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Monday, February 12, 2018

चित्रकथा - 55: फ़िल्म जगत के दो महान गिटार वादकों का निधन

अंक - 55

फ़िल्म जगत के दो महान गिटार वादकों का निधन


गोरख शर्मा और भानु गुप्त




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 55-वीं कड़ी है।

26 और 27 जनवरी 2018 को फ़िल्म जगत के दो सुप्रसिद्ध गिटार वादकों का निधन हो गया। संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के प्यारेलाल के भाई गोरख शर्मा के 26 जनवरी को और राहुल देव बर्मन टीम के भानु गुप्त के 27 जनवरी को निधन हो जाने से फ़िल्म-संगीत जगत के दो चमकते सितारे हमेशा के लिए डूब गए। भले हम इन दोनों कलाकारों को मुख्य रूप से फ़िल्मी गीतों में उनके गिटार के टुकड़ों से जानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इन दोनों ने गिटार के अलावा भी कई और साज़ों पर भी अपने अपने हाथ आज़माए हैं। जहाँ गोरख शर्मा ने मैन्डोलीन और कई अन्य तार वाद्यों पर अपनी जादुई उंगलियाँ चलाईं, वहीं भानु गुप्त ने हार्मोनिका (माउथ ऑर्गन) में महारथ हासिल की। आइए, आज ’चित्रकथा’ में गोरख शर्मा और भानु गुप्त को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके जीवन पर एक नज़र डालते हैं और याद करते हैं उन गीतों को जिन्हें उन्होंने अपनी कला से अमर बना दिया है। आज का यह अंक गोरख शर्मा और भानु गुप्त की पुण्य स्मृति को समर्पित है।





गोरख शर्मा और भानु गुप्त


नवरी 2018 का महीना संगीत जगत के लिए बेहद दुर्भाग्यजनक रहा। संतूर वादक पंडित उल्हास बापट, सरोद वादक पंडित बुद्धदेब दासगुप्ता, और फ़िल्म संगीत में रेसो-रेसो के जनक अमृतराव काटकर कके बाद अब गिटार वादक गोरख शर्मा और भानु गुप्त। गोरख शर्मा का नाम फ़िल्म जगत में भला कौन नहीं जानता! बेस गिटार को हिन्दी फ़िल्म संगीत में लाने वाले गुणी कलाकारों में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। 28 दिसंबर 1946 को जन्में गोरख रामप्रसाद शर्मा सुप्रसिद्ध ट्रम्पेट वादक पंडित रामप्रसाद शर्मा के पुत्र और सुप्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के प्यारेलाल शर्मा के छोटे भाई थे। 1960 से लेकर 2002 के बीच गोरख शर्मा ने लगभग 500 फ़िल्मों में लगभग 1000 गीतों में तरह तरह के वाद्य बजाए और इन तमाम सदाबहार गीतों को अलंकृत किया। प्यारेलाल, गणेश, आनन्द और महेश (महेश-किशोर जोड़ी वाले) ही की तरह गोरख शर्मा ने भी संगीत का मूल पाठ अपने पिता से ही सीखा। उन्हीं से उन्होंने तरह तरह के तार-वाद्यों को बजाने की कला सीखी। मैन्डोलीन, मैन्डोला, रुबाब, और कई प्रकार के गिटार जैसे कि ऐकोस्टिक, जैज़, ट्वेल्व स्ट्रिंग् और इलेक्ट्रिक गिटार सहित बेस गिटार में उन्होंने महारथ हासिल की। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि गोरख शर्मा को ही बेस गिटार को हिन्दी फ़िल्मी गीतों में लाने का श्रेय जाता है। वैसे गोरख जी ने अपना संगीत सफ़र शुरु किया था बतौर मैन्डोलीन वादक। इसके नोटेशन उन्होंने अपने पिता से सीखे। उन्ही दिनों में विदेशी साज़ों का भी चलन शुरु हो चुका था और गिटार को ख़ास तौर पर ख़ूब लोकप्रियता मिल रही थी। इसलिए गोरख जी ने भी सोचा कि क्यों ना इस पर भी हाथ आज़माया जाए। अत: उस ज़माने क मशहूर गिटार वादक ऐनिबल कैस्ट्रो से उन्होंने गिटार सीखना शुरु कर दिया और मैन्डोलीन का ज्ञान होने की वजह से कुछ ही समय में इस कला में भी निपुण हो गए। अपने करीयर के शुरुआती सालों में गोरख शर्मा ’बाल सुरील कला केन्द्र’ का हिस्सा हुआ करते थे। यह एक ऐसी संस्था थी जो महाराष्ट्र के छोटे शहरों में घूम-घूम कर कार्यक्रम पेश किया करती। कलाकारों के इस समूह में शामिल थे मीना मंगेशकर, उषा मंगेशकर, हृदयनाथ मंगेशकर, लक्ष्मीकान्त कुड़लकर, प्यारेलाल, गणेश, आनन्द आदि।

प्यारेलाल और गोरख शर्मा
60 के दशक में जब लक्ष्मीकान्त और प्यारेलाल ने अपनी जोड़ी बना कर फ़िल्म संगीत निर्देशन में उतरे, तब गोरख शर्मा को इस जोड़ी के गीतों में मैन्डोलीन बजाने का मौका मिला। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्हें संगीतकार रवि ने संगीत निर्देशन में ’चौधहवीं का चाँद’ फ़िल्म के मशहूर शीर्षक गीत में मैन्डोलीन बजाने का सुअवसर मिला। शंकर-जयकिशन और कल्याणजी-आनन्दजी के कई गीतों में भी उन्होंने मैन्डोलीन बजाए। जल्दी ही गोरख शर्मा बन गए लक्ष्मी-प्यारे के सहायक संगीतकार और इस जोड़ी के साथ उन्होंने 1966 से लेकर अन्त तक तकरीबन 475 फ़िल्मों में काम किया। Cine Musicians Association (CMA) में गोरख शर्मा का नाम सम्मान से लिया जाता था, और उस ज़माने में जहाँ साज़िन्दों को CMA द्वारा दिए गए ग्रेड के अनुसार वेतन मिला करते थे, वहाँ पंडित शिव कुमार शर्मा और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के साथ गोरख शर्मा को सर्वोच्च ग्रेड का वेतन मिलता था। यह उनकी कला का ही सम्मान था। जैसा कि हमने उपर कहा है कि गोरख शर्मा ने लगभग 1000 गीतों में साज़ बजाए हैं< लेकिन एक गीत जो उनकी ख़ास पहचान बना हुआ है, वह है 1980 की फ़िल्म ’कर्ज़’ का गीत "एक हसीना थी, एक दीवाना था"। सभी जानते हैं कि यह गीत फ़िल्म का थीम सॉंग् रहा है जिसका फ़िल्म की कहानी पर गहरा प्रभाव है। इसी गीत का प्रील्युड म्युज़िक फ़िल्म का थीम म्युज़िक भी है, और इन सब के पीछे अगर किसी का हाथ है तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ गोरख शर्मा का। गोरख जी के निधन पर फ़िल्म ’कर्ज़’ के नायक ॠषि कपूर ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए इस थीम म्युज़िक का ज़िक्र किया है।

गोरख शर्मा के संगीत के टुकड़ों से सजे कुछ और सुपरहिट गीत हैं - "मेरे महबूब क़यामय होगी" (Mr. X in Bombay, 1964), "नज़र ना लग जाए किसी की राहों में" (Night in London, 1967), "मैं शायर तो नहीं" (Bobby, 1973), "रुक जाना नहीं तू कहीं हार के" (इम्तिहान, 1974), "आओ यारों गाओ" (हवस, 1974), "My name is Anthony Gonsalves" (अमर अक्बर ऐन्थनी, 1977), "डफ़ली वाले डफ़ली बजा" (सरगम, 1979), "हम बने तुम बने एक दूजे के लिए" (एक दूजे के लिए, 1981), "सासों की ज़रूरत है जैसे" (आशिक़ी, 1990), "सनम मेरे सनम क़सम तेरी क़सम" (हम, 1991), "जाओ तुम चाहे जहाँ, याद करोगे वहाँ" (नरसिम्हा, 1991), "जादू तेरी नज़र, ख़ुशबू तेरा बदन" (डर, 1993)। BBC के एक साक्षात्कार में जब एक बार गोरख शर्मा से यह पूछा गया कि बड़े भाई की तरह उन्होंने संगीत निर्देशन में हाथ क्यों नहीं आज़माया, तो उनका जवाब था - "मैं उन दिनों मैन्डोलिन और गिटार की परफार्मेंस और उनकी रिकॉर्डिंग में इतना व्यस्त रहता था कि संगीत निर्देशन के लिए वक़्त ही नहीं मिल पता था।" बीते ज़माने को याद करते हुए गोरख जी ने आगे उस साक्षात्कार में बताया, ''उस समय अंग्रेज़ी संगीतकारों का दबदबा था, लेकिन बहुत कम लोग अंग्रेज़ी में संगीत (स्टाफ नोटेशन) पढ़ पाते थे, जिसकी वजह से उन्हें काम नहीं मिल पता था। अपने स्टॉफ़ में मैं उन चुनिंदा लोगों में से था, जो स्टॉफ़ नोटेशन पढ़ लेता था। हालांकि़, इसका श्रेय मेरे संगीतकार पिता पंडित रामप्रसाद शर्मा उर्फ़ 'बाबाजी' को जाता है।'' बीते दिनों को याद करते हुए वे आगे कहते हैं, "तब पूरा दिन रिकॉर्डिंग चलती थी और 70 से 100 संगीतकारों को एक साथ एक गाने की सही धुन निकालनी होती थी। किसी एक से भी चूक हो जाती तो सबको दोबारा फिर से बजाना पड़ता था। तब एसी (AC) तो होते नहीं थे, तो हम एक बंद कमरे में घंटों रिकॉर्डिंग करने के बाद तुरंत सारे खिड़की दरवाज़ें खोल देते थे या सब पंखे के आगे खड़े हो जाते।'' गोरख शर्मा के इस दुनिया से जाने से फ़िल्म संगीत जगत का एक चमकता सितारा हमेशा के लिए अस्त हो गया।


भानु गुप्त भी एक ऐसे साज़िन्दे थे जिनका फ़िल्म जगत में बहुत नाम था। ख़ास कर राहुल देव बर्मन की टोली में वो एक महत्वपूर्ण महारथी थे। माउथ ऑर्गन (हारमोनिका) और गिटार के वो जाने-माने वादक थे। भले उनका नाम राहुल देव बर्मन के साथ लिया जाता है, यह भी सच है कि उन्होंने कई अन्य संगीतकारों के साथ भी काम किया है। भानु गुप्त का जन्म 1932 में बर्मा (अब म्यानमार) की राजधानी रंगून में हुआ जहाँ बचपन में उन्होंने माउथ ऑरगन बजाना ब्रिटिश नाविकों से सीखा। जापानी भाषा जानने की वजह से मात्र 12 वर्ष की आयु में ही उन्हें जापानी आर्मी में अंग्रेज़ी भाषान्तरकार की नौकरी मिल गई। बचपन में उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध को बर्मा में रहते हुए बहुत करीब से देखा था भानु गुप्त ने। वो और उनका पूरा परिवार सुभाष चन्द्र बोस और उनके INA के साथ काम किया। 15 वर्ष की आयु में युवा भानु को एक प्लास्टिक हारमोनिका उपहार में मिला जिसे उन्होंने ख़ुद ही बजाना सीख लिया। पहली धुन जो उन्होंने उस पर बजाना सीखी, वो थी हमारी राष्ट्रगान की धुन। बर्मा में युद्ध गम्भीर रूप धारण करने की वजह से वो परिवार के साथ भारत आ गए और पश्चिम बंगाल के हूगली ज़िले के वैद्यबाटी नामक जगह में बस गए। ऑयल टेक्नोलोजी में पढ़ाई पूरी की और नौकरी भी करने लगे। भानु शुरु से ही एक अच्छे खिलाड़ी थे। नदियों को तैर कर पार कर जाना, बॉक्सिंग् और क्रिकेट खेलना उनके शौक थे। 18 वर्ष के होते ही भानु Calcutta League में First Division Cricket खेलने लगे। उन्होंने बापु नादकरनी, पंकज राय और वेस्ट इंडीज़ के रॉय गिलक्रिस्ट के साथ खेला हुआ है। आज भी कोलकाता के ’कालीघाट क्लब’ में उनका नाम उस क्लब के स्वर्णिम खिलाड़ियों की लिस्ट में लिखा हुआ है।

क्रिकेट खेलते हुए भानु गुप्त कोलकाता के नाइट क्लबों और कैबरे में आय दिन हारमोनिका बजाया करते थे जिससे थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती थी। धीरे-धीरे उनके सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि आगे क्रिकेट पर ध्यान देना है या संगीत पर। उन्होंने संगीत को चुना और एक संगीतज्ञ बनने का सपना लेकर 1959 में वो अपने परिवार के इच्छा के ख़िलाफ़ जाकर कोलकाता से बम्बई चले आए। हारमोनिका में उनके हुनर से प्रभावित हो कर संगीतकार सी. रामचन्द्र ने उन्हें पहली बार फ़िल्म ’पैग़ाम’ में बजाने का मौका दिया। जल्दी ही बिपिन दत्त (बिपिन-बाबुल जोड़ी के) के साथ वो काम करने लगे और आगे चल कर सलिल चौधरी के साथ जुड़े और वो एक ’हिन्दु हारमोनिका प्लेयर’ के नाम से पहचाने जाने लगे, क्योंकि उन दिनों लगभग सभी हारमोनिका वादक इसाई हुआ करते थे। सलिल दा के साथ किसी रेकॉर्डिंग् के दौरान भानु गुप्त की नज़र पड़ी एक पुराने एडुसोनिया गिटार पर, जिस पर "made by Braganzas of Free School Street, Kolkata" लिखा हुआ था। उपेक्षित स्थिति में पड़े इस गिटार को प्यार से उठा कर उन्होंने इसके तारों को छेड़ना शुरु किया और इसे सीखने में जुट गए। संगीत की समझ तो थी ही, इसलिए ज़्यादा समय नहीं लगा सीखने में। उन दिनों भानु गुप्त संगीतकार जोड़ी सोनिक-ओमी के पड़ोसी हुआ करते थे। सोनिक ओमी के वहाँ संगीतकार मदन मोहन का भी आना-जाना लगा रहता था। एक दिन जब भानु गुप्त गिटार बजा रहे थे, तब मदन मोहन ने उन्हें बजाते हुए सुना, प्रभावित हुए और सोनिक-ओमी के सहयोग से भानु से मुलाक़ात की। 1963 की किसी फ़िल्म में मदन मोहन ने भानु गुप्त को गिटार बजाने का मौका दिया। यह वह समय था जब राहुल देव बर्मन फ़िल्म जगत में बतौर स्वतन्त्र संगीतकार अपने पांव जमाने की कोशिश में लगे थे। उन्हें एक गिटारिस्ट की तलाश थी। ऐसे में भानु गुप्त को बुलाया गया और बाकी अब इतिहास बन चुका है। पंचम के साथ भानु गुप्त का साथ पंचम की मृत्यु तक, यानी 1994 तक रहा। 

पंचम और भानु दा
पंचम के जाने के बाद भानु गुप्त ने अनु मलिक, बप्पी लाहिड़ी और नदीन-श्रवण जैसे संगीतकारों के साथ काम किया। जिस तरह से गोरख शर्मा को हम ’कर्ज़’ के थीम के लिए जानते हैं, उसी तरह से भानु गुप्त को हम जानते हैं ’शोले’ फ़िल्म के ’गिटार थीम’ और ’हारमोनिका थीम’ के लिए। हारमोनिका थीम का दृश्य वह दृश्य है जहाँ जया भादुड़ी (बच्चन) दीया जला रही होती हैं और अमिताभ बच्चन अपना माउथ ऑरगन बजा रहे होते हैं। ’शोले’ के ही सदाबहार गीत "महबूबा महबूबा" में भी भानु गुप्त ने गिटार बजाया है। पंचम के जिस गीत में भानु गुप्त ने पहली बार बजाया, वह गीत था फ़िल्म ’तीसरी मंज़िल’ का "देखिये साहिबों..."। पंचम के कुछ और महत्वपूर्ण गीत जिनमें भानु गुप्त का गिटार सुनाई दिया, वो हैं "एक चतुर नार" (पड़ोसन, 1968), "चिंगारी कोई भड़के" (अमर प्रेम, 1972), "यादों की बारात निकली है आज" (यादों की बारात, 1973), "सुनो, कहो, सुना कहा" (आप की क़सम, 1974), "एक मैं और एक तू" (खेल खेल में, 1975), "तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं" (आंधी, 1975), "ऐसे ना मुझे तुम देखो" (Darling Darling, 1977), "क्या यही प्यार है" (Rocky, 1981), "ये कोरी करारी" (समुन्दर, 1986), "कुछ ना कहो कुछ भी ना कहो" (1942 A Love Story, 1994)। जानेमाने फ़िल्म इतिहासकार बालाजी विट्टल के साथ एक साक्षात्कार में भानु जी ने एक बार पंचम के काम करने के तरीकों के बारे में बताया था कि पंचम किसी भी चीज़ में से संगीत बाहर निकाल लेते थे। उदाहरण स्वरूप, एक बार एक डिफ़ेक्टिव सीलिंग् फ़ैन से तालबद्ध तरीके से चरमराहट की आवाज़ निकल रही थी और उसी से प्रेरित होकर बनी ’आप की क़सम’ फ़िल्म की "सुनो कहो कहा सुना" गीत की धुन। इसी तरह एक बार भानु दा ने गिटार पर ग़लत उंगली फेर दिया जिससे उत्पन्न हो गया "चिंगारी कोई भड़के" के प्रील्युड की धुन। भानु दा एक बार पैक अप के समय यूंही गिटार पर एक धुन बजा रहे थे, और वही धुन बन गई "एक मैं और एक तू" की धुन। "महबूबा महबूबा" में बोतल का प्रयोग या फिर ’तीसरी मंज़िल’ में दरवाज़ा खुलने की आवाज़, ये सब करामात पंचम के दिमाग़ से ही निकले थे। भानु दा ने बालाजी विट्टल को यह भी बताया कि पंचम कभी भी अपने साज़िन्दों और संगीतज्ञों के काम को सराहना नहीं भूलते थे। जब लता जी ने "क्या यही प्यार है" की धुन के लिए पंचम पर उनके दुर्लभ प्रशंसा बरसाईं तो पंचम ने तुरन्त भानु दा की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि "यह धुन इसने बनाया है!" इसी तरह से जब पंचम ने नासिर हुसैन को बताया कि ’यादों की बारात’ का शीर्षक गीत दरसल भानु ने बनाया है तो नासिर साहब ने उन्हें एक दुर्लभ Scotch Whisky से पुरस्कृत किया।

गोरख शर्मा और भानु गुप्त तो चले गए पर पीछे छोड़ गए वाद्य संगीत की एक ऐसी धरोहर जो आने वाले लम्बे समय तक इस दौर के साज़िन्दों और संगीतज्ञों को लाभान्वित करते रहेंगे और हम सुधी श्रोताओं के कानों और दिलों में अमृत घोलते रहेंगे। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की ओर से स्वर्गीय गोरख शर्मा और स्वर्गीय भानु गुप्त को विनम्र श्रद्धा-सुमन!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, January 27, 2018

चित्रकथा - 53: पंचम के दो महारथियों का निधन

अंक - 53

पंचम के दो संगीत महारथियों का निधन


पंडित उल्हास बापट और अमृतराव काटकर 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 53-वीं कड़ी है।

4 जनवरी 2018 को सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित उल्हास बापट और 15 जनवरी 2018 को फ़िल्मी गीतों में रेसो रेसो वाद्य के भीष्म पितामह व जाने-माने संगीत संयोजक व वादक श्री अमृतराव काटकर का निधन हो गया। संयोग की बात है कि इन दोनों संगीत महारथियों ने संगीतकार राहुल देव बर्मन के साथ लम्बा सफ़र तय किया, और उससे भी आश्चर्य की बात यह है कि 4 जनवरी को राहुल देव बर्मन की भी पुण्यतिथि है। इस दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ कर जाने के लिए इन दोनों शिल्पियों ने साल का लगभग वही दिन चुना जिस दिन पंचम इस दुनिया को छोड़ गए थे। आइए आज ’चित्रकथा’ में पंडित उल्हास बापट और श्री अमृतराव काटकर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राहुल देव बर्मन के साथ उनके संगीत सफ़र पर नज़र डालें।




संतूर एक ऐसा वाद्य है जो रुद्र वीणा, सितार, सरोद और सारंगी जितना पुराना नहीं है। और यही कारण है कि संतूर के घराने नहीं बने जिस वजह से संतूर वादकों के पास खुला मैदान है प्रयोगों के लिए। पंडित शिव कुमार शर्मा का नाम संतूर में सर्वोपरि ज़रूर  है लेकिन बीते दशकों में कुछ और बड़े कलाकार भी हुए हैं इस वाद्य के। इनमें एक महत्वपूर्ण नाम पंडित उल्हास बापट का है जिन्होंने संतूर में एक नई धारा लेकर आए। 67 वर्ष की आयु में उनके इस दुनिया से चले जाने से संतूर जगत को ऐसी क्षति पहुँची है जिसकी भरपाई होना मुश्किल है। पंडित बापट ने अपना संगीत सफ़र तबले से शुरु किया रमाकान्त म्हापसेकर के पास। 1973 में एक दिन अचानक उन्होंने एक साज़ों की दुकान में संतूर वाद्य को देखा और बिना कुछ सोचे उसे ख़रीद लाए। बिना किसी औपचारिक गुरु के, पंडित बापट ने अपने आप ही उसे बजाना शुरु किया हारमोनियम के नियमों को ध्यान में रख कर। आगे चल कर उन्होंने विभिन्न रागों को बजाया और यही नहीं रागों को आपस में मिला कर यौगिक रागों का सृजन किया। उन्होंने संतूर के कलमों में कुछ ऐसे बदलाव किए जिससे दो मींड के बीच जो अन्तराल या ख़ाली जगह होता था, वो ग़ायब हो गया। यही नहीं, पंडित जी ने कलमों के अन्त में एक मेटल स्ट्रिप भी जोड़ा जिससे कि दोनों में से किसी एक को संतूर के तार से घिसते हुए दूसरे को तार पर मारा जा सके। पंडित उल्हास बापट शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान ततो दिया ही है, साथ ही साथ फ़िल्म संगीत में उनके योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता। ख़ास तौर से राहुल देव बर्मन के साथ उन्होंने एक लम्बी पारी खेली और पंचम के तमाम यादगार गीतों को अपने दिलकश संतूर के टुकड़ों से सजाया।

पंचम के तमाम गीतों में हमने संतूर के यादगार टुकड़े सुने हैं, लेकिन हम में से शायद बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे जिन्हें पता होगा कि इन टुकड़ों को दरसल पंडित उल्हास बापट ने बजाया है। पंचम के साथ पंडित बापट का सफ़र शुरु हुआ था 1978 की फ़िल्म ’घर’ से। पंडित शिव कुमार शर्मा ने भी पंचम के साथ काम किया है जिसमें "काली पलक तेरी गोरी", "करवटें बदलते रहे सारी रात हम", "प्यार के दिन आए काले बादल छाये", "ये लड़का हाय अलाह कैसा है दीवाना" जैसे गीत शामिल हैं। पंडित बापट के बजाए गीतों में "राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं" (नमकीन),  "हुज़ूर इस क़दर भी ना इतरा के चलिए" (मासूम), "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है" (इजाज़त), "जाने क्या बात है, नींद नहीं आती" (सनी), "तेरे लिए पलकों की झालर बुनूँ" (हरजाई), "रिमझिम रिमझिम रुमझुम रुमझुम" (1942 A Love Story), "प्यार हुआ चुपके से" (1942 A Love Story), "सीली हवा छू गई" (लिबास) जैसे यादगार गीत शामिल हैं। पंडित उल्हास बापट एक ऐसे संतूर वादक थे जिन्हे क्रोमेटिक ट्युनिंग् की महारथ हासिल थी। 12 सुरों को अगर लगातार बजाया जाता रहे तो वो क्रोमेटिक ट्युनिंग् जैसा सुनाई देता है। पंडित बापट अकेले ऐसे कलाकार रहे जो संतूर पर इस तरह की ट्युनिंग् कर पाते थे और यही कारण था कि वो किसी भी स्केल के गीत को आसानी से संतूर पर बजा लेते थे, जो सामान्यत: संतूर पर बहुत मुश्किल होता है। उदाहरण के तौर पर 1981 की फ़िल्म ’ज़माने को दिखाना है’ के मशहूर गीत "दिल लेना खेल है दिलदार का" शुरु होता है डी स्केल से और पंडित जी का संतूर आता है सी-स्केल पर। लेकिन क्योंकि वो एक क्रोमेटिक ट्युनर थे, वो दोनो सेक्शन बजा लेते थे। 

क्रोमेटिक ट्युनिंग् जैसी मुश्किल विधा के अलावा पंडित उल्हास बापट ने संतूर की एक तकनीक का आविष्कार भी किया जिसका पेटेण्ट उनके पास है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में इसे मींड कहा जाता है जिसमें एक सुर से दूसरे सुर पर बिना अन्तराल के जाया जा सकता है। संतूर के कलमों में कुछ बदलाव करके पंडित बापट ने मींड को संतूर में साकार किया और पहली बार 1982 की फ़िल्म ’अंगूर’ के गीत "होठों पे बीती बात" में प्रयोग किया। यह पहला अवसर था कि जब पंचम ने उन्हें अपने गीत में मींड तकनीक प्रयोग करने का मौका दिया। इस गीत में यह प्रयोग इतना खरा उतरा कि पंचम ने चिल्लाते हुए कहा, "यह लड़का ने क्या कमाल किया है, संतूर पे मींड लाया है!" पंचम ख़ुद भी एक प्रयोगधर्मी संगीतकार थे, इसलिए पंडित बापट के साथ उनकी ट्युनिंग् ख़ूब जमी। 1987 के प्राइवेट ऐल्बम ’दिल पड़ोसी है’ में भी इसी मींड पद्धति का प्रयोग किया गया है। पंचम के अलावा पंडित बापट ने कई और संगीतकारों के गीतों में भी बजाया है जिनमें एक उल्लेखनीय नाम है रवीन्द्र जैन का। उनके साथ पहली बार 1979 की फ़िल्म ’सुनैना’ के पार्श्व-संगीत में उन्होंने बजाया। ’राम तेरी गंगा मैली’ के गीतों और पार्श्व-संगीत में भी पंडित बापट के सुमधुर संतूर के पीसेस सुनाई देते हैं। रवीन्द्र जैन के साथ उन्होंने लगभग 40 फ़िल्मों में काम किया है। पंडित उल्हास बापट ने 2004 की फ़िल्म ’वीर ज़ारा’ में भी बजाया, फ़िल्म के मुख्य गीत "तेरे लिए हम हैं जिये" के शुरुआती संगीत में ही उनके संतूर की ध्वनियों ने ऐसा समा बांधा कि सुनने वाले उसमें बहते चले गए। एक लम्बी बीमारी के बाद पंडित बापट इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गए, पर पीछे छोड़ गए संतूर और संगीत का एक ऐसा ख़ज़ाना जो आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाता रहेगा। पंडित उल्हास बापट की पुण्य स्मृति को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का विनम्र नमन!


राहुल देव बर्मन के संगीत में कई महत्वपूर्ण साज़िन्दों, संगीत संयोजकों और सहायकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मारुति राव, होमी मुल्ला, रणजीत गज़मर, बासुदेव चक्रबर्ती, मनोहारी सिंह, फ़्रैंको वाज़, रमेश अय्यर के साथ साथ एक महत्वपूर्ण नाम अमृतराव काटकर का भी है। अमृतराव काटकर एक ऐसे संगीत शिल्पि थे जो पंचम के साथ शुरु से ही जुड़े हुए थे और पंचम के ’रेसो-रेसो’ (Reso Reso) नामक वाद्य में जान फूंकने का श्रेय अमृतराव को जाता है। 15 जनवरी 2018 को अमृतराव काटकर के इस दुनिया-ए-फ़ानी से चले जाने से पंचम बैण्ड का एक और महत्वपूर्ण सदस्य हमसे बिछड़ गया। पंचम के गीतों में इस वाद्य का जितना प्रयोग हुआ, शायद ही किसी अन्य संगीतकार के गीतों में उससे पहले हुआ होगा। और इस दिशा में अमृतराव साहब का महत्वपूर्ण योगदान रहा। रेसो-रेसो मूलत: एक अफ़्रीकन वाद्य है जिसे ’स्क्रेपर’ (scraper) भी कहा जाता है। इस वाद्य को अतिरिक्त या सहायक रीदम के तौर पर प्रयोग किया जाता है जिससे कि मूल ताल या रीदम को अतिरिक्त धार या तिगुना गति मिल जाती है। रेसो वाद्य खोखले बाँस का बना होता है, एक पाइप के आकार में। निर्धारित दूरियों पर स्केल चिन्हित किया जाता है। जब इसका इस्तमाल कंघी जैसे किसी सपाट स्ट्रिप के साथ किया जाता है तो इससे बहुत ही तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। इस अतिरिक्त रीदम को ’साइड रीदम’ भी कहा जाता है। पंचम के गीतों में साइड रीदम के लिए रेसो के अलावा खंजिरी, कब्बाज़ आदि का प्रयोग भी काफ़ी हुआ है। उनके गीतों में रेसो का प्रयोग 1965 की फ़िल्म ’तीसरी मंज़िल’ के गीतों से ही शुरु हो गया था। "आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा", "ओ मेरे सोना रे" और "ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली" में रेसो का साइड रीदम में इस्तमाल महसूस किया जा सकता है। लेकिन जिस गीत में रेसो का प्रयोग सबसे ज़्यादा प्रॉमिनेण्ट रहा, वह था "मेरे सामने वाली खिड़की में"। इस गीत की शुरुआत में किशोर कुमार के आलाप और उन सात खंबों के बाद रेसो ही पूरे रीदम पर हावी रहता है। यूं तो रेसो को मुख्य रीदम के सहारे के रूप में प्रयोग किया जाता है, लेकिन पंचम ने उल्टा रुख़ अपनाया और रेसो को ही रीदम का मुख्य वाद्य बना लिया। ’पड़ोसन’ के इस गीत में केश्टो मुखर्जी द्वारा झाड़ू पर कंघी बजाने वाले जगह में दरसल रेसो पर कंघी पा प्रयोग होता है।

पंचम के गीतों में रेसो के महत्वपूर्ण प्रयोग के बारे में हमने जाना, लेकिन इन सब के पीछे जिस व्यक्ति का सबसे बड़ा योगदान रहा है, वो अमृतराव काटकर हैं, जिन्हें सभी प्यार से अमृत काका कह कर बुलाते थे। वो असल में एक तबला वादक थे लेकिन पंचम और उनके रीदम सेक्शन के प्रमुख मारुतिराव कीरजी ने उन्हें रेसो वादक बना दिया। अमृतराव ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जल्दी ही उन्होंने एक अपना अलग स्टाइल बना लिया रेसो के इस्तमाल का। उन्होंने इस विधा में ऐसी महारथ हासिल की कि आज वो भारत के शीर्ष के रेसो वादक के रूप में जाने जाते हैं। एक तबला वादक को रेसो वादक के रूप में स्थापित करने में पंचम और उनके गीतों का बड़ा हाथ रहा है। कंघी बजाने जैसी आवाज़ें पंचम के गीतों में कई बार सुनने को मिला है, जो रेसो की ध्वनियाँ हैं, और इन सबके पीछे हैं अमृतराव काटकर। ’कटी पतंग’ के "मेरा नाम है शबनम" गीत तो पूर्णत: रेसो और बॉंगो पर आधारित है। फ़िल्म ’सागर’ का गीत "सच मेरे यार है" भी तो रेसो से ही शुरु होता है। अमृतराव ने 1982-83 के आसपास रेसो के प्रयोग में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया। गीत था ’सनम तेरी कसम’ का "जानेजाँ ओ मेरी जानेजाँ"। पारम्परिक बाँस के बने रेसो के स्थान पर वो लेकर आए धातु से बना रेसो। गीत के दूसरे इन्टरल्युड संगीत में इस नए रेसो को सुना व महसूस किया जा सकता है। 

यूं तो एक अफ़्रीकन साज़ होने की वजह से रेसो का इस्तमाल साधारणत: उन गीतों में होता है जो तेज़ गति या तेज़ रीदम का हो, या कैबरे किस्म का कोई गीत हो, लेकिन पंचम और अमृतराव ने मिल कर रेसो को शास्त्रीय संगीत आधारित रचनाओं में भी प्रयोग किया और इस तरह के गीतों को एक नया रूप मिला। ’ख़ूबसूरत’ फ़िल्म के गीत "पिया बावरी पी कहाँ", ’अमर प्रेम’ के गीत "चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये", ’जुर्माना’ के गीत "सावन के झूले पड़े तुम चले आओ" और ’महबूबा" के गीत "मेरे नैना सावन भादों" में रेसो का प्रयोग करके इन दोनों ने सभी को चमत्कृत कर दिया। कितने आश्चर्य की बात है कि पंचम की पुण्यतिथि 4 जनवरी है और उनके ये दिग्गज साज़िंदे भी जनवरी के महीने में ही इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर जा रहे हैं। 4 जनवरी को पंडित उल्हास बापट और 15 जनवरी को अमृतराव काटकर के चले जाने से यूं लगा कि जैसे ये दोनों पंचम से ही फिर एक बार मिलने के लिए अपनी अपनी अनन्त यात्रा पर निकल पड़े हों। इन दो महान संगीत साधकों को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ करती है झुक कर सलाम!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Monday, December 4, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 17 || मन्ना डे

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 17
Manna Dey


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के 17 वें एपिसोड में सुनिए कहानी मन्ना डे की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....

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फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Monday, November 27, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 16 || आर डी बर्मन

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 16
R D Burman


फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के 16 वें एपिसोड में सुनिए कहानी पंचम यानी आर डी बर्मन की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....



फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -

Saturday, January 5, 2013

पंचम के रंग में रंगी है आज की 'सिने पहेली'


5 जनवरी, 2013
सिने-पहेली - 53  में आज 

पहचानिये पंचम  के कुछ गीतों को

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार, और आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ। दोस्तों, इन दिनों समूचे उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। कई जगहों पर न्यूनतम तापमान 2 डिग्री तक पहुँच गया है। इस मौसम में छुट्टी का दिन हो, हाथ में गरम चाय का प्याला हो, सामने प्लेट पर गरमागरम पकौड़े हों, और सामने कम्प्यूटर स्क्रीन पर ताज़ी 'सिने पहेली' का पेज खुला हो तो भई क्या बात है, नहीं? ख़ैर, छठे सेगमेण्ट की पहली कड़ी में प्रतियोगियों की भागीदारी में जो कमी आई थी, पिछली कड़ी में उसमें कुछ बढ़ौत्री हुई है, और हम यह आशा करते हैं कि आने वाले सप्ताहों में यह फिर से अपनी पूराने शक्ल में आ जायेगी। बढ़ते हैं आज की पहेली की ओर।.




दोस्तों, कल यानी 4 जनवरी को संगीतकार राहुल देव बर्मन के याद का दिन था। राहुल देव बर्मन, या पंचम, का नाम क्रान्तिकारी संगीतकार के रूप में लिया जाता है। पाँच चिन्हित क्रान्तिकारी संगीतकारों के बाकी चार नाम हैं मास्टर गुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ.पी. नय्यर और ए. आर. रहमान। इस तरह से 'सिने पहेली' में आज के अंक को पंचम के नाम समर्पित करना आवश्यक हो जाता है। तो आइए आज आप से पूछें पंचम के रंग में रंगी हुई यह 'सिने पहेली'।


आज की पहेली : पंचम पहेली


सवाल-1: आशा भोसले और पंचम के गाये प्रथम और अन्तिम युगल गीत कौन से थे? (2 अंक)

सवाल-2: पंचम द्वारा स्वरबद्ध लता मंगेशकर और आशा भोसले के गाये 6 युगल गीत बतायें। (6 अंक)

सवाल-3: Its a Sunday song. But the song was supposed to be sung on a Saturday. किस गीत की बात हो रही है यह? (2 अंक)


जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 53" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 10 जनवरी शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।


पिछली पहेली का हल


1. रीतेश देशमुख, तुषार कपूर
2. इलियाना डिक्रूज, रणबीर कपूर, प्रियंका चौपड़ा
3. जैकी भगनानी, निधि सुबैय्या
4. आर. माधवन
5. विवेक ओबेराय, मल्लिका शेरावत

पिछली पहेली का परिणाम

इस बार कुल 8 प्रतियोगियों ने 'सिने पहेली' में भाग लिया। सबसे पहले 100% सही जवाब भेज कर 'सरताज प्रतियोगी' का खिताब जीता है पिट्सबर्ग के महेश बसन्तनी ने। महेश जी, बहुत बहुत बधाई आपको। और यह रहा विस्तारित परिणाम...



नये प्रतियोगियों का आह्वान

नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।


कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?

1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। पाँचवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह नए साल में फिर मुलाक़ात होगी,  आप सभी के लिए नया साल शुभ हो, इसी आशा के साथ,  नमस्कार। 

Wednesday, January 4, 2012

छोटी सी कहानी से, बारिशों के पानी से - 'एक गीत सौ कहानियाँ' की पहली कड़ी में यादें पंचम के इस कालजयी गीत की


गुलज़ार हमेशा कहते थे कि पिक्चराइज़ करने के लिए उन्हें उस वक़्त कम्पोज़र के साथ बैठना बहुत ज़रूरी है जब गाना कम्पोज़ हो रहा हो वरना वो पिक्चराइज़ नहीं कर पाते। उन्हें इमेजेस मिलते हैं जब गाना कम्पोज़ हो रहा होता है। पर पंचम नें चाल चली और गुलज़ार के साथ बैठ कर इस गीत को कम्पोज़ करने से इन्कार कर दिया।

Wednesday, August 10, 2011

फिर किसी शाख ने फेंकी छाँव....और "बहुत देर तक" महकती रही तनहाईयाँ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 719/2011/159



'एल्ड इज़ गोल्ड' के सभी चाहने वालों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! जैसा कि इन दिनों इस स्तंभ में आप आनंद ले रहे हैं सजीव सारथी की लिखी कविताओं और उन कविताओं पर आधारित फ़िल्मी रचनाओं की लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर' में। आज नवी कड़ी के लिए हमने चुनी है कविता 'बहुत देर तक'।



बहुत देर तक

यूँ ही तकता रहा मैं

परिंदों के उड़ते हुए काफ़िलों को

बहुत देर तक

यूँ ही सुनता रहा मैं

सरकते हुए वक़्त की आहटों को



बहुत देर तक

डाल के सूखे पत्ते

भरते रहे रंग आँखों में मेरे

बहुत देर तक

शाम की डूबी किरणें

मिटाती रही ज़िंदगी के अंधेरे



बहुत देर तक

मेरा माँझी मुझको

बचाता रहा भँवर से उलझनों की

बहुत देर तक

वो उदासी को थामे

बैठा रहा दहलीज़ पे धड़कनों की



बहुत देर तक

उसके जाने के बाद भी

ओढ़े रहा मैं उसकी परछाई को

बहुत देर तक

उसके अहसास ने

सहारा दिया मेरी तन्हाई को।




इस कविता में कवि के अंदर की तन्हाई, उसके अकेलेपन का पता चलता है। कभी कभी ज़िंदगी यूं करवट लेती है कि जब हमारा साथी हमसे बिछड़ जाता है। हम लाख कोशिश करें उसके दामन को अपनी ओर खींचे रखने की, पर जिसको जाना होता है, वह चला जाता है, अपनी तमाम यादों के कारवाँ को पीछे छोड़े। उसकी यादें तन्हा रातों का सहारा बनती हैं। फिर एक नई सुबह आती है जब कोई नया साथी मिल जाता है। पहले पहले उस बिछड़े साथी के जगह उसे रख पाना असंभव सा लगता है, पर समय के साथ साथ सब बदल जाता है। अब नया साथी भी जैसे अपना सा लगने लगता है जो इस तन्हा ज़िंदगी में रोशनी की किरण बन कर आया है। और जीवन चक्र चलता रहता है। एक बार फिर। "फिर किसी शाख़ नें फेंकी छाँव, फिर किसी शाख़ नें हाथ हिलाया, फिर किसी मोड़ पे उलझे पाँव, फिर किसी राह नें पास बुलाया"। किसी के लिए ज़िंदगी नहीं रुकती। वक़्त के साथ हर ज़ख़्म भरता नहीं, फिर भी जीते हैं लोग कोई मरता नहीं। तो उस राह नें अपनी तरफ़ उसे बुलाया, और वो उस राह पर चल पड़ा, फिर एक बार। आइए सुना जाये राहुल देव बर्मन के संगीत में फ़िल्म 'लिबास' में लता मंगेशकर की आवाज़, गीत एक बार फिर गुलज़ार साहब का।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - ये एक मल्टी स्टारर फिल्म है.

सूत्र २ - फिल्म के निर्देशक आज भी सक्रिय हैं और अपनी नई फिल्म के लिए उन्होंने रहमान को साईन किया है.

सूत्र ३ - एक अंतरा शुरू होता है इस शब्द से - "अनजाने".



अब बताएं -

गीतकार कौन है - ३ अंक

संगीतकार बताएं - २ अंक

फिल्म के निर्देशक बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी और अवध जी बहुत दिनों बाद दिखे, कहाँ रहे जनाब ?



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, August 8, 2011

कतरा कतरा मिलती है.....खुशी और दर्द के तमाम फूलों को समेट लेता है "वो" आकर

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 717/2011/157

'ओल्ड इज़ गोल्ड' स्तंभ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय और सजीव का प्यार भरा नमस्कार! आज इस सुरीली महफ़िल की शमा जलाते हुए पेश कर रहे हैं सजीव सारथी की लिखी कविता 'वो'। लघु शृंखला 'एक पल की उम्र लेकर' की यह है सातवीं कड़ी।

समय की पृष्ठभूमि पर
बदलते रहे चित्र
कुछ चेहरे बने
कुछ बुझ गए
कुछ कदम साथ चले
कुछ खो गए
पर वो
उसकी ख़ुशबू रही साथ सदा
उसका साया साथ चला मेरे
हमेशा

टूटा कभी जब हौंसला
और छूटे सारे सहारे
उन थके से लम्हों में
डूबी-डूबी तन्हाइयों में
वो पास आकर
ज़ख़्मों को सहलाता रहा
उसके कंधों पर रखता हूँ सर
तो बहने लगता है सारा गुबार
आँखों से

वो समेट लेता है मेरे सारे आँसू
अपने दामन में
फिर प्यार से काँधे पर रख कर हाथ
कहता है - अभी हारना नहीं
अभी हारना नहीं
मगर उसकी उन नूर भरी
चमकती
मुस्कुराती
आँखों में
मैं देख लेता हूँ
अपने दर्द का एक
झिलमिलाता-सा कतरा।


इसमें कोई शक़ नहीं कि उस एक इंसान की आँखों में ही अपनी परछाई दिखती है, अपना दर्द बस उसी की आँखों से बहता है। जिस झिलमिलाते कतरे की बात कवि नें उपर कविता की अंतिम पंक्ति में की है, वह कतरा कभी प्यास बुझाती है तो कभी प्यास और बढ़ा देती है। यह सोचकर दिल को सुकून मिलता है कि कोई तो है जो मेरे दर्द को अपना दर्द समझता है, और दूसरी तरफ़ यह सोचकर मन उदास हो जाता है कि मेरे ग़मों की छाया उस पर भी पड़ रही है, उसे परेशान कर रही है। यह कतरा कभी सुकून बन कर तो कभी परेशानी बनकर बार बार आँखों में झलक दिखा जाता है। और कतरे की बात करें तो यह जीवन भी तो टुकड़ों में, कतरों में ही मिलता है न? शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे हमेशा लगातार जीवन में ख़ुशी, सफलता, यश, धन की प्राप्ति होती होगी। समय सदा एक जैसा नहीं रहता। जीवन में हर चीज़ टुकड़ों में मिलती है, और सबको इसी में संतुष्ट भी रहना चाहिए। अगर सबकुछ एक ही पल में, एक साथ मिल जाए फिर ज़िंदगी का मज़ा ही क्या! ज़िंदगी की प्यास हमेशा बनी रहनी चाहिए, तभी इंसान पर ज़िंदगी का नशा चढ़ा रहेगा। फ़िल्म 'इजाज़त' में गुलज़ार साहब नें कतरा कतरा ज़िंदगी की बात कही थी - "कतरा कतरा मिलती है, कतरा कतरा जीने दो, ज़िंदगी है, बहने दो, प्यासी हूँ मैं प्यासी रहने दो"। आशा भोसले का गाया और राहुल देव बर्मन का स्वरबद्ध किया यह गीत 'सुपरिम्पोज़िशन' का एक अनूठा उदाहरण है। आइए सुना जाए!



और अब एक विशेष सूचना:
२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।

और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-

सूत्र १ - ये कलात्मक फिल्म एक विचारणीय मुद्दे पर केंद्रित थी, जो आज भी एक समस्या ही है.
सूत्र २ - फिल्म के सगीतकार ने इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय सम्मान जीता था.
सूत्र ३ - इस ग़ज़ल के एक मिसरे में शब्द है -"लौ".

अब बताएं -
शायर बताएं - ३ अंक
संगीतकार बताएं - २ अंक
गायिका कौन है - २ अंक

सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है इस बार अमित जी कोई रोक् नहीं पायेगा....क्षिति जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, May 30, 2011

क्या जानूँ सजन होती है क्या गम की शाम....जब जल उठे हों मजरूह के गीतों के दिए तो गम कैसा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 667/2011/107

फ़िल्म-संगीत इतिहास के सुप्रसिद्ध गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला '...और कारवाँ बनता गया' की सातवीं कड़ी में एक ऐसे संगीतकार की रचना लेकर आज हम उपस्थित हुए हैं जिस संगीतकार के साथ भी मजरूह साहब नें एक सफल और बहुत लम्बी पारी खेली है। आप हैं राहुल देव बर्मन। इन दोनों के साथ की बात बताने से पहले यह बताना ज़रूरी है कि इस जोड़ी को मिलवाने में फ़िल्मकार नासिर हुसैन की मुख्य भूमिका रही है। वैसे कहीं कहीं यह भी सुनने/पढ़ने में आता है कि मजरूह साहब नें पंचम की मुलाक़ात नासिर साहब से करवाई। उधर ऐसा भी कहा जाता है कि साहिर लुधियानवी नें नासिर साहब की आलोचना की थी उनकी व्यावसायिक फ़िल्में बनाने के अंदाज़ की। नासिर साहब नाराज़ होकर साहिर साहब से यह कह कर मुंह मोड़ लिया कि साहिर साहब चाहते हैं कि हर निर्देशक गुरु दत्त बनें। नासिर हुसैन को अपना स्टाइल पसंद था, जिसमें वो कामयाब भी थे, तो फिर किसी और फ़िल्मकार के नक्श-ए-क़दम पर क्यों चलना! और इस तरह से मजरूह बन गये नासिर हुसैन की पहली पसंद और उन्होंने मजरूह साहब से दस फ़िल्मों में गीत लिखवाये। इन दस फ़िल्मों में जिनमें राहुल देव बर्मन का संगीत था, उनमें शामिल हैं 'तीसरी मंज़िल', 'बहारों के सपने', 'यादों की बारात', 'प्यार का मौसम', 'हम किसी से कम नहीं', 'कारवाँ', 'ज़माने को दिखाना है', 'मंज़िल मंज़िल', और 'ज़बरदस्त'।

आइए आज राहुल देव बर्मन और मजरूह सुल्तानपुरी की जोड़ी को समर्पित एक गीत सुना जाये फ़िल्म 'बहारों के सपने' से। लता मंगेशकर की आवाज़ में यह गीत है "क्या जानू सजन होती है क्या ग़म की शाम, जल उठे सौ दीये जब लिया तेरा नाम"। इस गीत में पंचम नें उस ज़माने के हिसाब से एक अनूठा और नवीन प्रयोग किया। उस ज़माने में सुपरिम्पोज़िंग् या मिक्सिंग् की तकनीक विकसित नहीं हुई थी। लेकिन पंचम नें समय से पहले ही इस बारे में सोचा और इसे अपने तरीके से सच कर दिखाया। इस गीत को सुनते हुए आप महसूस करेंगे कि मुख्य गीत के पार्श्व में भी अंतरे में एक गायिका की आवाज़ निरंतर चलती रहती है। पंचम नें गीत को लता की आवाज़ में ईरेज़िंग् हेड को हटाकर रेकॉर्ड किया। उसके बाद दोबारा लता जी से ही आलाप के साथ उसी रेकॉडिंग् पर रेकॉर्ड किया। मिक्सिंग् की तकनीक के न होते हुए भी पंचम नें मिक्सिंग् कर दिखाया था। लेकिन शायद यह बात कुछ लोगों के पल्ले नहीं पड़ी और उन्होंने इस गीत की विनाइल रेकॉर्ड पर लता मंगेशकर के साथ साथ उषा मंगेशकर को भी क्रेडिट दे दी। और लोग यह समझते रहे कि पार्श्व में गाया जा रहा आलाप उषा जी का है। लता जी के ट्विटर पर आने के बाद किसी नें उनसे जब इस बारे में पूछा था कि क्या उषा जी की आवाज़ उस गीत में शामिल है, तो उन्होंने सच्चाई बता दी कि गीत को सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्होंने ही गाया था और दो बार इसकी रेकॉर्डिंग् हुई थी। इसी बात से पंचम के सृजनशीलता का पता चलता है। तो आइए इस ख़ूबसूरत गीत को सुनें और सलाम करें मजरूह-पंचम की इस जोड़ी को। सचमुच ऐसे लाजवाब गीतों को सुनते हुए जैसे सौ दीये जल उठते हैं हमारे मन में।



क्या आप जानते हैं...
कि मजरूह सुल्तानपुरी नें करीब करीब ३५० फ़िल्मों में करीब ४००० गीत लिखे हैं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 8/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - फिल्म के निर्देशक कौन थे - ३ अंक
सवाल २ - किन युगल आवाजों में है ये गीत - २ अंक
सवाल ३ - संगीतकार बताएं- १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी के आने से मुकाबला रोचक हो गया है, बाज़ी शरद जी, अविनाश जी और क्षिति जी किसी की भी हो सकती है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, May 18, 2011

क्या गजब करते हो जी, प्यार से डरते हो जी....मगर जनाब हँसना कभी नहीं छोडना रोने के डर से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 659/2011/99

'गान और मुस्कान' शृंखला में अब तक आपने आठ गीत सुनें जिनके भाव अलग अलग थे, लेकिन जो एक बात उनमें समान थी, वह यह कि हर गीत में किसी न किसी बात पर गायक की हँसी सुनाई दी। आज के अंक के लिए हमने जिस गीत को चुना है, उसमें भी हँसी तो है ही, लेकिन यह हँसी थोड़ी मादकता लिये हुए है। एक सेनशुअस नंबर, एक सिड्युसिंग् नंबर, और इस तरह के गीतों को आशा जी किस तरह का अंजाम देती हैं, इससे आप भली-भाँति वाकिफ़ होंगे। जी हाँ, आज आशा भोसले की मादक आवाज़ में सुनिए १९८१ की फ़िल्म 'लव स्टोरी' से "क्या ग़ज़ब करते हो जी, प्यार से डरते हो जी, डर के तुम और हसीन लगते हो जी"। युं तो फ़िल्म के नायक-नायिका हैं कुमार गौरव और विजेता पंडित, लेकिन यह गीत फ़िल्माया गया है अरुणा इरानी पर, जो नायक कुमार गौरव को अपनी तरफ़ आकर्षित करना चाह रही है, लेकिन नायक साहब कुछ ज़्यादा इंटरेस्टेड नहीं लगते। उस पर नायिका विजेता भी तो पर्दे के पीछे से यह सब कुछ देख रही है, और कुमार गौरव भी उसे देखते हुए देखता है, लेकिन अरुणा इरानी इससे बेख़बर है। इस गीत में आशा जी की शरारती हँसी गीत की शुरुआत में ही सुनाई दे जाती है। हँसी के अलावा गीत में आगे चलकर आशा जी अंगड़ाई भी लेती है, जिसका भी अपना अलग मादक अंदाज़ है। आनंद बख्शी और राहुल देव बर्मन इस फ़िल्म के गीतकार-संगीतकार रहे, और इस फ़िल्म का "कैसा तेरा प्यार कैसा ग़ुस्सा है तेरा" हम 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला में सुनवा चुके हैं।

१९८१ का साल राहुल देव बर्मन के लिए एक महत्वपूर्ण साल था। इस साल उनके संगीत से सजी फ़िल्मों में शामिल थे 'धुआँ', 'मंगलसूत्र', 'दौलत', 'जेल-यात्रा', 'कालिया', 'शौक़ीन', 'रक्षा', 'क़ुदरत', 'कच्चे हीरे', 'ज़माने को दिखाना है', 'सत्ते पे सत्ता', 'बीवी ओ बीवी', 'गहरा ज़ख़्म'। साल ८१-८२ में तीन और फ़िल्में आईं पंचम के संगीत से सजी जिसनें न केवल पंचम के करीयर को चार चांद लगाये, बल्कि तीन नये नायकों को भी जन्म दिया। ये तीन नायक हैं संजय दत्त (रॉकी), कुमार गौरव (लव स्टोरी) और सनी देओल (बेताब)। बिल्कुल नई पीढ़ी के लिए रचा संगीत ज़बरदस्त कामयाब रही, जिसने यह साबित किया कि इस नये दशक और नई पीढ़ी में भी उनका संगीत कितना जवान है! लेकिन आधुनिक शैली के ऒर्केस्ट्रेशन और नये नायकों के लिए धुन बनाने का मतलब कतई यह नहीं था कि मेलडी के साथ कोई समझौता किया जाये जो उस दौर के एक अन्य संगीतकार नें डिस्को के नाम पर किया था। पंचम नें इन फ़िल्मों में गीतों की कर्णप्रियता के साथ भी कोई समझौता नहीं किया। अब आज के प्रस्तुत गीत को ही ले लीजिये, अगर यह गीत आज के दौर में बना होता तो यकीनन इसको अश्लीलता से भर दिया गया होता, गायकी में भी अश्लील शैली अपनायी गई होती, लेकिन इस गीत को सुनते हुए कभी भी ऐसा नहीं लगता कि कहीं पे कोई ग़लत बात है। गीत मादक और सिड्युसिव ज़रूर है लेकिन अश्लील कदापि नहीं। लीजिए आप भी इसी बात को महसूस कीजिए आशा जी की चंचल, शोख़ और शरारती अंदाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि एक साक्षात्कार में राहुल देव बर्मन नें यह स्वीकार किया था कि ८० के दशक में एक के बाद एक २३ लगातार फ़िल्मों के लिए उनका संगीत फ़्लॉप रहा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.
सवाल १ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म की नायिका कौन है - २ अंक
सवाल ३ - निर्देशक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे अरे ये क्या हुआ, अनजाना जी कहाँ गायब हो गए. अमित जी ३ अंक ले उड़े हैं सर यानी आप दोनों को स्कोर अब बराबर है...यानी फैसला आज अंतिम गेंद पर ही होगा. अविनाश जी और दीप जी को भी बधाई. हिन्दुस्तानी जी आप आये यही बहुत है, अमित जी छूटी हुई फिल्म का नाम बताने के लिए धन्येवाद

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, May 15, 2011

बोलिए सुरीली बोलियाँ...और पिरोते रहिये हँसी की लड़ियाँ हर पल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 656/2011/96

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! आज रविवार, यानी छुट्टी का दिन, आप सभी नें अपने अपने परिवार के साथ हँसी-ख़ुशी बिताया होगा। हँसी-ख़ुशी से याद आया कि इन दिनों इस स्तंभ में जारी है लघु शृंखला 'गान और मुस्कान', जिसमें हम कुछ ऐसे गीत सुनवा रहे हैं जिनमें गायक/गायिका की हँसी सुनाई देती है। आज आप सुनेंगे गायिका-अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित की हँसी। सिंगिंग् सुपरस्टार्स की श्रेणी में सुलक्षणा पंडित और सलमा आग़ा दो ऐसे नाम हैं जिनके बाद इस श्रेणी को पूर्णविराम सा लग गया है। ख़ैर, आज जिस गीत को लेकर हम उपस्थित हुए हैं वह है फ़िल्म 'गृहप्रवेश' का - "बोलिये सुरीली बोलियाँ"। भूपेन्द्र और सुलक्षणा पंडित की आवाज़ों में यह शास्त्रीय संगीत पर आधारित रचना है राग बिहाग पर आधारित, लेकिन इसमें हास्य का भी पुट है। अब जिस गीत के मुखड़े के ही बोल हैं "नमकीन आँखों की रसीली गोलियाँ", उसमें हास्य तो होगा ही न! और "नमकीन आँखों की रसीली गोलियाँ" कहने वाले गीतकार गुलज़ार साहब के अलावा भला और कौन हो सकता है! बासु भट्टाचार्य निर्देशित १९७९ की इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं संजीव कुमार, शर्मीला टैगोर और सारिका। 'अनुभव' और 'आविष्कार' के बाद 'गृह-प्रवेश', इस तरह से वैवाहिक संबंधों पर बनी फ़िल्मों की तिकड़ी की यह तीसरी व अंतिम फ़िल्म थी बासु साहब की। फ़िल्म में संगीत था कानू रॉय का जिन्होंने 'अनुभव' और 'आविष्कार' में भी संगीत दिया था। और इस फ़िल्म के गीतों को आवाज़ दी चन्द्राणी मुखर्जी, सुलक्षणा पंडित, भुपेन्द्र, येसुदास और पंकज मित्र नें।

सुलक्षणा पंडित एक अच्छी अभिनेत्री रही हैं। वो जितनी सुंदर दिखती हैं, उतनी ही सुंदर उनकी शख्सियत है, और उनकी आवाज़ भी उतनी ही ख़ूबसूरत है। कुछ वर्ष पहले सुलक्षणा जी विविध भारती पर तशरीफ़ लायी थीं। कमल शर्मा से की हुई उनकी लम्बी बातचीत में से एक अंश निकालकर आज यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें सुंदरता की बात कही गयी है, लीजिये पढ़िये-

कमल शर्मा: हम अभी कुछ देर पहले ब्युटी की बात कर रहे थे, सही मायने में जब तक आदमी अंदर से ख़ूबसूरत नहीं है, "इनर ब्युटी" जिसे हम कहते हैं, मेरे ख़याल से वो ज़्यादा सुंदर होती है। बहुत लम्बे समय तक लोग उसे ही याद रखते हैं और ऐसा भोलापन आपके मन में गहरा असर छोड़ता है, और स्क्रीन पर भी ज़्यादा अपना भी लगता है। आपका क्या ख़याल है इस बारे में?

सुलक्षणा पंडित: बहुत बड़ी बात कही आपनें। और बहुत सही बात है। देखिये मैं, एक बात कहती हूँ, आप जिस तरह से सौंदर्य की बात कर रहे हैं, तो वह सौंदर्य भगवान बनाता है। मैं यही कहूँगी कि जब मैं रास्ते पर चलती थी, १६/१७ साल, एक चर्च है, वहाँ मैं मोमबत्ती जलाती थी। मैं भजन गाती थी कि "भगवान मेरा अच्छा हो", सब जगह जाती थी, तो 'without my knowledge' के लोग मुझे पीछे मुड़ मुड़ के देखते थे, कि ये कौन है, ये कौन है, इतनी ख़ूबसूरत लगती थी। फिर एक बार मैं मन्ना दा के साथ कोई गाना गा रही थी, मुझे देखते ही बोले, "अरे सुलक्षणा, तू हीरोइन क्यों नहीं बनती?" मैंने कहा कि मैं गाना गाने आयी हूँ। तो बोले, "नूरजहाँ की तरह गा, और सुरैया भी गाती थीं, उनके जैसा काम भी करो"। तो मैंने कहा, "अच्छा, जैसे मिलेगा मैं करूँगी"। तो इस तरह से मन्ना दा नें, और फिर किशोर दा को जब पता चला कि सुलक्षणा इतनी टैलेण्टेड है, "इसको भी उसी तरह ईफ़ोर्ट आ रहे हैं जैसे मुझे आते थे, तो क्यों न इसको फ़िल्मों में काम कराया जाये!" उन्ही के साथ हेमन्त दा आये, उन्हीं का जो प्रोडक्शन है उसमें काम करो। अब दोनों में कहाँ हाँ कहाँ ना मुझे पता नहीं। तो अल्टिमेटली यही प्लान हुआ कि ना वो काम देंगे ना मैं काम करूँगी, और दोनों को अपनी अपनी जगह जैसे हैं वैसे ही रखेंगे।

दोस्तों, सुलक्षणा पंडित फिर अभिनेत्री कैसे बनीं, इसकी चर्चा हम फिर किसी दिन के लिए सुरक्षित रखते हुए आइए आपको सुनवाते हैं फ़िल्म 'गृहप्रवेश' का गीत और मज़ा लेते हैं सुलक्षणा जी की हँसी का भी।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्म 'गृह प्रवेश' में गुलज़ार साहब अतिथि कलाकार के रूप में पर्दे पर नज़र आये थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - फिल्म की दो नायिकाओं में से किस पर फिल्माया गया है ये गीत - २ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक कौन हैं - ३ अंक
सवाल ३ - गीतकार बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
ब्लोग्गर बाबा कुछ नाराज़ रहे तो हुआ ये कि पुराने सभी कमेंट्स गायब हो गए. लेकिन हमने उससे पहले उन अंकों को जोड़ लिया, अभी भी अनजाना और अमित जी के बीच ३ अंकों का फासला है देखते हैं किसके हाथ आएगी ये बाज़ी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, May 10, 2011

एक बात कहूँ गर मानो तुम.....हमेशा हँसते हंसाते रहिये इसी तरह

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 653/2011/93

गायक गायिकाओं की हँसी इन दिनों आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला 'गान और मुस्कान' के अंतर्गत। आज बारी लता मंगेशकर की हँसी सुनने की। कल का जो गीत था उसमें चुपके से सपने में आने की बात कही गई थी और आज जो गीत लेकर हम आये हैं, उसका भी भाव कुछ कुछ इसी तरह का है। नायिका शिकायत कर रही है कि नायक उनके सपनों में आते हैं जिस वजह से कभी वो नींद में उठकर चलती है तो कभी सोफ़े से गिर पड़ती है, तो कभी नायक का हाथ समझ कर सोफ़े का पाया ही पकड़ लेती है। जी हाँ, फ़िल्म 'गोलमाल' का यह गीत है "एक बात कहूँ गर मानो तुम, सपनों में न आना जानो तुम, मैं नींद में उठके चलती हूँ, जब देखती हूँ सच मानो तुम"। गुलज़ार और पंचम की जोड़ी का कमाल। वैसे इस गीत की तरफ़ लोगों का ध्यान ज़रा कम कम ही रहा है। 'गोलमाल' के नाम से लोग ज़्यादा "आने वाला पल जाने वाला है" को ही याद करते हैं। लेकिन गुणवत्ता में यह गीत भी कुछ कम नहीं है। इसमें गुलज़ार साहब नें बड़े ही सीधे बोलचाल जैसी भाषा का इस्तमाल करते हुए हास्य रस में डूबो डूबो कर गीत पेश किया है। जैसे कि एक अंतरे में नायिका गाती हैं "कल भी हुआ कि तुम गुज़रे थे पास से, थोड़े से अनमने, थोड़े उदास से, भागी थी मनाने नींद में लेकिन सोफ़े से गिर पड़ी..."। जिस गीत में भी कल्पना की बात आती है, ऐसे गीतों में गुलज़ार साहब को पूरी छूट मिल जाती है और वो पता नहीं अपनी सृजनशीलता को किस हद तक लेकर चले जाते हैं। रोमांटिक कॉमेडी का अनोखा उदाहरण है बिंदिया गोस्वामी पर फ़िल्माया यह गीत। इस गीत का सिचुएशन है कि अमोल पालेकर बिंदिया को गीत सिखाने आये हैं, और बिंदिया उन्हें यह गीत गा कर सुना रही है, और इस गीत में वो अपने पहले पहले प्यार के गुदगुदाने वाले अनुभवों का वर्णन भी कर रही है।

'गोलमाल' फ़िल्म तो पूर्णत: उत्पल दत्त, अमोल पालेकर और दीना पाठक की फ़िल्म थी, लेकिन नायिका के रूप में बिंदिया गोस्वामी नें भी अच्छी अदाकारी प्रस्तुत की थी। बिंदिया गोस्वामी का किरदार था उर्मिला का, जो एक मॉडर्ण लड़की है और जिसके पिता एक पुराने आदर्शों वाले इंसान भवानीशंकर (उत्पल दत्त) हैं। इस फ़िल्म के बारे में कुछ बताने की तो ज़रूरत ही नहीं, हिंदी सिनेमा के इस स्तंभ हास्य फ़िल्म को आप सभी नें देखा ही होगा, और एक बार नहीं बल्कि कई कई बार देखा होगा, और हर बार हँस हँस कर लोट पोट भी हो गये होंगे। आज के प्रस्तुत गीत को सुनते हुए भले ही आप हँस हँस कर लोट-पोट न हों, लेकिन लता जी की हँसी ही इस गीत का X-factor है जिसनें गीत को चार चांद लगा दी है। ऐसा हमने पहले भी कहा था, आज दोहरा रहे हैं कि लता जी की गाती हुई या बोलती हुई आवाज़ जितनी सुरीली है, उतना ही मनमोहक है उनकी हँसी। और उनकी इस ख़ासीयत को भी संगीतकारों नें एक्स्प्लॉएट करना नहीं भूले। कई गीतों में उनकी हँसी, उनकी मुस्कुराहट सुनाई दी है, और आज के गीत के अलावा भी आगे चलकर इसी शृंखला में लता जी की हँसी आप दो और गीतों में सुन सकते हैं। अभी हाल ही में एक फ़िल्म बनी है 'सतरंगी पैराशूट', जिसकी समीक्षा हम 'ताज़ा सुर ताल' में प्रस्तुत कर चुके हैं, इस फ़िल्म में लता जी नें न केवल आठ वर्षीय बच्चे का पार्श्वगायन किया है "तेरे हँसने से" गीत में, बल्कि इस गीत में जब वो "हँसने" शब्द को गाती हैं, तो उसमें उनकी हँसी भी सुनाई देती है। लता जी की इसी मधुर हँसी पर तो जैसे मर मिटने को जी चाहता है, और ईश्वर से यही प्रार्थना है कि लता जी के होठों पर मुस्कुराहट और हँसी सदा कायम रहे। आइए सुनें आज का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि बिंदिया गोस्वामी को सब से पहले हेमा मालिनी की माँ नें एक पार्टी में खोज निकाला था। उन्हें लगा कि बिंदिया की शक्ल हेमा से मिलती जुलती है और वो भी फ़िल्म जगत में नाम कमा सकती है। बिंदिया की पहली फ़िल्म थी 'जीवन ज्योति', जिसमें उनके नायक थे विजय अरोड़ा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 03/शृंखला 16
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - प्रेम धवन का लिखा है ये गीत.

सवाल १ - संगीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल २ - किस अभिनेता पर है ये गीत - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित अनजाना प्रतीक शरद (जी सबमें कोमन मानिये) सभी को बधाई. कोई चुपके से आके गीत को लेकर अमित जी ने कुछ संशय व्यक्त किये हैं, हम पता लगा रहे हैं पक्के सूत्रों से थोडा सा इन्तेज़ार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, April 20, 2011

कायदा कायदा आखिर फायदा.....कभी कभी कायदों को हटाकर भी जीने का मज़ा है समझा रहीं हैं रेखा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 639/2010/339

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! 'सितारों की सरगम' शृंखला में कल आपनें शत्रुघ्न सिंहा का गाया गीत सुना था ॠषीकेश मुखर्जी निर्देशित फ़िल्म 'नरम गरम' से, राहुल देव बर्मन का स्वरबद्ध किया और गुलज़ार साहब का लिखा। आज की कड़ी में भी जो गीत आप सुनने जा रहे हैं, उसे इसी टीम, यानी कि ॠषी दा, पंचम दा और गुलज़ार साहब, नें बनाया है। यह है १९८० की बेहद कामयाब फ़िल्म 'ख़ूबसूरत' से अभिनेत्री रेखा का गाया गीत "कायदा कायदा आख़िर फ़ायदा", जिसमें सपन चक्रवर्ती नें उनका साथ दिया है। युं तो गुलज़ार साहब बच्चों वाले गीत लिखने में और उनमें अजीब-ओ-गरीब उपमाएँ व रूपक देने में माहिर हैं, लेकिन इस गीत में तो उन्हें ऐसी खुली छूट व आज़ादी मिली कि वो तो अपनी कल्पना को पता नहीं किस हद तक लेके गये हैं। 'ख़ूबसूरत' के मुख्य कलाकार थे रेखा, दीना पाठक, अशोक कुमार, राकेश रोशन, शशिकला प्रमुख। कहानी तो आपको पता ही है, अगर आप में से किसी नें इस फ़िल्म को अब तक नहीं देखा है, तो हमारा सुझाव है कि आज ही इसे देखें। वाक़ई एक लाजवाब फ़िल्म है 'ख़ूबसूरत' और मुझे तो लगता है कि रेखा के श्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक है। और मज़ेदार बात यह है कि इस फ़िल्म में एक चुलबुली बबली लड़की का अभिनय करने के बाद अगले ही साल १९८१ में रेखा नें उमरावजान जैसा संजीदा किरदार निभाया था।

दोस्तों मुझे अब भी याद है, बचपन में दूरदर्शन में इस फ़िल्म को मैंने देखा था, फ़िल्म तो अच्छी लगी ही थी, लेकिन ख़ास कर इस गीत नें मेरे बाल मन में बड़ा असर किया था। यह बच्चों को एक स्वप्नलोक में ले जाने वाला गीत है, जिसे हम एक फ़ैण्टसी सॊंग् कह सकते हैं। यह गीत मेरे ख़याल से हर बच्चे के सपनों को साकार करता है। बर्फ़ से ढके पहाड़, जहाँ से आप चम्मच के ज़रिये एक स्कूप आइसक्रीम निकाल कर अपने मुंह में डाल सकते हैं। या फिर मान लीजिए कि पेड़ों पर फल फूल के बदले चाकलेट और टॊफ़ियाँ लटक रही हैं और आप अपना हाथ उपर करके या थोड़ा सा कूद कर और उन्हें तोड़ कर फट से मुंह में डाल सकते हैं! और अगर पानी के नलों से कोल्ड-ड्रिंक्स और कॊफ़ी निकले तो कैसा हो? कितना अच्छा होता न कि अगर जो जैसा है वो वैसा न होता। सारे नियम उलट जाते, सब कुछ नया नया हो जाता! बस यही है इस गीत का मकसद। "सारे नियम तोड़ दो, नियम से चलना छोड़ दो, इंनकिलाब ज़िंदाबाद"। अरे अरे अरे, यह मैं कौन से गीत का मुखड़ा लिख बैठा! दरअसल आज के प्रस्तुत गीत में और इस गीत में, जिसे आशा भोसले, उषा मंगेशकर और कल्याणी मित्रा नें गाया है, मुझे हमेशा से ही कन्फ़्युज़न होती रहा है। दोनों का विषय वस्तु एक जो है! तो आइए दोस्तों, सुनते हैं रेखा और सपन चक्रवर्ती की आवाज़ों में "कायदा कायदा आख़िर फ़ायदा"। और आप भी हमें सुझाइए कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की प्रस्तुति में हम किस तरह के बदलाव ला सकते हैं जिससे कि इसमें कुछ नयापन आये, क्योंकि फिर वही बात कि कायदा कायदा आख़िर फ़ायदा? आइए सुना जाये और मुस्कुराया जाये और एक बार फिर से एक बच्चा बना जाये!



क्या आप जानते हैं...
कि रेखा नें गायक शैलेन्द्र सिंह के साथ आवाज़ मिलाई थीं 'अगर तुम न होते' फ़िल्म के एक हास्य गीत में, जिसके बोल थे "कल तो सण्डे की छुट्टी है"।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 10/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - रीयल लाईफ के पति पत्नी हैं इस फिल्म के नायक नायिका.

सवाल १ - किस हास्य अभिनेता की आवाज़ में है ये गीत - १ अंक
सवाल २ - इन्होने एक पुरुष युगल गीत भी गाया था एक अन्य फिल्म में, कौन सी थी ये फिल्म - २ अंक
सवाल ३ - सवाल २ में पूछे गए युगल गीत में इनका साथ निभाया था विलेन और चरित्र भूमिकाओं में नज़र आने वाले एक और कलाकार ने, कौन हैं ये बूझिये ज़रा - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह अनजाना जी एक आगे निकल आये हैं, ये एक अंक निर्णायक हो सकता है. प्रतीक जी सही जवाब आपका भी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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