे यकीन मानिए, हमें और अच्छे और अनूठे शृंखलाओं को प्रस्तुत करने की उर्जा मिलती रहती है। ऐसे ही एक हमारे नियमित पाठक व श्रोता हैं ख़ानसाब ख़ान। ख़ान साहब अक्सर हमें ईमेल के द्वारा इन शृंखलाओं के बारे में अपने विचार लिख भेजते हैं। पिछले दिनों ख़ान साहब ने लता जी के गाए दुर्लभ गीतों की शृंखला पर अपने विचार प्रस्तुत किए एक ईमेल के बहाने, आइए आज उन्हीं का वह ईमेल पेश किया जाए, और उसके बाद हम लता जी का गाया एक और दुर्लभ गीत आपको सुनवाएँगे। ये रहा ख़ान साहब का ईमेल...


*******************************************
आदाब,
लता जी के दुर्लभ दस गीतों में बहुत जान थी, भले ही वक़्त ने इनमें साँसें सलामत ना रखी हो। लता जी के इन शुरुआती नग़मों से हम बिल्कुल ही अंजान थे। मगर आपके साथ इन गीतों को हमने केवल सुना और पढ़ा ही नहीं, बल्कि इन गीतों को और उस दौर को हमने जीया भी है। आप अपनी प्रस्तुति इस तरह देते हैं कि हमको ऐसा लगता है कि मानो हम उस दौर में चले गये हैं और उन लम्हों को जाने जी रहे हैं। गीतों के साथ जुड़ी जानकारियाँ पढ़कर ही गीत सुनने का मज़ा चार गुणा बढ़ जाता है। आपके इस प्रयासों का हम जितना भी शुक्रिया अदा करें, हमारा दिल नहीं भरता है। क्योंकि हमें लगता है कि आपके लिए 'थैंक्स' लफ़्ज़ बहुत ही छोटा है।

और साथ में श्री अजय देशपाण्डे जी का भी बहुत बहुत धन्यवाद जिनके सहयोग से यह सफ़र शुरु होकर अपने मुकाम तक पहुँचा। और आपने बिल्कुल सही कहा था कि लता जी की तारीफ़ में अब और कुछ कहना वक़्त की बरबादी ही होगी, क्योंकि लता जी वक़्त से बहुत बहुत आगे निकल गईं हैं। वाक़ई मैं उस दौर के बेहतरीन नग़मों की वजह से ही हिंदुस्तानी संगीत की नीव इतनी मज़बूत हो गई है। आज भी जो लोग हिंदुस्तानी संगीत को पसंद करते हैं और इसको सुनते हैं, उनमें से ज़्यादातर उस बीते दौर के ही संगीत को सुनना पसंद करते हैं, क्योंकि उस संगीत में एक सुकून है, दिल का आराम है, रातों का चैन है, दिन का क़रार है, हज़ारों जज़्बात हैं, लाखों अहसास हैं, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि उस दौर का हर गीत आज भी हर एक आम आदमी को ख़ुद से जुड़ा हुआ महसूस होता है।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद!
ख़ुदा हाफ़िज़!

**********************************************

ख़ान साहब, आपके इस ईमेल के जवाब में हम भी अगर 'शुक्रिया' कहेंगे तो वह बहुत ही छोटा सुनाई देगा। आपने पुराने दौर के गीत-संगीत की शान में जो कुछ भी लिखा है, उसका एक एक शब्द सही है। क्योंकि आपके ईमेल में 'लता के दुर्लभ दस' शृंखला का ज़िक्र है, तो क्यों ना आज यहाँ पर लता जी का ही एक और दुर्लभ गीत सुना और सुनवाया जाए। १९४८ में अनिल बिस्वास के संगीत से सजी एक फ़िल्म आई थी 'अनोखा प्यार'। दिलीप कुमार, नरगिस और नलिनी जयवंत फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे। अनिल दा ने मुकेश की आवाज़ चुनी दिलीप साहब के लिए, जब कि नरगिस के लिए मीना कपूर और नलिनी जयवंत के लिए लता मंगेशकर को चुना। जैसा कि आप जानते हैं कि उस ज़माने में गीत दो बार रेकॊर्ड होते थे, एक बार फ़िल्म के लिए और दूसरी बार ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड के लिए, तो इस फ़िल्म के साथ हुआ युं तो फ़िल्म के पर्दे पर तो नरगिस के लिए मीना कपूर की ही आवाज़ सुनाई दी, लेकिन ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड पर सारे गानें लता जी की आवाज़ में उतारे गये। ऐसा कहा जाता है कि मीना कपूर बीमार हो गईं थीं जब ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड के लिए गानें रेकॊर्ड होने थे, इसलिए अनिल दा ने लता जी से गवा लिया। इस फ़िल्म में एक फ़ीमेल डुएट था जिसे पर्दे पर लता और मीना कपूर ने गाया था। लेकिन जैसा कि हमने कहा, मीना कपूर के बीमार हो जाने की वजह से, ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड के लिए यह गीत लता जी के साथ ईरा नागरथ से गवा लिया गया। गीत के बोल हैं "ऐ दिल मेरी वफ़ा में कोई असर नहीं है, मैं मर रही हूँ जिन पर उनको ख़बर नहीं है"।

दोस्तों, ये वहीं ईरा नागरथ हैं जो पहले गायिका ईरा मोइत्र थीं। संगीतकार रोशन से शादी के बाद ये ईरा नागरथ बन गईं। यानी कि राकेश और राजेश रोशन की माँ, और ॠतिक रोशन की दादी हैं गायिका ईरा नागरथ। तो आइए इस दुर्लभ फ़ीमेल डुएट को सुना जाए जिसे लिखा है शम्स अज़ीमाबादी ने।
पहले फ़िल्म वाला वर्ज़न सुनिए लता और मीना कपूर से....

गीत - ऐ दिल मेरी वफ़ा में कोई असर नहीं है (लता, मीना कपूर - फ़िल्म वर्ज़न)



और अब सुनिए इस गीत का ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड वर्ज़न लता और ईरा नागरथ की आवाज़ों में...

गीत - ऐ दिल मेरी वफ़ा में कोई असर नहीं है (लता, ईरा नागरथ - ग्रामोफ़ोन वर्ज़न)



दोस्तों, हमें आशा है कि इस भूले बिसरे गीत को बहुत अरसे के बाद सुन कर आपको अच्छा लगा होगा। लता जी की आवाज़ के साथ साथ मीना कपूर और ईरा नागरथ जैसी कमचर्चित गायिकाओं की आवाज़ों को सुन कर एक अलग ही अनुभव हुआ होगा। तो आज के लिए बस इतना ही, रविवार की शाम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमीत कड़ी में आप सभी से फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए आज्ञा दीजिए, नमस्कार!

सुजॉय चट्टर्जी

Saturday, November 6, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - जब एक और भारी गडबडी वाले गीत की तरफ़ ध्यान आकर्षित कराया शरद जी ने

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक 'ईमेल के बहाने, यादों के ख़ज़ाने' में। पिछले दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हमनें लघु शृंखला 'गीत गड़बड़ी वाले' पेश की थी। इसी संदर्भ में शरद तैलंग जी ने हमें एक ईमेल भेजा। तो आइए आज शरद जी के उसी ईमेल को यहाँ प्रस्तुत करते हैं....
*******************************************

सुजॊय जी,

पिछले दिनों मैनें जयपुर के संस्कृत के विद्वान देवर्षि कलानाथ शास्त्री जी का एक लेख पढा था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि सहगल साहब का प्रसिद्ध गीत "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए" में मूल पंक्ति थी "चार कहार मिल मोरी डोलिया उठावै", लेकिन उन्होंने गा दिया "डोलिया सजावै", जबकि डोली सजाने का काम दुल्हन की सखियां करती हैं, कहार तो उठाते हैं। इसी तरह आगे की पंक्तियों में भी मूल गीत है "देहरी तो पर्वत हुई और अंगना भया बिदेस", जब कि उन्होंने गाया "अंगना तो परबत भया और देहरी भयी बिदेस", क्यों कि देहरी तो पर्बत समान हो सकती है जिसे लांघना मुश्किल हो जाएगा और पीहर का आंगन इतना दूर हो जाएगा जैसे बिदेस हो। लेकिन जो प्रचलित हो गया सभी उसी को गाए जा रहे है ।
शरद तैलंग


******************************************
दोस्तों, शरद जी ने जिस लेख का ज़िक्र किया, वह मघुमती पत्रिका के अक्टूबर २००९ अंक में प्रकाशित हुआ था। आइए उसी लेख का एक अंश यहाँ प्रस्तुत करते हैं, जिसमें इन गड़बड़ियों का ज़िक्र हुआ है। सहगल साहब के साथ साथ जगमोहन के गाये एक गीत का भी उल्लेख है। आइए पढ़ा जाए...

"पिछले दिनों लेखिकाओं की आपबीती बयान करने वाली तथा नारी की निष्ठुर नियति का सृजनात्मक चित्रण करने वाली आत्मकथाओं के अंशों का संकलन कर सुविख्यात कथाकार, सम्पादक और चिन्तक राजेन्द्र यादव के सम्पादन में प्रकाशित पुस्तक 'देहरी भई बिदेस' की चर्चा चली तो हमारे मानस में वह दिलचस्प और रोमांचक तथ्य फिर उभर आया कि बहुधा कुछ उक्तियाँ, फिकरे या उद्धरण लोककंठ में इस प्रकार समा जाते हैं कि कभी-कभी तो उनका आगा-पीछा ही समझ में नहीं आता, कभी यह ध्यान में नहीं आता कि वह उद्धरण ही गलत है, कभी उसके अर्थ का अनर्थ होता रहता है और पीढी-दर-पीढी हम उस भ्रान्ति को ढोते रहते हैं जो उस फिकरे में लोककंठ में आ बसी है। देहरी भई बिदेस भी ऐसा ही उद्धरण है जो कभी था नहीं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायक कुन्दनलाल सहगल द्वारा गाई गई कालजयी ठुमरी में भ्रमवश इस प्रकार गा दिये जाने के कारण ऐसा फैला कि इसे गलत बतलाने वाला पागल समझे जाने के खतरे से शायद ही बच पाये।

पुरानी पीढी के वयोवृद्ध गायकों को तो शायद मालूम ही होगा कि वाजिद अली शाह की सुप्रसिद्ध शरीर और आत्मा के प्रतीकों को लेकर लिखी रूपकात्मक ठुमरी बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय सदियों से प्रचलित है जिसके बोल लोककंठ में समा गये हैं - चार कहार मिलि डोलिया उठावै मोरा अपना पराया टूटो जाय आदि। उसमें यह भी रूपकात्मक उक्ति है - देहरी तो परबत भई, अँगना भयो बिदेस, लै बाबुल घर आपनो मैं चली पिया के देस। जैसे परबत उलाँघना दूभर हो जाता है वैसे ही विदेश में ब्याही बेटी से फिर देहरी नहीं उलाँघी जाएगी, बाबुल का आँगन बिदेस बन जाएगा। यही सही भी है, बिदेस होना आँगन के साथ ही फबता है, देहरी के साथ नहीं, वह तो उलाँघी जाती है, परबत उलाँघा नहीं जा सकता, अतः उसकी उपमा देहरी को दी गई। हुआ यह कि गायक शिरोमणि कुन्दनलाल सहगल किसी कारणवश बिना स्क्रिप्ट के अपनी धुन में इसे यूँ गा गये अँगना तो परबत भया देहरी भई बिदेस और उनकी गाई यह ठुमरी कालजयी हो गई। सब उसे ही उद्धृत करेंगे। बेचारे वाजिद अली शाह को कल्पना भी नहीं हो सकती थी कि बीसवीं सदी में उसकी उक्ति का पाठान्तर ऐसा चल पडेगा कि उसे ही मूल समझ लिया जाएगा। सहगल साहब तो चार कहार मिल मोरी डोलियो सजावैं भी गा गये जबकि कहार डोली उठाने के लिए लगाये जाते हैं, सजाती तो सखियाँ हैं। हो गया होगा यह संयोगवश ही अन्यथा हम कालजयी गायक सहगल के परम प्रशंसक हैं।

नई पीढी को उस गीत की तो शायद याद भी नहीं होगी जो सुप्रसिद्ध सुगम संगीत गायक जगमोहन ने गाया था और गैर-फिल्मी सुगम संगीत में सिरमौर हो गया था - ये चाँद नहीं, तेरी आरसी है। उसमें गाते-गाते एक बार उनके मुँह से निकल गया ये चाँद नहीं तेरी आरती है। बरसों तक यह बहस चलती रही कि मूल पाठ में आरसी शब्द है या आरती ?

सौजन्य: मधुमती, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर

तो लीजिए दोस्तों, आज सुनिए कुंदन लाल सहगल और कानन देवी की युगल आवाज़ों में १९३८ की फ़िल्म 'स्ट्रीट सिंगर' का मशहूर गीत, या युं कहिए कि ठुमरी, "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए"। आर. सी. बोराल का संगीत है और यह न्यु थिएटर्स की फ़िल्म थी।

गीत - बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए (स्ट्रीट सिंगर, १९३८ - सहगल/ कानन देवी)


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', जिसके लिए हम आभार व्यक्त करना चाहेंगे शरद तैलंग जी का। अगले हफ़्ते 'ओल्द इज़ गोल्ड' शनिवार विशेषांक लेकर हम पुन: उपस्थित होंगे, और कल से ज़रूर शामिल होइएगा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमीत महफ़िल में, क्योंकि कल से इसमें एक और बेहद ख़ास लघु शृंखला शुरु होने जा रही है। अब दीजिए इजाज़त, नमस्कार!

सुजॉय चट्टर्जी

Saturday, October 30, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - आज बारी है रोमेंद्र सागर जी की पसंद के गीत के

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस साप्ताहिक अंक में आप सभी का स्वागत है। 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम आप ही की बात करते हैं, और आप ही के पसंद के गीत सुनवाते हैं। फ़िल्मी गीत हर किसी के जीवन से जुड़ा होता है। कुछ गीत अगर हमें अपने बचपन की यादें ताज़ा कर देते हैं तो कुछ जवानी के दिनों के। कुछ गीतों से हमारा पीछे छोड़ आया प्यार वापस ज़िंदा हो जाता है तो कुछ गीत हमारे जुदाई के दिनों के हमसफ़र बन जाते हैं। हम भी यही चाहते हैं कि आप अपनी इन खट्टी मीठी यादों को हमारे साथ बाँटें इस साप्ताहिक अंक के ज़रिए। कोई तो गीत ऐसा ज़रूर होगा जिसे सुनकर आपको कोई ख़ास बात अपनी ज़िंदगी की एकदम से याद आ जाती होगी! तो लिख भेजिए हमें oig@hindyugm.com के पते पर, ठीक उसी तरह से जिस तरह हमारे दूसरे साथी लिख भेज रहे हैं।

और अब आज के फ़रमाइशी गीत की बारी। इस बार लिखने वाले हैं हमारे रोमेन्द्र सागर साहब। रोमेन्द्र जी लिखते हैं ----

"अनीता सिंह जी की फरमाईश को देखा तो कुछ अपना भी मन मचल सा गया !एक गीत है मुकेश की आवाज़ में ...फिल्म "मन तेरा तन मेरा" से ....बोल कुछ इस तरह से हैं :- "ज़िंदगी के मोड़ पर हम तुम मिले और खो गए ,अजनबी थे और फिर हम अजनबी से हो गए ..."

वाह रोमेन्द्र जी, किस भूले बिसरे गीत की आपने याद दिला दी है! सिर्फ़ गीत ही नहीं, मेरा ख़याल है कि 'मन तेरा तन मेरा' फ़िल्म का नाम भी लोग भूल चुके होंगे। यह १९७१ की फ़िल्म थी जिसके निर्देशक थे बी. आर. इशारा, जिन्होंने इस गीत को लिखा भी है। भले ही बी. आर. इशारा ने इस गीत को लिखा है, लेकिन इशारा साहब जाने जाते हैं बतौर फ़िल्म निर्देशक। ७० के दशक में उनकी बनाई फ़िल्में काफ़ी लोकप्रिय हुए थे। १९६९ और १९९६ के बीच उन्होंने कुल ३४ हिंदी फ़िल्मों का निर्माण/निर्देशन किया। उन्होंने ही अभिनेत्री परवीन बाबी को अहमदाबाद विश्वविद्यालय से खोज निकाला था। ७० के दशक में बनीं उनकी कुछ उल्लेखनीय फ़िल्में रहीं 'चेतना', 'मान जाइए', 'एक नज़र', 'मिलाप', और 'दिल की राहें'। ८० के दशक में 'वो फिर आयेगी' काफ़ी चर्चित हॊरर फ़िल्म थी।

और अब बात करते हैं इस गीत के संगीतकार सपन-जगमोहन की। दरअसल यह भी एक संगीतकार जोड़ी है सपन सेनगुप्ता और जगमोहन बक्शी की। सपन - जगमोहन ने हिंदी फ़िल्मों में पदर्पण किया १९६३ की फ़िल्म 'बेगाना' के ज़रिए और उसी फ़िल्म से चर्चा में आ गये थे। रफ़ी के गाये और शैलेन्द्र के लिखे "फिर वो भूली सी याद अई है" को ज़बरदस्त कामयाबी मिली थी। इसी फ़िल्म में मुकेश का "न जाने कहाँ खो गया वो ज़माना" अधिक लोकप्रिय तो नहीं हुआ, पर आगे चलकर मुकेश सपन जगमोहन के मुख्य गायक के रूप में जाने गये। 'मन तेरा तन मेरा' में मुकेश के गाये इस गीत को ज़्यादा तो नहीं सुना गया लेकिन दर्द की भावयुक्त अभिव्यक्ति के कारण सुनने में अच्छा लगता है। रूपक ताल में कम्पोज़ इस गीत के अंतरे के बाद और मुखड़े पर वापस लौटने के बीच का सरोद का तीव्र प्रयोग बहुत प्रभावशाली बन पड़ा है। तो आइए इस सुंदर लेकिन विस्मृत गीत को सुनें और शुक्रिया अदा करें रोमेन्द्र सागर जी का जिन्होंने इस गीत की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित किया।

गीत - ज़िंदगी के मोड़ पर हम तुम मिले और खो गये (मन तेरा तन मेरा)


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। अगले हफ़्ते आप ही में से फिर किसी दोस्त की यादों और गीत के साथ उपस्थित होंगे। अब आप से अगली मुलाक़ात होगी रविवार की नियमित कड़ी में, इन दिनों चल रहे 'गीत गड़बड़ी वाले' शृंखला के अंतर्गत। तब के लिए अनुमति दीजिए, नमस्कार!

सुजॉय चट्टर्जी

Saturday, October 23, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - जब बचपन जवानी और बुढापा सिमट गया था एक गीत में...हमारी श्रोता अनीता जी के लिए

'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' आपके मनपसंद स्तंभ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का ही एक साप्ताहिक विशेषांक है, जिसमें हम आप ही के ईमेल शामिल भी करते हैं और अगर आपने किसी गीत की फ़रमाइश की है तो उसे भी हम इसमें सुनवाते हैं। आज हम दो एक नहीं बल्कि दो दो ईमेल शामिल कर रहे हैं। पहला ईमेल हमें भेजा है ख़ानसाब ख़ान ने। ये लिखते हैं ...

आदाब,
'मजलिस-ए-क़व्वाली' की महफ़िल वाक़ई बहुत बहुत शानदार और जानदार थी। या युं कहें कि आपकी ये अदायगी हमें उस दौर के गानों का और ज़्यादा दीवाना बना गई। आप इतनी गम्भीरता से अपनी प्रस्तुति देते हैं कि हम आख़िर उसमें खो ही जाते हैं। और आपको शुक्रिया कहने के लिए ई-मेल कर ही देते हैं।

'मेरे हमदम मेरे दोस्त' की क़व्वाली "अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में" मुझे सब से ज़्यादा पसंद आई। मेरी पसंद तो आप ने मेरी बिना फ़रमाइश के ही पूरी कर दी। इसके लिए 'आवाज़' की पूरी टीम को तहे दिल से बहुत बहुत धन्यवाद!


ख़ानसाब, बहुत बहुत शुक्रिया आपका। आप समय समय पर इस तरह के ई-मेल भेज कर हमारा हौसला अफ़ज़ाई करते रहते हैं। यकीन मानिए, ये हमारे लिए जैसे टॊनिक का काम करते हैं। और रही बात आपके पसंद की क़व्वाली की, तो शायद आपको याद होगा, इस क़व्वाली के आलेख में मैंने इस बात का ज़िक्र भी किया था कि मुझे भी यह क़व्वाली अत्यन्त प्रिय है। चलिए हम दोनों की पसंद भी मिल गई। आप आगे भी इसी तरह का साथ बनाये रखिएगा। और अप अपनी अगली ग़ज़ल हमे कब भेज रहे हैं?

आइए अब आज के दूसरे ई-मेल पर आते हैं, इसे भेजा है अनीता सिंह ने। सच कहूँ, यह कोई ई-मेल नहीं है। दरअसल, बहुत दिनों पहले हमें 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के किसी अंक में अनीता सिंह की एक टिप्पणी मिली थी, जिसमें उन्होंने एक गीत की फ़रमाइश की थी। उस वक़्त हम उस गीत को सुनवा तो नहीं सके थे, लेकिन हमारे मन में यह बात ज़रूर रह गई थी कि कभी ना कभी हम अनीता जी की पसंद को पूरी कर सके। इसलिए हमने अपने ई-मेल के ड्राफ़्ट्स में उनकी यह टिप्पणी सेव कर के रख लिया था। तो चलिए आज उनकी उस टिप्पणी के साथ उनके पसंद का एक गीत सुना जाए। अनीता सिंह लिखती हैं...

जरा सी देर क्या हुई मैं तों चूक ही गई (पहेली से)। चलिए मेरे प्रश्न का उत्तर अल्पना जी ने दे ही दिया है, तो अपनी एक फरमाइश तो रख ही सकती हूँ न! मुझे एक शरारती गाना बहुत पसंद है, यदि आपके पास हो तो सुनाईयेगा। ''हम गवनवा न जैबे हो बिना झुलनी" और "चाहे तो मोरा जिया लई ले सांवरिया"। दोनो सुचित्रा सेन, अशोक कुमार और धर्मेन्द्र की फिल्म के हैं। फ़िल्म का नाम ???? क्यों बताऊँ???

वाह अनीता जी, बेहद सुंदर दो गीतों की फ़रमाइश आपने भेजी है। अब फ़िल्म का नाम चाहे आप बताएँ या ना बताएँ, यह तो ज़्यादातर लोगों को ही पता होगा। चलिए फिर भी हम बता देते हैं, ये दोनों गीत फ़िल्म 'ममता' के हैं। संगीतकार रोशन की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही 'ममता' और इस फ़िल्म के सभी गानें बेहद सराहे गये थे। आज हम अनीता जी की फ़रमाइश पर सुनेंगे "हम गवनवा ना जैबे हो बिना झुलनी"। लेकिन गीत सुनवाने से पहले हम अपनी तरफ़ से इस गीत के बारे में कुछ जानकारी आपको दे दें!

अगर आप इस गीत को ध्यान से सुनें, तो आप इस गीत को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं। पहला भाग है "हम गवनवा न जैबे हो" (ठुमरी), दूसरा भाग है "सकल बन गगन पवन चलत पुर्वाई रे" (खमाज, बहार), और तीसरे भाग मे है "विकल मोरा मनवा उन बिन हाए" (पीलू, बसंत मुखाड़ी)। कम्पोज़िशन, संगीत संयोजन और रागों के इस्तेमाल पर अगर आप ग़ौर करें तो इन तीनों भागों को आप इंसान के जीवन के तीन भागों के रूप में भी देख सकते हैं। पहला हिस्सा बचपन का, दूसरे हिस्से में है यौवन और तीसरे हिस्से में है बुढ़ापा। इस गीत को प्रस्तुत करते हुए रोशन साहब ने यही बात विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में कहा था - "ममता फ़िल्म में ऐसी ही एक सिचुएशन बनी कि जिसमें बचपन, जवानी और बुढ़ापा को दर्शाना था संगीत के माध्यम से। तो ज़ाहिर है कि धुन ही पहले बनाई गई। जहाँ पे शब्दों की ज़्यादा अहमियत होती है, वहाँ गीत पहले लिखा जाता है।" दोस्तों इस गीत के लिए रोशन साहब को जितनी दाद मिलनी चाहिए, उतनी ही दाद मजरूह सुल्तानपुरी को भी मिलनी ही चाहिए। अक्सर यह मान लिया जाता है कि हिंदी के कठिन शब्द शायरी के प्रभाव में बाधा डालते हैं। पर मजरूह साहब ने विकल शब्दों का बड़ी ही कामयाबी और ख़ूबसूरती से प्रयोग कर के हमें दिया एक से सुंदर गीत, और यह गीत भी उन्हीं में से एक है। और रही बात इस गीत की गायिका लता जी की, अब उनकी तारीफ़ में कुछ कहने को बचा है भला! आइए सुनते हैं और अनीता सिंह जी का शुक्रिया अदा करते हैं इस गीत को चुनने के लिए।

गीत - हम गवनवा ना जैबे हो बिना झुलनी (ममता)


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। अगर आप भी ख़ानसाब की तरह हमें कुछ कहना चाहते हैं या अनीता जी की तरह कोई गीत सुनवाना चाहते हैं, तो हमें फ़ौरन ई-मेल करें oig@hindyugm.com के पते पर। अब हमें इजाज़त दीजिए, अगले शनिवार आप ही में से फिर किसी दोस्त के ईमेल के साथ हम हाज़िर होंगे। और हाँ, कल से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित शृंखला में एक बेहद अनूठी लघु शृंखला शुरु होने जा रही है। आप में से जिन जिन दोस्तों के स्पीकर काम नहीं करते, या फिर ऒडियो प्ले नहीं होते, उनसे ग़ुज़ारिश है कि जल्द ही उन्हें ठीक करा लें। बिना ऒडियो के आप इस शृंखला का मज़ा नहीं ले पाएँगे। तो कल फिर मिलेंगे, तब तक के लिए, नमस्कार!

प्रस्तुति: सुजॊय

Saturday, October 16, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने - जब माँ दुर्गा के विविध रूपों से मिलवाया लावण्या जी ने

'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के साथ हम हाज़िर हैं। जैसा कि नवरात्री और दुर्गा पूजा की धूम मची हुई है चारों तरफ़, और आज है महानवमी। यानी कि नवरात्री की अंतिम रात्री और दुर्गा पूजा का भी अंतिम दिन। कल विजयादशमी के दिन दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन से यह उत्सव सम्पन्न होता है। तो क्यों ना आज इस अंक में हम माता रानी की आराधना करें।

दोस्तों, हमने महान कवि, दार्शनिक और गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह जी से सम्पर्क किया कि वो अपने पिताजी के बारे में हमें कुछ बताएँ जिन्हें हम अपने पाठकों के साथ बाँट सकें। तब लावण्या जी ने ही यह सुझाव दिया कि क्यों ना नवरात्री के पावन उपलक्ष्य पर पंडित जी द्वारा संयोजित देवी माँ के कुछ भजन प्रस्तुत किए जाएँ। लावण्या जी के हम आभारी हैं कि उन्होंने हमारे इस निवेदन को स्वीकारा और ईमेल के माध्यम से हमें माँ दुर्गा के विविध रूपों के बारे में लिख भेजा और साथ ही पंडित जी के भजनों के बारे में बताया। तो आइए अब पढ़ते हैं लावण्या जी का ईमेल।

**********************

ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते !!


**********************

या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै , नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नमः||

माता पार्वती , उमा , महेश्वरी, दुर्गा , कालिका, शिवा , महिसासुरमर्दिनी , सती , कात्यायनी, अम्बिका, भवानी, अम्बा , गौरी , कल्याणी, विंध्यवासिनी, चामुन्डी, वाराही , भैरवी, काली, ज्वालामुखी, बगलामुखी, धूम्रेश्वरी, वैष्णोदेवी , जगधात्री, जगदम्बिके, श्री, जगन्मयी, परमेश्वरी, त्रिपुरसुन्दरी ,जगात्सारा, जगादान्द्कारिणी, जगाद्विघंदासिनी ,भावंता, साध्वी, दुख्दारिद्र्य्नाशिनी, चतुर्वर्ग्प्रदा, विधात्री, पुर्णेँदुवदना,

निलावाणी, पार्वती, सर्वमँगला,सर्वसम्पत्प्रदा,शिवपूज्या,शिवप्रिता, सर्वविध्यामयी, कोमलाँगी, विधात्री, नीलमेघवर्णा, विप्रचित्ता, मदोन्मत्ता, मातँगी

देवी , खडगहस्ता, भयँकरी,पद्मा, कालरात्रि, शिवरुपिणी, स्वधा, स्वाहा, शारदेन्दुसुमनप्रभा, शरद्`ज्योत्सना, मुक्त्केशी, नँदा, गायत्री , सावित्री, लक्ष्मी , अलँकार सँयुक्ता, व्याघ्रचर्मावृत्ता, मध्या, महापरा, पवित्रा, परमा, महामाया, महोदया, इत्यादी देवी भगवती के कई नाम हैँ|

समस्त भारत मेँ देवी के शक्ति पीठ हैँ -

१) कामरूप पीठ
२) काशिका पीठ
३) नैपल्पिथ
४) रौद्र -पर्वत
५) कश्मीर पीठ
६) कान्यकुब्ज पीठ
७) पूर्णागिरी पीठ
८) अर्बुदाचल पीठ
९) अमृत केश्वर पीठ
१०) कैलास पीठ
११) शिव पीठ
१२) केदार पीठ
१३) भृगु पीठ
१४) कामकोटी पीठ
१५) चंद्रपुर पीठ
१६) ज्वालामुखी
१७) उज्जयिनी पीठ इत्यादी

भारत के हर प्राँत मेँ देवी के विविध स्वरुप की पूजा होती है और भारत के कई शहर देवी के स्वरुप की आराधना के प्रमुख केन्द्र हैँ।

शक्ति पूजा की अधिष्ठात्री दुर्गा देवी पूरे बँगाल की आराध्या काली कलकत्ते वाली "काली" भी हैँ,
और गुजरात की अम्बा माँ भी हैँ,
पँजाब की जालन्धरी देवी भी वही हैँ
तो विन्ध्य गुफा की विन्ध्यवासिनी भी वही
माता रानी हैँ जो जम्मू मेँ वैष्णोदेवी कहलातीँ हैँ
और त्रिकुट पर्बत पर माँ का डेरा है ॥
आसाम मेँ ताँत्रिक पूजन मेँ कामाख्या मँदिर बेजोड है ॥
तो दक्षिण मेँ वे कामाक्षी के मँदिर मेँ विराजमान हैँ
और चामुण्डी परबत पर भी वही हैँ
शैलपुत्री के रुप मेँ वे पर्बताधिराज हिमालय की पुत्री पार्बती कहलातीँ हैँ
तो भारत के शिखर से पग नखतक आकर,
कन्याकुमारी की कन्या के रुप मेँ भी वही पूजी जातीँ हैँ ॥
महाराष्ट्र की गणपति की मैया गौरी भी वही हैँ
और गुजरात के गरबे और रास के नृत्य ९ दिवस और ९ रात्रि को
माता अम्बिके का आह्वान करते हैँ ..
शिवाजी की वीर भवानी रण मेँ युद्ध विजय दिलवाने वाली वही हैँ --
गुजरात में, माँ खोडीयार स्वरूप से माता पूजी जातीं हैं

आइये देवी माँ की भक्ति में डूब जाएँ स्वर साम्राज्ञी सुश्री लता मंगेशकर के गाये ये भजन सुनिए, शब्द संयोजन पण्डित नरेंद्र शर्मा (मेरे पिताजी) का है और संगीत से संवारा है पण्डित ह्रदयनाथ मंगेशकर जी ने ! ऐल्बम का नाम है : महिमा माँ जगदम्बा की !




- लावण्या

*****************************************************

तो ये था पंडिर नरेन्दर शर्मा जी की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह जी के ईमेल पर आधारित आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। आप सभी को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए आज आप से आज्ञा ले रहे हैं, नमस्कार!



प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

Saturday, October 2, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (१०) - ऐसीच हूँ मैं कहकर इंदु जी जीत लेती हैं सबका दिल

'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। "आज है २ अक्तुबर का दिन, आज का दिन है बड़ा महान, आज के दिन दो फूल खिले हैं, जिनसे महका हिंदुस्तान, नाम एक का बापू गांधी और एक लाल बहादुर है, एक का नारा अमन एक का जय जवान जय किसान"। समूचे 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और महान नेता लाल बहादुर शास्त्री को उनकी जयंती पर स्नेह नमन अर्पित करते हुए आज का यह अंक शुरु कर रहे हैं। 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', दोस्तों, यह 'आवाज़' का एक ऐसा साप्ताहिक स्तंभ है जिसमें हम आप ही की बातें करते हैं जो आप ने हमें ईमेल के माध्यम से लिख भेजा है। यह सिलसिला पिछले १० हफ़्तों से जारी है और हर हफ़्ते हम आप ही में से किसी दोस्त के ईमेल को शामिल कर आपके भेजे हुए यादों को पूरी दुनिया के साथ बाँट रहे हैं। आज के अंक के लिए हम चुन लाये हैं हमारी प्यारी इंदु जी का ईमेल और उनकी पसंद का एक निहायती ख़ूबसूरत गीत। आइए अब आगे का हाल इंदु जी से ही जानें।

**********************************************************
कुछ बड़े प्यारे गाने हैं, जिनको भी सुनाया, आश्चर्य! सबने कहा 'हमने इन्हें पहले नही सुने'। उस खजाने मे से अभी सिर्फ एक गीत आपको भेज रही हूँ। आप सुनिए और ओनेस्टली बताइए कि क्या आपने या सुजॉय ने इस गाने को पहले कभी सुना है? यह गाना है फ़िल्म 'दूज का चाँद' का, "चाँद तकता है इधर", मोहम्मद रफ़ी और सुमन कल्याणपुर ने गाया है। अगर मुझसे पूछोगे कि ये गाना मुझे क्यों पसंद है? क्यों बताऊँ जी? ये कोई बात हुई? वृन्दावन गई थी, सोचा बरसाना भी हो आये 'वियोगिनी राधाजी' के दर्शन ही हो जाये? यूँ अपनी कल्पना और बनाई छवि के विपरीत पाया वहाँ सब। सिवाय प्रत्येक पेड़ पर लिखे 'राधे रानी' के नाम के। वर्तमान ब्रज से आँखें मूँद मैं 'उस' ब्रज में घूमती रही। कालिंदी के तट पर जा कर हम बैठ गए। तभी बड़े बेटे ने कहा -'मम्मी ! देखो कितना प्यारा गाना बज रहा है!' वो यही गाना था। "चाँद तकता है इधर आओ कही छुप जाए, कहीं लागे ना नजर आओ कही छुप जाएँ"। गाना मधुर था। प्रेम रस में डूबा हुआ। कहीं ऐसा कुछ नही था कि कोई गम्भीर हो जाये। मैं आँखें बंद कर कालिंदी के तट पर ये गीत सुनती रही। सुन रही थी, फिल्म या नायक नायिका के नाम से तक परिचित नही थी। इसलिए आँखों के सामने कोई नही आया। आया तो सिर्फ कृष्ण....... और मैं??? जैसे राधा थी उस पल। ऐसीच हूं मैं। जाने किस दुनिया की अजीब 'प्राणी'............ इस साधारण से प्रेम गीत ने मुझे भाव विभोर कर दिया और आज भी कर देता है। और मेरे आँसू तब भी नही रुके....आज भी नही रुकते। मैं नही रहती तब आपकी इस दुनिया का हिस्सा। इसीलिए मुझे पसंद है ये गाना, मुझे एकाकार कर देता है 'उससे', फिर मुझे किसी भजन या भक्ति गीत की आवश्यकता नही रहती बाबा! ऐसिच हूं मैं।

इंदु।

*********************************************
वाह इंदु जी, आपके अंदाज़-ए-बयाँ के तो कहने ही क्या! एक बेहद सुमधुर गीत की तरफ़ आपने हमारा ध्यान आकृष्ट करवाया है। सिर्फ़ हम ही नहीं, इस गीत को बहुत लोगों ने एक लम्बे अरसे से नहीं सुना होगा। यह हमारी बदक़िस्मती ही है कि ऐसे और इस तरह के न जाने कितने सुरीले गीतों पर वक़्त का धूल चढ़ चुकी है। आइए हम सब मिल कर इस तरह के गीतों पर जमी मैल को साफ़ करें और उन्हें 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का हिस्सा बनायें। साहिर लुधियानवी के बोल, रोशन की तर्ज़, और आवाज़ को बता ही चुके हैं, रफ़ी और सुमन की। सुनते हैं फ़िल्म 'दूज का चाँद' का यह बेहद सुरीला नग़मा।

गीत - चाँद तकता है इधर (दूज का चाँद)


दोस्तों, इंदु जी की तरह अगर आप भी ऐसे ही किसी गीत की तरफ़ हमारा ध्यान आकृष्ट करवाना चाहते हैं तो हमें ईमेल करें oig@hindyugm.com के पते पर। इसके अलावा आप अपने जीवन की कोई यादगार घटना, कोई संस्मरण, या कोई ऐसा गीत जिसके साथ आपकी यादें जुड़ी हुई हैं, हमें लिख भेजें इस स्तंभ के लिए। ख़ास कर हमारे उन दोस्तों से, जिन्होंने अभी तक हमें ईमेल नहीं किया है, उनसे तो हमारा ख़ास निवेदन है कि इस स्तंभ में भाग लेकर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' परिवार का हिस्सा बन जायें। साथ ही 'ओल्ड इज़ गोल्ड' को और भी बेहतर बनाने के लिए अगर आपके पास कोई सुझाव हो, तो उसे भी आप oig@hindyugm.com पर लिख सकते हैं। तो इसी उम्मीद के साथ कि आप अपना साथ युंही बनाये रखेंगे, आज के लिए हम विदा लेते हैं, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमीत कड़ी के साथ हम फिर हाज़िर होंगे कल शाम भारतीय समयानुसार ६:३० बजे। नमस्कार!

प्रस्तुति: सुजॊय

Saturday, September 25, 2010

ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने - लता विशेषांक

'ओल्ड इज़ गोल्ड' शनिवार विशेष में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। इन दिनों इस साप्ताहिक स्तंभ में हम लेकर आ रहे हैं आप ही के ईमेलों पर आधारित 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि २८ सितंबर को सुर कोकिला लता मंगेशकर का जन्मदिन है। लता जी को जनमदिन की बधाई और शुभकामना स्वरूप आज के इस अंक के लिए हम लेकर आये हैं एक विशेष प्रस्तुति जिसे हमने तैयार किया है हमारे दो साथियों के ईमेलों के आधार पर। और ये दो साथी हैं हमारी प्यारी गुड्डो दादी, और हमारी एक नई दोस्त अनीता निहालानी, जो ईमेल के माध्यम से कुछ ही दिन पहले हमसे जुड़ी हैं।

तो आइए सब से पहले पढ़ें कि गुड्डो दादी का क्या कहना है लता जी के बारे में।

सुजॉय बेटा

चिरंजीव भवः

सुर-साम्राज्ञी, भारत की बगिया की कोकिला, लता जी को जन्मदिवस की शुभ मंगल कामनाएँ। १९४७ में संगीतकार पंडित हुस्नलाल जी के घर मिली थी परिवार के साथ। फिर लता जी को शायद १९९० में शिकागो में मिली थी, दो मिनट ही बात हो सकी। सफ़ेद साड़ी लाल बोर्डर के सादे परिधान में बहुत ही सुंदर लग रही थी। स्वर साधना की देवी से मैंने यही पूछा की आप जूते पहन के स्टेज पर क्यों नहीं जातीं, तो यही बोली कि संगीत को नमस्कार मान सम्मान है और मेरे मुख से यही निकला की आपके गीतों का जादू सर पर चढ़ कर गूंजता है, बोलता है, तो मुस्करा दीं। दादी को इतना ही याद है। लता जी का एक गीत फ़िल्म 'महल' का "आएगा आनेवाला" प्रतिदिन सुनती हूँ।

आशीर्वाद के साथ
आपकी गुड्डोदादी
चिकागो से

तो दादी, क्योंकि फ़िल्म 'महल' का यह गीत अभी तक हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शामिल नहीं किया है, तो आइए आज आप की इस मनपसंद गीत को यहाँ सुना जाए। जे. नक्शब के बोल और खेमचंद प्रकाश का संगीत।

गीत - आयेगा आनेवाला (महल)


और अब हम आते हैं अनीता निहालानी जी के ईमेलों पर। जी हाँ, इनके दो ईमेल हमें मिले हैं। एक में इन्होंने लता जी पर एक बहुत ही सुंदर कविता लिख कर भेजी हैं, और दूसरे में लता जी के गाये एक गीत से जुड़ी अपनी यादों को लिख भेज है। तो आइए पहले अनीता जी की लिखी कविता का आनंद लिया जाए।


अनीता जी के साथ साथ हम सभी लता जी को जनमदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। और आइए अब पढ़ें अनीता जी का दूसरा ईमेल।

सुजोय जी,

लता जी के गीत सुनकर हम बड़े हुए, उन दिनों रेडियो पर दिन-रात उनके गीत बजा करते थे, उन्हें जन्म दिन पर बधाई दे सकूं यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है। २५ सितम्बर का मुझे इंतजार रहेगा।

अब रही यादों की बात....तो बात लगभग २६-२७ साल पुरानी है। उस दिन आकाश में मेघ छाए थे, अत्यंत शीतल पवन बह रहा था। मेरे विवाह की बात चल रही थी, खबर आयी भावी पतिदेव को एक साल की ट्रेनिंग के लिये असम जाना है, उससे पहले वे लोग मंगनी की रस्म कर लेना चाहते हैं। जुलाई का महीना था, उन्हें सुबह किसी वक्त पहुंचना था, मैंने हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी थी, घर के बांयी और छोटी सी बगीची थी, पुष्प सज्जा के लिये फूल लेने गयीं तभी हवा और तेज हो गयीं, साड़ी का आंचल लहराता हुआ पेड़ की टहनी में अटक गया, हाथ में एक बांस की टोकरी थी, नीचे पानी था, वर्षा बस थमी भर थी। मन में उत्सुकता थी, सब का असर यह हुआ की मैं गिरने ही वाली थी, यह सब कुछ ही पलों में घटा था, तभी भीतर ट्रांजिस्टर पर यह गीत बज उठा "पल भर में यह क्या हो गया...", मैं खुद को सम्भालूँ, इसके पूर्व ही देखा कि मेरे भावी पतिदेव अपने माता-पिता के साथ प्रवेश कर रहे हैं, मैंने घबराते हुए साड़ी का पल्लू छुडाने का प्रयास किया कि टोकरी से फूल नीचे गिर गए, तभी उन्होंने आकर फूल उठाये और मुझे अंदर ले गए, गीत बज रहा था... मैं वह गयीं वह दिल गया....प्यार से तुम बुलाना....आज इतने वर्षों बाद भी जब यह गीत बजता है वह बारिश, हवा और फूल मुझे सिहरा जाते हैं...

अनिता


वाह अनीता जी, सचमुच कुछ गीत हमारे जीवन के साथ ऐसे जुड़ जाते हैं कि फिर जब भी ये गीत कहीं से सुनाई दे जाए तो जैसे एक सिहरन सी दौड़ जाती है तन मन में। आइए आप के इस पसंदीदा गीत का आनंद लें लता जी की आवाज़ में, फ़िल्म 'स्वामी', गीतकार अमित खन्ना और संगीतकार राजेश रोशन।

गीत - पल भर में यह क्या हो गया (स्वामी)


तो ये था इस सप्ताह का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' जिसे हमने प्रस्तुत किया लता जी को उनके जनमदिन की बधाई स्वरूप। इस अंक के लिए हम ख़ास तौर से गुड्डो दादी और अनीता निहालानी जी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने िस अंक के लिए हमें अपना सहयोग दिया। तो अब आज के लिए इजाज़त दीजिए, कल फिर मुलाक़ात होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमीत अंक में। ज़रूर पधारिएगा, नमस्कार!

Saturday, September 18, 2010

ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने - जब १९५२ में लता ने जनमदिन की बधाई दी थी नूरजहाँ को

ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। इस साप्ताहिक स्तंभ में हम आप तक हर हफ़्ते पहूँचाते हैं आप ही के ईमेल में लिखी हुई आप ही की यादें। और आज है इस सिलसिले की आठवीं कड़ी। दोस्तों, आज हम जिस ईमेल को शामिल करने जा रहे हैं, उसे हमें किसने भेजा है यह तो हम भी नहीं जानते। दरअसल ना तो उन्होंने अपना नाम लिखा है और ना ही उनके ईमेल आइ.डी से उनके नाम का पता चल पाया है। लेकिन ज़रूरी बात यह कि जिन्होंने भी यह ईमेल भेजा है, बड़ा ही कमाल का और दुर्लभ तोहफ़ा हमें दिया है जिसके लिए "धन्यवाद" शब्द भी फीका पड़ जाए। दोस्तों, इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित कड़ियों में आप लता मंगेशकर पर केन्द्रित शृंखला का आनंद ले रहे हैं। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए इस शख़्स ने हमें यह ईमेल भेजा जिसमें 'स्क्रीन' पत्रिका के एक बहुत ही पुराने अंक से खोज कर लता जी का एक लेख है भेजा है जिसमें लता जी ने मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ जी को बड़े शिद्दत के साथ याद करते हुए उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी थीं। आज १८ सितंबर है और २१ सितंबर को नूरजहाँ जी का जन्मदिवस है। ऐसे में आज की कड़ी में इस लेख को शामिल कर पाना हम सब के लिए सौभाग्य की बात है। जिन्होंने भी हमें यह ईमेल भेजा है, उन्हें हम तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। लीजिए इस लेख को आप भी पढ़िए। 'टीयर्स ऒफ़ जॊय' के शीर्षक से यह लेख प्रकाशित हुई थी 'स्क्रीन' पत्रिका के २६ सितंबर १९५२ के अंक में, यानी कि आज से लगभग ६० साल पहले।

*******************************************************

TEARS OF JOY

(Screen, 26th Sept. 1952)

SEPTEMBER 21 was Noor Jehan's birthday and I, who consider myself her bosom friend and disciple, today pay tribute to her genius through the columns of 'Screen'.

They say, absence makes the heart grow fonder. I only know that our separation has given me great pain and even now, when I reminisce about the time we spent together, my mind rebels against the conditions that have erected a barrier between us.

Noor Jehan's innumerable fans console themselves by listening to her records and I also have to content myself with them. But when the desire to hear her in person grows too strong, I seek help of a telephone and we come together over a distance of hundreds of miles.

To see her again after years of separation, I undertook a journey to Jullunder (Jalandhar) not long ago and we met with cries of joy on the border line between India and Pakistan. I shall ever cherish those moments when tears coursed down her cheeks as she embraced me, tears that spoke of her affection for me.

People have wondered at our deep attachment, perhaps because they think we ought to share a professional rivalry. To them, I want to say that Noor jehan is like an elder sister to me (indeed I address her as 'didi'), that she is in a sense my "Guru" for I have always kept her enchanting voice as my ideal.

Even now as I pen these lines of homage to her, whom I deem my ideal, the greatest of them all, I find mere words inadequate. I pray to God that Noor jehan be blessed with happiness and prosperity and live to see many more birthdays.

Lata Mangeshkar.

***********************************************************

आज के इस ईमेल के बाद अब बारी आती है गीत सुनवाने की। कौन सा गाना सुनवाएँ आपको? लता जी से कुछ चाहनेवालों ने ट्विटर पर पूछा था कि उन्हें नूरजहाँ जी का गाया कौन सा गीत सब से ज़्यादा पसंद है। इसका उन्होंने यही जवाब दिया था कि उन्हें उनके सभी गानें बेहद पसंद है। साथ ही लता जी ने यह भी कहा था कि नूरजहाँ जी को लता जी का गाया जो गीत सब से ज़्यादा पसंद था, वह है फ़िल्म 'रज़िया सुल्तन' का "ऐ दिल-ए-नादान"। तो दोस्तों, क्योंकि आज लता जी और नूरजहाँ जी की एक साथ बात चली है, तो क्यों ना नूरजहाँ जी का पसंदीदा लता नंबर हो जाए! जाँनिसार अख़्तर का लिखा, ख़य्याम साहब का स्वरबद्ध किया हुआ गीत है। पिछले साल आइ.बी.एन-७ पर जावेद अख़्तर साहब ने जब लता जी को उनका सब से पसंदीदा गीत कौन सा है पूछा था, तब शुरु शुरु में तो लता जी यह कह कर सवाल को टाल दिया कि कोई एक गीत बताना मुश्किल है, लेकिन जावेद साहब के ज़ोर डालने पर उन्होंने इसी गीत का उल्लेख किया यह सोचे बग़ैर कि इसे जावेद साहब के पिताजी ने लिखा है। जावेद साहब ने कहा था, "लता जी, आप ने अपने हज़ारों गीतों में से एक गीत को चुना, और वह गीत मेरे वालिद साहब का लिखा हुआ है"। यह सुनते ही लता जी भी चौंक उठीं क्योंकि शायद उन्होंने जवाब देते हुए इस ओर ध्यान नहीं दिया था कि इसके गीतकार जाँनिसार साहब हैं।

और अब ख़य्याम साहब बता रहे हैं इसी गीत के बारे में विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में - "रज़िया सुल्तान आज से ७०० या ७५० बरस पुराना क़िस्सा है। और रज़िया सुल्तान और उनके वालिद, दि एम्पेरर, अल्तमश, ये लोग तुर्की से आए थे यहाँ हिंदुस्तान में। तो ये तारीख़ ने हमें बताया कि ये तुर्की से आए थे यहाँ, यूरोप से। वो किस रास्ते से आए, पहले मैंने यह मार्क किया। इराक़ है, इरान है, उसके बाद ये सेन्ट्रल एशिया, जो पहले रूस में थी, और उसके बाद ये आए दर-ए-ख़ाइबर के रास्ते। ज़ाहिर है उस ज़माने में ना हवाई जहाज़ था, मा मोटर गाड़ी थी, तो कारवाँ चलता था, या काफ़िले चलते थे। तो ५० माइल या ४० माइल चलते होंगे, उसके बाद पड़ाव डालते होंगे। तो रात को कुछ दिल बहलाने की बातें भी होती ही होंगी। तो वो किस साज़ और अंदाज़ गाने का, ये सब वहाँ से, और ये जो दर-ए-ख़ाइबर (ख़ाइबर पास) से होते हुए, यानी पेशावर से होते हुए, उस रास्ते से हमारे भारत में आए। भारत में आके, इन लोगों को भारत इतना अच्छा लगा कि इन्होंने अपना वतन बना लिया इसको। तो इन लोगों के जो जो साज़ होते हैं, कुछ टर्किश, कुछ अरबी, इरानी और हमारे भारत के साज़। तो उनका ब्लेण्डिंग् है ये। तो ब्लेण्डिंग्‍ ऐसी हुई, जो ऒर्केस्ट्रेशन ऐसी हुई, जो सुर ऐसे लगे इस धुन में भी। जैसे गाते हैं, तो वो अनोखापन इसमे, और लता जी की आवाज़, और फिर बहुत ज़हीन हैं लता जी, और तो क्या कहने, जो सुप्रीमो लफ़्ज़ है वह भी छोटा सा है उनके लिए। और ये जाँनिसार अख़्तर साहब का लिखा हुआ नग़मा है। और कमाल अमरोही साहब के क्या कहने जिन्होंने राइटिंग् की है। और मेकिंग् में कोई कॊम्प्रोमाइज़ नहीं की उन्होंने। जितनी किताबें उन्होंने पढ़ी, सब मुझे दी उन्होंने और उतनी ही स्टडी मैंने भी की। तब जाके यह बात आई।"

गीत - ऐ दिल-ए-नादान (रज़िया सुल्तान)


ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। हमें पूरी उम्मीद है कि आपको भाया होगा। आपको 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का यह साप्ताहिक विशेषांक कैसा लग रहा है, इसे हम और भी बेहतर और दिलचस्प किस तरह से बना सकते हैं, इसके लिए आप अपने विचार और सुझाव हमें oig@hindyugm.com पर लिख सकते हैं। हमें आपके ईमेल का इंतेज़ार रहेगा। इस स्तंभ को युंही बरकरार रखने के लिए हमें सब से ज़्यादा सहयोग आप ही मिल सकता है। अपने जीवन के यादगार घटनाओं को हमारे साथ बाँटिए इस स्तंभ में। इसी उम्मीद के साथ कि आप दोस्तों के ईमेलों से हमारा मेल बॊक्स भर जाएगा, आज के लिए हम विदा लेते हैं, लता जी के गाए एक बेहद दुर्लभ गीत के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' आपकी सेवा में फिर हाज़िर होगा कल शाम भारतीय समयानुसार ६:३० बजे। नमस्कार!


प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ