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रविवार, 4 अक्तूबर 2020

राग दरबारी : SWARGOSHTHI – 482 : RAG DARABARI





स्वरगोष्ठी – 482 में आज 

आसावरी थाट के राग – 4 : राग दरबारी अथवा दरबारी कान्हड़ा 

पण्डित जसराज से राग दरबारी में भक्ति रचना और मन्ना डे से फिल्मी गीत सुनिए 




पण्डित जसराज 

मन्ना डे 

“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के जन्य राग दरबारी अथवा दरबारी कान्हड़ा का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के राग दरबारी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में राग दरबारी में निबद्ध एक शास्त्रीय भक्ति-रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का कई फिल्मी गीतों में उपयोग किया गया है। राग दरबारी के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1968 में प्रदर्शित फिल्म "मेरे हुज़ूर" से हसरत जयपुरी का लिखा और शंकर जयकिशन का स्वरबद्ध किया गीत "झनक झनक तोरी बाजे पायलिया..." सुनवा रहे हैं, जिसे सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मन्ना डे ने स्वर दिया है। 




राग दरबारी का यह नामकरण अकबर के काल से प्रचलित हुआ। मध्यकालीन ग्रन्थों में राग का नाम दरबारी अथवा दरबारी कान्हड़ा नहीं मिलता। इसके स्थान पर कर्नाट या शुद्ध कर्नाट नाम से यह राग प्रचलित था। तानसेन, दरबार में अकबर के सम्मुख राग कर्नाट गाते थे, जो बादशाह और अन्य गुणी संगीत-प्रेमियों को खूब पसन्द आता था। राज दरबार का पसन्दीदा राग होने से धीरे-धीरे राग का नाम दरबारी अथवा दरबारी कान्हड़ा हो गया। प्राचीन नाम ‘कर्नाट’ परिवर्तित होकर ‘कान्हड़ा’ प्रचलित हो गया। सन् 1550 की राजस्थानी पेंटिंग में इस राग का उल्लेख मिलता है। वर्तमान में राग दरबारी कान्हड़ा आसावरी थाट का राग माना जाता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर सदा कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध लगते हैं। राग की जाति वक्र सम्पूर्ण होती है। अर्थात इस राग में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। मध्यरात्रि के समय यह राग अधिक प्रभावी लगता है। गान्धार स्वर आरोह और अवरोह दोनों में तथा धैवत स्वर केवल अवरोह में वक्र प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान अवरोह में धैवत को वर्जित करते हैं। तब राग की जाति सम्पूर्ण-षाडव हो जाती है। राग दरबारी का कोमल गान्धार अन्य सभी रागों के कोमल गान्धार से भिन्न होता है। राग का कोमल गान्धार स्वर अति कोमल होता है और आन्दोलित भी होता है। इस राग का चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक में किया जाता है। यह आलाप प्रधान राग है। इसमें विलम्बित आलाप और विलम्बित खयाल अत्यन्त प्रभावी लगते हैं। राग के यथार्थ स्वरूप को समझने के लिए और राग के भक्तिरस पक्ष को रेखांकित करने के लिए अब हम आपको विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में शक्ति और बुद्धि की प्रतीक देवी दुर्गा की स्तुति सुनवाते हैं। 

राग दरबारी : ‘जय जय श्री दुर्गे...’ : पण्डित जसराज 


राग दरबारी के स्वरों में श्रृंगार और भक्ति रस खूब मुखर होता है। अब हम आपको सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मन्ना डे के स्वर श्रृंगार रस से परिपूर्ण एक फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं। मन्ना डे को संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उनके चाचा कृष्णचन्द्र डे (के.सी. डे) से मिली, जो बंगाल की भक्ति संगीत शैलियों के सिद्ध गायक थे। इसके अलावा अपने विद्यार्थी जीवन में उस्ताद दबीर खाँ से खयाल, तराना और ठुमरी की शिक्षा भी प्राप्त हुई। 1940 में मन्ना डे अपने चाचा के साथ कोलकाता से मुम्बई आए। अपने चाचा के साथ-साथ खेमचन्द्र प्रकाश, शंकरराव व्यास, अनिल विश्वास, सचिनदेव बर्मन आदि के सहायक के रूप में कार्य किया। इस दौर में उन्होने कई फिल्मों में संगीत निर्देशन भी किया। फिल्म संगीत के क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करने के प्रयासों के बीच मन्ना डे ने मुम्बई में उस्ताद अमान अली खाँ और उस्ताद अब्दुल रहमान खाँ से संगीत सीखना जारी रखा। मन्ना डे के स्वर में राग दरबारी पर आधारित आज का दूसरा गीत श्रृंगार रस प्रधान है। यह गीत हमने 1968 में प्रदर्शित फिल्म "मेरे हुज़ूर" से लिया है। इसके संगीतकार शंकर-जयकिशन और गीतकार हसरत जयपुरी हैं। फिल्मों में राग दरबारी पर आधारित श्रृंगार रस प्रधान गीतों की सूची में यह गीत सर्वोच्च स्थान पर रखे जाने योग्य है। तीनताल में निबद्ध इस गीत में मन्ना डे ने अन्तिम अन्तरे में सरगम तानों का प्रयोग कुशलता से किया है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग दरबारी : "झनक झनक तोरी बाजे पायलिया..." : मन्ना डे : फिल्म - मेरे हुज़ूर 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 482वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1952 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन वरिष्ठ गायकों के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 10 अक्तूबर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 484 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 480वें अंक में हमने आपको 1968 में प्रदर्शित फिल्म "दो कलियाँ" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागी सफल रहे। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - जौनपुरी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल व कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की चौथी कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जन्य राग दरबारी अथवा दरबारी कान्हड़ा का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में एक भक्ति रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1968 में प्रदर्शित फिल्म "मेरे हुज़ूर" से मन्ना डे के स्वर में शंकर जयकिशन का संगीतबद्ध किया और हसरत जयपुरी का लिखा एक गीत "झनक झनक तोरी बाजे पायलिया..." प्रस्तुत किया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग दरबारी : SWARGOSHTHI – 482 : RAG DARABARI : 4 अक्तूबर, 2020 


शनिवार, 17 सितंबर 2016

"तुम जो आओ तो प्यार आ जाए...", कैसा कम्युनिकेशन गैप हुआ था गीतकार योगेश और संगीतकार रॉबिन बनर्जी के बीच?



एक गीत सौ कहानियाँ - 92
'तुम जो आओ तो प्यार आ जाए ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 92-वीं कड़ी में आज जानिए 1962 की फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ के मशहूर गीत "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए..." के बारे में जिसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर ने गाया था। बोल योगेश के और संगीत रॉबिन बनर्जी का। 

गीतकार योगेश
खनऊ के रहने वाले योगेश गौड़, यानी कि गीतकार योगेश पिता की मृत्यु के बाद भाग्य आजमाने और काम की तलाश में चले आए बम्बई। प्रसिद्ध लेखक बृजेन्द्र गौड़ उनके रिश्तेदार थे, इस वजह से उनसे जाकर मिले। लेकिन बृजेन्द्र गौड़ से योगेश को कोई मदद नहीं मिली। अलबत्ता गौड़ साहब के असिस्टैण्ट ने ज़रूर लेखन की बारीकियाँ सीखने में उनकी मदद की। चीज़ें समझ आईं तो योगेश भी लिखने की कोशिशें करने लगे। उन्हें एक-आध फ़िल्मों में गाना लिखने का मौक़ा मिला। लेकिन ये वो फ़िल्में थीं जो कभी पूरी तरह से बन ही नहीं पाई। फिर एक दिन योगेश की मुलाक़ात हुई संगीतकार रॉबिन बनर्जी से। रॉबिन बनर्जी ने योगेश की रचनाएँ सुनी, बहुत प्रभावित हुए, और उन्होंने योगेश को रोज़ाना सुबह उनके घर रियाज़ करने के वक़्त आने को कहा। अब योगेश रोज़ाना रॉबिन बनर्जी के घर पहुँच जाते। बैठकें होती, और इन बैठकों में योगेश रॉबिन बनर्जी की धुनें सुनते और रॉबिन बनर्जी योगेश की कविताएँ और गीत सुनते। लेकिन यह सिलसिला कई दिनों तक चलने के बावजूद कुछ बात बन नहीं पा रही थी और बेचैनी थी कि बढ़ती ही जा रही थी। बेचैनी इसलिए कि अभी तक रॉबिन बनर्जी ने योगेश की उन रचनाओँ पर एक भी धुन नहीं बनाई थी जिन रचनाओं से रॉबिन बनर्जी प्रभावित हो गए थे। आख़िर एक रोज़ योगेश ने रॉबिन बनर्जी से पूछ ही डाला, "दादा, आप मेरे गीतों पर धुन कब बनाएँगे?" रॉबिन बनर्जी चौंक गए। उल्टा उन्होंने योगेश से ही सवाल दाग डाला, "अरे इतने दिनों से तुम यहाँ आ रहे हो, मैं रोज़ नई नई धुनें सुना रहा हूँ, और तुमने आज तक एक भी धुन पर गीत नहीं लिखा?" तब जाकर योगेश को समझ आई कि अमूमन फ़िल्म जगत में धुन पहले बनाई जाती है और उस धुन पर गीत या शब्द बाद में लिखे जाते हैं। दरसल रॉबिन बनर्जी ने योगेश को बुलाया ही इसलिए था कि वो कम्पोज़िशन सुनें और उसके हिसाब से बोल लिखे, गीत लिखे। और योगेश इस उम्मीद में बैठे रहे कि आज नहीं तो कल जो मैंने पहले से ही लिख रखा है, उसकी वो धुन बनाएँगे। यह था कम्युनिकेशन गैप। बहरहाल इसके बाद यह गैप गैप नहीं रहा, दोनों की ग़लतफ़हमी दूर हुई और रॉबिन बनर्जी द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ से योगेश का करीअर शुरु हुआ।



रॉबिन बनर्जी का शुमार कमचर्चित संगीतकारों में होता है। 50 के दशक के अन्त से लेकर 70 के दशक के मध्य तक वो सक्रीय थे फ़िल्म जगत में। लेकिन अधिकतर स्टण्ट फ़िल्मों में संगीत देने का ही उन्हें मौक़े मिले, जिस वजह से वो कभी भी पहली श्रेणी के संगीतकारों में शामिल नहीं हो सके। संगीत देने के साथ साथ वो एक अच्छे गायक भी रहे। उनके संगीत से सजी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए" (’सखी रॉबिन’, 1962), "देश का प्यारा सबका दुलारा" (’मासूम’, 1960, "दग़ाबाज़ क्यों तूने" (’वज़िर-ए-आज़म’, 1961), "आँखों आँखों में" ('Marvel Man', 1964) आदि। गायक के रूप में उनके कुछ परिचित गानें हैं "इधर तो आ" (’Tarzan And Kingkong' 1965), "ये नशा क्या हुआ है" (’फिर आया तूफ़ान’, 1973) और दो गीत 1964 की फ़िल्म ’हुकुम का इक्का’ के - "चोरी चोरी गली मोरी" और "किया है हुस्न को बदनाम"। उनके करीअर का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत वही है जो योगेश का लिखा पहला गीत है, यानी कि फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ का "तुम जो आओ तो प्यार आ जाए, ज़िन्दगी में बहार आ जाए"। इसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर ने गाया था। 60 के दशक में कम बजट की फ़िल्मों के निर्माताओं और संगीतकारों के लिए लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ें पाना ख़्वाब समान हुआ करता था। मन्ना डे की भी यह नाराज़गी रही कि बड़ी बजट की फ़िल्मों में उन्हें केवल शास्त्रीय राग आधारित गीत गाने के लिए ही बुलवाए जाते या फिर किसी बूढ़े किरदार पर फ़िल्माये जाने वाले गीत के लिए। लेकिन उन्हें कम बजट की फ़िल्मों में नायक पर फ़िल्माए जाने वाले बहुत से गीत मिले और यह गीत उन्हीं में से एक है। 

उधर गायिकाओं में सुमन कल्याणपुर को ’ग़रीबों की लता’ कहा जाता था। यह उल्लेखनीय तथ्य है कि रॉबिन
मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर
बनर्जी ने अपने करीअर में कभी भी लता से कोई गीत नहीं गवाया (या यह भी संभव है कि उन्हें मौक़ा नहीं मिला)। उनकी 95% गीत सुमन कल्याणपुर ने गाए। प्रस्तुत गीत मन्ना डे के दिल के बहुत करीब था, तभी तो विविध भारती के ’विशेष जयमाला’ कार्यक्रम में उन्होंने इसे चुना और गीत पेश करते हुए कहा - "अब एक ऐसे म्युज़िक डिरेक्टर मुझे याद आ रहे हैं जिन्होंने बहुत धिक फ़िल्मों में म्युज़िक तो नहीं दिया, लेकिन जो भी काम किया अच्छे ढंग से किया। इस म्युज़िक डिरेक्टर का नाम है रॉबिन बनर्जी। मैंने एक युगल गीत रॉबिन के निर्देशन में गाया था फ़िल्म ’सखी रॉबिन’ के लिए। बहुत मधुर है यह गीत जिसे मेरे साथ सुमन कल्याणपुर जी ने गाया है। सुमन जी का भी जवाब नहीं है, बड़ी अच्छी गायिका हैं, बहुत समझ कर गाती हैं। इतनी अच्छी गायिका की आवाज़ में आजकल नए फ़िल्मों के गाने सुनाई नहीं देते।" मन्ना डे ने सुमन कल्याणपुर के साथ बहुत से युगल गीत गाए हैं। इसी साल अर्थात् 1962 में दत्ताराम के संगीत में इस जोड़ी ने गाया फ़िल्म ’नीली आँखें’ का गीत "ये नशीली हवा, छा रहा है नशा"। दत्ताराम के लिए पहली बार 1960 में मन्ना दा और सुमन जी ने फ़िल्म ’श्रीमान सत्यवादी’ में "भीगी हवाओं में, तेरी अदाओं में" गाया था। वैसे मन्ना-सुमन का गाया पहला डुएट 1958 की फ़िल्म ’अल-हिलाल’ में था "बिगड़ी है बात बना दे" और "तुम हो दिल के चोर"; संगीतकार थे बुलो सी. रानी। उसके बाद 1961 में ’ज़िन्दगी और ख़्वाब’ में इनका गाया "न जाने कहाँ तुम थे, न जाने कहाँ हम थे" बेहद लोकप्रिय हुआ था। यह भी दत्ताराम की ही रचना थी। मीना कुमारी पर फ़िल्माया यह गीत सुन कर बहुत से लोगों को यह धोखा भी हो गया कि यह लता मंगेशकर की आवाज़ है। 1961 में ही संगीतकार बाबुल ने भी इस जोड़ी से फ़िल्म ’रेशमी रूमाल’ में गवाया "आँख में शोख़ी, लब पे तबस्सुम"। और दत्ताराम ने फिर एक बार 1963 में इनसे गवाया फ़िल्म ’जब से तुम्हें देखा है’ में "ये दिन, दिन हैं ख़ुशी के, आजा रे आजा मेरे साथी ज़िन्दगी के"। 1962 में ’सखी रॉबिन’ के अलावा मन्ना-सुमन ने ’रॉकेट गर्ल’ फ़िल्म में भी एक गीत गाया था "आजा चले पिया चाँद वाले देस में", संगीत था चित्रगुप्त का। 1966 में ’अफ़साना’, 1971 में ’जाने अनजाने’, 1975 में ’दफ़ा 302' और 1978 में ’काला आदमी’ जैसी फ़िल्मों में भी मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर के गाये युगल गीत थे।

और अब इस गीत को सुनते हैं जो रंजन और शालिनी पर फ़िल्माया गया था।


अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




रविवार, 17 जुलाई 2016

राग अल्हैया बिलावल : SWARGOSHTHI – 279 : RAG ALHAIYA BILAWAL




स्वरगोष्ठी – 279 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 12 : समापन कड़ी में खुशहाली का माहौल

“भोर आई गया अँधियारा सारे जग में हुआ उजियारा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की यह समापन कड़ी है। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हमने मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा की और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी भी दी। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हम आपको राग अल्हैया बिलावल के स्वरों में पिरोये गए 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बावर्ची’ से एक सुमधुर, उल्लास से परिपूर्ण गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी, किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग अल्हैया बिलावल के स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर और उनकी शिष्याओ के स्वरों में राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध एक सुमधुर रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन उन गिने-चुने संगीतकारों में से थे जो नए-नए प्रयोग करने से नहीं कतराते थे। शास्त्रीय रागों को लेकर तरह-तरह के प्रयोग मदन मोहन ने किए जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’बावर्ची’ का गीत ही ले लीजिए "भोर आई गया अँधियारा..."। यह गीत आधारित है राग अल्हैया बिलावल पर। इस फ़िल्म के बनते समय तक शायद ऐसा कोई भी हिन्दी फ़िल्मी गीत नहीं था जो इस राग पर आधारित हो। अल्हैया बिलावल एक प्रात:कालीन राग (सुबह 6 से 9 बजे तक गाया जाने वाला राग) होने की वजह से मुमकिन था कि इसका प्रयोग संगीतकार अपने गीतों में करते क्योंकि प्रात:काल के बहुत से गीत फ़िल्मों में आ चुके थे। पर शायद किसी ने भी इस राग को नहीं अपनाया, या फिर यूँ कहें कि अपना नहीं सके। मदन मोहन ने इस ओर पहल किया और अल्हैया बिलावल को गले लगाया। ’बावर्ची’ फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी थी कि सुबह के वक़्त संयुक्त परिवार में चहल-पहल शुरु हुई है, पिताजी के चरण-स्पर्ष हो रहे हैं, सुबह की चाय पी जा रही है, बावर्ची अपने काम पे लगा है, संगीतकार बेटा अपने सुर लगा रहा है, घर की बेटियाँ घर के काम-काज में लगी हैं। इस सिचुएशन के लिए गीत बनाना आसान काम नहीं था। पर मदन मोहन ने एक ऐसे गीत की रचना कर दी कि इस तरह का यह आजतक का एकमात्र गीत बन कर रह गया है। बावर्ची बने फ़िल्म के नायक राजेश खन्ना के लिए मन्ना डे की आवाज़ ली गई जो इस गीत के मुख्य गायक हैं, जो बिखरते हुए उस परिवार को एक डोर में बाँधे रखने के लिए इस गीत में सबको शामिल कर लेते हैं। पिता हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का पार्श्वगायन उन्होंने ख़ुद ही किया, संगीतकार बेटे (असरानी) को आवाज़ दी किशोर कुमार ने, और घर की दो बेटियों (जया भादुड़ी और उषा किरण) के लिए आवाज़ें दीं शास्त्रीय-संगीत की शीर्ष की दो गायिकाओं ने। ये हैं लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी। कैफ़ी आजमी ने गीत लिखा और नृत्य निर्देशन के लिए चुना गया गोपीकृष्ण को। कलाकारों के इस अद्वितीय आयोजन ने इस गीत को अमर बना दिया। और मदन मोहन ने केवल अल्हैया बिलावल ही नहीं, इस गीत के अलग-अलग अंश के लिए अलग-अलग रागों का प्रयोग किया। "भोर आई गया अंधियारा" का मूल स्थायी और अन्तरा राग अल्हैया बिलावल है। परन्तु अलग-अलग अन्तरों में राग मारु विहाग, नट भैरव, धनाश्री और हंसध्वनि की झलक भी मिलती है। हर बदले हुए राग के अन्तरे के बाद राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध स्थायी की पंक्तियाँ वापस आती हैं।

अपने उसूलों पर चलने की वजह से 70 के दशक में मदन मोहन के साथ कई फ़िल्मकारों ने काम करना बन्द कर दिया था। हालाँकि उनके अन्तिम कुछ वर्षों में उन्होंने ॠषीकेश मुखर्जी (बावर्ची), गुलज़ार (कोशिश, मौसम), चेतन आनन्द (हँसते ज़ख़्म) और एच. एस. रवैल (लैला मजनूं) के साथ काम किया, पर उनके लिए रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में तारीख़ मिलना भी मुश्किल हो रहा था। नए संगीतकारों की फ़ौज 60 के दशक के अन्तिम भाग से आ चुकी थी जिनके पास बहुत सी फ़िल्में थीं और वो महीनों तक अच्छे रेकॉर्डिंग् स्टुडियोज़ (जैसे कि तारदेव, फ़िल्म सेन्टर, महबूब) को बुक करवा लेते थे जिस वजह से जब मदन जी को ज़रूरत पड़ती स्टुडियो की, तो उन्हें नहीं मिल पाता। इस तरह से उनकी रेकॉर्डिंग् कई महीनों के लिए टल जाती और इस तरह से वो पिछड़ते जा रहे थे। ख़ैर, वापस आते हैं ’बावर्ची’ पर। इस फ़िल्म में कुल छह गीत थे। एक गीत की हमने चर्चा की, अन्य पाँच गीत भी रागों अथवा लोक संगीत पर आधारित थे। मन्ना डे की एकल आवाज़ में "तुम बिन जीवन कैसा जीवन..." के पहले अन्तरे में राग हेमन्त की झलक है। इसी प्रकार लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में "काहे कान्हा करत बरजोरी...", में भी राग का स्पर्श है। कुमारी फ़ैयाज़ की आवाज़ में "पहले चोरी फिर सीनाज़ोरी..." में मराठी लोक संगीत लावणी का रंग है। मदन मोहन की फ़िल्म हो और लता मंगेशकर का कोई गीत ना हो कैसे हो सकता है भला। इस फ़िल्म में दो गीत लता जी से गवाये गए - "मोरे नैना बहाये नीर...", और दूसरा गीत है "मस्त पवन डोले रे..."। इस दूसरे गीत को फ़िल्म में नहीं शामिल किया गया, इसका मदन मोहन को अफ़सोस रहा। उनके साथ ऐसा कई बार हुआ। एडिटिंग् की कैंची उनके कई सुन्दर गीतों पर चल गई और गीत फ़िल्म से बाहर हो गया। कुछ उदाहरण - "खेलो ना मेरे दिल से..." (हक़ीक़त), "चिराग़ दिल का जलाओ बहुत अन्धेरा है..." (चिराग़), "दुनिया बनाने वाले..." (हिन्दुस्तान की क़सम), "मस्त पवन डोले रे..." (बावर्ची)। ’हीर रांझा’ में "मेरी दुनिया में तुम आयी..." शुरु-शुरु में फ़िल्म में नहीं था, कुछ सप्ताह बाद इसे जोड़ा गया था, पर साथ ही "तेरे कूचे में..." को हटा दिया गया। ’हँसते ज़ख़्म’ में "आज सोचा तो आँसू भर आए..." गीत को बहुत सप्ताह बीत जाने के बाद जोड़ा गया था। इन सारी जानकारियों के बाद अब समय है फ़िल्म ’बावर्ची’ के "भोर आई गया अँधियारा..." गीत को सुनने के साथ-साथ देखने का।


राग अल्हैया बिलावल : "भोर आई गया अँधियारा..." : मन्ना डे और साथी : फिल्म – बावर्ची


राग अल्हैया बिलावल का सम्बन्ध बिलावल थाट से माना गया है और इस थाट के आश्रय राग बिलावल का ही एक प्रकार है। इस राग के आरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस कारण इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। आरोह में शुद्ध और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग अल्हैया बिलावल के गायन-वादन का समय दिन का प्रथम प्रहर होता है। राग के आरोह में ऋषभ और अवरोह में गान्धार स्वर का अधिकतर वक्र प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग आरोह में और कोमल निषाद का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो धैवत के बीच में किया जाता है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है, अर्थात इसका वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में आता है। इस राग का चलन भी सप्तक के उत्तरांग में और तार सप्तक में अधिक किया जाता है। आजकल राग अल्हैया बिलावल का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है केवल बिलावल कह देने से लोग अल्हैया बिलावल ही समझते हैं, जबकि राग बिलावल और अल्हैया बिलावल दो अलग-अलग राग हैं। राग अल्हैया बिलावल के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 16 मात्रा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने के गायकी में दक्ष विदुषी किशोरी अमोनकर। इस गायन में उनकी शिष्याओं का योगदान भी है। राग अल्हैया बिलावल की इस बन्दिश के बोल हैं – ‘कवन बतरिया गैलो माई...’। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक के साथ जारी श्रृंखला को भी यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अल्हैया बिलावल : ‘कवन बतरिया गैलो माई...’ विदुषी किशोरी अमोनकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – ताल के लिए गीत में किस तालवाद्य का प्रयोग किया गया है? हमें उस तालवाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 281वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 277 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल की राहें’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मधुवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज यह समापन कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग अल्हैया बिलावल का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए हमने प्रस्तुत किया। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख  : सुजॉय चटर्जी  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




रविवार, 1 मई 2016

राग रागेश्री : SWARGOSHTHI – 268 : RAG RAGESHRI





स्वरगोष्ठी – 268 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन -1 : मन्ना डे को जन्मदिन पर स्मरण

‘कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हो रहा है। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का भी सहयोग लिया है। आप सब संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ श्रृंखला के प्रवेशांक में हार्दिक स्वागत करता हूँ। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर आधारित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की और फिर उस राग की जानकारी देंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने राग रागेश्री में उनका स्वरबद्ध किया, फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ का एक गीत चुना है। इस गीत को पार्श्वगायक मन्ना डे ने स्वर दिया था। इस गीत को चुनने का एक कारण यह भी है कि आज के ही दिन वर्ष 1919 में मन्ना डे का जन्म हुआ था। आज मन्ना डे के 98वें जन्मदिन पर हम उन्हीं के गाये गीत से उनको स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं। राग रागेश्री पर आधारित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के गीत के साथ राग का स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम उस्ताद शाहिद परवेज का सितार पर बजाया राग रागेश्री भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


"बहारें हमको ढूंढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे...", संगीतकार मदन मोहन द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के बोल उन्हीं पर किस शिद्दत से लागू होती है, यह बताने की ज़रूरत नहीं। आज उनके गाये हुए इतने दशक बीत जाने के बाद भी उनके गीतों के ज़रिए उनके अफ़साने बयाँ होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों की ख़ासियत यह रही है कि फ़िल्म संगीत को शास्त्रीय संगीत के रंग से ऐसे सजाया है कि एक एक रचना को सुन कर जैसे आत्मा तृप्त हो जाती है। इसी उद्देश्य से हम ’स्वरगोष्ठी’ में आज से शुरु कर रहे हैं संगीतकार मदन मोहन द्वारा स्वरबद्ध शास्त्रीय संगीत आधारित गीतों की एक श्रृंखला। शुरुआत किस गीत से की जाए? आज 1 मई है, सुविख्यात गायक मन्ना डे का जन्मदिवस। तो क्यों ना मदन मोहन और मन्ना डे के सुरीले संगम से उत्पन्न एक अनमोल मोती प्रस्तुत किया जाए। हिन्दी फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत गाने वाले पुरुष गायकों में मन्ना डे का कोई सानी नहीं। ना उस ज़माने में कोई था, और इस ज़माने में तो सवाल ही नहीं। जब भी कभी शास्त्रीय राग आधारित रचना की सिचुएशन किसी फ़िल्म में आती, तब मन्ना डे ही संगीतकारों की पहली पसन्द होते। मदन मोहन ने भी उनसे कई गीत गवाए हैं। 1957 में एक फ़िल्म बनी थी ’देख कबीरा रोया’ जिसमें लगभग सभी गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित थे। तीन गीत तो एक के बाद एक फ़िल्म में आते हैं, पहला "मेरी वीणा तुम बिन रोये" (लता), दूसरा "अश्कों से तेरी हमने तसवीर बनायी है" (आशा) और तीसरा गीत है "तू प्यार करे या ठुकराये" (लता)। ये तीन गीत क्रम से राग अहीर भैरव, पहाड़ी और भैरवी पर आधारित थे, और ये फ़िल्माये गये, क्रम से, अमिता, अनीता गुहा और शुभा खोटे पर। लता की आवाज़ में फ़िल्म का एक अन्य गीत "लगन तोसे लगी बलमा" भी एक सुन्दर रचना थी राग तिलंग पर आधारित। मदन मोहन के शुरुआती सफ़र में उन पर यह आरोप लगा था कि वो हमेशा गायिका-प्रधान गीतों की रचना करते हैं। सारे इलज़ामों को शान्त करते हुए जब उन्होंने ’देख कबीरा रोया’ में "कौन आया मेरे मन के द्वारे" (मन्ना डे) और "हमसे आया ना गया" (तलत महमूद) जैसे गीतों की रचना की तब सभी आलोचकों ने चुप्पी साध ली।

"कौन आया मेरे मन के द्वारे" गीत तो बेहद लोकप्रिय हुआ था जिसे मन्ना डे के श्रेष्ठ गीतों में भी माना जाता है। एक साक्षात्कार में मन्ना दा ने राग रागेश्री पर आधारित इस गीत के बारे में कहा था कि मदन मोहन ने उनसे इस गीत को गाते समय विशेष ध्यान रखने को कहा था क्योंकि यह रचना उनके दिल के बहुत क़रीब थी। मन्ना डे की आवाज़ में इसी फ़िल्म में एक और उल्लेखनीय रचना थी "बैरन हो गई रैना" जो राग जयजयवन्ती का एक बहुत उत्कृष्ट उदाहरण है। इस गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि यह कोई फ़िल्मी गीत ना होकर शास्त्रीय संगीत की कोई रचना हो। मदन मोहन की मृत्यु के बाद उनको समर्पित एक कार्यक्रम में उन्हें याद करते हुए मन्ना डे ने कहा था - एक महान संगीतकार, मदन साहब, मदन मोहन। मदन मोहन गाने तो लाजवाब बनाते ही थे, साथ ही साथ खाना भी बहुत अच्छा पका लेते थे। और ख़ास कर के एक चीज़ जो बनाते थे, लाजवाब, वह शायद आप भी खाये होंगे, वह है भिंडी-मटन। यानी कि भिंडी और मटन, दोनों को मिला कर मदन साहब बनाते थे। एक मरतबा मुझे टेलीफ़ोन करके कहा कि मन्ना, क्या कर रहा है? मैंने कहा कि कुछ भी नहीं कर रहा हूँ, बैठा हूँ। कहने लगे, क्या बैठा है, चल आजा मेरे घर। उन दिनों मैं रहता था बान्द्रे में, मदन मोहन साहब रहते थे पेडर रोड पे। तो गाड़ी निकाल कर मैं चला गया मदन साहब के पास। और मदन साहब बना रहे थे मटन के साथ भिंडी। मैंने बोला कि यह क्या कम्बिनेशन है भई, मटन के साथ भिंडी? कहा कि खा के तो देख, फिर मालूम पड़ेगा! वाक़ई, बहुत बहुत बढ़िया भिंडी-मटन खिलाया उन्होंने। साथ ही साथ उन्होंने कहा कि एक गाना है। और वह गाना था "कौन आया मेरे मन के द्वारे...”। मदन मोहन का भिंडी-मटन जितना स्वादिष्ट बना था, उतना ही मधुर बना था ’देख कबीरा रोया’ का यह गीत। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए।


राग रागेश्री : ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे...’ : मन्ना डे : फिल्म – देख कबीरा रोया



फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के इस गीत के बारे में सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी अलका देव मारुलकर ने कहा था- ’देख कबीरा रोया’ में रागेश्री राग पर आधारित एक गीत है जिसमें switch-overs भी नाट्यपूर्ण तरीके से आया है। रागेश्री और बागेश्री दोनों बहने हैं, जिनमें थोड़ा फ़र्क है। फ़र्क यह है कि बागेश्री में कोमल गान्धार के साथ पंचम लगता है और रागेश्री में कोमल गान्धार तो होता है लेकिन पंचम वर्जित होता है, कोई कोई इसमें शुद्ध निषाद भी लगाते हैं। मन्ना डे के गाए इस गीत के दूसरे अन्तरे में तीव्र मध्यम का सुन्दर प्रयोग मन्ना दा ने किया है, जिसमें मिश्र गारा की छाया भी दिखाई पड़ती है।

यह गीत राग रागेश्री पर आधारित है। भारतीय संगीत में राग रागेश्री को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग की जाति औड़व-षाड़व होती है, अर्थात, आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग में निषाद स्वर कोमल होता है। पंचम स्वर वर्जित होता है। आरोह में पंचम के साथ ऋषभ स्वर भी वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसमें गान्धार स्वर वादी और निषाद स्वर संवादी होता है। राग रागेश्री के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना गया है। राग रागेश्री का एक दूसरा प्रकार भी प्रचलित है। इस प्रकार के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। परन्तु मन्द्र सप्तक में हमेशा कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। कोमल निषाद की रागेश्री अधिक प्रचलित है। अब हम आपको उस्ताद शाहिद परवेज़ से सितार पर राग रागेश्री की तीनताल में निबद्ध एक गत सुनवाते है। आप इसे सुनिए और फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के गीत के स्वरों को इस सितार की रचना में पहचानने का प्रयास कीजिए। साथ ही इसी प्रस्तुति के साथ हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग रागेश्री : सितार पर तीनताल में निबद्ध गत : उस्ताद शाहिद परवेज़




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 268वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को ध्यान से सुनिए और बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान सकते हैं? इस गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 7 मई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 266 की संगीत पहेली में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ से चैती शैली पर आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचन्दी और कहरवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मात्राएं – 14 और 8 या 4 तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – सुमन कल्याणपुर

लगता है इस बार की पहेली हमारे प्रतिभागियों के लिए कुछ कठिन थी। इस बार मात्र तीन प्रतिभागियों ने उत्तर दिया है। इनमे से दो प्रतिभागियों ने केवल पहले और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। तीसरी प्रतिभागी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने ही गायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज़ को पहचाना है, किन्तु पहले और दूसरे प्रश्नों का अधूरा जवाब दिया है। इस प्रकार हरिणा जी को दो अंक दिये जाते हैं। दो अंक पाकर हमारे अन्य विजेता हैं- पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज से हमारी नई श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हो रहा है। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे राग रागेश्री पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

रंग वो जिसमे रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमे मीरा...

मन्ना डे 
महफिले कहकशां - 02


दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, महफिले कहकशां के रूप में. पूजा अनिल के साथ अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज सुनिए प्रबोध चन्द्र डे के प्राइवेट एल्बम से एक मन रंग देने वाला प्यारा सा गीत.

मुख्य स्वर - पूजा अनिल
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजोई चट्टर्जी 

रविवार, 13 मार्च 2016

राग ललित : SWARGOSHTHI – 261 : RAG LALIT





स्वरगोष्ठी – 261 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 9 : राग ललित

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और मदन मोहन का राग ललित




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हम राग ललित के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले हम आपको आगरा घराने के विख्यात गायक आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का राग ललित में गायन होगा। इसके साथ ही संगीतकार मदनमोहन का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ का इसी राग पर आधारित युगल गीत लता मंगेशकर और मन्ना डे से सुनेगे। 
 

ज के अंक में हम आपसे राग ललित की संरचना पर कुछ चर्चा कर रहे हैं। राग ललित पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ, कोमल धैवत तथा दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह दोनों में पंचम स्वर पूर्णतः वर्जित होता है। इसीलिए इस राग की जाति षाड़व-षाड़व होती है। अर्थात, राग के आरोह और अवरोह में 6-6 स्वरों का प्रयोग होता है। भातखण्डे जी ने राग ललित में शुद्ध धैवत के प्रयोग को माना है। उनके अनुसार यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग ललित की जो स्वर-संरचना है उसके अनुसार यह राग किसी भी थाट के अनुकूल नहीं है। मारवा थाट के स्वरों से राग ललित के स्वर बिलकुल मेल नहीं खाते। राग ललित में शुद्ध मध्यम स्वर बहुत प्रबल है और राग का वादी स्वर भी है। इसके विपरीत मारवा में शुद्ध मध्यम सर्वथा वर्जित होता है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। आपको राग ललित का उदाहरण सुनवाने के लिए हमने आगरा घराने के सिरमौर गवैये उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ की गायकी को चुना है।

उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ
भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो हमारे सामने आता है, वह है, आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा आदि सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस की वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना गुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बना लिया और पालन-पोषण के साथ ही संगीत के शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। अब हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ललित का आलाप और खयाल अंग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं।

राग ललित : आलाप और बन्दिश : ‘तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ


मदन मोहन और मन्ना डे
फिल्म संगीत के क्षेत्र में मदनमोहन का का नाम एक ऐसे संगीतकार के रूप में लिया जाता है, जिनकी रचनाएँ सभ्रान्त और संगीत के शौकीनों के बीच चाव से सुनी जाती है। उनका संगीत जटिलताओं से मुक्त होते हुए भी हमेशा सतहीपन से भी दूर ही रहा। फिल्मों में गजल गायकी का एक मानक स्थापित करने में मदनमोहन का योगदान प्रशंसनीय रहा है। उनके अनेक गीतों में रागों की विविधता के दर्शन भी होते हैं। फिल्म संगीत को रागों के परिष्कृत और सरलीकृत रूप प्रदान करने की प्रेरणा उन्हें उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और लखनऊ के तत्कालीन समृद्ध सांगीतिक परिवेश से ही मिली थी। 1951 में बनी देवेंद्र गोयल की फिल्म ‘अदा’ में मदनमोहन और लता मंगेशकर का साथ हुआ और यह साथ लम्बी अवधि तक जारी रहा। इसी प्रकार पुरुष कण्ठ में राग आधारित गीतों के लिए उनकी पहली पसन्द मन्ना डे हुआ करते थे। मन्ना डे और लता मंगेशकर ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में अनेक उच्चकोटि के गीत गाये। मदनमोहन के संगीत से सजा गीत, जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह राग ललित पर आधारित एक युगल गीत है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा जिन्दाबाद’ में मदनमोहन का संगीत था। इस फिल्म के गीतों में उन्होने रागों का आधार लिया और आकर्षक संगीत रचनाओं का सृजन किया। फिल्म में राग ललित के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत- ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ था, जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया। आइए, सुनते हैं यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग ललित : ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 261वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित गीत है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 19 मार्च, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 263वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 259 की संगीत पहेली में हमने आपको 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम’ के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – भटियार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है, गायक-गायिका – पण्डित राजन मिश्र और एस. जानकी

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागी सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और चेरीहिल, न्यूजर्सी से  प्रफुल्ल पटेल। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के नौवें अंक में हमने आपसे राग ललित पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पास हर सप्ताह आपकी फरमाइशे आती हैं। हमारे कई पाठकों ने ‘स्वरगोष्ठी’ में दी जाने वाली रागों के विवरण के प्रामाणिकता की जानकारी माँगी है। उन सभी पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि रागों का जो परिचय इस स्तम्भ में दिया जाता है, वह प्रामाणिक पुस्तकों से पुष्टि करने का बाद ही लिखा जाता है। यह पुस्तकें है; संगीत कार्यालय, हाथरस द्वारा प्रकाशित और श्री वसन्त द्वारा संकलित और श्री लक्ष्मीनारायण गर्ग द्वारा सम्पादित ‘राग-कोष’, संगीत सदन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित और श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’ तथा आवश्यकता पड़ने पर पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’। हम इन ग्रन्थों से साभार पुष्टि करके ही आप तक रागों का परिचय पहुँचाते हैं। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रविवार, 21 फ़रवरी 2016

राग गौड़ सारंग : SWARGOSHTHI – 258 : RAG GAUR SARANG


स्वरगोष्ठी – 258 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 6 : राग गौड़ सारंग

इस राग में सुनिए पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास की रचनाएँ




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की छ्ठी कड़ी में आज हम राग गौड़ सारंग के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी पर राग गौड़ सारंग की के स्वर में एक अनूठी रचना सुनेगे, और फिर इसी राग के स्वरों में पिरोया 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ का एक गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।

स श्रृंखला में अभी तक आपने जो राग सुने हैं, वह सभी कल्याण थाट के राग माने जाते हैं और इन्हें रात्रि के पहले प्रहर में ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। दोनों मध्यम स्वर स्वर से युक्त आज का राग, ‘गौड़ सारंग’ भी कल्याण थाट का माना जाता है, किन्तु इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का प्रथम प्रहर नहीं बल्कि दिन का दूसरा प्रहर होता है। राग गौड़ सारंग में दोनों मध्यम के अलावा सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं, इसीलिए इसे सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। परन्तु इसमे आरोह और अवरोह के सभी स्वर वक्र प्रयोग किये जाते है, इसलिए इसे वक्र सम्पूर्ण जाति का राग माना जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है।

पन्नालाल घोष
प्राचीन ग्रन्थकार राग कामोद, केदार और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग को भी बिलावल थाट का राग मानते थे, क्योंकि तब इस राग में तीव्र मध्यम स्वर प्रयोग नहीं किया जाता था। परन्तु जब से इन रागों में दोनों मध्यम का प्रयोग होने लगा, तब से इन्हें कल्याण थाट का राग माना जाने लगा। राग गौड़ सारंग के आरोह और अवरोह में तीव्र मध्यम स्वर का अल्प प्रयोग केवल पंचम स्वर के साथ किया जाता है। शुद्ध मध्यम स्वर आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। राग की रंजकता को बढ़ाने के लिए कभी-कभी अवरोह में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग राग केदार और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग में भी किया जाता है। इस राग का चलन वक्र होता है। किन्तु तानों में वक्रता कम की जाती है। राग गौड़ सारंग का उदाहरण हम आपको बाँसुरी पर सुनवाएँगे। बाँसुरी वाद्य को शास्त्रीय मंच पर प्रतिष्ठित कराने वाले सुविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष से अब हम इस राग में निबद्ध एक मनोहारी रचना सुनवा रहे हैं। 24 जुलाई, 1911 को अविभाजित भारत के बारिसाल, पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्में पन्नालाल घोष का एक और नाम था, अमलज्योति घोष। परन्तु अपने संगीतज्ञ जीवन में वह अपने पुकारने के नाम से ही विख्यात हुए। इनके पिता अक्षय कुमार घोष स्वयं एक संगीतज्ञ थे और सितार बजाते थे। पन्ना बाबू को बचपन में अपने पिता से ही सितार वादन की शिक्षा मिली थी। जब वे कुछ बड़े हुए तो उनके हाथ कहीं से एक बाँसुरी मिल गई। उन्होने बाँसुरी पर अपने सितार पर सीखे हुए तंत्रकारी कौशल की नकल करना शुरू किया। एक बार एक सन्यासी ने सुन कर बालक पन्नालाल को भविष्य में महान बाँसुरी वादक बनने का आशीर्वाद दिया। आगे चल कर शास्त्रीय संगीत के मंच पर उन्होने बाँसुरी वाद्य को प्रतिष्ठा दिलाई। लीजिए, अब आप पण्डित पन्नालाल घोष से बाँसुरी पर बजाया राग गौड़ सारंग की तीनताल में निबद्ध एक रचना सुनिए।


राग गौड़ सारंग : तीनताल में निबद्ध एक रचना : पण्डित पन्नालाल घोष 




अनिल विश्वास और लता मंगेशकर
सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार अनिल विश्वास ने 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ के लिए एक रागमाला गीत तैयार किया था, जिसमें चार अन्तरे चार अलग-अलग रागों में स्वरबद्ध थे। इन्हीं में से एक अन्तरा राग गौड़ सारंग में था। आज हम आपको वही अन्तरा सुनवा रहे हैं। पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास परस्पर मित्र भी थे और सम्बन्धी भी। हमारे साथी, फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार और स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने एक साक्षात्कार में अनिल विश्वास के व्यक्तित्व और कृतित्व को उभारा था। उसी साक्षात्कार का कुछ अंश हम आपके लिए प्रस्तुत करते हैं। 
पन्नालाल घोष बाद में अनिल बिस्वास के बहनोई बने, पहले से ही दोनों बहुत अच्छे मित्र थे। अपने परम मित्र और बहनोई को याद करते हुए विविध भारती के ’संगीत सरिता’ में अनिल दा ने कुछ इस तरह से उनके बारे में बताया था साक्षात्कार लेने वाले सितार वादक तुषार भाटिया को – “पन्नालाल घोष बाँसुरी को कॉनसर्ट के स्तर पर लाने का श्रेय जाता है, अभी तक उन्हीं को पिता माना जाता है। कुछ हमारी पुरानी बातें हमें याद आ जाती हैं। तुमको मालूम नहीं होगा कि पन्ना से पहले मैं बाँसुरी बजाता था। तो एक दिन ऐसा हुआ कि माँ तीरथ से वापस आईं, जब गईं तब मैं बच्चे की आवाज़ में बोलता था, वापस आईं तो मैं मर्द की आवाज़ में बोलने लगा। तो उन्होंने आकर देखा कि हमारी कुलुंगी के उपर, क्या कहते हैं उसको, वह बाँसुरी रखी हुई है, उन्होंने सारे उठाके फेंक दिए और कहा कि यह तेरी आवाज़ को क्या हो गया? मैंने जाकर पन्ना को कहा कि मेरी बाँसुरी तो गई, अब क्या होगा? उन्होंने कहा कि मैं पकड़ लेता हूँ!” अनिल दा ने एक आश्चर्य करने वाले तथ्य को भी उजागर किया कि पन्नालाल घोष बाँसुरी से पहले सितार बजाते थे और उनके पिता (अक्षय घोष) एक बहुत अच्छे सितार वादक थे। तो इस तरह से बाँसुरी बजाने के शौकीन अनिल बिस्वास बन गए मशहूर संगीतकार और सितार बजाने के शौकीन पन्नालाल घोष बन गए मशहूर बाँसुरी वादक। दोनों एक दूसरे से इतना प्यार करते थे कि एक बाद जब अनिल बिस्वास को रेडियो पर पहली बार गायन रेकॉर्ड करने के लिए रेकॉर्डिंग्‍ रूम में भेजा गया तो बाहर प्रतीक्षा कर रहे पन्नालाल घोष पसीना-पसीना हो गए इस घबराहट में कि उनका दोस्त कैसा परफ़ॉर्म करेगा! अनिल दा ने उस साक्षात्कार में यह भी बताया कि पन्ना बाबू का पहला व्यावयासिक वादन अनिल दा के रेकॉर्डिंग्‍ में ही बजाया था, और जब तक वो बम्बई में रहे, अनिल दा के हर फ़िल्म में वो ही बाँसुरी बजाया करते थे। 
 पार्श्वगायक मन्ना डे और लता मंगेशका के गाये, राग गौड़ सारंग के स्वरों में पिरोए फिल्म हमदर्द के इस गीत में पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी के अलावा पण्डित रामनारायण की सारंगी का भी योगदान था। तीनताल में निबद्ध यह गीत अब आप सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग गौड़ सारंग : “ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...” : मन्ना डे और लता मंगेशकर फिल्म – हमदर्द 





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 258वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 27 फरवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 256 की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग - हमीर, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – मुहम्मद रफी (और उस्ताद अमीर खाँ)।

इस बार की पहेली में कुल पाँच प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। हमारे नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के छठे अंक में हमने आपसे राग गौड़ सारंग पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र



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