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Monday, February 19, 2018

चित्रकथा - 56: फ़िल्मों में फ़ैज़

अंक - 56

फ़िल्मों में फ़ैज़


"ये वो सहर तो नहीं..."




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 54-वीं कड़ी है।

13 फ़रवरी को उर्दू के मशहूर शायर और लेखक फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की 108-वीं जन्म-जयन्ती दुनिया भर में मनायी गई। बामपंथी विचारधारा रखने वाले फ़ैज़ को अपने उसूलों के लिए जेल भी जाना पड़ा और अपने वतन से आत्मनिर्वासित भी हुए। मार्क्सवादी फ़ैज़ को 1962 में सोवियत संघ ने ’लेनिन शान्ति पुरस्कार’ से सम्मानित किया। साहित्य में उनके अमूल्य योगदान के लिए पाक़िस्तान सरकार ने 1990 में उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान ’निशान-ए-इम्तियाज़’ से सम्मानित किया। फ़ैज़ की ग़ज़लों और कविताओं को कई बार फ़िल्मों में भी जगह मिली है। आइए आज ’चिरकथा’ में हम नज़र डालें उन फ़िल्मों पर जिनमें मौजूद है फ़ैज़ की शायरी और उनकी कविताएँ।






फ़ैज़ का जन्म 1911 में हुआ था। फ़िल्मों में उनके योगदान की बात करें तो 35 साल की उम्र में उन्होंने इस ओर रुख़ किया और 1947 में पहली बार किसी फ़िल्म में उनकी रचना सुनाई दी। बम्बई में निर्मित यह फ़िल्म थी ’रोमियो ऐण्ड जुलियट’। हुस्नलाल-भगतराम के संगीत में फ़ैज़ की लिखी कविता "दोनों जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के" को गाया ज़ोहरा अम्बालेवाली और शर्माजी ने। ये शर्माजी और कोई नहीं बल्कि हमारे संगीतकार ख़य्याम साहब हैं जो उन दिनों साम्प्रदायिक अस्थिरता के चलते अपना नाम बदल लिया था। रोमियो-जुलियट की मोहब्बत को किस ख़ूबसूरती से फ़ैज़ ने इस गीत में उभारा है, ज़रा पढिये - "मैं तेरी मूरत बस निहार के, दोनों जहाँ में तेरी मोहब्बत में हार के, रोता जा रहा है कोई, सद-ए-ग़म गुज़ार के। विरह, मयकदा, ख़ुमार, सावन उदास है, तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के। एक फ़ुर्सत-ए-निगाह मिली, वो भी चार दिन, देखें है हमने खाकले प्रवरदिगार के।" कुछ लोगों का ख़याल है कि इस ग़ज़ल में ख़य्याम की नहीं बल्कि जी. एम. दुर्रानी की आवाज़ है, लेकिन ख़य्याम साहब ने एक साक्षात्कार में बताया है कि यह उन्हीं का गाया हुआ है। अविभाजित भारत के पंजाब में जन्में फ़ैज़ ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी में नौकरी की और मेडल भी जीते। 1947 में भारत को आज़ादी मिली और फ़ैज़ हो गए सरहद के उस पार। पाक़िस्तान में वो The Pakistan Times के सम्पादक के पद पर कार्य किया और कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रीय सदस्य रहे। 1951 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया लिआक़त सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के जुर्म में, और उन्हें जेल में डाल दिया गया।

चार साल जेल में क़ैद रहने के बाद जब वो बाहर निकले, तब तक वो बहुत ज़्यादा मशहूर हो चुके थे। जब वो जेल से रिहा हुए तब वो एक नायक बन चुके थे। उन्ही दिनों मशहूर फ़िल्मकार ए. आर. कारदार के पुत्र ए. जे. कारदार ने उन्हें अपनी एक फ़िल्म के लिए स्क्रिप्ट लिखने का न्योता दिया। फ़ैज़ ने अपनी पसन्दीदा उपन्यास ’The Boatman of the Padma’ (माणिक बन्दोपाध्याय की क्लासिक उपन्यास ’पद्मा नदीर मांझी का अंग्रेज़ी अनुवाद) को चुना और बंगाल के मछुआरों के जीवन पर आधारित इस उपन्यास पर स्क्रिप्ट लिखी। फ़िल्म के निर्देशन में भी फ़ैज़ ने सक्रीय भूमिका अदा की। ’जागो हुआ सवेरा’ शीर्षक से इस फ़िल्म का निर्माण 1959 में पूरा हुआ और फ़िल्म प्रदर्शित हुई। बॉक्स ऑफ़िस में फ़िल्म ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया लेकिन कई अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म उत्सवों में इस फ़िल्म ने वाहवाही लूटी। इससे पहले भी फ़ैज़ की एक कविता पर फ़िल्म बनाने की कोशिश हुई थी। ’हम तो तरीक राहों में मारे गए’ नामक कविता (जो अमरीकी दम्पति जुलियस और इथेल रोज़ेनबर्ग के जीवन पर आधारित है) पर यह फ़िल्म बननी थी पर अन्तत: नहीं बन पायी। बाद के सालों में भी फ़ैज़ ने कई बार फ़िल्में बनाने की योजना बनाई लेकिन हर बार किसी ना किसी वजह से फ़िल्म नहीं बन सकी। उनकी एकमात्र अंग्रेज़ी कविता ‘The Unicorn and the Dancing Girl’ पर आधारित एक वृत्तचित्र बनाई गई जिसमें मोहेंजोदारो के अवशेषों से बरामद दो कलाकृतियों की बातें हैं। यह फ़िल्म 1963 में UNESCO के तत्वावधान में बनी थी और इसमें मानव सभ्यता की यात्रा का वर्णन है। फ़ैज़ ने फ़िल्म निर्माण को एक कला समझा, और उन्हें यह बात बहुत चुभती थी कि सभी रचनात्मक क्रियाओं को "कला" लेकिन फ़िल्म को "इंडस्ट्री" कहा जाता है। ये तमाम बातें हमें प्राप्त हुईं फ़ैज़ की जीवनी Love and Revolution: Faiz Ahmed Faiz – The Authorised Biography से जिसे लिखा अली मदीह हाशमी ने।

अब ज़िक्र फ़ैज़ के लिखे गीत और ग़ज़लों की जिन्हें हमने सुने हमारी फ़िल्मों में। 1962 की पाक्सितानी फ़िल्म ’क़ैदी’ में मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ ने गाया फ़ैज़ का मशहूर कलाम "मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग"। इसे स्वरबद्ध किया था संगीतकार राशिद आत्रे ने। 1953-54 के आसपास नूरजहाँ और उनके पति शौकर हुसैन रिज़्वी के बीच वैवाहिक तनावों के चलते दोनों के बीच तलाक़ हो गया, और 1959 में नूरजहाँ ने फ़िल्म अभिनेता एजाज़ दुर्रानी से शादी कर ली। दुर्रानी के दवाबों के चलते नूरजहाँ को अभिनय छोड़ना पड़ा और उनके अभिनय-गायन से सजी अन्तिम फ़िल्म 1961 में आयी ’मिर्ज़ा ग़ालिब’। इसके बाद सिर्फ़ गायन का सफ़र जारी रखते हुए 1962 में ’क़ैदी’ में फ़ैज़ के इस ग़ज़ल को गा कर वो फिर एक बार शोहरत की बुलंदी पर पहुँच गईं। इस नज़्म के बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। जिस दिन फ़ैज़ को जेल से रिहा किया जा रहा था, उस दिन नूरजहाँ जेल के बाहर उनका इन्तज़ार कर रही थीं। फ़ैज़ के जेल से रिहा होने की ख़ुशी में उनके तमाम दोस्तों ने जश्न मनाने का फ़ैसला किया। उस जश्न में नूरजहाँ भी शामिल थीं और सभी ने उनसे गाने की गुज़ारिश की। नूरजहाँ ने उस दिन फ़ैज़ की ही नज़्म "मुझसे पहली सी मोहब्बत..." को नग़मे के रूप में गा कर सुनाया जिसे उन्होंने उसी वक़्त ख़ुद कम्पोज़ भी किया बिना किसी साज़ के सहारे। उसे सुन कर हर कोई आश्चर्यचकित हो गए। बाद में फ़ैज़ जब भी इस नज़्म को पढ़ते, इसमें वो नूरजहाँ का नाम ज़रूर शामिल करते क्योंकि उनके अनुसार नूरजहाँ की वजह से इस नज़्म में रूह आ गई थी। फ़िल्म ’क़ैदी’ में जब यह नज़्म सुनाई दी, तब इसे और भी अधिक लोकप्रियता मिली और सरहदों को पार कर दुनिया भर में मशहूर हो गई। 

"मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग" में फ़ैज़ कहते हैं - "मैनें समझा था कि तू है तो दरख़शां है हयात, तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है, तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात, तेरी आखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है..."। इसी से प्रेरित हो कर हमारे यहाँ के शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने 1969 की फ़िल्म ’चिराग़’ में मुखड़ा लिखा "तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है"। मजरूह के लिखे इस गीत को भी ख़ूब लोकप्रियता मिली और आज यह एक सदाबहार नग़मा बन चुका है। ऐसी था फ़ैज़ के अल्फ़ाज़ों का जल्वा! नूरजहाँ द्वारा इस नज़्म को अत्यधिक लोकप्रिय बनाने के बाद जब भी कभी फ़ैज़ को इस नज़्म को पढ़ने का दरख्वास्त मिलता, वो उसे खारिज कर देते यह कहते हुए, "वो गीत अब मेरा कहाँ, नूरजहाँ का हो गया है!" उनके हिसाब से भले उन्होंने इसे लिखा हो, पर नूरजहाँ ने इसे अपनी आवाज़ और अंदाज़-ए-बयाँ से रूह भर दी है, और इसलिए इस नज़्म पर सिर्फ़ उन्हीं का हक़ है। ऐसे थे फ़ैज़ और उनकी शख़्सियत!

भारत में बनने वाली फ़िल्मों की अगर बात करें तो 1965 की शम्मी कपूर - जयश्री अभिनीत फ़िल्म ’जानवर’ में फ़ैज़ की लिखी क़ता को शामिल किया गया - "रात यूं दिल में तेरी खोयी हुई याद आई, जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए, जैसे सेहराओं में हौले से चले बाद-ए-नसीम, जैसे बीमार को बे-वजह क़रार आ जाए"। आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ों में इसे स्वरबद्ध किया शंकर जयकिशन ने। इस गीत की ख़ास बात यह है कि इसमें कोई रीदम नहीं है, कम से कम साज़ों के इस्तमाल से इसे शम्मी कपूर और जयश्री एक नाव में नदी की सैर करते हुए एक दूसरे से बातचीत के रूप में कर रहे हैं, लेकिन पूरे सुर में और शायराना अंदाज़ में भी। इसके बाद एक लम्बे अन्तराल के बाद 1982 की मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्म ’आगमन’ में फ़ैज़ को सुनाई दिया। इस फ़िल्म का निर्माण Uttar Pradesh Sugarcane Seed and Development Corporation ने किया था Integrated Films के बैनर तले। फ़िल्म में गन्ने के को-ऑपरेटिव सोसायटी की राजनीति और तौर-तरीकों को दिखाया गया था। फ़िल्म को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली। फ़िल्म की सबसे ख़ास बात यह थी कि इसके संगीतकार थे उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ और गाने लिखे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और हसरत जयपुरी ने। फ़ैज़ के लिखे नग़मों की बात करें तो पहला नग़मा एक नज़्म है "ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर, वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं..."। इसे तीन भागों में फ़िल्म में शामिल किया गया है। पहला और तीसरा भाग अनुराधा पौडवाल ने गाया है जबकि दूसरा भाग उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ साहब ने ही गाया है। दूसरा नग़मा फ़ौज़ की एक कविता का हिस्सा है। "दरबार-ए-वतन में जब इक दिन, सब जाने वाले जाएंगे, कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएंगे", ये हैं इस कविता की पहली लाइनें। दस लाइनों की इस कविता का पाँच, छह, सात और आठवें लाइनों को लेकर यह गीत बनाया गया है "अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें, अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं, जो दरिया झूम के उठे हैं, तिनकों से ना टाले जाएंगे..."। इस गीत के भी दो संस्करण हैं, एक हरिहरन की एकल स्वर में और दूसरे में हरिहरन के साथ हैं उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा साहब। फ़ैज़ का लिखा फ़िल्म का अगला नग़मा एक ग़ज़ल है "जुनूं की याद मनाओ कि जश्न का दिन है, सलीब-ओ-दार सजाओ कि जश्न का दिन है"। इसे हरिहरन ने गाया है। ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ की गाई एक और नज़्म है "निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ, चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले, जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले, नज़र चुरा के चले जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले"।


फ़ैज़ की शायरी और लेखनी में मज़दूरों की बातें हैं, समानता की बातें हैं। इसलिए अक्सर उनकी कविताओं, नज़्मों और ग़ज़लों को ऐसी फ़िल्मों के लिए चुनी जाती हैं जिनमें इस तरह की विषयवस्तु होती है। ’आगमन’ के अगले ही साल 1983 में आई बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्म ’मज़दूर’ जिसमें दिलीप कुमार और राज बब्बर ने अभिनय किया। फ़िल्म में फ़ैज़ का लिखा "हम महनत कश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे" के बोलों में थोड़ा फेर बदल कर गीतकार हसन कमाल ने लिख डाला "हम मेहनत कश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे"। इसके लिए फ़िल्म में फ़ैज़ को क्रेडिट नहीं दिया गया जो ताज्जुब की बात है। और यह उस समय की बात है जब फ़ैज़ ज़िंदा थे। फ़िल्म की नामावली में कहीं भी फ़ैज़ का ज़िक्र नहीं है जो बेहद शर्म की बात है। ख़ैर, 1986 में मुज़फ़्फ़र अली की अगली फ़िल्म आई ’अंजुमन’ जिसमें शबाना आज़मी, फ़ारुख़ शेख, रोहिणी हत्तंगड़ी मुख्य किरदारों में थे। लखनऊ की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में चिकन कढ़ाई श्रमिकों के संघर्ष के मुद्दे उठाए गए थे। फ़िल्म में ख़ैयाम का संगीत था और गीत लिखे शहरयार और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने। गीतों की एक और ख़ासियत यह भी थी कि तीन गीत शबाना आज़मी ने गाए। ’गमन’ और ’उमराव जान’ के बाद मुज़फ़्फ़र अली के साथ फ़ारुख़ शेख की यह तीसरी फ़िल्म थी। और अब एक नज़र उन दो नग़मों पर जिन्हें फ़ैज़ ने लिखे। पहली ग़ज़ल है शबाना आज़मी की आवाज़ में "मैं राह कब से नई ज़िन्दगी की तकती हूँ, हर एक क़दम पे हर एक मोड़ पे संभलती हूँ"। किसी ज़माने में ख़ुशहाल ज़िन्दगी जीने वाली जब संघर्ष से गुज़रती है तो उसकी मुंह से वैसे ही बोल निकल पड़ते हैं जैसा कि फ़ैज़ ने लिखा है - "किया है जश्न कभी डूबते सितारों का, कभी मैं एक किरण के लिए भटकती हूँ, मैं ख़ुद को देख के हैरान होने लगती हूँ, मैं कहाँ आइने की ज़ुबां समझती हूँ"। क्या ख़ूब निभाया है शबाना आज़मी ने इस ग़ज़ल को! इसे सुनते हुए हैरानी होती है कि आख़िर क्यों उनकी आवाज़ में और गीत सुनाई नहीं दिए हमें। फ़ैज़ की लिखी फ़िल्म की दूसरी ग़ज़ल है "कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं, सत शुक्र के अपनी रातों में, अब हिज्र की कोई रात नहीं"। ख़ैयाम साहब और उनकी बेगम जगजीत कौन ने क्या ख़ूब गाया है इस ग़ज़ल को। अनिल बिस्वास और मदन मोहन के बाद ख़ैयाम साहब ही एक ऐसे संगीतकार हुए जिन्होंने फ़िल्मी ग़ज़लों को एक ख़ास जगह दी।


20 नवंबर 1984 को फ़ैज़ इस फ़ानी दुनिया को छोड़ गए, लेकिन 90 के दशक में भी उनकी रचनाएँ हिंदी फ़िल्मों में आती रहीं। 1993 की फ़िल्म ’मुहाफ़िज़’ में उस्ताद सुल्तान ख़ाँ और ज़ाकिर हुसैन का संगीत था। अनीता देसाई की लिखी 1984 की ’बूकर प्राइज़’ नामांकित उपन्यास ’इन कस्टडी’ पर आधारित इस फ़िल्म को इस्माइल मर्चैण्ट ने निर्देशित किया था। फ़िल्म के सभी छह गीत फ़ैज़ के लिखे हुए थे। पहली ग़ज़ल शंकर महादेवन की आवाज़ में "नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं, क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं"। पहली मुलाक़ात या बहुत दिनों के बाद अपनी प्रेमिका से मुलाक़ात की ख़ुशी को किस मासूमियत लेकिन असरदार तरीके से इस ग़ज़ल में व्यक्त किया गया है, इसे सुनते हुए अंदाज़ा लगाया जा सकता है। दूसरा नग़मा हरिहरन की आवाज़ में है - "आज बाज़ार में पाँवजोला चलो, चश्म-ए-नम जान सोरीदा काफ़ी नहीं, तोहमत-ए-इश्क़ को सीदा काफ़ी नहीं, आज बाज़ार में पाँवजोला चलो"। इसके अंत में फ़ैज़ लिखते हैं - "इनका दम साँस अपने सिवा कौन है, सहर-ए-जाना में अब बासफ़ा कौन है, दश्त-ए-क़ातिल के साया रहा कौन है, रख़्त-ए-दिल बांध लो दिल फ़िगारो चलो, फिर हमीं क़त्ल हो आएँ यारों चलो"। ऐसे थे फ़ैज़! इसी तरह सुरेश वाडकर की आवाज़ में फ़ैज़ की एक और कविता है "आज इक हर्फ़ को फिर ढूंढता फिरता है ख़्याल, मद भरा हर्फ़ कोई, ज़हर भरा हर्फ़ कोई, दिलनशी हर्फ़ कोई, कहर भरा हर्फ़ कोई, आज इक हर्फ़ को फिर ढूंढता फिरता है ख़्याल"। कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़ में ग़ज़ल है "ऐ जज़्बा-ए-दिल अगर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए, मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए"। कविता की ही आवाज़ में फ़िल्म की एक और ग़ज़ल है "राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया, दिल बहुत कुछ जला के देख लिया, और क्या देखने को बाक़ी है, आपसे दिल लगा के देख लिया"। वर्ष 2005 में फ़िल्म '99.9 FM' में फ़ैज़ की बस एक रचना को लिया गया था - "ये मुझे अज़ीज़ भी नापसन्द"। दुर्भाग्यवश इस गीत या ग़ज़ल की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हो पायी है। इसी साल ’सहर’ नाम की क्राइम थ्रिलर फ़िल्म आई थी जिसमें संगीतकार थे डैनिएल बी. जॉर्ज और गीत लिखे स्वानन्द किरकिरे ने। लेकिन फ़िल्म के शीर्षक को ध्यान में रखते हुए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की उन मशहूर चार पंक्तियों को रखा गया था - "ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-ग़ज़ीदा सहर, वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं"। पंकज कपूर की असरदार आवाज़ में ये चार पंक्तियाँ सुनने में कमाल की लगती है।

वर्तमान दशक में भी फ़ैज़ मौजूद हैं फ़िल्म जगत में। 2012 की मीरा नाइर निर्देशित चर्चित अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म ’The Reluctant Fundamentalist’ प्रदर्शित हुई थी। 9/11 के हादसे के बाद अमरीका में एक आम मुसलमान की ज़िन्दगी किस तरह की हो गई थी, इस पर आधारित थी इस फ़िल्म की कहानी। फ़िल्म में मुख्य संगीतकार थे मैकल ऐन्ड्रिउस, लेकिन फ़ैज़ की एक रचना को शामिल करने के लिए आतिफ़ असलम को अतिथि संगीतकार के रूप में चुना गया और आतिफ़ ने ही इस गीत को गाया। आतिफ़ की आवाज़ में "मोरी अरज सुनो दस्तगीर पीर, रब्बा सचिया, तू ते अखिया सी, जाओ बन्दिया जग दा शाह एन तू, साडिया नेमतान तेरिया दौलताने, साडा नैब थे अलीजा हैं तू"। फ़्युज़न आधारित इस सूफ़ी नग़में में ऊपरवाले से दुआएँ मांगी जा रही है हिफ़ाज़त की। ऊपरवाले को मासूम धमकी भी दी जा रही है कि अगर उसने हिफ़ाज़त नहीं की तो वो किसी और ख़ुदा को चुन लेगा। प्रेम अपने शुद्धतम रूप में सुनाई देता है इस गीत में। यूं तो आतिफ़ असलम के बहुत से सुपरहिट गीत हमने सुने हैं, लेकिन इस गीत की बात ही कुछ और है। अफ़सोस इस बात का है कि इस गीत को लोगों ने ज़्यादा नहीं सुना। आतिफ़ की तरह ख़ुशक़िस्मत अरिजीत सिंह भी हैं जिन्हें भी फ़ैज़ को गाने का मौक़ा मिला। फ़िल्म थी 2014 की ’हैदर’। विशाल भारद्वाज के संगीत में और अरिजीत की आवाज़ में "गुलों में रंग भरे" को सुनना बड़ा ही सुकूनदायक होता है। "बड़ा है दर्द का रिश्ता, तुम्हारे नाम पे आएंगे ग़म गुज़ार चले, गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले। चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले, गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले"। इस ग़ज़ल के बाद इसी फ़िल्म में रेखा भारद्वाज की आवाज़ में भी फ़ैज़ की एक नज़्म है जो बेमिसाल है। फ़ैज़ इसमें लिखते हैं - "आज के नाम और आज के ग़म के नाम, आज का ग़म के है ज़िन्दगी के भरे, गुलिस्ताँ से ख़फ़ा, जर्द पत्तों का बन, जर्द पत्तों का बन जो मेरा देश है, दर्द की अंजुमन जो मेरा देश है, उन दुखी माँओं के नाम, रात में जिनके बच्चे बिलखते हैं, और नींद की मार खाए हुए बाज़ुओं से संभलते नहीं, दुख बताते नहीं, मिन्नतों जारियों से बहलाते नहीं, उन हईनाओं के नाम, उन हसीनाओं के नाम..."। यह एक ऐसी नज़्म है जिसे सुनते हुए आपकी आँखें नम हुए बिना नहीं रह पाएंगी।

2016 में फ़िल्म आई थी ’बुद्धा इन अ ट्रैफ़िक जाम’। इस फ़िल्म का गीत-संगीत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी है। "बेकार कुत्ते..." रोहित शर्मा द्वारा स्वरबद्ध 2013 के ऐल्बम ’स्वांग’ की एक रचना है जो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी से प्रेरित है जिसे नए बोलों से संवारा है रविन्दर रंढवा ने। पंकज बदरा और रोहित ने इसे गाया है। एक और फ़ैज़ ऐडप्टेशन "चन्द रोज़..." जिसे पल्लवी जोशी ने गाया है। शास्त्रीय गायन में सारी त्रुटियों के बावजूद पल्लवी की आवाज़ में यह गीत सुनने में अच्छा लगा। जी हाँ, ये वही पल्लवी जोशी हैं जिन्हें आप बरसों पहले दूरदर्शन के धारावाहिकों में देखा करते थे। फ़ैज़ लिखते हैं "ये तेरी हुस्न से लिपटी हुई आलम की गर्द, अपनी दो रोज़ जवानी की शिकस्तों का शुमार, चांदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द, दिल की बेसुद तड़प जिस्म की मायूस पुकार, चंद रोज़ और मेरी जान फ़कत चंद रोज़..."। तो यहाँ आकर पूरी होती है फ़िल्मों में फ़ैज़ का सफ़र। हमें पूरी उम्मीद है कि इसी तरह से आने वाले सालों में भी फ़ैज़ हमारी फ़िल्मों के गीतों में लगातार आते रहेंगे।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Wednesday, May 5, 2010

ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात... फ़ैज़ साहब के बेमिसाल बोल और इक़बाल बानो की मदभरी आवाज़

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८२

बात तो दर-असल पुरानी हो चुकी है, फिर भी अगर ऐसा मुद्दा हो, ऐसी घटना हो जिससे खुशी मिले तो फिर क्यों न दोस्तों के बीच उसका ज़िक्र किया जाए। है ना? तो हुआ यह है कि आज से कुछ ३३ दिन पहले यानि कि २ अप्रैल के दिन महफ़िल-ए-गज़ल की सालगिरह थी। अब हमारी महफ़िल कोई माशूका या फिर कोई छोटा बच्चा तो नहीं कि जो शिकायतें करें ,इसलिए हमें इस दिन का इल्म हीं न हुआ। हाँ, गलती हमारी है और हम अपनी इस खता से मुकरते भी नहीं, लेकिन आप लोग किधर थे... आप तमाम चाहने वालों का तो यह फ़र्ज़ बनता था कि हमें समय पर याद दिला दें। अब भले हीं हमारी यह महफ़िल नाज़ न करे या फिर तेवर न दिखाए, लेकिन इसकी आँखों से यह ज़ाहिर है कि इसे हल्का हीं सही, लेकिन बुरा तो ज़रूर हीं लगा है। क्या?..... क्या कहा? नहीं लगा... ऐसा क्यों... ऐसा कैसे.... ओहो... यह वज़ह है.. सही है भाई.. जब महफ़िल में चचा ग़ालिब विराजमान हों और वो भी पूरे के पूरे ढाई महिने के लिए तो फिर कौन नाराज़ होगा.. नाराज़ होना तो दूर की बात है.. किसी को अपनी खबर हो तो ना वो कुछ और सोचे। यही हाल हमारी महफ़िल का भी था... यानि कि अनजाने में हीं हमने महफ़िल की नाराज़गी दूर कर दी है। अगर फिर भी कुछ कसर बाकी रह गई हो, तो आज की महफ़िल में हम उसका निपटारा कर देंगे। अब चूँकि चचा ग़ालिब को हम वापस नहीं बुला सकते, लेकिन पिछली सदी (बीसवीं सदी) के ग़ालिब, जिन्हें ग़ालिब का एकमात्र उत्तराधिकारी (हमने इस बात का ज़िक्र पिछली कुछ महफ़िलों में भी किया था) कहा जाता है, को निमंत्रण देकर हम उस कमी को पूरा तो कर हीं सकते हैं। तो लीजिए आज की महफ़िल में हाज़िर हैं दो बार नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किए जा चुके "फ़ैज़ अहमद फ़ैज़" साहब।

महफ़िल में फ़ैज़ का एहतराम करने की जिम्मेदारी हमने मशहूर लेखक "विश्वनाथ त्रिपाठी" जी को दी है। तो ये रहे त्रिपाठी जी के शब्द (साभार: डॉ. शशिकांत):

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को पहली बार मैंने तब देखा था जब सज्ज़ाद जहीर की लंदन में मौत हो गई थी और वे उनकी लाश को लेकर हिंदुस्तान आए थे, लेकिन उनसे बाक़ायदा तब मिला था जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ का सचिव था। यह इमरजेंसी के बाद की बात है। उन दिनों मैं ख़ूब भ्रमण करता था। बड़े-बड़े लेखकों से मिलना होता था। फ़ैज़ साहब से मैंने हाथ मिलाया। बड़ी नरम हथेलियां थीं उनकी। फिर एक मीटिंग में प्रगतिशील साहित्य को लोकप्रिय बनाने की बात चल रही थी। मैंने फ़ैज़ साहब से पूछा कि आप इतना घूमते हैं, लेकिन हर जगह अंग्रेजी में स्पीच देते हैं, ऐसे में हिंदुस्तान और पाकिस्तान में हिंदी-उर्दू के प्रगतिशील साहित्य का प्रचार कैसे होगा? फ़ैज़ साहब ने कहा, "इंटरनेशनल मंचों पर अंग्रेजी में बोलने की मज़बूरी होती है, लेकिन आपलोगों का कम से कम उतना काम तो कीजिए जितना हमने अपनी ज़ुबान के लिए किया है।" उसके बाद उनसे मेरा कई बार मिलना हुआ।

फ़ैज़ साहब के बारे में ये एक बात बहुत कम लोग जानते हैं। उसे प्रचारित नहीं किया गया। जब गांधीजी की हत्या हुई थी तब फ़ैज़ साहब "पाकिस्तान टाइम्स" के संपादक थे। गांधीजी की शवयात्रा में शरीक होने वे वहां से आए थे चार्टर्ड प्लेन से। और जो संपादकीय उन्होंने लिखा था मेरी चले तो में उसकी लाखों-करोड़ों प्रतियां लोगों में बांटूं। गांधीजी के व्यक्तित्व का बहुत उचित एतिहासिक मूल्यांकन करते हुए शायद ही कोई दूसरा संपादकीय लिखा गया होगा। फ़ैज़ साहब ने लिखा था- "अपनी मिल्लत और अपनी कौम के लिए शहीद होनेवाले हीरो तो इतिहास में बहुत हुए हैं लेकिन जिस मिललत से अपनी मिल्लत का झगड़ा हो रहा है और जिस मुल्क़ से अपने मुल्क़ की लड़ाई हो रही है, उस पर शहीद होनेवाले गांधीजी अकेले थे।" पाकिस्तान बनने के बाद फ़ैज़ साहब जब भी हिंदुस्तान आते थे तो नेहरू जी उन्हें अपने यहां बुलाते थे और उनकी कविताएं सुनते थे। विजय लक्ष्मी पंडित और इंदिरा जी भी सुनती थीं। दरअसल नेहरूजी कवियों और शायरों की क़द्र करते थे। नेहरू जी ने लिखा था- "ज़िन्दगी उतनी ही ख़ूबसूरत होनी चाहिए जितनी कविता।"

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू में प्रगतिशील कवियों में सबसे प्रसिद्ध कवि हैं। जोश, जिगर और फ़िराक के बाद की पीढ़ी के कवियों में वे सबसे लोकप्रिय थे। उन्हें नोबेल प्राइज को छोड़कर साहित्य जगत का बड़े से बड़ा सम्मान और पुरस्कार मिला। फ़ैज़ साहब मूलत: अंगेजी के अध्यापक थे। पंजाबी थे। लेकिन उन कवियों में थे जिन्होंने अपने विचारों के लिए अग्नि-परीक्षा भी दी। उनके एक काव्य संकलन का नाम है- ‘ज़िन्दांनामा’ इसका मतलब होता है कारागार। अयूब शाही के ज़माने में उन्होंने सीधी विद्रोहात्मक कविताएं लिखीं। उन्होंने मजदूरों के जुलूसों में गाए जानेवाले कई गीत लिखे जो आज भी प्रसिद्ध हैं। मसलन- "एक मुल्क नहीं, दो मुल्क नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे।"

फ़ैज़ एक अच्छे अर्थों में प्रेम और जागरण के कवि हैं। उर्दू-फारसी की काव्य परंपरा के प्रतीकों का वे ऐसा उपभोग करते हैं जिससे उनकी प्रगतिशील कविता एक पारंपरिक ढांचे में ढल जाती है और जो नई बातें हैं वे भी लय में समन्वित हो जाती हैं। फ़ैज़ साहब ने कई प्रतीकों के अर्थ बदले हैं जैसे उनकी एक प्ररंभिक कविता "रकीब से" है। रकीब प्रेम में प्रतिद्वंद्वी को कहा जाता है। उन्होंने लिखा कि अपनी प्रमिका के रूप से मैं कितना प्रभावित हूँ ये मेरा रकीब जानता है। लेखकों के लिए उन्होंने लिखा- "माता-ए-लौह कलम छिन गई तो क्या ग़म है कि खून -ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंनें।" दरअसल फ़ैज़ में जो क्रांति है उसे उन्होंने एक इश्किया जामा पहना दिया है। उनकी कविताएं क्रांति की भी कविताएं हैं और सरस कविताएं हैं। सबसे बड़ा कमाल यह है कि उनकी कविताओं में सामाजिक-आर्थिक पराधीनता की यातना और स्वातंत्र्य की कल्पना का जो उल्लास होता है, वो सब मौजूद हैं।

फ़ैज़ की कविताओं में संगीतात्मकता, गेयता बहुत है। मैं समझता हूं कि जिगर मुरादाबादी, जो मूलत: रीतिकालीन भावबोध के कवि थे, में आशिकी का जितना तत्व है, बहुत कुछ वैसा ही तत्व अगर किसी प्रगतिशील कवि में है तो फ़ैज़ में है। फ़ैज़ की दो और ख़ासियतें हैं- एक, व्यंग्य वे कम करते हैं लेकिन जब करते हैं तो उसे बहुत गहरा कर देते हैं। जैसे- "शेख साहब से रस्मोराह न की, शुक्र है ज़िन्दगी तबाह न की।" और दूसरी बात, फ़ैज़ रूमान के कवि हैं। अपने भावबोध को सकर्मक रूप प्रदान करनेवाले कवि हैं लकिन क्रांति तो सफल नहीं हुई। ऐसे में जो क्रांतिकारी कवि हैं वे निराश होकर बैठ जाते हैं। कई तो आत्महत्या कर लेते हैं और कई ज़माने को गालियाँ देते हैं। फ़ैज़ वैसे नहीं हैं। फ़ैज़ में राजनीतिक असफलता से भी कहीं ज़्यादा अपनी कविता को मार्मिकता प्रदान की है। उनका एक शेर है- "करो कुज जबी पे सर-ए-कफ़न, मेरे क़ातिलों को गुमां न हो। कि गुरूर इश्क का बांकपन, पसेमर्ग हमने भुला दिया।" अर्थात कफ़न में लिपटे हुए मेरे शरीर के माथे पर टोपी थोड़ी तिरछी कर दो, इसलिए कि मेरी हत्या करनेवालों का यह भरम नहीं होना चाहिए कि मरने के बाद मुझ में प्रेम के स्वाभिमान का बांकपन नहीं रह गया है।

सो, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ केवल रूप, सौदर्य और प्रेरणा के ही कवि नहीं हैं बल्कि असफलताओ और वेदना के क्षणों में भी साथ खड़े रहनेवाले पंक्तियों के कवि हैं।

फ़ैज़ साहब महफ़िल में आसन ले चुके हैं, तो क्यों ना उनसे उनकी यह बेहद मक़बूल नज़्म सुन ली जाए:

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक् तेरी है
देख के आहंगर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़न्जीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले


शायद आपको(फ़ैज़ साहब को भी.. हो सकता है कि वो भूल गए हों..आखिर इनकी उम्र भी तो हो चली है)पता न हो कि फ़ैज़ साहब की महत्ता बस हिन्दुस्तान और पाकिस्तान तक हीं सीमित न थी, बल्कि इनकी रचनाओं का विश्व की दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद किया गया था। रूस में हिंदुस्तानी प्रायद्वीप के देशों के साहित्य और संस्कृति की रूसी प्रसारक और प्रचारक सुश्री मरियम सलगानिक, जिन्हें हाल में हीं "पद्म-श्री" से सम्मानित किया गया है, ने फ़ैज़ की कई रचनाओं का रूसी में अनुवाद किया है। रूस में फ़ैज़ की जितनी भी किताबें छपीं है, सभी में उनका बड़ा सहयोग रहा है। सोवियत लेखक संघ में काम करते हुए मरियम सलगानिक ने बरीस स्लूत्स्की ओर मिखायल इसाकोव्स्की जैसे बड़े रूसी कवियों को फ़ैज़ की रचनाओं के अनुवाद के काम की ओर आकर्षित भी किया है।

यह तो थी फ़ैज़ के बारे में थोड़ी-सी जानकारी। अब हम आज की नज़्म की ओर रुख करते हैं। फ़ैज़ साहब के सामने उनकी किसी नज़्म को गाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है और आज यह काम फ़हद हुसैन जी करने जा रही हैं। फ़हद जी! हम आपके बारे में जानना चाहेंगे, अंतर्जाल पे कुछ भी नहीं होने की वज़ह से हम आपसे पूरी तरह से नावाकिफ़ हैं। उम्मीद करते हैं कि आप हमें निराश नहीं करेंगी। इक़बाल बानो जी करने जा रही हैं। वैसे इक़बाल बानो इस काम में खासी अभ्यस्त हैं क्योंकि फ़ैज़ साहब की आधी से अधिक गज़लों और नज़्मों को इन्होंने हीं अपनी आवाज़ दी है। हमें जहाँ तक याद है.. फ़ैज़ जी हमारी महफ़िल में ३ या ४ बार पहले भी आ चुके हैं और उनमें से २ बार उन्हें इक़बाल जी का हीं सान्निध्य मिला था। यह तो हुई महफ़िल की बात.... हमनें तो इक़बाल जी को तब भी याद किया था जब जहां-ए-फ़ानी से इनकी रुख्सती हुई थी। वह घटना हम कभी भूल नहीं पाएँगे। उस श्रद्धांजलि के बारे में पढने के लिए यहाँ जाएँ। मन दु:खी हो गया ना.... क्या कीजिएगा.. इक़बाल जी थी हीं ऐसी शख्सियत। अब हमें वो वापस तो नहीं मिल सकती, लेकिन उनकी आवाज़ में यह नज़्म सुनकर हम अपना मन हल्का ज़रूर कर सकते हैं।:

दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लरज़ा हैं
तेरी आवाज़ के साये तेरे होंठों के सराब
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले
खिल रहे हैं तेरे पहलू के समन और गुलाब

उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तेरी साँस की आँच
अपनी ख़ुश्ब में सुलगती हुई मद्धम मद्धम
दूर् ____ पर् चमकती हुई क़तरा क़तरा
गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम

उस क़दर प्यार से ऐ जान-ए जहाँ रक्खा है
दिल के रुख़सार पे इस वक़्त तेरी याद् ने हाथ
यूँ गुमाँ होता है गर्चे है अभी सुबह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "शगूफ़े" और शेर कुछ यूँ था-

फूल क्या, शगूफ़े क्या, चाँद क्या, सितारे क्या,
सब रक़ीब कदमों पर सर झुकाने लगते हैं।

बहुत दिनों के बाद सीमा जी महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुईं। आपको आपके मामूल (रूटीन) पर वापस देखकर बहुत खुशी हुई। ये रहे आपके शेर:

वो सर-ओ-कद है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
के उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं (फ़राज़)

हँसते हैं मेरी सूरत-ए-मफ़्तूँ पे शगूफ़े
मेरे दिल-ए-नादान से कुछ भूल हुई है (साग़र सिद्दीकी)

शरद जी, आपने तो हरेक आशिक के दिल की बात कह दी। किसी सुंदर मुखरे को देखने को बाद आशिक का यही हाल होता है:

शगूफ़ों को अभी से देख कर अन्दाज़ होता है
जवानी इन पे आयेगी तो आशिक हर कोई होगा।

शन्नो जी, मौसम और शगूफ़ों के बीच ऐसी खींचातानी। वाह! क्या ख्यालात हैं:

शगूफों की तो भरमार थी गुलशन में
पर मौसम के नखरों से न खिल पाए.

मंजु जी, सेहरा और चेहरा से तो हम बखूबी वाकिफ़ थे, लेकिन इनका एक-साथ इस तरह इस्तेमाल कभी देखा न था। मज़ा आ गया:

दिल ने शगूफों से बनाया अनमोल सेहरा ,
अरे !किस खुशनसीब का सजेगा चेहरा .

नीलम जी, अंतर्जाल (इंटरनेट) पर हर शब्द का अर्थ मौजूद है। वैसे भी पहले के शेरों को देखकर आप मतलब जान सकती थीं। फिर भी मैं बताए देता हूँ। शगूफ़े = कलियाँ ... आपसे शेर की उम्मीद थी... खैर अगली बार....

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, December 9, 2009

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें...सज्जाद अली ने कुछ यूँ उम्मीद जगाई, साथ हैं फ़राज़ के शब्द

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६१

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शामिख जी की पसंद की पहली गज़ल लेकर। आज की गज़ल की बात करें, उससे पहले मैं दो सप्ताह की अपनी गैर-हाज़िरी के लिए आप सबसे माफ़ी माँगना चाहूँगा। कुछ ऐसी वज़ह हीं आन पड़ी थी कि मुझे गज़लों की इस शानदार और जानदार महफ़िल को कुछ दिनों के लिए बंद करना पड़ा। लेकिन कोई बात नहीं, गज़लों की रूकी हुई यह गाड़ी दो सप्ताह के बाद फिर से पटरी पर आ गई है और निकट भविष्य में इसकी गति कम होने की मुझे कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। तो चलिए आज की महफ़िल की शुरूआत कर हीं देते हैं। तो आज जो गज़ल हम आपको सुनवाने जा रहे हैं वह यूँ तो मेहदी हसन साहब की आवाज़ में भी उपलब्ध थी, लेकिन हमने जान-बूझकर एक कम-चर्चित गायक की गाई हुई गज़ल को चुना। वैसे इस गायक को कम-चर्चित भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि पाकिस्तानी फिल्मों में इन्होंने बहुत सारे गाने गाए हैं। इस फ़नकार के अब्बाजान साजन(वास्तविक नाम: शफ़क़त हुसैन) नाम से मलयालम फिल्में निर्देशित किया करते हैं। ७० के दशक से अबतक उन्होंने लगभग ३० फिल्में निर्देशित की हैं। मज़े की बात यह है कि खुद तो वे हिन्दुस्तान में रह गए लेकिन उनके दोनों बेटों ने पाकिस्तान में खासा नाम कमाया। जैसे कि आज की गज़ल के गायक सज्जाद अली पाकिस्तान के जानेमाने पॉप गायक हैं, वहीं वक़ार अली एक जानेमाने संगीतकार। सज्जाद अली का जन्म १९६६ में कराची के एक शिया मुस्लिम परिवार में हुआ था। बचपन से हीं इन्हें संगीत की शिक्षा दी गई। शास्त्रीय संगीत में इन्हें खासी रूचि थी। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद बरकत अली खान, उस्ताद मुबारक अली खान, मेहदी हसन खान, गुलाम अली, अमानत अली खान जैसे धुरंधरों के संगीत और गायिकी को सुनकर हीं इन्होंने खुद को तैयार किया। इनका पहला एलबम १९७९ में रीलिज हुआ था, जिसमें इन्होंने बड़े-बड़े फ़नकारों की गायिकी को दुहराया। उस एलबम के ज्यादातर गाने "हसरत मोहानी" और "मोमिन खां मोमिन" के लिखे हुए थे। यूँ तो इस एलबम ने इन्हें नाम दिया लेकिन इन्हें असली पहचान मिली पीटीवी की २५वीं सालगिरह पर आयोजित किए गए कार्यक्रम "सिलवर जुब्ली" में। दिन था २६ नवंबर १९८३. "लगी रे लगी लगन" और "बावरी चकोरी" ने रातों-रात इन्हें फर्श से अर्श पर पहुँचा दिया। एक वो दिन था और एक आज का दिन है...सज्जाद अली ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अप्रेल २००८ में "चहार बलिश" नाम से इन्होंने अपना एलबम रीलिज किया, जिसमें "चल रैन दे"(यह गाना वास्तव में जुलाई २००६ में मार्केट में आया था और इस गाने ने उस समय खासा धूम मचाया था) भी शामिल है। इनके बारे में इससे ज्यादा क्या कहा जाए कि खुद ए०आर०रहमान इन्हें "ओरिजिनल क्रोसओवर" मानते हैं। वैसे कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन बाकी बातें कभी अगली कड़ी में। अब हम रूख करते हैं इस गज़ल के गज़लगो "अहमद फ़राज़" साहब की ओर।

सबको मालूम है कि फ़राज़ साहब का इंतकाल पिछले साल २५ अगस्त को हुआ था। सबको मालूम है कि उन्हें २००४ में हिलाल-ए-इम्तियाज़ से नवाज़ा गया था और उन्होंने यह कहकर यह सम्मान लौटा दिया था कि "मेरा ईमान मुझे माफ़ नहीं करेगा अगर मैं पाकिस्तान में हो रही इन घटनाओं का मूक दर्शक बना रहूँ। कम से कम मैं इतना तो कर हीं सकता हूँ कि मैं इस तानाशाही सरकार को यह दिखा दूँ कि मौलिक अधिकारों को छीनने वाली यह सरकार लोगों के दिलों में कैसा मकाम रखती है। इसलिए मैं हिलाल-ए-इम्तियाज़ को लौटा रहा हूँ और अपने आप को इस हुकूमत से हमेशा के लिए अलग करता हूँ।" लेकिन कुछ बाते हैं जो सबको मालूम नहीं। और वे हैं फ़राज़ साहब का चुटकीला अंदाज़, हर बात को हँसी में उड़ा जाने की अदा। जैसे कि यूँ तो उन्हें हिलाल-ए-इम्तियाज़ २००४ में मिला, लेकिन उन्होंने इसे लौटाया २००६ में। तो इस मामले में किसी ने उनसे पूछा कि "दो साल की देरी क्यों?" तो उनका जवाब था कि "आपको क्या लगता है कि इन दो सालों में इसने कुछ अंडे दे दिए हैं क्या..यह आज भी वही है।" कहते हैं कि एक बार कुछ लोग फ़राज़ साहब के दरवाजे पर आए और उनसे कहने लगे कि "क्या तुम कलमा सुना सकते हो?" फ़राज़ साहब ने तपाक से जवाब दिया "क्यों? पुराने कलमे में कोई बदलाव आ गया है क्या?" फ़राज़ साहब से एक बार पूछा गया कि १९४७ के पाकिस्तान और आज के पाकिस्तान में क्या फ़र्क महसूस करते हैं। उनका जवाब था: "१९४७ में मुस्लिम लीग के प्रेसीडेंट का नाम मुहम्मद अली जिन्ना था और आज चौधरी गुजरात हुसैन है"। यह तो हुआ उनका मज़ाकिया लहज़ा। लेकिन असल में फ़राज़ साहब ४७ के पाकिस्तान और आज के पाकिस्तान में कोई फ़र्क नहीं महसूस करते थे। उनसे जब पूछा गया कि आजकल वे जोश-औ-जुनूं वाली क्रातिकारी कविताएँ क्यों नहीं लिखते। तो उनका जवाब था:"क्योंकि मैं एक हीं चीज हर बार नहीं लिखना चाहता। पाकिस्तान में चीजें नहीं बदलतीं और इसीलिए मेरी लिखी हुई पुरानी कविताएँ भी पुरानी नहीं होती..उनका आज भी उतना हीं महत्व है, जितना पहले था।" फ़राज़ हमेशा हीं सैनिक शासन के खिलाफ़ रहे थे, तब भी जब उनके बाकी साथियों ने सरकार का साथ देना मुनासिब समझा था। इस मामले में फ़राज़ दृढ-संकल्प थे। उनका कहना था कि "मैं निरंकुशता के खिलाफ़ था, हूँ और रहूँगा। माना कि वक्त बुरा है लेकिन ऐसा वक्त भी नहीं आया कि मुझे किसी के डर से देश छोड़ना पड़े। मैं घर पर हीं रहकर उनका विरोध करूँगा।" लेकिन ज़िया के शासनकाल में उन्हें भी देशनिकाला सहना पड़ा। छ: साल तक वे देश से बाहर रहे। इस मामले में वे "फ़ैज़" के उत्तराधिकारी साबित हुए। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो उन्हें फ़ैज़ के पास ला खड़ा करते हैं। इसलिए कई लोगों का यह मानना है कि सही मायने में फ़ैज़ की परछाई किसी में नज़र आती थी तो वे फ़राज़ हीं थे। फ़राज़ न सिर्फ़ क्रांति के कवि थे बल्कि प्रेम के मामले में भी उनका कोई सानी न था। कहते हैं कि ऐसा कोई प्रेम-पत्र नहीं जिसमें फ़राज़ का शेर शामिल न हो। १९५४ की बात है, जब फ़राज़ पेशावर के इस्लामिया कौलेज़ में पढा करते थे। तब अपने दोस्तों को घेर कर रोमांटिक कविताएँ सुनाना उनकी दैनिक आदत थी। उस समय लड़के-लड़कियाँ खुलेआम आपस में बात नहीं किया करते थे। फिर भी फ़राज़ को लड़कियों की चिट्ठियाँ आती थीं, वो भी न सिर्फ़ अपने कौलेज से, बल्कि शहर के दूसरे कौलेजों से भी। ऐसा असर था फ़राज़ की लेखनी में...

चलते-चलते फ़राज़ के बारे में कुछ शब्द "भारतीय साहित्य संग्रह" पर उपलब्ध फ़राज़ की पुस्तक "खानाबदोश" की समीक्षा से: अहमद फ़राज़ उर्दू के एक समर्थ, सजग और जीवन्त कवि हैं। उनकी कविता जितनी पाकिस्तानी है उतनी ही भारतीय। ऐसा इसलिए कि उर्दू में दोनों देशों के बीच बँटवारा नहीं साझा है। हम यहाँ यह याद कर सकते हैं कि पाकिस्तान बनने के बाद वहाँ के अब तक के सबसे बड़े कवि फ़ैज अहमद फ़ैज़ की भारत में लोकप्रियता और प्रतिष्ठा रही है। जैसे फ़ैज़ में वैसे ही अब अहमद फ़राज़ में यह साफ़ पहचाना जा सकता है कि सरहदों के पार और उनके बावजूद, हमारे समय में हम जिन प्रश्नों, अन्तर्विरोधों, तनावों, बेचैनियों और जिज्ञासाओं से घिरे हैं, उन्हें यह कविता सीधे और निहायत आत्मीय आवाज़ में सम्बोधित करती है। एक बार फिर यह कविता इस सच्चाई का इज़हार है और एसर्शन भी। फ़राज़ की कविता ज़िन्दादिल कविता है, उसमें हमेशा एक क़िस्म की स्फूर्ति है; तब भी वह किसी रूमानी अवसाद में डूबी है। वह ऐसी कविता भी है, जो आदमी और उसके बेशुमार रिश्तों की दुनिया को कविता के भूगोल में स्मरणीय ढंग से विन्यस्त करने की चेष्टा करती है। भले उतनी उदग्र न हो जितनी, मस्लन पाब्लो नेरुदा या कि फ़ैज़ की कविता रही है, वह इसी परंपरा में है जिसमें प्रेम और क्रान्ति में, रूमानी सच्चाई और सामाजिक सच्चाई में बुनियादी तौर पर कोई विरोध भाव नहीं है। उसकी आधुनिकता परम्परा का विस्तार है, उसका अवरोध नहीं। वह अपने समय से जो रिश्ता बनाती है वह सीधा-सादा न होकर ख़ासा जटिल है। वह समय को निरी समकालीनता के बाड़े से निकाल कर उसे थोड़ा पीछे और कुछ आगे ले जानी वाली कविता है। फ़राज़ की ज़ुबान में मिठास और अपनी दुनिया में रचे-बसे होने की अनुगूँजें हैं। ज़रूरी होने पर बेबाकी, तीखापन और तंज़ भी है। उसमें उर्दू की अपनी समृद्ध परम्परा की कृतज्ञ याद है। उसमें लयों, बहरों, छन्दों की आश्चर्यजनक विविधता और क्षमता है। सबसे बढ़कर उसमें खुलापन है, जो अहमद फ़राज़ के इन्सानी तौर पर भरे पूरे और चौकन्ने होने का सबूत है। वह मित्र-कविता है जो हमसे आत्मीयता और आत्मविश्वास के साथ बात करती है और हमारे विश्वास आसानी से जीत लेती है। चलिए आज की महफ़िल की समाप्ति अहमद फ़राज़ के इस शेर से करते हैं, जिसमें मोहब्बत की हद बताई गई है:

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे|


इस शेर के बाद चलिए हम अब १९९५ में रीलिज हुई पाकिस्तानी फिल्म "चिफ़ साहब" से इस गज़ल को सुनते हैं, जिसका हर एक मिसरा न जाने कितनी दास्तान सुना जाता है। तो दिल पर हाथ रखकर इस गज़ल का आनंद लें:

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुये फूल किताबों में मिलें

ढूँढ उजड़े हुये लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इन्साँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

अब न वो मैं हूँ न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो साये तमन्ना के _____ में मिलें




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "नसीब" और शेर कुछ यूं था -

हाँ नसीब अपने ही सो गए,
हाय हम क्या से क्या हो गए..

सही शब्द के साथ महफ़िल में सबसे पहली हाज़िरी लगाई "मुरारी पारीक" जी ने। मुरारी जी आपका महफ़िल-ए-गज़ल में हार्दिक स्वागत है। आप आगे भी महफ़िल की शोभा बढाते रहें, इसी कामना के साथ आपका यह शेर पेश-ए-खिदमत है:

जो खिल उठें गुलाब मेरे दिल के बाग़ में
रब्बा, मेरे "नसीब" में ऐसी बहार दे (चरागे-दिल वर्ल्ड प्रेस से)

सजीव जी, आगे से आपको शिकायत करने का मौका नहीं मिलेगा :) इस बार समय की कमी के कारण मैं ज्यादा शोध नहीं कर पाया।

शरद जी, तो कैसी लगी आपकी पसंदीदा नज़्मों पर हमारी यह पेशकश? अपनी राय जाहिर ज़रूर कीजिएगा। यह रहा "नसीब" शब्द पर आपका यह शेर:

नसीब आजमाने के दिन आ रहे है
क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं। (फ़ैज़) क्या हुआ..आज कोई स्वरचित शेर नहीं!!

सीमा जी,आपने भी एक से बढकर एक शेर पेश किए। मसलन:

तेरा हिज्र मेरा नसीब है तेरा ग़म ही मेरी हयात है
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों तू कहीं भी हो मेरे साथ है। (निदा फ़ाज़ली)

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया (सुदर्शन फ़ाकिर)

कुलदीप जी, आपका पेश किया शेर भी कमाल का है:

बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार
लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे (राना सहरी)

आप सबके बाद महफ़िल को संभाला शामिख जी ने। शामिख जी, आज से तीन दिनों तक आपकी हीं पसंद की गज़लें पेश होने वाली हैं, इसलिए नदारद मत होईयेगा :) ये रहे आपके शेर:

वही सिपाह-ए-सितम ख़ेमाज़न है चारों तरफ़
जो मेरे बख़्त में था अब नसीब-ए-शहर भी है (अहमद फ़राज़)

नसीब फिर कोई तक़्रीब-ए-क़र्ब हो के न हो
जो दिल में हों वही बातें किया करो उससे (अहमद फ़राज़) संयोग देखिए कि आज हमने जो गज़ल पेश की है, वो भी फ़राज़ साहब की हीं है।

मंजु जी, हर बार की तरह इस बार भी स्वरचित शेर के साथ नज़र आईं:

ऐ मेरे मालिक ! जब -जब मेरा नसीब जगाया ,
तब -तब गम के रोड़े खुशियों के फूल बन महकने लगे .

अंत में महफ़िल सुमित जी के नाम हुई। ये रही आपकी पेशकश:

नसीब में जिसके जो लिखा था वो तेरी महफ़िल में काम आया,
किसी के हिस्से में प्यास आई किसी के हिस्से में जाम आया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, September 18, 2009

ये बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो.... महफ़िल में पहली मर्तबा "नुसरत" और "फ़ैज़" एक साथ

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४६

पिछली कड़ी में जहाँ सारे जवाब परफ़ेक्ट होते-होते रह गए थे(शरद जी अपने दूसरे जवाब के साथ कड़ी संख्या जोड़ना भूल गए थे), वहीं इस बार हमें इस बात की खुशी है कि पहली मर्तबा किसी ने कोई गलती नहीं की है। खुशी इस बात की भी है कि जहाँ हमारे बस दो नियमित पहेली बूझक हुआ करते थे(सीमा जी और शरद जी), वहीं इसी फ़ेहरिश्त में अब शामिख जी भी शामिल हो गए हैं। उम्मीद करते हैं कि धीरे-धीरे और भी लोग हमारी इस मुहिम में भाग लेने के लिए आगे आएँगे। अभी भी ५ कड़ियाँ बाकी हैं, इसलिए कभी भी सारे रूझान बदल सकते हैं। इसलिए सभी प्रतिभागियों से आग्रह है कि वे जोर लगा दें और जो अभी भी किसी शर्मो-हया के कारण खुद को छुपाए हुए हैं,वे पर्दा हटा के सामने आ जाएँ। चलिए अब पिछली कड़ी के अंकों का हिसाब करते हैं। इस बार का गणित बड़ा हीं आसान है: सीमा जी: ४ अंक, शरद जी: २ अंक, शामिख जी: १ अंक। और हाँ, शरद जी आपकी यह बहानेबाजी नहीं चलेगी। महफ़िल-ए-गज़ल में आपको आना हीं होगा और जवाब भी देना होगा। चलिए, अब बारी है आज के प्रश्नों की| तो ये रहे प्रतियोगिता के नियम और उसके आगे दो प्रश्न: ५० वें अंक तक हम हर बार आपसे दो सवाल पूछेंगे जिसके जवाब उस दिन के या फिर पिछली कड़ियों के आलेख में छुपे होंगे। अगर आपने पिछली कड़ियों को सही से पढा होगा तो आपको जवाब ढूँढने में मुश्किल नहीं होगी, नहीं तो आपको थोड़ी मेहनत करनी होगी। और हाँ, हर बार पहला सही जवाब देने वाले को ४ अंक, उसके बाद २ अंक और उसके बाद हर किसी को १ अंक मिलेंगे। इन १० कड़ियों में जो भी सबसे ज्यादा अंक हासिल करेगा, वह महफ़िल-ए-गज़ल में अपनी पसंद की ५ गज़लों की फरमाईश कर सकता है, वहीं दूसरे स्थान पर आने वाला पाठक अपनी पसंद की ३ गज़लों को सुनने का हक़दार होगा। इस तरह चुनी गई आठ गज़लों को हम ५३वीं से ६०वीं कड़ी के बीच पेश करेंगे। और साथ हीं एक बात और- जवाब देने वाले को यह भी बताना होगा कि "अमुक" सवाल किस कड़ी से जुड़ा है। तो ये रहे आज के सवाल: -

१) "महाराष्ट्र प्राईड अवार्ड" से सम्मानित एक फ़नकार जिन्होंने अपने शुरूआती दिनों में "गमन" फ़िल्म का एक गीत गाकर प्रसिद्धि पाई। उस फ़नकार का नाम बताएँ और यह भी बताएँ कि वह कौन-सा गीत है जिसकी हम बातें कर रहे हैं।
२) आज से करीब २३ साल पहले चिट्ठी लेकर आने वाला एक फ़नकार जिसके बड़े भाई ने फिल्म "अभिमान" में लता मंगेशकर के साथ एक दोगाना गया था। उस फ़नकार के नाम के साथ अभिमान फ़िल्म का वह गाना भी बताएँ।


यूँ तो महफ़िल में किसी एक बड़े फ़नकार का आना हीं हमारे लिए बड़े फ़ख्र की बात होती है, इसलिए जब भी "नुसरत फतेह अली खान" साहब या फिर "फ़ैज़ अहमद फ़ैज़" साहब की हमारी महफ़िल में आमद हुई है, हमने उस दिन को किसी जश्न की तरह जिया है, लेकिन उसे क्या कहिएगा जब एक साथ ये दो बड़े फ़नकार आपकी महफ़िल में आने को राज़ी हो जाएँ। कुछ ऐसा हीं आज यहाँ होने जा रहा है। आज हम आपको जो गज़ल सुनवाने जा रहे हैं उसे अपने बेहतरीन हर्फ़ों से सजाया है "फ़ैज़" ने तो अपनी रूहानी और रूमानी आवाज़ से सराबोर किया है "बाबा नुसरत" ने। हम बता नहीं सकते कि इस गज़ल को पेश करते हुए हमें कैसा अनुभव हो रहा है। लग रहा है मानो एक दिन के लिए हीं सही लेकिन जन्नत ने आज अपने दरवाजे हम सब के लिए खोल दिए हैं। चलिए तो फिर, आज की महफ़िल की विधिवत शुरूआत करते हैं और बात करते हैं सबसे पहले "नुसरत फतेह अली खान" की। बहुत ढूँढने पर हमें जनाब राहत फतेह अली खान का एक इंटरव्यु हाथ लगा है। हमारे लिए यह फ़ख्र की बात है कि "राहत" साहब से यह बातचीत हिन्द-युग्म की हीं एक वाहिका "रचना श्रीवास्तव" ने की थी। तो पेश हैं उस इंटरव्यु के कुछ अंश: मैं नुसरत फ़तेह अली खान साहब का भतीजा हूँ और मेरे वालिद फार्रुख फतेह अली खान साहेब को भी संगीत का शौक था बस समझ लीजिये की इसी कारण पूरे घर में ही संगीत का माहौल था। ७ साल की उमर में मैने अपना पहला कार्यक्रम किया था। खाँ साहेब ने मुझे सुना और बहुत तारीफ़ की। उनका कोई बेटा नही था तो उन्होंने मुझे गोद ले लिया था। मैं आज जो कुछ भी हूँ उन्ही की बदौलत हूँ, संगीत के रूह तक पहुँचना उन्हीं से सीखा है। १९८५ में वो मुझे बहर भी ले कर गए। जब भी कभी मै गाता था उनकी तरफ़ ही देख कर गाता था। सभी कहते थे सामने देख कर गाओ, पर मै यदि उनको न देखूँ तो गा ही नहीं सकता था। वो स्टेज पे गाते गाते हीं मुझे बहुत कुछ सिखा देते थे। आप सब तो राजीव शुक्ला को जानते हीं होंगे। जनाब कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य हैं। उनके पास भी नुसरत साहब की कुछ यादें जमा हैं। वे कहते हैं: मैं एक बार लाहौर में प्रसिद्ध गायक नुसरत फतेह अली खान का इंटरव्यू करने गया था, शायद वह उनका आखिरी टेलीविजन इंटरव्यू था। नुसरत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से पुरजोर मांग की थी कि पाकिस्तान के दरवाजे भारतीय कलाकारों के लिए खोल दिए जाने चाहिए। नुसरत शायद पहले ऐसे पाकिस्तानी कलाकार थे जिन्होंने ईमानदारी से यह बात कही थी, वरना नूरजहां से लेकर आबिदा परवीन तक किसी को भी मैंने यह कहते नहीं सुना कि भारतीय कलाकारों को पाकिस्तान में आमंत्रित किया जाना चाहिए। तो इस कदर खुले दिल के थे हमारे "बाबा नुसरत"। बस गम यही है कि ऐसा साफ़-दिल का इंसान अब हमारे बीच नहीं है..लेकिन उनकी आवाज़ तो हमेशा हीं रवां रहेगी।

"बाबा" के बाद अब समय है शायरी की दुनिया के बेताज़ बादशाह "फ़ैज़ अहमद फ़ैज़" की यादें जवां करने की। फ़ैज़ के बारे में अपनी पुस्तक "पाकिस्तान की शायरी" में "श्रीकान्त" कहते हैं: किसी देश की पहचान यदि किसी साहित्यकार के नाते की जाए तो इससे बढ़कर मसिजीवी का सम्मान और क्या हो सकता है ! फ़ैज़ ऐसे ही शायर हुए, जिनकी वजह से लोग पाकिस्तान को जानते थे। वे जेल के बन्द सीख़चों से भी सारी दुनिया के दमित, दलित, शोषित लोगों को जगाते रहे। उर्दू शायरी में प्रगतिवाद की चर्चा बिना फ़ैज़ के अपूर्ण मानी जाती है। फ़ैज़ नज़्मों और ग़ज़लों दोनों के शायर हैं। उनकी रचनाओं में जज़्बाती ज़िंदगी फैली हुई है। फ़ैज़ की शायरी में वर्तमान की व्यथा, विडम्बनाएँ तथा उससे मुक्ति की छटपटाहट स्पष्ट-अस्पष्ट दृष्टव्य हैं। फ़ैज़ के सम्पूर्ण का निर्माता भले न हो, वर्तमान को यथोचित दिशा देने का यत्न अवश्य करता है, ताकि आगामी पल स्वस्थ तथा सुन्दर हो। फ़ैज़ ने शिल्प तथा विषयगत क्रान्तिकारी परिवर्तन किए, जिसका प्रभाव आज तक कुछ उर्दू कवियों में देखा जा सकता है। फ़ैज़ की शायरी में विचार और कला का अनूठा सामंजस्य मिलता है। किसी का परिचय देते समय कोई इससे ज्यादा क्या कहेगा! फ़ैज़ के बारे में किसी लेखक का यह कहना किसी भी लिहाज़ से गलत नहीं है(सौजन्य: भारतीय साहित्य संग्रह): उर्दू शाइरी में फ़ैज़ को ग़ालिब और इक़बाल को पाये का शाइर माना गया है, लेकिन उनकी प्रतिबद्ध प्रगतिशील जीवन-दृष्टि सम्पूर्ण उर्दू शाइरी में उन्हें एक नई बुलन्दी सौंप जाती है। फूलों की रंगो-बू से सराबोर शाइरी से अगर आँच भी आ रही हो तो मान लेना चाहिए कि फ़ैज़ वहाँ पूरी तरह मौजूद हैं। यही उनकी शाइरी की ख़ास पहचान है, यानी रोमानी तेवर में खालिस इन्क़लाबी बात। उनकी तमाम रचनाओं में जैसे एक अर्थपूर्ण उदासी, दर्द और कराह छुपी हुई है, इसके बावजूद वह हमें अद्भुत् रूप से अपनी पस्तहिम्मती के खिलाफ़ खड़ा करने में समर्थ है। कारण, रचनात्मकता के साथ चलने वाले उनके जीवन-संघर्ष। उन्हीं में उनकी शाइरी का जन्म हुआ और उन्हीं के चलते वह पली-बढ़ी। वे उसे लहू की आग में तपाकर अवाम के दिलो-दिमाग़ तक ले गए और कुछ इस अन्दाज़ में कि वह दुनिया के तमाम मजलूमों की आवाज़ बन गई। समय-समय पर हम इसी तरह फ़ैज़ के बारे में बाकी लेखकों और शायरों के विचार आपसे बाँटते रहेंगे। अभी आगे बढते हैं गज़ल की ओर। उससे पहले "फ़ैज़" का लिखा एक बड़ा हीं खुबसूरत शेर पेश-ए-खिदमत है:

तुम आये हो न शब-ए-इन्तज़ार गुज़री है,
तलाश में है सहर बार बार गुज़री है।


वैसे जानकारी के लिए बता दें कि इस गज़ल को "मुज़फ़्फ़र अली" की फ़िल्म "अंजुमन" में भी शामिल किया गया था, जिसमें आवाज़ें थीं संगीतकार खैय्याम और जगजीत कौर की। वह फ़िल्म अपने-आप में हीं अजूबी थी, क्योंकि उसके एक और गाने को शबाना आज़मी ने गाया था। खैर छोड़िये उन बातों को, अभी हम नुसरत साहब की आवाज़ में इस गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं:

कब याद में तेरा साथ नहीं,कब हाथ में तेरा हाथ नहीं,
सद शुक्र के अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं।

मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आयेँ जाँ दे आयेँ,
दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं।

जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है,
ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं।

मैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं, याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँ,
आशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं।

ये बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा,
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

न हुई गर मेरे मरने से तसल्ली न सही,
___ और भी बाकी हो तो ये भी न सही


आपके विकल्प हैं -
a) आजमाईश, b) इम्तहां, c) तन्हाई, d) बेकरारी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "तन्हाई" और शेर कुछ यूं था -

मैं बहुत जल्दी ही घर लौट के आ जाऊँगा,
मेरी तन्हाई यहाँ कुछ दिनों पहरा दे दे...

राहत इंदौरी के इस शेर को सबसे पहली सही पहचाना "सीमा" जी ने। सीमा जी ने वह गज़ल भी पेश की जिससे यह शेर लिया गया है। उस गज़ल का मतला और मक़ता दोनों हीं बड़े हीं शानदार हैं। आप भी देखिए:

शहर में ढूँढ रहा हूँ के सहारा दे दे
कोई हातिम जो मेरे हाथ में कासा दे दे

तुमको राहत की तबीयत का नहीं अंदाज़ा
वो भिखारी है मगर माँगो तो दुनिया दे दे।

इस गज़ल के बाद सीमा जी ने कुछ शेर महफ़िल के सुपूर्द किए। ये रही बानगी:

जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं
हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं (सुदर्शन फ़ाकिर)

तन्हाई की ये कौन सी मन्ज़िल है रफ़ीक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है (शहरयार)

कावे-कावे सख़्तजानी हाय तन्हाई न पूछ
सुबह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का (मनु जी के बड़े अंकल यानि कि मिर्ज़ा ग़ालिब)

निर्मला जी, आपको हमारी पेशकश पसंद आई, इसके लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया। आगे भी हमारा यही प्रयास रहेगा कि गज़लों का यह स्तर बना रहे।

शरद जी, मंजु जी और शन्नो जी ने अपने-अपने स्वरचित शेर पेश किए। शन्नो जी, हौसला-आफ़जाई के लिए आपका किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ। आप तीनों इसी तरह महफ़िल में आते रहें और शेर सुनाते रहें, यही दुआ है। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर(क्रम से):

मेरी तन्हाई मेरे पास न आती है कभी,
जब भी आती है तेरी याद भी आ जाती है।

मेरी तन्हाई के गरजते -बरसते बादल हो ,
यादों के आंसुओं से समुन्द्र बन जाते हो।

तन्हाई के आलम में तन्हाई मुझे भाती
कुछ ऐसे लम्हों में हो जाती हूँ जज्बाती।

अंत में अपने लाजवाब शेरों के साथ महफ़िल में नज़र आए शामिख जी। कुछ शेर जो आपकी पोटली से निकलकर हमारी ओर आए:

शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
गुफ़्तगू तुझ से रहा करती है (परवीन शाकिर)

कुछ न किसी से बोलेंगे
तन्हाई में रो लेंगे (अहमद फ़राज़)

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की
तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरी तन्हाई की (क़तील शिफ़ाई)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, August 28, 2009

शीशा-ए-मय में ढले सुबह के आग़ाज़ का रंग ....... फ़ैज़ के हर्फ़ों को आवाज़ के शीशे में उतारा आशा ताई ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #४०

हफ़िल-ए-गज़ल की ३८वीं कड़ी में हुई अपनी गलती को सुधारने के लिए लीजिए हम हाज़िर हैं शरद जी की पसंद की आखिरी गज़ल लेकर। इस गज़ल के बारे में क्या कहें....सुनते हीं दिल में आशा ताई की मीठी आवाज़ उतर जाती है। आशा ताई हमारी महफ़िल में एक बार पहले भी आ चुकी हैं। उस समय आशा ताई के साथ थे सुर सम्राट ख़य्याम और गज़ल थी "चाहा था एक शख्स को जाने किधर चला गया।" उस वक्त हमें उस गज़ल के गज़लगो का नाम मालूम न था, लेकिन इस बार ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। आज की गज़ल के गज़लगो का ज़िक्र करना खुद में एक गर्व की बात है और हमारी यह खुशकिस्मती है कि आशा ताई की तरह हीं ये साहब भी हमारी महफ़िल में दूसरी बार तशरीफ़ ला रहे हैं। इससे पहले हमने इनकी लिखी एक नज़्म "गुल हुई जाती है अफ़सुर्दा सुलगती हुई शाम" सुनी थी, जिसे अपनी आवाज़ से सजाया था बेग़म आबिदा परवीन ने। उस कड़ी को हमने पूरी तरह से इन्हीं मोहतरम के हवाले कर दिया था और इनके बारे में ढेर सारी बातें की थीं। उसी अंदाज़ और उसी जोश-औ-जुनूं के साथ हम आज की कड़ी को भी इन्हीं के हवाले करते हैं। तो चलिए हम शुरू करते हैं चर्चाओं का सिलसिला बीसवीं सदी के "ग़ालिब" जनाब फ़ैज़ अहमद "फ़ैज़" के साथ। फ़ैज़ को याद करते हुए मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली कहते हैं: फ़ैज़ को वर्तमान से अतीत बने वक़्त का एक बड़ा हिस्सा गुज़र चुका है. इस दौरान केवल आलमी रियासत ही तब्दील नहीं हुई है बल्कि इंसान की सोच भी काफ़ी तब्दील हो चुकी है. कोई 2600 बरस पहले महात्मा बुद्ध ने कहा था कि तब्दीली एक बड़ी हक़ीक़त है लेकिन इससे बड़ी एक हक़ीकत है और वह यह है कि तब्दीली भी तब्दील होती है. वक़्त के साथ बुलबुले भी बदलती हैं और उनके तराने भी. लेकिन इस बनने-बिगड़ने के बावजूद फ़ैज़ के कलाम और उसके एहतिराम में कोई कमी नहीं आई. अपनी ज़िंदगी में जैसे वह पढ़े और सुने जाते थे आज भी उसी तरह दोहराए जाते है, सुनाए जाते हैं और गाए जाते हैं. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने वही लिखा जो उनका अनुभव था. इस अनुभव की रौशनी ने न उनकी आवाज़ को नारा बनाया और न ही उन्होंने अपने दृष्टिकोण का शोर मचाया था. उन्होंने समाज के ग़मो-खुशी को पहले अपना बनाया और फिर उन्हें दूसरों को सुनाया.

मुंबई की एक महफ़िल में फ़ैज़ शरीक थे. फ़ैज़ के लिए सजाई गई उस महफ़िल में अमिताभ बच्चन, रामानंद सागर और दूसरी फ़िल्मी हस्तियों के साथ, सरदार जाफ़री, जज़्बी, जांनिसार अख़्तर, मजरूह सुल्तानपुरी वगैरह शरीक थे. ये सब फ़ैज़ की शोहरत, अजमत और शेरी-ज़हानत (काव्यदृष्टि) के कॉम्पलेक्स से पीड़ित थे. सब अलग-अलग टुकड़ियों में बँटे फ़ैज़ को चर्चा का विषय बनाए हुए थे. कोई कह रहा था कि फ़ैज़ ग़लत ज़ुबान लिखते हैं तो कोई बोल रहा था कि उन्हें यासर अराफ़ात की पत्रिका 'लोटस' ने शोहरत दी है. फ़ैज़ इन सब बातों को दूर-दूर से सुन रहे थे और जाम पर जाम चढ़ा रहे थे और सिगरेट पर सिगरेट सुलगा रहे थे. जब पढ़ने के लिए बुलाया गया तो उन्होंने फ़रमाया कि भाई दुकानें तो सबने एक साथ लगाई थीं. अब इसको क्या कहा जाए. कोई चल गई तो यह उसकी देन है जिसे परवरदिगार दे.


साहित्य-कुंज पर शीशों का मसीहा फ़ैज़ शीर्षक से लिखे अपने आलेख में चंद्र मौलेश्वर प्रसाद "फ़ैज़" का जीवन-वृतांत कुछ यूँ पेश करते हैं: अपने साम्यवादी विचारों के कारण ‘फ़ैज़’ को जेल की हवा भी खानी पडी़ थी। हुआ य़ूं कि १९५१ में, जब चौधरी लियाकत अली खां पाकिस्तान के प्रधान मंत्री थे, तब कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता और साहित्यकार सैय्यद सज्जाद ज़हीर को ‘फ़ैज़’ के साथ उस समय पाया गया जब ये दोनों अपने दो फ़ौजी मित्रों के साथ देखे गये। उन पर मुकदमा चलाया गया जो अब ‘रावलपिंडी कांस्पिरेसी केस’ के नाम से प्रसिद्ध है।‘फ़ैज़’ को चार वर्ष तक कैद में रखा गया था जिसमें तीन माह की कैदे-तन्हाई भी शामिल है। तब उन्होंने कहा था-

मता-ए-लौहो-कलम छिन गई तो क्या गम है
कि खूने-दिल में डुबो ली है उंगलियां मैंने
जबां पे मुहर लगी है तो क्या रख दी है
हर एक हल्का-ए-ज़ंजीर में ज़ुबां मैंने॥..
कोई पुकारो कि उम्र होने आई है
फ़लक को का़फ़िला-ए-रोज़ो शाम ठहराए
सबा ने फिर दरे-ज़िंदां पे आके दी दस्तक
सहर करीब है दिल से कहो न घबराए॥

इसी कैद के दौरान ‘फ़ैज़’ ने कई रचनाएं लिखी जिन्हें ‘दस्ते-सबा’ के नाम से प्रकाशित किया गया है। इस दौरान इतनी राजनैतिक उथल-पुथल होती रही कि सरकारें तेज़ी से बदलीं। नतीजा यह हुआ कि मुकदमा पूरा हुए बगैर ही २० अप्रेल १९५५ के दिन ‘फ़ैज़’ को रिहाई दे दी गई। अपने साम्यवादी विचारों के कारण ‘फ़ैज़’ को १९५८ में फिर एक बार ‘सुरक्षा एक्ट’ के तहत गिरफ़्तार किया गया परंतु अप्रैल १९५९ में रिहा कर दिया गया। इस राजनैतिक उहापोह से तंग आकर ‘फ़ैज़’ लंदन चले गए। जब ग़म की शाम गुज़र गई और उम्मीद की सुबह नज़र आई तो ‘फ़ैज़’ फिर अपनी मातृभूमि को लौट आए। अपने बुढा़पे के दिनों में ‘फ़ैज़’ को दमे का रोग इस कदर सताने लगा कि वे वापिस लाहौर लौट आए। रोग हद से ज़्यादा बढ़ गया और सांस लेने में दिक्कत होने लगी। ‘फ़ैज़’ को लाहौर के मेयो अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने २० नवम्बर १९८५ के दिन इस संसार को अलविदा कहा।
फ़ैज़ हमेशा से हीं एक संवेदनशील कवि रहे हैं। तभी तो जब उनके मित्र हैदराबाद के सुप्रसिद्ध जनकवि मख़दूम मुहीउद्दीन, जिन्होंने तेलंगाना आंदोलन मे भाग लिया था, की मौत हो गई तो फ़ैज़ ने उनको समर्पित करते हुए यह कहा था:

आप की याद आती रही रात भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर


शायद आपको याद होगा कि महफ़िल-ए-गज़ल के एक अंक में हमने छाया गांगुली की गाई हुई एक गज़ल का जिक्र किया था, जिसे फिल्म "गमन" से लिया गया था। उस गज़ल के शुरूआती बोल थे:

आप की याद आती रही रात भर
चांदनी जगमगाती रही रात भर


तो इन दो शेरों में साम्य इसलिए दिख रहा है, क्योंकि उपरोक्त शेर जनाब मख़दूम मुहीउद्दीन द्वारा रचित है। जहाँ मखदूम साहब ने चाँदनी को रात भर जगमगाता पाया है, वहीं उनकी मौत के बाद "फ़ैज़" ने उसी चाँदनी को शरारों-सा जलता हुआ महसूस किया है। दर्द की पराकाष्ठा है ये। यह तो हुई दर्द की बात...अब बारी है खुशियों की। तो पेश है मदहोशी से भरी आज की गज़ल। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज का रंग,
यूँ फ़ज़ा महकी कि बदला मेरे हमराज़ का रंग

साया-ए-चश्म में हैराँ रुख़-ए-रौशन का जमाल
सुर्ख़ी-ए-लब पे परेशाँ तेरी आवाज़ का रंग

बेपिये हों कि अगर लुत्फ़ करो आख़िर-ए-शब
शीशा-ए-मय में ढले सुबह के आग़ाज़ का रंग

चंगो-नय रंग पे थे अपने लहू के दम से
दिल ने लय बदली तो मद्धम हुआ हर साज़ का रंग

इक सुख़न और कि फिर रंग-ए-तकल्लुम तेरा
हर्फ़-ए-सादा को इनायत करे एजाज़ का रंग




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

___ ऐसे भी होंगें ये कभी सोचा न था,
सामने भी था मेरे और वो मेरा न था...


आपके विकल्प हैं -
a) फासले, b) दूरियां, c) अजनबी, d) बेगाने

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "तजुर्बा" और शेर कुछ यूं था -

क्यों डरें ज़िंदगी में क्या होगा,
कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा....

इस शब्द को सबसे पहले सही पहचाना नीरज जी ने और उन्होंने इस शब्द पर क़तील शिफ़ाई साहब का एक भी पेश किया:

ले मेरे तजुर्बों से सबक ऐ मेरे रकीब,
दो चार साल उम्र में तुझसे बड़ा हूँ मैं...

खुबसूरत हैं आँखें तेरी...गज़ल से जुड़ी अपनी यादें शेयर करने के लिए नीरज जी का आभार!

इनके बाद महफ़िल में नज़र आए शामिख साहब। उनके साथ थी जावेद अख्तर साहब की लिखी वह गज़ल जिससे यह शेर लिया गया है। इसके बाद उन्होंने कुछ "फ़िराक़ गोरखपुरी" के तो कुछ अनाम के शेर महफ़िल के सुपूर्द किए। बानगी देखिएगा:

हमारा ये तजुर्बा कि खुश होना मोहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता, कभी आसान नहीं होता

मेरा अपना तजुर्बा है इसे सबको बता देना
हिदायत से तो अच्छा है किसी को मशवरा देना।

शरद जी शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं है...एक गलती आपने की और एक गलती हमने...लेकिन गलती का फल तो अच्छा हीं हुआ..इसी बहाने हमें एक बेहद खुबसूरत गज़ल सुनने को मिल गई। वैसे "तर्जुबा" पर आपके शेर कहाँ है? अहा..मिल गए, थोड़े अंतराल के बाद थे:

इस तरह सौदा किया है आदमी से वक़्त ने
तज़ुर्बे दे कर वो कुछ उसकी जवानी ले गया ।

शन्नो जी ...सदियों बाद आपका स्वागत है :) कहाँ थीं आप...महफ़िल अधुरी थी आपके बिना...खैर अब आ गई हैं तो मत जाईयेगा....आपने तो महफ़िल में आपके तजुर्बे पर हीं दो शेर कह डाले। अच्छा लगा पढकर:

लिखने की तमन्ना है मुझे मगर तजुर्बा ही नहीं
मेरे शेर सुनते ही लोग महफ़िल से भाग जाते हैं.

अगर फरमाइश कहीं से होती मेरी शायरी के लिए
तो शायद सुनने वालों का भी अपना ही तजुर्बा होता.

एक यह भी:
तजुर्बा रहा है हिचकियों से की किसी ने मुझे याद किया
क्या आवाज़ पर भी किसी ने दस्तक दी है आज मुझे.

मंजु जी हर बार की तरह इस बार भी स्वरचित शेर के साथ महफ़िल में नज़र आईं:

तजुर्बा जिन्दगी का कहानियों में बोलता .
दोस्तों ! कोई हंसता तो कोई रोता ,

और अंत में रचना जी के दो शेर:

तजुर्बा अपनों का कुछ इस कदर हुआ मुझे
काटों ने ही नहीं फूलों ने भी दगा दिया मुझे

क्या है माँ की दुआ दोस्तों
मौत टली तो तजुर्बा हुआ दोस्तों

सुमित जी..आप आए अच्छा लगा...बस कोई नया शेर डाल देते तो मज़ा आ जाता... :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए विदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, April 24, 2009

हम देखेंगे... लाज़िम है कि हम भी देखेंगे...

पाकिस्तान से कोई ताज़ा ख़बर है?... ज़रूर कोई बुरी ख़बर होगी। याद नहीं पिछली बार कब इस मुल्क से कोई अच्छी ख़बर सुनने को मिली थी। करेले जैसी ख़बरें वो भी नीम चढ़ी कि उनपर अफ़सोस करने के लिये न तो दिमाग़ के पास फ़ालतू-दिमाग़ रह गया है और न दिल के पास वो धड़कनें जो आंसू में ढल जाती हैं। नहीं दोस्त ये वाक़ई बुरी ख़बर है... और फिर जो कुछ मोबाइल पर कहा गया वो वाक़ई यक़ीन करने वाला नहीं था। इक़बाल बानों नहीं रहीं।

हँसी कब ग़ायब हो गई, बेयक़ीनी कब यक़ीन में बदल गई, पता ही नहीं चला। एक ऐसे मुल्क में जहाँ ख़तरनाक ख़बरें रोज़मर्रा की हक़ीक़त बन चुकी हैं। जहां मौत तमाशा बन चुकी है वहां इक़बाल बानों की मौत ने उस आवाज़ को भी हमसे छीन लिया जो ज़ख़्म भरने का काम करती थी, जो रूह का इलाज थी। “दश्ते तंहाई में ऐ जाने जहां ज़िंदा हैं…” फ़ैज़ की ये नज़्म अगर सुननेवालों के दिलों में ज़िंदा है तो इसकी एक बड़ी वजह इक़बाल बानों की वो आवाज़ है जो इसका जिस्म बन गई। बहरहाल ये सच है कि 21 अप्रैल 2009 को इकबाल बानो अपने चाहने वालों को ख़ुदा हाफिज़ कहके हमेशा-हमेशा के लिये रुख़सत हो गईं। और इसी के साथ ठुमरी, दादरा, ख़याल और ग़ज़ल की एक बेहतरीन ख़िदमतगुज़ार एक न मिटने वाली याद बन कर रह गई।

“हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे... हम देखेंगे” यूनिवर्सिटी के ज़माने से लेकर अब तक जब कभी ये नज़्म गायी गई, बदन में सिरहन दौड़ा गई। कई बार टेप की हुई आवाज़ में इसे सुना और साथ ही सुनीं वो हज़ारों तालियाँ जो लय के साथ-साथ गीत को ऊँचा और ऊँचा उठाती रहीं। मेरी इस बात से आप भी सहमत होंगे कि इस नज़्म के अलावा शायद ही कभी किसी और गीत को जनता का, श्रोताओं का, दर्शकों का इतना गहरा समर्थन कभी मिला हो, हमने तो कभी नहीं देखा-सुना हालांकि सब कुछ देखने-सुनने का कोई दावा भी हम नहीं करते। अवाम की आवाज़ में हुक्मरानों के ख़िलाफ़ पंक्ति दर पंक्ति व्यंग्य की लज़्ज़त महसूस करना और ताली बजाकर उसके साथ समर्थन का रोमांच जिन श्रोताओं की यादों का हिस्सा है उन्हें इक़बाल बानो की मौत कैसे खल रही होगी इसका अंदाज़ा हम लगा सकते हैं।

पता नहीं कितनों को ये इल्म है कि इकबाल बानों की पैदाइश इसी दिल्ली में हुई। दिल्ली घराने के उस्ताद चाँद खान ने उन्हें शास्त्रीय संगीत और लाइट क्लास्किल म्यूज़िक में प्रशिक्षित किया। पहली बार उनकी आवाज़ को लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली से सुना। विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। अगर इजाज़त हो तो ये कहना चाहूँगा कि हमारे पास दो बेगम अख़्तर थीं, विभाजन में हमने एक पाकिस्तान को दे दी। 1952 में, 17 साल की उम्र में उनकी शादी एक ज़मींदार से कर दी गई। इक़बाल बानो की इस शर्त के साथ कि उनके शौहर उन्हें गाने से कभी नहीं रोकेंगे। ताज्जुब है कि मौसिकी के नाम पर, एक इस्लामी गणराज्य में, एक शौहर अपनहे वचन के साथ अंत तक बँधा रहा और इक़बाल बानो की आवाज़ के करिश्में दुनिया सुनती रहीं।
1957 से वो संगीत की अपनी प्रस्तुतियों के द्वारा लोकप्रियता की सीढियाँ चढ़ने लगीं। और जल्दी ही फ़ैज़ के कलाम को गाने की एक्सपर्ट कही जाने लगीं। प्रगतिशील आंदोलन के बैनर तले जब भी, कहीं भी, कोई भी आयोजन हुआ तो इक़बाल बानो की आवाज़ हमेशा उसमें शामिल रही। हर ख़ास और आम ने इस आवाज़ को सराहा, उसे दिल से चाहा। हिंद युग्म उन्हें अपना सलाम पेश करता है।

--नाज़िम नक़वी


दश्ते तंहाई में ऐ जाने जहां ज़िंदा हैं (फैज़ अहमद फैज़)


हम देखेंगे.....लाज़िम है कि हम भी देखेंगे (फैज़ अहमद फैज़)


गोरी तोरे नैना काजर बिन कारे (ठुमरी)

संगत- साबरी खान (सारंगी), ज़ाहिद खान (हारमोनियम), रमज़ान खान (तबला), अबदुल हमीद साबरी (सुरमनदल) और साईद खान (सितार)।


इक़बाल बानो को हिन्द-युग्म की श्रद्धाँजलि

हम देखेंगे का वीडियो

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