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Monday, May 25, 2009

हरियाला सावन ढोल बजाता आया....मानसून की आहट पर कान धरे है ये मधुर समूहगान

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 91

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए आज हम एक बड़ा ही अनोखा समूहगान लेकर आये हैं। सन् १९५३ में बिमल राय की एक मशहूर फ़िल्म आयी थी 'दो बीघा ज़मीन'। बिमल राय ने अपना कैरियर कलकत्ते के 'न्यू थियटर्स' में शुरु किया था और उसके बाद मुंबई आकर 'बौम्बे टाकीज़' से जुड़ गये जहाँ पर उन्होने कुछ फ़िल्में निर्देशित की जैसे कि १९५२ में बनी फ़िल्म 'माँ'। उस वक़्त 'बौम्बे टाकीज़' बंद होने के कगार पर थी। इसलिए बिमलदा ने अपनी 'प्रोडक्शन' कंपनी की स्थापना की और अपने कलकत्ते के तीन दोस्त, सलिल चौधरी, नवेन्दु घोष और असित सेन के साथ मिलकर सलिल चौधरी की बंगला उपन्यास 'रिक्शावाला' को आधार बनाकर 'दो बीघा ज़मीन' बनाने की ठानी। सलिलदा की बेटी अंतरा चौधरी ने एक बार बताया था इस फ़िल्म के बारे में, सुनिए उन्ही के शब्दों में - "१९५२ में ऋत्विक घटक बिमलदा को 'रिक्शावाला' दिखाने ले गये। बिमलदा इस फ़िल्म से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने मेरे पिताजी को अपनी कंपनी के साथ जुड़ने का न्योता दे बैठे, और इस तरह से बुनियाद पड़ी 'दो बीघा ज़मीन' की। ये दोनो एक दूसरे का बहुत सम्मान करते थे। मुझे अभी भी याद है कि जब बिमलदा बहुत सुबह सुबह हमारे घर आया करते थे और मेरे पिताजी के बिस्तर के पास कुर्सी में बैठकर अख़बार पढ़ते रहते और पिताजी के उठने का इंतज़ार करते। मेरी माँ उन्हे जगाना भी चाहे तो बिमलदा मना कर देते थे।" यह तो थी 'दो बीघा ज़मीन' और 'रिक्शावाला' की बात, लेकिन ऐसा भी कहा गया है कि 'दो बीघा ज़मीन' ख़्वाजा अहमद अब्बास की कहानी पर बनी फ़िल्म 'धरती के लाल' से भी प्रेरित था। यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि अब्बास साहब और सलिलदा, दोनो ही 'इपटा' के सदस्य थे। बलराज साहनी, निरुपा राय और रतन कुमार अभिनीत 'दो बीघा ज़मीन' हिंदी फ़िल्म इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म रही है।

सलिल चौधरी के संगीत की एक ख़ास बात यह रही है कि उनके बहुत सारे गीतों में जन-जागरण के सुर झलकते हैं। संगीत उनके लिए एक हथियार की तरह था जिससे वो समाज में क्रांति की लहर पैदा करना चाहते थे। सलिलदा के व्यक्तित्व को जानने के लिए उनके बनाये इस तरह के जोशीले गीतों को सुनना बेहद ज़रूरी हो जाता है। दृढ़ राजनैतिक विचारों और सामाजिक कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने की वजह से उनका संगीत उस ज़माने के दूसरे संगीतकारों से बिल्कुल अलग हुआ करता था। फ़िल्म 'दो बीघा ज़मीन' मे भी उन्होने इस तरह के कम से कम दो गीत हमें दिये हैं। एक तो है "धरती कहे पुकार के मौसम बीता जाये" और दूसरा गीत है "हरियाला सावन ढोल बजाता आया", और यही दूसरा गीत आज सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। गीतकार शैलेन्द्र भी 'इपटा' के सक्रीय सदस्य थे। सलिलदा के समाज में क्रांति पैदा करने वाले संगीत को अपने जोशीले असरदार बोलों से इस फ़िल्म में समृद्ध किया शैलेन्द्र ने। मन्ना डे, लता मंगेशकर, और साथियों की आवाज़ों में किसान परिवारों के उत्साह भरे इस गीत को सुनिए और गरमी के इस मौसम में सावन को जल्द से जल्द आने का न्योता दीजिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. राज कुमार और माला सिन्हा अभिनीत इस फिल्म में संगीत है सी रामचंद्र का.
२. परवेज़ शम्सी ने लिखा है ये मधुर युगल गीत.
३. मुखड़े में शब्द है - "कहानी".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत दिनों बाद दिलीप जी के सर बंधा है विजेता का ताज. बधाई हो दिलीप जी और पराग जी आपको भी बधाई सही गीत पहचाना

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Sunday, April 26, 2009

चंदा मामा मेरे द्वार आना...बच्चों के साथ बच्ची बनी आशा की आवाज़ में ये स्नेह निमंत्रण

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 62

साधारणत: हिन्दी फ़िल्मों के विषय नायक और नायिका को केन्द्र में रख कर ही चुने जाते हैं। लेकिन नायक-नायिका की प्रेम-कहानी के बिना भी सफ़ल फ़िल्में बनाई जा सकती है ये हमारे फ़िल्मकारों ने समय समय पर साबित किया है। ऐसी ही एक फ़िल्म है 'लाजवंती' जिसमें एक माँ और उसकी छोटी सी बच्ची के रिश्ते को बड़ी संवेदनशीलता से दर्शाया गया है। दोस्तों, मैने यह फ़िल्म बहुत साल पहले दूरदर्शन पर देखी था और जितना मुझे याद आ रहा है, इस फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की है कि ग़लतफ़हमी का शिकार पति (बलराज साहनी) अपनी पत्नी (नरगिस) को घर से निकाल देता है और इस तरह से माँ अपनी बेटी (बेबी नाज़) से भी अलग हो जाती है। थोड़े दिनो के बाद पति-पत्नी की ग़लतफ़हमी दूर हो जाती है और वो घर भी वापस आ जाती है लेकिन बेटी के दिल में तब तक अपनी माँ के लिए इतना ज़हर भर चुका होता है कि यही फ़िल्म का मुख्य मुद्दा बन जाता है। अंततः जब बेटी को सच्चाई का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि तब तक नरगिस आत्महत्या के लिए निकल पड़ती है। नरगिस खाई में छलांग लगाने ही वाली है कि पीछे से उसकी बेटी उसे "माँ" कहकर पुकारती है और इस तरह से माँ-बेटी के पुनर्मिलन के साथ फ़िल्म का सुखांत होता है।

१९५८ की फ़िल्म 'लाजवंती' में सचिन देव बर्मन का संगीत था और इस फ़िल्म के ज़्यादातर गीतों को आशा भोंसले ने गाया था । "कोई आया धड़कन कहती है", "कुछ दिन पहले एक ताल में कमलकुंज के अंदर रहता था एक हंस का जोड़ा" और "गा मेरे मन गा, यूहीं बिताये जा दिन ज़िन्दगी के" जैसे गीत बेहद मशहूर हैं। सन १९५७ में लता मंगेशकर और सचिन देव बर्मन के बीच कुछ ग़लतफ़हमी हो गई थी जिसकी वजह से दोनों ने एक दूसरे के साथ काम करना बंद कर दिया था। इस ग़लतफ़हमी की पूरी कहानी हम किसी और दिन आपको तफ़सील से बताएँगे। तो इस ग़लतफ़हमी की वजह से दादा बर्मन लताजी के बजाये आशाजी से गाने गवा रहे थे। 'लाजवंती' इसी दौरान बनी फ़िल्म थी और शायद यही वजह रही होगी कि दादा ने इस फ़िल्म का एक भी गाना लताजी से नहीं गवाया। आज इस फ़िल्म से हम आपको सुनवा रहे हैं आशा भोंसले और साथियों का गाया एक बच्चोंवाला गाना और गाने के बोल हैं "चंदामामा मेरे द्वार आना"। यह लीजिये, यह तो तुकबंदी भी हो गई। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस गीत में परदे पर बेबी नाज़ और दूसरे बच्चों को स्कूल के किसी जलसे में स्टेज पर गाते और नृत्य करते हुए दिखाया गया है। तो सुनिये यह गीत और याद कीजिये अपने स्कूल के दिनो को और अपने स्कूल के वार्षिक जलसों को...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. साहिर के बोल और रोशन का संगीत.
२. लता की जादूई आवाज़.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द से - "दुनिया"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
जहाँ पिछली बार ढेरों विजेता थे इस बार एक भी नहीं...गीत मुश्किल था, इस कारण सभी को माफ़ी दी जाती है....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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