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रविवार, 20 दिसंबर 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (२३)

मखमली आवाज़ के जादूगर तलत महमूद साहब को संगीत प्रेमी अक्सर याद करते है उनकी दर्द भरी गज़लों के लिए. उनके गाये युगल गीत उतने याद नहीं आते है. अगर बात मेरी पसंदीदा गायिका गीता दत्त जी की हो तो उनके हलके-फुल्के गीत पसंद करने वालों की संख्या अधिक है. थोड़े संगीत प्रेमी उनके गाये भजन तथा दर्द भरे गीत भी पसंद करते है. गीताजी के गाये युगल गीतों की बात हो तो, मुहम्मद रफ़ी साहब के साथ उनके गाये हुए सुप्रसिद्ध गीत ही ज्यादा जेहन में आते है. सत्तर और अस्सी के दशक के आम संगीत प्रेमी को तो शायद यह पता भी नहीं था, कि तलत महमूद साहब और गीता दत्त जी ने मिलकर एक से एक खूबसूरत और सुरीले गीत एक साथ गाये है. सन १९८४ के करीब एक नौजवान एच एम् वी (हिज़ मास्टर्स वोईस ) कंपनी में नियुक्त किया गया. यह नौजवान शुरू में तो शास्त्रीय संगीत के विभाग में काम करता था, मगर उसे पुराने हिंदी फ़िल्मी गीतों में काफी दिलचस्पी थी. गायिका गीता दत्त जी की आवाज़ का यह नौजवान भक्त था. उसीके भागीरथ प्रयत्नोके के बाद एक एल पी (लॉन्ग प्लेयिंग) रिकार्ड प्रसिद्द हुआ "दुएट्स टू रेमेम्बर" (यादगार युगल गीत) : तलत महमूद - गीता दत्त". पहेली बार तलत महमूद साहब और गीता दत्त जी के गाये हुए सुरीले और मधुर गीत आम संगीत प्रेमी तक पहुंचे. खुद तलत महमूद साहब इस नौजवान से प्रभावित हुए और जाहीर है बहुत प्रसन्न भी हुए. इस नौजवान का नाम है श्री तुषार भाटिया जी.

इन्ही की अथक परिश्रमों के के बाद गीता जी के गाये गानों के कई एल पी (लॉन्ग प्लेयिंग) रिकार्ड सिर्फ तीन साल में एच एम् वी (हिज़ मास्टर्स वोईस) कंपनी ने बनाकर संगीत प्रेमियों को इनसे परिचय कराया. आगे चलकर श्री हरमिंदर सिंह हमराज़ जी ने हिंदी फिल्म गीत कोष प्रसिद्द किये, जिनसे यह जानकारी मिली कि तलत महमूद साहब और गीता दत्त जी ने मिलकर कुल २६ गीत हिंदी फिल्मों के लिए गाये तथा एक एक गैर फ़िल्मी गीत भी गाया. गौर करने वाली बात यह है कि जिन संगीतकारों ने तलत साहब को एक से एक लाजवाब सोलो गीत दिए (नौशाद, अनिल बिस्वास, मदनमोहन) उन्होंने तलत साहब और गीताजी के साथ युगल गीत नहीं बनाए. उसी तरह बर्मनदा, नय्यर साहब, चित्रगुप्त साहब ने भी गीताजी और तलत साहब के लिए युगल गीत नहीं बनाए. इन २६ गीतों के मौसीकार है : हेमंत कुमार, हंसराज बहल, सी रामचंद्र, खेमचंद प्रकाश, विनोद, बसंत प्रकाश , बुलो सी रानी, हुस्नलाल - भगतराम , राम गांगुली , जिम्मी सिंह, सुबीर सेन, दान सिंह , सन्मुख बाबू, हफीज खान, अविनाश व्यास, घंटासला, रोबिन चत्तेर्जी और मदन मोहन. एक बात तो जाहीर है, कि इनमें से ज्यादातर गीत कम बजेट वाली फिल्मों के लिए बनाए गाये थे. मगर इसका यह मतलब नहीं की हम उनका लुत्फ़ नहीं उठा सकते. लीजिये आज प्रस्तुत है इन्ही दो मधुर आवाजों से सजे हुए कुछ दुर्लभ गीत:

१) पहली प्रस्तुती है फिल्म मक्खीचूस (१९५६) से, जिसके कलाकार थे महिपाल और श्यामा. संगीतकार है विनोद (एरिक रोबर्ट्स) और गीतकार है पंडित इन्द्र. यह एक हास्यरस से भरी फिल्म है और यह गीत भी हल्का फुल्का रूमानी और रंजक है. अभिनेता महिपाल ज्यादातर पौराणीक फिल्मों के लिए प्रसिद्द थे, मगर इस फिल्म में उनका किरदार ज़रूर अलग है. गीताजी की आवाज़ और श्यामा के जलवे गीत को और भी मजेदार बना देते है. तलत साहब भी इस हास्य-प्रणय गीत में मस्त मौला लग रहे है. इस गीत के रिकार्ड पर एक अंतरा कम है, इसलिए हमने यह गीत फिल्म के ओरिजिनल साउंड ट्रैक से लिया है, जिसमे वह अंतरा ("जेंटल मन समझ कर हमने तुमको दिल दे डाला") भी मौजूद है.

Makkhee Choos - O Arabpati Ki Chhori - Geeta Dutt & Talat Mahmood



२) अगला गीत है बिलकुल अलग भावों में, फिल्म संगम (१९५४) से. संगीतकार है राम गांगुली, गीतकार हैं शमशुल हुदा बिहारी साहब. फ़िल्म के कलाकार है शेखर, कामिनी कौशल, शशिकला आदी. यह गीत प्रणय रस में डूबा हुआ है और सादे बोलों को राम गांगुली साहब ने खूबसुरती से स्वर बद्ध किया है. गीत में "संगम" शब्द भी आता है, जिससे यह पता चलता है कि यह फिल्मका शीर्षक गीत हो सकता है. इस फिल्म का वीडियो उपलब्ध ना होने के कारण इस बात का पता नहीं कि यह गीत मुख्य कलाकारों पर फिल्माया गया था या नहीं. चलिए इस सुरीले गीत का आनंद लेते है

Sangam - Raat hain armaan bhari - Geeta Dutt & Talat Mahmood



३) हंसराज बहल एक और ऐसे संगीतकार है जो अत्यंत प्रतिभाशाली होने के बावजूद आज की पीढी को उनके बारे में ख़ास जानकारी नहीं है. सन १९५५ में एक फिल्म आयी थी "दरबार" जिसके गीत लिखे थे असद भोपाली साहब ने और संगीत था हंसराज बहल साहब का. इस फिल्म के बारे में अन्य कोई भी जानकारी अंतर्जाल पर उपलब्द्ध नहीं है.(इसी शीर्षक की एक फिल्म पाकिस्तान में सन १९५८ में बनी थी, जिसके बारे में कुछ जानकारी अंतर्जाल पर उपलब्द्ध है). प्रस्तुत गीत विरहरस में डूबा हुआ है, और ऐसे गीत को तलत साहब के अलावा और कौन अच्छे से गा सकता है. आप ही इसे सुनिए और सोचिये की हंसराज बहल, असद भोपाली, तलत महमूद और गीता दत्त के प्रयासों से सजे इस गीत को संगीत प्रेमियों ने क्यों भुला दिया ?

Darbaar - Kyaa paaya duniyane - Geeta Dutt & Talat Mahmood



४) संगीतकार और गायक हेमंत कुमार जितने प्रतिभाशाली कलाकार थे उससे भी ज्यादा महान इंसान थे. खुद गायक होते हुए भी कई अन्य गायाकों से भी उन्होंने गीत गवाए. मुहम्मद रफ़ी, तलत महमूद, सुबीर सेन, किशोर कुमार ऐसे कई नाम इस में शामिल है. लीजिये अब प्रस्तुत हैं फिल्म बहू (१९५५) का गीत जिसके संगीतकार है हेमंत कुमार और गीतकार हैं एक बार फिर से शमशुल हुदा बिहारी साहब. फिल्म बहु के निर्देशक थे शक्ति सामंता साहब और कलाकार थे कारन दीवान, उषा किरण, शशिकला आदी. इस फिल्म में हेमंत कुमार साहब ने तलत महमूद और गीता दत्त से एक नहीं,दो गीत गवाए. दोनों भी सुरीले और मीठे प्रणय गीत है. आज का प्रस्तुत गीत है "देखो देखो जी बलम".

Bahu - Dekho dekho jee balam - Geeta Dutt & Talat Mahmood



५) अब बारी है फिल्म शबिस्तान (१९५१) की. आज हमने इस फ़िल्म के एक नहीं दो गीत चुने है. पहला गीत है "हम हैं तेरे दीवाने, गर तू बुरा ना माने". इस गीत की खासियत यह है की इसकी पहली दो पंक्तिया संगीतकार सी रामचंद्र (चितलकर) साहब ने खुद गाई है मगर रिकार्ड पर उनका नाम ना जाने क्यों नहीं आया. यह गीत भी प्रणय रस और हास्य रस से भरपूर है. "अरे हम को चला बनाने"..ऐसी पंक्तिया अपने शहद जैसी आवाज़ में गीता जी ही गा सकती है. गीत पूरी तरह छेड़ छाड़ से भरा हुआ है. गीतकार कमर जलालाबादी साहब ने इसे खूब सवाल जवाब के तरीके से लिखा है.

Shabistan - Hum hain tere diwaane - Geeta Dutt & Talat Mahmood



६) और अब सुनिए इसी फिल्म का एक और गीत, "कहो एक बार मुझे तुमसे प्यार". गीतकार हैं कमर जलालाबादी साहब और संगीतकार सी रामचंद्र (चितलकर) साहब. गौर करने की बात यह भी है कि इसी फिल्म के कुछ गीत मदन मोहन साहब ने भी स्वरबद्ध किये. उन्होंने भी तलत महमूद और गीता दत्त के आवाजों में एक छेड़ छाड़ भरा प्रणय गीत बनाया था, उसे फिर कभी सुनेंगे. फिल्म के कलाकार थे श्याम और नसीम बानो (अभिनेत्री सायरा बानो की माँ). यह बहुत दुःख की बात है कि इस फिल्म के शूटिंग के दौरान अभिनेता श्याम घोड़े पर से गिरे और उनकी मृत्यु हो गयी.

Shabistan - Kaho ek baar - Geeta Dutt & Talat Mahmood



७) आज की अन्तिम प्रस्तुति हैं एक ऐसी फिल्म से जिसका नाम शायद ही किसी को मालूम होगा. सन १९५९ में यह फिल्म आयी थी जिसके संगीतकार थें मनोहर और गीत लिखे थे अख्तर रोमानी ने. फिल्म का नाम है "डॉक्टर जेड" (Doctor Z) और नाम से तो ऐसा लगता है कि यह कम बजट की कोई फिल्म होगी. ऐसी फिल्म में भी तलत महमूद और गीता दत्त के आवाजों में यह अत्यंत मधुर और सुरीला गीत बनाया गया. हमारी खुश किस्मती हैं कि पचास साल के बाद भी हम इस को सुन सकते है और इसका आनंद उठा सकते है. "दिल को लगाके भूल से, दिल का जहां मिटा दिया, हमने भरी बहार में अपना चमन जला दिया"..वाह वाह कितना दर्द भरा और दिल की गहराई को छू लेने वाला गीत है यह.

Doctor Z - Dilko lagake bhool se - Geeta Dutt & Talat Mahmood



हमें आशा है कि आप भी इन दुर्लभ गीतों का आनंद उठाएंगे और हमारे साथ श्री तुषार भाटिया जी के आभारी रहेंगे.

प्रस्तुति- पराग सांकला



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

सोमवार, 23 नवंबर 2009

ए री मैं तो प्रेम दीवानी....मीरा के रंग रंगी गीता दत्त की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 271

२३ नवंबर १९३०। स्थान बंगाल का फ़रीदपुर, जो आज बंगलादेश का हिस्सा है। एक ज़मीनदार परिवार में जन्म हुआ था एक बच्ची का। १९४२ के आसपास वो परिवार साम्प्रदायिक दंगों से अपने आप को बचते बचाते आ पहुँची बम्बई नगरी। लाखों की सम्पत्ति और ज़मीन जायदाद को युंही छोड़कर बम्बई आ पहुँचे इस परिवार ने दो कमरे का एक मकान भाड़े पर लिया। गायन प्रतिभा होने की वजह से यह बच्ची हीरेन्द्रनाथ नंदी से संगीत की तालीम ले रही थी। दिन गुज़रते गए और यह बच्ची भी बड़ी होती गई। १६ वर्ष की आयु में एक रोज़ यह लड़की अपने घर पर रियाज़ कर रही थी जब उसके घर के नीचे से गुज़र रहे थे फ़िल्म संगीतकार पंडित हनुमान प्रसाद। उसकी गायन और आवाज़ से वो इतने प्रभावित हुए कि वो कौतुहल वश सीधे उसके घर में जा पहुँचे। पंडित हनुमान प्रसाद से उसकी यह मुलाक़ात उसकी क़िस्मत को हमेशा हमेशा के लिए बदलकर रख दी। पंडित प्रसाद ने फ़िल्म 'भक्त प्रह्लाद' में इस लड़की को पहला मौका दिया और इस तरह से फ़िल्म जगत को मिली एक लाजवाब पार्श्व गायिका के रूप में गीता रॉय, जो आगे चलकर गीता दत्त के नाम से मशहूर हुईं। दोस्तों, आज २३ नवंबर, गीता जी के जनम दिवस के उपलक्ष पर हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं दस कड़ियों की एक ख़ास लघु शृंखला 'गीतांजली'। गीता दत्त के चाहने वालो की जब बात चलती है, तो इंटरनेट से जुड़े संगीत रसिकों को सब से पहले जिस शख्स का नाम याद आता है वो हैं हमारे अतिपरिचित पराग सांकला जी। गीता जी के गीतों के प्रति उनका प्रेम, जुनून और शोध सराहनीय रहा है। और इसीलिए प्रस्तुत शृंखला के लिए उनसे बेहतर भला और कौन होता जो गीता जी के गाए १० गानें चुनें और उनसे संबंधित जानकारियाँ भी हमें उपलब्ध कराएँ। और उन्होने बहुत ही आग्रह के साथ हमारे इस अनुरोध को ठीक वैसे ही पूरा किया जैसा हमने चाहा था। तो आज से अगले दस दिनों तक हम सुनेंगे पराग जी के चुने हुए गीता जी के गाए १० ऐसे गानें जो फ़िल्माए गये हैं सुनहरे दौर के दस अलग अलग अभिनेत्रियों पर। इस पूरी शृंखला के लिए शोध कार्य पराग जी ने ही किया है, हमने तो बस उनके द्वारा उपलब्ध कराई हुई जानकारी का हिंदी में अनुवाद किया है।

जब गीता रॉय शुरु शुरु में आईं थीं तो उन्होने कई फ़िल्मों में भक्ति रचनाएँ गाईं थीं। उनकी आवाज़ में भक्ति गीत इतने पुर-असर हुआ करते थे कि उन रचनाओं को सुनते हुए ऐसा लगता था कि जैसे ईश्वर से सम्पर्क स्थापित हो रहा हो! तो क्यों ना हम 'गीतांजली' की शुरुआत एक भक्ति रचना के साथ ही करें। और ऐसे में १९५० की फ़िल्म 'जोगन' का ज़िक्र करना अनिवार्य हो जाता है। जी हाँ, आज गीता जी की आवाज़ सज रही है नरगिस के होंठों पर। रणजीत मूवीटोन की इस फ़िल्म का निर्देशन किया था किदार शर्मा ने और नायक बने दिलीप कुमार। संगीतकार बुलो सी. रानी के करीयर की सब से चर्चित फ़िल्म रही 'जोगन' जिसमें उन्होने एक से एक मीरा भजन स्वरबद्ध किए जो गीता जी की आवाज़ पाकर धन्य हो गए। "घूंघट के पट खोल रे", "मत जा मत जा जोगी", "ए री मैं तो प्रेम दीवानी", "प्यारे दर्शन दीजो आए" और "मैं तो गिरिधर के घर जाऊँ" जैसे मीरा भजन एक बार फिर से जीवित हो उठे। मीरा भजनों के अतिरिक्त इस फ़िल्म में किदार शर्मा, पंडित इंद्र और हिम्मतराय शर्मा ने भी कुछ गीत लिखे। लेकिन आज हम सुनेंगे मीरा भजन "ए री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरो दर्द ना जाने कोई"। पाठकों की जानकारी के लिए हम बता दें कि इस फ़िल्म का "मत जा जोगी" भजन गीता जी के पसंदीदा १० गीतों की फ़ेहरिस्त में शोभा पाता है जो उन्होने जारी किया था सन् १९५७ में। दोस्तों, क्योंकि आज गीता जी के साथ साथ ज़िक्र हो रहा है अभिनेत्री नरगिस जी का, तो उनके बारे में भी हम कुछ बताना चाहेंगे। नरगिस हिंदी सिनेमा के इतिहास का एक चमकता हुआ सितारा हैं जिन्होने सिनेमा के विकास में और सिनेमा को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। १९३५ में बाल कलाकार के रूप में फ़िल्म 'तलाश-ए-हक़' में पहली बार नज़र आईं थीं, लेकिन उनका अभिनय का सफ़र सही मायने में शुरु हुआ सन् १९४२ में फ़िल्म 'तमन्ना' के साथ। ४० और ५० के दशकों में वो छाईं रहीं। युं तो वो एक डॊक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन क़िस्मत उन्हे फ़िल्म जगत में ले आई। उनकी यादगार फ़िल्मों में शामिल है 'बरसात', 'अंदाज़', 'जोगन', 'आवारा', 'दीदार', 'श्री ४२०', 'चोरी चोरी' और इन सब से उपर १९५७ की फ़िल्म 'मदर इंडिया'। १९५८ में सुनिल दत्त से विवाह के पश्चात उन्होने अपना फ़िल्मी सफ़र समाप्त कर दिया और अपना पूरा ध्यान अपने परिवार पे लगा दिया। कैंसर की बीमारी ने उन्हे घेर लिया और ३ मई १९८१ को उन्होने इस संसार को अलविदा कह दिया। और इसके ठीक ५ दिन बाद, ७ मई १९८१ को प्रदर्शित हुई उनके बेटे संजय दत्त की पहली फ़िल्म 'रॉकी'। इस फ़िल्म के प्रीमीयर ईवेंट में एक सीट ख़ाली रखी गई थी नरगिस के लिए। और आइए अब सुनते हैं नरगिस पर फ़िल्माया गीता रॉय की आवाज़ में फ़िल्म 'जोगन' से यह मीरा भजन जिसे सुनते हुए आप एक दैवीय लोक में पहुँच जाएँगे। आज गीता जी के जनम दिवस पर हम हिंद-युग्म की तरफ़ से उन्हे अर्पित कर रहे हैं अपने विनम्र श्रद्धा सुमन!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये गीत है गीता जी का गाया मीना कुमारी के लिए.
२. गीतकार हैं अंजुम जयपुरी.
३. मुखड़े में शब्द है - "नस".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -

नयी विजेता हमें मिली है इंदु जी के रूप में, इंदु जी आपका खता खुला है ३ अंकों से, बधाई, अवध जी आपने बहुत ही दिलचस्प बात बताई, क्या शांति माथुर के बारे में आपके पास और कोई जानकारी उपलब्ध है ? मतलब वो इन दिनों कहाँ है क्या कर रही हैं आदि, उनके बारे में हम सब बहुत कम जानते हैं...पाबला जी और निर्मला जी आभार..

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

रविवार, 1 नवंबर 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (१९) फिल्म गीतकार शृंखला भाग १

जब फ़िल्मी गीतकारों की बात चलती है तो कुछ गिनती के नाम ही जेहन में आते हैं, पर दोस्तों ऐसे अनेकों गीतकार हैं, जिनके नाम समय के गर्द में कहीं खो से गए हैं, जिनके लिखे गीत तो हम आज भी शौक से सुनते हैं पर उनके नाम से अपरिचित हैं, और इसके विपरीत ऐसा भी है कि कुछ बेहद मशहूर गीतकारों के लिखे बेहद अनमोल से गीत भी उनके अन्य लोकप्रिय गीतों की लोकप्रियता में कहीं गुमसुम से खड़े मिलते हैं, फ़िल्मी दुनिया के गीतकारों पर "रविवार सुबह की कॉफी" में हम आज से एक संक्षिप्त चर्चा शुरू कर रहे हैं, इस शृंखला की परिकल्पना भी खुद हमारे नियमित श्रोता पराग सांकला जी ने की है, तो चलिए पराग जी के संग मिलने चलें सुनहरे दौर के कुछ मशहूर/गुमनाम गीतकारों से और सुनें उनके लिखे कुछ बेहद सुरीले/ सुमधुर गीत. हम आपको याद दिला दें कि पराग जी मरहूम गायिका गीत दत्त जी को समर्पित जालस्थल का संचालन करते हैं.


१) शैलेन्द्र

महान गीतकार शैलेन्द्र जी का असली नाम था "शंकर दास केसरीलाल शैलेन्द्र". उनका जन्म हुआ था सन् १९२३ में रावलपिन्डी (अब पाकिस्तान में). भारतीय रेलवे में वास मुंबई में सन् १९४७ में काम कर रहे थे. उनकी कविता "जलता है पंजाब " लोकप्रिय हुई और उसी दौरान उनकी मुलाक़ात राज कपूर से हुई. उसीके साथ उनका फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ फिल्म बरसात से ! शंकर जयकिशन की जोड़ी के साथ साथ शैलेंद्र ने सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी और कई संगीतकारों के साथ काम किया. उनके राज कपूर के लिए लिखे गए कई गीत लोकप्रिय है, मगर आज हम उनके एक दुर्लभ गीत के बारे में बात करेंगे. लीजिये उन्ही का लिखा हुआ यह अमर गीत जिसे गाया हैं मखमली आवाज़ के जादूगर तलत महमूद ने फिल्म पतिता (१९५३) के लिए. संगीत शंकर जयकिशन का है और गीत फिल्माया गया हैं देव आनंद पर. सुप्रसिद्ध अंगरेजी कवि पी बी शेल्ली ने लिखा था "Our sweetest songs are those that tell of saddest thoughts".शैलेन्द्र ने इसी बात को लेकर यह अजरामर गीत लिखा और जैसे कि पी बी शेल्ली के विचारों को एक नए आसमानी बुलंदी पर लेकर चले गए. गीतकार शैलेन्द्र पर विस्तार से भी पढें यहाँ.



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२) इन्दीवर

बप्पी लाहिरी के साथ इन्दीवर के गाने सुननेवालों को शायद यह नहीं पता होगा की इन्दीवर (श्यामलाल राय) ने अपना पहला लोकप्रिय गीत (बड़े अरमानों से रखा हैं बलम तेरी कसम) लिखा था सन् १९५१ में फिल्म मल्हार के लिए. कहा जाता है की सन् १९४६ से १९५० तक उन्होंने काफी संघर्ष किया, मगर उसके बारे में कोई ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है. रोशन के साथ इन्दीवर को जोड़ी बन गयी, मगर दूसरे लोकप्रिय संगीतकारों के साथ उन्हें गीत लिखने के मौके (खासकर पचास के दशक में) ज्यादा नहीं मिले. बाद में कल्यानजी - आनंद जी के साथ इन्दीवर की जोड़ी बन गयी. समय के साथ इन्दीवर ने समझौता कर लिया और फिर...

खैर, आज हम महान गायक मुकेश, संगीतकार रोशन और गीतकार इन्दीवर का एक सुमधुर गीत लेकर आये है जिसे परदे पर अभिनीत किया गया था संजीव कुमार (और साथ में मुकरी और ज़हीदा पर). फिल्म है अनोखी रात जो सन् १९६८ में आयी थी. यह फिल्म रोशन की आखरी फिल्म थी और इस फिल्म के प्रर्दशित होने से पहले ही उनका देहांत हुआ था.

इतना दार्शनिक और गहराई से भरपूर गीत शायद ही सुनने मिलता है.



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३) असद भोपाली

असद भोपाली (असद खान) ऐसे गीतकार हैं जिन्हें लगभग ४० सालके संघर्ष के बाद बहुत बड़ी सफलता मिली. उनका लिखा हुआ एक साधारण सा गीत "कबूतर जा जा जा " जैसे के देश के हर युवक युवती के लिए प्रेमगीत बन गया. यह गीत था फिल्म मैंने प्यार किया (१९८९) का जिसे संगीतबद्ध किया था राम- लक्ष्मण ने.

असद भोपाली की पहली फिल्मों में से एक थी बहुत बड़े बजट की फिल्म अफसाना (१९५१) जिसमे थे अशोक कुमार, वीणा, जीवन, प्राण, कुलदीप कौर आदि. संगीत था उस ज़माने के लोकप्रिय हुस्नलाल भगतराम का. इसके गीत (और फिल्म भी) लोकप्रिय रहे मगर असद चोटी के संगीतकारोंके गुट में शामिल ना हो सके. सालों साल तक वो एन दत्ता, हंसराज बहल, रवि, सोनिक ओमी, उषा खन्ना, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल आदि संगीतकारों के साथ करते रहे मगर वह कामयाबी हासिल न कर सके जो उन्हें फिल्म मैंने प्यार किया से मिली.

लीजिये फिल्म अफसाना (१९५१) का लता मंगेशकर का गाया हुआ यह गीत सुनिए जिसे असद भोपाली ने दिल की गहराईयों से लिखा है



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४) कमर जलालाबादी

अमृतसर के पास एक छोटा सा गाँव हैं जिसका नाम है जलालाबाद , जहां पर जन्म हुआ था ओमप्रकाश (कमर जलालाबादी) का. महान फिल्मकार दल्सुखलाल पंचोली ने उन्हें पहला मौका दिया था फिल्म ज़मीनदार (१९४२) के लिए. उन्होंने चालीस और पचास के दशक में सदाबहार और सुरीले गीत लिखे. उन्होंने सचिन देव बर्मन के साथ उनकी पहली फिल्म एट डेज़ (१९४६) में भी काम किया. उस ज़माने के लगभग हर संगीतकार के साथ (नौशाद और शंकर जयकिशन के अलावा) उन्होंने गीत लिखे.

उनका लिखा हुआ "खुश हैं ज़माना आज पहली तारीख हैं"(फिल्म पहली तारीख १९५४) का गीत आज भी बिनाका गीतमाला पर महीने की पहली तारीख को बजता है. रिदम किंग ओ पी नय्यर के साथ भी उन्होंने "मेरा नाम चीन चीन चू" जैसे लोकप्रिय गीत लिखे.

लीजिये उनका लिखा हुआ रेलवे की तान पर थिरकता हुआ गीत "राही मतवाले" सुनिए. इसे गाया है तलत महमूद और सुरैय्या ने फिल्म वारिस (१९५४) के लिए. मज़े की बात है कि गीत फिल्माया भी गया था इन्ही दो कलाकारों पर.



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५) किदार शर्मा

महान फिल्म निर्माता, निर्देशक और गीतकार किदार शर्मा की जीवनी "The one and lonely Kidar Sharma" हाल ही में प्रर्दशित हुई थी. जिस गीतकार ने सैंकडो सुरीले गीत लिखे उन्हें आज ज़माना भूल चूका है. कुंदन लाल सहगल की फिल्म "देवदास " के अजरामर गीत इन्ही के कलम से लिखे गए है. "बालम आये बसों मोरे मन में" और "दुःख के अब दीन बीतत नाही". उनके लिखे हुए लोकप्रिय गीत है इन फिल्मों मे : नील कमल (१९४७), बावरे नैन (१९५०), सुहाग रात (१९४८). फिल्म जोगन (१९५०) का निर्देशन भी किदार शर्मा का है.

आज की तारीख में किदार शर्मा को कोई अगर याद करता हैं तो इस बात के लिए की उन्होंने हिंदी फिल्म जगत को राज कपूर, मधुबाला, गीता बाली जैसे सितारे दिए. मुबारक बेग़म का गाया "कभी तनहाईयों में यूं हामारी याद आयेगी" भी इन्ही किदार शर्मा का लिखा हुआ है. इसे स्वरबद्ध किया स्नेहल भाटकर (बी वासुदेव) ने और फिल्माया गया हैं तनुजा पर. मुबारक बेग़म के अनुसार यह गीत अन्य लोकप्रिय गायिका गानेवाली थी मगर किसी कारणवश वह ना आ सकी और मुबारक बेग़म को इस गीत को गाने का मौका मिला. उन्होंने इस गीत के भावों को अपनी मीठी आवाज़ में पिरोकर इसे एक यादगार गीत बना दिया.



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प्रस्तुति -पराग सांकला


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

रविवार, 19 जुलाई 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (10)

पराग सांकला जी से हमारे सभी नियमित श्रोता परिचित हैं. इन्हें हम आवाज़ पर गीता दत्त विशेषज्ञ कहते हैं, सच कहें तो इनके माध्यम से गीता दत्त जी की गायिकी के ऐसे अनछुवे पहलूओं पर हम सब का ध्यान गया है जिसके बारे में शायाद हम कभी नहीं जान पाते. एक बार पहले भी पराग ने आपको गीता जी के गाये कुछ मधुर और दुर्लभ प्रेम गीत सुनवाए थे, इसी कड़ी को आज आगे बढाते हुए आज हम सुनते हैं गीता जी के गाये १४ और प्रेम गीत. ये हिंद युग्म परिवार की तरह से भाव भीनी श्रद्धाजंली है गायिका गीता दत्त को जिनकी कल ३७ वीं पुण्यतिथि है. पेश है पराग जी के नायाब संकलन में से कुछ अनमोल मोती इस रविवार सुबह की कॉफी में

गीता रॉय (दत्त) ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत प्रेमगीत गाये हैं मगर जिनके बारे में या तो कम लोगों को जानकारी हैं या संगीत प्रेमियों को इस बात का शायद अहसास नहीं है. इसीलिए आज हम गीता के गाये हुए कुछ मधुर मीठे प्रणय गीतों की खोज करेंगे.

सन १९४८ में पंजाब के जाने माने संगीतकार हंसराज बहल के लिए फिल्म "चुनरिया" के लिए गीता ने गाया था "ओह मोटोरवाले बाबू मिलने आजा रे, तेरी मोटर रहे सलामत बाबू मिलने आजा रे". एक गाँव की अल्हड गोरी की भावनाओं को सरलता और मधुरता से इस गाने में गीता ने अपनी आवाज़ से सजीव बना दिया है.



सन १९५० में फिल्म "हमारी बेटी" के लिए जवान संगीतकार स्नेहल भाटकर (जिनका असली नाम था वासुदेव भाटकर) ने मुकेश और गीता रॉय से गवाया एक मीठा सा युगल गीत "किसने छेड़े तार मेरी दिल की सितार के किसने छेड़े तार". भावों की नाजुकता और प्रेम की परिभाषा का एक सुन्दर उदाहरण हैं यह युगल गीत जिसे लिखा था रणधीर ने.



बावरे नैन फिल्म में संगीतकार रोशन को सबसे पहला सुप्रसिद्ध गीत (ख़यालों में किसी के) देने के बाद अगले साल गीता रॉय ने रोशन के लिए फिल्म बेदर्दी के लिए गाया "दो प्यार की बातें हो जाए, एक तुम कह दो, एक हम कह दे". बूटाराम शर्मा के लिखे इस सीधे से गीत में अपनी आवाज़ की जादू से एक अनोखी अदा बिखेरी हैं गीता रोय ने.



जिस साल फिल्म "दो भाई" प्रर्दशित हुई उसी साल फिल्मिस्तान की और एक फिल्म आयी थी जिसका नाम था शहनाई. दिग्गज संगीतकार सी रामचन्द्र ने एक फडकता हुआ प्रेमगीत बनाया था "चढ़ती जवानी में झूलो झूलो मेरी रानी, तुम प्रेम का हिंडोला". इसे गाया था खुद सी रामचंद्र, गीता रॉय और बीनापानी मुख़र्जी ने. कहाँ "दो भाई" के दर्द भरे गीत और कहाँ यह प्रेम के हिंडोले!



गीतकार राजेंदर किशन की कलम का जादू हैं इस प्रेमगीत में जिसे संगीतबद्ध किया हैं सचिन देव बर्मन ने. "एक हम और दूसरे तुम, तीसरा कोई नहीं, यूं कहो हम एक हैं और दूसरा कोई नहीं". इसे गाया हैं किशोर कुमार और गीता रॉय ने फिल्म "प्यार" के लिए जो सन १९५० में आई थी. गीत फिल्माया गया था राज कपूर और नर्गिस पर.



"हम तुमसे पूंछते हैं सच सच हमें बताना, क्या तुम को आ गया हैं दिल लेके मुस्कुराना?" वाह वाह क्या सवाल किया हैं. यह बोल हैं अंजुम जयपुरी के लिए जिन्हें संगीतबद्ध किया था चित्रगुप्त ने फिल्म हमारी शान के लिए जो १९५१ में प्रर्दशित हुई थी. बहुत कम संगीत प्रेमी जानते हैं की गीता दत्त ने सबसे ज्यादा गीत संगीतकार चित्रगुप्त के लिए गाये हैं. यह गीत गाया हैं मोहम्मद रफी और गीता ने. रफी और गीता दत्त के गानों में भी सबसे ज्यादा गाने चित्रगुप्त ने संगीतबद्ध किये हैं.



पाश्चात्य धुन पर थिरकता हुआ एक स्वप्नील प्रेमगीत हैं फिल्म ज़माना (१९५७) से जिसके संगीत निर्देशक हैं सलील चौधरी और बोल हैं "दिल यह चाहे चाँद सितारों को छूले ..दिन बहार के हैं.." उसी साल प्रसिद्द फिल्म बंदी का मीठा सा गीत हैं "गोरा बदन मोरा उमरिया बाली मैं तो गेंद की डाली मोपे तिरछी नजरिया ना डालो मोरे बालमा". हेमंतकुमार का संगीतबद्ध यह गीत सुनने के बाद दिल में छा जाता है.



संगीतकार ओमकार प्रसाद नय्यर (जो की ओ पी नय्यर के नाम से ज्यादा परिचित है) ने कई फिल्मों को फड़कता हुआ संगीत दिया. अभिनेत्री श्यामा की एक फिल्म आई थी श्रीमती ४२० (१९५६) में, जिसके लिए ओ पी ने एक प्रेमगीत गवाया था मोहम्मद रफी और गीता दत्त से. गीत के बोल है "यहाँ हम वहां तुम, मेरा दिल हुआ हैं गुम", जिसे लिखा था जान निसार अख्तर ने.



आज के युवा संगीत प्रेमी शायद शंकरदास गुप्ता के नाम से अनजान है. फिल्म आहुती (१९५०) के लिए गीता दत्त ने शंकरदास गुप्ता एक युगल गीत गाया था "लहरों से खेले चन्दा, चन्दा से खेले तारे". उसी फिल्म के लिए और एक गीत इन दोनों ने गाया था "दिल के बस में हैं जहां ले जाएगा हम जायेंगे..वक़्त से कह दो के ठहरे बन स्वर के आयेंगे". एक अलग अंदाज़ में यह गीत स्वरबद्ध किया हैं, जैसे की दो प्रेमी बात-चीत कर रहे हैं. गीता अपनी मदभरी आवाज़ में कहती हैं -"चाँद बन कर आयेंगे और चांदनी फैलायेंगे".



अगर प्रेमगीत में हास्य रस को शामिल किया जाया तो क्या सुनने मिलेगा? मेरा जवाब हैं "दिल-ऐ-बेकरार कहे बार बार,हमसे थोडा थोडा प्यार भी ज़रूर करो जी". इस को गाया हैं गीता दत्त और गुलाम मुस्तफा दुर्रानी ने फिल्म बगदाद के लिए और संगीतबद्ध किया हैं बुलो सी रानी ने. जिस बुलो सी रानी ने सिर्फ दो साल पहले जोगन में एक से एक बेहतर भजन गीता दत्त से गवाए थे उन्हों ने इस फिल्म में उसी गीता से लाजवाब हलके फुलके गीत भी गवाएं. और जिस राजा मेहंदी अली खान साहब ने फिल्म दो भाई के लिखा था "मेरा सुन्दर सपना बीत गया" , देखिये कितनी मजेदार बाते लिखी हैं इस गाने में:

दुर्रानी : मैं बाज़ आया मोहब्बत से, उठा लो पान दान अपना
गीता दत्त : तुम्हारी मेरी उल्फत का हैं दुश्मन खानदान अपना
दुर्रानी : तो ऐसे खानदान की नाक में अमचूर करो जी



सचिन देव बर्मन ने जिस साल गीता रॉय को फिल्म दो भाई के दर्द भरे गीतों से लोकप्रियता की चोटी पर पहुंचाया उसी साल उन्ही की संगीत बद्ध की हुई फिल्म आई थी "दिल की रानी". जवान राज कपूर और मधुबाला ने इस फिल्म में अभिनय किया था. उसी फिल्म का यह मीठा सा प्रेमगीत हैं "आहा मोरे मोहन ने मुझको बुलाया हो". इसी फिल्म में और एक प्यार भरा गीत था "आयेंगे आयेंगे आयेंगे रे मेरे मन के बसैय्या आयेंगे रे".



और अब आज की आखरी पेशकश है संगीतकार बुलो सी रानी का फिल्म दरोगाजी (१९४९) के लिया संगीतबद्ध किया हुआ प्रेमगीत "अपने साजन के मन में समाई रे". बुलो सी रानी ने इस फिल्म के पूरे के पूरे यानी १२ गाने सिर्फ गीता रॉय से ही गवाए हैं. अभिनेत्री नर्गिस पर फिल्माया गया यह मधुर गीत के बोल हैं मनोहर लाल खन्ना (संगीतकार उषा खन्ना के पिताजी) के. गीता की आवाज़ में लचक और नशा का एक अजीब मिश्रण है जो इस गीत को और भी मीठा कर देता हैं.



जो अदा उनके दर्दभरे गीतों में, भजनों में और नृत्य गीतों में हैं वही अदा, वही खासियत, वही अंदाज़ उनके गाये हुए प्रेम गीतों में है. उम्मीद हैं की आप सभी संगीत प्रेमियों को इन गीतों से वही आनंद और उल्हास मिला हैं जितना हमें मिला.

प्रस्तुति - पराग सांकला


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

रविवार, 17 मई 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (5)

पराग संकला से हमारे श्रोता परिचित हैं, आप गायिका गीता दत्त के बहुत बड़े मुरीद हैं और उन्हीं की याद में गीता दत्त डॉट कॉम के नाम से एक वेबसाइट भी चलते हैं. आवाज़ पर गीता दत्त के विविध गीतों पर एक लम्बी चर्चा वो पेश कर चुके हैं अपने आलेख "असली गीता दत्त की खोज में" के साथ. आज एक बार फिर रविवार सुबह की कॉफी का आनंद लें पराग संकला के साथ गीता दत्त जी के गाये कुछ दुर्लभ "प्रेम गीतों" को सुनकर.


गीता दत्त और प्रेम गीतों की भाषा

हिंदी चित्रपट संगीत में अलग अलग प्रकार के गीत बनाते हैं. लोरी, भजन, नृत्यगीत, हास्यगीत, कव्वाली, बालगीत और ग़ज़ल. इन सब गानों के बीच में एक मुख्य प्रकार जो हिंदी फिल्मों में हमेशा से अधिक मात्रा में रहता हैं वह हैं प्रणयगीत यानी कि प्रेम की भाषा को व्यक्त करने वाले मधुर गीत! फिल्म चाहे हास्यफिल्म हो, या भावुक या फिर वीररस से भरपूर या फिर सामजिक विषय पर बनी हो, मगर हर फिल्म में प्रेम गीत जरूर होते हैं. कई फिल्मों में तो छः सात प्रेमगीत हुआ करते हैं.

चालीस के दशक में बनी फिल्मों से लेकर आज की फिल्मों तक लगभग हर फिल्म में कोई न कोई प्रणयगीत जरूर होता हैं. संगीत प्रेमियोंका यह मानना है कि चालीस, पचास और साठ के दशक हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णयुग हैं. इन सालों में संगीतकार, गीतकार और गायाकों की प्रतिभा अपनी बुलंदियों पर थी.

गीता रॉय (दत्त) ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत प्रेमगीत गाये हैं मगर जिनके बारे में या तो कम लोगों को जानकारी हैं या संगीत प्रेमियों को इस बात का शायद अहसास नहीं है. इसीलिए आज हम गीता के गाये हुए कुछ मधुर मीठे प्रणय गीतों की खोज करेंगे.

सबसे पहले हम सुनेंगे इस मृदु मधुर युगल गीत को जिसे गाया हैं गीता दत्त और किशोर कुमार ने फिल्म मिस माला (१९५४)के लिए, चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में. "नाचती झूमती मुस्कुराती आ गयी प्यार की रात" फिल्माया गया था खुद किशोरकुमार और अभिनेत्री वैजयंती माला पर. रात के समय इसे सुनिए और देखिये गीता की अदाकारी और आवाज़ की मीठास. कुछ संगीत प्रेमियों का यह मानना हैं कि यह गीत उनका किशोरकुमार के साथ सबसे अच्छा गीत हैं. गौर करने की बात यह हैं कि गीता दत्त ने अभिनेत्री वैजयंती माला के लिए बहुत कम गीत गाये हैं.



जब बात हसीन रात की हो रही हैं तो इस सुप्रसिद्ध गाने के बारे में बात क्यों न करे? शायद आज की पीढी को इस गाने के बारे में पता न हो मगर सन १९५५ में फिल्म सरदार का यह गीत बिनाका गीतमाला पर काफी मशहूर था. संगीतकार जगमोहन "सूरसागर" का स्वरबद्ध किया यह गीत हैं "बरखा की रात में हे हो हां..रस बरसे नील गगन से". उद्धव कुमार के लिखे हुए बोल हैं. "भीगे हैं तन फिर भी जलाता हैं मन, जैसे के जल में लगी हो अगन, राम सबको बचाए इस उलझन से".



कुछ साल और पीछे जाते हैं सन १९४८ में. संगीतकार हैं ज्ञान दत्त और गाने के बोल लिखे हैं जाने माने गीतकार दीना नाथ मधोक ने. जी हाँ, फिल्म का नाम हैं "चन्दा की चांदनी" और गीत हैं "उल्फत के दर्द का भी मज़ा लो". १८ साल की जवान गीता रॉय की सुमधुर आवाज़ में यह गाना सुनते ही बनता है. प्यार के दर्द के बारे में वह कहती हैं "यह दर्द सुहाना इस दर्द को पालो, दिल चाहे और हो जरा और हो". लाजवाब!



प्रणय भाव के युगल गीतों की बात हो रही हो और फिल्म दिलरुबा का यह गीत हम कैसे भूल सकते हैं? अभिनेत्री रेहाना और देव आनंद पर फिल्माया गया यह गीत है "हमने खाई हैं मुहब्बत में जवानी की कसम, न कभी होंगे जुदा हम". चालीस के दशक के सुप्रसिद्ध गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ गीता रॉय ने यह गीत गाया था सन १९५० में. आज भी इस गीत में प्रेमभावना के तरल और मुलायम रंग हैं. दुर्रानी और गीता दत्त के मीठे और रसीले गीतों में इस गाने का स्थान बहुत ऊंचा हैं.



गीतकार अज़ीज़ कश्मीरी और संगीतकार विनोद (एरिक रॉबर्ट्स) का "लारा लप्पा" गीत तो बहुत मशहूर हैं जो फिल्म एक थी लड़की में था. उसी फिल्म में विनोद ने गीता रॉय से एक प्रेमविभोर गीत गवाया. गाने के बोल हैं "उनसे कहना के वोह पलभर के लिए आ जाए". एक अद्भुत सी मीठास हैं इस गाने में. जब वाह गाती हैं "फिर मुझे ख्वाब में मिलने के लिए आ जाए, हाय, फिर मुझे ख्वाब में मिलने के लिए आ जाए" तब उस "हाय" पर दिल धड़क उठता हैं.



जो अदा उनके दर्दभरे गीतों में, भजनों में और नृत्य गीतों में हैं वही अदा, वही खासियत, वही अंदाज़ उनके गाये हुए प्रेम गीतों में है. उम्मीद हैं कि आप सभी संगीत प्रेमियों को इन गीतों से वही आनंद और उल्लास मिला हैं जितना हमें मिला.

उन्ही के गाये हुए फिल्म दिलरुबा की यह पंक्तियाँ हैं:
तुम दिल में चले आते हो
सपनों में ढले जाते हो
तुम मेरे दिल का तार तार
छेड़े चले जाते हो!

गीता जी, आप की आवाज़ सचमुच संगीत प्रेमियों के दिलों के तार छेड़ देती है. और भी हैं बहुत से गीत, जिन्हें फिर किसी रविवार को आपके लिए लेकर आऊँगा.

प्रस्तुति - पराग संकला



"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

असली गीता दत्त की खोज में...

जब मैं गीता दत्त के गाने सुनता हूँ तब दुविधा में पड़ जाता हूँ. "मैं तो गिरिधर के घर जाऊं" गानेवाली वो ही गायिका हैं क्या जिसने कहा था "ओह बाबू ओह लाला". जो एक छोटे बालक की आवाज़ में फल तथा सब्जी बेच रही थी "फल की बहार हैं केले अनार हैं" वो ही एक विरहन के बोल सुना रही थी "आओगे ना साजन आओगे ना"! शास्त्रीय संगीत की मधुर लय और तानपर "बाट चलत नयी चुनरी रंग डारी" की शिकायत हो रही थी और तभी जनम जन्मांतर का साथ निभाने वाला गीत "ना यह चाँद होगा ना तारे रहेंगे मगर हम हमेशा तुम्हारे रहेंगे" गाया जा रहा था.

"कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ" में सचमुच किसी दूर कोने से एक बिरहन की वाणी सुनाई आ रही थी और साथ ही "चंदा चांदनी में जब चमके क्या हो, आ मिले जो कोई छम से पूछते हो क्या हमसे?" यह सवाल किया जा रहा था. रेलगाडी की धक् धक् पर चलती हुई रेहाना गीता की आवाज़ पर थिरक कर गा रही थी" धक् धक् करती चली हम सब से कहती चली जीवन की रेल रे मुहब्बत का नाम हैं दिलों का मेल रे". अपने आप से सवाल किया जा रहा था "ए दिल मुझे बता दे तू किस पे आ गया हैं?" और सखी को छेड़ने की नटखट अदा थी "अँखियाँ भूल गयी हैं सोना". सोलह साल की लड़की का बांकपन था "चन्दा खेले आँख मिचौली बदली से नदी किनारे, दुल्हन खेले फागन होली" और "तोरा मनवा क्यों घबराएँ रे" में एक अनुभव की पुकार थी. "मेरा सुन्दर सपना बीत गया" गानेवाली "मेरा नाम चिन चिन चू" के जलवे बिखर रही थी. उसी वक्त "कल रात पिया ने बात कहीं कुछ ऐसी, मतवाला भंवरा कहे कली से जैसी" के मदहोश बोल सुनाये जा रहे थे.

युगल गीतों की बात की जाए तो एक तरफ "कल साजना मिलना यहाँ, हैं तमाम काम धाम रे आज ना आज ना" की स्वाभाविक शिकायत की जा रही थी वहीँ दूसरी ओर "तुमसे ही मेरी ज़िन्दगी मेरी बहार तुम" के स्वर गूँज रहे थे. "अरमां भरे दिल की लगन तेरे लिए हैं" के सुरीले स्वरों के साथ "ख्यालों में किसीके इसी तरहे आया नहीं करते" की तकारार हो रही थी. "रात हैं अरमान भरी और क्या सुहानी रात हैं, आज बिछडे दिल मिले हैं तेरा मेरा साथ हैं" के रोमांचक ख्यालों के साथ साथ राधा और कृष्ण के रंग में डूबा हुआ "आन मिलो आन मिलो श्याम सांवरे ब्रिज में अकेली राधे खोयी खोयी फिरे" की व्याकुल पुकार भी थी.

"मेरा दिल जो मेरा होता पलकों पे पकड़ लेती" के आधुनिक और काव्यात्मक खयालों के साथ साथ "धरती से दूर गोरे बादलों के पार आजा आजा बसाले नया संसार" की सुन्दर कविकल्पना भी थी. "मिया मेरा बड़ा बेईमान मेरी निकली रे किस्मत खोटी" की नोक-झोंक के साथ "मुझको तुम जो मिले ये जहां मिल गया" की खुशियाँ भी शामिल थी. "मोसे चंचल जवानी संभाली नहीं जाए" के लगभग कामुक भावों के साथ साथ "मेरे मुन्ने रे सीधी राह पे चलना जुग जुग तक फूलना फलना" का आशीर्वाद भी था.

नायक को कह रही थी "राजा मोहे ले चल तू दिल्ली की सैर को" और फिर कोई नटखट साजन "लखनो चलो अब रानी बम्बई का बिगडा पानी" की शिकायत करा रहा था. सखियों के साथ "चलो पनिया भरन को पतली कमरिया पे छलके गगरिया हो" गाकर नदी किनारे जाने की बातें और शादी में बिदाई के समय "बाबुल का मोरे आँगन बिछडा छूटी रे मोरी सखियाँ" की व्याकुलता थी. नायक के साथ सीटी बजाना सीखते सीखते "सुन सुन सुन जालिमा" गाया जा रहा था और गाँव की लोकधुन पर "नदिया किनारे मोरा डेरा मशाल जले सारी रतिया" गुनगुनाया जा रहा था.

"गायें गायें हम नए तराने गायें" के आधुनिक स्वरों के साथ "जमुना के तीर कान्हा आओ रो रो पुकारे राधा मीठी मीठी बंसिया बजाओ" की पुकार भी थी. हौले हौले ..हाय डोले.. के बोलों में बंगाल का जादू था और उड़ पुड जानिया में पंजाब की मिटटी की खुशबू थी. प्यार की प्यास के हिंदी गाने (उत्तर में हैं खडा हिमालय) में "आमार शोनार बांगला देश" की मधुर तान छेड़ रही थी और बंगाली फिल्म में "तेरे लिए आया हैं लेके कोई दिल" के हिंदी बोल सुना रही थी. "तालियों ना ताले" के सुरों पर गरबा का रास रचाया जा रहा था और मराठी में "गणपति बाप्पा मोरया, पुढल्या वर्षी लौकर या" गाकर गणेश भगवान् की आरती कर रही थी. माला सिन्हा की बनाई हुई नेपाली फिल्म में गाने गाये और फिर "जान लेके हथेली पे चल बैं जमाने से ना डरबएं राम" भोजपुरी में गा रही थी.

ममता गा रही थी "नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना" और एक नर्तिका की आवाज़ थी "माने ना माने ना माने ना , तेरे बिन मोरा जिया ना माने". "गुनगुन गुनगुन गुंजन करता भंवरा तुम कौन संदेसा लाये" की पार्वती थी और "एक नया तराना एक नया फ़साना एक नयी कहानी हूँ मैं, एक रंग रंगीली एक छैल छबीली मदमस्त जवानी हूँ मैं" की क्लब डांसर भी थी. मोरनी बनकर कह रही थी "आजा छाये कारे बदरा" और "आज नहीं तो कल बिखरेंगे ये बादल ओह रात के भूले हुए मुसाफिर सुबह हुई घर चल अब घर चल रे" गाकर हौसला बढा रही थी.

पाश्चात्य धुन पर थिरकता हुआ गीत "मुझे हुज़ूर तुमसे प्यार हैं तुम्हीं पे ज़िन्दगी निसार हैं" और हिंदुस्थानी संगीत का असर था "मेरे नैनों में प्रीत मेरे होंठों पे गीत मेरे सपनों में तुम ही समाये". ऐसे कई अलग अलग प्रकार के भावों के गीत गाती थी कि सुननेवाला दंग रह जाएँ. "कभी अकड़ कर बात न करना हमसे अरे मवाली " गानेवाली गायिका उसी संगीतकार के साथ मिल कर "जय जगदीश हरे" को अजरामर कर देती थी. रफी साहब के साथ तो ऐसे रसीले और सुरीले गीत गाये हैं कि उनका कोई जवाब नहीं. "अच्छा जी माफ़ कर दो, थोडा इन्साफ कर दो" गाया था फिल्म मुसाफिरखाना के लिए और उन्हीं के साथ "चुपके से मिले प्यासे प्यासे" जैसा तरल और स्वप्नील गीत भी गाया. बालक के जन्मदिन के शुभ अवसरपर एक बढिया सा गीत गाया था "पोम पोम पोम बाजा बोले ढोलक धिन धिन धिन, घडी घडी यह खुशियाँ आये बार बार यह दिन".

गीता को हमसे दूर जाकर पैंतीस से भी ज्यादा साल गुज़र चुके हैं. वैसे तो १९५० के मध्य से ही कुछ न कुछ कारणवश वो फ़िल्मी दुनिया से धीरे धीरे अलग हो रही थी. आज की तारीख में कल का बना हुआ गाना पसंद न करने वाले लोग भला ऐसे गानों को क्यूँ याद रखे और सुने जो शायद उनके जन्म लेने से भी पहले बने थे. सीधी सी बात यह हैं कि उन गीतों में अपनापन हैं, एक मिठास हैं और एक शख्सियत हैं जिसने हरेक गाने को अपने अंदाज़ में गाया. नायिका, सहनायिका, खलनायिका, नर्तकी या रस्ते की बंजारिन, हर किसी के लिए अलग रंग और ढंग के गाने गाये. "नाचे घोड़ा नाचे घोड़ा, किम्मत इसकी बीस हज़ार मैं बेच रही हूँ बीच बाज़ार" आज से साठ साल पहले बना हैं और फिर भी तरोताजा हैं. "आज की काली घटा" सुनते हैं तो लगता है सचमुच बाहर बादल छा गए हैं.

मुग्ध कन्या भानुमती पर फिल्माया गए गाने "कबूतर आजा आजा रे" और "झनन झनन झनवा मोरे बिछुआ झनन बाजे रे" ऐसी मिठास से बने हैं कि बार बार सुनने को दिल चाहता हैं. जाल के लिए साहिर साहब की रचना "जोर लगाके हैय्या पैर जमाके हैय्या" आज भी याद किया जाता है जब कोई कठिन काम करने के लिए लोग मिल जाते हैं. "सुन सुन मद्रासी छोरी के तेरे लिए दिल जलता" का जवाब दिया "चल हट रे पंजाबी छोरे के तू मेरा क्या लगता?". अलग किस्म के गाने , अलग कलाकार, अलग संगीतकार, अलग सहयोगी गायक, और अलग उन गानों के लेखक; मगर गीता दत्त का अपना ही अंदाज़ था. किसी ने कहा कि उनकी आवाज़ में शहद की मिठास और मधुमक्खी की चुभन का मिश्रण था. कोई कह गया कि ठंडी हवा में काली घटा समाई हुई थी. कोई कहता हैं गीता गले से नहीं दिल से गाती थी!

बीस से भी कम उम्र में मीराबाई के और कबीर के भजन जिस भाव और लगन से गाये उसी लगन से "दिल की उमंगें हैं जवाँ" जैसा फड़कता हुआ और मस्ती भरा गाना भी गाया. (इसी गाने में उन्हों ने कुछ शब्द भी कहें जो सुनाने लायक हैं). एक तरफ "जवानियाँ निगोडी यह सताएं, घूँघट मोरा उड़ उड़ जाएँ" और उसी फिल्म में गाया" अब कौन सुनेगा हाय रे दुखे दिल की कहानी". ऐसे कितने ही गाने हैं जो पहली बार सुनने के बावजूद भी लगता हैं कि कितना दिलकश गाना हैं, वाह वाह! "बूझो बूझो ए दिल वालों कौन सा तारा चाँद को प्यारा" बिलकुल संगीतकार पंकज मलिकके अंदाज़ में गाया था फिल्म ज़लज़ला में!

भले गाना पूरा अकेले गाती हो या फिर कुछ थोड़े से शब्द, एक अपनी झलक जरूर छोड़ देती थी. "पिकनिक में टिक टिक करती झूमें मस्तों की टोली" ऐसा युगल गीत हैं जिसमें मन्ना डे साहब और साथी कलाकार ज्यादा तर गाते हैं , और गीता दत्त सिर्फ एक या दो पंक्तियाँ गाती हैं. इस गाने को सुनिए और उनकी आवाज़ की मिठास और हरकत देखिये. ऐसा ही गाना हैं रफी साहब के साथ "ए दिल हैं मुश्किल जीना यहाँ" जिसमे गीता दत्त सिर्फ आखिरी की कुछ पंक्तियाँ गाती हैं. "दादा गिरी नहीं चलने की यहाँ.." जिस अंदाज़ में गाया हैं वो अपने आप में गाने को चार चाँद लगा देता हैं. ऐसा ही एक उदाहरण हैं एक लोरी का जिसे गीता ने गया हैं पारुल घोष जी के साथ. बोल हैं " आ जा री निंदिया आ", गाने की सिर्फ पहली दो पंक्तियाँ गीता के मधुर आवाज़ मैं हैं और बाकी का पूरा गाना पारुल जी ने गाया हैं.

बात हो चाहे अपने से ज्यादा अनुभवी गायकों के साथ गाने की (जैसे की मुकेश, शमशाद बेग़म और जोहराजान अम्बलावाली) या फिर नए गायकोंके साथ गाने की (आशा भोंसले, मुबारक बेग़म, सुमन कल्याणपुर, महेंद्र कपूर या अभिनेत्री नूतन)! न किसी पर हावी होने की कोशिश न किसीसे प्रभावित होकर अपनी छवि खोना. अभिनेता सुन्दर, भारत भूषण, प्राण, नूतन, दादामुनि अशोक कुमार जी और हरफन मौला किशोर कुमार के साथ भी गाने गाये!

चालीस के दशक के विख्यात गायक गुलाम मुस्तफा दुर्रानी के साथ तो इतने ख़ूबसूरत गाने गाये हैं मगर दुर्भाग्य से उनमें से बहुत कम गाने आजकल उपलब्ध हैं. ग़ज़ल सम्राट तलत महमूद के साथ प्रेमगीत और छेड़-छड़ भरे मधुर गीत गायें. इन दोनों के साथ संगीतकार बुलो सी रानी द्वारा संगीतबद्ध किया हुआ "यह प्यार की बातें यह आज की रातें दिलदार याद रखना" बड़ा ही मस्ती भरा गीत हैं, जो फिल्म बगदाद के लिए बनाया गया था. इसी तरह गीता ने तलत महमूद के साथ कई सुरीले गीत गायें जो आज लगभग अज्ञात हैं.

जब वो गाती थी "आग लगाना क्या मुश्किल हैं" तो सचमुच लगता हैं कि गीता की आवाज़ उस नर्तकी के लिए ही बनी थी. गाँव की गोरी के लिए गाया हुआ गाना "जवाब नहीं गोरे मुखडे पे तिल काले का" (रफी साहब के साथ) बिलकुल उसी अंदाज़ में हैं. उन्ही चित्रगुप्त के संगीत दिग्दर्शन में उषा मंगेशकर के साथ गाया "लिख पढ़ पढ़ लिख के अच्छा सा राजा बेटा बन". और फिर उसी फिल्म में हेलन के लिए गाया "बीस बरस तक लाख संभाला, चला गया पर जानेवाला, दिल हो गया चोरी हाय..."!

सन १९४९ में संगीतकार ज्ञान दत्त का संगीतबद्ध किया एक फडकता हुआ गीत "जिया का दिया पिया टीम टीम होवे" शमशाद बेग़म जी के साथ इस अंदाज़ में गाया हैं कि बस! उसी फिल्म में एक तिकोन गीत था "उमंगों के दिन बीते जाए" जो आज भी जवान हैं. वैसे तो गीता दत्त ने फिल्मों के लिए गीत गाना शुरू किया सन 1946 में, मगर एक ही साल में फिल्म दो भाई के गीतों से लोग उसे पहचानने लग गए. अगले पांच साल तक गीता दत्त, शमशाद बेग़म और लता मंगेशकर सर्वाधिक लोकप्रिय गायिकाएं रही. अपने जीवन में सौ से भी ज्यादा संगीतकारों के लिए गीता दत्त ने लगभग सत्रह सौ गाने गाये.

अपनी आवाज़ के जादू से हमारी जिंदगियों में एक ताज़गी और आनंद का अनुभव कराने के लिए संगीत प्रेमी गीता दत्त को हमेशा याद रखेंगे.

प्रस्तुति - पराग संकला
(पराग गीता जी के बहुत बड़े भक्त हैं, उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर एक वेबसाइट भी बनाई है जो गीता जी की अमर आवाज़ को समर्पित है...गीता दत्त के जीवन से जुडी तमाम जानकारियाँ आप उनकी साईट पर पा सकते हैं, पता है -
गीता दत्त. कॉम




उपर पराग जी ने जिन गीतों का जिक्र किया है उनमें से अधिकतर गीतों को बहुत से श्रोताओं ने शायद कभी नहीं सुना होगा, तो लीजिये इनमें से कुछ बेहद अनसुने से दुर्लभ गीत आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं...गीता जी के और भी गीत हम समय समय पर आपको सुनवाते रहेंगें, ये वादा है...आज सुनिए ये चुनिन्दा नग्में -

बुलबुल मेरे चमन के...


आओगे न सजन आओगे न...


आज की काली घटा...


चलो पनिया भरन को...


एक रात की ये प्रीत...


और अंत में सुनिए ये लाजवाब गीत - उत्तर में खडा हिमालय....

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