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Monday, September 22, 2008

पंकज सुबीर की कहानी "शायद जोशी" में लता मंगेशकर

(ये आलेख नहीं है बल्कि मेरी एक कहानी ''शायद जोशी'' का अंश है ये कहानी मेरे कहानी संग्रह ''ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी'' की संभावित कहानियों में से एक है ।)

- पंकज सुबीर

अचानक उसे याद आया कल रात को रेडियो पर सुना लता मंगेशकर का फिल्म शंकर हुसैन का वो गाना 'अपने आप रातों में' । उसे नहीं पता था कि शंकर हुसैन में एक और इतना बढ़िया गाना भी है वरना अभी तक तो वो 'आप यूं फासलों से गुज़रते रहे' पर ही फिदा था । हां क्या तो भी शुरूआत थी उस गाने की 'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं, चौंकते हैं दरवाज़े सीढ़ियाँ धड़कती हैं' उफ्फ क्या शब्द हैं, और कितनी खूबसूरती से गाया है लता मंगेशकर ने ।

'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े सीढियां धड़कती हैं
अपने आप.....'

और उस पर खैयाम साहब का संगीत, कोई भारी संगीत नहीं, हलके हल्‍के बजते हुए साज और बस मध्यम मध्यम स्वर में गीत । और उसके बाद 'अपने आप' शब्दों को दोहराते समय 'आ' और 'प' के बीच में लता जी का लंबा सा आलाप उफ्फ जानलेवा ही तो है । एक तो फिल्म का नाम ही कितना विचित्र है 'शंकर हुसैन' पता नहीं क्या होगा इस फिल्म में । काश वो इसे देख पता । कुछ चीज़ें होती हैं न ऐसी, जिनको लेकर आप हमेशा सोचते रहते हैं कि काश आप इसे देख पाते । बचपन में जब इतिहास के टीचर इतिहास पढाते थे तब उसकी बहुत इच्छा होती थी कि काश उसे एक बार सिकंदर देखने को मिल जाए । वो छूकर देख पाए कि अच्छा ऐसा है सिकंदर । ऐसा ही कुछ वो काश्मीर में खिलने वाले क्वांग पोश, दामपोश फूलों के बारे में भी सोचता था । शंकर हुसैन को लेकर भी उसको ऐसी ही उत्सुकता है कि क्या होगा इस फिल्म में । और शंकर के साथ हुसैन कैसे लग गया ।

मुखडे क़े बाद जो अंतरा शुरू होता है वो भी कमाल का ही था

'एक अजनबी आहट आ रही है कम कम सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम सी
बिन किसी की याद आए दिल के तार हिलते हैं
बिन किसी के खनकाए चूडियां खनकती हैं
अपने आप.........'

पहले तो उसने पक्का सोच लिया था कि ये गीत गुलज़ार का ही है । वही लिखते हैं इस तरह शब्दों के साथ खेल खेल कर । खामोशी का गीत 'हमने देखी है उन आंखों की....' भी तो इसी तरह का है । उत्सुकता के साथ उसने गीत के खत्म होने का इंतज़ार किया था और जब गीतकार का नाम लिया गया था तो चौंक गया था वो । कैफ भोपाली....? उनका गीत था ये......? थोडा अच्छा भी लगा था उसे, अपने ही शहर वाले ने लिखा है इतना सुंदर गीत ।

दूसरा मुखडा तो पहले से भी यादा अच्छा था

'कोई पहले दिन जैसे घर किसी को जाता हो
जैसे खुद मुसाफिर को रास्ता बुलाता हो
पांव जाने किस जानिब बेउठाए उठते हैं
और छम छमा छम छम पायलें छनकती हैं
अपने आप........'

आश्चर्य चकित रह गया था वो, इतना सुंदर गीत उसने आज तक सुना क्यों नही था। कितनी सीधी सीधी सी बात कही है । पांव जाने किस जानिब बेउठाए उठते हैं । जाने किस जानिब और वो भी बेउठाए ....। क्या बात कही है ये गीत छुपा कहाँ था अब तक ? कितने मशहूर गीत सुन चुका है वो अब तक, फिर ये गीत कहाँ छुपा था ? वैसे कैफ भोपाली और लता मंगेशकर की जुगलबंदी में पाकीज़ा के सारे गाने उसे पंसद हैं । विशेषकर 'यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते ' वो तो अद्भुत गीत है ।

गाने का तीसरा अंतरा शायद पूरी शिद्दत के साथ लिखा गया था । उसी अज्ञात की तरफ बार बार इशारा करते हुए शब्दों को पिरोया गया है जो शायद उन सबके जीवन में होता है जिनके सारे स्वपन अभी स्थगित नहीं हुए हैं । एक अज्ञात, जो होता है पर दिखाई नहीं देता । सारी समस्याओं का मूल एक ही है, जीवन से अज्ञात की समाप्ति । जब तक आपको लगता है कि न जाने कौन है, पर है ज़रूर, तब तक आप सपने देखते हैं । सपने देखते हैं, उस न जाने कौन के सपने। वो न जाने कौन आपके आस पास फिरता है, मगर दिखता नहीं है । वही आपको जिन्दा रखता है । जैसे ही आपको यकीन हो जाता है कि हम तो इतने दिन से फिज़ूल ही परेशान हैं, कोई भी नहीं है, उसी दिन आपको सपने आने भी बंद हो जाते हैं (स्थगित हो जाते हैं) ।

'जाने कौन बालों में उंगलियां पिरोता है
खेलता है पानी से तन बदन भिगोता है
जाने किसके हाथों से गागरें छलकती हैं
जाने किसी बाँहों से बिजलियां लपकती हैं
अपने आप.......'


क्या डिफाइन किया है अज्ञात को । 'जाने कौन बालों में उंगलिया पिरोता है' ज्ञात और अज्ञात के बीच एक महीन से सूत बराबर गुंजाइश को छोड़ा गया है, यह कह कर कि जाने किसकी बाँहों से बिजलियां लपकती हैं। कैफ भोपाली ऐसा ही लिखते थे 'फिरते हैं हम अकेले बाँहों में कोई ले ले....' । कौन ले ले....? कुछ पता नहीं हैं । बस वही, जो है, पर नहीं है । यहाँ पर भी उसकी बांहों से बिजलियाँ लपक रही हैं। पता नहीं ये शंकर हुसैन अब उसको देखने को मिलेगी या नहीं । क्या होगा जब वो मर रहा होगा? क्या ये तब तक भी उसको परेशान करेगी ? कशमीर के क्वांगपोश और दामपोश फूलों की तरह । क्या सचमुच इतने सारे अनुत्तरित प्रश्नों को साथ लेकर ही मरेगा वो ? फिर उन प्रश्नों का होता क्या होगा जो उस आदमी के साथ जीवन भर चलते आए हैं, जो अभी अभी मर गया है ।

आखिर में एक बार फिर लता मंगेशकर की आवाज़ उसी मुखड़े को दोहराती है....

'अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े सीढियां धड़कती हैं
अपने आप.....'

और विस्मय में डूबा हुआ छोड़कर गीत खत्म भी हो जाता है ।



प्रस्तुति - - पंकज सुबीर


लता संगीत उत्सव की एक और कड़ी

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