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Tuesday, September 21, 2010

खासी तिंग्या का खास अंदाज़ लिए तन्हा राहों में कुछ ढूँढने निकले हैं गुमशुदा बिक्रम घोष और राकेश तिवारी

ताज़ा सुर ताल ३६/२०१०


विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' में आप सभी का फिर एक बार बहुत बहुत स्वागत है! पिछले हफ़्ते हमने एक ऒफ़बीट फ़िल्म 'माधोलाल कीप वाकिंग्‍' के गानें सुने थे, और आज भी हम एक ऒफ़बीट फ़िल्म लेकर हाज़िर हुए हैं। इस फ़िल्म के भी प्रोमो टीवी पर दिखाई नहीं दिए और कहीं से इसकी चर्चा सुनाई नहीं दी। यह फ़िल्म है 'गुमशुदा'।

सुजॊय - अपने शीर्षक की तरह ही यह फ़िल्म गुमशुदा-सी ही लगती है। सुना है कि यह एक मर्डर मिस्ट्री की कहानी पर बनी फ़िल्म है जिसका निर्माण किया है सुधीर डी. आहुजा ने और निर्देशक हैं अशोक विश्वनाथन। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रजत कपूर, विक्टर बनर्जी, सिमोन सिंह, राज ज़ुत्शी और प्रियांशु चटर्जी। फ़िल्म में संगीत है बिक्रम घोष का और गानें लिखे हैं राकेश त्रिपाठी ने।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, ये बिक्रम घोष कहीं वही बिक्रम घोष तो नहीं हैं जो एक नामचीन तबला वादक हैं और जिनका फ़्युज़न संगीत में भी दबदबा रहा है?

सुजॊय - जी हाँ, आपने बिल्कुल ठीक पहचाना, और आपको यह भी बता दूँ कि बिक्रम के पिता हैं पंडित शंकर घोष जो एक जानेमाने तबला वादक रहे हैं जिन्होंने उस्ताद अली अक़बर ख़ान और पंडित रविशंकर जैसे मैस्ट्रोस का संगत किया है।

विश्व दीपक - जहाँ तक फ़िल्मी करीयर का सवाल है, बिक्रम घोष का हिंदी फ़िल्मों में यह पदार्पण है, जबकि बांगला फ़िल्मों में वो संगीत दे चुके हैं।

सुजॊय - हाँ, उनके संगीत से सजी कुछ बांगला फ़िल्में हैं इति श्रीकांत (२००४), देवकी (२००५), नील राजार देशे (२००८), और पियालीर पासवर्ड (२००९)। साल २००९ में एक फ़िल्म बनी थी अंग्रेज़ी, हिंदी और गुजराती में 'लिटल ज़िज़ू' के नाम से जिसमें बिक्रम घोष ने गिउलियानो मोदारेली के साथ मिलकर संगीत दिया था। और आइए अब बातों को देते हैं विराम और सुनते हैं 'गुमशुदा' का पहला गीत सुनिधि चौहान की आवाज़ में।

गीत - तन्हा राहें


विश्व दीपक - "तन्हा राहें मेरी उलझी सी क्यों लगे, एक नया अरमाँ फिर भी दिल में जगे, ढूंढे नज़रें मेरी अंजानी मंज़िलें, साया भी क्यों मेरा अब फ़साना लगे"; क्योंकि यह एक मर्डर मिस्ट्री फ़िल्म है, इसलिए इस फ़िल्म के गीतों से हमें उसी तरह की उम्मीदें रखनी चाहिए। और इस पहले गीत में भी एक क़िस्म का सस्पेन्स छुपा सा लगता है, जैसे कोई राज़, कोई डर छुपा हुआ हो। सुनिधि की आवाज़ में यह गीत सुन कर फ़िल्म 'दीवानगी' के शीर्षक गीत की याद आ गई। "सपनों से कह दो अब मुझे ना ठगे", गीतकार राकेश तिवारी के इन बोलों में नई बात नज़र आई है।

सुजॊय - और गीत के संगीत संयोजन से भी सस्पेन्स टपक रहा है। साज़ों के इस्तेमाल में भी विविधता अपनाई गई है। परक्युशन से लेकर लातिनो कार्निवल म्युज़िक के नमूने सुने जा सकते हैं इस गीत में। गायकी के बारे में यही कह सकते हैं कि यह स्टाइल सुनिधि का मनचाहा स्टाइल है और इसलिए शायद इस गीत को गाना उनके लिए बायें हाथ का खेल रहा होगा। इस तरह के गानें उन्होंने शुरु से ही बहुत से गाए हैं, इसलिए गायकी के लिहाज़ से कोई नई बात नहीं है इसमें।

विश्व दीपक - आइए अब बढ़ते हैं दूसरे गीत की ओर, इस बार आवाज़ है सोनू निगम की। जब फ़िल्म का शीर्षक ही है 'गुमशुदा' तो इस फ़िल्म के किसी गीत में अगर ढूंढने की बात हो तो इसमें हैरत वाली कोई बात नहीं, है न? इस गीत के बोल हैं "ढूंढो, गली गली डगर डगर नगर नगर शहर शहर अरे ढूंढो, हर सफ़र दर बदर आठों पहर शाम-ओ-सहर अरे ढूंढो"।

गीत - ढूंढो


सुजॊय - इस गीत में अगर ढूंढ़ने जाएँ तो बिक्रम घोष का ज़बरदस्त ऒरकेस्ट्रेशन मिलता है। वैसे गीत का जो बेसिक ट्युन है वह सीधा सादा सा है, एल्किन अरेंजमेण्ट में हेवी ऒरकेस्ट्रेशन का प्रयोग हुआ है। भारतीय और विदेशी साज़ों का अच्छा फ़्युज़न हुआ है। कुछ कुछ क़व्वली शैली का भी सहारा लिया गया है। कहीं कहीं हार्ड रॊक शैली का भी असर मिलता है।

विश्व दीपक - गीतकार राकेश तिवारी की बात करें तो वो एक कोलकाता बेस्ड स्क्रीनप्ले राइटर, संवाद लेखक, गीतकार और निर्देशक हैं। १४ नवंबर १९७० को कोलकाता में जन्में राकेश ने मुंबई मायानगरी की तरफ़ रूख किया साल २००० में। निम्बस टेलीविज़न के साथ उन्होंने काम करना शुरु किया और एशियन स्काइशॊप के लिए बहुत से विज्ञापन लिखे। लेकिन २००२ में वो कोलकाता वापस आ गए और यहीं पर काम करना शुरु कर दिया। राकेश तिवारी करीब १० टीवी धारावाहिक लिख चुके हैं और फ़िल्मों के लिए १६० से उपर गीत लिख चुके हैं। उन्होंने एक बंगला फ़िल्म 'बोनोभूमि' में एक हिंदी गीत भी लिखा है जो फ़िल्म का एकमात्र ऒरिजिनल गीत है।

सुजॊय - 'गुमशुदा' फ़िल्म में कुल ६ गीत हैं और हर गीत एक एकल गीत है और हर गीत में अलग आवाज़ है। सुनिधि चौहान और सोनू निगम के बाद अब इस गीत में आवाज़ जून बनर्जी की है।

गीत - किसने पहचाना


विश्व दीपक - स्पैनिश प्रभाव का एक और उदाहरण था यह गीत, जिसमें अकोस्टिक स्पैनिश लूप पूरे गीत में छाया हुआ है। "किसने पहचाना खेल मन का अंजाना", इस गीत में भी वही सस्पेन्स, वही अद्‍भुत रस! अब तो भई एक जैसा लगने लगा है। "तन्हा राहें" गीत का ही एक्स्टेंशन लगा यह गीत। बस ऒरकेस्ट्र्शन में थोड़ा हेर फेर है।

सुजॊय - इस गीत की गायिका जून बनर्जी एक उभरती गायिका हैं। बांगला फ़िल्मों में उन्होंने कई गीत गाए हैं। हिंदी फ़िल्मों की बात करें तो जून ने २००९ में 'रात गई बात गई' में अनुराग शर्मा के साथ एक युगल गीत गाया था, उससे पहले 'गांधी माइ फ़ादर' में भी उनकी आवाज़ सुनाई दी थी। २००७ में शंकर अहसान लॊय के संगीत में जून बनर्जी ने शंकर महादेवन और विशाल दादलानी के साथ मिलकर 'हाइ स्कूल म्युज़िकल-२' में "उड़ चले" गीत गाया था।

विश्व दीपक - और अब चौथा गीत और चौथी आवाज़, रोनिता डे की, बोल "चुप था पानी चुप थी लहर, एक हवा का झोंका, उठ गया है भँवर"।

गीत - चुप था पानी


सुजॊय - इस गीत में भी वही सपेन्स और डर छुपा है, "गहरा घना दलदल, धंस गया है कमल, कौन किसको रोके, कहदे रुक जा संभल, आनेवाले कल में बीता कल क्यों मिले, ख़्वाबों के रंगों में क्यों ख्वाहिशें घुले"। इस गीत में कोरस का गाया "उंगली पकड़ के मीर मौला रस्ता बता दे मेरे मौला" सुनने में अच्छा लगता है।

विश्व दीपक - अगर आपको इससे पहले के दो गीत ज़्यादा नहीं भाये हों तो इस गीत में बिक्रम घोष ने पूरी कोशिश की है कि उन गीतों की ख़ामियों को पूरा कर दे। अच्छा कॊम्पोज़िशन है और रोनिता डे ने अच्छा निभाया है इसको। और इस गीत में भी परक्युशन का इस्तेमाल सुनाई देता है।

सुजॊय - अब एक रॊक नंबर रुपंकर की आवाज़ में। जी हाँ, वही रुपंकर जो आज बंगाल के एक जाने माने और कामयाब गायक हैं। इनका पूरा नाम है रुपंकर बागची। बंगाल में इनके गाए बांगला गीतों के हज़ारों लाखों चाहने वाले हैं। उनके गाए ग़ैर-फ़िल्मी ऐल्बम्स, फ़िल्मी गीत और विज्ञापन जिंगल्स घर घर गूंज रहे हैं बंगाल में। उन्हें कई पुरस्कारों से भी नवाज़ा जा चुका है। टीवी धारावाहिक 'शोनार होरिन' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ टाइटल गीत का 'टेलीसम्मान' ख़िताब मिला, तो फ़िल्म 'अंदरमहल' के लिए सर्बश्रेष्ठ गायक का पुरस्कार मिला मशहूर मीडिया ग्रूप 'आनंद बज़ार पत्रिका' से।उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का भी पुरस्कार मिल चुका है और कई बार सर्वश्रेष्ठ ऐल्बम के पुरस्कार से भी नवाज़े जा चुके हैं। उनके गाये रोमांटिक गानें तो जैसे आज के बांगला युवाओं के दिलों की धड़कन बन गये है।

विश्व दीपक - आज के दौर के रॊक शैली के गायकों में सूरज जगन का नाम इन दिनों सब से उपर चल रहा है। और इस गीत में भी रुपंकर का अंदाज़ सूरज जगन से मिलता जुलता सुनाई दे रहा है। लीजिए आप भी सुनिए।

गीत - इसमे है चमक इसमें है नशा


विश्व दीपक - और अब फ़िल्म का छठा और अंतिम गीत, जिसे गाया है दोहर ने। यह शायद इस ऐल्बम का सब से अनोखा गीत है क्योंकि इसके बोल हिंदी के नहीं बल्कि उत्तरी-पूर्वी भारत के किसी राज्य का है। गीत के बोल हैं "खासी तिंग्या"। भले ही गीत के बोल समझ में ना आते हों लेकिन इस लोक धुन में वही पहाड़ों वाला आकर्षण है जो अपनी तरह खींचता है और इस गीत को सुनते हुए जैसे हम उत्तर-पूर्व में पहुँच जाते हैं।

सुजॊय - वाक़ई इस तरह का संगीत किसी हिंदी फ़िल्म में पहले कभी सुनने को नहीं मिला है। क्योंकि मैं ख़ुद उत्तरपूर्वी भारत में एक लम्बे अरसे तक रह चुका हूँ, शायद इसीलिए यह भाषा बहुत ही जानी-पहचानी-सी लग रही है। लेकिन बात ऐसी है कि उत्तरपूर्व भारत में इतनी सारी जनजातियाँ हैं और सबकी अलग अलग भाषाएँ हैं कि किसी एक भाषा को अलग से पहचान पाना आसान नहीं। मुझे जितना लग रहा है कि यह खासी भाषा है जो मेघालय की एक जनजाति है। लेकिन मैं पक्का कह नहीं सकता। गीत कुछ इस तरह का है "ahai klimnoe khasi tingya, ahai klimnoe khasi tingya, kilma savay kilm thungya, kilma savay kilm thungya"। आइए सुनते हैं, बड़ा मीठा सा गाना है, और क्यों ना हो, लोक गीत होते ही मीठे हैं चाहे किसी भी अंचल के क्यों ना हों!

गीत - खासी तिंग्या


सुजॊय - 'गुमशुदा' फ़िल्म के गानों के बारे में यही कहूँगा कि सभी गानें सिचुएशनल है, फ़िल्म को देखते हुए शायद इनका असर पता चलेगा। सिर्फ़ अगर बोल और संगीत की बात है तो "चुप था पानी" और "खासी तिंग्या" मुझे अच्छे लगे। मेरी तरफ़ से ३ की रेटिंग।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस एलबम पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले मैं आपको धन्यवाद देना चाहूँगा क्योंकि आपकी बदौलत हीं हम इन ऑफबीट फिल्मों के गीतों से रूबरू हो पा रहे हैं, नहीं तो आज के समय में कोई भी समीक्षक इन फिल्मों पर अपनी नज़र या अपनी कलम नहीं दौड़ाता या फिर अगर दौड़ाता भी है तो इन फिल्मों (और इनके गीतों) को सिरे से निरस्थ कर देता है। हम बस यही मानकर चलते हैं कि अच्छा संगीत तो बड़े संगीतकारों की झोली से हीं निकल सकता है और इस गलत सोच के कारण बिक्रम घोष जैसे संगीतकार नेपथ्य में हीं रह जाते हैं। मैं आवाज़ के सारे श्रोताओं से यह दरख्वास्त करता हूँ कि अगर आप "गुमशुदा" के गाने सुनने के मूड में नहीं हैं(थे), फिर भी आज के "ताज़ा सुर ताल" में शामिल किए गए इन गानों को एक मर्तबा जरूर सुन लें, उसके बाद निर्णय पूर्णत: आपका होगा कि आगे इन गानों को सुनना है भी या नहीं। जैसा कि सुजॉय जी ने कहा कि संगीतकार ने हिन्दी फिल्मों में अच्छा पदार्पण करने की पूरी कोशिश की है, अब भले हीं इस कोशिश में थोड़ा दुहराव आ गया है, लेकिन इस कोशिश को सराहा जाना चाहिए। सुजॉय जी की रेटिंग को सम्मान देते हुए मैं आज की समीक्षा के समापन की घोषणा करता हूँ। अगली बार एक बड़ा हीं खास एलबम होगा, मेरे सबसे पसंदीदा संगीतकार का... इंतज़ार कीजिएगा।

आवाज़ रेटिंग्स: गुमशुदा: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १०६- फ़िल्म 'लिटल ज़िज़ू' को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों की किस श्रेणी के तहत पुरस्कृत किया गया था?

TST ट्रिविया # १०७- आज जब मेघालय के खासी लोक संगीत का ज़िक चला है तो बताइए कि वह कौन सी लोरी थी अनिल बिस्वास की स्वरबद्ध की हुई जिसमें उन्होंने खासी लोक धुन का इस्तमाल किया था?

TST ट्रिविया # १०८- निर्देशक अशोक विश्वनाथन को कितनी बार नैशनल अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. फ़िल्म - सूरजमुखी, गायिका - अर्पिता साहा
२. अल्ताफ़ राजा
३. फ़िल्म 'हिना' की क़व्वाली "देर ना हो जाए कहीं"

Wednesday, March 17, 2010

पीपरा के पतवा सरीके डोले मनवा...मिटटी की सौंधी सौंधी महक लिए "गोदान" का ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 376/2010/76



'१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला की छठी कड़ी में हमने आज एक ऐसी फ़िल्म के गीत को चुना है जिसकी कहानी एक ऐसे साहित्यकार ने लिखी थी जिनका नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। मुंशी प्रेमचंद, जिनकी बहुचर्चित उपन्यास 'गोदान' हिंदी साहित्य के धरोहर का एक अनमोल नगीना है। 'गोदान' की कहानी गाँव में बसे एक किसान होरी और उसके परिवार की मर्मस्पर्शी कहानी है कि किस तरह से समाज उन पर एक के बाद एक ज़ुल्म ढाते हैं और किस तरह से वो हर मुसीबत का सामना करते हैं। सेल्युलॊयड के पर्दे पर 'गोदान' को जीवंत किया था निर्देशक त्रिलोक जेटली के साथ साथ अभिनेता राज कुमार, शशिकला, महमूद, शुभा खोटे, मदन पुरी, टुनटुन और कामिनी कौशल ने। फ़िल्म में संगीत था पंडित रविशंकर का और गीत लिखे शैलेन्द्र और अंजान ने। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि युं तो अंजान ने फ़िल्म जगत में १९५३ में ही क़दम रख दिया था 'प्रिज़नर्स ऒफ़ गोलकोण्डा' नामक फ़िल्म से, लेकिन उसके बाद कई सालों तक उनकी झोली में कम बजट की फ़िल्में ही आती रहीं जिसकी वजह से लोगों ने उनकी तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। जिस फ़िल्म के गीतों के अंजान और अंजान नहीं रहे, वह फ़िल्म थी 'गोदान'। 'गोदान' के वह राह खोल दिया कि जिसके बाद बड़े बड़े संगीतकारों ने उनसे गानें लिखवाने शुरु कर दिये। फ़िल्म 'गोदान' के गानें फ़िल्म के स्थान, काल, पात्र के मुताबिक लोक शैली के ही थे, जिनमें से उल्लेखनीय हैं गीता दत्त व महेन्द्र कपूर का गाया "ओ बेदर्दी क्यों तड़पाए जियरा मोरा रिझाय के", लता मंगेशकर का गाया "चली आज गोरी पिया की नगरिया" व "जाने काहे जिया मोरा डोले रे", मुकेश का गाया "हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा", आशा भोसले का गाया "जनम लियो ललना कि चांद मोरे अंगना उतरी आयो हो", तथा मोहम्मद रफ़ी का गाया "बिरज में होली खेलत नंदलाल" और "पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा"। आज हम सुनने जा रहे हैं "पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा के हियरा में उठत हिलोल, पूर्वा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा के चल आज देसवा की ओर"। क्या ख़ूब तुलना की है अंजान साहब ने कि दिल ऐसे डोल रहा है जैसे कि हवा के झोंकों से पीपल के पत्त्ते सरसराते हैं। दोस्तों, यह गीत हम ख़ास बजा रहे हैं व्व्व्व के अनुरोध पर।



विविध भारती पर सन्‍ २००७ में एक शृंखला प्रस्तुत की गई थी जिसका शीर्षक था 'अंजान की कहानी समीर की ज़बानी'। तो उसमें अंजान साहब के सुपुत्र समीर साहब से जब यूनुस ख़ान ने आज के इस प्रस्तुत गीत का ज़िक्र किया था, तब समीर साहब ने कुछ इस तरह से अपने विचार व्यक्त किए थे इस गीत के बारे में - "मुझे भी यह गाना बहुत याद आता है और क्यों याद आता है क्योंकि मुझे मेरा गाँव याद आता है। मेरा गाँव जो है वह बाबसपुर, बनारस में है। बाबसपुर एयरपोर्ट, जहाँ पे प्लेन आती हैं, जाती हैं, वहाँ से जितना दूर गाँव का घर है, उतना ही दूर शहर का घर है। तो मेरा गाँव जो है, और उसमें मेरा मकान जो है, उसके चारों तरफ़ बांस के बहुत ज़्यादा पेड़ हुआ करते थे। तो जब मैं बड़ा हुआ और जब मैंने उनका (अंजान का) गाना सुना "बतवारी में मधुर सुर बाजे", तो पहले तो मुझे बतवारी का मतलब मालूम नहीं था। तो मैंने कहा कि "बतवारी" का मतलब क्या है? बाद में जब मैं लिखने लगा, समझने लगा और रेडियो से जुड़ा तब मुझे याद आया कि वो बांस से, बचपन में मम्मी बोला करती थीं कि बतवारी में मत जाना, वहाँ सांप हैं, वहाँ कीड़ें बहुत होते हैं। मुझे बतवारी याद आई और पता चला कि उन्होने बतवारी वहाँ से ली थी, और कितना ख़ूबसूरत गाना था, तो ऐसी सिमिलीज़, ऐसी सारी उपमाएँ केवल वही दे सकता है जो इस मिट्टी से जुड़ा हुआ हो!" बस्‍ दोस्तों, मेरा ख़याल है कि गाँव की मिट्टी से जुड़े इस गीत को लिखने वाले की तारीफ़ में ये शब्द काफ़ी हैं। इससे आगे आप ख़ुद सुन कर महसूस कीजिए।







क्या आप जानते हैं...





चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-



1. मुखड़े में शब्द है -"धूप", गीत पहचानें-३ अंक.

2. बासु चटर्जी निर्मित और निर्देशित इस फिल्म का नाम बताएं- २ अंक.

3. अमोल पालेकर और फिल्म की नायिका पर फिल्माए इस गीत के गीतकार कौन हैं-२ अंक.

4. पुराने दौर के एक अमर संगीत से सुपुत्र हैं इस गीत के संगीतकार, नाम बताएं-२ अंक.



विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।



पिछली पहेली का परिणाम-

अनुपम जी बधाई, बहुत दिनों में पधारे आप, शरद जी और अवध जी आये सही जवाब लेकर. पारुल और उज्जवल आपके सन्देश पाकर खुशी हुई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी

पहेली रचना -सजीव सारथी




ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, December 23, 2009

कैसे दिन बीते कैसे बीती रतिया....पंडित रवि शंकर और शैलेन्द्र की जुगलबंदी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 299

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों आप सुन रहे हैं शरद तैलंग जी के पसंद के पाँच गानें बिल्कुल बैक टू बैक। आज है उनके चुने हुए चौथे गाने की बारी। फ़िल्म 'अनुराधा' से यह है लता जी का गाया "कैसे दिन बीते कैसे बीती रतिया, पिया जाने ना"। इस फ़िल्म का एक गीत हमने 'दस राग दस रंग' शृंखला के दौरान आपको सुनवाया था। याद है ना आपको राग जनसम्मोहिनी पर आधारित गीत "हाए रे वो दिन क्यों ना आए"? फ़िल्म 'अनुराधा' के संगीतकार थे सुविख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर, जिन्होने इस फ़िल्म के सभी गीतों में शास्त्रीय संगीत की वो छटा बिखेरी कि हर गीत लाजवाब है, उत्कृष्ट है। इस फ़िल्म में उन्होने राग मंज खमाज को आधार बनाकर दो गानें बनाए। एक है "जाने कैसे सपनों में खो गई अखियाँ" और दूसरा गीत है "कैसे दिन बीते कैसे बीती रतिया", और यही दूसरा गीत पसंद है शरद जी का। शैलेन्द्र की गीत रचना है और लता जी की सुरीली आवाज़। वैसे हम इस फ़िल्म के बारे में सब कुछ "हाए रे वो दिन..." गीत के वक़्त ही बता चुके हैं। यहाँ तक कि फ़िल्म की कहानी का सारांश भी बताया जा चुका है। तो आज बस इतना ही कहेंगे कि इस राग पर एक और गीत जो लोकप्रिय हुआ है वह है फ़िल्म 'शागिर्द' का भजन "कान्हा आन पड़ी मैं तेरे द्वार"।

आइए आज जब मौका हाथ लगा है तो आपको पंडित रविशंकर जी के बारे में कुछ बातें बताई जाए। पंडित जी का जन्म ७ अप्रैल १९२० में वारानसी में हुआ था। उस समय उनका नाम रखा गया था रबीन्द्र शंकर चौधरी। उन्होने अपनी जवानी अपने भाई उदय शंकर के डांस ग्रूप के साथ पूरे भारत और यूरोप के टूर करते हुए गुज़ार दी। १८ वर्ष की अयु में, यानी कि १९३८ में उन्होने नृत्य छोड़ दिया और अल्लाउद्दिन ख़ान के पास चले गए सितार सीखने के लिए। १९४४ में पढ़ाई ख़त्म कर वो बन गए एक संगीतकार और सत्यजीत रे की बंगला फ़िल्मों में संगीत देने लगे। इनमें शामिल है कालजयी बंगला फ़िल्म 'अपुर संसार'। १९४९ से लेकर १९५६ तक पंडित जी आकाशवाणी दिल्ली में संगीतकार रहे। १९५६ से उन्होने भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार के लिए अमरीका व यूरोप के टूर शुरु किए। सितार और भारतीय शास्त्रीय संगीत को दुनिया में लोकप्रिय बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है और इस प्रयास के लिए उन्हे समय समय पर बहुत सारे सम्मानों से सम्मानित भी किया गया है। १९९९ में उन्हे देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से समानित किया गया, जिसके बाद और किसी पुरस्कार का ज़िक्र फीका सा लगेगा। २००० के दशक में वो अपनी बेटी अनूष्का के साथ पर्फ़ॊर्म करते हुए देखे और सुने गए। आज वो ८९ वर्ष के हैं। हम हिंद युग्म की तरफ़ से उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की ईश्वर से कामना करते हैं और उनके द्वारा बनाए इस सुमधुर गीत का आनंद उठाते हैं। आइए सुनें...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. कल होगा हमारा एतिहासिक ३०० वां एपिसोड जो समर्पित होगा हमारे वीर जांबाज़ जवानों के नाम.
२. मन्ना डे हैं गायक.
३. मख़्दूम मोहिउद्दिन के रचे इस गीत के मुखड़े में शब्द है-"पूछो", और हाँ कल ज़रा कमर कस कर आईएगा, क्योंकि कल होगी आपके संगीत ज्ञान की अब तक की सबसे कठिन परीक्षा...

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, हमें खुशी है कि ३०० तक पहुचते पहुँचते हमें आपके रूप में एक जबरदस्त विजेता मिल गया है, आपने ये दूरी रिकॉर्ड टाइम में पूरी की है, शरद जी तो अपने उदगार व्यक्त कर चुके ही हैं, दो बार विजेता बने शरद जी के मूह से निकले ये शब्द बहुत कुछ कह जाते हैं, तो ढोल नगाड़े बज रहे हैं और तालियाँ भी खूब जोरों शोरों से बज रही हैं आशा है आप भी सुन पा रही होंगीं, एक बार फिर से बधाई, पाबला जी और अवध जी भी शामिल हैं इस सत्कार में, राज जी, गोदान फिल्म के गीत शैलेन्द्र ने नहीं लिखे थे, पर मैंने और सुजॉय ने आज तक इस फिल्म का कोई गीत नहीं सुना है, यदि आपके पास उपलब्ध हों तो हमें अवश्य भेजने का कष्ट करें, और हाँ कल होगी हमारे सभी अब तक के धुरंधरों की सबसे बड़ी टक्कर, तैयार हैं न आप सब ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, October 12, 2009

हाय रे वो दिन क्यों न आये....ओल्ड इस गोल्ड पर पहली बार पंडित रविशंकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 230

'दस राग दस रंग' शृंखला मे पिछले नौ दिनों में आप ने सुने नौ अलग अलग शास्त्रीय रागों पर आधारित कुछ बेहतरीन फ़िल्मी रचनाएँ। आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी में हम आप को सम्मोहित करने के लिए लेकर आए हैं राग जनसम्मोहिनी, जिसे शुभ कल्याण भी कहा जाता है। सुविख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर आधुनिक काल के ऐसे संगीत साधक हैं जिन्होने ख़ुद कई रागों का विकास किया, नए नए प्रयोग कर नए रागों का इजाद किया। राग जनसम्मोहिनी उन्ही का पुनराविष्कार है। दोस्तों, एक बार ज़ी टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रम 'सा रे गा मा पा' में एक प्रतिभागी ने फ़िल्म 'अनुराधा' का एक गीत गाते वक़्त उसके राग को कलावती बताया था, जिसे सुधारते हुए जज बने ख़ुद पंडित रविशंकर ने बताया कि दरअसल यह राग कलावती नहीं बल्कि जनसम्मोहिनी है। जब पंडित जी ने यह राग बजाया था तब उन्हे मालूम नहीं था कि इसे क्या कहा जाता है। जब इसका उल्लेख कहीं नहीं मिला तो वो इसे अपने नाम पर रवि कल्याण या कुछ और रख सकते थे, जैसे कि तानसेन के नाम पर है मिया की तोड़ी और मिया की मल्हार। पंडित रविशंकर ने और ज़्यादा शोध किया और ढ़ूंढ निकाला एक दक्षिण भारतीय स्केल जिसे जनसम्मोहिनी कहा जाता है। उन्होने उसी कार्यक्रम में बताया कि हो सकता है कि इस राग का ज़िक्र किताबों में हो, लेकिन कोई भी इसे बजा नहीं रहा था। राग कलावती में अगर एक शुद्ध रिशभ लगा दिया जाए तो वह बन जाता है राग जनसम्मोहिनी। इस राग के बारे में बहुत कुछ कह गया मैं लेकिन फ़िल्म 'अनुराधा' के उस गीत का तो ज़िक्र किया ही नहीं। यह गीत है लता जी का गाया हुआ "हाए रे वो दिन क्यों ना आए"। शैलेन्द्र की गीत रचना है।

ऋषिकेश मुखर्जी के इस १९६० की फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे बलराज साहनी और लीला नायडु। कहानी है एक डॊक्टर निर्मल की जो गरीबों की सेवा के लिए एक गाँव में प्रैक्टिस करने जाता है। वहाँ उसकी मुलाक़ात होती है अनुराधा नाम की एक लड़की से जो रेडियो पर गाती हैं। दोनों में प्यार हो जाता है, अनुराधा के पैसे वाले पिता के मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाकर दोनो शादी कर लेते हैं। अनुराधा गाना छोड़ देती है और घर गृहस्थी में लग जाती है। लेकिन जल्द ही उनकी शादी-शुदा ज़िंदगी में दरार पड़ जाती है जब अनुराधा का एक पुराना दोस्त उसकी ज़िंदगी में वापस आ जाता है, और उसे एक बार फिर से गाना शुरु करने की राय देता है। पति पत्नी में दूरियाँ बढ़ती चली जाती है, अनुराधा को भी लगने लगता है कि उसका पति उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दे रहा है, और इसलिए एक दिन अनुराधा फ़ैसला करती है अपने पति से अलग होने का। आगे क्या होता है फ़िल्म का अंजाम, वह आप ख़ुद ही कभी देख लीजिएगा। तो साहब, एक रेडियो गायिका का किरदार होने की वजह से अनुराधा (लीला नायडु) पर कई गानें फ़िल्माए गए, जिन्हे लता जी ने गाए। एक तो है आज का प्रस्तुत गीत, इसके अलावा इस फ़िल्म के प्रचलित गानें हैं राग मंज खमाज पर आधारित "जाने कैसे सपनों में खो गई अखियाँ, मैं तो हूँ जागी मोरी सो गईं अखियाँ" और "हाए कैसे दिन बीते कैसे बीती रतिया, पिया जाने ना", तथा भैरवी पर आधारित "साँवरे साँवरे, काहे मोसे करो जोराजोरी, बैयाँ ना मरोड़ो मोरी, दूँगी दूँगी गारी, हटो जी"। तो लीजिए सुनिए आज का गीत जो है राग जनसम्मोहिनी पर आधारित, और यह भी आपको बता दें कि इस राग पर नौशाद साहब ने भी एक गीत बनाया था फ़िल्म 'दिल दिया दर्द लिया' के लिए "कोई साग़र दिल को बहलाता नहीं"। 'दस राग दस रंग' शृंखला का पहला हिस्सा आज यहीं ख़त्म होता है, कुछ और रागों और उन पर आधारित गीतों को लेकर हम फिर से वापस आएँगे इसी महफ़िल में। ये दस गीत आपको कैसे लगे, ज़रूर बताइएगा, कल फिर मुलाक़ात होगी इस महफ़िल में, नमस्ते!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. हिंदुस्तान के सबसे चर्चित शहरों में से एक के रहन सहन पर है ये गीत.
२. इस युगल गीत को निभाते परदे पर नज़र आये कुमकुम और.....
३. गीतकार हैं मजरूह सुल्तानपुरी.

पिछली पहेली का परिणाम -

पराग जी आप भी ४० के आंकडे पर आ पहुंचे हैं, बढे चलिए...दिलीप जी यानी कि आप जल्दी ही आवाज़ पर लौटेंगें अपने आलेख के साथ...इंतज़ार रहेगा....भूल मत जाईयेगा :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, February 21, 2009

अरे दिल है तेरे पंजे में तो क्या हुआ....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 02

ओल्ड इस गोल्ड आवाज़ का एक ऐसा स्तम्भ है जिसमें हम आपको फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर से चुनकर एक लोकप्रिय गीत सुनवाते हैं और साथ ही साथ उस गीत की चर्चा भी करते हैं उपलब्ध तथ्यों के आधार पर. आज हमने इस स्तम्भ के लिए जिस गीत को चुना है उस गीत को सुनकर न केवल आप मुस्कुरायेंगें बल्कि आपके कदम थिरकने भी लगेंगे. १९५८ में एक फ़िल्म आई थी-"दिल्ली का ठग" और इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में थे किशोर कुमार और नूतन. इस फ़िल्म में किशोर कुमार और आशा भोंसले का गाया एक ऐसा गीत है जो अपने आप में एक ही है, और ऐसा गीत फ़िर उसके बाद कभी नही बन पाया. जब किशोर दा के सामने हास्य गीत गाने की बारी आती है, तो जैसे उनका अंदाज़ ही बदल जाता है. संगीतकार चाहे जैसी भी धुन बनाये, किशोर दा उस पर अपने अंदाज़ की ऐसी छाप छोड़ देते हैं की वो गीत सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्ही का बन कर रह जाता है. ऐसा ही है ये गीत भी जिसे आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं.

फ़िल्म की सिचुअशन ये है कि नूतन, किशोर कुमार को अंग्रेजी की "वोक्युबलरी" सिखा रही हैं. इस सिचुअशन पर जब गीत बनाने का सोचा गया तब तब गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी, संगीतकार रवि और गायक किशोर कुमार और आशा भोंसले ने एक ऐसा "मास्टर पीस" तैयार कर सबके सामने पेश कर दिया कि सब खुशी से झूम उठे और हँसी के मारे लोट पोट भी हो गए. आशा ने भी देखिये किस खूबी से यहाँ किशोर को टक्कर दी है गायकी में. इस तरह के गीत निभाने आसान नही होते ये याद रखियेगा. "सी ऐ टी कैट कैट माने बिल्ली..." को उस साल अमीन सायानी के हिट रेडियो कार्यक्रम बिनाका गीत माला के वार्षिक कार्यक्रम में दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था. आज भी ये गीत किशोर कुमार के सदाबहार हास्य गीतों की तालिका में एक बेहद सम्मान जनक स्थान हासिल करता है. तो सुनिए किशोर कुमार के साथ आशा भोंसले की आवाज़, फ़िल्म "दिल्ली का ठग" का ये गुदगुदाने वाला गाना.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. कमर जलालाबादी, कल्यानजी आनंद जी और मुकेश की शानदार जुगलबंदी.
२. मनमोहन देसाई की पहली निर्देशित फ़िल्म, नायक थे राजकपूर.
३. गीत के मुखड़े में शब्द है -"सुभान अल्लाह"

कुछ याद आया...?

कल की पहेली का सही जवाब दिया मीत जी ने, मनु जी ने और दिलीप जी ने. आप सब को बधाई.

प्रस्तुति - सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सदर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, February 15, 2009

बिल्लू को कहना नही कोई हज्ज़ाम...

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (11)
नामांकन में आना भी एक उपलब्धि है - पंडित रवि शंकर
ग्रैमी पुरस्कार विजेता उस्ताद जाकिर हुसैन को बधाई देने वालों में तीन बार ग्रैमी हुए पंडित रवि शंकर भी हैं. एक ताज़ा इंटरव्यू में पंडित जी ने कहा-"विश्व मोहन भट्ट को जब ग्रैमी मिला तब इस बाबत मीडिया में जग्रता आयी. मेरे पहले दो सम्मानों के बारे में तो मुझे भी ख़बर नही लगी देशवासियों की बात तो दूर है. कई बार जूरी के सदस्यों के वोट न मिल पाने के कारण कोई अच्छा संगीतकार विजयी होने से रह जाता है पर इससे उसके संगीत की महत्ता कम नही होती, मेरा मानना है कि नामांकन में आना भी एक बड़े सम्मान की बात है. मुझे दुःख है कि लक्ष्मी शंकर ग्रैमी नही जीत पायी, वे बेहद प्रतिभाशाली हैं.पर खुशी इस बात की है कि जाकिर ने इसे जीता." गौरतलब है कि मोहन वीणा वादक पंडित विश्व मोहन भट्ट भी पंडित रवि शंकर जी के ही शिष्य हैं. भारत रत्न पंडित रवि शंकर ऐ आर रहमान को भी बधाई देना नही भूले-"मैं हिन्दी फ़िल्म संगीतकारों का सालों से प्रशंसक रहा हूँ, सी रामचंद्र, सलिल चौधरी, एस डी और आर डी बर्मन, इल्ल्याराजा और अब ऐ आर रहमान जो निरंतर इतनी सुंदर धुनों से संगीत को संवार रहे हैं. फिल्मों के लिए उनका पार्श्व संगीत भी सराहनीय रहा है. विदेशों में भी अब उन्हें ख्याति प्राप्त करते देख खुशी हो रही है." दुनिया भर से ढेरों सम्मान पाने वाले पंडित रवि शंकर के लिया सबसे बड़ा सम्मान क्या है ? -"जो कुछ भी मिला है उसके लिए मैं ईश्वर, अपने गुरु और अपने प्रशंसकों को धन्येवाद देना चाहता हूँ, पर जब मैं परफोर्म करता हूँ और अपने संगीत में डूबे हुए किसी श्रोता का गर दिल भर आए और उसकी आँख से आंसू का एक कतरा गिरे, तो वो मेरे लिए सर्वोत्तम पुरस्कार है..". आपको नमन है ऐ संगीत शिरोमणि.



मैं एक खिलाड़ी जैसा महसूस कर रहा हूँ - ऐ आर रहमान

बाफ्टा की फ़तेह के बाद अब रहमान चले हैं एक और गढ़ जीतने न्यू यार्क शहर को. मनीष के ख़ास निर्मित बंद गले के सूट पहने रहमान इस समय ख़ुद को एक खिलाड़ी सा महसूस कर रहे हैं जिस पर सारे देश की नज़र है और जिससे ओलंपिक गोल्ड की पूरी पूरी उम्मीद की जा रही है -"ओलंपिक के लिए निकलते किसी खिलाड़ी से जिसपर पूरे देश को स्वर्ण लेकर आने की उम्मीद रहती है, मैं ख़ुद को इस वक्त उस खिलाड़ी सा महसूस कर रहा हूँ, पता नही मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतरूंगा या नही, खुदा ने मुझे पहले ही मेरी काबिलियत से अधिक दिया है, इसलिए मैं कभी भी ज्यादा की महत्वकांक्षा नही कर पाता, ये मेरा स्वाभाविक गुण है...".


भारतीय संगीत एल्बम के लिए ग्रैमी जीतना चाहता हूँ - उस्ताद जाकिर हुसैन

"जब कोई दूसरा देश आपकी कला को सम्मान देता है, सबकी निगाहें आपकी तरफ़ उठ जाती है, पर जब आपका गुरु आपको शाबाशी दे कोई गौर नही करता. पर मेरे लिए दूसरी बात अधिक मायने रखती है", ग्रैमी जीतने वाले उस्ताद जाकिर हुसैन ने एक ताज़ा इंटरव्यू में ये बात कही -"मेरे गुरु और पिता मरहूम उस्ताद अल्लाह रखा खान ने मात्र दो बार मुझसे ये कहा कि मैंने अच्छा बजाया. दो बार उनके इन शब्दों से मिला सम्मान मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है. मैं कभी एक पूरी तरह से भारतीय शास्त्रीय संगीत के किसी एल्बम के लिए ग्रैमी जीतना चाहता हूँ, जैसा कि पंडित रवि शंकर जी ने कर दिखाया था. विदेशी संगीतकारों के साथ गठबंधन ग्रैमी तक पहुँचने का आसान रास्ता बना देता है...".


बिल्लू को कहना नही कोई हज्ज़ाम

एक और बड़ी फ़िल्म और एक और नया विवाद, अब तो जैसे ये एक परम्परा ही हो गई है...खैर हम विवादों की तरफ़ न जाकर सुनते हैं सप्ताह का सॉलिड गीत फ़िल्म "बिल्लू" से. ठेठ देसी अंदाज़ के इस गीत में गुलज़ार साहब ने कमाल के शब्द चुने हैं. "लोशन खुसबुदार" और "उस्तरे की धार" जैसे शब्दों ने गीत को खासा नया पन दे दिया है. प्रीतम ने भी बहुत बढ़िया धुन और संयोजन किया है. आवाजें हैं रघुबीर यादव, अजय जिन्गरान और कल्पना की...हाँ ...और गाने का अन्तिम हिस्सा सबसे शानदार है....सुनिए और आनन्द लीजिये.





Tuesday, February 10, 2009

रहमान के बाद अब बाज़ी मारी उस्ताद जाकिर हुसैन ने भी...


भारतीय संगीत की थाप विश्व पटल पर सुनाई दे रही है, लॉस एन्जेलेंस और लन्दन में भारत के दो संगीत महारथियों ने अपने अन्य प्रतियोगियों पर विजय पाते हुए शीर्ष पुरस्कारों पर कब्जा जमाया. जहाँ चार अन्य प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए रहमान ने एक बार फ़िर "स्लम डोग मिलिनिअर" के लिए बाफ्टा (ब्रिटिश एकेडमी ऑफ़ फ़िल्म एंड टेलिविज़न आर्ट) जीता तो वहीँ तबला उस्ताद जाकिर हुसैन ने दूसरी बार ग्रैमी पुरस्कार जिसे संगीत का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है, पर अपनी विजयी मोहर लगायी.जाकिर ने अपनी एल्बम "ग्लोबल ड्रम प्रोजेक्ट" के लिए कंटेम्पररी वर्ल्ड म्यूजिक अल्बम श्रेणी में ये पुरस्कार जीता. गोल्डन ड्रम प्रोजेक्ट में हुसैन ने रॉक बैंड "ग्रेटफुल डेड" के मिकी हार्ट के साथ जुगलबंदी की है और उनका साथ दिया नईजीरियन पर्काशानिस्ट सिकिरू एडेपोजू और जैज़ पर्काशानिस्ट प्युरेटो रिकोन ने. ये इस समूह का और ख़ुद हुसैन का दूसरा ग्रैमी है. पहली बार भी १९९१ में उन्होंने मिकी हार्ट ही के साथ टीम अप कर "प्लेनट ड्रम" नाम का एल्बम किया था जिसे १९९२ में ग्रैमी सम्मान हासिल हुआ था.

दूसरी तरफ़ लन्दन में हुए बाफ्टा समारोह में भी गोल्डन ग्लोब की तर्ज पर एक बार फ़िर स्लम डोग पूरी तरह से छाई रही. फ़िल्म को कुल ७ बाफ्टा अवार्ड मिले जिसमें रहमान के आलावा एक भारतीय और भी है. जी हाँ, केरल निवासी और फ़िल्म के साउंड निर्देशक रसूल पुकुट्टी ने भी अपने फन से भारतीय संगीत प्रेमियों का सर गर्व से ऊंचा किया. पहली बार बाफ्टा में भारतीय नाम आए हैं, पुरस्कार पाने वालों में. हालाँकि बाफ्टा ने फिल्मों में उनके योगदान के लिए निर्देशक यश चोपडा का सम्मान किया था सन २००६ में. इसके आलावा संजय लीला बंसाली की "देवदास" को विदेशी फिल्मों की श्रेणी में नामांकन मिला था २००२ में, पर स्पेनिश फ़िल्म "टॉल्क टू हर" ने बाज़ी मार ली थी.

बाफ्टा ने बेशक भारतीय कलाकारों को देर में पहचाना पर ग्रैमी पुरस्कारों में भारतीय पहले भी अपना जलवा दिखा चुके हैं. उस्ताद जाकिर हुसैन के आलावा पंडित रवि शंकर और मोहन वीणा वादक विश्व मोहन भट्ट की कला को भी ग्रैमी ने सम्मानित किया है बारम्बार. पंडित रवि शंकर ने तो ३ बार ये सम्मान जीता है. दरअसल पंडित जी पहले ग्रैमी सम्मान पाने वाले भारतीय कलाकार बने थे जब १९६७ में मशहूर वोइलानिस्ट येहुदी मेनुहिन के साथ वेस्ट मीट ईस्ट कंसर्ट के लिए उन्हें बेस्ट चेंबर म्यूजिक पर्फोर्मांस श्रेणी में पुरस्कृत किया गया था.

खुशी की बात ये भी है की इस बार ग्रैमी की दौड़ में और भी ४ श्रेणियों में ३ अन्य भारतीय भी शामिल रहे. लुईस बैंक को जैज़ एल्बम श्रेणी में दो नामांकन मिले (एल्बम माइल्स फ्रॉम इंडिया, और फ्लोटिंग पॉइंट), कोलकत्ता के संगीतकार को उनकी एल्बम "कोलकत्ता क्रोनिकल" के लिए तो मशहूर शास्त्रीय गायक लक्ष्मी शंकर को "डांसिंग इन दा लाइट" के लिए नामांकन मिला. गोल्डन ग्लोब, बाफ्टा और ग्रैमी के बाद अब सबकी नज़रें २२ तारीख को होने वाले ऑस्कर पर टिकी हैं. उम्मीद है यहाँ भी तिरंगा लहराएगा पूरे आन बान और शान के साथ. अभी के लिए तो उस्ताद जाकिर हुसैन, रहमान, और रसूल पुकुट्टी को हम सब की ढेरो बधाईयाँ. आईये सुनते हैं उस्ताद का तबला वादन १९९९ में आई उनकी जैज़ फुयूज़न एल्बम "दा बिलीवर" से ये ट्रैक "फईन्डिंग दा वे...". साथ में हैं जॉन मेक्लिंग, यू श्रीनिवास, और वी सेल्वागणेश.



धीमे कनेक्शन वाले यहाँ से सुनें-






Thursday, January 15, 2009

जब मुझे विचित्र वीणा वादन हेतु मिला आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी का आशीर्वाद

(पहले अंक से आगे...)

शाम के यही कोई आठ बजे का समय था, बनारस में गंगा मैया झूम झूम कर बह रही थी और कई युवा संगीत कलाकारों को शब्द, स्वर और लय की सरिता में खो जाने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी, नगर के एक सभागार में 'आकाशवाणी संगीत प्रतियोगिता' के विजेताओ का संगीत प्रदर्शन हो रहा था, मैं मंच पर विचित्र वीणा लेकर बैठी, श्रोताओं की पहली पंक्ति में ही श्रद्धेय स्वर्गीय किशन महाराज जी को देखा और दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्कार किया, तत्पश्चात वीणा वादन शुरू किया, जैसे ही वादन समाप्त समाप्त हुआ, आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी मंच पर आए, अपना हाथ मेरे सर पर रखा और कहा "अच्छा बजा रही हो, खूब बजाओ "। उनका यह आशीर्वाद और फ़िर उनके हाथ से स्वर्ण पदक पाकर मेरी संगीत साधना सफल हो गई, जीवन का वह क्षण मेरे लिए अविस्मर्णीय हैं ।

कई बार कई संगीत समारोह में उनका तबला सुनने का अवसर भी मुझे प्राप्त हुआ, उनका तबला चतुर्मिखी था, तबले की सारी बातें उसमे शामिल थी, लव और स्याही का वे सूझबूझ से प्रयोग करते थे, उनके उठान, कायदे रेलों और परनो की विशिष्ट पहचान थी । उन्होंने तबले में गणित के महत्व को समझाया, वे किसी भी मात्रा से तिहाई शुरू कर सम पर खत्म् करते थे, जो की अत्यन्त ही कठिन हैं । प्रचलित तालो के अतिरिक्त वे अष्ट मंगल, जैत जय, पंचम सवारी, लक्ष्मी और गणेश तालों का वादन भी बहुत सुगमता और सुंदरता से करते थे. तबले के कई घरानों की रचनाओ का उनके पास समृद्ध भण्डार था ।

आदरणीय पंडित रवि शंकर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब, पंडित भीमसेन जोशी जी के साथ ही, आदरणीय शम्भू महाराज, सितारा देवी आदि के साथ उन्होंने संगत की । देश विदेश की कई संगीत सभाओ में तबला वादन की प्रस्तुति देकर तबले का प्रेम श्रोताओ के ह्रदय में अचल स्थापित किया ।

लय भास्कर, संगती सम्राट, काशी स्वर गंगा सम्मान, संगीत नाटक अकादमी सम्मान, ताल चिंतामणि, लय चक्रवती, उस्ताद हाफिज़ अली खान व अन्य कई सम्मानों के साथ पद्मश्री व पद्मभूषण अलंकरण से उन्हें नवाजा गया ।

वे ३ सितम्बर १९२३ की आधी रात को ही इस धरती पर आए थे और चार मई २००८ की आधी रात को ही वे इस धरती को छोड़, स्वर्ग की सभा में देवों के साथ संगत करने हमेशा के लिए चले गए। उनके जाने से हमने एक युगजयी संगीत दिग्गज को खो दिया, पर उनका आशीर्वाद हम सभी के साथ हमेशा हैं, इस बात से थोड़ा धैर्य मिलता हैं । आदरणीय स्वर्गीय किशन महाराज जी को मेरी भावपूर्ण श्रद्धांजलि -

देखिये उस्ताद विलायत खान के साथ राग दरबारी में संगत करते पंडित किशन महाराज जी को -



कविता छिब्बर द्वारा प्रस्तुत पंडित जी को दी गई ये श्रद्धाजंली भी तीन खंडों में है...देखें यहाँ, यहाँ और यहाँ.

प्रस्तुति - वीणा साधिका,
राधिका
(राधिका बुधकर)

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