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Wednesday, August 12, 2009

रूप तेरा मस्ताना...प्यार मेरा दीवाना...रोमांस का समां बाँधती किशोर की आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 169

हाल ही में एक गीत आया था "कभी मेरे साथ कोई रात गुज़ार तुझे सुबह तक मैं करूँ प्यार", जिसमें सेन्सुयसनेस कम और अश्लीलता ज़्यादा थी। अगर हम आज से ४० साल पीछे की तरफ़ चलें, तो फ़िल्म 'आराधना' में आनंद बक्शी साहब ने एक गीत लिखा था "रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना, भूल कोई हम से न हो जाए"। यह गीत भी मादक और कामोत्तेजक था लेकिन अश्लील कदापि नहीं। दोस्तों, हमने इन दोनों गीतों का एक साथ ज़िक्र यह कहने के लिए किया कि उस पुराने दौर में भी इस तरह के सिचुयशन बनते थे, लेकिन उस दौर के फ़िल्मकार, गीतकार व संगीतकार इन पर ऐसे गानें बनाते थे जो स्थान काल व पात्रों का भी न्याय करे और साथ ही साथ इस बात का भी ध्यान रखें कि उसका फ़िल्मांकन रुचिकर हो, न कि अश्लील। आज 'दस रूप ज़िंदगी के और एक आवाज़' के अंतर्गत सुनिए किशोर दा की आवाज़ में इसी मादक नशीले गीत को, जिसे सुनकर दिल में हलचल सी होने लगती है। गीत के बोल और संगीत मादक और उत्तेजक तो हैं ही, किशोर दा ने भी उसी अंदाज़ में इसे गाया जिस अंदाज़ की इस गीत को ज़रूरत थी।

फ़िल्म 'आराधना' के बारे में विस्तृत जानकारी हम ने आप को शक्ति सामंत पर केन्द्रित शृंखला में दी थी, आप उस पूरे शृंखला को यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं। प्रस्तुत गीत उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी 'बोल्ड' गीत था। सचिनदा ने इस गीत के लिए पहले जो धुन बनाई थी, उसमें किशोर कुमार को कुछ कमी सी लग रही थी, यानी कि जिस नशीले अंदाज़ की ज़रूरत थी वह नहीं आ पा रही थी। तब किशोरदा ने ही इसकी धुन को थोड़ा सा 'मॊर्डन' बना दिया जो बर्मन दादा को भी पसंद आया। अब बारी थी इस गाने के फ़िल्मांकन की। शक्तिदा साधारणतः अपने फ़िल्मों के रिकार्ड किए हुए गाने रात के वक़्त सुना करते थे और उनके फ़िल्मांकन के बारे में योजनाएँ बनाया करते थे। इस गीत के लिए उनके दिमाग़ में एक ख़याल आया कि क्यों ना इस गीत को एक ही 'शॉट' में फ़िल्माया जाए! उन्होने एक काग़ज़ का पन्ना लिया और उस पर तीन अक्षर लिखे - ए, बी, सी। 'ए' नायक के लिए, 'बी' नायिका के लिए, और 'सी' कैमरे के लिए। और इस तरह से वो अपने मन ही मन में गाने का पूरा फ़िल्मांकन क़ैद कर लिया। उन्होने एक गोलाकार 'ट्राली' का इंतज़ाम किया और फ़िल्मालय स्टुडियो में इस गीत को फ़िल्मा लिया गया। शुरु शुरु में कई लोगों ने उनके इस एक शॉट वाले विचार का विरोध किया था। किसी ने यहाँ तक कहा भी था कि "इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शॉट में ले रहा है"। उस समय सभी के सवालों का शक्तिदा ने एक ही जवाब दिया था कि "जब रात को गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि कहाँ 'कट' करूँ"। और इस तरह से यह गीत हिंदी फ़िल्म जगत का पहला गाना बन गया जिसे केवल एक ही शॉट में फ़िल्माया गया था। तो चलिए हम भी इस गीत की मादकता और नशीलेपन का आनंद उठाते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. बेफिक्री के आलम में खुले आसमान में गूंजती किशोर की आवाज़.
2. कल के गीत का थीम है - "यायावरी, सफ़र, आदि".
3. एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से -"दिन".

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह वाह रोहित जी आप के हुए ८ अंक, मात्र एक जवाब पीछे हैं आप दिशा जी के स्कोर से. वाकई मुकाबला दिलचस्प है. सुमित जी, मंजू जी, और मनु जी ने सहमती की मोहर लगा दी है. शरद जी और स्वप्न जी आप बाकी सब से मीलों आगे हैं इसमें कोई शक है क्या :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, May 15, 2009

सफल "हुई" तेरी आराधना (भाग ४), शक्ति सामंता का मुक्कमल फ़िल्मी सफ़र

अब तक आपने पढ़ा -

आनंद आश्रम से शुरू हुआ सफ़र....

हावड़ाब्रिज से कश्मीर की कली तक...

रोमांटिक फिल्मों के दौर में आराधना की धूम...

अब आगे...

दोस्तों, शक्ति सामंत की सुरीली फ़िल्म यात्रा की एक और कड़ी के साथ हम हाज़िर हुए हैं आज। शक्तिदा के इस सुरीले सफ़र के हमसफ़र बनकर पिछली कड़ी तक हम पाँव रख चुके थे ७० के दशक में। इससे पहले कि हम शक्तिदा और राजेश खन्ना की दूसरी फ़िल्म का ज़िक्र शुरु करें, 'आराधना' के एक और गाने की शूटिंग से संबधित बात हम आपको बताना चाहेंगे। यह बात शक्तिदा ने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी भाइयों को बताया था - "मुझे याद है कि कुल्लू मनाली में राजेश खन्ना और शर्मीला टैगोर के साथ मुझे एक गाना फ़िल्माना था। वो लोग तैयार होके १० बजे के करीब लोकेशन पर पहुँचते थे और ११ बजे पूरी वादी पर अंधेरा छा जाता था। बहुत कोशिशों के बाद भी जब वो लोग ७ बजे लोकेशन पर नहीं पहुँचे तो एक दिन मैनें दोनो को सोने ही नहीं दिया और ५ बजे 'मेक-अप' कराके ७ बजे लोकेशन पर ले गया। और उसके बाद ११ - ११:३० बजे तक हम लोग शूटिंग करते रहे। उसके बाद 'पैक-अप' करके उनको छोड़ दिया। उस दिन तो वो लोग मुझसे बहुत नाराज़ हुए, दो दिन तक मुझसे बात तक नहीं की, लेकिन जब उसका रेज़ल्ट उन्होने स्क्रीन पर देखा तो दोनो ही ख़ुशी से झूम उठे। वह गीत मैं आप लोगों के सामने पेश करता हूँ।"

गीत: कोरा क़ाग़ज़ था यह मन मेरा (आराधना)


१९७० में शक्तिदा के निर्माण व निर्देशन में राजेश खन्ना एक बार फिर नज़र आये' फ़िल्म 'कटी पतंग' में। 'आराधना' की व्यापक सफलता के बाद राजेश खन्ना एक 'स्टार' बन चुके थे। 'कटी पतंग' में राजेश खन्ना की नायिका बनीं आशा पारिख। इस फ़िल्म के ज़रिए एक बार फिर शक्तिदा और राजेश खन्ना ने सफलता की ऊँचाइयों को छूआ। आनंद बक्शी और राहूल देव बर्मन की नयी नयी जोड़ी ने जैसे चारों ओर तहलका मचा दिया इस फ़िल्म के गीतों के ज़रिये। किशोर कुमार की आवाज़ भी शक्तिदा के फ़िल्मों के संपर्क में आकर एक नयी ताज़गी और जवानी के साथ सामने आयी। "प्यार दीवाना होता है मस्ताना होता है", "यह जो मोहब्बत है यह उनका है काम" और "आज न छोड़ेंगे बस हमझोली" जैसे गाने किशोरदा के सदाबहार गीतों के एल्बम मे अक्सर जगह पाते हैं। इसी फ़िल्म में एक अनोखा गीत था जो फ़िल्म की खलनायिका बिंदु पर फ़िल्माया गया था। आशा भोंसले की आवाज़ में "मेरा नाम है शबनम, प्यार से लोग मुझे शब्बो कहते हैं" अपने आप में अनूठा है, अपने जैसा एकमात्र गीत है। गीत संवाद की शक्ल में है, जिसमें बिंदु आशा पारिख को 'ब्लैक-मेल' करते हुए डराती है। सुनिए यह गीत आज बहुत दिनो के बाद!

गीत: मेरा नाम है शबनम (कटी पतंग)


'कटी पतंग' की सफलता के जश्न अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि शक्तिदा की अगली फ़िल्म 'अमर प्रेम' आ गयी १९७१ में और एक बार फिर से वही कामयाबी की कहानी दोहरायी गई। इस बार 'आराधना' की जोड़ी यानी राजेश और शर्मीला साथ आये। 'अमर प्रेम' की कहानी आधारित थी विभुति भुशण बंदोपाध्याय की उपन्यास पर। यह फ़िल्म १९७० की अरबिंदो मुखर्जी की बंगला फ़िल्म 'निशिपद्म' का हिंदी रीमेक था। एक अच्छे घर के नौजवान लड़के की एक वेश्या के प्रति पवित्र प्रेम की कहानी है 'अमर प्रेम' जो मानवीय मूल्यों और संबंधों का एक बार फिर से मूल्यांकन करने पर हमें मजबूर कर देता है। आनंद बक्शी, राहूल देव बर्मन और किशोर कुमार की अच्छी-ख़ासी तिकड़ी बन चुकी थी और इस फ़िल्म के गाने भी ऐसे गूंजे कि अब तक उनकी गूंज सुनाई देती है। तो यहाँ पर भी वही गुंजन पेश-ए-ख़िदमत है।

गीत: चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये (अमर प्रेम)


'अमर प्रेम' के साथ १९७१ में शक्ति सामंत के निर्माण व निर्देशन में दूसरी फ़िल्म आयी 'जाने अंजाने'। शम्मी कपूर, विनोद खन्ना और लीना चंदावरकर अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार थे शंकर जयकिशन एवं गीतकार थे हसरत जयपुरी। रंजन घोष की कहानी और व्रजेन्द्र गौड़ के संवाद थे इस फ़िल्म में। हम आपको पहले बता चुके हैं कि ये दोनो शक्तिदा के अच्छे दोस्तों में से थे। फ़िल्म की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म में गीतकार गुलशन बावरा और संगीतकार कानु राय ने अभिनय किया था। फ़िल्म के कम से कम तीन गाने ख़ूब चर्चित हुए थे - किशोर कुमार का गाया शीर्षक गीत "जाने अंजाने लोग मिले मिला ना कोई अपना", मन्ना डे का गाया शास्त्रीय राग पर आधारित "छम छम बाजे रे पायलिया", और लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी का गाया एक लोकप्रिय युगल गीत भी था इस फ़िल्म में, क्यों ना आज यहाँ पर सुने वही युगल गीत!

गीत: तेरी नीली नीली आँखों के दिल पे तीर चल गए (जाने अंजाने)


१९७२ में शक्ति सामंत ने बनाई फ़िल्म 'अनुराग'। विनोद मेहरा, मौसमी चटर्जी, राजेश खन्ना, नूतन और अशोक कुमार के जानदार और भावुक अभिनय से यह फ़िल्म सजी थी। फ़िल्म की कहानी दिल को छू लेनेवाली थी। नेत्रदान के विषय को बहुत ही सुंदर और असरदार तरीके से प्रस्तुत किया है शक्तिदा ने इस फ़िल्म के ज़रिए। सचिन देव बर्मन के संगीत की मिठास इस फ़िल्म के गीतों में महसूस किया जा सकता है। इनमें उन्होने बंगाल की भटियाली लोक संगीत का ऐसा मधुर फ़िल्मीकरण किया है कि लोक संगीत की मिठास भी बरकरार है और हल्के फुल्के फ़िल्मी गीत का भी रंग मौजूद है इन गानों में। ऐसा ही एक गीत लताजी की आवाज़ में पेश है यहाँ। गीतकार हैं आनंद बक्शी।

गीत: नींद चुराये चैन चुराये डाका डाले तेरी बंसी (अनुराग)


शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की एक मशहूर बंगला उपन्यास रही है 'चरित्रहीन'। १९७४ में जब निर्माता देवेश घोष ने इस कहानी पर फ़िल्म बनाने की सोची तो फ़िल्म के निर्देशक के रूप में शक्तिदा को चुना गया। संजीव कुमार, शर्मीला टैगोर एवं योगिता बाली अभिनीत इस फ़िल्म को काफ़ी सराहना मिली थी। कहानी कुछ ऐसी थी कि शर्मीला एक सीधी सादी लड़की है जो संजीव कुमार से मिलती है और दोनो को एक दूसरे से प्यार हो जाता है। लेकिन संजीव कुमार की शादी एक दूसरी लड़की योगिता बाली से हो जाती है। एक लम्बे अरसे के बाद जब संजीव शर्मीला से मिलता है तो तब तक शर्मीला एक वेश्या बन चुकी होती है। संजीव कुमार के बुरे दिनों में शर्मीला ही उसकी मदद करती है। फ़िल्म बौक्स औफ़िस पर ठीक ठाक रही। फ़िल्म के गाने लिखे आनंद बक्शी साहब ने और संगीत था राहुल देव बर्मन का। इसी साल शक्तिदा ने राजेश खन्ना और ज़ीनत अमान को लेकर अपने बैनर तले बनाई फ़िल्म 'अजनबी'। इस फ़िल्म में भी बक्शी साहब और पंचम के गीत संगीत गूंजे और बस आज तक गूंजते ही जा रहे हैं। इस फ़िल्म के एक गीत के बारे में और बक्शी-पंचम की जोड़ी के बारे में शक्तिदा ने उसी जयमाला में कहा था - "जो गीत आप लोग सुनते हैं, पसंद करते हैं, उसके पीछे कितनी मेहनत होती है वह शायद आप लोग नहीं जानते! लोग अकसर मुझसे पूछते हैं कि आप हमेशा आनंद बक्शी और आर.डी. बर्मन को ही क्यों लेते हैं? ये दोनो 'सिचुएशन' सुनने के बाद इतने घुलमिल जाते हैं कि वह गीत तैयार होकर जब हमारे सामने आता है तो सिर्फ़ गीत ही नहीं रहता, बल्कि फ़िल्म की कहानी का एक अंग बन जाता है। 'अजनबी' फ़िल्म में ज़ीनत अमान और राजेश खन्ना पर फ़िल्माये गए इस गीत में भी कुछ ऐसी ही बात है।"

गीत: हम दोनो दो प्रेमी दुनिया छोड़ चले (अजनबी)


दोस्तों, शक्ति सामंत की फ़िल्मी यात्रा इतनी लम्बी है कि हम उनके फ़िल्मों और उनके मधुर गीत संगीत में ग़ोते लगाते हुए बस बहते ही चले जा रहे हैं पिछले कुछ हफ़्तों से। शक्तिदा के फ़िल्मी सफ़र की कहानी जारी रहेगी अगले अंक में भी। बने रहिए 'हिंदयुग्म' पर 'आवाज़' के साथ!

प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Friday, April 24, 2009

सफल "हुई" तेरी अराधना...शक्ति सामंत पर विशेष (भाग 3)

दोस्तों, शक्ति सामंत के फ़िल्मी सफ़र को तय करते हुए पिछली कड़ी में हम पहुँच गए थे सन् १९६५ में जिस साल आयी थी उनकी बेहद कामयाब फ़िल्म 'कश्मीर की कली'। आज हम उनके सुरीले सफ़र की यह दास्तान शुरु कर रहे हैं सन् १९६६ की फ़िल्म 'सावन की घटा' के एक गीत से। इस फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन, दोनो ही शक्तिदा ने किया था और इस फ़िल्म में भी नय्यर साहब का ही संगीत था।

गीत: आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया (सावन की घटा)


"आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया, मैं तो आगे बढ़ गयी पीछे ज़माना रह गया"। एस. एच. बिहारी के लिखे इस गीत के बोल जैसे शक्तिदा को ही समर्पित थे। 'हावड़ा ब्रिज', 'चायना टाउन', और 'कश्मीर की कली' जैसी 'हिट' फ़िल्मों के बाद इसमें कोई शक़ नहीं रहा कि शक्तिदा फ़िल्म जगत में बहुत ऊपर पहुँच चुके थे। उनका नाम भी बड़े बड़े फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों की सूची में शामिल हो गया। और साल दर साल उनकी प्रतिभा और सफलता साथ साथ परवान चढ़ती चली गयी। 'सावन की घटा' के अगले ही साल, यानी कि १९६७ में एक और मशहूर फ़िल्म आयी 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' जिसके गीत संगीत ने तो हंगामा मचा दिया। शम्मी कपूर, शंकर जयकिशन और मोहम्मद रफ़ी की तिकड़ी पहले से ही लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुँच चुकी थी। इस फ़िल्म ने उनकी मुकुट पर एक और चमकता हीरा जड़ दिया। शक्तिदा किसी विदेशी शहर को आधार बनाकर एक फ़िल्म बनाना चाहते थे। उनके अनुसार उस ज़माने में पैरिस को लेकर लोगों में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी थी और यूरोप के सबसे ख़ास शहर के रूप में भारतीय इसे मानते थे। इसलिए इस फ़िल्म के लिए पैरिस को ही चुना गया। उन्होने यह भी कहा था कि इस फ़िल्म की कहानी में कोई ख़ास बात नहीं थी, फ़िल्म चली अपने किस्मत के बलबूते। फ़िल्म के गीतों के लिए पैरिस से ही नर्तकियों को लिया गया था। एक फ़्रेंच निर्माता ने जब यह फ़िल्म देखी तो उन्होने शक्तिदा से अनुरोध किया कि वो उन्हे इस फ़िल्म के कुछ दृश्य उनकी अपनी फ़िल्म में इस्तेमाल करने की अनुमती दे दें। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के शूटिंग से जुड़ा एक मज़ेदार क़िस्सा शक्तिदा ने फ़ौजी भाइयों के लिए प्रसारित विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में बताया था। हुआ यूँ कि वो लोग पैरिस में फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। उन दिनो 'जंगली' और 'संगम' के गानें पूरी दुनिया में धूम मचा रहे थे। एक दिन शक्तिदा, जयकिशन और शम्मी कपूर एक 'रेस्तोराँ' में बैठे हुए थे कि अचानक कुछ लोगों ने उन्हे घेर लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक कि जयकिशन और शम्मी कपूर ने उनको "आइ आइ या करूँ मैं क्या सुकू सुकू" गाना नहीं सुनाया। 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' के जिस गाने को वो उन दिनों फ़िल्मा रहे थे वह गाना था यह...

गीत: आसमान से आया फ़रिश्ता (ऐन ईवनिंग इन पैरिस)


साल १९६९। उस समय राजेश खन्ना राजेश खन्ना नहीं बने थे। उन्होने कुछ दो तीन फ़िल्मों में काम किया था, लेकिन वो फ़िल्में बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हो पायी थी। जब 'आराधना' की कहानी शक्तिदा के दिमाग़ में आयी, तो उन्हे लगा कि इस कहानी पर एक सफ़ल फ़िल्म तभी बनायी जा सकती है अगर नायक की भूमिका में कोई नया अभिनेता हो। उन्होने राजेश खन्ना का अभिनय देख रखा था और उन्हे उनका अभिनय काफ़ी पसंद भी आया था। जब उन्होने राजेश खन्ना से 'आराधना' में काम करने की बात की तो पहले पहले तो वो ज़्यादा ख़ुश नहीं हुए क्योंकि उनका किरदार 'इंटर्वल' से पहले ही मर जाता है और उनका डबल रोल काफ़ी देर बाद शुरु होता है। उन्हे लगा कि यह नायिका प्रधान फ़िल्म है जो उन्हे कामयाबी नहीं दिला सकती। लेकिन शक्तिदा ने उन्हे हर तरीके से समझाया, यहाँ तक कहा कि अगर फ़िल्म नाकामयाब भी होती है तो भी उन्हे उनके पूरे पैसे मिल जाएंगे। आख़िरकार राजेश खन्ना राज़ी हो गए और फ़िल्म का निर्माण शुरु हो गया। शक्तिदा ने बहुत ही कम बजट में यह फ़िल्म बना डाली और जब फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो वो लखपति बन गए। 'आराधना' मुंबई के 'बांद्रा टाकीज़' में रिलीज़ हुई थी। मद्रास के एक सिनेमाघर में यह फ़िल्म लगातार दो साल तक चली। इस फ़िल्म ने राजेश खन्ना के रूप में फ़िल्म जगत को दिया उसका पहला 'सुपर स्टार'। शर्मिला टैगोर के स्टाइल को भी उस युग की युवतियों ने गले लगाया। और इसी फ़िल्म से शुरुआत हुई राजेश खन्ना, आनंद बख्शी, सचिन देव बर्मन और किशोर कुमार के टीम की।

गीत: मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू (आराधना)


'आराधना' की बातें इतनी ज़्यादा हैं दोस्तों कि केवल एक गीत सुनवाकर हम आगे नहीं बढ़ सकते, भले ही एक और अंक हमें बढ़ाने पड़ जाए। तो हुआ यूँ कि शुरुआत में यह तय हुआ था कि रफ़ी साहब बनेंगे राजेश खन्ना की आवाज़। लेकिन उन दिनो रफ़ी साहब एक लम्बी विदेश यात्रा पर गए हुए थे। इसलिए शक्तिदा ने किशोर कुमार का नाम सुझाया। उन दिनो किशोर देव आनंद के लिए गाया करते थे, इसलिए सचिनदा पूरी तरह से शंका-मुक्त नहीं थे कि किशोर गाने के लिए राज़ी हो जाएंगे। शक्तिदा ने किशोर को फ़ोन किया, जो उन दिनों उनके दोस्त बन चुके थे बड़े भाई अशोक कुमार के ज़रिए। किशोर ने जब गाने से इनकार कर दिया तो शक्तिदा ने कहा, "नखरे क्यूँ कर रहा है, हो सकता है कि यह तुम्हारे लिए कुछ अच्छा हो जाए"। आख़िर में किशोर राज़ी हो गए। शुरु शुरु में सचिनदा बतौर गीतकार शैलेन्द्र को लेना चाह रहे थे, लेकिन यहाँ भी शक्तिदा ने सुझाव दिया कि क्यूँ ना सचिनदा की जोड़ी उभरते गीतकार आनंद बख्शी के साथ बनाई जाए। और यहाँ भी उनका सुझाव रंग लाया। जब तक रफ़ी साहब अपनी विदेश यात्रा से लौटते, इस फ़िल्म के करीब करीब सभी गाने रिकार्ड हो चुके थे सिवाय दो गीतों के, जिन्हे फिर रफ़ी साहब ने गाया। इनमें से एक गीत का संगीत राहुल देव बर्मन ने तैयार किया था क्युंकि सचिनदा की तबीयत उन दिनों कुछ ठीक नहीं चल रही थी। तो क्यूँ ना यहाँ पर वही गीत सुन लिया जाए!

गीत: बाग़ों में बहार है (आराधना)


'आराधना' में किशोर कुमार का गाया "रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना" उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी 'बोल्ड' गीत था। सचिनदा ने इस गीत के लिए पहले जो धुन बनाई थी, उसमें किशोर कुमार को कुछ कमी सी लग रही थी, यानी कि जिस नशीले अंदाज़ की ज़रूरत थी वह नहीं आ पा रही थी। तब किशोरदा ने ही इसकी धुन को थोड़ा सा 'मॊर्डन' बना दिया जो बर्मन दादा को भी पसंद आया। अब बारी थी इस गाने के फ़िल्मांकन की। शक्तिदा साधारणतः अपने फ़िल्मों के रिकार्ड किए हुए गाने रात के वक़्त सुना करते थे और उनके फ़िल्मांकन के बारे में योजनाएँ बनाया करते थे। इस गीत के लिए उनके दिमाग़ में एक ख्याल आया कि क्यूँ ना इस गीत को एक ही 'शौट' में फ़िल्माया जाए! उन्होने एक काग़ज़ का पन्ना लिया और उस पर तीन अक्षर लिखे - ए, बी, सी। 'ए' नायक के लिए, 'बी' नायिका के लिए, और 'सी' कैमरे के लिए। और इस तरह से वो अपने मन ही मन में गाने का पूरा फ़िल्मांकन क़ैद कर लिया। उन्होने एक गोलाकार 'ट्राली' का इंतज़ाम किया और फ़िल्मालय स्टुडियो में इस गीत को फ़िल्मा लिया गया। शुरु शुरु में कई लोगों ने उनके इस एक शौट वाले विचार का विरोध किया था। किसी ने यहाँ तक कहा भी था कि "इसका दिमाग़ ख़राब हो गया है जो इतना अच्छा गाना एक ही शौट में ले रहा है"। उस समय सभी के सवालों का शक्तिदा ने एक ही जवाब दिया था कि "जब रात को गाना सुन रहा था तो समझ ही नहीं आया कि कहाँ 'कट' करूँ"। और इस तरह से यह गीत हिंदी फ़िल्म जगत का पहला गाना बन गया जिसे केवल एक ही शौट में फ़िल्माया गया था। तो चलिए हम भी इस गीत की मादकता और नशीलेपन का आनंद उठाते हैं।

गीत: रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना (आराधना)


'आराधना' की कामयाबी सिर्फ़ शक्ति सामंत की कामयाबी नहीं थी, बल्कि राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर, आनंद बख्शी, किशोर कुमार जैसे तमाम कलाकारों के लिए यह फ़िल्म यादगार साबित हुई। इस फ़िल्म की कामयाबी के झंडे को लहराते हुए शक्तिदा ने प्रवेश किया ७० के दशक में। १९७० में उनके निर्देशन में फ़िल्म आयी 'पगला कहीं का'। निर्माता थे अजीत चक्रवर्ती। शम्मी कपूर और आशा पारेख अभिनीत इस फ़िल्म में शंकर जयकिशन ने एक बार फिर से 'ऐन ईवनिंग इन पैरिस' की तरह अपने सुरीले संगीत के जलवे बिखेरे हसरत जयपुरी के लिखे और लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और मन्ना डे के गाए गीतों के ज़रिए। इस फ़िल्म का एक गीत ऐसा था जो हमें कभी उसे भुलाने नहीं देता। आप समझ गए होंगे कि हमारा इशारा किस तरफ़ है, जी हाँ, लताजी और रफ़ी साहब का गाया 'डबल वर्ज़न' गीत "तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे"।

गीत: तुम मुझे युं भुला ना पायोगे (पगला कहीं का)


"तुम मुझे युँ भुला ना पायोगे, जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे संग संग तुम भी गुनगुनायोगे"। इसमें कोई शक़ नहीं कि शक्तिदा के फ़िल्मों के गीतों को आज भी लोग बड़े प्यार से गुनगुनाते हैं, याद करते हैं। रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में यही गानें तो हैं जो हमारे सुख दुख के साथी हैं। ना कभी हम इन गीतों को भुला सकते हैं और ना ही इन गानों और इनके फ़िल्मों से जुड़े कलाकारों को। और शायद यही वजह है कि आज हम 'आवाज़' के इस मंच पर शक्ति सामंत को याद कर रहे हैं, उन्हे श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं। पहले हमने सोचा था कि इस श्रद्धांजली को हम चार भागों में पोस्ट करेंगे, लेकिन शक्तिदा के फ़िल्मों की सूची इतनी लम्बी है और इन फ़िल्मों के गाने इतने प्यारे हैं कि हम बड़ी मुशकिल में पड़ गए कि किस फ़िल्म को छोड़ें, और किस फ़िल्म का ज़िक्र करें। इसलिए हमने तय किया है कि हम इस श्रद्धांजली को तब तक जारी रखेंगे जब तक शक्तिदा के सभी फ़िल्मों का ज़िक्र हम इत्मीनान से कर नहीं लेते। चौथे भाग के साथ हम बहुत जल्द वापस आयेंगे, तब तक पढ़ते रहिए और सुनते रहिए 'आवाज़'।

प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

Tuesday, September 2, 2008

कोई हमदम न रहा... किशोर कुमार ( २ )

अवनीश तिवारी लिख रहे हैं हरफनमौला फनकार किशोर कुमार के सगीत सफर की दास्तान, जिसकी पहली कड़ी आप यहाँ पढ़ चुके हैं, अब पढ़ें आगे -

साथियों ,
इस महीने याद करेंगे किशोर कुमार के जीवन के उस दशक की जो उनके भीतर के कुदरती कला को प्रस्तुत कर उनको एक बेजोड़ कलाकार के रूप में स्थापित करता है. १९६०-१९७० का वह दशक हिन्दी फ़िल्म जगत में किशोर के नाम से छाया रहा चाहे अभिनय हो, संगीत बनाना हो या गाना गाना और या फ़िर फिल्मो का निर्देशन, लगभग फिल्मी कला के हर क्षेत्र में किशोर ने सफल प्रयोग किए. किसी साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि उन दिनों वे इतने व्यस्त थे कि एक स्टूडियो से दुसरे स्टूडियो जाते समय, चलती गाडी में ही अगले दिए गए कामों (assignments) की तैयारी करने लगते.

इस सुनहरे दशक में किशोर के अभिनय और आवाज़ की कुछ यादगार फिल्मे -

१. १९६० - बेवकूफ , गर्ल फ्रेंड
गर्ल फ्रेंड फ़िल्म सत्येन बोश की निर्देशित फ़िल्म थी जिसका एक गीत अपनी छाप छोड़ गया गायिका सुधा मल्होत्रा के साथ गाया गीत " कश्ती का खामोश सफर है " यादगार रहा

२. १९६१ - झुमरू
किशोर के हरफनमौला होने का परिचय देती यह फ़िल्म कभी भुलाई नही जा सकती इसके योडेल्लिंग अंदाज़ में गाये सारे गीत आज भी ताजे हैं " कोई हम दम ना रहा , कोई सहारा ना रहा ..." यह गीत तो किशोर को भी बेहद पसंद था बड़े भाई अशोक कुमार भी इसी गीत से छोटे किशोर को याद कर लिया करते थे



३. १९६२ - बॉम्बे का चोर - माला सिन्हा के साथ अभिनय किया

४. १९६२ - Half Ticket - अभिनेत्री मधुबाला के साथ की यह फ़िल्म मस्ती और हंसी से भरपूर थी बच्चों की तरह शरारत करते किशोर को खूब पसंद किया गया

५. १९६४ - दूर गगन की छाँव में - " आ चल के तुझे मैं लेकर चलूं ..." यह मीठा गाना काफी लोकप्रिय हुया
यह फ़िल्म किशोर को भी प्रिय थी

६. १९६५ - श्रीमान फंटूस - यह नाम लेते ही गम से दिल को भर जाने वाला गाना याद आ जाता है गाना था - " वो दर्द भरा अफ़साना ..." जितने भी बड़े स्टेज शो हुए, लगभग सभी में किशोर ने इस गीत को दोहराया

६. १९६७ - हम दो डाकू

७. १९६८ - पडोसन - यह एक ऐसी दिलचस्प फ़िल्म है कि जिसे १०० बार देखने के बाद भी देखने का मन करे
साइड हीरो के रूप में किए गए अभिनय से किशोर ने इसे आज तक जवां रखा है
" एक चतुर नार..." इस भिडंत गाने के लिए सफल गायक मन्ना दे ने तक किशोर के हुनर की दाद दी
शास्त्रीय संगीत से बेखबर किशोर ने तैयारी कर कामयाबी से इस गीत को पूरा किया

८. अन्य फिल्मे -
१९६८ - श्रीमान , पायल की झंकार
१९७० - आंसू और मुस्कान आदि ...

गायक बना संगीतकार -

संगीत की समझ आने पर किशोर ने संगीतकार का भी काम किया उनका हुनर यहाँ भी हिट हुया

१९६२ - झुमरू में संगीत बनाया इतना ही नही तो गीत के बोल भी लिखे और सभी जानते है गानों से ही यह फ़िल्म आज भी देखी जाती है

१९६४ - दूर गगन की छाँव में और १९६७ - हम दो डाकू में भी संगीत दिया

किशोर कुमार आपने गानों में योडेलीन के अंदाज़ के कारण जाने जाते रहे. यह नुस्खा उन्होंने अपने मझले भाई अनूप कुमार के एक रिकॉर्डिंग से छिप कर सीखा था. अनूपजी ने इसे विदेश से लाये थे.
गीत और संगीत में किशोर इतने उलझे थे कि उनके अभिनय के गीत उस समय मोहम्मद रफी जी को गाने पड़े.

साथ का यह फोटो किशोर कुमार के अलग अलग पहलू को बता रहा है.




गायकी में सम्मान -

यह एक सफल और कई मायनो में याद गार फ़िल्म रही १९६९ में शक्ति सामंत की फ़िल्म "आराधना"
राजेश खन्ना पर फिल्माए गीतों ने तो हिन्दी फिल्मो में Romantic Songs की कड़ी में एक हलचल सी मचा दी "मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू ..." और "रूप तेरा मस्ताना ..." - आज भी सुपर हिट है
" रूप तेरा मस्ताना ..." - इस गीत के लिए किशोर को जीवन का पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला
यही फ़िल्म है जहाँ से मशहूर संगीतकार आर. डी. बर्मन ने अपने पिता की गैरमौजूदगी में ख़ुद ब ख़ुद काम संभाला और फ़िर बस आगे चलते ही गए.

राजेश खन्ना बताते हैं कि पहली बार उनके लिए गाने से पहले किशोर दा ने उन्हें बुलाया और उनसे सवाल-जवाब किए. गानों के बन जाने पर राजेश जी को पता चला कि किशोर उस मुलाक़ात में उनके बोलने के अंदाज़ की मालूमात कर रहे थे. बस इसके बाद किशोर और राजेश खन्ना एक दुसरे के लिए पर्याय से हो गए.

१९६० में उस जमाने की मशहूर और खुबसूरत आदकारा मधुबाला के साथ शादी के बंधन में बंधे पारिवारिक नाराजगी के चलते उन्हें इस सम्बन्ध में तकलीफों का सामना करना पडा दिल की मरीज़ मधुबाला के इलाज़ के लिए किशोर ने कोशिश की लेकिन १९६९ में यह साथ टूट गया और बिना साथी के किशोर फ़िर अकेले पड़े.

गैर हिन्दी गाने -

असल में किशोर बंगाली थे और बंगला में भी गाने गाये १९६४ में सत्यजीत रॉय जैसे सफल निर्देशक की फ़िल्म "चारुलता" में उन्होंने गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर के बंगला गीत " आमी चीनी गो चीनी तोमारे ..." गीत को गाकर यह साबित कर दिया कि वे एक प्रतिभाशाली ( versatile ) कलाकार थे वे सत्यजीत रॉय के करीब रहे और "पाथर पंचोली" फ़िल्म के निर्माण में उन्होंने रोय जी की आर्थिक मदद भी की

इस तरह से १९६०-१९७० का दशक किशोर कुमार को एक कुशल कलाकार के रूप में देखता है

इस महीने के इस किशोरनामे को मैं कुछ पंक्तियों से सलाम करता हूँ -

गजब के सूर थे और खूबसरत थी आवाज़ ,
लाजवाब अभिनय था और अलग ही अंदाज़ ,
छीडके थे जो बीज अपने हुनर के तुमने ,
बन चमन महका करती है वो आज





- अवनीश तिवारी

( जारी...)

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