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शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

लव की घंटी बजा रहे हैं ललित कुछ 'बेशरम' होकर

90 के दशक की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में इस जोड़ी का संगीत था, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे , कुछ कुछ होता है, जो जीता वही सिकंदर  जैसी फिल्मों के नाम जुबाँ पे आते ही याद आते हैं जतिन ललित. फना  के बाद दोनों भाईयों ने अलग अलग काम करने का फैसला लिया, और अब एक लंबे अरसे बाद ललित लौटे हैं रणबीर कपूर अभिनीत बेशरम  के साथ. देखें क्या ललित अकेले दम पर वही पुराना सुरीला जादू फिर से पैदा कर पाए हैं या नहीं.   

जैसा कि हम बता चुके हैं कि ललित फिल्म के प्रमुख संगीतकार हैं पर यहाँ एक अतिथि संगीतकार के रूप में इश्क बेक्टर भी मौजूद हैं और इन्हीं का है शीर्षक गीत बेशरम . धुन कैची है, शब्द बेतरतीब हैं, ८० के दशक जैसा टेम्पो है गीत का, और फिल्म के शीर्षक गीत के रूप में एकदम सटीक है.

रणबीर पर फिल्माए ताजा हिट गीत दिल्ली वाली गर्ल फ्रेंड  की तर्ज पर ही लगता है हम लुट गए रे पिया आके तेरे मोहल्ले  गीत भी. तेज रिदम पर ममता शर्म और एश्वर्या निगम की दिलफेंक गायकी गीत को एक चार्टबस्टर बनाने में पूरी तरह समर्थ है.

किशोर कुमार के चुलबले गीतों का अंदाज़ झलकता है लव की घंटी   गीत में. सुजीत शेट्टी के साथ खुद रणबीर की भी आवाज़ है गीत में. राजीव बरनवाल ने शब्द भी अच्छे गढे है यहाँ. सुजीत की गायिकी में संभावनाएं नज़र आती है. इस तरह के खिलंदड गीतों को निभाना आसान नहीं है, हालांकि धुन चुराई हुई है और खुद ललित भी इसे स्वीकार कर चुके हैं, तो हम ललित को इस गीत के लिए बधाई देना जरूरी नहीं समझते.

ललित अपने स्वाभाविक फॉर्म में नज़र आते हैं अगले गीत दिल का जो हाल है  , गीत रोमांटिक तो है पर चुलबुला भी. पर अभिजीत और श्रेया की आवाज़ में वो जरूरी विरोधाभास नज़र नहीं आता. शब्द भी औसत हैं. बड़े नामों के बावजूद गीत सामान्य ही लगता है.

श्रेया पिछले गीत की कमी को सोनू के साथ पूरा करती नज़र आती है तू है  गीत में, बेहतर और अधिक सुरीला है ये गीत जहाँ धुन शब्द और गायिकी सभी एक दूसरे को जरूरी साथ देते हुए प्रतीत होते हैं, गीत में सोनू की आवाज़ बहुत देर बाद प्रवेश करती है, पर उन्हीं का गायन गीत को मुक्कमल करती है यहाँ.

श्रेया एक बार सुनाई देती है जोशीले मिका के साथ. मराठी लोक धुन पर आधारित गीत आ रे आ रे एक बार फिर औसत ही लगता है. हालाँकि गायकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है पर गीत में नयेपन का अभाव है.

तडके में कहीं कमी न रह जाए तो ललित ले आये मिका और सीनियर मेहदी के साथ. चल हैंड उठा के नचे  एक जोशीला डांस गीत है, जो सुनने से अधिक देखने में अधिक सुखद लगेगा. बेशरम का संगीत फिल्म के अनुरूप है, शायद लंबे समय तक दिल पर टिके रहने का दम ख़म न हों इनमें पर फिल्म को जरूरी ताम झाम देने में पूरी तरह समर्थ है. ललित यहाँ प्रीतम 'मोड' में हैं.

एल्बम के बहतरीन गीत - लव की घंटी, मोहल्ले, बेशरम 
हमारी रेटिंग - ३.७ 

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

"तेरे मस्त-मस्त दो नैन" गाता हुआ हुड़हुड़ाता आ पहुँचा है एक दबंग, जिसके लिए मुन्नी भी बदनाम हो गई..

ताज़ा सुर ताल ३१/२०१०

विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' के इस अंक में हम सभी का स्वागत करते हैं। सुजॊय जी, अब ऐसा लगने लगा है कि साल २०१० के हिट गीतों की फ़ेहरिस्त ने रफ़्तार पकड़ ली है; एक के बाद एक फ़िल्म आती जा रही है और हर फ़िल्म का कोई ना कोई गीत ज़रूर हिट हो रहा है।

सुजॊय - हिट गीतों की अगर बात करें तो कभी कभी कामयाब गीतों का फ़ॊरमुला फ़िल्मकारों और कुछ हद तक अभिनेता पर भी निर्भर करता है, ऐसा अक्सर देखा गया है। अब सलमान ख़ान को ही लीजिए, शायद ही उनका कोई फ़िल्म ऐसा होगा, जिसके गानें हिट ना हुए होंगे। वैसे तो उनकी फ़िल्में भी ख़ूब चलती हैं, लेकिन उनके फ़्लॊप फ़िल्मों के गानें भी कम से कम चल पड़ते हैं।

विश्व दीपक - ठीक कहा, इसी साल उनकी फ़िल्म 'वीर' बॉक्स ऑफ़िस पर नाकामयाब रही, लेकिन फ़िल्म के गाने चल पड़े थे, ख़ास कर "सलाम आया" गीत तो बहुत पसंद किया गया। पिछले कुछ सालों से सलमान ख़ान की फ़िल्मों में साजिद-वाजिद संगीत दे रहे हैं। 'तेरे नाम' की अपार कामयाबी के बावजूद सल्लु मिया ने हिमेश रेशम्मिया से साजिद वाजिद पर स्विच-ओवर कर लिया था। पिछले साल 'वाण्टेड' और इस साल जनवरी में प्रदर्शित 'वीर' के बाद अब सलमान और साजिद-वाजिद की तिकड़ी लेकर आए हैं फ़िल्म 'दबंग', और आज 'टी.एस.टी' में इसी फ़िल्म के गानें।

सुजॊय - 'दबंग' अभिनव कश्यप निर्देशित फ़िल्म है जिसमें सलमान ख़ान की नायिका बनी हैं नवोदित अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा। साथ मे हैं अरबाज़ ख़ान, सोनू सूद, विनोद खन्ना, डिम्पल कपाडिया, महेश मांजरेकर और ओम पुरी। यानी कि एक ज़बरदस्त स्टार-कास्ट है इस फ़िल्म में। साजिद वाजिद के धुनों पर गानें लिखे हैं जलीश शेरवानी ने। लेकिन एक गीत ललित पण्डित ने लिखा और स्वरबद्ध किया है। फ़ैज़ अनवर ने भी एक गीत लिखा है।

विश्व दीपक - कहते हैं सौ सुनार की एक लुहार की, तो यहाँ भी वही बात है, फ़ैज़ साहब ने जो एक गीत लिखा है, वही फ़िल्म के बाक़ी सभी गीतों पर भारी है। सुनते हैं राहत फ़तेह अली ख़ान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में वही गीत।

गीत - तेरे मस्त मस्त दो नैन


सुजॊय - वाह! अच्छा लगा। सूफ़ी क़व्वाली अंदाज़ का यह गीत राहत साहब के फ़िल्मी गायन करीयर का एक और यादगार गीत बनने जा रहा है। 'वीर' के "सुरीली अखियों वाली" के बाद, साजिद-वाजिद के लिए फिर एक बार उन्होंने अपने आप को सिद्ध किया है इस गीत में। साजिद वाजिद के कम्पोज़िशन्स की अच्छी बात यह लगती है कि वो भारतीय साज़ों की ध्वनियों का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं जिससे गीत ज़्यादा कर्णप्रिय बन जाता है।

विश्व दीपक - और रही बात इस गीत के बोलों की, तो फ़ैज़ अनवर, जो एक अनुभवी फ़िल्मी गीतकार रहे हैं और ९० के दशक में बहुत सारे हिट गीत दिए हैं, उन्होंने काव्यात्मक शैली अख़्तियार करते हुए इस गीत में लिखा है "माही वे आप सा, दिल ये बेताब सा, तड़पा जाए तड़पा तड़पा जाए, नैनों के झील में, उतरा था युंही दिल, डूबा जाए डूबा डूबा जाए..."। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि यह गीत हर लिहाज़ से सुपरहिट होने का स्तर रखता है। इस गीत के दो वर्ज़न हैं, हमने राहत साहब और श्रेया का युगल वर्ज़न सुना, राहत साहब का एकल वर्ज़न भी है। लगे हाथों उसे भी सुन लते हैं।

गीत - तेरे मस्त मस्त दो नैन (एकल)


सुजॊय - फ़िल्म का तीसरा गीत, या युं कहिए कि ऐल्बम का तीसरा गीत है "मुन्नी बदनाम" जिसे लिखा व स्वरबद्ध किया है जतिन ललित के ललित पण्डित ने। यह एक आइटम नंबर है जिसे ममता शर्मा और ऐश्वर्या ने गाया है। यह गीत मास के लिए है, क्लास के लिए नहीं। चलिए, इसे भी सुनते चलें....

गीत - मुन्नी बदनाम


विश्व दीपक - "मुन्नी बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए", आइटम नंबर होने के साथ इसमें कॊमिक एलीमेण्ट्स भी डाले गए हैं, जैसे कि "ले झंडु बाम हुई डारलिंग तेरे लिए", "शिल्पा सा फ़िगर, बेबो सी अदा" वगेरह। वैसे क्या आपको पता है कि यह गाना "उत्तर प्रदेश" के एक पुराने लोक-गीत "लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए" से प्रेरित है। इसी लोक-गीत का इस्तेमाल बप्पी-लाहिड़ी भी एक फिल्म "रॉक डांसर" में कर चुके हैं, जहाँ "लौंडा बदनाम हुआ लौंडिया तेरे लिए" के बोल पर "जावेद जाफ़री" थिड़कते हुए नज़र आए थे। मुझे यह जानकारी मिलिब्लॉग और आईटूएफ़एस के कार्तिक से हासिल हुई है।

सुजॊय - बड़ी हीं अनूठी जानकारी है। खैर, इस मास नंबर के बाद बेहतर यही होगा कि हम अगले गीत की तरफ़ बढ़ें। ऐल्बम का चौथा गीत है सोनू निगम और श्रेया घोषाल का गाया एक नर्मोनाज़ुक रोमांटिक डुएट "चोरी किया रे जिया"। आइए सुनते हैं।

गीत - चोरी किया रे जिया


विश्व दीपक - वैसे तो सोनू और श्रेया के गाए कई यादगार डुएट्स हैं, इस गीत में वैसे कोई नई बात नहीं है, लेकिन गीत का रीदम और संगीत संयोजन अपीलिंग है। गिटार की मेलोडियस स्ट्रिंग्स और उस पर कैची बीट्स सुनने वाले को गीत के साथ जोड़े रखते हैं। सोनू और श्रेया की आवाज़ों ने फिर एक बार साबित किया कि आज के दौर में ये ही दो अव्वल नंबर पर हैं। साजिद-वाजिद ने बहुत से ऐसे रोमांटिक डुएट्स हमें दिए हैं जब भी उन्हें मौका दिया गया है। इस गीत को लिखा है जलीश शेरवानी ने जिन्होंने फ़िल्म 'मुझसे शादी करोगी' में भी "लाल दुपट्टा", "रब करे तुझको भी प्यार हो जाए" जैसे सफल रोमांटिक गीत लिख चुके हैं।

सुजॊय - अब बढ़ते हैं अगले गीत की तरफ़ जो है फ़िल्म का शीर्षक गीत, "हुड़ हुड़ दबंग"। विश्व दीपक जी, आपको "दबंग" शब्द का अर्थ पता है?

विश्व दीपक - हाँ, "दबंग" यानी "निडर" या "निर्भय", जिसे अंग्रेज़ी में "fearless" कह सकते हैं। लेकिन कहीं भी दबंग शब्द का इस्तेमाल पोजिटीव सेन्स में नहीं होता। हम जिस किसी को भी दबंग के विशेषण से नवाज़ते हैं तो इसका मतलब ये होता है कि वह इंसान शक्तिशाली है और दूसरों को दबा कर रखता है। आज भी गाँवों में जमींदारों को इसलिए दबंग कहते हैं क्योंकि वे गरीब जनता का हक़ मारते हैं और जनता उनसे डरी हुई रहती है। "दबंग" और "दलित" एक दूसरे के पूरक हैं। वह जो लोगों को अपनी जूतों तल दबा कर रखे वह "दबंग" और वह जो "दबा" हुआ हो वह "दलित"। इसलिए "दबंग" का अर्थ "निडर" होते हुए भी यह एक निगेटिव वर्ड है। मेरे हिसाब से फिल्म में भी इसी नकारात्मक अर्थ को दर्शाया गया है।

सुजॊय - अच्छा! तो चलिए यह गीत सुन लेते हैं जिसे सुनते हुए मुझे यकीन है आप सब को फ़िल्म 'ओमकारा' का शीर्षक गीत ज़रूर याद आ जाएगा। वैसे इस गीत में भी आवाज़ सुखविंदर सिंह की ही है जिन्होंने 'ओमकारा' का वह गीत गाया था; और इस गीत में सुखविंदर के साथ वाजिद ने भी आवाज़ मिलायी है। "हुड़ हुड़ दबंग" फ़िल्म में सलमान ख़ान के किरदार को वर्णित करता होगा, ऐसा प्रतीत होता है।

गीत - हुड़ हुड़ दबंग


विश्व दीपक - कुछ हेवी ड्रम्स और वायलिन्स का ज़बरदस्त इस्तेमाल हुआ है; लोक शैली में बनाया गया है गीत वाक़ई "ओमकारा" से मिलता जुलता है। लेकिन बोलों के लिहाज़ से "ओमकारा" इससे बहुत उपर ही रहेगा। ख़ैर, गीत बुरा नहीं है। और आइए अब फ़िल्म का अंतिम गीत सुन लिया जाए, यह एक क़व्वाली है वाजिद, मास्टर सलीम, शबाब साबरी और साथियों की आवाज़ों में। "हमका पीनी है" एक ग्रामीण लोक शैली वाला गीत है जो पूरी तरह से सिचुएशनल है। जलीश शेरवानी के बोल।

सुजॊय - फिर एक बार शायद मास नंबर है, ना कि क्लास। ढोलक का मुख्य रूप से इस्तेमाल है, लीजिए आप भी सुनिए।

गीत - हमका पीनी है


सुजॊय - इन छह गीतों को सुन कर यही कह सकता हूँ कि "तेरे मस्त मस्त दो नैन" ही ऐल्बम का सर्वोत्तम गीत है.. असल में दोनों वर्जन्स हीं कमाल के हैं। जैसा कि शुरु में आपने कहा था "सौ सुन्हार की, एक लुहार की", अब मैं भी सहमत हो गया हूँ आप से। सोनू-श्रेया का "चोरी किया रे जिया" भी कर्णप्रिय रहा। विश्व दीपक जी, आज हम 'दबंग' के साथ साथ 'वी आर फ़मिली' के भी कुछ गानें सुनवाने वाले थे। लेकिन 'वी आरे फ़मिली' के गीतों को जब मैंने सुना तो मुझे लगा कि इस फ़िल्म के सभी गीतों को सुनवाना चाहिए। इसलिए अगर संभव हुआ तो अगले हफ़्ते हम 'वी आर फ़ैमिली' के गानें लेकर हाज़िर होंगे। क्या ख़याल है?

विश्व दीपक - जी, आपने सही कहा। वास्तव में मैने अभी तक "वी आर फ़ैमिली" के गाने नहीं सुने, इसलिए प्रोमोज़ में गाने सुनकर मुझे लगा कि कुछ हीं गाने सुनने लायक हैं। और यही कारण है कि पिछले टीएसटी में मैंने यह कह दिया था कि दोनों फिल्मों के गाने साथ करेंगे। लेकिन चूँकि आपने गाने सुने हैं और आपको वे गाने पसंद आए हैं, तब दोनों एलबमों की समीक्षा साथ करने का कोई प्रश्न हीं नहीं उठता। तो अगली टीएसटी "वी आर फ़ैमिली" पर हीं सजेगी। अलग बात है कि उस वक़्त आपके साथ मैं नही सजीव जी रहेंगे, क्योंकि मैं दस दिनों के लिए नदारद होने वाला हूँ.. घर जा रहा हूँ "रक्षा बंधन" के लिए। २९ को लौटूँगा, उसके बाद मैं फिर से आपके साथ आ जाऊँगा। ठीक है? :) जहाँ तक "दबंग" का सवाल है, तो मेरे हिसाब से गाने "मास" के लिए इस कारण से हैं क्योंकि फिल्म हीं "मास" के लिए है। यह फिल्म "वांटेड" की तर्ज़ पर बनाई गई मालूम होती है। जिस तरह वांटेड के गाने क्रिटिक्स ने एलबम सुनने के बाद नकार दिए थे, लेकिन फिल्म रीलिज होने पर उन्हीं गानों ने धूम मचा दी थी। मेरे हिसाब से इस फिल्म के गाने भी फिल्म आने के बाद उसी तरह का कमाल करने वाले हैं। शायद सलमान खान ने "साज़िद-वाज़िद" को ऐसी हिदायत हीं दी हो कि भाई गाने ऐसे बनाओ कि लोग झूम उठे.. वे गाने कितने दिन चलेंगे, इसका ख्याल रखने की कोई जरूरत नहीं। नहीं तो साज़िद-वाज़िद सुमधुर गाने देने में भी उस्ताद हैं। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का समापन करते हैं। जाते-जाते स्वतंत्रता दिवस की बधाईयाँ भी लेते जाईये। जय हिन्द!

आवाज़ रेटिंग्स: दबंग: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९१- संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद इन दिनों किस रियल्टी शो में नज़र आ रहे हैं?

TST ट्रिविया # ९२- फ़ैज़ अनवर का एक बड़ा ही मशहूर गीत है जो आया था २००१ की एक फ़िल्म में। गीत के एक अंतरे की पंक्ति है "फूल सा खिल के महका है ये दिल, फिर तुझे छू के बहका है ये दिल"। गीत का मुखड़ा बताइए।

TST ट्रिविया # ९३- 'दबंग' और 'वी आर फ़मिली' के साउंडट्रैक में आप दो समनाताएँ बताएँ।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. तुलसी कुमार... एल्बम का नाम - "लव हो जाये"
२. रॉकफ़ोर्ड .. उस गाने को "के के" ने गाया था।
३. सलीम-सुलेमान

सीमा जी, आपने दो सवालों के सही जवाब दिए। तीसरे सवाल में शायद आप संगीतकार और प्रोगामर में कन्फ़्युज़ हो गईं। अगर जवाब "जतिन-ललित" होता तो हम पूँछते हीं क्यों? :) और वैसे भी टी०एस०टी० के किसी भी अंक में पूछा गया कोई भी सवाल उसी अंक से संबंधित होता है। तो फिर इस सवाल का जवाब तो "सलीम-सुलेमान" हीं होना था, क्योंकि सवाल में इस अंक के किसी और शख्स का तो नाम हीं नहीं आया था। आगे से ऐसे "हिंट्स" पर ध्यान रखिएगा। :)

सोमवार, 4 जनवरी 2010

दूल्हा मिल गया...शाहरुख़ के कधों पर ललित पंडित के गीतों की डोली...

ताज़ा सुर ताल ०१/ २०१०

सजीव - गुड्‍ मॊर्निंग् सुजॊय! और बताओ न्यू ईयर कैसा रहा? ख़ूब जम के मस्ती की होगी तुमने?

सुजॊय - गुड्‍ मॊर्निंग् सजीव! न्यू ईयर तो अच्छा रहा और इन दिनों कड़ाके की ठंड जो पड़ रही है उत्तर भारत में, तो मैं भी उसी की चपेट में हूँ, इसलिए घर में ही रहा और रेडियो व टेलीविज़न के तमाम कार्यक्रमों, जिनमें २००९ के फ़िल्मों और उनके संगीत की समीक्षात्मक तरीके से प्रस्तुतिकरण हुआ, उन्ही का मज़ा ले रहा था।

सजीव - ठीक कहा, पिछले कुछ दिनों में हमने २००९ की काफ़ी आलोचना, समालोचना कर ली, अब आओ कमर कस लें २०१० के फ़िल्म संगीत को सुनने और उनके बारे में चर्चा करने के लिए।

सुजॊय - मैं समझ रहा हूँ सजीव कि आपका इशारा किस तरफ़ है। 'ताज़ा सुर ताल', यानी कि TST की आज इस साल की पहली कड़ी है, और इस साल के शुरु से ही हम इस सीरीज़ में इस साल रिलीज़ होने वाले संगीत को रप्त करते जाएँगे।

सजीव - हाँ, और हमारी अपने पाठकों और श्रोताओं से यह ख़ास ग़ुज़ारिश है कि अब की बार आप इसमें सक्रीय भूमिका निभाएँ। केवल यह कहकर नए संगीत से मुंह ना मोड़ लें कि आपको नया संगीत पसंद नहीं। बल्कि एक विश्लेषणात्मक रवैया अपनाएँ और इस मंच पर हमें बताएँ कि कौन सा गीत आपको अच्छा लगा और कौन सा नहीं लगा, और क्यों। ठीक कहा ना मैंने सुजॊय?

सुजॊय - १०० फ़ीसदी सही कहा आपने! और भई सीमा जी को टक्कर देने वाले भी तो चाहिए, वरना वो बिना गोलकीपर के गोल पोस्ट पर एक के बाद एक गोल करती चली जाएँगी, हा हा हा!

सजीव - आज तुम्हारा मूड कुछ हल्का फुल्का सा लग रहा है सुजॊय!

सुजॊय - जी बिल्कुल! नए साल में अभी तक ज़िंदगी ने रफ़्तार नहीं पकड़ी है न, इसलिए बिल्कुल फ़्रेश हूँ। और हमारे फ़िल्म जगत में भी साल का पहला महीना कुछ हद तक ढीला ढाला सा ही रहता है।

सजीव - ठीक कहा। तो चलो तुम्हारे इसी मूड को बरक़रार रखते हुए आज हम सुनते हैं और चर्चा करते हैं फ़िल्म 'दुल्हा मिल गया' के संगीत का। वैसे भी साल की शुरुआत 'लाइटर नोट' पे ही होनी चाहिए। बातें बहुत सारी हो गई, चलो जल्दी से इस फ़िल्म का शीर्षक गीत पहले सुन लेते हैं, फिर उसके बाद इस फ़िल्म की चर्चा शुरु करेंगे।

गीत: दुल्हा मिल गया...dulha mil gaya (title)


सुजॊय - यह तो दलेर मेहन्दी की आवाज़ थी ना?

सजीव - हाँ, कई दिनों के बाद किसी फ़िल्म में उनका गाया हुआ गाना आया है, और वो भी शाहरुख़ ख़ान पर फ़िल्माया गया है। शाहरुख़ ने इस फ़िल्म में अतिथि कलाकार के रूप में इस गीत में नज़र आएँगे। वैसे शाहरुख़ ने कई फ़िल्मों में इस तरह से एक गीत में नज़र आए हैं। कोई ऐसा गीत याद आता है तुम्हे?

सुजॊय - क्यों नहीं, फ़िल्म 'काल' के शीर्षक गीत "काल धमाल" में नज़र आए थे। अच्छा 'दुल्हा मिल गया' के इस गीत के अगर बात करें तो मेरा ख़याल है कि यह एक पेप्पी और कैची नंबर है जो शुरु से लेकर अंत तक अपने जोश और उत्साह को बनाए रखती है। पंजाबी रंग का गाना और उस पर दलेर साहब की गायकी, इसका असर तो होना ही था। और शाहरुख़ जो भी काम करते हैं उसमें पूरी जान लगा देते हैं।

सजीव - फ़िल्म 'दुल्हा मिल गया' में कुल १२ गानें हैं।

सुजॊय - १२ गानें? 'व्हाट्स योर राशी' में १३ गानें थे, क्या कोई होड़ सी चल पड़ी है? मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि ९० के दशक के उस टी-सीरीज़ का दौर वापस आने वाला है। याद है ना आपको कि जब हर फ़िल्म में ८-१० गानें होते थे, जिनमें गायिका होती थीं अनुराधा पौडवाल और अलग अलग गीतों में अलग अलग गायकों की आवाज़ें होती थीं?

सजीव - बिल्कुल याद है। लेकिन इस ऐल्बम की अच्छी बात यह है कि भले ही १२ गानें हैं लेकिन हर गाना अलग अलग क़िस्म का है। अब जो गाना हम सुनेंगे उसे गाया है अदनान सामी और अनुश्का मनचंदा ने। यह है "अकेला दिल", आजकल जो ट्रेंड चली है अंग्रेज़ी के बोलों को सुपरिम्पोज़ करने की, इस गीत में यह काम सौंपा गया है अनुश्का को। यह भी एक थिरकता गाना है, पहले गाने के मुक़ाबले थोड़ा स्लो। गाना ठीक ठाक है, बहुत कोई ख़ास बात भी नहीं है, चलो आगे इस गीत के बारे में राय श्रोताओं पर ही छोड़ते हैं।

सुजॊय - यह गाना कुछ कुछ वेस्ट इंडीज़ के कैरिबीयन के कैलीप्सो संगीत से प्रभावित लगता है, जिस तरह से अदनान सामी का ही एक मशहूर गाना था फ़िल्म 'ऐतराज़' में, "गेला गेला गेला दिल गेला गेला"। सुनिए यह गीत और दोनों गीतों के बीच समानता को महसूस कीजिए।

गीत: अकेला दिल..akela dil (dulha mil gaya)


सुजॊय - अब इस फ़िल्म से जुड़े लोगों की ज़रा बातें हो जाए? 'दुल्हा मिल गया' के प्रोड्युसर हैं विवेक वास्वानी। फ़िल्म का निर्देशन किया है मुदस्सर अज़ीज़ ने और ख़ास बात, उन्होने ही फ़िल्म के गानें भी लिखे हैं। यह उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म है। वैसे वो चर्चा में रहे हैं सुश्मिता सेन के बॊय फ़्रेंड होने की वजह से।

सजीव - मुदस्सर अज़ीज़ के ज़िक्र से मुझे फ़िल्मकार किदार शर्मा की याद आ गई। वो भी फ़िल्म निर्माण व निर्देशन के साथ साथ गीतकारी भी करते थे न?

सुजॊय - बिल्कुल ठीक। गुलज़ार साहब और कमाल अमरोही साहब भी इसी संदर्भ में याद किए जा सकते हैं। अच्छा, तो मैं 'दुल्हा मिल गया' के कास्ट से परिचय करवा रहा था। फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाए हैं फ़रदीन ख़ान और सुश्मिता सेन ने, तथा शाहरुख़ ख़ान का ज़िक्र तो हम कर ही चुके हैं। फ़िल्म में संगीत है ललित पंडित का। वही ललित पंडित जो कभी जतीन-ललित की जोड़ी के रूप में एक से एक सुपरहिट गानें दिया करते थे। 'फ़ना' इस जोड़ी की अंतिम फ़िल्म थी।

सजीव - और एक बात सुजॊय कि जतीन-ललित ने शाहरुख़ ख़ान के कितने सारे फ़िल्मों में सुपर डुपर हिट गानें दिए, जैसे कि 'येस बॊस', 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे', 'कुछ कुछ होता है', 'मोहब्बतें', और 'कभी ख़ुशी कभी ग़म'। और जब से ये दोनों एक दूसरे से अलग हुए हैं, किसी भी फ़िल्म में इन्हे सफलता अभी तक नहीं मिली है। ख़ैर, वापस आते हैं 'दुल्हा मिल गया' पर और तीसरा गाना जो हम अब बजाएँगे वह है "आजा आजा मेरे रांझना वे आजा आजा"।

सुजॊय - बोल सुन कर तो लग रहा है कि फ़िल्म में किसी शादी के सिचुयशन के लिए बना होगा यह गाना। गाने में मुख्य स्वर है नई आवाज़ सुनंदा का, और बाद में अनुश्का उनका साथ देती हैं। अनुश्का मनचंदा इन दिनों तेज़ी से कामयाबी के पायदान चढ़ रही हैं। सुनिधि और श्रेया के बाद अब तक कोई गायिका उस मुक़ाम तक नहीं पहुँच पायी हैं। हो सकता है वह मुक़ाम अनुश्का के इंतज़ार में है।

सजीव - इस गीत में वैसे कोई नई बात नहीं है, बल्कि 'कभी ख़ुशी कभी ग़म' के "बोले चूड़ियाँ बोले कंगना" का ही एक एक्स्टेन्शन जैसा लगता है। सिर्फ़ मुखड़ा ही नहीं, अंतरे में भी जब "साथिया हाथ दे, अब मेरा साथ दे" गाया जाता है, उसमें भी "बोले चूड़ियाँ" का अंतरा याद आ ही जाता है।

गीत: आजा आजा रांझना वे...aaja aaja ranjhna ve (dulha mil gaya)


सुजॊय - अब एक बेहद नर्मोनाज़ुक गीत हो जाए इस फ़िल्म से। सजीव, इस दौर की जो सब से अग्रणी गायिकाएँ है, यानी कि श्रेय घोषाल और सुनिधि चौहान, मैंने एक पत्रिका में एक बार पढ़ा था कि श्रेया को लता घराने का माना जाता है और सुनिधि को आशा घराने का। है न मज़ेदार ऒब्ज़र्वेशन?

सजीव - हाँ, कुछ हद तक सही भी है। श्रेया ज़्यादातर नर्मोनाज़ुक गानें गाती हैं और सुनिधि किसी भी तरह के गीत गानें से नहीं कतरातीं।

सुजॊय - तो चलिए अब एक ख़ास श्रेया वाले अंदाज़ का गाना हो जाए, यह गीत है "रंग दिया दिल"। लोक रंग में रंगा हुआ गाना है, जो उपर के तीन गीतों से बिल्कुल अलग हट के है।

सजीव - कैरीबीयन से हम सीधे अपनी धरती हिंदुस्तान में उतर आते हैं और इस गीत को सुनते हुए जैसे हम पंजाब के किसी गाँव में पहुँच जाते हैं जहाँ पीली सरसों के खेत में नायिका अपने प्यार के इंतज़ार में यह गीत गा रही होती है।

गीत: रंग दिया दिल...rang diya dil (dulha mil gaya)


सुजॊय - और अब पाँचवे और अंतिम गीत की बारी। और शायद यह फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत साबित होने वाला है। अजी गीत क्या, यह तो एक क़व्वाली है, "दिलरुबाओं के जलवे तौबा"।

सजीव - पहला गाना शाहरुख़ ख़ान पर फ़िल्माया हुआ था और यह क़व्वाली भी उन्ही पर और उनके साथ सुश्मिता सेन पर फ़िल्माया गया है। पिक्चराइज़ेशन भी ज़बरदस्त हुई है इस क़व्वाली का। इस क़व्वाली की तैयारी में हर किसी ने जी जान लगाई होगी, क्योंकि शाहरुख़ ख़ान इससे पहले फ़िल्म 'मैं हूँ ना' में एक मशहूर क़व्वाली "तुम से मिल के दिल का है जो हाल क्या कहें" कर चुके हैं जिसे अपार सफलता मिली थी। तो ज़ाहिर है कि लोगों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं।

सुजॊय - और शायद पहली बार गायक अमित कुमार शाहरुख़ ख़ान का प्लेबैक कर रहे हैं इस क़व्वाली में। 'अपना सपना मनी मनी' में "दिल में बजी गीटार" के बाद अमित कुमार की आवाज़ फिर से गूँज उठी है इस क़व्वाली में। वैसे सजीव, क्या आपको अमित कुमार की आवाज़ मे कोई और क़व्वाली याद आती है?

सजीव - नहीं भई मुझे तो कोई ऐसी क़व्वाली याद नहीं आ रही है।

सुजॊय - कोई बात नहीं, यह सवाल आज हम अपने ट्रिविया में पूछ लेंगे। "दिलरुबाओं के जलवे" में अमित कुमार के साथ आवाज़ मिलाई है मोनाली ठाकुर ने जिन्होने फ़िल्म 'रेस' का वह हिट गीत गाया था "ज़रा ज़रा टच मी टच मी"। रीयलिटी शोज़ के वजह से कई गायक गायिकाएँ सामने आ रहे हैं। लेकिन उससे भी बड़ी बात है कि इन्हे फ़िल्मों में चांस देने में संगीतकारों और फ़िल्मकारों की भूमिका। अनुश्का और मोनाली ऐसी ही रीयलिटी शोज़ से उभरी हैं। इस फ़िल्म में एक और गीत है जिसमें तुलसी की आवाज़ है, वो भी यही से आईं हैं। और फिर श्रेया सुनिधि भी तो रीयलिटी शो की ही उपज हैं!

सजीव - और एक मज़ेदार बात नोटिस की है तुमने इस क़व्वाली में?

सुजॊय - कौन सी?

सजीव - यही कि क़व्वाली के अंत के जो बोल हैं उनमें शाहरुख़ ख़ान और सुश्मिता सेन के कई फ़िल्मों और गीतों का ज़िक्र आता है जैसे कि शाहरुख़ की फ़िल्में बादशाह, कुछ कुछ होता है, दीवाना, कुछ कुछ होता है, बाज़ीगर, डर, अंजाम, देवदास, दिल तो पागल है, मैं हूँ ना। सुश्मिता की दस्तक, सिर्फ़ तुम और बेवफ़ा जैसी फ़िल्मों और "दिलबर" तथा "मस्त माहौल" जैसे गीतों का उल्लेख भी आता है क़व्वाली के अंतिम चरण में। मुदस्सर अज़ीज़ ने बतौर गीतकार भी अच्छा काम दिखाया है इस फ़िल्म में। अब उनकी क़िस्मत के सितारे कितने बुलंद हैं, वह तो फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद ही पता लगेगी!

सुजॊय - तो चलिए, हम सब मिलकर इस क़व्वाली का लुत्फ़ उठाते हैं। हमने १२ में से कुल ५ गानें यहाँ पे शामिल किए जो अलग अलग रंग-ओ-अंदाज़ के हैं। उम्मीद है आप सभी को पसंद आएँगे। नीचे पूछे गए सवालों के जवाब देने की कोशिश कीजिएगा लेकिन इन गीतों के बारे में अपनी राय टिप्पणी में लिखना हर श्रोता व पाठक के लिए अनिवार्य है। :-)

गीत: दिलरुबाओं के जलवे तौबा...dilrubaaon ke jalve (dulha mil gaya)


एल्बम "दूल्हा मिल गया" को आवाज़ रेटिंग **१/२
फिल्म में हालाँकि शाहरुख़ खान अतिथि भूमिका में हैं पर प्रचार प्रसार में उन्हीं का सहारा लिया जा रहा है. जैसा कि हमने उपर जिक्र किया, लगभग सभी गीत औसत ही हैं, "अकेला दिल" अदनान सामी के गायन अंदाज़ और अच्छे बोलों के कारण चर्चित हो सकता है. कुछ नयी आवाजों में संभावना नज़र आती है पर इन्हें और बेहतर गीत भी मिलने चाहिए, नए पन के अभाव में इस अल्बम को ढाई तारे की रेटिंग ही दी जा सकती है
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और अब बारी है ताज़ा सुर ताल (TST) ट्रिविया की, जनवरी के पहले सोमवार से लेकर दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक हर सप्ताह हम आपसे पूछेंगें ३ सवाल. हर सही जवाब के होंगें ३ अंक. इसके अलावा जो श्रोता प्रस्तुत गीतों को सुनकर अपनी रेटिंग देगा (५ में से ) वो भी १ अंक पाने का हक रखेगा, तो खेलिए हमारे संग, नए गीतों पर आपनी राय रखिये और सवालों का जवाब तलाश कर अपना संगीत ज्ञान भी बढ़ायिये...

प्रस्तुत है आज के ३ सवाल

सवाल # १. अमित कुमार ने गायिका हेमलता के साथ १९८८ की एक फ़िल्म में एक क़व्वाली गाया था। आनंद बक्शी की रचना, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत, फ़िल्म के मुख्य किरदार थे गोविन्दा और सोनम। बताइए इस क़व्वाले के बोल और फ़िल्म का नाम।

सवाल # २. क्योंकि आज ज़िक्र है संगीतकार ललित पंडित का, तो बताइए कि जतीन-ललित की जोड़ी ने अपना पहला फ़िल्मी ऐल्बम 'यारा दिलदारा' से पहले जिस ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम की रचना की थी, उस ऐल्बम का क्या शीर्षक था?

सवाल # ३. मुदस्सर अज़ीज़ ने 'दुल्हा मिल गया' में पहली बार अपने निर्देशन के जल्वे दिखाए हैं। गानें भी उन्होने ही लिखे हैं लेकिन बतौर गीतकार यह उनकी पहली फ़िल्म नहीं है। तो आप ही बता दीजिए कि इससे पहले उन्होने किस फ़िल्म में गीत लिख चुके हैं?



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

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