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Sunday, February 21, 2016

राग गौड़ सारंग : SWARGOSHTHI – 258 : RAG GAUR SARANG


स्वरगोष्ठी – 258 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 6 : राग गौड़ सारंग

इस राग में सुनिए पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास की रचनाएँ




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की छ्ठी कड़ी में आज हम राग गौड़ सारंग के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी पर राग गौड़ सारंग की के स्वर में एक अनूठी रचना सुनेगे, और फिर इसी राग के स्वरों में पिरोया 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ का एक गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।

स श्रृंखला में अभी तक आपने जो राग सुने हैं, वह सभी कल्याण थाट के राग माने जाते हैं और इन्हें रात्रि के पहले प्रहर में ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। दोनों मध्यम स्वर स्वर से युक्त आज का राग, ‘गौड़ सारंग’ भी कल्याण थाट का माना जाता है, किन्तु इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का प्रथम प्रहर नहीं बल्कि दिन का दूसरा प्रहर होता है। राग गौड़ सारंग में दोनों मध्यम के अलावा सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं, इसीलिए इसे सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। परन्तु इसमे आरोह और अवरोह के सभी स्वर वक्र प्रयोग किये जाते है, इसलिए इसे वक्र सम्पूर्ण जाति का राग माना जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है।

पन्नालाल घोष
प्राचीन ग्रन्थकार राग कामोद, केदार और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग को भी बिलावल थाट का राग मानते थे, क्योंकि तब इस राग में तीव्र मध्यम स्वर प्रयोग नहीं किया जाता था। परन्तु जब से इन रागों में दोनों मध्यम का प्रयोग होने लगा, तब से इन्हें कल्याण थाट का राग माना जाने लगा। राग गौड़ सारंग के आरोह और अवरोह में तीव्र मध्यम स्वर का अल्प प्रयोग केवल पंचम स्वर के साथ किया जाता है। शुद्ध मध्यम स्वर आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। राग की रंजकता को बढ़ाने के लिए कभी-कभी अवरोह में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग राग केदार और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग में भी किया जाता है। इस राग का चलन वक्र होता है। किन्तु तानों में वक्रता कम की जाती है। राग गौड़ सारंग का उदाहरण हम आपको बाँसुरी पर सुनवाएँगे। बाँसुरी वाद्य को शास्त्रीय मंच पर प्रतिष्ठित कराने वाले सुविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष से अब हम इस राग में निबद्ध एक मनोहारी रचना सुनवा रहे हैं। 24 जुलाई, 1911 को अविभाजित भारत के बारिसाल, पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्में पन्नालाल घोष का एक और नाम था, अमलज्योति घोष। परन्तु अपने संगीतज्ञ जीवन में वह अपने पुकारने के नाम से ही विख्यात हुए। इनके पिता अक्षय कुमार घोष स्वयं एक संगीतज्ञ थे और सितार बजाते थे। पन्ना बाबू को बचपन में अपने पिता से ही सितार वादन की शिक्षा मिली थी। जब वे कुछ बड़े हुए तो उनके हाथ कहीं से एक बाँसुरी मिल गई। उन्होने बाँसुरी पर अपने सितार पर सीखे हुए तंत्रकारी कौशल की नकल करना शुरू किया। एक बार एक सन्यासी ने सुन कर बालक पन्नालाल को भविष्य में महान बाँसुरी वादक बनने का आशीर्वाद दिया। आगे चल कर शास्त्रीय संगीत के मंच पर उन्होने बाँसुरी वाद्य को प्रतिष्ठा दिलाई। लीजिए, अब आप पण्डित पन्नालाल घोष से बाँसुरी पर बजाया राग गौड़ सारंग की तीनताल में निबद्ध एक रचना सुनिए।


राग गौड़ सारंग : तीनताल में निबद्ध एक रचना : पण्डित पन्नालाल घोष 




अनिल विश्वास और लता मंगेशकर
सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार अनिल विश्वास ने 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ के लिए एक रागमाला गीत तैयार किया था, जिसमें चार अन्तरे चार अलग-अलग रागों में स्वरबद्ध थे। इन्हीं में से एक अन्तरा राग गौड़ सारंग में था। आज हम आपको वही अन्तरा सुनवा रहे हैं। पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास परस्पर मित्र भी थे और सम्बन्धी भी। हमारे साथी, फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार और स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने एक साक्षात्कार में अनिल विश्वास के व्यक्तित्व और कृतित्व को उभारा था। उसी साक्षात्कार का कुछ अंश हम आपके लिए प्रस्तुत करते हैं। 
पन्नालाल घोष बाद में अनिल बिस्वास के बहनोई बने, पहले से ही दोनों बहुत अच्छे मित्र थे। अपने परम मित्र और बहनोई को याद करते हुए विविध भारती के ’संगीत सरिता’ में अनिल दा ने कुछ इस तरह से उनके बारे में बताया था साक्षात्कार लेने वाले सितार वादक तुषार भाटिया को – “पन्नालाल घोष बाँसुरी को कॉनसर्ट के स्तर पर लाने का श्रेय जाता है, अभी तक उन्हीं को पिता माना जाता है। कुछ हमारी पुरानी बातें हमें याद आ जाती हैं। तुमको मालूम नहीं होगा कि पन्ना से पहले मैं बाँसुरी बजाता था। तो एक दिन ऐसा हुआ कि माँ तीरथ से वापस आईं, जब गईं तब मैं बच्चे की आवाज़ में बोलता था, वापस आईं तो मैं मर्द की आवाज़ में बोलने लगा। तो उन्होंने आकर देखा कि हमारी कुलुंगी के उपर, क्या कहते हैं उसको, वह बाँसुरी रखी हुई है, उन्होंने सारे उठाके फेंक दिए और कहा कि यह तेरी आवाज़ को क्या हो गया? मैंने जाकर पन्ना को कहा कि मेरी बाँसुरी तो गई, अब क्या होगा? उन्होंने कहा कि मैं पकड़ लेता हूँ!” अनिल दा ने एक आश्चर्य करने वाले तथ्य को भी उजागर किया कि पन्नालाल घोष बाँसुरी से पहले सितार बजाते थे और उनके पिता (अक्षय घोष) एक बहुत अच्छे सितार वादक थे। तो इस तरह से बाँसुरी बजाने के शौकीन अनिल बिस्वास बन गए मशहूर संगीतकार और सितार बजाने के शौकीन पन्नालाल घोष बन गए मशहूर बाँसुरी वादक। दोनों एक दूसरे से इतना प्यार करते थे कि एक बाद जब अनिल बिस्वास को रेडियो पर पहली बार गायन रेकॉर्ड करने के लिए रेकॉर्डिंग्‍ रूम में भेजा गया तो बाहर प्रतीक्षा कर रहे पन्नालाल घोष पसीना-पसीना हो गए इस घबराहट में कि उनका दोस्त कैसा परफ़ॉर्म करेगा! अनिल दा ने उस साक्षात्कार में यह भी बताया कि पन्ना बाबू का पहला व्यावयासिक वादन अनिल दा के रेकॉर्डिंग्‍ में ही बजाया था, और जब तक वो बम्बई में रहे, अनिल दा के हर फ़िल्म में वो ही बाँसुरी बजाया करते थे। 
 पार्श्वगायक मन्ना डे और लता मंगेशका के गाये, राग गौड़ सारंग के स्वरों में पिरोए फिल्म हमदर्द के इस गीत में पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी के अलावा पण्डित रामनारायण की सारंगी का भी योगदान था। तीनताल में निबद्ध यह गीत अब आप सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग गौड़ सारंग : “ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...” : मन्ना डे और लता मंगेशकर फिल्म – हमदर्द 





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 258वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 27 फरवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 256 की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग - हमीर, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – मुहम्मद रफी (और उस्ताद अमीर खाँ)।

इस बार की पहेली में कुल पाँच प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। हमारे नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के छठे अंक में हमने आपसे राग गौड़ सारंग पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र



Sunday, December 20, 2015

सारंगी के पर्याय पण्डित रामनारायण : SWARGOSHTHI – 249 : SARANGI AND PANDIT RAMNARAYAN





स्वरगोष्ठी – 249 में आज

संगीत के शिखर पर – 10 : पण्डित रामनारायण

संगीत के सौ रंग बिखेरती पण्डित रामनारायण की सारंगी



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की दसवीं कड़ी में हम आपको मानव-कण्ठ के सर्वाधिक निकट तंत्रवाद्य सारंगी और इस वाद्य कुशल वादक पण्डित रामनारायण के बारे में चर्चा कर रहे हैं। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि 25 दिसम्बर को पण्डित रामनारायण जी का 89वाँ जन्मदिन है। इस अवसर पर हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में पण्डित जी का सारंगी पर बजाया राग मारवा का आलाप और राग दरबारी में एक आकर्षक गत प्रस्तुत करेंगे। पण्डित रामनारायण आरम्भिक दशकों में फिल्म संगीत से भी जुड़े थे। आज के अंक में हम आपको 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ का एक गीत सुनवाएँगे, जिसमें पण्डित जी की सारंगी का वादन किया गया था। इस फिल्मी गीत में आपको राग जोगिया और राग बहार का स्पर्श मिलेगा।


ज-तंत्र वाद्यों में वर्तमान भारतीय वाद्य सारंगी, सर्वाधिक प्राचीन है। शास्त्रीय मंचों पर प्रचलित सारंगी, विविध रूपों और विविध नामों से लोक संगीत से भी जुड़ी है। प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि लंका के राजा रावण का यह सर्वप्रिय वाद्य था। ऐसी मान्यता है कि रावण ने ही इस वाद्य का आविष्कार किया था। इसी कारण इसका एक प्राचीन नाम ‘रावण हत्था’ का उल्लेख भी मिलता है। आज के अंक में हम सारंगी और इस वाद्य के अप्रतिम वादक पण्डित रामनारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट है। एक कुशल सारंगी वादक गले की शत-प्रतिशत विशेषताओं को अपने वाद्य पर बजा सकता है। सम्भवतः इसीलिए इस वाद्य को ‘सौ-रंगी’ अर्थात सारंगी कहा गया। 25 दिसम्बर, 1927 को उदयपुर, राजस्थान के एक सांगीतिक परिवार में एक ऐसे प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ, जिसे आज हम सब विख्यात सारंगी वादक पण्डित रामनारायण के रूप में जानते हैं। भारतीय संगीत जगत में इस महान संगीतज्ञ का योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। आज के अंक में हम उनके इस योगदान पर चर्चा करेंगे। फरवरी, 1994 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अभिलेखागार के लिए मुझे पण्डित रामनारायण जी से एक लम्बे साक्षात्कार का सुअवसर मिला था। उस बातचीत के कुछ अंश हम आपके लिए इस अंक में भी प्रस्तुत करेंगे, किन्तु उससे पहले आपको सुनवाते हैं, पण्डित रामनारायण का बजाया उनका सर्वप्रिय राग मारवा में मनमोहक आलाप।


राग मारवा : सारंगी पर आलाप : पण्डित रामनारायण




पण्डित रामनारायण के प्रपितामह, दानजी वियावत उदयपुर महाराणा के दरबारी गायक थे। पितामह हरिलाल वियावत भी उच्चकोटि के गायक थे, जबकि पिता नाथूजी वियावत ने दिलरुबा वाद्य को अपनाया। छः वर्ष की आयु में रामनारायण जी के हाथ एक सारंगी लगी और इसी वाद्य पर पिता की देख-रेख में अभ्यास आरम्भ हो गया। 10 वर्ष की आयु में उन्होने उस्ताद अल्लाबंदे और उस्ताद जाकिरुद्दीन डागर से ध्रुवपद की शिक्षा ग्रहण की। इसके साथ ही जयपुर के सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद महबूब खाँ से भी मार्गदर्शन प्राप्त किया। 1944 में रामनारायण जी की नियुक्ति सारंगी संगतिकार के रूप रेडियो लाहौर में हुई, जहाँ तत्कालीन जाने-माने गायक-वादकों के साथ उन्होने सारंगी की संगति कर कम आयु में ही ख्याति अर्जित की। 1947 में देश विभाजन के समय उन्हें लाहौर से दिल्ली केन्द्र पर स्थानान्तरित किया गया। अब तक रामनारायण के सारंगी वादन में इतनी परिपक्वता आ गई कि तत्कालीन सारंगी वादकों में उनकी एक अलग शैली के रूप में पहचानी जाने लगी। इसके बावजूद उनका मन इस बात से हमेशा खिन्न रहा करता था कि संगीत के मंच पर संगतिकारों को वह दर्जा नहीं मिलता था, जिसके वो हकदार थे। मुख्य गायक कलाकारों के साथ, इसी बात पर प्रायः नोक-झोंक हो जाती थी। उनका मानना था कि संगतिकारों को भी प्रदर्शन के दौरान अपनी बात कहने का अवसर मिलना चाहिए। 1956 में पण्डित रामनारायण ने मुम्बई के एक संगीत समारोह में एकल सारंगी वादन किया। संगीत-प्रेमियों के लिए यह एक दुर्लभ क्षण था। किसी शास्त्रीय मंच पर पहली बार सदियों से संगति वाद्य के रूप में प्रचलित सारंगी को स्वतंत्र वादन का सम्मान प्राप्त हुआ था। इस दिन संगीत के सुनहरे पृष्ठों पर पण्डित रामनारायन का नाम सारंगी को प्रतिष्ठित करने में दर्ज़ हो चुका था। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर सुनते हैं, पण्डित रामनारायण जी का सारंगी पर बजाया राग दरबारी में एक मनमोहक गत।


राग दरबारी : सारंगी पर गत का वादन : पण्डित रामनारायण




सारंगी वादन की अपनी एक अलग शैली विकसित करते हुए पण्डित रामनारायण का मन स्वतंत्र सारंगी वादन के लिए बेचैन होने लगा। रेडियो की नौकरी में रहते हुए उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी, अतः 1949 में उन्होने रेडियो की नौकरी छोड़ कर मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँच गये। मुम्बई में स्वयं को स्थापित करने की लालसा ने उन्हें फिल्म-जगत में पहुँचा दिया। उस दौर के फिल्म संगीतकारों ने पण्डित रामनारायण को सर-आँखों पर बिठाया। सारंगी के सुरों से सजी उनकी कुछ प्रमुख फिल्में हैं- हमदर्द 1953, अदालत 1958, मुगल-ए-आजम 1960, गंगा जमुना 1961, कश्मीर की कली 1964, मिलन और नूरजहाँ 1967। संगीतकार ओ.पी. नैयर के तो वे सर्वप्रिय रहे। हमदर्द, अदालत, गंगा जमुना और मिलन फिल्म में तो उन्होने कई गीतों की धुनें भी बनाई। अब हम आपको उनके फिल्मी गीतों में से चुन कर हमने फिल्म ‘हमदर्द’ का एक राग आधारित गीत लिया है। इस गीत के चार अन्तरे हैं। पहला अन्तरा राग गौड़ सारंग, दूसरा अन्तरा राग गौड़ मल्हार, तीसरा अन्तरा राग जोगिया और चौथा अन्तरा राग बहार के सुरों में निबद्ध है। अब हम आपको गीत का तीसरा और चौथा अन्तरा सुनवा रहे हैं। फिल्म के संगीत निर्देशक हैं अनिल विश्वास और गायक हैं, मन्ना डे और लता मंगेशकर। आइए सुनते हैं, राग जोगिया और राग बहार के स्वरो से सुसज्जित यह गीत।


राग जोगिया और बहार : ‘पी बिन सब सूना...’ और ‘आई मधु ऋतु...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 249वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिल्म में शामिल की गई एक ठुमरी रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेता का सम्मान मिलेगा। साथ ही पहेली के वार्षिक विजेताओं की घोषणा ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में की जाएगी।



1 – इस गीतांश में आपको किस राग की अनुभूति हो रही है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस गायिका की आवाज़ है? उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 26 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का हल भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 251वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रघुनाथ सेठ की बाँसुरी वादन का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – शुद्ध सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – बाँसुरी

इस बार की पहेली के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों में एक नये प्रतिभागी शामिल हुए हैं। यह नये प्रतिभागी हैं, पनवेल, महाराष्ट्र के शिरीष ओक। शिरीष जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य विजेता हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे सारंगी के अप्रतिम साधक पण्डित रामनारायन के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में कुछ चर्चा की। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   




Sunday, April 21, 2013

ऋतु आधारित राग हैं इस रागमाला गीत में



स्वरगोष्ठी – 117 में आज

रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 4


‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए...’



‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ मैं, कृष्णमोहन मिश्र अपने संगीत-प्रेमी पाठकों-श्रोताओं के बीच एक बार पुनः उपस्थित हूँ। आज के अंक में हम एक बार फिर लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ की अगली कड़ी प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के पिछले दो अंकों में हमने जो गीत शामिल किये थे, उनमे रागों के क्रम प्रहर के क्रमानुसार थे। परन्तु आज के रागमाला गीत में रागों का क्रम बदलते मौसम के अनुसार है। इस गीत में ग्रीष्म ऋतु का राग गौड़ सारंग, वर्षा ऋतु का राग गौड़ मल्हार, पतझड़ का राग जोगिया और बसन्त ऋतु का राग बहार क्रमशः शामिल किया गया है। रागमाला का यह गीत हमने 1953 प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार हैं, अनिल विश्वास और इसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने गाया है। 



अनिल विश्वास और लता मंगेशकर 
‘रागमाला’ संगीत का वह प्रकार होता है, जिसमे किसी गीत में एक से अधिक रागों का प्रयोग हो और सभी राग स्वतंत्र रूप से रचना में उपस्थित हों। रागमाला गीतों में रागों का संयोजन प्रायः प्रहर के क्रम में, ऋतु के क्रम में अथवा थाट के क्रम में किया जाता है। आज के अंक में प्रस्तुत किया जाने वाला गीत 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिया गया है और ऋतु के रागों के क्रम में है। गीत में चार अन्तरे हैं, जिन्हें संगीतकार अनिल विश्वास ने चार अलग-अलग रागों में निबद्ध किया था। इस फिल्म और इसके गीतों के बारे में फिल्म संगीत के प्रख्यात शोधकर्त्ता पंकज राग ने अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखा है- “फिल्म ‘हमदर्द’ (1953) तो शास्त्रीय संगीत आधारित कम्पोज़ीशन के लिए हिन्दी फिल्म संगीत के इतिहास में अमर हो चुकी है। स्वयं अनिल विश्वास की ही प्रोडक्शन (निर्मात्री- आशालता विश्वास) के बैनर तले बनी इस फिल्म में ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...’ (मन्ना डे, लता) एक बेहतरीन रागमाला थी, जिसमें खयाल अंग का प्रयोग था और गौड़ सारंग, गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार पर आधारित लाजवाब टुकड़े थे। कम्पोज़ीशन और गायकी के इतने सुन्दर उदाहरण फिल्म संगीत में कम ही मिलते हैं”। संगीतकार अनिल विश्वास ने इस रागमाला गीत के लिए मन्ना डे और लता मंगेशकर को चुना था।

मन्ना डे 
अनिल विश्वास मन्ना डे की प्रतिभा से बहुत अच्छी तरह परिचित थे। उन्होने इस गीत के चारो अन्तरों को चार अलग-अलग रागों में खयाल अंग में संगीतबद्ध किया था। उन दिनों यह चलन था कि पक्के रागों पर आधारित गीतों को गाने के लिए संगीत जगत के सिद्ध गायकों से फिल्मों में गीत गवाया जाता था। परन्तु अनिल विश्वास ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पुरुष स्वर के लिए मन्ना डे को और नारी स्वर के लिए लता मंगेशकर पर भरोसा किया और फिल्म संगीत जगत का यह कालजयी गीत तैयार हुआ। एक बार अनिल विश्वास ने इस गीत की रचना प्रक्रिया के बारे में अपने एक साक्षात्कार में कहा था- “आजकल गायक कलाकारों के पास रिहर्सल का समय नहीं होता, मगर फिल्म ‘हमदर्द’ के इस गीत को रिकार्ड करने से पहले मन्ना डे और लता ने लगातार 15 दिनों तक इस गीत का रिहर्सल किया था”। एक अन्य साक्षात्कार में मन्ना डे ने बताया था- “इस गीत को रिकार्ड करने में 6-7 घण्टे का समय लगा था। हम सब बुरी तरह थक गए थे, लेकिन रिकार्डिंग के बाद गाना सुन कर अनिल दा खुशी के मारे सचमुच नाचने लगे। उन्हें नाचते देख कर लगा कि वो हमारी मेहनत से सन्तुष्ट थे”

फिल्म 'हमदर्द' के इस गीत के प्रसंग में अभिनेता शेखर एक अन्ध-गायक की भूमिका में हैं, जो नायिका निम्मी को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। गीत के पहले भाग के बोल हैं- ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री, मन के मीत न आए...’। गीत के इस अन्तरे में ग्रीष्म ऋतु की दोपहरी का परिवेश चित्रित है और ऐसे परिवेश के चित्रण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त राग गौड़ सारंग ही है। अनिल विश्वास ने गीत का दूसरा अन्तरा राग गौड़ मल्हार में निबद्ध किया था, जिसके बोल हैं- ‘बरखा ऋतु बैरी हमार...’। प्रचण्ड गर्मी के बाद जब वर्षा की बूँदें भूमि की तपिश को शान्त करने का प्रयत्न करती हैं, तब विरही मन और भी व्याकुल हो जाता है। गीत के इस भाग के शब्द भी परिवेश के अनुकूल रचे गए हैं। सुविधा की दृष्टि गीत के चारो अन्तरों को दो भाग में हमने बाँट दिया है। लीजिए गीत के प्रथम दो अन्तरे सुनिए।


रागमाला गीत : फिल्म हमदर्द : राग गौड़ सारंग और गौड़ मल्हार : मन्ना डे और लता मंगेशकर


गीतकार प्रेम धवन 
फिल्म ‘हमदर्द’ के इस रागमाला गीत के तीसरे अन्तरे में पतझड़ के परिवेश में नायिका के विरह भाव का चित्रण है। इस अन्तरे को संगीतकार अनिल विश्वास ने राग जोगिया में बाँधा है। इस अन्तरे के बोल हैं- 'पी बिन सूना री...'। गीत का चौथा और अन्तिम अन्तरा उल्लासपूर्ण परिवेश का चित्रण करता है। इसे राग बसन्त बहार के स्वर दिये गए हैं, जिसके बोल हैं- ‘आई मधु ऋतु बसन्त बहार रे...’। गीत के चारो अन्तरों को मन्ना डे और लता मंगेशकर ने रागानुकूल स्वरों की शुद्धता बनाए रखते हुए इस अनूठे गीत को भावपूर्ण ढंग से तीनताल में गाया है। गीतकार प्रेम धवन हैं। इस गीत को ऐतिहासिक बनाने में वाद्य संगीत के श्रेष्ठतम कलाकारों का योगदान भी रहा। गीत में सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण ने संगति की थी। रिकार्डिंग पूरी हो जाने के बाद जाने-माने सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ ने टिप्पणी की थी- ‘फिल्म संगीत जगत में आज एक श्रेष्ठतम गीत रिकार्ड हुआ है'। स्वयं मन्ना डे भी इस गीत को अपने श्रेष्ठ गीतों की श्रेणी में शीर्ष पर मानते हैं। आइए हम प्रेम धवन के लिखे, अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध किये तथा मन्ना डे व लता मंगेशकर के स्वरों में 'हमदर्द' फिल्म के इस 'रागमाला' गीत का तीसरा और चौथा अन्तरा सुनते हैं-


रागमाला गीत : फिल्म हमदर्द : राग जोगिया और बहार : मन्ना डे और लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 117वीं संगीत पहेली में हम आपको आधी शताब्दी पूर्व के एक फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

2 – गीत के संगीतकार का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 119वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 115वें अंक में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म 'गोदान' से पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में पारम्परिक चैती की धुन पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- संगीत शैली चैती और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार पण्डित रविशंकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ को हम एक बार फिर विराम देंगे और उसके स्थान पर एक विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। दरअसल इस माह एक क्षेत्रीय भाषा की फिल्म अपने प्रदर्शन की आधी शताब्दी पूर्ण कर चुकी है। इस अवसर पर हम अपने एक अतिथि लेखक और युवा फिल्म पत्रकार रविराज पटेल का शोधपरक् आलेख प्रस्तुत करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 

 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


Sunday, January 27, 2013

दिन के चौथे प्रहर के कुछ आकर्षक राग

स्वरगोष्ठी – 106 में आज

राग और प्रहर – 4

गोधूली बेला के श्रम-परिहार करते राग


‘स्वरगोष्ठी’ के 106ठें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इन दिनों आपके प्रिय स्तम्भ पर लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। पिछले अंक में हमने दिन के तीसरे प्रहर के रागों की चर्चा की थी। आज बारी है, चौथे प्रहर के रागों की। इस प्रहर में सूर्य अस्ताचलगामी होता है। इस प्रहर के उत्तरार्द्ध काल को गोधूली बेला भी कहा जाता है। चूँकि इस समय गायों का झुण्ड चारागाहों से वापस लौटता है और उनके चलने से धूल का एक गुबार उठता है, इसीलिए इसे गोधूली बेला कहा जाता है। इस प्रहर के रागों में ऐसी स्वर-संगतियाँ होती हैं, जिनसे दिन भर के श्रम से तन और मन को शान्ति मिलती है। आज के अंक में हम इस प्रहर के हेमन्त, पटदीप, मारवा और गौड़ सारंग रागों की चर्चा करेंगे। 


दिन का चौथा प्रहर, अपराह्न तीन बजे से लेकर सूर्यास्त होने के बीच की अवधि को माना जाता है। यह वह समय होता है, जब जन-जीवन अपने दैनिक शारीरिक और मानसिक क्रियाओं से थका-हारा होता है तथा उसे थोड़ी विश्रान्ति की तलाश होती है। ऐसे में दिन के चौथे प्रहर के राग उसे राहत देते हैं। चौथे प्रहर में प्रयोग किये जाने वाले रागों में राग ‘गौड़ सारंग’ एक ऐसा राग है जिसे तीसरे प्रहर में भी गाया-बजाया जाता है। सारंग अंग से संचालित होने वाले इस राग को कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह और अवरोह दोनों में वक्र गति से स्वर लगाए जाते हैं। राग में दोनों मध्यम का और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। आलाप में पंचम, ऋषभ, षडज और निषाद, ऋषभ, षडज का आवर्तन किया जाता है। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत अथवा निषाद होता है।

आज हम आपको राग ‘गौड़ सारंग’ पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं। संगीतकार अनिल विश्वास ने 1953 में फिल्म 'हमदर्द' के लिए एक गीत 'रागमाला' में तैयार किया था। ‘रगमाला’ संगीत का वह प्रकार होता है, जब किसी गीत में एक से अधिक रागों का प्रयोग हो और सभी राग स्वतंत्र रूप से रचना में उपस्थित हों। अनिल विश्वास ने गीत के चार अन्तरों को चार अलग-अलग रागों में संगीतबद्ध किया था। उन दिनों का चलन यह था कि ऐसे गीतों को गाने के लिए फिल्म जगत के बाहर के विशेषज्ञों को बुलाया जाता था। परन्तु अनिल विश्वास ने इस युगलगीत में पुरुष स्वर के लिए मन्ना डे का और नारी स्वर के लिए लता मंगेशकर का चयन किया। फिल्म 'हमदर्द' के इस गीत के बोल हैं- ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए...’। गीत की स्थायी की पंक्ति से लेकर अन्तरे के समापन तक राग 'गौड़ सारंग' के स्वरों में पिरोया गया है। गीत के शेष तीन अन्तरे अलग-अलग रागों में निबद्ध हैं। इस गीत को ऐतिहासिक बनाने में वाद्य संगीत के श्रेष्ठतम कलाकारों का योगदान भी रहा। गीत में सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण ने संगति की थी। आज हम प्रेम धवन के लिखे, अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध किये तथा मन्ना डे व लता मंगेशकर के स्वरों में 'हमदर्द' फिल्म के इस 'रागमाला' गीत का पहला अन्तरा सुनते हैं।


राग ‘गौड़ सारंग’ : फिल्म ‘हमदर्द’ : ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर



दिन के चौथे प्रहर का एक बेहद प्रचलित राग ‘पटदीप’ है। इसे राग ‘पटदीपिका’ भी कहते हैं। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला राग पटदीप औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर का प्रयोग नहीं होता। गान्धार कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। आज के अंक में हम आपको राग पटदीप में निबद्ध श्रृंगार रस प्रधान एक मोहक खयाल रचना सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर, सहसवान घराने के जाने-माने गायक उस्ताद राशिद खाँ। राग पटदीप के इस खयाल के बोल हैं- ‘रंग रँगीला बनरा मोरा हमरी बात न माने...’ और यह द्रुत एकताल में निबद्ध है। तबला संगति पण्डित विश्वनाथ शिरोड़कर ने की है।


राग ‘पटदीप’ : ‘रंग रँगीला बनरा मोरा...’ : उस्ताद राशिद खाँ




चौथे प्रहर के रागों में ‘हेमन्त’ भी एक बेहद मधुर राग है। इसे राग ‘हेम’ भी कहा जाता है। कुछ विद्वानों का मत है कि उस्ताद अलाउद्दीन खाँ ने इस राग का सृजन किया था। परन्तु फिल्म संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी के मतानुसार तानसेन इस राग के सर्जक थे और उन्होने इस राग की एक प्राचीन ध्रुवपद बन्दिश- ‘सुध बिसर गई आज अपने गुनन की...’ की रचना की थी। श्री त्रिपाठी ने इस ध्रुवपद रचना को 1962 की अपनी फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में भी इस्तेमाल किया था। ‘हेमन्त’ औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसे पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इसके आरोह में गान्धार धैवत स्वर का प्रयोग नहीं होता। इसमें ऋषभ, गान्धार धैवत स्वर कोमल और मध्यम स्वर तीव्र प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर ऋषभ और संवादी पंचम होता है। यह ऋतु प्रधान राग भी है। हेमन्त ऋतु में यह किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है, किन्तु अन्य परिवेश में इसे सूर्यास्त से पहले गाने-बजाने की परम्परा है। इस राग में उप-शास्त्रीय और सुगम संगीत की रचनाएँ खूब निखरती है। आज हम आपको राग ‘हेमन्त’ की एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी- ‘याद पिया की आए...’ सुनवाते हैं। इसे सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ ने बड़े भावपूर्ण अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।

राग ‘हेमन्त’ : ठुमरी- ‘याद पिया की आए...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ



लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ की आज की कड़ी में हम चौथे प्रहर के रागों की चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर में में गाये-बजाये जाने वाले रागों में ‘मारवा’ एक अत्यन्त भावपूर्ण राग है। यह मारवा थाट का आश्रय राग है, जिसकी जाति षाड़व-षाड़व है। इसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। कोमल ऋषभ और तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है। पूर्वांग प्रधान इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग मारवा में प्रयोग किये जाने वाले स्वर राग पूरिया और सोहनी में भी होते हैं। परन्तु राग पूरिया का चलन सप्तक के पूर्वांग में और सोहनी का चलन सप्तक के उत्तरांग में होता है, जबकि मारवा का चलन सप्तक के मध्य अंग में होता है। इसके अलावा मारवा में ऋषभ और धैवत स्वर बलवान होता है, जबकि पूरिया में निषाद और गान्धार स्वर बली होते हैं। राग मारवा के स्वरों में गोधूली बेला के परिवेश को सार्थक बनाने की अद्भुत क्षमता होती है। अब हम आपको राग मारवा की एक मधुर रचना सितार पर सुनवाते हैं। वादक है, विश्वविख्यात सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ। तबला संगति पण्डित अनिंदों चटर्जी ने की है। आप मधुर सितार-वादन का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग ‘मारवा’ : मध्य लय तीनताल का तराना : उस्ताद विलायत खाँ



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 106ठें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। 



1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 - इस गीत को किस ताल में निबद्ध किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 108वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 104थे अंक में हमने आपको 1966 में बनी फिल्म ‘मेरा साया’ से एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भीमपलासी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार मदनमोहन। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और हमारे एक नए पाठक मिनिसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने दिया है। बैंगलुरु के पंकज मुकेश और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने एक-एक प्रश्न का ही सही जवाब दिया है। इन्हें एक-एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनो लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। आगामी अंक में हम आपके साथ रात्रि के पहले प्रहर अर्थात सूर्यास्त के बाद से लेकर रात्रि के नौ बजे के मध्य प्रस्तुत किये जाने वाले रागों पर चर्चा करेंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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