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Saturday, April 16, 2016

"कई सदियों से, कई जनमों से...", केवल 24 घण्टे के अन्दर लिख, स्वरबद्ध और रेकॉर्ड होकर पहुँचा था सेट पर यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 80
 

'कई सदियों से, कई जनमों से...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 80-वीं कड़ी में आज जानिए 1972 की फ़िल्म ’मिलाप’ के मशहूर गीत "कई सदियों से कई जनमों से..." के बारे में जिसे मुकेश ने गाया था। बोल नक्श ल्यायलपुरी के और संगीत बृजभूषण का। 
  

लेखक, निर्देशक बी. आर. इशारा और गीतकार/शायर नक्श ल्यायलपुरी की कहानी। दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे।
B R Ishara
दोनों ने पहली बार साथ काम किया 1970 की फ़िल्म ’चेतना’ में। इस फ़िल्म में नक्श साहब के लिखे दोनों गीत बहुत ही पसन्द किए गए। "जीवन है एक भूल सजनवा बिन तेरे..." और "मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा..."। इन गीतों का बी. आर. इशारा पर ऐसा असर पड़ा कि नक्श ल्यायलपुरी हमेशा के लिए उनके पसन्दीदा गीतकार बन गए। इशारा साहब को नक्श साहब के लिखे गीतों पर इतना भरोसा था कि वो उनके लिखे गीतों को अनुमोदित करना भी ज़रूरी नहीं समझते थे, एक बार देखना भी ज़रूरी नहीं समझते थे। नक्श ल्यायलपुरी ने गीत लिख दिया, रेकॉर्ड कर लो, ऐसा रवैया होता था उनका। ऐसे ही एक क़िस्से का उल्लेख इस अंक में हम कर रहे हैं आज, जिसे नक्श साहब ने अपनी एक साक्षात्कार में बताया था। बात 1972 की है, बी. आर. इशारा फ़िल्म ’मिलाप’ की शूटिंग् के लिए आउटडोर पे थे। इस फ़िल्म में शत्रुघन सिन्हा और डैनी डेंगज़ोंगपा मुख्य भूमिकाओं में थे। इस फ़िल्म के लिए कुल चार गीत रेकॉर्ड होने थे। उन दिनों फ़िल्म का चौथा गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में रेकॉर्ड हो रहा था और बी. आर. इशारा बैंगलोर में शूटिंग् कर रहे थे। हुआ यूं कि एक दिन अचानक बी. आर. इशारा ने नक्श साहब को फ़ोन किया और एक गाने की सिचुएशन समझाते हुए बोले कि मैं यह गाना शत्रुघन सिन्हा पर दो बार फ़िल्माना चाहता हूँ - एक बार मुकेश की आवाज़ में और एक बार मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में। फ़िल्म में शत्रुघन सिन्हा के दो रोल हैं, एक रोल के लिए रफ़ी साहब तो गा ही रहे हैं, दूसरे रोल के लिए मुकेश जी का गाया एक गाना चाहिए और यही गाना रफ़ी साहब की आवाज़ में भी चाहिए क्योंकि दोनों रोल पर फ़िल्माना चाहता हूँ इसे। मगर मुश्किल यह है कि शत्रुघन मेरे पास अगले चार दिन तक ही है। अगर तुम यह गाना कल रात तक लिख कर, कम्पोज़ करवा कर और रेकॉर्डिंग् करवा कर भेज सको तो कमाल हो जाएगा! नक्श साहब ने यह ज़िम्मेदारी चुनौती के रूप में स्वीकार कर ली।

गीत के संगीतकार बृजभूषण जी ने नक्श साहब को यह सुझाव दिया कि क्योंकि मुकेश जी हाल ही में दिल के
Naqsh Lyallpuri
दौरे से गुज़रे हैं, इसलिए कोई ऐसा गीत हम न बनाएँ जिसे गाते हुए उन्हें तकलीफ़ हो, उनके दिल पर ज़ोर पड़े। नक्श साह्ब को यह बात बहुत अच्छी लगी और उन्होंने बहुत छोटे छोटे शब्दों का प्रयोग इस गीत में किया। गीत तो फ़टाफ़ट लिख दिया, मगर असली दिक्कत थी उसका संगीत तैयार करना, और मुकेश और रफ़ी से रेकॉर्डिंग् करवाना। नक्श ने सबसे पहले रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में बात की, अगले दिन शाम की डेट मिल गई। उसके बाद रफ़ी और मुकेश जी से भी संयोग से समय मिल गया। अब उन्होंने फ़टाफ़ट संगीतकार बृजभूशण के साथ बैठ कर गाने का संगीत तैयार किया, और अगले दिन सही समय पर दोनों गायकों की आवाज़ों में गाने को रेकॉर्ड करवा कर बी. आर. इशारा को भेज दिया। हालाँकि बाद में मुकेश द्वारा गाया गीत ही फ़िल्म में रखा गया। तो इस तरह से 24 घण्टे के अन्दर एक गीत लिखा गया, म्युज़िक कम्पोज़ किया गया, रेकॉर्ड किया गया और फ़िल्म के निर्देशक बी. आर. इशारा को भेज दिया गया अगले दिन फ़िल्मांकन के लिए। इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद इस 24 घण्टे के अन्दर तैयार हुआ गीत लोगों को बहुत पसन्द आया और हिट हो गया। यह गीत था "कई सदियों से, कई जनमों से, तेरे प्यार को तरसे मेरा मन, आजा, आजा कि अधुरा है अपना मिलन..."। यह एक हौन्टिंग् गीत है और मुकेश की आवाज़ में यह गीत जैसे रोंगटे खड़े कर देता है। मुकेश जी की नैज़ल अन्दाज़ की वजह से "सदियों", "जनमों", "मन", "मिलन" जैसे शब्दों को जिस तरह का अंजाम मिला है, उससे गीत में और ज़्यादा निखार आ गया है। इससे पहले भी एक गीत मुकेश और रफ़ी साहब, दोनों की आवाज़ों में रेकॉर्ड हुआ था। वह गीत था  पर सरदार मलिक के संगीत निर्देशन में चर्चित फ़िल्म ’सारंगा’ का शीर्षक गीत "सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन..."। दोनों ही संस्करण इतने अच्छे हैं कि बताना मुश्किल कि कौन किससे बेहतर हैं।

और अब इसी गीत के संदर्भ में एक और क़िस्सा। नक्श साहब के ही शब्दों में (सूत्र: उजाले उनकी यादों के, बस इतनी सी थी इस गीत की कहानी।
Mukesh
"मुझे एक क़िस्सा याद है। मैं उन दिनों मुलुंड में रहता था। वहाँ मुकेश का एक प्रोग्राम आयोजित हुआ। मुझे वहाँ लोग नहीं जानते थे। तो जैसे ही प्रोग्राम शुरू हुआ, मुकेश ने आयोजक से पूछा कि क्या आप जानते हैं कि आपके इस इलाके में भी एक शायर रहता है? आपने उन्हें निमंत्रित किया है प्रोग्राम में? आयोजक ने कहा ’नही”। जब मुकेश ने उनसे कहा कि क्या वो मुझे आमन्त्रित कर सकते हैं, तब आयोजक ने कुछ लोगों को तुरन्त मेरे घर भेज दिया। मैं उस समय रात का खाना खा रहा था। मैं तो डर गया रात को इतने सारे लोगों को देख कर। लेकिन जब उन्होंने पूरी बात बताई तो मेरी जान में जान आई और मैं उनके साथ गया। उस रात मुकेश जी ने पहले तीन गाने राज कपूर के गाए। और चौथा गीत शुरू करने से पहले यह कहा कि इस गीत को लिखने वाला शायर आप ही की बस्ती में रहता है। फिर उन्होंने मेरे दो गीत गाए, एक ’चेतना’ का और दूसरा ’मिलाप’ का।"
(विविध भारती) -



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, June 7, 2014

"रस्म-ए-उल्फ़त" के बाद और कोई गाना मत बजाना


एक गीत सौ कहानियाँ - 33
 

रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कप्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह साप्ताहिक स्तंभ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 33वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'दिल की राहें' की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे..." के बारे में.




"मैं यह समझता हूँ कि हर फ़नकार का जज़्बाती होना ज़रूरी है, क्योंकि अगर उसमें इन्सानियत का जज़्बा नहीं है, तो वो सही फ़नकार नहीं हो सकता। भगवान ने कुछ फ़नकारों को ज़्यादा ही जज़्बाती बनाया है। यह गाना मुझे बहुत पसन्द है, बहुत ख़ूबसूरती से गाया गया है, सुन के कुछ एक अजीब सी कैफ़ियत तारी होती है। दर्द भरा गाना है, पर दर्द भी इन्सान की ज़िन्दगी का हिस्सा है। इससे इन्सान कब तक दूर भाग सकता है?", ये शब्द निकले थे संगीतकार मदन मोहन के मुख से विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़िल्म 'दिल की राहें' की ग़ज़ल "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे" सुनवाने से पहले। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों व ग़ज़लों की बात करें तो ऐसा अक्सर हुआ कि वो फ़िल्में नहीं चली पर उन फ़िल्मों को आज तक अगर लोगों ने याद रखा तो सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके गीतों की वजह से। केवल 70 के दशक की ही अगर बात करें तो 'महाराजा', 'दस्तक', 'माँ का आँचल', 'हँसते ज़ख़्म', 'मौसम' और 'दिल की राहें' कुछ ऐसी फ़िल्में हैं जो बॉक्स ऑफ़िस पर ज़्यादा कमाल नहीं दिखा सके, पर आज इन फ़िल्मों के ज़िक्र पर सबसे पहले इनके गानें याद आते हैं। मदन मोहन की मौसिक़ी और लता मंगेशकर की आवाज़ में जितनी भी ग़ज़लें बनीं हैं, वो सभी एक से बढ़ कर एक है, और उन्हें सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे ये जन्नत में बन कर धरती पर उतारे गये हैं। इन ग़ज़लों का पूरा श्रेय मदन मोहन और लता जी को दे दें और इनके शायरों को याद न करें, यह बहुत ग़लत बात जो जायेगी। राजा मेहन्दी अली ख़ाँ, राजेन्द्र कृष्ण और मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे ग़ज़लों को मदन मोहन ने सबसे ज़्यादा स्वरबद्ध किया। पर 1973 में दो फ़िल्में ऐसी आईं जिनमें बतौर गीतकार नक्श लायलपुरी साहब ने कमान सम्भाली। ये फ़िल्में थीं 'प्रभात' और 'दिल की राहें'। फ़िल्म 'प्रभात' में लता के गाये कई गीत थे जिनमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है मुजरा गीत "साक़ीया क़रीब आ, नज़र मिला..."। और फ़िल्म 'दिल की राहें' के गीतों और ग़ज़लों के तो क्या कहने! मन्ना डे और उषा मंगेशकर की युगल आवाज़ों में "अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो, मेरा गीत अमर हो जाये..." और लता मंगेशकर की गायी "रस्म-ए-उल्फ़त..." फ़िल्म की दो श्रेष्ठ रचनायें थीं। इन दो फ़िल्मों के अलावा नक्श साहब ने मदन जी के साथ एक और फ़िल्म के लिए भी गीत लिखे पर वह फ़िल्म नहीं बनी। 

नक्श ल्यायलपुरी और लता
"रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें" ग़ज़ल के बनने की कहानी चौंकाने वाली है। हुआ यूँ कि एक सिचुएशन पर गीत लिखने के लिए मदन मोहन ने नक्श लायलपुरी को एक धुन दे दी थी और नक्श साहब को गीत लिख कर रविवार की सुबह मदन जी के घर ले जाना था। और वह गीत अगले दिन (सोमवार) को रेकॉर्ड होना था क्योंकि लता जी ने डेट दे रखा था। तो नक्श साहब गीत लिख कर मदन मोहन के घर पहुँचे रविवार सुबह 11 बजे। उनका लिखा हुआ गीत मदन जी ने पढ़ा और उनसे कहा कि फ़िल्म के निर्माता (सुल्तान एच. दुर्रानी और एस. कौसर) ने कहा है कि उन्हें अपनी फ़िल्म में मदन मोहन से एक ग़ज़ल चाहिये। अगर मदन मोहन के साथ ग़ज़ल नहीं बनायी तो फिर क्या काम किया, ऐसा निर्माता महोदय ने मदन मोहन से कहा है। तो अब मदन जी भी चाहते हैं कि उसी धुन पर नक्श साहब एक ग़ज़ल लिख दे। अब नक्श साहब मदन जी को ना भी नहीं कह सकते थे, वो दुविधा में पड़ गये। यह तनाव भी था कि अगले ही दिन रेकॉर्ड करना है, अगर लिख ना सके तो क्या होगा! लता जी की डेट बेकार हो जायेगी, वगेरह वगेरह। ये सब सोचते सोचते वो मदन जी के घर से बाहर निकल आये। उन्होंने घड़ी देखा, सुबह के 11 बज रहे थे। उन्होंने सोचा कि अगर वो पेडर रोड से मुलुंड वापस जाकर लिखेंगे तो काफ़ी समय बरबाद हो जायेगा, और फिर वापस भी आना है, इसलिए वो चौपाटी में फुटपाथ के एक कोने में जाकर बैठ गये। और मन ही मन सोचने लगे कि इतने कम समय में लिखें तो लिखें कैसे, गीत को ग़ज़ल बनायें तो बनायें कैसे, इस मुसीबत से निकले तो निकले कैसे? और ये सब सोचते-सोचते उनके मुख से निकल पड़े कि रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे। बस, कलम चलने लगी, कभी रुकती, कभी चलती, कभी वो सोचते, कभी मुस्कुराते, ऐसा करते करते ग़ज़ल पूरी हो गई। और शाम 4 बजे नक्श साहब जा पहुँचे मदन मोहन जी के घर। अगले दिन ग़ज़ल रेकॉर्ड हो गई। लता और मदन मोहन की जोड़ी के ग़ज़लों के बारे में तो सब जानते थे, इस बार नक्श साहब की भी ख़ूब तारीफ़ हुईं। नक्श साहब ने एक मुलाक़ात में बताया था कि बरसों बाद मदन मोहन जी की याद में मुंबई के चेम्बुर में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था जिसमें नक्श साहब को भी आमन्त्रित किया गया था। जब इस ग़ज़ल को बजाया गया, तब किसी ने कहा कि "रस्म-ए-उल्फ़त" के बाद और कोई गाना मत बजाना।

अपने मनचाहे साज़ के साथ मदन जी
मदन मोहन के बारे में गीतकार और शायर नक्श लायल्पुरी के क्या विचार हैं, उन्हीं के शब्दों में पढ़िये - "उनसे मिलने से पहले मैंने जो कुछ भी सुन रखा था मदन मोहन के बारे में, कि वो शॉर्ट-टेम्पर्ड हैं, वगेरह वगेरह, वो सब ग़लत बातें हैं। वो ऐसे पहले संगीतकार थे जिन्होंने मेरे सर पर कभी पहाड़ नहीं रखा। वो गीतकारों और शायरों को छूट देते थे। वो किसी सिटिंग्‍ में ज़्यादा से ज़्यादा 20 मिनट बैठते और मुझे कभी भी किसी गीत को पूरा करने के लिए कभी समय की पाबन्दी नहीं दी। निर्माता जब किसी धुन को सिलेक्ट कर लेते थे, तब मदन जी मुझे बुलाते और समझाते। वो समय के बड़े पाबन्द थे और अगर कोई देर से आया तो वो ग़ुस्सा हो जाते थे। किसी गीत को कम्पोज़ करने के लिए वो 10 मिनट का समय लेते थे। लेकिन जब कोई निर्माता उन्हें साइन करवाने आते तो वो उनसे एक महीने का समय माँग लेते ताकि उन्हें अपना मनपसन्द स्टुडियो, मनपसन्द कलाकार और साज़िन्दों से डेट्स मिल जाये। इन सब चीज़ों के लिए वो किसी की ख़ुशामद करना बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। स्टुडियो, साज़िन्दे और गायक तय हो जाने पर वो पाँच-छह गीत एक के बाद एक रेकॉर्ड कर लेते, एक गीत प्रति दिन के हिसाब से।" नक्श लायलपुरी के उस मुलाक़ात में उन्होंने यह बताया कि मदन मोहन फ़िल्म 'लैला मजनूं' में नक्श साहब को बतौर गीतकार लेना चाहते थे। मदन मोहन साहिर लुधियानवी को नहीं लेना चाहते थे क्योंकि साहिर अपने गीतों में फेर-बदल बिल्कुल पसन्द नहीं करते और उधर मदन मोहन की आदत थी कि हर गीत में कुछ न कुछ फेरबदल कर देते थे। पर 'लैला मजनूं' के निर्माता एच. एस. रवैल साहिर के पक्ष में थे, और मदन जी को झुकना पड़ा क्योंकि उन्हें उस वक़्त पैसों को सख़्त ज़रूरत थी अपने लोनावला के बंगले के निर्माण के लिए। 'लैला मजनूं' के रिलीज़ के बाद मदन मोहन जब नक्श लायलपुरी से मिले तो उनसे कहा कि वो 'लैला मजनूं' से भी बड़े फ़िल्म में नक्श साहब से गीत लिखवायेंगे, पर वह दिन आने से पहले ही मदन जी अचानक इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। उसी मुलाक़ात में जब नक्श साहब से यह पूछा गया कि मदन जी का कौन सा गीत उन्हें सर्वाधिक पसन्द है, तो उन्होंने फ़िल्म 'अनपढ़' के "आपकी नज़रों ने समझा" की तरफ़ इशारा किया। नक्श साहब ने यह भी बताया कि इसी गीत के मीटर पर उन्होंने फ़िल्म 'दिल की राहें' में ही एक गीत लिखा था "आप की बातें करें या अपना अफ़साना कहें, होश में दोनो नहीं हैं किसको दीवाना कहें"। पर "रस्म-ए-उल्फ़त" ही ज़्यादा मशहूर हुआ।

उस्ताद रईस ख़ाँ

मदन मोहन के गीतों में बहुत बार हमें सुन्दर सितार की ध्वनियाँ सुनने को मिली हैं। अन्य गीतों की तरह "रस्म-ए-उल्फ़त" में भी जो सितार के सुरीले पीस बजे हैं, उन्हें बजाया है सितार के उस्ताद रईस ख़ाँ साहब ने। ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और पहली बार सन 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में सितार बजाया था। विविध भारती के लोकप्रिय कार्यक्रम 'उजाले उनकी यादों के' के शीर्षक संगीत में इसी गीत के शुरुआती संगीत का अंश सुनाई देता है जिसे रईस ख़ाँ साहब ने बजाया था। इस गीत के बाद मदन जी के बहुत सारे यादगार गीतों में उन्होंने सितार बजाया और सितार के इन टुकड़ों ने गीतों को सजाने-सँवारने में अलंकार का काम किया। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी टाइमिंग कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लतफ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया हमेशा के लिए। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। नक्श साहब की ख़ुशक़िस्मती थी कि 1973 में 'दिल की राहें' बन गईं और उनकी इस अमर ग़ज़ल को रईस ख़ाँ साहब के सितार ने चार चाँद लगाये। बस इतनी सी थी आज के गीत की दास्तान। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए। गीत आरम्भ होने से पहले मदन मोहन की ही आवाज़ में वह टिप्पणी भी सुनिए जिसका उल्लेख इस आलेख के आरम्भ में किया गया है। गीत के अन्त में उस्ताद रईस खाँ का बजाया सितार पर झाला भी आप सुन सकते हैं।


फिल्म - दिल की राहें : 'रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ तो निभाएँ कैसे...' : गायिका - लता मंगेशकर : संगीत - मदन मोहन : गीत - नक्श लायलपुरी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Monday, August 1, 2011

मैं तो हर मोड पे तुझको दूंगा सदा....दिलों के बीच उभरी नफरत की दीवारों को मिटाने की गुहार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 712/2011/152

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कल से हमने शुरु की है सजीव सारथी की लिखी कविताओं की किताब 'एक पल की उम्र लेकर' से १० चुने हुए कविताओं और उनसे सम्बंधित फ़िल्मी गीतों पर आधारित यह लघु शृंखला। आज इसकी दूसरी कड़ी में प्रस्तुत है कविता 'दीवारें'।

मैं छूना चाहता हूँ तुम्हें
महसूस करना चाहता हूँ
तुम्हारा दिल
पर देखना तो दूर
मैं सुन भी नहीं पाता हूँ तुम्हें
तुम कहीं दूर बैठे हो
सरहदों के पार हो जैसे
कुछ कहते तो हो ज़रूर
पर आवाज़ों को निगल जाती हैं दीवारें
जो रोज़ एक नए नाम की
खड़ी कर देते हैं 'वो' दरमियाँ हमारे

तुम्हारे घर की खिड़की से
आसमाँ अब भी वैसा ही दिखता होगा ना
तुम्हारी रसोई से उठती उस महक को
पहचानती है मेरी भूख अब भी,
तुम्हारी छत पर बैठ कर
वो चाँदनी भर-भर पीना प्यालों में
याद होगी तुम्हें भी
मेरे घर की वो बैठक
जहाँ भूल जाते थे तुम
कलम अपनी
तुम्हारे गले से लग कर
रोना चाहता हूँ फिर मैं
और देखना चाहता हूँ फिर
तुम्हें चहकता हुआ
अपनी ख़ुशियों में
तरस गया हूँ सुनने को
तुम्हारे बच्चों की किलकारियाँ
जाने कितनी सदियाँ से
पर सोचता हूँ तो लगता है
जैसे अभी कल की ही तो बात थी
जब हम तुम पड़ोसी हुआ करते थे
और उन दिनों
हमारे घरों के दरमियाँ भी फ़कत
एक ईंट-पत्थर की
महीन-सी दीवार हुआ करती थी... बस।


दीवारें कभी दो परिवारों, दो घरों के बीच दरार पैदा कर देती हैं, तो कभी दो दिलों के बीच। सचमुच बड़ा परेशान करती हैं ये दीवारें, बड़ा सताती हैं। पर ये भी एक हकीकत है कि चाहे दुनिया कितनी भी दीवारें खड़ी कर दें, चाहे कितने भी पहरे बिठा दें, प्यार के रास्ते पर कितने ही पर्वत-सागर बिछा दें, सच्चा प्यार कभी हार स्वीकार नहीं करता। किसी न किसी रूप में प्यार पनपता है, जवान होता है। लेकिन यह तभी संभव है जब कोशिश दोनों तरफ़ से हों। कभी कभार कई कारणों से दोनों में से कोई एक रिश्ते को आगे नहीं बढ़ा पाता। ऐसे में दूसरे के दिल की आह एक सदा बनकर निकलती है। चाहे कोई सुने न सुने, पर दिल तो पुकारे ही चला जाता है। कई बार राह पर फूल बिछे होने के बावजूद किसी मजबूरी की वजह से कांटे चुनने पड़ते हैं। इससे रिश्ते में ग़लतफ़हमी जन्म लेती है और एक बार शक़ या ग़लतफ़हमी जन्म ले ले तो उससे बचना बहुत मुश्किल हो जाता है। अनिल धवन और रेहाना सुल्तान अभिनीत १९७० की फ़िल्म 'चेतना' में सपन जगमोहन के संगीत में गीतकार नक्श ल्यालपुरी नें भी एक ऐसा ही गीत लिखा था "मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा, मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को तू सुने न सुने"। सजीव जी की कविता 'दीवारें' को पढ़कर सब से पहले इसी गीत की याद आई थी, तो लीजिए इस ख़ूबसूरत कविता के साथ इस ख़ूबसूरत गीत का भी आनन्द लें।



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - फिल्म में प्रमुख अभिनेत्री की दोहरी भूमिका है.
सूत्र २ - इस गीत के भी दो संस्करण हैं, एक युगल और एक एकल, दोनों ही संस्करण में गायक एक ही हैं.
सूत्र ३ - पहले अंतरे की अंतिम पंक्ति में शब्द है - "औंधे"

अब बताएं -
फिल्म की नायिका बताएं - ३ अंक
गायक कौन हैं - २ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
क्षिति जी ने भी अपनी आमद का बिगुल बजा दिया है, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, October 28, 2010

बदरा छाए रे, कारे कारे अरे मितवा...कभी कभी खराब फिल्मांकन अच्छे खासे गीत को ले डूबते हैं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 515/2010/215

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'गीत गड़बड़ी वाले', और इसमें अब तक हमने आपको चार गानें सुनवा चुके हैं जिनमें कोई ना कोई भूल हुई थी, और उस भूल को नज़रंदाज़ कर गाने में रख लिया गया था। दोस्तों, अभी दो दिन पहले ही हमने 'बाप रे बाप' फ़िल्म का गीत सुनवाते वक़्त इस बात का ज़िक्र किया था कि किस तरह से फ़िल्मांकन के ज़रिए आशा जी की ग़लती को गीत का हिस्सा बना दिया था किशोर कुमार ने। लेकिन दोस्तों, अगर फ़िल्मांकन से इस ग़लती को सम्भाल लिया गया है, तो कई बार ऐसे भी हादसे हुए हैं कि फ़िल्मांकन की व्यर्थता की वजह से अच्छे गानें गड्ढे में चले गए। अब आप ही बताइए कि अगर गीत में बात हो रही है काले काले बादलों की, बादलों के गरजने की, पिया मिलन के आस की, लेकिन गाना फ़िल्माया गया हो कड़कते धूप में, वीरान पथरीली पहाड़ियों में, तो इसको आप क्या कहेंगे? जी हाँ, कई गानें ऐसे हुए हैं, जो कम बजट की फ़िल्मों के हैं। क्या होता है कि ऐसे निर्माताओं के पास धन की कमी रहती है, जिसकी वजह से उन्हें विपरीत हालातों में भी शूटिंग् कर लेनी पड़ती है और समझौता करना पड़ता है फ़िल्म के साथ, फ़िल्मांकन के साथ। आज हम आपको एक ऐसा ही गीत सुनवाने जा रहे हैं जिसके फ़िल्मांकन में गम्भीर त्रुटि हुई है। यह गीत है फ़िल्म 'मान जाइए' का, लता मंगेशकर का गाया, नक्श ल्यालपुरी का लिखा, और जयदेव का स्वरबद्ध किया, "बदरा छाए रे, कारे कारे अरे मितवा, छाए रे, अंग लग जा ओ मितवा"। बेहद सुंदर गीत, और क्यों ना हो, जब जयदेव के धुनों को लता जी की आवाज़ मिल जाए, तो इससे सुरीला, इससे मीठा और क्या हो सकता है भला! 'मान जाइए' १९७२ की बी. डी. पाण्डेय की फ़िल्म थी जिसके निर्देशक थे बी. आर. इशारा। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राकेश पाण्डेय, रेहाना सुल्तान, असीत सेन, लीला मिश्र, जलाल आग़ा प्रमुख।

और अब बात करते हैं इस गीत के फ़िल्मांकन के बारे में। मेरा मतलब है फ़िल्मांकन में हुई त्रुटि के बारे में। मैं क्या साहब, ख़ुद नक्श ल्यालपुरी साहब से ही जानिए, जो बहुत नाराज़ हुए थे अपने इस गीत के फ़िल्मांकन को देखने के बाद। बातचीत का जो अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं, वह हुई थी नक्श साहब और विविध भारती के कमल शर्मा के बीच 'उजाले उनकी यादों के कार्यक्रम' में।

नक्श: गाने के पिक्चराइज़ेशन पर भी बहुत कुछ डीपेण्ड करता है। एक खराब पिक्चराइज़ेशन गाने को नुकसान पहुँचा सकता है, गाने को बरबाद कर सकता है।

कमल: क्या ऐसा कोई 'बैड एक्स्पीरिएन्स' आपको हुआ है?

नक्श: एक नहीं, बल्कि बहुत सारे हुए। बहुत बार मेरे साथ हुआ है कि ग़लत पिक्चराइज़ेशन ने मेरे गाने को ख़तम कर दिया है। एक गाना था जिसकी शूटिंग् शिमला में होनी थी। गीत के दो अंतरे थे, जिनमें से एक बगीचे में फ़िल्माया जाना था और दूसरा अंतरा बर्फ़ के उपर जिसमें नायक नायिका को स्केटिंग् करते हुए दिखाये जाना था। तो मैंने उसी तरह से ये दो अंतरे लिखे। लेकिन जब फ़िल्म पूरी हुई और मैंने यह गाना देखा, तो मैं तो हैरान रह गया यह देख कर कि दोनों अंतरों का फ़िल्मांकन बिलकुल उल्टा हुआ है। जो अंतरा बगीचे में फ़िल्माया जाना चाहिए था, उसे बर्फ़ के उपर फ़िल्मा लिया गया। बर्फ़ वाले अंतरे के लिए मैंने लिखा था "पर्वत के दामन में चाँदी के आंगन में डोलते बोलते बदन", लेकिन यह निर्देशक के सर के उपर से निकल गई।

कमल: इस तरह के गड़बड़ी की कोई और मिसाल दे सकते हैं आप?

नक्श: एक गाना था "बदरा छाये रे", जिसके पिक्चराइज़ेशन में ज़रूरत थी बारिश की, हरियाली की। लेकिन फिर वही बात, जब मैंने फ़िल्म देखी, तो मुझे सिवाय सूखी घाँस के चारों तरफ़ और कुछ नज़र नहीं आया। अगर मैं आउटडोर के लिए कोई गाना लिखता हूँ तो आप उसे इनडोर में पिक्चराइज़ नहीं कर सकते। मेरे गीतों में पिक्चराइज़ेशन का बहुत बड़ा हाथ होता है।

दोस्तों, आप भी यू-ट्युब में इस गीत का विडियो देखिएगा, सच में बेहद अफ़सोस की बात है कि चिलचिलाती धूप में, नीले आसमान तले, रूखे वीरान पथरीले पहाड़ों में एक ऐसे गीत की शूटिंग हुई है जिसके बोल हैं "बदरा छाये रे कारे कारे अरे मितवा"। अगर ऐसे फ़िल्मांकन को देख कर गीतकार नाराज़ होता है, तो यह उसका हक़ है नाराज़ होने का। चलिए, फ़िल्मांकन को अब छोड़िए, और सुनिए यह सुमधुर रचना फ़िल्म 'मान जाइए' से।



क्या आप जानते हैं...
कि हिंदी फ़िल्मों में गीत लिखने के अलावा नक्श ल्यालपुरी ने कुल ४६ पंजाबी फ़िल्मों के लिए भी गीत लिखे हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०६ /शृंखला ०२
ये धुन गीत के लंबे प्रील्यूड की है-


अतिरिक्त सूत्र - इस गीत में ये प्रिल्यूड जिसका कुछ हिस्सा हमने सुनवाया, लगभग आधे गीत के बराबर है यानी कि गीत की लम्बाई का करीब आधा हिस्सा प्रिल्यूड में चला जाता है.
सवाल १ - इस फिल्म के नाम जैसा आजकल एक चेवनप्राश भी बाजार में है, नाम बताएं फिल्म का- १ अंक
सवाल २ - आशा किशोर और साथियों के गाये इस गीत के संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्याम कान्त जी दूसरी शृंखला का आधा सफर खतम हुआ है आज, और अभी तक आप आगे हैं ७ अंकों से, अब अगली कड़ी रविवार को होगी. उम्मीद है तब तक आप परीक्षाओं से निपटकर आ पायेंगें, हमारी शुभकामनाएँ लेते जाईये. अमित जी और बिट्टू जी भी बहुत बढ़िया चल रहे हैं. अवध जी गलत हो गए आप इस बार, इंदु जी, तभी तो कहते हैं हमेशा दिल की सुना कीजिये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, August 3, 2010

अहले दिल यूँ भी निभा लेते हैं....नक्श साहब का कलाम और लता की पुरकशिश आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 453/2010/153

ख़य्याम साहब एक ऐसे संगीतकार रहे जिन्होने ना केवल अपने संगीत के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया, बल्कि उन्होनें कभी सस्ते बोल वाले गीतों को स्वरबद्ध करना भी नहीं स्वीकारा। नतीजा यह कि ख़य्याम साहब का हर एक गीत उत्कृष्ट है, क्लासिक है। ख़्य्याम साहब ८० के दशक के उन गिने चुने संगीतकारों में से हैं जिन्होने फ़िल्म संगीत के बदलते तेवर के बावजूद अपने स्तर को बनाए रखते हुए एक से एक नायाब गानें हमें दिए। इसलिए आश्चर्य की बात बिलकुल नहीं है कि हमारी इस शृंखला में कुल १० ग़ज़लों में से ४ ग़ज़लें ख़य्याम साहब की कॊम्पोज़ की हुई हैं। इन चार ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल फ़िल्म 'उमरावजान' से कल आपने सुनी, आज दूसरी ग़ज़ल की बारी। और इस बार आवाज़ आशा जी की बड़ी बहन लता जी की। नक्श ल्यालपुरी साहब का कलाम है और क्या ख़ूब उन्होने लिखा है कि "अहल-ए-दिल यूँ भी निभा लेते हैं, दर्द सीने में छुपा लेते हैं"। आज 'सेहरा में रात फूलों की' शृंखला में इसी ग़ज़ल की बारी। १९८१ की फ़िल्म 'दर्द' की यह ग़ज़ल है। इस फ़िल्म के गीतों की अगर बात करें तो इसमें दो शीर्षक गीत शामिल हैं; एक तो आशा-किशोर का गाया "प्यार का दर्द है, मीठा मीठा प्यारा प्यारा", और दूसरा है यह प्रस्तुत ग़ज़ल। इस ग़ज़ल के भी दो वर्ज़न हैं, पहला लता जी का गाया हुआ और दूसरा भूपेन्द्र की आवाज़ में। ख़य्याम साहब के हिसाब से पहला गीत यंग जेनरेशन के लिहाज़ से बना था, और दूसरा गीत, यानी कि यह ग़ज़ल सीनियर जेनरेशन के लिए बनाया गया था। फ़िल्म 'दर्द' का निर्माण किया था श्याम सुंदर शिवदासानी ने और निर्देशक थे अम्ब्रीश संगल। फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी ३१ जुलाई १९८१ के दिन, जिसके मुख्य कलाकार थे राजेश खन्ना, हेमा मालिनी, पूनम ढिल्लों, कृषण धवन प्रमुख।

नक्श ल्यालपुरी ने ख़य्याम के साथ बहुत सी फ़िल्मों में काम किया है, जैसे कि 'दर्द', 'आहिस्ता आहिस्ता', 'ख़ानदान', 'नूरी', आदि। जब नक्श साहब को विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में ख़य्याम साहब के बारे में पूछा गया, तो और बातों ही बातों में फ़िल्म 'दर्द' का भी ज़िक्र आया था। आइए उसी मुलाक़ात का एक अंश यहाँ पढ़ते हैं -

प्र: ख़य्याम साहब से जुड़ी कोई यादगार घटना याद है आपको?

उ: फ़िल्म 'दर्द' में एक गाना था "न जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया", इस गीत के लिए जब मैंने मुखड़ा फ़ाइनलाइज़ किया तो ख़य्याम साहब बोले कि यह तो अंतरे का मीटर है, आपने इसे मुखड़ा बना दिया! मैंने कहा कि सभी को पसंद आ गया और यह भी अच्छा बन सकता है। जब यह गाना बना तो राजेश खन्ना हर एक को यह गाना पूरे एक महीने तक सुनवाते रहे।

प्र: ख़य्याम साहब का कौन सा गीत आपको सब से ज़्यादा पसंद है?

उ: "बहारों मेरा जीवन भी संवारो", 'आख़िरी ख़त' फ़िल्म का यह गीत मेरा फ़ेवरीट है। फिर 'शगुन', 'फिर सुबह होगी' और 'उमरावजान' के गानें भी मुझे बेहद पसंद है।

प्र: ख़य्याम साहब आज भी ऐक्टिव हैं फ़िल्म जगत में।

उ: जी हाँ, भगवान उन्हे लम्बी उम्र दे!

तो दोस्तों, यह तो रही नक्श ल्यालपुरी से कमल शर्मा की बातचीत का एक छोटा सा अंश जिसमें ज़िक्र छिड़ा था ख़य्याम साहब का। आइए अब इस प्यारी सी ग़ज़ल को सुना जाए लता जी की शहद घोलती आवाज़ में, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के कुल ७ शेर ...

लता वर्ज़न:

अहल-ए-दिल युं भी निभा लेते हैं,
दर्द सीने में छुपा लेते हैं।

दिल की महफ़िल में उजालों के लिए,
याद की शम्मा जला लेते हैं।

जलते मौसम में भी ये दीवाने,
कुछ हसीं फूल खिला लेते हैं।

अपनी आँखों को बनाकर ये ज़ुबाँ,
कितने अफ़सानें सुना लेते हैं।

जिनको जीना है मोहब्बत के लिए,
अपनी हस्ती को मिटा लेते हैं।

भूपेन्द्र वर्ज़न:

अहल-ए-दिल युं भी निभा लेते हैं,
दर्द सीने में छुपा लेते हैं।

ज़ख़्म जैसे भी मिले ज़ख़्मों से,
दिल के दामन को सजा लेते हैं।

अपने क़दमों पे मुहब्बत वाले,
आसमानों को झुका लेते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि नक्श ल्यालपुरी ने फ़िल्मों के लिए करीब करीब ६० मुजरे लिखे हैं और हर एक का अंदाज़ एक दूसरे से अलग रहा। यह बात उन्होने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहा था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. मतले की पहली पंक्ति में शब्द है "खुदा", शायर बताएं - ३ अंक.
२. कल इस महान गायक की जयंती है, नाम बताये - १ अंक.
३. १९८५ में प्रदर्शित इस फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
४. इस संगीतकार को भी कल हम पहली बात ओल्ड इस गोल्ड में सुनेंगे, जिन्हें सामानांतर फिल्मों के संगीतकार के रूप में अधिक जाना जाता है, कौन हैं ये कमाल के संगीतकार - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी आपने ओ सवालों के जवाब दे डाले, इसलिए आपको नक् नहीं मिल पायेंगें, पर आपने एक खूबसूरत याद को हमारे साथ शेयर किया, वाकई वो दिन भी कुछ खास थे, शरद जी, और पवन जी सही जवाबों के लिए बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, February 22, 2010

ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे...पूछते हैं तलत साहब नक्श की इस गज़ल में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 353/2010/53

ह है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल और आप इन दिनों इस पर सुन रहे हैं तलत महमूद साहब पर केन्द्रित शृंखला 'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़'। तलत साहब की गाई ग़ज़लों के अलावा इसमें हम आपको उनके जीवन से जुड़ी बातें भी बता रहे हैं। कल हमने आपको उनके शुरुआती दिनों का हाल बताया था, आइए आज उनके शब्दों में जानें कि कैसा था उनका पहला पहला अनुभव बतौर अभिनेता। ये उन्होने विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में कहे थे। "कानन देवी, एक और महान फ़नकार। उनके साथ मैंने न्यु थिएटर्स की फ़िल्म 'राजलक्ष्मी' में एक छोटा सा रोल किया थ। उस फ़िल्म में एक रोल था जिसमें उस चरित्र को एक गाना भी गाना था। निर्देशक साहब ने कहा कि आप तो गाते हैं, आप ही यह रोल कर लीजिये। मं अगले दिन ख़ूब शेव करके, दाढ़ी बनाकर सेट पर पहुँच, और तब मुझे पता चला कि दरसल रोल साधू का है। मेक-अप मैन आकर मेरा पूरा चेहरा सफ़ेद दाढ़ी से ढक दिया। जब गोंद सूखने लगा तो चेहरा इतना खिंचने लगा कि मुझसे मुंह भी खोला नहीं जा रहा था। निर्देशक साहब ने कहा कि ज़रा मुंह खोल कर तो गाओ! मुझे उन पर बड़ा ग़ुस्सा आया और दिल किया कि दाढ़ी उतार कर फेंक दूँ। तभी वहाँ आ पहुँची कानन देवी और मैं अपने आप को संभाल लिया।" दोस्तों, थी यह एक मज़ेदार क़िस्सा। 'राजलक्ष्मी' तलत महमूद साहब की पहली फ़िल्म थी बतौर अभिनेता और गायक। साल था १९४५। इसके बाद उन्होने १२ और फ़िल्मों में अभिनय किया जिनकी फ़ेहरिस्त इस प्रकार है - तुम और मैं ('४७), समाप्ति ('४९), आराम ('५१), दिल-ए-नादान ('५३), डाक बाबू ('५४), वारिस ('५४), रफ़्तार ('५५), दिवाली की रात ('५६), एक गाँव की कहानी ('५७), लाला रुख़ ('५८), मालिक ('५८) और सोने की चिड़िया ('५८)। आज के अंक के लिए हमने जिस ग़ज़ल को चुना है वह है १९५६ की फ़िल्म 'दिवाली की रात' का। "ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे, हर ख़ुशी रोती नज़र आई मुझे"। नक्श ल्यालपुरी का क़लाम और मौसिक़ी कमचर्चित संगीतकार स्नेहल भाटकर की।

'दिवाली की रात' फ़िल्म में तलत महमूद साहब के साथ पर्दे पर नज़र आईं रूपमाला और शशिकला। फ़िल्म के निर्मता थे विशनदास सप्रू और राम रसीला, तथा निर्देशक थे दीपक आशा। प्रस्तुत ग़ज़ल के शायर नक्श ल्यायलपुरी के अलावा इस फ़िल्म के गानें लिखे मधुकर राजस्थानी ने। आपको यहाँ बताना चाहेंगे कि नक्श साहब ने फ़िल्मी दुनिया में बतौर गीतकार क़दम रखा था सन् १९५२ में जगदीश सेठी की फ़िल्म 'जग्गू' में, जिसमें उन्होने एक कैबरे गीत लिखा था। जसवंत राय के नाम से पंजाब के ल्यायलपुर में जन्मे नक्श साहब अपने स्कूली दिनों से ही लिखने में प्रतिभा रखते थे। उनके उर्दू टीचर परीक्षाओं के बाद उनकी कॊपियाँ अपने पास रख लेते थे, नोट्स के लिए नहीं बल्कि उन शेरों और कविताओं के लिए जो आख़िरी पन्नों पर वो लिखा करते थे। नक्श साहब की यह प्रतिभा परवान चढ़ती गई और वो स्कूल से कॊलेज में दाख़िल हुए। देश के बंटवारे के बाद वो अपने परिवार के साथ लखनऊ आ गए, लेकिन उनकी सृजनात्मक पिपासा और उनकी बेरोज़गारी ने उन्हे लखनऊ छोड़ बम्बई चले जाने पर मजबूर किया। उस समय उनकी आयु १९ वर्ष की थी और साल था १९५१। बम्बई के वो शुरुआती बहुत सुखद नहीं थे। लेकिन उन्हे कुछ राहत मिली जब डाक-तार विभाग में उन्हे एक नौकरी मिल गई। लेकिन उनके जैसे प्रतिभाशाली इंसान की वह जगह नहीं थी। बहरहाल वहाँ पर उन्होने कुच दोस्त बनाए और उन्ही दोस्तों के आग्रह पर उन्होने एक नाटक लिखा 'तड़प', जो उनके लिए फ़िल्म जगत में दाख़िले के लिए मददगार साबित हुआ। राम मोहन, जो उस नाटक के नायक थे और फ़िल्मकार जगदीश सेठी के सहायक भी, नक्श साहब को सेठी साहब के पास ले गए, और इस तरह से उन्हे फ़िल्म 'जग्गू' में गीत लिखने का मौका मिला और हिंदी फ़िल्म जगत में उनकी एंट्री हो गई। नक्श साहब की बातें आगे भी जारी रहेंगे, फ़िल्हाल सुना जाए तलत साहब की मख़मली आवाज़, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के चार शेर।

ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे,
हर ख़ुशी रोती नज़र आई मुझे।

जिनके दामन में सुहाने ख़्वाब थे,
फिर उन्ही रातों की याद आई मुझे।

हो गई वीरान महफ़िल प्यार की,
ये फ़िज़ा भी रास ना आई मुझे।

छीन कर मुझसे मेरे होश-ओ-हवास,
अब जहाँ कहता है सौदाई मुझे।



क्या आप जानते हैं...
तलत महमूद की फ़िल्म 'दिल-ए-नादान' के हीरोइन की तलाश के लिए ए. आर. कारदार ने 'ऒल इंडिया बिउटी कॊंटेस्ट' का आयोजन किया जिसे प्रायोजित किया उस ज़माने की मशहूर टूथपेस्ट कंपनी 'कोलीनोस' ने। इस कॊंटेस्ट की विजेयता बनीं पीस कंवल (Peace Kanwal), जो नज़र आए तलत साहब के साथ 'दिल-ए-नादान' में।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. तलत की गाई इस ग़ज़ल के मतले में शब्द है- "नवाज़िश", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. कौन हैं इस गज़ल के शायर- २ अंक.
3. नानुभाई वकील निर्देशित इस फिल्म के संगीतकार का नाम बताएं जो बेहद कमचर्चित ही रहे- २ अंक.
4. एक और मकबूल संगीतकार का भी नाम जुड़ा है इस गीत के साथ उनका भी नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी, आप बड़ी हैं, कुछ विपक्ष में कहने की हिम्मत नहीं होती, इसलिए अपनी जान बचने की खातिर हम ये इलज़ाम शरद जी के सर डाल देते हैं, दरअसल उनका सुझाव था और इससे हमें भी इत्तेफाक है कि यदि सारे जवाब आ जाते हैं तो बाकी श्रोता मूक दर्शक बने रहते हैं, और हमारा उद्देश्य सबकी भागीदारी है, वैसे कल के सवाल का कोई सही जवाब नहीं आया. अवध जी बहुत दिनों में आये और जवाब दिए बिना चले गए. :), खैर आज सही

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, June 24, 2009

रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे- लता का सवाल, नक्श ल्यालपुरी का कलाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 121

ता मंगेशकर की आवाज़ में मदन मोहन के संगीत से सजी हुई ग़ज़लें हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाते हैं। यूँ तो ये ग़ज़लें ज़्यादातर राजा मेहंदी अली ख़ान, राजेन्द्र कृष्ण, और कुछ हद तक कैफ़ी आज़्मी ने लिखे थे, लेकिन एक फ़िल्म ऐसी भी रही है जिसमें मदन साहब की तर्ज़ पर इनमें से किसी ने भी नहीं बल्कि गीतकार नक्श ल्यालपुरी ने कम से कम दो बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़लें लिखी हैं। यह फ़िल्म थी 'दिल की राहें' और आज इस महफ़िल में पेश-ए-ख़िदमत है इसी फ़िल्म से एक बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल लताजी की आवाज़ में। 'दिल की राहें' बनी थी सन् १९७३ में जिसका निर्माण किया था एस. कौसर ने। बी. आर. इशारा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे राकेश पाण्डेय, रेहाना सुल्तान, और दिलीप दत्त प्रमुख। छोटी बजट की फ़िल्म थी और फ़िल्म नहीं चली, लेकिन आज अगर इस फ़िल्म को कोई याद करता है तो १००% इसके गीत संगीत की वजह से। मदन मोहन के जादूई संगीत, गीतकार और शायर नक्श ल्यालपुरी के पुर-असर अल्फ़ाज़, तथा लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर और मन्ना डे के मधुर आवाज़ों ने इस फ़िल्म के गीतों को एक अलग ही बुलंदी तक पहुँचा दिया था। लताजी के गाये ग़ज़लों के अलावा इस फ़िल्म में मन्ना डे और उषा जी की आवाज़ों में "अपने सुरों में मेरे सुरों को बसा लो यह गीत अमर हो जाये" भी सचमुच आज अमर हो गया है। जब हम दर्द में डूबे हुए नग़मों की बात करते हैं तो मदन मोहन का नाम यकायक ज़हन में आ जाता है। उनके बनाये फ़िल्मी ग़ज़लों को सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे ये इस धरती पर नहीं बल्कि जन्नत में बनाये गये हों। गीतकारों और गायकों का भी उतना ही योगदान रहा है उनकी तर्ज़ों को यादगार बनाने में। गीतकार नक्श ल्यालपुरी ने मदन मोहन के साथ तीन फ़िल्मों में काम किया था - एक तो था 'दिल की राहें', दूसरी 'प्रभात', और तीसरी फ़िल्म अधूरी ही रह गयी थी।

अभी हाल ही में नक्श ल्यालपुरी तशरीफ़ लाये थे विविध भारती के स्टुडियो में 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम के लिए। उसमें उन्होने इस ग़ज़ल के बनने की कहानी बतायी थी। पेश है उन्ही के शब्दों में इस ग़ज़ल के बनने की दास्तान - "मैने एक गीत रविवार को लिखा था जिसे सोमवार को रिकार्ड होना था। लता जी ने डेट दिया हुआ था। तो मैं गीत लेकर मदन मोहन साहब के पास गया तो पता चला कि फ़िल्म के निर्माता चाहते हैं कि गीत के बदले कोई ग़ज़ल हो। उनका कहना था कि अगर मदन मोहन के साथ ग़ज़ल नहीं बनायी तो फिर क्या काम किया! मैने गीत लिखा था, मदन साहब चाहते थे कि मैं उसी धुन पर कोई ग़ज़ल लिख दूँ। उस वक़्त ११ बज रहे थे। मैने सोचा कि अगर मैं पेडर रोड से मुलुंड तक वापस जाऊँगा तो उसमें काफ़ी वक़्त निकल जायेगा। इसलिए मैं मदन साहब के घर से निकलकर चौपाटी में फुटपाथ के एक कोने में बैठ गया और लिखने लगा। मैने ग़ज़ल पूरी की और मदन साहब के दरवाज़े पर ठीक शाम ४ बजे पहुँच गया। और यह ग़ज़ल थी "रस्म-ए-उल्फ़त को निभायें तो निभायें कैसे"। दोस्तों, देखा आप ने कि फुटपाथ के कोने में बैठकर किस अमर ग़ज़ल की रचना की थी नक्श साहब ने! नक्श साहब ने मदन साहब के बारे में और भी कई बातें बतायी हैं उसी कार्यक्रम में जिन्हे हम आगे चलकर इस शृंखला में आप के साथ बाँटने वाले हैं, फिलहाल सुनिये इस ग़ज़ल को, जो लेखन, संगीत और गायिकी के लिहाज़ से उत्कृष्ट है, अद्वितीय है, बेजोड़ है, बेमिसाल है!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. तीन भाईयों ने अपनी अदाकारी से सजाया इस फिल्म को.
२. नायिका थी मधुबाला.
३. मुखड़े में शब्द है "चीन".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
भई मुकाबला हो तो ऐसा. एक बार फिर शरद जी और स्वप्न मंजूषा जी एक साथ सही जवाब के साथ. स्वप्न जी १६ अंकों पर हैं पर शरद जी अभी भी बढ़त कायम रखे है २२ अंकों के साथ. पराग जी, दिलीप जी, मनु जी, रचना जी, सुमित जी, राज जी और स्वप्न मंजूषा जी हमारा हौंसला बढ़ाने के लिए आप सब का धन्येवाद.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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