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रविवार, 1 मार्च 2015

रंगोत्सव पर सुनिए चतुरंग : SWARGOSHTHI – 209 : CHATURANG



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी पाठकों / श्रोताओं को रंगोत्सव के पर्व पर हार्दिक मंगलकामना



 
स्वरगोष्ठी – 209 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 7 : चतुरंग

संगीत के चार अलंकरणों से सुसज्जित चतुरंग






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नवीन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की प्रचलित खयाल शैली के अन्तर्गत ‘तराना’ गायकी का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम खयाल शैली के अन्तर्गत गाये जाने वाले ‘चतुरंग’ गीतों पर चर्चा करेंगे। सुप्रसिद्ध गायक पण्डित जसराज का राग श्याम कल्याण में निबद्ध एक चतुरंग हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल ही तो है’ का राग भैरवी पर आधारित एक गीत भी सुनवा रहे हैं, जिसमें पार्श्वगायक मन्ना डे ने तराना और चतुरंग का आकर्षक प्रयोग किया था। 


ठारहवीं शताब्दी में सुल्तान मुहम्मद शाह रँगीले के दरबारी संगीतज्ञ नियामत खाँ ‘सदारंग’ द्वारा शास्त्रीय संगीत की एक शैली के रूप में विकसित और स्थापित खयाल शैली आज की सर्वाधिक लोकप्रिय शैली है। सदारंग की खयाल रचनाएँ अनेक पीढ़ियों से हस्तान्तरित होते हुए आज भी प्रचलित हैं। सदारंग तानसेन के वंशज थे। उनकी और उनके वंशजों की गायकी ध्रुपद शैली की थी। खयाल शैली पर ध्रुपद का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। खयाल शैली की तुलना जब ध्रुपद से की जाती है तो पहला अन्तर इसके साहित्य में परिलक्षित होता है। अधिकतर ध्रुपद रचनाओं के साहित्य में आध्यात्मिक भाव प्रमुख होता है, जबकि खयाल रचनाओं में श्रृंगार रस और लौकिक भाव की प्रधानता होती है। खयाल और ध्रुपद के साहित्य की भाषा में भी यह अन्तर स्पष्ट हो जाता है। श्रृंगार रस की अधिकता और चमत्कारपूर्ण दरबारी गायकी के कारण खयाल को अनेक अलंकारों से सजाया जाता है। खयाल शैली में विभिन्न प्रकार के तानों का प्रयोग किया जाता है। इस शैली में विविध अलंकरणों की प्रवृत्ति के कारण तराना, रागमाला, तालमाला, चतुरंग, त्रिवट आदि गायकी का विकास हुआ। पिछले अंक में हमने तराना शैली पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम ‘चतुरंग’ की चर्चा करेंगे। चतुरंग गायकी का वह रागबद्ध और तालबद्ध प्रकार है, जिसमें संगीत के चार अंग एक ही रचना में शामिल होते हैं। मध्यकाल के संगीत विद्वान मतंग द्वारा एक ऐसे प्रबन्ध गायन का प्रतिपादन किया गया था, जिसके अन्तर्गत एक रचना में चार खण्डों को चार रागों, चार ताल और चार भिन्न भाषाओं के पदों में गायन किया जाता था। वर्तमान में प्रचलित रागमाला, तालमाला और चतुरंग की गायकी इसी शैली के विकसित रूप हैं। वर्तमान चतुरंग में राग और ताल एक-एक प्रकार के ही होते हैं। इसके साथ ही चतुरंग में पद का साहित्य, तराने के बोल, सरगम और तबला या मृदंग के बोलों का एक क्रम में संयोजन होता है। ‘संगीत रत्नाकर’ नामक ग्रन्थ में भी एक ऐसी ही गायकी का उल्लेख है। संगीतज्ञ पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने भी अनेक उत्कृष्ट चतुरंग रचनाएँ की थी। अब हम आपको वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में राग श्याम कल्याण में निबद्ध चतुरंग सुनवा रहे हैं।


चतुरंग : राग श्याम कल्याण : पण्डित जसराज : द्रुत तीनताल





फिल्मों में चतुरंग का प्रयोग कुछेक संगीतकारों ने ही किया है। 1963 में संगीतकार रोशन को एक अवसर मिला, अपना श्रेष्ठतम संगीत देने का। फिल्म थी 'दिल ही तो है', जिसमे राज कपूर और नूतन नायक-नायिका थे। यह गीत राज कपूर पर फिल्माया गया था। फिल्म के प्रसंग के अनुसार एक संगीत मंच पर एक नृत्यांगना के साथ बहुत बड़े उस्ताद को गायन संगति करनी थी। अचानक उस्ताद के न आ पाने की सूचना मिलती है। आनन-फानन में चाँद (राज कपूर) को दाढ़ी-मूंछ लगा कर मंच पर बैठा दिया जाता है। रोशन ने इस प्रसंग के लिए गीत का जो संगीत रचा, उसमे उपशास्त्रीय संगीत की इतनी सारी शैलियाँ डाल दीं कि उस समय के किसी फ़िल्मी पार्श्वगायक के लिए बेहद मुश्किल काम था। मन्ना डे ने इस चुनौती को स्वीकार किया और गीत ‘लागा चुनरी में दाग, छुपाऊं कैसे....’ को अपना स्वर देकर गीत को अमर बना दिया। इस गीत के उत्तरार्द्ध में राग भैरवी का तराना शामिल किया गया है। इसी तराना के बीच में 'पखावज के बोल', 'सरगम', नृत्य के बोल', 'कवित्त', 'टुकड़े', यहाँ तक कि तराना के बीच में हल्का सा ध्रुवपद का अंश भी इस गीत में शामिल है। संगीत के इतने सारे अंग मात्र सवा पाँच मिनट के गीत में डाले गए हैं। जिस गीत में संगीत के तीन अंग होते हैं, उन्हें 'त्रिवट' और जिनमें चार अंग होते हैं, उन्हें 'चतुरंग' कहा जाता है। मन्ना डे के गाये इस गीत को फिल्म संगीत में चतुरंग के प्रयोग का एक श्रेष्ठ उदाहरण माना जा सकता है। यह गीत भारतीय संगीत में 'सदासुहागिन राग' के विशेषण से पहचाने जाने वाले राग -"भैरवी" पर आधारित है। कुछ विद्वान् इसे राग "सिन्धु भैरवी" पर आधारित मानते हैं, किन्तु जाने-माने संगीतज्ञ पं. रामनारायण ने इस गीत को "भैरवी" आधारित माना है। गीत की एक विशेषता यह भी है कि गीतकार साहिर लुधियानवी ने कबीर के एक निर्गुण पद की भावभूमि पर इसे लिखा है। आइए इस कालजयी गीत को सुनते हैं। आप यह गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति 


राग भैरवी : ‘लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे...’ : मन्ना डे : फिल्म – दिल ही तो है







संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 209वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – भारतीय संगीत की किस वरिष्ठ गायिका की आवाज़ है? विदुषी गायिका का नाम बताइए।

2 – संगीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 मार्च, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 211वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता



‘स्वरगोष्ठी’ की 207वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी परवीन सुलताना की आवाज़ में राग हंसध्वनि के तराना का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछे थे। आपको इनमे से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। यह हमारे लिए अत्यन्त सुखद था कि सभी प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- तराना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग हंसध्वनि और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- द्रुत तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक से हमने आपसे चतुरंग गीत पर चर्चा की। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



रविवार, 11 मार्च 2012

स्वरगोष्ठी – 61 विविध संगीत शैलियो में होली के इन्द्रधनुषी रंग

स्वरगोष्ठी – ६१ में आज

‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम.....’

भारतीय पर्वों में होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें संगीत-नृत्य की प्रमुख भूमिका होती है। जनसामान्य अपने उल्लास को व्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से देशज संगीत का सहारा लेता है। इस अवसर पर प्रस्तुत की जाने वाली रचनाओं में लोक-संगीत की प्रधानता के बावजूद सभी भारतीय संगीत शैलियों में होली की रचनाएँ प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं। आज के अंक में हम आपके लिए कुछ संगीत शैलियों में रंगोत्सव के चुनिन्दा गीतों पर चर्चा करेंगे।    



न्द्रधनुषी रंगों में भींगे तन-मन लिये ‘स्वरगोष्ठी’ के अपने समस्त पाठकों-श्रोताओं का, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः अबीर-गुलाल के साथ स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। रंगोत्सव के उल्लासपूर्ण परिवेश में ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंक में हमने आपके लिए राग काफी में निबद्ध कुछ संगीत-रचनाओं को प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम यह सिलसिला जारी रखते हुए कुछ अन्य संगीत शैलियों की फाल्गुनी रचनाएँ लेकर उपस्थित हुए हैं। आज प्रस्तुत की जाने वाली होली रचनाएँ हमने राग काफी से इतर रागों में चुनी है।

आज की इस सतरंगी गोष्ठी का आरम्भ हम एक फिल्मी गीत से करेंगे। १९९६ में एक संगीतप्रधान फिल्म, ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग में एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली के रंग किस प्रकार निखरते है? 


फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : स्वर – आरती अंकलीकर


पिछले अंक में हमने इस तथ्य को रेखांकित किया था कि भारतीय संगीत की सभी शैलियों में होली के गीत मिलते हैं। मेरे मित्र, संगीत समीक्षक और हाथरस से प्रकाशित प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका- ‘संगीत’ के परामर्शदाता मुकेश गर्ग ने इस तथ्य को इन शब्दों में रेखांकित किया है- ‘हिन्दुस्तानी संगीत में होली की जगह कुछ अलग ही है. ध्रुपद शैली की धमार गायकी से लेकर ख़याल और ठुमरी गायकी तक, इस रंग-बिरंगे त्योहार का उल्लास देखते ही बनता है। इन गायन-शैलियों में संयोग श्रृंगार के ढेरों चित्र तो मिलते ही हैं, वियोग की पीड़ा को दर्शाने वाली ठुमरियों की भी कोई कमी नहीं। यहाँ तक कि ठुमरी का एक प्रकार तो 'होरी' या 'होली' नाम से ही जाना जाता है। इन ठुमरियों ने शब्द और स्वर दोनों स्तरों पर बहुत कुछ लोक-संगीत से ग्रहण किया है।’ लोक संगीत की इस महत्ता को स्वीकारती हुई लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) की सेवानिवृत्त प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव का मत है कि भारतीय संगीत के कई राग, लोक संगीत की धुनों को ही विकसित और परिमार्जित कर निर्मित है। राग पीलू, पहाड़ी, माँड़ आदि का उदगम लोक संगीत से ही हुआ है। आइए अब आपको होली की एक लोक संगीत की रचना सुनवाते हैं, किन्तु किसी लोक कलाकार से नहीं, बल्कि वरिष्ठ शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र से-

शिव की होली : ‘खेले मसाने की होली दिगम्बर...’ : स्वर – पं. छन्नूलाल मिश्र


भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुवपद। इस शैली के अन्तर्गत धमार गायकी तो पूरी तरह रंगों के पर्व पर ही केन्द्रित रहती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला १४ मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली का वर्णन मिलता है। कुछ धमार रचनाओं में फाल्गुनी परिवेश का चित्रण भी होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको धमार गायकी के माध्यम से रंगोत्सव का एक अलग रंग दिखाने का प्रयास करेंगे।

ध्रुवपद-धमार गायकी में एक युगल गायक हैं- गुंडेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा), जिन्हें देश-विदेश में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से ‘स्वरगोष्ठी’ के होली अंकों के लिए हमने एक धमार अपने पाठकों/श्रोताओं को सुनवाने का अनुरोध किया था। हमारे अनुरोध का मान रखते हुए रमाकान्त गुंडेचा ने हमें तत्काल राग केदार का यह मनमोहक धमार, आपको सुनवाने के लिए उपलब्ध कराया। गुंडेचा बन्धु के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, राग केदार का यह धमार -'चोरी चोरी मारत हो कुमकुम, सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...'  प्रस्तुत है-

धमार- केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : स्वर – गुंडेचा बन्धु


होली-पर्व पर ‘स्वरगोष्ठी’ की इस विशेष श्रृंखला का समापन हम संगीत-मंचों की परम्परा के अनुसार राग भैरवी की एक ऐतिहासिक महत्त्व की रचना से करेंगे। उन्नीसवीं शताब्दी में दिल्ली में ठुमरी के कई गायक और रचनाकार हुए, जिन्होंने इस शैली को समृद्धि प्रदान की। इन्हीं में एक थे गोस्वामी श्रीलाल, जिन्होंने "पछाहीं ठुमरी" को एक नई दिशा दी। इनका जन्म 1860 में दिल्ली के एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। संगीत की शिक्षा इन्हें अपने पिता गोस्वामी कीर्तिलाल से प्राप्त हुई। ये सितारवादन में भी प्रवीण थे। "कुँवरश्याम" उपनाम से इन्होने अनेक ध्रुवपद, धमार, ख़याल, ठुमरी आदि की रचनाएँ की। इनका संगीत स्वान्तःसुखाय और अपने आराध्य भगवान् श्रीकृष्ण को सुनाने के लिए ही था। जीवन भर इन्होने किशोरीरमण मन्दिर से बाहर कहीं नहीं गाया-बजाया। इनकी ठुमरी रचनाएँ कृष्णलीला प्रधान तथा स्वर, ताल और साहित्य की दृष्टि से अति उत्तम है। राग भैरवी की ठुमरी -"बाट चलत नई चुनरी रंग डारी श्याम..." कुँवरश्याम की सुप्रसिद्ध रचना है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भी देवालय संगीत की परम्परा कहीं-कहीं दीख पड़ती थी| संगीतज्ञ कुँवरश्याम इसी परम्परा के संवाहक और पोषक थे| आज हम यही पसिद्ध ठुमरी आपको सुनवाएँगे। राधा-कृष्ण की होली के रंगों से सराबोर इस ठुमरी को कई प्रसिद्ध गायकों ने स्वर दिया है। यहाँ तक कि १९५३ की फिल्म "लड़की" में गायिका गीता दत्त ने और १९५७ की फिल्म "रानी रूपमती" में कृष्णराव चोंकर व मुहम्मद रफी ने भी इस ठुमरी को अपना स्वर दिया था। आज यह ठुमरी और उसके बाद तराना आपके लिए प्रस्तुत करेंगे ‘श्यामचौरासी’ घराने के संवाहक उस्ताद शफकत अली खाँ। आप भैरवी के स्वरों में होली के एक अलग रंग का आनन्द लीजिए और मुझे रंगोत्सव के इस विशेष अंक को विराम देने की अनुमति दीजिए। अगले अंक के संगीत-अनुष्ठान में आपसे फिर मिलेंगे।

ठुमरी और तराना : ‘बाट चलत नई चुनरी रंग डारी...’ : स्वर - शफकत अली खाँ


आज की पहेली

नीचे दिये गए संगीत के अंश को ध्यान से सुनिए और हमारे दो प्रश्नों के उत्तर दीजिए। भारतीय वाद्य संगीत के दो दिग्गज वादक कलाकारों की जुगलबन्दी से यह संगीत अंश लिया गया है। इस जुगलबन्दी में उत्तर भारत की बेहद चर्चित लोक-धुन का वादन किया गया है। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – प्रस्तुत संगीत अंश में किन दो वाद्यों की जुगलबन्दी की गई है? दोनों वाद्यों के नाम बताइए।

२ – दोनों वादक कलाकारों ने किस लोक-धुन का वादन किया है? यह लोक-धुन मौसम पर आधारित है।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६३वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ५९वें अंक में हमने आपको १९६३ की एक फिल्म के होली गीत का एक अंश सुनवाया था और आपसे फिल्म का नाम और उस राग का नाम पूछा था, जिस पर यह गीत आधारित है। दोनों प्रश्नों के क्रमशः सही उत्तर है- फिल्म ‘गोदान’ और राग ‘काफी’। दोनों पश्नों का सही उत्तर देने वाले पाठक हैं- बैंगलुरु के पंकज मुकेश और बरेली, उत्तर प्रदेश के दयानिधि वत्स। इन्दौर की क्षिति तिवारी ने राग की पहचान तो ठीक की, किन्तु फिल्म का नाम पहचानने में भूल कर बैठीं। इन सभी पाठकों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई। इन पाठकों/श्रोताओं के साथ-साथ फेसबुक के उन सभी मित्रों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द किया।

अपने पाठकों को हम सहर्ष सूचित करते हैं कि ‘सिने-पहेली’ की भाँति ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली के विजेता और महाविजेता का हम चयन करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के ५१वें से लेकर ६०वें (पिछले अंक) तक की पहेली में जिस पाठक के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें ‘विजेता’ का सम्मान मिलेगा। यह घोषणा हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में करेंगे। तब तक आप इस अंक की पहेली को सुलझाते रहिए।

झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में हमने संगीत की विविध शैलियों में होली की रचनाएँ आपके लिए प्रस्तुत किया है। अगले अंक में भी हम आपके लिए ऋतु आधारित संगीत का सिलसिला जारी रखेंगे। भारतीय लोक संगीत की कुछ शैलियाँ ऐसी हैं जो उपशास्त्रीय संगीत में भी बेहद लोकप्रिय हैं। ऐसी ही एक मौसम आधारित लोक संगीत शैली और उपशास्त्रीय संगीत से उसके अन्तर्सम्बन्धों पर चर्चा करेंगे। 



कृष्णमोहन मिश्र

रविवार, 4 मार्च 2012

राग काफी और होली के इन्द्रधनुषी रंग

SWARGOSHTHI – 60

स्वरगोष्ठी – ६० में आज

‘होरी खेलत नन्दलाल बिरज में...’


भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ किया गया है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। आइए, इन्हीं भावों को साथ लेकर हम सब शामिल होते हैं, इस रंगोत्सव में।

बीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच ‘स्वरगोष्ठी’ के साठवें अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आपकी संगोष्ठी में पुनः उपस्थित हूँ। आज के अंक में और अगले अंक में भी हम फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर होंगे। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाएँगे। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। इस श्रृंखला में हमने संगीत की इन सभी शैलियों में से रचनाएँ चुनी हैं।

हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है- काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। राग काफी पर चर्चा हम बाद में करेंगे, उससे पहले आपको सुनवाते है एक फिल्मी गीत। १९६३ में एक फिल्म- ‘गोदान’ प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी यह फिल्म, जिसके संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म- ‘गोदान’ के इस होली गीत का-

फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : संगीत – पं. रविशंकर


होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधा-कृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी-

काफी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी...’ : स्वर – गिरिजा देवी


अभी आपने जो होरी सुनी, वह स्पष्ट रूप से राग काफी में निबद्ध थी। आइए, अब थोड़ी चर्चा राग काफी की संरचना पर करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गांधार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गांधार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गांधार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए-

तराना – राग काफी : स्वर – मालिनी राजुरकर : द्रुत तीनताल


गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। वाद्य संगीत में तो सार्थक या निरर्थक, शब्द होते ही नहीं, किन्तु कुशल वादक ऐसा रागानुकूल परिवेश रच देते हैं कि जहाँ शब्द महत्त्वहीन हो जाते हैं। अब हम आपको सरोद पर राग काफी का वादन सुनवाते हैं। उस्ताद अली अकबर खाँ, भारतीय संगीत के जाने-माने सरोद वादक रहे हैं। उनका बजाया राग काफी का एक अत्यन्त मोहक रिकार्ड है, जिसमें तबला संगति उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने की है। अपनी आज की संगीत-बैठक का समापन हम इसी रिकार्ड के प्रथम भाग के साथ करेंगे। इस वादन में राग काफी के स्वर तो हैं, किन्तु शब्द नहीं हैं। आप सरोद पर राग काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए और ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।

राग – काफी : सरोद वादक – उस्ताद अली अकबर खाँ : तबला - उस्ताद ज़ाकिर हुसेन


आज की पहेली


अभी हमने आपको ठुमरी अंग में एक फिल्मी गीत का अंश सुनवाया है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।

१ – गीत की पंक्तियों को ध्यान से सुनिए और बताइए कि कौन हैं यह गायिका?

२ – किस राग पर आधारित है यह गीत? राग का नाम बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६२वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ५८वें अंक में हमने आपको एक भोजपुरी लोकगीत का अंश सुनवाया था और आपसे गायिका का नाम और गीत प्रस्तुत किये जाने का अवसर पूछा था। दोनों प्रश्नों के क्रमशः सही उत्तर है- गायिका शारदा सिन्हा और कन्या पक्ष द्वारा वर को लग्न चढ़ाने हेतु प्रस्थान का अवसर। दोनों प्रश्न का सही उत्तर एकमात्र पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। मीरजापुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी केवल पहले प्रश्न का ही उत्तर दे सके। दोनों पाठकों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई।
मध्यप्रदेश की उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत कला अकादमी के सेवानिवृत्त निदेशक अरुण पलनीतकर और वाराणसी से अभिषेक मिश्र ने सामान्य पाठकों और श्रोताओं को सरल ढंग से रागों की पहचान कराने के हमारे प्रयास की सराहना की है। झारखण्ड के एक पाठक यू.पी. ओझा ने लोक-कला-गौरव भिखारी ठाकुर के गीतों को सुनवाने का आग्रह किया है। ओझा जी के साथ सभी पाठकों को विश्वास दिलाते हैं कि निकट भविष्य में हम इस विषय पर ‘स्वरगोष्ठी’ का पूरा एक अंक समर्पित करेंगे। इन पाठकों/श्रोताओं के साथ-साथ फेसबुक के सभी मित्रों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द किया।

झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में हमने संगीत की विविध शैलियों में राग काफी के माध्यम से कुछ फागुनी रंग बिखेरने का प्रयास किया है। अगले अंक में भी हम उमंग और उल्लास के इस परिवेश को जारी रखेंगे। अगले अंक में राग काफी के अलावा अन्य रागों में भी होली की सतरंगी छटा का दर्शन करेंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।



कृष्णमोहन मिश्र

रविवार, 20 मार्च 2011

सुर संगम में आज - होरी की उमंग और ठुमरी के लोक रंग से सजाएँ इस होली को

सुर संगम - 12 - शास्त्रिय और लोक संगीत की होली

फाल्गुन के महीने में पिचकारियों से निकले रंग मानो मुर्झाने वाली, शीतकालीन हवाओं को बहाकर पृथ्वी की छवि में बसंत ऋतु के जीवंत दृश्य भर देते हैं। तो आइये सुनते हैं ऐसे ही दृश्य को दर्शाती इस ठुमरी को, शोभा गुर्टू जी की आवाज़ में।


"आज बिरज में होरी रे रसिया
आज बिरज में होरी रे रसिया
अबीर गुलाल के बादल छाए
अबीर गुलाल के बादल छाए
आज बिरज में होरी रे रसिया

आज बिरज में होरी रे रसिया"


सुप्रभात! रविवार की इस रंगीन सुबह में सुर-संगम की १२वीं कड़ी लिए मैं सुमित चक्रवर्ती पुन: उपस्थित हूँ। दोस्तों क्या कभी आपने महसूस किया है कि होली के आते ही समां में कैसी मस्ती सी घुल जाती है. इससे पहले कि आप बाहर निकल कर रंग और गुलाल से जम कर होली खेलें जरा संगीत के माध्यम से अपना मूड तो सेट कर लीजिए. आज की हमारी कड़ी भी रंगों के त्योहार - होली पर ही आधारित है जिसमें हमने पारंपरिक लोक व शास्त्रीय संगीत की होली रचने की एक कोशिश की है। भारतीय त्योहारों में होली को शास्त्रीय व लोक संगीत का एक महत्त्वपूर्ण घटक माना गया है। रंगों का यह उत्सव हमारे जीवन को हर्षोल्लास व संगीत से भर देता है। फाल्गुन के महीने में पिचकारियों से निकले रंग मानो मुर्झाने वाली, शीतकालीन हवाओं को बहाकर पृथ्वी की छवि में बसंत ऋतु के जीवंत दृश्य भर देते हैं। तो आइये सुनते हैं ऐसे ही दृश्य को दर्शाती इस ठुमरी को, शोभा गुर्टू जी की आवाज़ में।

ठुमरी - आज बिरज में होरी रे रसिया


होली भारत के सबसे जीवंत व उल्लास भरे त्योहारों में से एक है। इसे देश के हर कोने में अलग-अलग और अनूठी शैलियों में मनाया जाता है जिसकी झलक मूलत: इन प्रांतों के संगीत में पाई जाती है। होली के साथ जुड़ी संगीत शैलियाँ भिन्न होते हुए भी मुख्यतः पौराणिक संदर्भ और लोककथाओं पर आधारित होती हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत शैली के मूल १० निम्नलिखित रूप हैं - ध्रुपद, धामर, होरी, ख़याल, टप्पा, चतुरांग, राग अगर, तराना, सरगम और ठुमरी। इनमें से ध्रुपद शैली को सबसे प्राचीन माना जाता है तथा बाकी सभी शैलियों का जन्म भी इसी से हुआ। 'होरी' ध्रुपद का ही सबसे लोकप्रिय रूप है जिसे होली के त्योहार पर गाया जाता है। ये रचनाएँ मुख्यतः राधा-कृष्ण के प्रेम-प्रसंग और बसंत ऋतु पर आधारित होती हैं। दिलचस्प बात यह है कि इसे शास्त्रीय व अर्धशास्त्रीय दोनों रूपों में प्रस्तुत किया जाता है। होरी को साधारणतः बसंत, काफी व खमाज आदि रागों और दीपचंदी ताल में गाया जाता है। तो चलिए क्यों न हम भी एक बार फिर से रंग जाएँ गिरिजा देवी द्वारा प्रस्तुत इस 'होरी' के रंग में।

उड़त अबीर गुलाल - गिरिजा देवी


भारतीय संगीत में जब हम होली की बात कर ही रहे हैं तो फ़िल्मी गीतों का उल्लेख करना भी अनिवार्य बन जाता है। हमारी हिन्दी फ़िल्मों में भी अक्सर होली पर आधारित गीतों को दर्शाया जाता है जो किसी न किसी राग या ठुमरी पर ही आधारित होते है। होली पर आधारित फ़िल्मी गीतों में मैं जिस गीत को नींव का पत्थर मानता हूँ वह है फ़िल्म 'नवरंग' का अत्यंत लोकप्रिय गीत - 'अरे जारे हट नटखट ना छेड़ मेरा घूँघट'। यह गीत संगीतकार सी. रामचन्द्र ने राग पहाड़ी पर रचा और इसके बोल लिखे भरत व्यास ने। इस गीत को गाया था स्वयं सी. रामचन्द्र, आशा भोंसले और महेन्द्र कपूर ने तथा गीत में दर्शाया गया था अभिनेत्री सन्ध्या को राधा-कृष्ण की अट्खेलियों को नृत्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए। आइये आनंद लेते हैं इस रंगारंग गीत का।

अरे जा रे हट नटखट - नवरंग


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। 'सुर-संगम' के ५०-वे अंक तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए इस टुकड़े को और पहचानिए कि यह कौन सा वाद्‍य है।



पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित तिवारी जी ने गीत को और उसके राग को बिलकुल सही पहचाना और ५ अंक अर्जित कर लिए हैं। बधाई व शुभकामनाएँ!

तो लीजिए, हम आ पहुँचे हैं 'सुर-संगम' की आज की कड़ी की समाप्ति पर। आशा है आपको यह कड़ी पसन्द आई। सच मानिए तो मुझे भी बहुत आनन्द आया इस कड़ी को लिखने में। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। हमारे और भी श्रोता व पाठक आने वाली कड़ियों को सुनें, पढ़ें तथा पहेलियों में भाग लें, इसी आशा के साथ आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने मित्र सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए, आप सभी को होली की पुनः ढेरों शुभकामनाएँ, नमस्कार!

प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

बुधवार, 11 मार्च 2009

खेलें मसाने में होरी दिगम्बर खेलें मसाने में होरी

लोकगायक छन्नूलाल मिश्रा की आवाज़ में 'होली के रंग टेसू के फूल' एल्बम के सभी गीत

होली त्योहार के साहित्य में होली का सबसे अधिक जिक्र बृजभाषा के साहित्य में मिलता है। मेरे दीमाग में यह बात थी कि इस होली पर श्रोताओं को कुछ ओरिजनल सुनाया जाय। होली की वहीं खुश्बू बिखराई जाये जो बृज गये बिना महसूस कर पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन लोकगायक पंडित छन्नूलाल मिश्रा अपनी बेमिसाल गायकी से यह काम आसान कर देते हैं।

पिछले महीने जब मैं पश्चिम बंगाल, झारखण्ड औरे उत्तर प्रदेश की यात्रा पर था तो संयोग से बनारस जाना हुआ। विश्वप्रसिद्द शास्त्रीय गायक छन्नूलाल वहीं निवासते हैं। सोचा कि उनका इंटरव्यू लेता चलूँ और साथ ही साथ उन्हीं की आवाज़ में एक होरी-गीत की जीवंत रिकॉर्डिंग भी कर लूँ। लेकिन फिर सोचा कि पहले अपने श्रोताओं को छन्नूलाल मिश्रा से परिचय तो कराऊँ, साक्षात्कार तो कभी भी ले लूँगा। उसी दिन तय कर लिया था कि छन्नूलाल के प्रसिद्ध एल्बम 'होली के रंग टेसू के फूल' के गीत पहले श्रोताओं को सुनावाउँगा।

दोस्तो, ३ अगस्त १९३६ को उ॰ प्र॰ के आजमगढ़ जनपद के हरिहरपुर गाँव में जन्में छन्नूलाल मिश्रा भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध घराने 'किराना घराना' के विशेष रूप से ख्याल गायन और पूरब-अंग (ठुमरी) के कलाकार के तौर पर जाने जाते हैं। इनके दादा पंडित शांता प्रसाद (गुदाई महाराज) ए चर्चित तबलावादक थे। छन्नूलाल बिहार के तबलावादक अनोखेलाल जी महाराज के दामाद हैं। शुरूआत में इन्होंने अपने पिता पंडित बद्री प्रसाद मिश्रा से ही संगीत की शिक्षा लेनी आरम्भ की, जो कि किराना घराने के उस्ताद अब्दुल ग़नी ख़ान तक ज़ारी रही। बहुत बाद में ये ठाकुर जयदेव सिंह के भी शागिर्द रहे।

आज ये अपनी बनारसी गायकी और पंजाब गायकी के लिये लोगों में पहचाने जाते हैं। (विशेषतौर पर ख्याल, दादरा, ठुमरी, चैती, कजरी, होरी और भजन)।

आज हम इनकी गायकी की उन्हीं विविधरंगों में होरी का रंग लेकर आये हैं। 'होली के रंग टेसू के फूल' एल्बम का गीत 'खेलें मसाने में होरी दिगम्बर' इनका चर्चित होरी गीत है, जिसका लाइव कंसर्ट संस्करण हम आपको सुनवा रहे हैं।
(यह गीत एल्बम के गीत से थोड़ा सा अलग है)



'होली के रंग टेसू के फूल' एल्बम के सारे गीत यहाँ से सुनें और लोकधुनों की बयार में खुद को भुला दें।



जल्द ही छन्नूलाल जी से एक भेंटवार्ता भी सुनवाउँगा।

इससे आगे>>>>'ओल्ड इज गोल्ड' शृंखला के तहत सुजॉय-सजीव की होली विशेष प्रस्तुति सुनना न भूलें

Album: Holi Ke Rang Tesu Ke Phool, Composer & Singer: Pandit Channulal Mishra
Tracks:
01 - Aaye Khelan Hori
02 - Holi Khelat Nandkumar
03 - Rang Darungi Darungi Rang Darungi
04 - Barjori Karo Na Mose Hori Mein
05 - Holi Ke Din Dekho Aayee Re
06 - Kanhaiya Ghar Chalo Guiya
07 - Girdharilal Chhar Mori Bahiyaan
08 - Khalayn Masanay Mayn Hori Digamber

"आज बिरज में होरी रे रसिया...."- लीपिका भट्टाचार्य की आवाज़ में सुनिए "होरी" गीत

सभी पाठकों और श्रोताओं को होली की शुभकामनायें. आज होली के अवसर पर आवाज़ पर भी कुछ बहुत ख़ास है आपके लिए. इस शुभ दिन को हमने चुना है आपको एक उभरती हुई गायिका से मिलवाने के लिए जो आपको अपनी मधुर आवाज़ में "होरी" के रंगों से सराबोर करने वाली हैं.

गायिका और संगीत निर्देशिका लीपिका भट्टाचार्य लगभग तभी से युग्म के साथ जुडी हैं जब से हमने अपने पहले संगीतबद्ध गीत के साथ युग्म पर संगीत रचना की शुरुआत की थी. उन दिनों वो एक जिंगल का काम कर चुकी थी. पर चूँकि हमारा काम इन्टरनेट आधारित रहा तो इसमें अलग अलग दिशाओं में बैठे कलाकारों के दरमियाँ मेल बिठाने के मामले में अक्सर परेशानियाँ सामने आती रही. लीपिका भी इसी परेशानी में उलझी रही, इस बीच उन्होंने अपनी दो कृष्ण भजन की एल्बम का काम मुक्कमल कर दिया जिनके नाम थे -"चोरी चोरी माखन" और "हरे कृष्ण". इन सब व्यस्तताओं के बीच भी उनका आवाज़ से सम्पर्क निरंतर बना रहा. बीच में उनके आग्रह पर हमने शोभा महेन्द्रू जी का लिखा एक शिव भजन उन्हें भेजा था स्वरबद्ध करने के लिए पर बात बन नहीं पायी. अब ऐसी प्रतिभा की धनी गायिका को आपसे मिलवाने का होली से बेहतर मौका और क्या हो सकता था. तो आईये लीपिका के स्वरों और सुरों के रंग में रंग जाईये और डूब जाईये होली की मस्ती में. यदि आप होली नहीं भी खेलते तो हमारा दावा है लीपिका के इस "होरी" गीत को सुनने के बाद आपका भी मन मचल उठेगा रंग खेलने के लिए. लीजिये सुनिए -



इसके आगे है>>>>>होरी गीतों के मशहूर जनगायक पंडित छन्नूलाल मिश्रा के गीतों से सजी शैलेश भारतवासी की प्रस्तुति

होली मुबारक


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