रविवार, 27 दिसंबर 2020

राग खमाज और बिलावल : SWARGOSHTHI – 494 : RAG KHAMAJ & BILAWAL





स्वरगोष्ठी – 494 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 10 : संगीतकार – खय्याम 

जब राज कपूर ने फिल्म “फिर सुबह होगी” के लिए स्वयं ही खय्याम का चुनाव किया 





पण्डित उल्हास कशालकर 

मुकेश और आशा भोसले 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दसवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हमने फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा की है। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जा रही है। आमतौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर की फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती थी। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्त्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर और उनके प्रारम्भिक दौर के संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की दसवीं और समापन कड़ी में हम 1958 में राज कपूर द्वारा निर्मित फिल्म "फिर सुबह होगी” से राग खमाज और बिलावल पर आधारित एक गीत; "वो सुबह कभी तो आएगी...” सुनवा रहे हैं, जिसका संगीत खय्याम ने और स्वर; मुकेश और आशा भोसले ने दिया है। यह गीत साहिर लुधियानवी ने लिखा है और राग खमाज तथा बिलावल पर आधारित है। राग खमाज के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम इस राग में निबद्ध एक रसभरी ठुमरी; “कोयलिया कूक सुनावे...” सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 




फिल्म "फिर सुबह होगी" में राज कपूर और माला सिन्हा 
जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार” की समापन कड़ी में कृष्णमोहन मिश्र और “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” परिवार की ओर से आपका हार्दिक स्वागत है। इस श्रृंखला में हमने आपके लिए राज कपूर द्वारा निर्मित तीन फिल्मों और केवल अभिनीत सात फिल्मों के ऐसे गीतों को चुना, जिन पर या तो राज कपूर का प्रभाव था या उन गीतों से वे स्वयं प्रभावित हुए थे। गीतों को चुनते समय हमने इस बात का ध्यान भी रखा कि ये फिल्में राज कपूर के प्रारम्भिक एक दशक की हो और उनके अधिकतर फिल्मों के संगीतकार शंकर जयकिशन के अलावा अन्य संगीतकारों की हो। आज श्रृंखला की समापन कड़ी में हम एक ऐसे गीत पर चर्चा करेंगे, जिस पर राज कपूर की समाजवादी विचारधारा का पूरा प्रभाव अंकित हुआ है। पिछले अंक में हमने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राज कपूर की समान विचारधारा पर चर्चा की थी। जिस प्रकार नेहरू जी तत्कालीन सोवियत रूस और चीन में लोकप्रिय थे, ठीक उसी प्रकार राज कपूर और उनकी फिल्में भी इन देशों में लोकप्रिय थीं 1958 में निर्माता और निर्देशक रमेश सहगल की फिल्म “फिर सुबह होगी” प्रदर्शित हुई थी। यह फिल्म रूसी उपन्यासकार फ़्योडोर दोस्तोएव्स्की की विश्वविख्यात कृति “क्राइम एण्ड पनिशमेंट” पर आधारित थी। रमेश सहगल इस फिल्म में नायक की भूमिका के लिए राज कपूर को और गीतकार के रूप में साहिर लुधियानवी को शामिल कर चुके थे। राज कपूर फिल्म के कथानक से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। फिल्म के संगीतकार का चयन अभी बाकी था। साहिर लुधियानवी ने एक दिन रमेश सहगल को संगीतकार खय्याम का नाम सुझाया। रमेश सहगल को उम्मीद थी कि राज कपूर शंकर जयकिशन के नाम का सुझाव देंगे। परन्तु उन्होने ऐसा नहीं किया। रमेश सहगल ने राज कपूर और खय्याम की एक बैठक करा दी। 


संगीतकार ख़ैयाम  

लता मंगेशकर ने एक बार राज कपूर को एक तानपूरा भेंट किया था। खय्याम के साथ हुई बैठक में राज कपूर ने वही तानपूरा ख़ैयाम की ओर बढ़ाते हुए कुछ सुनाने का आग्रह किया। खय्याम ने उस नये तानपूरा के तारों को छेड़ते हुए राग पूरिया धनाश्री की एक बन्दिश सुनाई थी। राज कपूर खय्याम की गायकी से प्रभावित हुए और उन्हें फिल्म के शीर्षक गीत की धुन बनाने को कहा। खय्याम इस फिल्म का संगीत तैयार करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। राज कपूर की सहमति मिल जाने के बाद उन्होने फिल्म के शीर्षक गीत की पाँच अलग अलग धुने बनाई। अगली बैठक में राज कपूर ने जब गीत पांचों धुने सुनी तो वे खय्याम की प्रतिभा से अत्यन्त प्रभावित हुए और फिल्म के सभी गीतों की धुनें बनाने की पूरी स्वतन्त्रता दे दी। इस प्रकार राज कपूर, खय्याम, साहिर लुधियानवी और रमेश सहगल के अनूठे समागम से फिल्म “फिर सुबह होगी” के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। फिल्म तो सफल नहीं हुई किन्तु श्रृंगार प्रधान गीतों के उस दौर में यथार्थवादी गीत एक नई ताजगी लेकर आए थे, अतः गीत खूब चले। राज कपूर और खय्याम के भेंट प्रसंग हमने पंकज राग की पुस्तक “धुनों की यात्रा” से साभार उद्धृत किया है। मेरे एक पत्रकार मित्र प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार, एक मशहूर किस्सा संगीतकार खय्याम बताते हैं कि 1958 में रमेश सहगल एक फिल्म बना रहे थे “फिर सुबह होगी” फिल्म के हीरो राज कपूर थे और उन्हीं के पसन्द के संगीतकार शंकर जयकिशन थे। गीत लिखने की ज़िम्मेदारी साहिर के कंधों पर थी। उन्होने रमेश सहगल से पूछा कि संगीतकार कौन है, तो उन्होने सारे कहानी बता दी। इस पर वो बोले कि जिसने इस फिल्म के मूल लेखक दोस्तोवस्की के नावेल “क्राइम ऐंड पनिशमेंट” को न सिर्फ पढ़ा हो बल्कि समझा भी हो वही इस फिल्म का संगीत बनायेगा। उन्होंने कहा कि मैं तो ऐसे आदमी को जानता भी नहीं हूँ। तब साहिर ने कहा; मैं जानता हूँ, वो हैं खय्याम। इस पर रमेश सहगल ने कहा कि ठीक है मैं उन्हें राज साहब से मिलवा दूँगा अगर वे ओ.के. कर देंगे तो मुझे कोई एतराज नहीं। साहिर ने नज्म लिखी “वो सुबह कभी तो आयेगी...”। खय्याम ने इस नज़्म की पाँच धुने बनाईं। राज कपूर ने सुनीं और पांचों को पास कर दिया। फिल्म “फिर सुबह होगी” में खय्याम ने राज कपूर पर फिल्माए गए गीतों को मुकेश से गवाया था। मुख्य शीर्षक गीत; “वो सुबह कभी तो आएगी...” के दो संस्करण हैं, एक संस्करण में केवल मुकेश का और दूसरे में मुकेश के साथ आशा भोसले का स्वर है। मुकेश की आवाज़ में एक अन्य गीत; “आसमाँ पे है खुदा, और ज़मीं पे हम...” तत्कालीन फिल्मी गीतों की बनी छवि तोड़ने में सफल हुआ था। फिल्म प्रेमियों ने इस गीत और संगीत के नयेपन को खूब सराहा था। फिल्म के अन्य गीत; “चीन ओ अरब हमारा...”, “फिर ना कीजे मेरी गुस्ताख़ निगाहों का गिला...” आदि अपनी सहज धुनों के कारण खूब सराहे गए। आज की समापन कड़ी में हम आपको फिल्म के शीर्षक गीत का वही संस्करण सुनवाते हैं, जिसे मुकेश और आशा भोसले ने स्वर दिया था। लीजिए, साहिर लुधियानवी का गीत, खय्याम का संगीत, मुकेश और आशा भोसले के युगल स्वरों से युक्त फिल्म “फिर सुबह होगी” का यह गीत सुनिए। इस गीत के आरम्भ में राग खमाज का आधार है और बाद में राग बिलावल का स्पर्श भी है। फिल्म “फिर सुबह होगी” का यह गीत राज कपूर और माला सिन्हा पर फिल्माया गया है। इस दृश्य में माला सिन्हा राज कपूर की बाहों में हैं और गीत के आरम्भ से अन्त तक दोनों इसी मुद्रा में रहते हैं। 

राग खमाज व बिलावल : “वो सुबह कभी तो आएगी...” : मुकेश और आशा भोसले : संगीत – खय्याम 


खमाज थाट के स्वर होते हैं; सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒(कोमल)। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग “खमाज” कहलाता है। “खमाज” राग में थाट के अनुकूल निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। यह चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें द्रुत खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा आदि गाया जाता है। इस राग में विलम्बित खयाल नहीं गाया जाता। यद्यपि आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, किन्तु ठुमरी गाते समय कभी कभी आरोह में भी ऋषभ स्वर का प्रयोग किया जाता है। राग खमाज से मिलता जुलता राग तिलंग होता है। राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने ग्वालियर घराने के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में एक रसभरी ठुमरी सुनवा रहे हैं। 

राग खमाज : “कोयलिया कूक सुनावे...” : ठुमरी : पण्डित उल्हास कशालकर 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 495 और 496वें अंक में वर्ष 2020 के महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ सम्मिलित की जाएँगी, अतः इस अंक में हम कोई भी पहेली नहीं दे रहे हैं। 496वें अंक से संगीत पहेली का सिलसिला पुनः आरम्भ होगा। 

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 492वें अंक में हमने आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म "अब दिल्ली दूर नहीं” से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को सफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - मारू बिहाग और यमन कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा एवं कहरवा का एक प्रकार तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले, गीता दत्त और साथी 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दसवीं और समापन कड़ी में आज आपने राज कपूर व माला सिन्हा द्वारा अभिनीत फिल्म "फिर सुबह होगी” के एक गीत का रसास्वादन किया, फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी तथा संगीतकार खय्याम का परिचय भी प्राप्त किया। यह गीत राग खमाज और बिलावल पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में एक रसभरी ठुमरी का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग खमाज और बिलावल : SWARGOSHTHI – 494 : RAG KHAMAJ & BILAWAL : 27 दिसम्बर, 2020 



रविवार, 20 दिसंबर 2020

राग मारू बिहाग और यमन कल्याण : SWARGOSHTHI – 493 : RAG MARU BIHAG & YAMN KALYAN





स्वरगोष्ठी – 493 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 9 : संगीतकार – दत्ताराम 

जब राज कपूर की निर्मित फिल्म में दत्ताराम ने रचा मारू बिहाग पर आधारित गीत 





विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे 

आशा भोसले 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आमतौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर की फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती थी। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्त्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर और उनके प्रारम्भिक दौर के संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की नौवीं कड़ी में हम 1957 में राज कपूर द्वारा निर्मित फिल्म "अब दिल्ली दूर नहीं” से राग मारू बिहाग और यमन कल्याण पर आधारित एक गीत; "ये चमन हमारा अपना है...” सुनवा रहे हैं, जिसका संगीत दत्ताराम ने और स्वर आशा भोसले, गीता दत्त और साथियों ने दिया है। यह गीत शैलेन्द्र ने लिखा है और राग मारू बिहाग और यमन कल्याण पर आधारित है। राग मारू बिहाग के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम इस राग में निबद्ध एक छोटा खयाल “जागूँ मैं सारी रैना...” किराना घराने की गायकी में दक्ष सुप्रसिद्ध विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 





राज कपूर द्वारा निर्मित फिल्म "अब दिल्ली दूर नहीं" 
बीते  सप्ताह 14 दिसम्बर को महान स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर की हमने 97वीं जयन्ती मनाई। आज इस श्रृंखला की नौवीं कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने प्रिय पाठकों का स्वागत करते हुए आरम्भ करता हूँ, राज कपूर द्वारा निर्मित एक महत्त्वपूर्ण फिल्मकृति पर चर्चा। राज कपूर की यह उल्लेखनीय कृति है, 1957 में निर्मित फिल्म “अब दिल्ली दूर नहीं” थी। यह विश्वास करना कठिन होगा कि फिल्म “अब दिल्ली दूर नहीं” का निर्माण देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सलाह पर राज कपूर ने किया था, परन्तु यह सत्य है। दरअसल नेहरू जी और राज कपूर में कई समानताएँ थीं। दोनों सपनों के सौदागर थे और समाजवादी विचारधारा के पोषक थे। दोनों का व्यक्तित्व सोवियत रूस में अत्यन्त लोकप्रिय रहा है। राज कपूर नेहरू जी के अनन्य भक्त थे और प्रायः दोनों की भेंट हुआ करती थी। ऐसी ही एक भेंट में नेहरू जी ने राज कपूर से एक ऐसी फिल्म बनाने को कहा जिसमें एक बच्चे की कहानी हो और वह बच्चा अपने पिता को न्याय दिलाने के लिए दिल्ली की दुर्गम यात्रा कर देश के प्रधानमंत्री तक अपनी फरियाद करता है। अन्ततः वह बालक प्रधानमंत्री नेहरू से मिलने में सफल हो जाता है। 


गीता दत्त 
इस कथानक पर फिल्म बनवाने के पीछे नेहरू जी के दो उद्देश्य थे। मात्र एक दशक पहले स्वतंत्र देश के सरकार की न्याय व्यवस्था पर विश्वास जगाना और नेहरू जी का बच्चों के प्रति अनुराग को अभिव्यक्ति देना। फिल्म के अन्तिम दृश्यों में नेहरू जी ने स्वयं काम करने की सहमति भी राज कपूर को दी थी। पूरी फिल्म बन जाने के बाद जब नेहरू जी की बारी आई तो मोरार जी देसाई ने उन्हें फिल्म में काम करने से रोका। नेहरू जी की राजनैतिक छवि के कारण अन्य लोगों ने भी उन्हें मना किया। असमंजस की स्थिति में नेहरू जी ने राज कपूर से अपनी असमर्थता बता दी। राज कपूर इस फिल्म को लगभग पूरी बना चुके थे। इस अप्रत्याशित स्थिति में खिन्न मन से अन्तिम प्रसंगों में फिल्म डिवीजन के “स्टॉक शॉट” की सहायता से किसी प्रकार फिल्म “अब दिल्ली दूर नहीं” को पूरा किया। फिल्म तो नहीं चली, परन्तु इसके गीतों को अपार सफलता मिली। राज कपूर ने फिल्म “अब दिल्ली दूर नहीं” के निर्देशन के लिए अमर कुमार को और संगीत के लिए दत्ताराम नाईक को पहली बार स्वतंत्र संगीतकार के रूप में अवसर दिया। इससे पहले तक दत्ताराम, शंकर जयकिशन के सहायक रहे। दत्ताराम का ताल पक्ष अत्यन्त मजबूत था वे तबला, ढोलक और ढफ वादन में अत्यन्त कुशल थे। राज कपूर की फिल्म “अब दिल्ली दूर नहीं” में जब उन्हें पहली बार स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का अवसर मिला तो उन्होने फिल्म के सभी आठ गीतों की धुने बड़े परिश्रम से कथ्य के अनुकूल तैयार कीं। नेहरू जी के बाल प्रेम को रेखांकित करने के लिए राज कपूर ने शैलेन्द्र का लिखा गीत; “चूँ चूँ करती आई चिड़िया...” और वर्षों की गुलामी के बाद मिली स्वतन्त्रता के वातावरण में नवनिर्माण के लिए प्रेरित करते गीत; “ये चमन हमारा अपना है...” को शामिल किया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि फिल्म के यह दोनों गीत आज भी लोकप्रिय हैं। प्रत्येक वर्ष बाल दिवस पर और राष्ट्रीय पर्वों पर ये दोनों गीत सर्वत्र बजाए जाते हैं। आज की इस कड़ी में आज हम फिल्म का एक लोकप्रिय गीत; “ये चमन हमारा अपना है...” आपको सुनवाएँगे। यह गीत राग मारू बिहाग पर आधारित है। बाद में इस गीत में यमन कल्याण का स्पर्श भी परिलक्षित होता है। कुछ विद्वान इस गीत को प्राचीन राग कल्याण से जोड़ते हैं, जिसे वर्तमान में राग यमन कहा जाता है। शैलेन्द्र के लिखे इस गीत को गीता दत्त, आशा भोसले और साथियों ने स्वर दिया है। 

राग मारू बिहाग : ये चमन हमारा अपना है...” : आशा भोसले, गीता दत्त और साथी : संगीत – दत्ताराम 

 

राग मारू विहाग का सम्बन्ध कल्याण थाट से माना जाता है। राग में दोनों मध्यम स्वर और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद माना जाता है। इस राग के गायन अथवा वादन का उपयुक्त समय रात्रि 8 से 9 बजे तक अर्थात रात्रि का प्रथम प्रहर होता है। इस राग के आरोह में सा, ग, म॑, प, नि, सां और अवरोह में सां, नि, प, ध, प, म॑, ग, रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मारू विहाग में यमन और बिहाग रागों की छाया दृष्टिगत होती है। नि, सा, ग; प, नि, सा; सा, म॑, ग; से बिहाग तथा म॑, प, ध, प; सां, नि, प, ध, म॑, प, म॑, ग, म॑, रे, सा; में यमन अथवा कल्याण राग की झलक मिलती है। इस राग का भाव करुण, समर्पित तथा पुकार से युक्त प्रतीत होता है। 

पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत चिंतन, मंच प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक लेखन शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। आश्चर्य होता है कि उनके व्यक्तित्व के साथ इतने सारे उच्चकोटि के गुणों का समावेश कितने परिश्रम से हुआ होगा। आज की “स्वरगोष्ठी” में हम विदुषी प्रभा अत्रे के स्वर में एक मनमोहक रचना सुनवाएँगे। वर्तमान में प्रभा जी अकेली महिला कलासाधिका हैं, जो किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उनके शैक्षिक पृष्ठभूमि में विज्ञान, विधि और संगीत शास्त्र की त्रिवेणी प्रवाहमान है। यही नहीं उन्होने लन्दन के ट्रिनिटी कालेज ऑफ म्युजिक से पाश्चात्य संगीत का अध्ययन किया। कुछ समय तक उन्होने कथक नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा भी ग्रहण की। प्रभा जी के लिए ज्ञानार्जन के इन सभी स्रोतों से बढ़ कर थी, प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत ग्रहण की गई व्यावहारिक शिक्षा। आज के अंक में विदुषी प्रभा अत्रे का एक अत्यन्त प्रिय राग “मारू बिहाग” प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग में प्रभा जी एक द्रुत खयाल प्रस्तुत कर रही हैं। द्रुत तीनताल की बन्दिश है; “जागूँ मैं सारी रैना बलमा…”। 

राग मारू बिहाग : “जागूँ मैं सारी रैना बलमा...” : डॉ. प्रभा अत्रे 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 493वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग छह दशक पूर्व प्रदर्शित राज कपूर द्वारा अभिनीत एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के पाँचवें सत्र अर्थात इस वर्ष के अन्तिम अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल पार्श्वगायक/गायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 26 दिसम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 495 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 491वें अंक में हमने आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म "शारदा” से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को असफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा व कहरवा का एक प्रकार तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मन्ना डे। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की नौवीं कड़ी में आज आपने राज कपूर द्वारा निर्मित "अब दिल्ली दूर नहीं” के एक गीत का रसास्वादन किया, फिल्म के गीतकार शैलेन्द्र तथा संगीतकार दत्ताराम का परिचय भी प्राप्त किया। यह गीत राग मारू बिहाग और यमन कल्याण पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको किराना घराने की गायकी में दक्ष विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय तीन ताल में निबद्ध द्रुत खयाल का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मारू बिहाग और यमन कल्याण : SWARGOSHTHI – 493 : RAG MARU BIHAG & YAMN KALYAN : 20 दिसम्बर, 2020 




रविवार, 13 दिसंबर 2020

कल 14 दिसम्बर को राज कपूर की 97वीं जयन्ती पर सादर स्मरण : राग काफी : SWARGOSHTHI – 492 : RAG KAFI : 13 दिसम्बर, 2020


कल 14 दिसम्बर को राज कपूर की 97वीं जयन्ती पर सादर स्मरण 




स्वरगोष्ठी – 492 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 8 : संगीतकार – सी. रामचन्द्र

राग काफी पर आधारित सी. रामचन्द्र का रचा गीत मन्ना डे ने राज कपूर के लिए गाया 





पण्डित अजय चक्रवर्ती 

गायक मन्ना डे 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आमतौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर की फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। अगले सप्ताह उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्त्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर और उनके प्रारम्भिक दौर के संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की आठवीं कड़ी में हम 1957 में राज कपूर द्वारा अभिनीत फिल्म "शारदा” से राग काफी पर आधारित एक गीत; "चाहे ज़िंदगी से कितना भी भाग रे...” सुनवा रहे हैं, जिसका संगीत सी. रामचन्द्र ने और स्वर मन्ना डे ने दिया है। यह गीत राजेन्द्रकृष्ण ने लिखा है और राग काफी पर आधारित है। राग काफी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम इस राग में निबद्ध एक ठुमरी “जब से श्याम सिधारे...” पटियाला गायकी में दक्ष सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 



कल 14 दिसम्बर को फ़िल्मकार राज कपूर के 97वाँ जन्मदिन है। इस अवसर पर हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए श्रृंखला की आज की कड़ी में उनके द्वारा अभिनीत और 1957 में प्रदर्शित फिल्म “शारदा” का गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। राज कपूर सही अर्थों में स्वतंत्र भारत के सपनों के सौदागर थे। उनकी फिल्मों के कथानक और चरित्र सामाजिक यथार्थ की भूमि में जन्म लेते थे, परन्तु उनका ऊपरी स्वरूप फंतासी की तरह दिखता था। जीवन की विसंगतियों से भाग कर आए हुए दर्शक फंतासी के नेत्ररंजक स्वरूप में मनोरंजन पाते और प्रबुद्ध दर्शक सामाजिक सन्दर्भ और पात्रों की मानवीयता से अभिभूत हो जाते। हक़ीक़त और फसाना का यह सन्तुलन राज कपूर की निर्मित फिल्मों के साथ-साथ अभिनीत फिल्मों में भी उपस्थित रहा है। 


फिल्म "शारदा" में राज कपूर व मीना कुमारी 
आज हम आपको राज कपूर की अभिनीत फिल्म “शारदा” में उनके चरित्र के माध्यम से इस सन्तुलन प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे। फिल्म “शारदा” 1957 में प्रदर्शित हुई थी, जिसके निर्माता व निर्देशक एल.बी. प्रसाद तथा संगीतकार सी. रामचन्द्र व गीतकार राजेन्द्रकृष्ण थे। फिल्म के के गीत और संगीत की चर्चा से पूर्व फिल्म के कथानक और चरित्रों की चर्चा आवश्यक है। भारतीय सामाजिक सम्बन्धों की पड़ताल करती इस फिल्म की कथा सदाशिव ब्राह्मण और पी. शेट्टी ने, पटकथा इन्दरराज ने तथा संवाद विश्वामित्र आदिल ने लिखे थे। फिल्म की पटकथा के अनुसार वास्तव में यह नारी चरित्र प्रधान फिल्म है। फिल्म में नायिका शारदा की भूमिका अत्यन्त संवेदनशील अभिनेत्री मीना कुमारी द्वारा अभिनीत की गई थी। नायिका को भारतीय आध्यात्म और भारतीय परम्परा के के प्रति गहरी आस्था है। एक प्राकृतिक चिकित्सा आश्रम में सेविका के रूप में कार्य करने के दौरान वह चंचल, किन्तु निश्छल हृदय नायक शेखर (राज कपूर) के प्रति आकर्षित होती है। एक विदेशयात्रा के दौरान नायक शेखर की मृत्यु का समाचार मिलता है। शेखर की मृत्यु के समाचार और सामाजिक मर्यादा से बँधी शारदा के सामने ऐसी परिस्थिति बनती है कि उसे शेखर के विधुर पिता से विवाह करना पड़ता है। कुछ ही दिनों बाद शेखर विमान दुर्घटना से जीवित बच कर वापस लौट आता है और उसे नायिका अपनी विमाता के रूप में परिलक्षित होती है। वापस लौटने पर शेखर के सामने शारदा प्रेमिका से माँ की भूमिका में बदली हुई नज़र आती है। शेखर इस विसंगति को सह नहीं पाता और शराब के नशे में डूब जाता है। राज कपूर ने फिल्म में अपने चरित्र की विविधता को कुशलता से जिया है। नायिका प्रधान कथानक होने के बावजूद राज कपूर ने प्रेमिका और माँ के अन्तर्द्वंद्व को जिस खूबी से प्रस्तुत किया, उसने फिल्म “शारदा” को छठें दशक की श्रेष्ठतम फिल्मों की श्रेणी में ला दिया। 

फिल्म “शारदा” के गीतकार राजेन्द्र कृष्ण और संगीतकार सी. रामचन्द्र थे। इस दौर में सी. रामचन्द्र के प्रतिद्वंद्वी ओ.पी. नैयर और शंकर जयकिशन तत्कालीन जनरुचि के अनुकूल संगीत रचना कर रहे थे। इसके बावजूद सी. रामचन्द्र ने फिल्म “शारदा” में अविस्मरणीय संगीत रचे। हल्की फुल्की धुन में; “जप जप जप रे...”, कीर्तन शैली में; “निखिल भुवन पालम...”, लता मंगेशकर के स्वर में कर्णप्रिय गीत; “ओ चाँद जहाँ वो जाएँ...” आदि अपने समय के अत्यन्त लोकप्रिय गीतों की सूची में रहे हैं। परन्तु शब्दों के प्रेरक भाव, आकर्षक धुन और फिल्म के प्रसंग की सार्थक अभिव्यक्ति करता गीत; “चाहे ज़िन्दगी से कितना भी भाग रे...” फिल्म का एक आदर्श गीत सिद्ध हुआ। आज हम आपको राज कपूर द्वारा अभिनीत, सी. रामचन्द्र का संगीतबद्ध और मन्ना डे के स्वर में गाया गया वही गीत सुनवा रहे हैं। सी. रामचन्द्र, मुकेश की गायकी को पसन्द नहीं करते थे, इसके बावजूद राज कपूर के कारण उन्होने मुकेश को फिल्म में शामिल किया। परन्तु उन्होने मुकेश के हिस्से में फिल्म के हल्के फुल्के गीत ही गवाए। गम्भीर भाव के गीत मन्ना डे के हिस्से में ही आए। राग काफी के स्वरों पर आधारित फिल्म “शारदा” का यह गीत अब आप सुनिए। 

राग काफी : “चाहे ज़िंदगी से कितना भी भाग रे...” : मन्ना डे : संगीत – सी. रामचन्द्र 

 

हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है; काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। पहले हम राग काफी के स्वरों की संरचना पर विचार करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा, रे, ग(कोमल), म, प, ध, नि(कोमल), सां, तथा अवरोह में सां नि(कोमल), ध, प, म, ग(कोमल), रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। अब हम आपको राग काफी में निबद्ध एक ठुमरी; “जब से श्याम सिधारे...” का गायन सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और पटियाला गायकी की परम्परा के गायन में दक्ष पण्डित अजय चक्रवर्ती। लीजिए सुनिए राग काफी में निबद्ध यह ठुमरी और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग काफी : “जब से श्याम सिधारे...” : ठुमरी : पण्डित अजय चक्रवर्ती 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 492वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग 62 वर्ष पूर्व प्रदर्शित राज कपूर की एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के पाँचवें सत्र अर्थात इस वर्ष के अन्तिम अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन पार्श्वगायिकाओं के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 19 दिसम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 494 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 490वें अंक में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म "जागते रहो” से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को सफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुहम्मद रफी, एस. बलबीर और साथी। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की आठवीं कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "शारदा” के एक गीत का रसास्वादन किया, फिल्म के गीतकार राजेन्द्र कृष्ण तथा संगीतकार सी. रामचन्द्र का परिचय भी प्राप्त किया। यह गीत राग काफी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको पटियाला घराने की गायकी में दक्ष संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय ठुमरी रचना का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग काफी : SWARGOSHTHI – 492 : RAG KAFI : 13 दिसम्बर, 2020 


रविवार, 6 दिसंबर 2020

राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 491 : RAG BHAIRAVI




स्वरगोष्ठी – 491 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 7 : संगीतकार – सलिल चौधरी 

राज कपूर की फिल्म “जागते रहो” में फंतासी कम और सामाजिक यथार्थ अधिक है 




उस्ताद राशिद खाँ 

संगीतकार सलिल चौधरी 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आमतौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर की फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। अगले सप्ताह उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्त्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर और उनके प्रारम्भिक दौर के संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की सातवीं कड़ी में हम 1956 में राज कपूर द्वारा निर्मित और अभिनीत फिल्म "जागते रहो” से राग भैरवी पर आधारित एक गीत; "ते कि मैं झूठ बोलेया...” सुनवा रहे हैं, जिसका संगीत सलिल चौधरी ने और स्वर मुहम्मद रफी, एस. बलबीर और साथियों ने दिया है। यह गीत प्रेम धवन ने लिखा है और राग भैरवी पर आधारित है। राग भैरवी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम इस राग में निबद्ध एक भक्ति रचना “जय शारदा भवानी भारती...” रामपुर, सहसवान घराने के सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 



कल्पनाशील फ़िल्मकार राज कपूर के 97वें जन्मदिन के अवसर पर आयोजित श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार” की सातवीं कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। अपने फिल्मी जीवन में राज कपूर ने 18 फिल्मों का निर्माण किया था। फिल्म “हिना” का अधूरा निर्माण कर वे स्वर्ग सिधार गए, जिसे बाद में उनके पुत्रों ने पूरा किया। इन सभी फिल्मों के कथानक सामाजिक यथार्थ की भूमि से जन्म लेते थे, किन्तु उनका ऊपरी स्वरूप फंतासी की तरह दिखता था। इन 18 फिल्मों में एक फिल्म “जागते रहो” ऐसी है, जिसमें सामाजिक यथार्थ की मात्रा अधिक और फंतासी नाममात्र के लिए है। राज कपूर इस फिल्म के निर्माता और अभिनेता थे। फिल्म ‘जागते रहो’ एक सफल बांग्ला नाटक “एक दिन रात्रे” पर आधारित है, जिसमे एक रात की कहानी है। यह फिल्म महानगरीय सभ्यता के खोखलेपन को चित्रित करता है। फिल्म का निदेशन सुप्रसिद्ध रंगकर्मी जोड़ी शम्भू मित्रा और अमित मैत्र ने किया था। फिल्म का नायक एक छोटे से गाँव से नौकरी की खोज में महानगर में आया है। पूरे दिन भूंखा प्यासा भटकता हुआ वह एक बहुमंजिले भवन में पानी की तलाश में पहुँच जाता है। चौकीदार उसे चोर समझ कर शोर मचा देता है। घबरा कर वह खुद को छिपाने के लिए भवन की हर मंज़िल और हर फ्लैट में भटकता फिरता है। इन सभी फ्लैट में उसे तथाकथित सभ्य समाज का वास्तविक चेहरा दिखाई देता है। राज कपूर की यही एकमात्र फिल्म है, जिसमे अधिकतम हक़ीक़त है और नाममात्र का फसाना। राज कपूर ने इस गम्भीर कथ्य में भी मनोरंजन का प्रयास किया है। करारे व्यंग्य के बीच हास्य के क्षण भी हैं। पूरी फिल्म में नायक कुछ नहीं बोलता। केवल अन्त में वह कहता है; “मैं थका हारा पानी पीने यहाँ चला आया, और सब लोग मुझे मुझे चोर समझ कर मेरे पीछे भागे, जैसे मैं कोई पागल कुत्ता हूँ। मैंने यहाँ हर तरह के लोग और चेहरे देखे। मुझ गँवार को तुमसे यही शिक्षा दी कि चोरी किये बिना कोई बड़ा आदमी नहीं बन सकता। क्या सचमुच चोरी किये बिना कोई बड़ा आदमी नहीं बन सकता?” यह जलता हुआ प्रश्न राज कपूर ने देश के कर्णधारों से पूछा है। राज कपूर जैसे जागरूक फ़िल्मकार ने भावी भारतीय समाज का पूर्वानुमान 1956 में ही कर लिया था। 



फिल्म "जागते रहो" में राज कपूर और नरगिस 
फिल्म “जागते रहो” के निर्माण की योजना बनाते समय राज कपूर के साथियों ने इस शुष्क विषय पर फिल्म न बनाने का सुझाव दिया, किन्तु उनके मस्तिष्क में यह विषय इतनी गहराई तक पैठ चुका था कि उन्होने उस सुझाव को दरकिनार कर दिया। फिल्म के अन्तिम दृश्य में प्यासा नायक अन्ततः एक बाग में पहुँचता है, जहाँ नरगिस पौधों को सींच रही थी। रात भर का प्यासा नायक उस युवती के हाथ से जी भर कर पानी पीकर तृप्त हो जाता है। यह प्यास एक व्यक्ति के रूप में और एक प्रेमी हृदय वाले राज कपूर की थी और फ़िल्मकार राज कपूर की भी थी। फिल्म “जागते रहो” का एक विचित्र तथ्य यह भी है कि राज कपूर द्वारा निभाए गये चरित्र को पानी पिला कर तृप्त करने वाली नरगिस की राज कपूर के साथ यह अन्तिम फिल्म सिद्ध हुई। फिल्म “जागते रहो” का निर्माण आरम्भ होने से पहले शंकर जयकिशन, राज कपूर की फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। “बरसात”, “आवारा”, “श्री420”, “चोरी चोरी” आदि के गीत अत्यन्त जनप्रिय हो चुके थे। इसके बावजूद “जागते रहो” के लिए राज कपूर ने शंकर जयकिशन के स्थान पर जनवादी विचारधारा के सलिल चौधरी को संगीत का दायित्व दिया। राज कपूर की दूरदृष्टि ने इस तथ्य को पहचान लिया था कि शंकर जयकिशन के संगीत में आधी हक़ीक़त और आधा फसाना अभिव्यक्त होता है, जब कि सलिल चौधरी के संगीत से केवल हक़ीक़त। सलिल चौधरी ने फिल्म के कथानक के अनुरूप सूर्योदय के राग भैरव को केन्द्र में रख कर संगीत रचा। रात में होने वाले पाप को धोने और जनमानस में जागृति लाने के लिए भैरव के स्वरों से लिप्त गीत; “जागो मोहन प्यारे...” की ही आवश्यकता थी। सलिल दा ने इस फिल्म में दर्शनिकता से परिपूर्ण गीत; “ज़िंदगी ख्वाब है...” की भी रचना की, जिसे अभिनेता मोतीलाल पर फिल्माया गया था। आज जो गीत हम आपको सुनवाने जा रहे हैं, उसमें सलिल चौधरी की पंजाब के लोकसंगीत और नृत्य शैली उजागर होती है। पंजाब की चर्चित लोकशैली “भांगड़ा” पर आधारित गीत; “ते कि मैं झूठ बोलेया...” आज आपके लिए उपहार है। इस गीत को मोहम्मद रफी, एस. बलबीर और साथियों ने स्वर दिया है। गीतकार हैं प्रेम धवन और संगीतकार तो सलिल चौधरी हैं ही। फिल्म ‘जागते रहो’ के कथानक में घटित घटना की अवधि और फिल्म की अवधि लगभग समान है। रात्रि एक बज कर बीस मिनट से आरम्भ घटनाक्रम सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाता है। पंजाब के लोकनृत्य भांगड़ा और राग भैरवी पर आधारित यह गीत अब आप सुनिए। 

राग भैरवी : “ते कि मैं झूठ बोलेया...” : मुहम्मद रफी, एस. बलबीर और साथी : संगीत – सलिल चौधरी 


अभी आपने जो गीत सुना, उसमें राग भैरवी के स्वर लगे हैं। स्वरों के माध्यम से प्रत्येक रस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। संगीतज्ञ इसे ‘सदा सुहागिन राग’ तथा ‘सदाबहार’ राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒(कोमल), ग॒(कोमल), म, प, ध॒(कोमल), नि॒(कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒(कोमल), ध॒(कोमल), प, म ग(कोमल), रे॒(कोमल), सा होते हैं। यूँ तो इस राग के गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला है, किन्तु आमतौर पर इसका गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोधकर्त्ता लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने राग भैरवी पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगी। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परमशान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव के विषय में श्री मिश्र ने बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजित करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर, सहसवान घराने की गायकी के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध एक वंदना गीत। ऐसी मान्यता है कि इस गीत की रचना संगीत सम्राट तानसेन ने की थी। आप इस रचना के माध्यम से राग भैरवी के भक्तिरस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग भैरवी : "जय शारदा भवानी भारती..." : उस्ताद राशिद खाँ 



संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 491वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग 63 वर्ष पूर्व प्रदर्शित राज कपूर की एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के पाँचवें सत्र अर्थात इस वर्ष के अन्तिम अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 12 दिसम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 493 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 489वें अंक में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म "धुन से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को असफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – नट भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की सातवीं कड़ी में आज आपने राज कपूर की निर्मित और अभिनीत फिल्म "जागते रहो” एक गीत का रसास्वादन और गीतकार प्रेम धवन तथा संगीतकार सलिल चौधरी का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग भैरवी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको रामपुर, सहसवान घराने सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय भक्तिरचना का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग भैरवी : SWARGOSHTHI – 491 : RAG BHAIRAVI : 6 दिसम्बर, 2020 



रविवार, 29 नवंबर 2020

राग नट भैरवी : SWARGOSHTHI – 490 : RAG NAT BHAIRAVI





स्वरगोष्ठी – 490 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 6 : संगीतकार - मदन मोहन 

एकमात्र गीत, जिसमें हेमन्त कुमार ने राज कपूर के लिए स्वर दिया और एकमात्र फिल्म में संगीत मदन मोहन ने दिया 






संगीतकार मदन मोहन 

विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जाएगी। आमतौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर की फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा करेंगे, जिसने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती है। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्त्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। श्रृंखला के आज की छठी कड़ी में हम 1953 में राज कपूर व नरगिस द्वारा अभिनीत फिल्म "धुन” से राग नट भैरवी पर आधारित एक गीत; "हम प्यार करेंगे...” सुनवा रहे हैं, जिसका संगीत मदन मोहन ने और स्वर हेमन्त कुमार तथा लता मंगेशकर ने दिया है। यह गीत राग नट भैरवी पर आधारित है। राग नट भैरवी के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम राग नट भैरवी में निबद्ध एक भक्ति रचना “ॐ नमः शिवाय...” सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे और साथियों के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 



इस श्रृंखला के माध्यम से हम स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर और उनके प्रारम्भिक दौर के संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में हम उस फिल्म का उल्लेख करेंगे, जिसमें राज कपूर के साथ प्रथम और अन्तिम बार मदनमोहन ने संगीत दिया तथा हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर द्वारा राज कपूर और नरगिस के लिए गाया एकमात्र गीत शामिल था। वर्ष 1953 में प्रदर्शित यह फिल्म है ‘धुन’, जिसमें राज कपूर की सर्वप्रिय नायिका नरगिस थीं। नरगिस के साथ राज कपूर ने कुल 16 फिल्मों में अभिनय किया था, जिनमें 6 फिल्में आर.के. की थीं। राज कपूर के मित्र और लेखक जयप्रकाश चौकसे ने अपनी पुस्तक; “राज कपूर” में एक स्थान पर लिखा है; नरगिस, राज कपूर की फिल्मों की आत्मा थीं। महिलाओं के प्रति राज कपूर का जो दृष्टिकोण सामान्य जीवन में रहा, वही दृष्टिकोण उनकी फिल्मों में दिखाई पड़ता है। राज कपूर और नरगिस के सम्बन्धों के बारे में सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने अपने एक आलेख में लिखा था; राज कपूर ने पत्नी की हक़ीक़त को प्रेमिका के अफसाने से जोड़ दिया था। दरअसल राज कपूर ने अपनी कमजोरी और विशेषता को कभी छिपाया नहीं, बल्कि सहज रूप से जगजाहिर किया, यही कारण था कि फिल्म “आवारा” और “श्री 420” के प्रीमियर पर राज कपूर जब नरगिस सहित पत्नी कृष्णा कपूर के साथ गए तब इस त्रिवेणी को लोगों ने सहज रूप में स्वीकार किया। 


फिल्म "धुन" में राज कपूर 
अब हम राज कपूर और नरगिस अभिनीत फिल्म “धुन” के संगीतकार मदन मोहन की चर्चा करते हैं। वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म “आँखें” से फिल्म संगीत जगत में अपना हस्ताक्षर अंकित करने वाले मदनमोहन को आज भी फिल्मी ग़ज़लों का शाहंशाह माना जाता है। उन्हें ग़ज़लों के प्रति लगाव तब उत्पन्न हुआ, जब उन्होने सेना की नौकरी छोड़ कर आकाशवाणी, लखनऊ के संगीत विभाग में नौकरी की। यहीं पर उनकी भेंट बेग़म अख्तर के साथ उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ, रोशन आरा बेग़म, संगीतकर रोशन, पार्श्वगायक तलत महमूद और संगीतकार जयदेव से हुई। बेग़म अख्तर की गायकी से मदनमोहन अत्यन्त प्रभावित हुए थे। रेडियो की नौकरी के बाद ही वह फिल्मों की ओर उन्मुख हुए। 1953 में उन्हें फिल्म “धुन” का संगीत रचने का अवसर मिला। इस फिल्म के संगीत में उन्होने तत्कालीन प्रचलित शैली से अलग हट कर एक नया प्रयोग किया। पियानो की निरन्तरता के साथ रागों के स्वरों में गूँथी तर्ज़ों को खूब सराहा गया। फिल्म के गीतों में लता मंगेशकर का गाया; “तारे गिन गिन बीती रात...”, “सितारों से पूछो...” आदि गीत अत्यन्त मधुर थे, किन्तु गुणबत्ता की दृष्टि से राग भैरवी के स्वरों पर आधारित गीत; “निंदिया न आए...” फिल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत सिद्ध हुआ। फिल्म का एक हल्का फुल्का युगल गीत; “हम प्यार करेंगे...” अपने समय में बेहद लोकप्रिय हुआ था। यह गीत राज कपूर और नरगिस पर फिल्माया गया था। इस युगल गीत में लता मंगेशकर ने नरगिस के लिए और संगीतकार व गायक हेमन्त कुमार ने राज कपूर के लिए अपनी आवाज़ दी थी। “धुन” राज कपूर द्वारा अभिनीत एकमात्र वह फिल्म है जिसका संगीत मदनमोहन ने दिया। इस फिल्म के बाद फिल्म संगीत के इन दोनों दिग्गजों ने राज कपूर के साथ कभी कार्य नहीं किया। आइए अब हम सुनते है, फिल्म “धुन” का वही गीत, जिसे राज कपूर और नरगिस के लिए क्रमशः हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर ने पार्श्वगायन किया है। गीतकार हैं, भरत व्यास और संगीतकार हैं, मदनमोहन। 

राग नट भैरवी : “हम प्यार करेंगे...” : हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर : संगीत – मदन मोहन 


राग नट भैरवी की संरचना कुछ इस प्रकार है कि राग भैरवी में जब शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाता है तब यह आसावरी थाट का राग नट भैरवी कहलाता है। निश्चित रूप से इस राग का सम्बन्ध आसावरी थाट से होता है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग नट भैरवी के आरोह और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग में कोमल गान्धार, कोमल धैवत और कोमल निषाद के साथ शुद्ध ऋषभ का प्रयोग किया जाता है। आरोह के स्वर हैं; सा, रे, कोमल ग, म, प, कोमल ध, कोमल नि, और सां तथा अवरोह के स्वर हैं; सां, कोमल नि, कोमल ध, प, म, कोमल ग, रे, और सा। इस राग में कोई भी स्वर वर्जित नहीं होता। राग का वादी स्वर कोमल धैवत और संवादी स्वर कोमल गान्धार होता है। इस राग के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का प्रथम प्रहर माना जाता है। राग की एक विशेषता यह भी है कि कोमल धैवत कभी कभी शुद्ध धैवत का भी प्रयोग कर लिया जाता है। इस राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराने के लिए अब हम आपके लिए राग नट भैरवी में पिरोयी एक भक्तिरचना सुनवाते हैं। इसे सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे और साथियों ने प्रस्तुत किया है। गीत में संगति वाद्य के रूप में पाश्चात्य वाद्यों का प्रयोग भी किया गया है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग नट भैरवी : “ॐ नमः शिवाय...” : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे और साथी 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 490वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग 64 वर्ष पूर्व प्रदर्शित राज कपूर की एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात इस अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन पार्श्वगायकों के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 5 दिसम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 492 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 488वें अंक में हमने आपको 1950 में प्रदर्शित फिल्म "दास्तान” से लिये गए एक युगल गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को सफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुहम्मद रफी और सुरैया 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की छठी कड़ी में आज आपने राज कपूर की अभिनीत फिल्म "धुन” के एक युगलगीत का रसास्वादन किया और गीतकार भरत व्यास तथा संगीतकार मदन मोहन द्वारा तैयार गीत का परिचय प्राप्त किया। यह गीत राग नट भैरवी पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे और साथियों के स्वर में एक अत्यन्त कर्णप्रिय भक्तिरचना का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग नट भैरवी : SWARGOSHTHI – 490 : RAG NAT BHAIRAVI : 29 नवम्बर, 2020 


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