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Tuesday, February 1, 2011

तेरे लिए किशमिश चुनें, पिस्ते चुनें: ऐसे मासूम बोल पर सात क्या सत्तर खून माफ़! गुलज़ार और विशाल का कमाल!

Taaza Sur Taal (TST) - 04/2011 - SAAT KHOON MAAF

एक गीतकार जो सीधे-सीधे यीशु से सवाल पूछता है कि तुम अपने चाहने वालों को कैसे चुनते हो, एक गीतकार जो अपनी प्रेमिका के लिए परिंदों से बागों का सौदा कर लेता है ताकि उसके लिए किशमिश और पिस्ते चुन सके, एक गीतकार जो प्रेमिका की तारीफ़ के लिए "म्याउ-सी लड़की" जैसे संबोधन और उपमाओं की पोटली उड़ेल देता है, एक गीतकार जो आँखों से आँखें चार करने की जिद्द तो करता है, लेकिन मुआफ़ी भी माँगता है कि "सॉरी तुझे संडे के दिन ज़हमत हुई", एक गीतकार जो ओठों से ओठों की छुअन को "ऒठ तले चोट चलने" की संज्ञा देता है, एक गीतकार जो सूखे पत्तों को आवारा बताकर ज़िंदगी की ऐसी सच्चाई बयां करता है कि सीधी-सादी बात भी सूफ़ियाना लगने लाती है .. यह एक ऐसे गीतकार की कहानी है जो शब्दों से ज्यादा भाव को अहमियत देता है और इसलिए शब्दों के गुलेल लेकर भावों के बगीचे में नहीं घुमता, बल्कि भावों के खेत में खड़े होकर शब्दों की चिड़ियों को प्यार से अपने दिल के मटर मुहैया कराता है और फिर उन चिड़ियों को छोड़ देता है खुले आसमान में परवाज़ भरने के लिए, फिर जो भी बहेलिया उन चिड़ियों को अपनी समझ के गुलेल से बस में करने की कोशिश करता है, उसे उन "परिंदों" के पर हीं नसीब होते है, लेकिन जिसे खुले आसमान से प्यार है, वह उन "पाखियों" की हरेक उड़ान का मर्म जान लेता है और न जानते हुए भी जुड़ जाता है उस जादूगर से जिसके पास बार-बार लौटकर ये पंछी जाया करते हैं। यह एक ऐसे गीतकार की कहानी है, जिसे यूँ हीं "गुलज़ार" नहीं कहा जाता।

अब खैर तो नहीं,
कोई बैर तो नहीं,
दुश्मन जिये मेरा,
वो भी गैर तो नहीं..
(ओ मामा)

अपने दिल को इतने प्यार से शायद हीं किसी ने दुश्मन कहा होगा, वैसे भी गुलज़ार साहब दिल और चाँद से खेलने में माहिर है.. आखिर इन्होंने हीं "दिल को पड़ोसी" कहा था और "चाँद को थाली में परोस" दिया था.. शायद हीं ऐसी कोई नज़्म या ग़ज़ल होती है, जिसमें ये चाँद का ज़िक्र नहीं करते। संभव है कि किसी नज़्म या ग़ज़ल में ये चाँद का ज़िक्र करना भूल गए हों लेकिन "एलबम" या "फिल्म" के किसी न किसी गीत में चाँद की बात निकल हीं आती है, लेकिन यह क्या... मेरे हिसाब से "सात खून माफ़" अकेली या पहली फिल्म होगी जिसमें चाँद नदारद है.. हाँ तारे हैं, गुलज़ार साहब तारों को नहीं भूलते और इसलिए कहते हैं कि "तेरे लिए मैं सीसे का आसमान बुन दूँगा, ताकि पैर में तारों की किरचियाँ न चुभें" ("तेरे लिए")। सुरेश वाडेकर साहब ने इस गाने में क्या मिसरी घोली है, उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। "तेरे लिए किशमिश चुनें, पिस्ते चुनें".. इन लफ़्ज़ों को सुनते हीं कश्मीर की वादी आँखों के सामने आ जाती है। वाडेकर साहब से विशाल ने इस गाने में वही तिलिस्म बुनवाया है, जो ओंकारा के "जाग जा" में नज़र आया था।

गुलज़ार साहब "तू" से "आप" का सफ़र बड़ी हीं ईमानदारी और बड़े हीं प्यार से पूरा करते हैं। मुझसे अगर एक गीतकार की हैसियत से पूछा जाए तो मुझे "तू" और "आप" दोनों हीं प्यारे हैं, लेकिन "तू" कुछ ज्यादा प्यारा है। किसी को "आप" कहकर "दिल" उड़ेल देना मुझे थोड़ा मुश्किल का काम लगता आया है, लेकिन "बेकरां" में जिस तरह से गुलज़ार साहब ने अपने नायक से "एक ज़रा चेहरा उधर कीजै इनायत होगी.......... लिल्लाह!!!" कहवा दिया है, उसके बाद तो मेरे सारे शक़-ओ-शुबहा दूर हो गए। हाँ ,अपनी प्रेयसी को "आप" कहकर भी उससे(उनसे) इश्क़ जताया जा सकता है और वो भी बड़े हीं लाजवाब तरीके से। "आँख कुछ लाल-सी है, रात जागे तो नही, रात जब बिजली गई, डर के भागे तो नही".. वाह! क्या मासूमियत है इन शब्दों में.. इस गीत को विशाल से अच्छी कोई आवाज़ नहीं मिल सकती थी.. "ओंकारा" के "ओ साथी रे" के बाद विशाल ने अपनी आवाज़ का मखमलीपन इसी गीत के लिये बचाकर रखा था मानो!

बरसों पहले जब गुलज़ार साहब ने एक नज़्म के माध्यम से भगवान शंकर से प्रश्न किया था कि "इतने सारे लोग तुम्हें दूध से नहवाते है, चिपचिपा कर देते हैं तुम्हें, धूप और अगरू के धुएँ से तुम्हारी नाक में दम कर देते हैं, फिर भी तुम हिलते-डुलते नहीं, ना हीं अपनी परेशानी बयां करते हो और ना दूसरों की परेशानी हीं सुनते हो"... "एक ज़रा छींक हीं दो तुम कि यकीं आए कि सब देख रहे हो" तभी मालूम पड़ गया था कि यह शायर ऊपर वाले से आँख में आँख डालकर सवाल पूछने की कुव्वत रखता है... तभी तो जब "यीशु" गाने में ये कहते हैं कि "गिरज़े का गज़र सुनते हो? फिर भी क्यूँ चुप रहते हो?" "क्या जिस्म ये बेमानी है, क्या रूह गरीब होती है, तुम प्यार हीं प्यार हो लेकिन, क्या प्यार सलीब होती है?" तो उस सर्वशक्तिमान की सत्ता भी कांपने लगती है। भला किसमें इतनी हिम्मत होगी जो यीशु से यह पूछे कि "रूई की तरह इस जिस्म को तुम कैसे धुनते हो?" जिस्म और रूह के अस्तित्व और अहमियत के ऐसे सवाल हमेशा-से हीं यक्ष-प्रश्न रहे हैं, काश कभी इसका जवाब मिल जाए! रेखा भारद्वाज जिस तरह से रूह में रूई डुबोकर यीशु के सलीब के सामने सवालों की एक सूची तैयार करती हैं, उससे नामुमकिन है कि "यीशु" ज्यादा देर तक चुप रह पाएँगे। सुनने वाले तो कतई नहीं रह सकते.. उनके दिलों से वाह और आह तो निकल हीं आएगी।

"खादिम को दिल पर तो इख्तियार करने दो" हो या फिर "खादिम हूँ, शहजादी को तैयार करने दो" यानि कि "डार्लिंग" हो या फिर "दूसरी डार्लिंग".. दोनों हीं मामलों में "रसियन धुन" पर थिरकती बावली को खुद के खादिम होने पर बड़ा ही गुमान है। खुद को अपने प्रेमी पर निछावर करने की ऐसी तड़प है कि वह "उसके मिलने" को "वस्ल-ए-ख़ुदा" (ख़ुदा से मिलना) मान बैठी है और इस बात से वह कतई भी शर्मिंदा नहीं है तभी तो कहती है कि "पब्लिक में सनसनी एक बार करने दो"। इस गीत में उषा उत्थुप की मर्दानी आवाज़ (जिसमें डार्लिंग की लंबी तान एक गूंज बनकर कानों में उतरती है) और रेखा भारद्वाज का "हस्कीनेस" एक दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं। यहाँ पर कौन श्रेष्ठ है का निर्णय करना जितना मुश्किल है, उतना हीं फिजूल भी। "दूसरी डार्लिंग" में उषा उत्थुप पार्श्व में चली गई हैं जहाँ पर पहले से क्लिंटन सेरेजो और फ़्रैक्वाईस कैस्टेलिनों मौजूद हैं। इस गाने की धुन एक रसियन "लोक-गीत" की धुन पर आधारित है। उस रसियन गीत को यहाँ और यहाँ सुना जा सकता है।

अगले गीत की बात करूँ उससे पहले मैं उस गीत (आवारा) के बोलों की तरफ़ सबका ध्यान आकृष्ट कराना चाहूँगा:

आवारा आवारा
हवा पे रखे सूखे पत्ते आवारा
पाँव जमीं पे लगते ही उड़ लेते हैं दुबारा
ना शाख जुड़े ना जड़ पकड़े
मौसम मौसम बंजारा

झोंका झोंका ये हवा
रोज़ उड़ाये रे
जाकी डा्ल गयी वो तो बीत गया
जाकी माटी गयी वो का मीत गया
कोई न बुलाये रे
रुत रंग लिये आई भी गई
मुठ्ठियाँ ना खुली बेरंग रही
सूखा पत्ता बंजारा


पेड़ से उतर चुके सूखे पत्तों की मिसाल देकर गुलज़ार साहब रूह से उतर चुकी जिस्म या फिर दो इंसानों के बीच खत्म चुके संबंध की कहानी कहते हैं। एक बार जो जिस्म उतर जाए वह फिर से रूह से जुड़ नहीं पाता, एक बार रिश्ते की जो डोर टूट जाए वह फिर से अपने असल रूप में आ नहीं पाती। पल भर को पत्ते जमीं पर पड़े रहें तो इसका मतलब यह नहीं होता कि उसे जड़ नसीब होने वाला है, क्योंकि अगले हीं पल उसे हवा उड़ाकर कहीं और जा पटकती है। जो एक बार डाल छोड़ दे, वह उस डाल के लिए अतीत हो जाता है, जो एक बार माटी छोड़ दे, वह अपनी ज़िंदगी हीं गंवा बैठता है, फिर चाहे कितने भी मौसम आएँ और जाएँ उस पत्ते के लिए मौसम की मुट्ठी में कोई भी पैगाम, कोई भी खुशखबरी नहीं होती। और इस तरह वह सूखा पत्ता आवारा और बंजारा बनकर रह जाता है। इस लिए यही कोशिश होनी चाहिए कि "वह डोर कभी न टूटे".. आखिर रहीम ने भी तो कहा है:

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे तो फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ि जाय
...

रहींम तो इस बात का यकीन दिलाते हैं कि जुड़ना संभव है, लेकिन गुलज़ार साहब की नज़रों में "एक बार नज़र से गिरे तो फिर नज़र में चढने की कोई संभावना नहीं है।" इस गीत को पढने के बाद ऐसा लगता है कि राहत फ़तेह अली ख़ान साहब हीं इसके साथ सही न्याय कर सकते हैं, लेकिन विशाल ने इस बार एक नए गायक "मास्टर सलीम" में अपना यकीन दिखाया है और यकीनन सलीम साहब इसे निबाहने में खरे उतरते हैं।

अगले दो गाने "ओ मामा" और "दिल दिल है" रॉक शैली के हैं। "ओ मामा" में के के की आवाज़ है तो "दिल दिल है" में "सूरज जगन" की। "के के" लगभग दस साल बाद विशाल के साथ लौटे हैं। "अनुराग कश्यप" की "अनरीलिज़्ड फिल्म" "पाँच" में "के के" के गाए गीत "सर झुका ख़ुदा हूँ मैं" को बहुत सारी प्रशंसा हासिल हुई थी। अगर यह फिल्म रीलिज़ हुई होती तो निस्संदेह यह प्रशंसा सैकड़ों गुणा बढ चुकी होती, लेकिन संगीत की सही समझ रखने वालों को इससे कोई खासा फ़र्क नहीं पड़ता। हम सब "के के" की काबिलियत से अच्छी तरह वाकिफ़ है, इसलिए "ओ मामा" में "म्याऊँ-सी लड़की" सुनकर खुश भी होते हैं और झूम भी पड़ते हैं। जहाँ तक "दिल दिल है" की बात है तो "सूरज जगन" की गायकी "विशाल दादलानी" की तरह सुनाई पड़ती है। सूरज कहीं भी कमजोर नहीं पड़े हैं, लेकिन मेरे हिसाब से विशाल दादलानी होते तो बात हीं कुछ और होती। वैसे यह अच्छी ख़बर है कि विशाल भारद्वाज कुछ गिने-चुने गायकों तक हीं सीमित नहीं है, बल्कि नए-नए गायकों को उनकी आवाज़ और पहुँच के हिसाब से मौका दे रहे हैं। अगर ऐसी बात नहीं होती तो हमें इस फ़िल्म में "सुखविंदर" और "राहत" साहब के गाने सुनने को ज़रूर मिलते।

आपने गौर किया होगा कि हमारी यह समीक्षा "गीतकार" के लिए ज्यादा थी बनिस्पत संगीतकार और गायक-गायिकाओं के। अब क्या करें हम! जहाँ गुलज़ार साहब नज़र आ जाते हैं तो नज़र उनसे हटती हीं नहीं। और वैसे भी हमारी संगीत की समझ बहुत कम है। हम किसी भी गाने में बोल को तरज़ीह देते हैं, क्योंकि हम खुद ठहरे एक "संघर्षरत गीतकार" :)

वैसे एक बात कहना चाहूँगा कि आज के दौर में "विशाल भारद्वाज" एकमात्र ऐसे संगीतकार हैं जो "कविता" की कद्र करते हैं और जानते हैं कि "एक गीतकार" (अमूमन "गुलज़ार साहब") के शब्दों को कितनी अहमियत दी जानी चाहिए, तभी तो इनका हर एक गीत दिल के करीब पहुँच जाता है।

चलिए तो अब आज की बातचीत पर यहीं पूर्णविराम लगाते हैं। अगली मुलाकात अगले हफ़्ते होगी। तब तक "दिल दिल है" गाने से "दिल" की परिभाषा जानने की कोशिश की जाए:

सौ जन्नतों के काबिल है,
यह जाहिलों का जाहिल है..
दिल दर्द की मटकी, दिल जान की आफ़त,
बदमाशियाँ करके, दिखलाए शराफ़त..
जो दिल को चुरा ले, दिल उसकी अमानत,
सब इश्क़ के मुजरिम, एक दिल की जमानत
......

आवाज़ रेटिंग - 9/10

सुनने लायक गीत - डार्लिंग, दूसरी डार्लिंग, बेकरां, तेरे लिए, आवारा, यीशु, ओ मामा




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, December 14, 2010

मिर्च, ब्रेक के बाद, तेरा क्या होगा जॉनी, नो प्रोब्लम और इसी लाईफ़ में के गानों के साथ हाज़िर है इस साल की आखिरी समीक्षा

हम हरबार किसी एक या किन्ही दो फिल्मों के गानों की समीक्षा करते थे और इस कारण से कई सारी फिल्में हमसे छूटती चली गईं। अब चूँकि अगले मंगलवार से हम दो हफ़्तों के लिए अपने "ताजा सुर ताल" का रंग कुछ अलग-सा रखने वाले हैं, इसलिए आज हीं हमें बची हुई फिल्मों को निपटाना होगा। हमने निर्णय लिया है कि हम चार-फिल्मों के चुनिंदा एक या दो गाने आपको सुनवाएँगे और उस फिल्म के गाने मिला-जुलाकर कैसे बन पड़े हैं (और किन लोगों ने बनाया है), वह आपको बताएँगे। तो चलिए इस बदले हुए हुलिये में आज की समीक्षा की शुरूआत करते हैं।

आज की पहली फिल्म है "ब्रेक के बाद"। इस फिल्म में संगीत दिया है विशाल-शेखर ने और बोल लिखे हैं प्रसून जोशी ने। बहुत दिनों के बाद प्रसून जोशी की वापसी हुई है हिन्दी फिल्मों में... और मैं यही कहूँगा कि अपने बोल से वे इस बार भी निराश नहीं करते। अलग तरह के शब्द लिखने में इनकी महारत है और कुछ गानों में इसकी झलक भी नज़र आती है, हाँ लेकिन वह कमाल जो उन्होंने "लंदन ड्रीम्स" में किया था, उसकी थोड़ी कमी दिखी। बस एक गाना "धूप के मकान-सा" में उनका सिक्का पूरी तरह से जमा है। वैसे गाने में संगीत और गायकी की भी उतनी हीं ज़रूरत होती है और यह तो सभी जानते हैं कि विशाल-शेखर किस तरह का संगीत रचते हैं। यहाँ भी उनकी वही छाप नज़र आती है। जो उनका संगीत पसंद करते हैं (जैसे कि मैं करता हूँ), उन्हें इस फिल्म के गाने भी पसंद आएँगे, ऐसा मेरा यकीन है। चलिए तो आपको इस फिल्म से दो गाने सुनवाते हैं। पहला गाना है एलिस्सा मेन्डोंसा (शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी में से लॉय की सुपुत्री) एवं विशाल दादलानी की आवाज़ों में "अधूरे" , वहीं दूसरा गाना है नीरज श्रीधर, विशाल, शेखर एवं रिस डिसूजा की आवाज़ों में "अजब लहर"।

अधूरे


अजब लहर


"ब्रेक के बाद" के बाद आईये सुनते हैं फिल्म "तेरा क्या होगा जॉनी" के गानों को। यह फिल्म आने के पहले हीं सूर्खियों में आ चुकी है.. क्योंकि यह कई महिने पहले हीं "लीक" हो गई थी.. कईयों ने इसे "पाईरेटेड सीडीज" पर देख भी लिया है (मैंने नहीं :) )। फिल्म के नाम और इसके मुख्य कलाकार (नील नीतिन मुकेश) को देखा जाए तो यह "जॉनी गद्दार" का सिक़्वेल लगती है, लेकिन चूँकि इन दोनों के निर्देशक अलग-अलग हैं (जॊनी गद्दार: श्रीराम राघवन, तेरा क्या होगा जॉनी: सुधीर मिश्रा) तो यह माना जा सकता है कि दोनों की कहानियों में कोई समानता नहीं होगी। इस फिल्म में संगीत है पंकज अवस्थी एवं अली अज़मत का और बोल लिखे हैं नीलेश मिश्रा ,जुनैद वसी, अली अज़मत , सुरेंद्र चतुर्वेदी, सबीर ज़ाफ़र एवं संदीप नाथ ने। अभी हम आपको जो दो गाने सुनाने जा रहे हैं, उनमें पंकज अवस्थी की "लीक से हटकर" आवाज़ है, जो गीतकारों की कविताओं में चार चाँद लगा देती है। पहला गाना है "सुरेंद्र चतुर्वेदी" का लिखा "शब को रोज़" एवं दूसरा है "नीलेश मिश्रा" का लिखा "लहरों ने कहा"। ये रहे वो दो गाने:

शब को रोज़


लहरों ने कहा


अगली फिल्म है "विनय शुक्ला" की "मिर्च"। विनय अपनी फिल्म "गॉडमदर" के कारण प्रख्यात हैं। अपनी इस नई फिल्म में विनय ने "लिंग-समानता" (जेंडर-इक़्विलटी) एवं "वुमन सेक्सुवलिटी" को केंद्र में रखा है। उनका कहना है कि उन्हें यह फिल्म बनाने की प्रेरणा पंचतंत्र की कुछ कहानियों को पढने के बाद मिली। इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं "कोंकणा सेन शर्मा, राईमा सेन, सहाना गोस्वामी, इला अरूण, श्रेयस तालपड़े एवं बोमन ईरानी"। जहाँ तक संगीत की बात है तो कई सालों बाद मोंटी शर्मा बॉलीवुड की मुख्य धारा में लौटे हैं। अपनी वापसी में वे कितने सफ़ल हुए हैं, यह तो आप गाने सुनकर हीं कह सकते हैं। फिल्म में गाने लिखे हैं जावेद अख्तर साहब ने। इस फिल्म का एक गाना तो ट्रेलर आते हीं मक़बूल हो चुका है। चलिए, हम आपको पहले वही गाना सुनाते हैं (कारे कारे बदरा), जिसमें आवाज़ है शंकर महादेवन की। दूसरा गाना जो हम आपको सुनवाने वाले हैं, उसे स्वर दिया है ईला अरूण, पंडित गिरीश चट्टोपाध्याय एवं चारू सेमवाल ने। जिस तरह यह फिल्म बाकी फिल्मों से कुछ हटकर है, वही बात इसके गानों के बारे में भी कही जा सकती है। आप खुद सुने:

कारे कारे बदरा


मोरा सैंयां


आज की अंतिम दो फिल्में हैं राजश्री प्रोडक्शन्स की "इसी लाईफ़ में" एवं "अनिल कपूर प्रोडक्शन्स" कि "नो प्रोब्लम"। पहले का निर्देशन किया है विधि कासलीवाल ने तो दूसरे का अनीस बज़्मी ने। फिल्म कितनी मज़ेदार है या कितनी होगी, यह तो फिल्म देखने पर हीं जाना जा सकता है, लेकिन जहाँ तक गानों की बात है तो मुझे इन दोनों के गानों में कोई खासा दम नहीं दिखा। "मीत ब्रदर्स " एवं "अंजान अंकित" "इसी लाईफ़ के" के कुछ गानों में अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए हैं, लेकिन यह बात "नो प्रोब्लम" के "प्रीतम", "साजिद-वाजिद" या "आनंद राज आनंद" के लिए नहीं की जा सकती। चलिए तो हम सुनते हैं "मनोज मुंतसिर" का लिखा मोहित चौहान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "इसी उमर में"



और "नो प्रोब्लम" से प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध मास्टर सलीम, कल्पना एवं हार्ड कौर की आवाज़ों में कुमार का लिखा "शकीरा":



आज हमने कुछ अच्छे, कुछ ठीक-ठाक गाने सुने। आपको कौन-कौन-से गाने पसंद आए, ज़रूर लिखकर बताईयेगा। और हाँ, "ताजा सुर ताल" की अगली दो कड़ियों का ज़रूर इंतज़ार करें, आपके लिए कुछ खास हम संजोकर लाने वाले हैं। इसी वायदे के साथ अलविदा कहने का वक़्त आ गया है। धन्यवाद!

Tuesday, November 23, 2010

सुजॉय जी को शादी का तोहफ़ा देने आ गए हैं सलीम-सुलेमान और अमिताभ भट्टाचार्य "बैंड बाजा बारात" के साथ

अभी वक़्त है अपने नियमित ताज़ा सुर ताल का.. ताज़ा सुर ताल यानि कि टी एस टी, जिसके मेजबान मुख्य रूप से सुजॉय जी हुआ करते हैं। मुख्य रूप से इसलिए कहा क्योंकि हर मंगलवार के दिन समीक्षा के दौरान उनसे बातचीत होती है, अब ये बातचीत मैं करूँ या फिर सजीव जी करें... पिछली मर्तबा ये बागडोर सजीव जी ने संभाली थी और उसके पहले कई हफ़्तों तक बातचीत का वो सिरा मेरे हाथ में था.. लेकिन दूसरा सिरा हमेशा हीं सुजॉय जी थामे रहते हैं। आज के दिन और आज के बाद दो-तीन और हफ़्तों तक स्थिति अलग-सी रहने वाली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुजॉय जी घर गए हुए हैं.. अपनी ज़िंदगी के उस सिरे को संभालने जिसका दूसरा सिरा उनकी अर्धांगिनी के हाथों में है। जी हाँ, कल हीं सुजॉय जी की शादी थी। शादी बड़ी धूमधाम से हुई और होती भी क्यों नहीं, जब हम सब दोस्तों और शुभचिंतकों की दुआएँ उनके साथ थीं। हम सब तक की तरफ़ से सुजॉय जी को शादी की शुभकामनाएँ, बधाईयाँ एवं बहुत-बहुत प्यार .. (बड़ों की तरफ़ से आशीर्वाद भी).. हम नहीं चाहते थे कि इन मंगल घड़ियों में उन्हें थोड़ा भी तंग किया जाए, इसलिए कुछ हफ़्तों तक ताज़ा सुर ताल मैं अकेले हीं (या फिर कभी-कभार सजीव जी के साथ) हीं संभालने वाला हूँ। आपसे उसी प्रोत्साहन की उम्मीद रहेगी, जो सुजॉय जी को हासिल होती है। धन्यवाद! चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का शुभारंभ करते हैं।

इसे इत्तेफ़ाक़ हीं कहेंगे कि शादी की बातें करते-करते हम जिस फिल्म की समीक्षा करने जा रहे हैं, वह फिल्म भी शादियों को हीं ध्यान में रख कर बनी है। यशराज बैनर्स के तहत आने वाली इस फिल्म का निर्देशन किया है मनीष शर्मा ने, कहानी भी उन्हीं की है, जबकि पटकथा लिखी है हबीब फैजल ने। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह। फिल्म १० दिसम्बर २०१० को रीलिज होने वाली है। इस फिल्म में संगीत है पार्श्व-संगीत के दम पर हिन्दी-फिल्मों में अपनी पहचान बनाने वाले "सलीम-सुलेमान" बंधुओं का और गीत लिखे हैं "अमित त्रिवेदी" के खासम-खास "अमिताभ भट्टाचार्य" ने (देव-डी, उड़ान)।

फिल्म का पहला गाना है "ऐं वैं.. ऐं वैं".. आवाज़ें हैं सलीम मर्चैंट और सुनिधि चौहान की। गाने की धुन ऐसी है कि पहली बार में हीं आपके मन पर छा जाए और संयोजन भी कमाल का है। गीत सुनकर डान्स-फ्लोर पर उतरने को जी करने लगता है। चूंकि गाने के माध्य्म से पंजाबी माहौल तैयार किया गया है, इसलिए पार्श्व में बैंजो और बांसुरी को आराम से महसूस किया जा सकता है। अमिताभ के बोल बाकी नियमित पंजाबी गानों (भांगड़ा) से काफी अलग हैं। "चाय में डुबोया बिस्किट हो गया" या फिर "गुड़ देखा, मक्खी वहीं फिट हो गया".. जैसी पंक्तियाँ विरले हीं सुनने को मिलती है। मुझे यह गाना बेहद भाया। इस गाने का एक "दिल्ली क्लब मिक्स" भी है, जिसमें मास्टर सलीम ने सलीम मर्चैंट का स्थान लिया है। मास्टर सलीम के आने से "माँ दा लाडला" वाली फिलिंग आ जाती है। थोड़ी कोशिश करने पर आप आवाज़ में इस परिवर्तन को महसूस कर सकते हैं। दोनों हीं गाने अच्छे हैं।

गीत - ऐं वैं


गीत - ऐं वैं (दिल्ली क्लब मिक्स)


अब बढते हैं अगले गाने की ओर। यह गाना है "तरकीबें", जिसे गाया है बेन्नी दयाल ने और उनका बेहतरीन तरीके साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। सलीम-सुलेमान और बेन्नी दयाल की जोड़ी "पॉकेट में रॉकेट" के बाद एक बार फिर साथ आई है। कहीं कहीं यह गाना उसी गाने का एक्सटेंशन लगता है। बेन्नी दयाल एक बार फिर सफल हुए हैं, अपनी आवाज़ का जादू चलाने में। लेकिन मेरे हिसाब से इस गाने की सबसे खूबसूरत बात है, इसके बोल। "अनकन्वेशनल राईटिंग" की अगर बात आएगी, तो इस गाने को उसमें जरूर शुमार किया जाएगा। "कंघी हैं तरकीबें" या फिर "हौसलें सेंक ले" जैसे विचार आपको सोचने पर और सोचकर खुश होने पर मजबूर करते हैं।

गीत - तरकीबें


अगला गाना है "श्रेया घोषाल" की आवाज़ में "आधा इश्क़"। आजकल यह कहावत चल पड़ी है कि श्रेया कभी गलत नहीं हो सकती और श्रेया का गाया गाना कभी बुरा नहीं हो सकता। तो फिर "आधा इश्क़" को खूबसूरत होना हीं है। कुछ लोग इसलिए परेशान हैं कि "आधा इश्क़" भी कुछ होता है क्या?.. उन लोगों को शायद यह पता नहीं कि एकतरफ़ा इश्क़ तो आधा हीं हुआ ना.. यह मेरा ख्याल है, लेकिन ख्याल कोई भी हो.. जब ज़िंदगी "दस ग्राम" की हो सकती है तो इश्क़ "आधा" क्यों नहीं हो सकता। क्या कहते हैं आप लोग?

गीत - आधा इश्क़


चलिए तो बात को आगे बढागे हुए एलबम के चौथे गाने की ओर आते हैं। यह गाना है बेन्नी दयाल और हिमानी कपूर की आवाज़ो में "दम-दम"। इस गाने को सुनने के बाद मुझे यही लगा कि सलीम-सुलेमान ने "दम" भरे गाने के लिए बेन्नी को चुनकर गलती कर दी। गाने में जब तक अंतरा नहीं आता, तब तक दम जैसी कोई बात हीं नज़र नहीं आती। अब जबकि इस गाने को एक आईटम सॉंग जैसा होना है तो आवाज़ से भी वो जोश झलकना चाहिए ना। अंतरे के पहले (यानि कि मुखरे में) धुन भी थोड़ी सुस्त है। अंतरे में यह गाना जोर पकड़ता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। "दम-दम" में दम नहीं है मेरे भाई!! "दम-दम" का एक सूफ़ी-मिक्स है जिसे सुखविंदर ने गाया है.. सभी जानते हैं कि "जोश" का दूसरा नाम है "सुखविंदर" और ऊपर से मिक्स यानि कि "पेसी ट्युन" तो सूफ़ी-मिक्स हर मामले में बढिया है "दम-दम" से। मेरी यही चाहत है कि फिल्म में "सूफ़ी-मिक्स" हो, तभी मज़ा आएगा।

गीत - दम दम


गीत - दम दम (सूफ़ी मिक्स)


अगले गाने "मितरा" में गायकी की कमान संभाली है खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने और उनका साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। यह गाना हर मामले में बेहतरीन है। इस गाने में "अमित त्रिवेदी" की झलक मिलती है, शायद इसीलिए अमिताभ भी माईक के पीछे आने को राजी हुए हैं। सलीम की आवाज़ हर तरह के गाने में काम करती है, इसलिए वे यहाँ भी अपना असर छोड़ जाते हैं। मितरा के बाद बारी है एक नियमित भांगड़े की, जो हर पंजाबी शादी के लिए एक रस्म-सा माना जाता है। लेकिन यह भांगड़ा दूसरे पंजाबी भांगड़ों से थोड़ा अलग है। इस भांगड़े का नाम यूँ तो "बारी बरसी" हीं है, लेकिन इसमें "खट के" कोई हीर या रांझा नहीं लाते, बल्कि "पिज़्ज़ा" , "गोंद" और "खजूर" लाते हैं। इस गाने को सुनकर आप अपने पेट और मुँह पर हाथ रखकर "हँसी" रोकने की कोशिश करेंगे तो वहीं अपनी कदमों को काबू में रखकर यह कोशिश करेंगे कि कहीं "नाच न निकल जाए"। चूँकि यह गाना मस्ती के लिए बना है और एक नियमित पैटर्न पर बना है, इसलिए इसे अच्छा या खराब निर्धारित करने का कोई तुक नहीं बनता। चलिए तो अब सुनते हैं "मितरा" और "बारी बरसी"।

गीत - मितरा


गीत - बारी बरसी


कुल मिलाकर मुझे "सलीम-सुलेमान" की यह पेशकश अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। चलते-चलते इस फिल्म का "थीम सॉंग" सुन लेते हैं, जिसे गाया है सलीम मर्चैंट और श्रद्धा पंडित ने। छोटा-सा गाना है, लेकिन चूँकि यह थीम है तो मेरे हिसाब से फिल्म में एक से ज्यादा बार बजेगा जरूर।



आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: तरकीबें और मितरा

लुंज-पुंज गीत: दम-दम

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