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रविवार, 16 अगस्त 2009

छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी....जय विज्ञान है युवा हिन्दुस्तान का नया नारा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 173

स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष पर तिरंगे के तीन रगों से रंगे तीन गानें आप इन दिनों सुन रहे हैं बैक टू बैक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल पर। कल गेरुआ रंग यानी कि वीर रस पर आधारित गीत आप ने सुना, आज का रंग है सफ़ेद, यानी कि शांति, अमन, भाईचारे और प्रगति की बातें। दोस्तों, जब देश भक्ति गीतों की बात आती है तो हम ने अक्सर यह देखा है कि गीतकार ज़्यादातर हमारे इतिहास में से चुन चुन कर देश भक्ति के उदाहरण खोज लाते हैं और हमारे देश की गौरव गाथा का बखान करते हैं। बहुत कम ही गीत ऐसे हैं जिनमें देश के नवनिर्माण, प्रगति और देश के भविष्य के विकास की ओर झाँका गया हो। जैसा कि हमने कहा कि हमारा आज का रंग है सफ़ेद, यानी कि शांति का। और देश में शांत वातावरण तब ही पैदा हो सकते हैं जब हर एक देशवासी को दो वक़्त की रोटी नसीब हो, पहनने के लिए कपड़े नसीब हो, घर नसीब हो। इन सब का सीधा ताल्लुख़ देश के विकास और प्रगति पर निर्भर करता है। ऐसे ही विचारों को गीत के शक्ल में पिरोया है गीतकार प्रेम धवन ने फ़िल्म 'हम हिंदुस्तानी' के उस मशहूर गीत में जिसे आज हम आप के लिए लेकर आये हैं। मुकेश और साथियों की आवाज़ों में और उषा खन्ना के संगीत निर्देशन में वह गीत है "छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे मिलकर नयी कहानी, हम हिंदुस्तानी"। इस गीत में धवन जी ने साफ़ शब्दों में कहा है कि पुरानी बातों पर ज़्यादा ध्यान न देकर मेहनत को ही अपना इमान बनायें।

एस. मुखर्जी निर्मित व राम मुखर्जी निर्देशित १९६० की इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त, जय मुखर्जी और आशा पारेख। फ़िल्म में उषा खन्ना का संगीत कामयाब रहा। अब आ जाइए गीतकार प्रेम धवन पर। धवन साहब देश भक्ति गीतों के बहुत अच्छे गीतकार रहे हैं। आप को शायद मनोज कुमार की फ़िल्म 'शहीद' याद हो जो शहीद भगत सिंह पर बनी थी। इस फ़िल्म में प्रेम धवन ने गानें लिखे और संगीत भी दिया था। देश भक्ति फ़िल्मों में 'शहीद' एक बहुत ही महत्वपूर्ण नाम है। इस फ़िल्म से संबंधित कुछ बातें प्रेम धवन जी ने विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में कहे थे, जिन्हे पढ़ कर आप की आँखें नम हो जायेंगी। "मेरे फ़ौजी भा‍इयों, शहीद भगत सिंह के जीवन पर आधारित एक फ़िल्म मनोज कुमार ने बनायी थी, मैने उसमें गीत लिखे और संगीत भी दिया था। यह मेरी ख़ुशनसीबी है कि भगत सिंह की माँ से मिलने का इत्तेफ़ाक़ हुआ। हम लोग उस गाँव में गए जहाँ भगत सिंह की माँ रहती थीं। उनसे हम लोग मिले और भगत सिंह के जीवन से जुड़ी कई बातें उन्होने हमें बतायीं। उनकी एक बात जो मेरे दिल को छू गयी, वह यह था कि फाँसी से एक दिन पहले वो अपने बेटे से मिलने जब जेल गयीं तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। तब भगत सिंह ने उनसे कहा कि 'माँ, मत रो, अगर तुम रोयोगी तो कोई माँ अपने बेटे को क़ुर्बानी की राह पर नहीं भेज पाएगी'। इसी बात से प्रेरीत हो कर मैने इस फ़िल्म 'शहीद' में यह गीत लिखा "तू न रोना के तू है भगत सिंह की माँ, मर के भी तेरा लाल मरेगा नहीं, घोड़ी चढ़ के तो लाते हैं दुल्हन सभी, हँस कर हर कोई फाँसी चढ़ेगा नहीं"।" दोस्तों, इन बातों को लिखते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गये हैं, आँखें भी बोझल हो रही हैं, अब और ज़्यादा लिखा नहीं जा रहा। सुनिए आज का गीत फ़िल्म 'हम हिंदुस्तानी' का। कुछ 'रिकार्ड्स' पर यह गीत ६:३० मिनट का है तो कुछ 'रिकार्ड्स' पर ३:३० मिनट का। हम आप के लिए पूरे साढ़े ६ मिनट वाला वर्ज़न ढ़ूंढ लाए हैं। इस गीत के बोलों की जितनी तारीफ़ की जाए कम ही होगी। मुझे निम्नलिखित अंतरा सब से ज़्यादा अच्छा लगता है, आप भी ज़रूर बताइयेगा कि आप को इस गीत का कौन सा अंतरा सब से ज़्यादा भाता है।

"दाग़ ग़ुलामी का धोया है जान लुटाके,
दीप जलाये हैं ये कितने दीप बुझाके,
ली है आज़ादी तो फिर इस आज़ादी को,
रखना होगा हर दुश्मन से आज बचाके,
नया ख़ून है नयी उमंगें अब है नयी जवानी,
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल के गीत का थीम है -"जय किसान".
2. इस अमर गीत के गीतकार ने इसी वर्ष हमसे विदा कहा है.
3. एक अंतरे में तिरेंगे के रंगों को देशभक्तों के नामों से जोड़ा गया है.

पिछली पहेली का परिणाम -
दीपाली जी सही जवाब. अब आप भी पराग जी के बराबर १२ अंकों पर आ गयी हैं...बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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