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Sunday, June 1, 2014

सौ रंग बिखेरती मधुर सारंगी


स्वरगोष्ठी – 170 में आज


संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला – 8



मानव-कण्ठ का अनुकरण करने में सक्षम लोक और शास्त्रीय तंत्रवाद्य सारंगी 
 



 ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ की आठवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी स्तम्भकार सुमित चक्रवर्ती के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ कम प्रचलित, लुप्तप्राय अथवा अनूठे संगीत वाद्यों की चर्चा कर रहे हैं। वर्तमान में शास्त्रीय या लोकमंचों पर प्रचलित अनेक वाद्य हैं जो प्राचीन वैदिक परम्परा से जुड़े हैं और समय के साथ क्रमशः विकसित होकर हमारे सम्मुख आज भी उपस्थित हैं। कुछ ऐसे भी वाद्य हैं जिनकी उपयोगिता तो है किन्तु धीरे-धीरे अब ये लुप्तप्राय हो रहे हैं। इस श्रृंखला में हम कुछ लुप्तप्राय और कुछ प्राचीन वाद्यों के परिवर्तित व संशोधित स्वरूप में प्रचलित वाद्यों का भी उल्लेख कर रहे हैं। वाद्य परिचय श्रृंखला की आज यह समापन कड़ी है और आज की इस कड़ी में हम आपसे एक ऐसे गज-तंत्र-वाद्य की चर्चा करेंगे जो सम्भवतः सबसे प्राचीन तंत्रवाद्य है। इस बहुउपयोगी वाद्य का प्रचलन क्रमशः कम होता जा रहा है, किन्तु लोक और शास्त्रीय, दोनों मंचों पर आज भी इसे देखा जा सकता है। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमारे साथी सुमित चक्रवर्ती सारंगी के दो लोक स्वरूप पर चर्चा कर रहे हैं। 



लाखा खाँ  (सारंगी) और दाने खाँ (ढोलक)
श्चिमी राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है- ‘ताल मिले तो पगाँ रा घुँघरू बाजे’, अर्थात ‘संगीत में यदि सधी हुई ताल की संगति मिल जाए तो पैरों के घुँघरू स्वतः बज उठते हैं’। राजस्थानी लोक संस्कृति में लोकवाद्यों का काफ़ी प्रभाव रहा है। प्रदेश के विभिन्न अंचलों में वहाँ की संस्कृति के अनुकूल स्थानीय लोकवाद्य खूब रचे-बसे हैं। जिस क्षेत्र में स्थानीय वाद्यों को फलने-फूलने का अवसर मिला, उन वाद्यों की धूम देश के कोने-कोने से लेकर विदेशों तक मची है। ऐसा ही एक राजस्थानी लोक-तंत्र-वाद्य ‘सारंगी’ है। सारंगी शब्द ‘सौ’ और ‘रंग’ शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है सौ रंगों को बिखेरने वाला वाद्य। ऐसा नाम शायद इसे इसलिए मिला कि मानव के गले की प्रायः सभी हरकतों के अनुकरण का गुण इस वाद्य में मौजूद है। सारंगी प्राचीन काल में घुमक्कड़ जातियों का वाद्य रहा है। मध्यकाल में जब गायन, वादन और नर्तन को राजदरबारों का संरक्षण मिला तो यह गायन और नृत्य का प्रमुख संगति वाद्य बना। शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठित होने के बावजूद सारंगी का लोक स्वरूप फलता-फूलता रहा। इसका प्राचीन नाम ‘सारिन्दा’ था जो कालान्तर के साथ ‘सारंगी’ हुआ। राजस्थान में सारंगी के विविध रूप दिखाई देते हैं। मिरासी, लंगा, जोगी, माँगणियार आदि जाति के कलाकारों द्वारा बजाया जाने वाला यह वाद्य गायन तथा नृत्य की संगति की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। संगति वाद्य के अलावा यह स्वतंत्र वाद्य के रूप में बजाया जाता है। पश्चिमी राजस्थान क्षेत्र की लंगा जाति का यह प्रमुख वाद्य है इनकी सारंगी को सिन्धी सारंगी कहा जाता है। आइए, अब हम आपको इस सारंगी का रसास्वादन कराते हैं। लंगा सारंगी वादकों में एक प्रमुख नाम लाखा खाँ का है। इनकी सारंगी को ‘लोदी’ कहा जाता है। लाखा खाँ का लोदी वादन देश-विदेश में प्रसिद्ध है। अब आप लाखा खाँ का सारंगी वादन सुनिए। ढोलक संगति उनके पुत्र दाने खाँ ने की है।


सारंगी वादन : राजस्थानी लोकधुन : वादक – लाखा खाँ लंगा : ढोलक संगति – दाने खान लंगा




श्याम नेपाली 
भरत नेपाली 
विभिन्न क्षेत्रों की लोक सारंगी भी कई प्रकार की होती है। थार क्षेत्र में ही दो अलग-अलग आकार-प्रकार की सारंगी होती है। इनमें सिन्धी सारंगी और गुजराती सारंगी अधिक लोकप्रिय है। सिन्धी सारंगी आकार में बड़ी होती है। इसे जैसलमेर और बाड़मेर ज़िले के लंगा माँगणियार द्वारा बजाया जाता है। गुजराती सारंगी, सिन्धी सारंगी से आकार में छोटी होती है। सारंगी का निर्माण शीशम और रोहिडे की लकड़ी से होता है। इसका निचला हिस्सा जिसे कुंडी कहा जाता है, बकरे की खाल से मढ़ा जाता है। इसके पेंदे के ऊपरी भाग में सींग की बनी घोड़ी होती है। घोड़ी के छेदों में से तार निकालकर किनारे पर लगे चौथे में उन्हें बाँध दिया जाता है। इस वाद्य में 29 तार होते हैं तथा मुख्य बाज में चार तार होते हैं जिनमें से दो तार स्टील के व दो तार ताँत के होते हैं। ताँत के तार को ‘राँदा’ कहते हैं। बाज के तारों के अलावा झोरे के आठ तथा झीले के 17 तार होते हैं। बाज के तारों पर गज, की रगड़ से सुर निकलते हैं। सारंगी के ऊपर लगी खूँटियों को झीले कहा जाता है। पैंदे में बाज के तारों के नीचे घोड़ी में आठ छेद होते हैं। इनमें से झारों के तार निकलते हैं। एक प्रतीकात्मक समस्वरित सारंगी की आवाज़ किसी मधुमक्खी के छत्ते से आती भनभनाहट जैसी होती है। सारंगी वाद्य बजाने में राजस्थान की सबसे पारंगत जाति है, सारंगिया लंगा।

सारंगी की सुरमई तान और लोकगायकी जब एक साथ निकलती है तब सुनने वाला हर दर्शक और श्रोता सब कुछ छोड़ कर इसमें खो जाता है, क्योंकि इस वाद्ययंत्र में अनूठी विशेषताएँ हैं। यह नेपाल का भी पारम्परिक वाद्य है, परन्तु नेपाली सारंगी में केवल चार तार होते हैं। नेपाली सारंगी का प्रयोग आमतौर पर लोक गायक करते हैं। ये गायक अपने गायन के दौरान स्वयं सारंगी वादन भी करते हैं। आइये, आज की चर्चा को यहीं विराम देते हुए आपको नेपाली सारंगी वादन का एक उदाहरण सुनवाते हैं। नेपाल के दो लोक कलाकार, भरत नेपाली और श्याम नेपाली क्रमशः दो लोकधुन प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इन लोकधुनों का आनन्द लीजिए और हमें ‘संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला’ को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


नेपाली सारंगी वादन : लोकधुन : वादक – भरत नेपाली और श्याम नेपाली





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 170वें अंक की पहेली में आज हम आपको गायन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।






1 – भारतीय संगीत की इस शैली का नाम बताइए।

2 – गीत का यह अंश सुन कर राग पहचानिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 172वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 168वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘बारादरी’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- तालवाद्य – घड़ा या घटम। पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- कहरवा ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हमने संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला के अन्तर्गत सारंगी वाद्य के लोक स्वरूप के बारे में चर्चा की। भारतीय संगीत वाद्यों पर इस लघु श्रृंखला को अब हम यहीं विराम देते हैं। भविष्य में इस प्रकार की श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत करेंगे। अगले अंक में हम आपका परिचय एक ऐसे संगीत-साधक से कराएँगे जिनका योगदान मंच प्रदर्शन से कहीं अधिक भारतीय संगीत के प्रचारक और विस्तारक के रूप में है। यह अंक ‘व्यक्तित्व’ श्रृंखला के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जाएगा। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे। 



आलेख : सुमित चक्रवर्ती
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, September 16, 2012

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला : पं. श्रीकुमार मिश्र से बातचीत


स्वरगोष्ठी – ८८ में आज
संगीत के सौ रंग बिखेरती सारंगी

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आपकी गोष्ठी में उपस्थित हूँ और आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। मित्रों, यह ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ का सौभाग्य रहा है कि इसे आरम्भ से ही संगीत-साधकों, संगीत-शिक्षकों और संगीत-प्रेमियों का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा। हमारे एक ऐसे ही मार्गदर्शक हैं जाने-माने इसराज और मयूर वीणा वादक और शिक्षक पं. श्रीकुमार मिश्र। पिछले दिनों उनकी कक्षा में मैं आकस्मिक रूप से जब पहुँचा तो आश्चर्यचकित रह गया। लगभग अप्रचलित इन गज-वाद्यों को सीखने के लिए कुल ९ विद्यार्थी उस कक्षा में उपस्थित थे, जिनमें ५ बालिकाएँ थीं। श्रीकुमार जी इन बच्चों को एक सरल सी तान का अभ्यास करा रहे थे। मैंने संगीत के उन विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की सराहना की और श्रीकुमार जी से गज-तंत्र वाद्यों के बारे में ‘स्वरगोष्ठी’ के लिए कुछ बातचीत करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार कर लिया। आज के अंक में हम इस बातचीत के सम्पादित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के समस्त पाठकों-श्रोताओं की ओर से आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आज हम आपसे गज से बजने वाले वाद्यों के विषय में कुछ बातचीत करना चाहते हैं।

श्रीकुमार मिश्र : मेरा अहोभाग्य, जो ‘स्वरगोष्ठी’ के गुणी पाठकों से संवाद का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। मुझे अपने गुरुओं से जो प्राप्त हुआ और स्वाध्याय से जो कुछ भी अर्जित किया, उसे आपके साथ बाँटने में अत्यधिक प्रसन्नता होगी।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, आज आपसे हम संगीत के ऐसे तंत्रवाद्यों पर चर्चा करना चाहते हैं जिन्हें गज (Bow) से बजाया जाता है।

श्रीकुमार मिश्र : वर्तमान भारतीय संगीत में गज से बजने वाले जितने भी तंत्रवाद्य प्रचलित हैं, उनमें सबसे प्राचीन वाद्य सारंगी है। अन्य तंत्रवाद्यों की भाँति गज-तंत्र वाद्यों में भी वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक अनेक परिवर्तन-संशोधन होते रहे। वैदिक काल के तंत्रवाद्यों के नाम ‘हिरण्यकेशी सूत्र’ में मिलता है। इस सूत्र के आधार पर ताल्लुक वीणा, काण्ड वीणा, चिच्छोरा, आलापु वीणा, कपिशीर्ष वीणा आदि के स्वरूप की कल्पना की जा सकती है। इसी प्रकार रामायणकाल के तंत्रवाद्यों के बारे में बाल्मीकि कृत ‘रामायण’ के एक प्रसंग में रावण के संगीत कक्ष में विपंची, मत्त कोकिला, वीणा, आदि वाद्यों का उल्लेख किया गया है। एक धारणा तो यह भी है कि रावणहत्था नामक तंत्रवाद्य वर्तमान सारंगी का प्राचीन रूप था, किन्तु इस धारणा की पुष्टि मैं अब तक किसी ग्रन्थ से नहीं कर पाया हूँ। हाँ, प्रोफेसर लालमणि मिश्र ने अपनी पुस्तक में यह उल्लेख अवश्य किया है कि सारंगी का ही एक प्राचीन रूप श्रीलंका में लोकवाद्य के रूप में प्रचलित था। कालान्तर में यही वाद्य राजस्थान पहुँचा और यहाँ इसका नामकरण ‘रावणहत्था’ हुआ। राजस्थान के लोक संगीत में आज भी सारंगी के अनेक प्रकार मिलते हैं। इन्हीं में एक प्रकार है ‘सिन्धी सारंगी’, जिसे लंगा जाति के लोक कलाकार आज बहुतायत में प्रयोग करते हैं। इसमें मुख्य चार तारों में दो लोहे के और दो ताँत के होते हैं। इसके अलावा सात झारा के और १७ तरब के तार होते हैं।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, हमारे पास सिन्धी सारंगी की एक रिकार्डिंग है, जिसे हबीब खाँ लंगा ने बजाया है। सारंगी के अन्य लोकरूपों की चर्चा को हम जारी रखेंगे, परन्तु पहले सिन्धी सारंगी का वादन सुनते हैं।

सिन्धी सारंगी : वादक – हबीब खाँ लंगा



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, लोक संगीत में प्रचलित सारंगी के कुछ अन्य प्रकारों के बारे में भी हमारे पाठकों को बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : संरचना के अनुसार लोक संगीत में अनेक प्रकार की सारंगी का प्रयोग किया जाता है। राजस्थान की लंगा जाति के लोक कलाकार सिन्धी सारंगी के अलावा एक और प्रकार की सारंगी का प्रयोग करते हैं, जिसे गुजराती सारंगी कहा जाता है। इसमें चार मुख्य और आठ सहायक तार होते हैं। इसे रोहिदा नामक लकड़ी से बनाया जाता है। इसी प्रकार उत्तर भारत में भिक्षाटन कर जीवन-यापन करने वाले जोगियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली सारंगी ‘जोगिया सारंगी’ कहलाती है। यह तून की लकड़ी द्वारा निर्मित छोटी सारंगी होती है, जिसके तुम्बे पर खाल मढ़ी होती है। इसमें ताँत के तीन तार होते हैं। इसी प्रकार निहालदे के जोगियों द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली सारंगी ‘धानी सारंगी’ कहलाती है। इसका तुम्बा सपाट होता है और इसमें मुख्य चार तारों में दो लोहे के और दो ताँत के तार होते हैं। इस प्रकार की सारंगी में आठ सहायक तार भी होते हैं। लोक सारंगी का ही एक विकसित रूप है, जिसे ‘अलाबु सारंगी’ नाम से पुकारा जाता है। जैसलमेर के मांगनियार जाति के लोक कलाकार इस सारंगी का प्रयोग करते हैं। सारंगी का ही एक प्रचलित लोक स्वरूप है जिसे ‘नेपाली सारंगी’ कहा जाता है। इसकी खोखली कुंडी या तुम्बे का निचला आधा हिस्सा चमड़े से मढ़ा होता है और आधा हिस्सा खुला होता है।

कृष्णमोहन : सारंगी के लोक और शास्त्रीय स्वरूप की चर्चा को हम जारी रखेंगे, परन्तु यहाँ थोड़ा विराम लेकर अपने पाठकों-श्रोताओं को नेपाली सारंगी का एक उदाहरण सुनवाते है।

नेपाली सारंगी : वादक – जंगबहादुर गन्धर्व



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, सारंगी का वर्तमान शास्त्रीय स्वरूप भी तो परम्परागत रूप से ही विकसित हुआ है। हम चाहेंगे कि हमारे पाठको-श्रोताओं को इस वाद्य की कुछ असाधारण विशेषताओं और वादन शैली के बारे में बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : सारंगी एक ऐसा वाद्य है, जो मानव-कण्ठ की अनुकृति करने में सक्षम है। अपने इस गुण के कारण सारंगी रागदारी संगीत के गायक कलाकारों की संगति के लिए सर्वप्रिय वाद्य बना रहा। गायक कलाकारों की आवश्यकतानुसार समय-समय पर सारंगी की बनावट में परिवर्तन होते रहे। मध्यकाल में चार मुख्य तारों की बड़ी सारंगी का प्रयोग किया जाता था। इसे चारगा की सारंगी कहा जाता था। इस सारंगी के पहले तार को ज़ील, दूसरे को डेवढ़, तीसरे को खरज और चौथे तार को लरज़ कहते हैं। प्राचीन काल के गायकों में मन्द्र और अतिमन्द्र गायन का चलन था। ऐसे में सारंगी के चौथे तार की उपयोगिता थी। परन्तु धीरे-धीरे मन्द्र और अतिमन्द्र स्वरों में गायन का चलन कम होता गया और आधुनिक सारंगी से चौथा तार हट गया। अधिकतर आधुनिक सारंगी में अब तीन मुख्य तारों का ही प्रयोग होता है।

कृष्णमोहन : शास्त्रीय वाद्य के रूप में सारंगी वाद्य का अधिकतर प्रयोग संगति वाद्य के रूप में हुआ है, किन्तु विगत कुछ दशक से सारंगी के स्वतंत्र वादन का चलन भी बढ़ा है। इस प्रश्न का उत्तर भी आपसे अपेक्षित है, किन्तु उससे पहले हम अपने संगीत-प्रेमी श्रोताओ को स्वतंत्र सारंगी वादन का एक उदाहरण सुनवाते हैं। युवा सारंगी वादक कमाल साबरी प्रस्तुत कर रहे हैं, राग रामकली। तबला संगति की है उस्ताद शफ़ात अहमद खाँ।

राग रामकली : स्वतंत्र सारंगी वादन : वादक – उस्ताद कमाल साबरी



श्रीकुमार मिश्र : आपने बिलकुल ठीक कहा, सारंगी के तंत्रों से उत्पन्न नाद, मानव के कण्ठ-नाद से मेल खाने के कारण इस वाद्य का प्रयोग संगति वाद्य के रूप में अधिक हुआ है। परन्तु पिछले ५०-६० वर्षों में कुछ सृजनशील सारंगी वादकों ने इसे स्वतंत्र स्वर वाद्य के रूप में भी बजाया है। जिन कलाकारों ने स्वतंत्र वादन के रूप में सारंगी को अपनाया, उन्हें अपनी स्वयं की वादन शैली भी रचनी पड़ी। इसका मुख्य कारण था कि इसे संगति वाद्य ही माना जाता था। इन कलाकारों ने अपनी स्वयं की गढ़ी गई वादन शैली के अनुकूल सारंगी वाद्य में थोड़े फेर-बदल भी किये। स्वतंत्र सारंगी वादन के क्षेत्र में पं. रामनारायण, उस्ताद साबरी खाँ और उनके सुपुत्र कमाल खाँ, वाराणसी के पं. गोपाल मिश्र, पं. हनुमानप्रसाद मिश्र, पं. बैजनाथ मिश्र, उस्ताद सुलेमान खाँ, उस्ताद सुल्तान खाँ, उस्ताद ज़हीर खाँ आदि कई ऐसे सारंगी वादक हैं जिन्होने संगति के साथ-साथ स्वतंत्र वादन के क्षेत्र में भी भरपूर ख्याति आर्जित की है।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, आपने पण्डित रामनारायन जी का नाम लिया और अब हम अपने पाठकों-श्रोताओं को उन्हीं की बजाई सारंगी सुनवाने जा रहे हैं। नीचे दिये गए प्लेयर को क्लिक कीजिए और सुनिए, पण्डित रामनारायन की बजाई राग पीलू की ठुमरी-

ठुमरी राग पीलू : स्वतंत्र सारंगी वादन : वादक – पण्डित रामनारायण



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, इस ठुमरी के साथ ही हम सारंगी के बारे में जानकारी देने के लिए ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आपका आभार व्यक्त करते हैं और अनुरोध करते हैं कि ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में भी आप हमारे बीच आएँगे और गज-तंत्र श्रेणी के कुछ और वाद्यों की चर्चा करेंगे।

श्रीकुमार मिश्र : ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ और ‘स्वरगोष्ठी’ के सभी संचालकों को धन्यवाद कि आपने संगीत प्रेमियों के इस मंच से मुझे जुडने का अवसर दिया। सभी पाठको-श्रोताओं को मेरा अभिवादन।
आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको एक गज-तंत्र-वाद्य पर प्रस्तुत एक राग-रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ९०वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१_ संगीत की यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२_ ताल की पहचान कीजिए और हमे ताल का नाम भी बताइए।


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९०वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८६वें अंक की पहेली में हमने आपको विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में एक द्रुत खयाल की रचना सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर राग ‘कलावती’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर ताल ‘एकताल’ है। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर, उत्तर प्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में हमने एक बार पुनः पण्डित श्रीकुमार मिश्र को आमंत्रित किया है। इस अंक में हम उनसे गज-तंत्र श्रेणी के कुछ ऐसे वाद्यों के विषय में चर्चा करेंगे जिनमें परदे होते हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित आपकी अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

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