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Sunday, March 11, 2018

राग कलावती : SWARGOSHTHI – 360 : RAG KALAVATI




स्वरगोष्ठी – 360 में आज

पाँच स्वर के राग – 8 : “मैका पिया बुलावे अपने मन्दिरवा...”

विदुषी गंगूबाई हंगल से राग कलावती की बन्दिश और लता मंगेशकर व सुरेश वाडकर से फिल्म का गीत सुनिए





विदुषी गंगूबाई हंगल
सुरेश वाडकर और लता मंगेशकर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वरों के शुद्ध स्वर की श्रुति से नीचे की श्रुति पर कोमल स्वर का स्थान होता है। इसी प्रकार शुद्ध मध्यम से ऊपर की श्रुति पर तीव्र मध्यम स्वर का स्थान होता है। संगीत के इन्हीं सात स्वरों के संयोजन से रागों का आकार ग्रहण होता है। किसी राग की रचना के लिए कम से कम पाँच और अधिक से अधिक सात स्वर की आवश्यकता होती है। जिन रागों में केवल पाँच स्वर का प्रयोग होता है, उन्हें औड़व जाति, जिन रागों में छः स्वर होते हैं उन्हें षाडव जाति और जिनमें सातो स्वर प्रयोग हों उन्हें सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। रागों की जातियों का वर्गीकरण राग के आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या के अनुसार कुल नौ जातियों में किया जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऐसे रागों को औड़व-औड़व जाति का राग कहा जाता है। श्रृंखला की आठवीं कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग कलावती का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही विदुषी गंगूबाई हंगल के स्वरों में प्रस्तुत राग कलावती की एक बन्दिश के माध्यम से हम राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। राग कलावती के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग कलावती के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1985 में प्रदर्शित फिल्म “सुर संगम” से लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का स्वरबद्ध किया एक गीत –“मैका पिया बुलावे अपने मन्दिरवा...” लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर के स्वर में सुनवा रहे हैं।



आज के अंक में हम पाँच स्वरों वाले एक और प्रचलित राग, कलावती पर आपसे चर्चा करेंगे और इस राग में दो उदाहरण भी प्रस्तुत करेंगे। पिछले अंक में हमने 1985 में प्रदर्शित फिल्म “उत्सव” से संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का राग विभास पर आधारीर एक गीत प्रस्तुत किया था। आज के अंक में भी हमने 1985 की ही दूसरी फिल्म “सुर संगम” से एक गीत चुना है। परन्तु इस गीत का राग विभास नहीं बल्कि राग कलावती है। फिल्म “सुर संगम” एक महान संगीतज्ञ के आदर्श जीवन पर आधारित है। फिल्म में संगीत-शिक्षण की प्राचीन गुरु-शिष्य परम्परा को भी रेखांकित किया गया है। एक संगीतज्ञ के जीवन पर केन्द्रित होने के कारण लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के लिए गीतों में विभिन्न रागों के समावेश की चुनौती थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि उन्होने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होने संगीतज्ञ के केन्द्रीय चरित्र के लिए सुविख्यात युगल गायक पण्डित राजन साजन मिश्र बन्धु के बड़े भाई पण्डित राजन मिश्र के स्वर का चयन किया। फिल्म के अन्य पुरुष चरित्र के लिए सुरेश वाडकर, स्त्री चरित्र के लिए लता मंगेशकर और बाल कलाकार के लिए दक्षिण भारत की गायिका पी. सुशीला की आवाज़ को चुना। फिल्म “सुर संगम” से लिया गया आज का गीत राग कलावती के स्वरों पर आधारित है। फिल्म में यह गीत संगीतज्ञ की बेटी और उनके होने वाले दामाद पर फिल्माया गया है। स्वर दिया है, लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर ने। गीतकार वसन्त देव और संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल हैं।

राग कलावती : “मैका पिया बुलावे अपने मन्दिरवा...” : लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर : फिल्म – सुर संगम


कलावती रे म वर्जित, कोमल लेत निषाद,
मध्यरात्रि में गाइए, प स का है संवाद।
राग कलावती को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और मध्यम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। इसीलिए राग की जाति औड़व-औड़व होती है। राग कलावती में निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है और शेष स्वर शुद्ध होते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर और मध्यरात्रि माना जाता है। यह कर्नाटक पद्धति का राग है, जो अब उत्तर भारतीय संगीत में पर्याप्त लोकप्रिय राग हो गया है। उत्तर भारतीय संगीत पद्धति के स्वरों के अनुसार राग झिंझोटी में ऋषभ और मध्यम स्वर वर्जित कर देने से राग कलावती की रचना होती है। आरोह में कोमल निषाद स्वर का वक्र प्रयोग किया जाता है, किन्तु अवरोह में सीधा प्रयोग किया जाता है। ग, प, ग, सा, के प्रयोग से राग शंकरा का आभास होता है, किन्तु कोमल निषाद और धैवत के दीर्घ प्रयोग से राग कलावती का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। राग कलावती का समप्रकृति राग जनसम्मोहिनी होता है। राग कलावती का शास्त्रीय स्वरूप समझने के लिए अब हम आपको किराना घराने की सुविख्यात गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के स्वर में इस राग की एक रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी सप्ताह 5 मार्च को इस महान गायिका का 106वाँ जन्मदिन मनाया गया है। पद्मविभूषण सम्मान से अलंकृत विदुषी गांगूबाई हंगल के स्वर में अब आप तीनताल में निबद्ध यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग कलावती : “बोलन लागी कोयलिया...” : विदुषी गंगूबाई हंगल



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 360वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस प्रसिद्ध गायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 17 मार्च, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 362वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 358वीं कड़ी में हमने आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म “उत्सव” के एक रागबद्ध फिल्मी गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – विभास, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – सुरेश वाडकर

“स्वरगोष्ठी” की पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, राजस्थान से हमारी एक पुरानी पाठक चित्तौड़गढ़, राजस्थान से इन्दुपुरी गोस्वामी, हमारी एक नई पाठक आशा भानप और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” की आठवीं कड़ी में आपने राग कलावती का परिचय प्राप्त किया। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने लिए विदुषी गंगूबाई हंगल से एक खयाल रचना का रसास्वादन किया था। साथ ही आपने फिल्म “सुर संगम” से राग कलावती के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। अगले अंक में पाँच स्वर के एक अन्य राग पर आपसे चर्चा करेंगे। इस नई श्रृंखला “पाँच स्वर के राग” अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, November 2, 2014

वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : SWARGOSHTHI – 192 : RAG BHIMPALASI


स्वरगोष्ठी – 192 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 1 : राग भीमपलासी

संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास और गायिका सरस्वती राणे की जोड़ी ने राग भीमपलासी के स्वरों में रचा एक मधुर गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई लघु श्रृंखला आरम्भ कर रहे है। इस श्रृंखला का शीर्षक है- ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम आपसे 1943 की फिल्म ‘रामराज्य’ के एक गीत- ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ की चर्चा करेंगे। इस गीत का सृजन अपने समय की दो दिग्गज सांगीतिक विभूतियों, संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास और किराना घराने की चर्चित गायिका सरस्वती राणे द्वारा हुआ था। राग भीमपलासी के फिल्मी प्रयोग का यह एक अच्छा उदाहरण है। इसके साथ ही राग भीमपलासी स्वरूप को समझने के लिए इस अंक में हम आपको शीर्षस्थ गायिका गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की एक मोहक रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 
 


हात्मा गाँधी ने अपने जीवनकाल में एकमात्र फिल्म ‘रामराज्य’ देखी थी। 1943 में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रकाश पिक्चर्स ने किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक अपने समय के जाने-माने संगीतज्ञ पण्डित शंकरराव व्यास थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, व्यासजी की कुशलता केवल फिल्म संगीत निर्देशन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय गायन, संगीत शिक्षण और ग्रन्थकार के रूप में भी सुरभित हुई। फिल्म ‘रामराज्य’ में पण्डित जी ने राग भीमपलासी के स्वरों में एक गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ संगीतबद्ध किया था। इस गीत को किराना घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की सुपुत्री और सुप्रसिद्ध गायिका सरस्वती राणे ने स्वर दिया था। आज पहले हम इस गीत के संगीतकार पण्डित शंकरराव व्यास और उसके बाद विदुषी सरस्वती राणे के व्यक्तित्व-कृतित्व पर चर्चा करेंगे।

शंकरराव व्यास 
कोल्हापुर में 23 जनवरी, 1898 को पुरोहितों के परिवार में जन्मे शंकरराव व्यास के पिता गणेश पन्त, कथावाचक के साथ-साथ संगीत-प्रेमी भी थे। संगीत के संस्कार उन्हें अपने पिता से ही प्राप्त हुए। दुर्भाग्यवश जब शंकरराव आठ वर्ष के थे तब उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के देहान्त के बाद वे अपने चाचा श्रीकृष्ण सरस्वती के आश्रित हुए। उन्हीं दिनों पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर भारतीय संगीत को उसकी दयनीय स्थिति से उबारने के लिए पूरे महाराष्ट्र में भ्रमण कर रहे थे और उनकी अगली योजना पूरे देश में संगीत के प्रचार-प्रसार की थी। बालक शंकरराव के संगीत-ज्ञान और उत्साह देख कर पलुस्कर जी ने उन्हें अपने साथ ले लिया। पलुस्कर जी द्वारा स्थापित गान्धर्व विद्यालय में ही उन्होने ९ वर्ष तक संगीत शिक्षा प्राप्त की और अहमदाबाद के राष्ट्रीय विद्यालय में संगीत शिक्षक हो गए। इसी बीच पलुस्कर जी ने लाहौर में संगीत विद्यालय की स्थापना की और शंकरराव को वहीं प्रधानाचार्य के पद पर बुला लिया। लाहौर में संगीत विद्यालय विधिवत स्थापित हो जाने और सुचारु रूप से संचालित होने के बाद वे अहमदाबाद आए और यहाँ भी ‘गुजरात संगीत विद्यालय’ की स्थापना की। 1934 में उन्होने गन्धर्व संगीत महाविद्यालय स्थापित किया। इस बीच उन्होने संगीत शिक्षण के साथ-साथ संगीत सम्मेलनों में भाग लेना भी जारी रखा।

1938 में 40 वर्ष की आयु में शंकरराव व्यास ने फिल्म संगीत के क्षेत्र में पदार्पण किया। 1938 में रमणलाल बसन्तलाल के उपन्यास पर बनी फिल्म ‘पूर्णिमा’ में कई गीत गाये थे। गायन के साथ-साथ फिल्मों की संगीत रचना के क्षेत्र में भी उनका वर्चस्व कायम हो चुका था। व्यास जी के संगीतबद्ध, भक्ति प्रधान और नीति पधान गीत गली-गली गूँजने लगे थे। 1940 में ‘सरदार’, ‘नरसी भगत’ और 1942 में ‘भरतमिलाप’ फिल्मों के गीत लोकप्रियता के शिखर पर थे। इसी समय 1943 में प्रकाश पिक्चर्स की फिल्म ‘रामराज्य’ प्रदर्शित हुई थी। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौर में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ में दर्शकों को गाँधीवादी रामराज्य की परिकल्पना परिलक्षित हो रही थी। इस फिल्म के राग आधारित गीत भी अत्यन्त जनप्रिय हुए थे, विशेष रूप से फिल्म में लव और कुश चरित्रों पर फिल्माया गया गीत ‘भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं...’ और राजमहल में फिल्माया गया गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’। पण्डित शंकरराव व्यास ने इन दोनों गीतों को क्रमशः काफी और भीमपलासी के स्वरों में बाँधा था। आज हमारी चर्चा में रमेश चन्द्र गुप्ता के लिखे, शंकरराव व्यास के संगीतबद्ध किए और सरस्वती राणे के गाये गीत ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ ही है। आइए, पहले हम यह गीत सुनते हैं।


राग भीमपलासी : ‘वीणा मधुर मधुर कछु बोल...’ : फिल्म – रामराज्य : स्वर – सरस्वती राणे : संगीत – पण्डित शंकरराव व्यास





सरस्वती राणे 
अभी आपने जो गीत सुना वह अपने समय की विख्यात गायिका सरस्वती राणे के स्वरों में था। इनका जन्म 4 अक्टूबर, 1913 को महाराष्ट्र के मिरज में हुआ था। किराना घराने के संस्थापक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ और तारा बाई की सन्तान सरस्वती राणे को संगीत विरासत में मिला था। 1930 में पति से अलग होने के बाद तारा बाई ने अपने पाँच सन्तानों का स्वयं पालन-पोषण किया। सरस्वती ने अपने पिता से प्राप्त संगीत शिक्षा को अपने बड़े भाई सुरेशबाबू माने और बड़ी बहन हीराबाई बड़ोदकर के मार्गदर्शन से आगे बढ़ाया। उन दिनों संगीत के मंचों पर हीराबाई और सरस्वती के जुगलबन्दी प्रस्तुतियाँ खूब चर्चित हो गई थी। सरस्वती राणे का मंच-पदार्पण सात वर्ष की आयु में संगीत प्रधान नाटकों के माध्यम से हुआ था। 1929 में मराठी रंगमंच के सितारे बालगन्धर्व जैसे कलाकारों के साथ अभिनय और गाने का उन्हें अवसर मिला। 1933 से रेडियो पर गाने का अवसर मिला जो 1990 तक जारी रहा। 1943 में जब उन्होने फिल्म ‘रामराज्य’ के लिए पार्श्वगायन किया था, उस समय सरस्वती राणे लोकप्रियता के शिखर पर थीं।

राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, (कोमल), म, प, नि (कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि (कोमल), ध, प, म (कोमल), रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। ‘भीमपलासी’ के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है।

गंगूबाई हंगल 

आइए, अब हम आपको राग भीमपलासी की ही एक आकर्षक बन्दिश सुनवाते हैं। यह किराना घराने की गायकी में शीर्षस्थ विदुषी गंगूबाई हंगल की एक रिकार्डिंग है। 5 मार्च, 1913 को धारवाड़, कर्नाटक में उनका जन्म हुआ था। बाल्यावस्था में उन्हें अपनी माँ से दक्षिण भारतीय संगीत पद्यति की शिक्षा मिली। 1928 में उनका परिवार हुबली स्थानान्तरित हो गया। जाने-माने संगीतविद् सवाई गन्धर्व से उत्तर भारतीय संगीत में दक्षता प्राप्त करने से पूर्व किन्नरी वीणा वादक कृष्ण आचार्य और दत्तोपन्त देसाई से संगीत की शिक्षा ग्रहण की थी। पण्डित भीमसेन जोशी इनके गुरूभाई थे। गंगूबाई हंगल ने संगीत को आत्मसात करने के लिए कठिन साधना की थी। भारत के उच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से 1971 में और ‘पद्मविभूषण’ से 2002 में अलंकृत किया गया था। 21 जुलाई, 2009 को इस महान गायिका का हुबली में निधन हुआ था। अब आप विदुषी गंगूबाई हंगल की आवाज़ में राग भीमपलासी की यह खयाल रचना सुनिए। इस प्रस्तुति में उनके गायन में उनकी सुपुत्री कृष्णा हंगल ने सहयोग किया है। आप राग भीमपलासी का रसास्वादन कीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : ‘गरवा हरवा डारो री...’ : विदुषी गंगूबाई हंगल : तीनताल 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 192वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छः दशक से भी पहले की एक फिल्म के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग का आभास होता है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 194वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 190वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी राग भैरवी की ठुमरी ‘रस के भरे तोरे नैन...’ का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी गिरिजा देवी। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से नई लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ आरम्भ हुई है। पहले की तरह इस श्रृंखला के बारे में भी आपके सुझाव आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हों, हमे आविलम्ब लिखें। आप अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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