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बुधवार, 4 अप्रैल 2018

चित्रकथा - 62: हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-1)

अंक - 62

हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार (भाग-1)

"अंबर की एक पाक सुराही..." 




’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार! फ़िल्म जगत एक ऐसा उद्योग है जो पुरुष-प्रधान है। अभिनेत्रियों और पार्श्वगायिकाओं को कुछ देर के लिए अगर भूल जाएँ तो पायेंगे कि फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में ना के बराबर रही हैं। जहाँ तक फ़िल्मी गीतकारों और संगीतकारों का सवाल है, इन विधाओं में तो महिला कलाकारों की संख्या की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है। आज ’चित्रकथा’ में हम एक शोधालेख लेकर आए हैं जिसमें हम बातें करेंगे हिन्दी फ़िल्म जगत के महिला गीतकारों की, और उनके द्वारा लिखे गए यादगार गीतों की। आज का यह अंक समर्पित है महिला फ़िल्म गीतकारों को! 



गर यह पूछा जाए कि किस महिला गीतकार की रचनाएँ सबसे ज़्यादा फ़िल्मों में सुनाई दी हैं, तो
शायद इसका सही जवाब होगा मीराबाई। एक तरफ़ जहाँ यह एक सुन्दर और मन को शान्ति प्रदान करने वाली बात है, वहीं दूसरी ओर यह एक दुर्भाग्यजनक बात भी है कि जिस देश में मीराबाई जैसी कवयित्री हुईं हैं, उस देश में महिला गीतकारों की इतनी कमी है। हिन्दी सिने संगीत जगत की पहली महिला जिन्होंने गीतकारिता के लिए कलम उठाया था, वो हैं जद्दनबाई, जो फ़िल्म निर्माण के पहले दौर की एक गायिका, संगीतकार, अदाकारा और फ़िल्मकार रही हैं। 1892 में जन्मीं जद्दनबाई को भारतीय सिनेमा के अग्रदूतों में गिना जाता है। वो अभिनेत्री नरगिस की माँ थीं। 1935 की फ़िल्म ’तलाश-ए-हक़’ में संगीत देकर वो फ़िल्म जगत की पहली महिला संगीतकार बनीं। लेकिन इस फ़िल्म के गीतों के रिकॉर्ड के उपलब्ध ना होने की वजह से सरस्वती देवी को प्रथम महिला संगीतकार होने का गौरव मिला। इसके अगले ही साल 1936 में फ़िल्म ’मैडम फ़ैशन’ में एक गीत लिख कर जद्दनबाई बन गईं फ़िल्म जगत की प्रथम महिला गीतकार। गायक जुगल-किशोर की आवाज़ में जद्दनबाई की लिखी व स्वरबद्ध की हुई यह ग़ज़ल थी "यही आरज़ू थी दिल की कि क़रीब यार होता, और हज़ार जाँ से क़ुरबाँ मैं हज़ार बार होता"। इस फ़िल्म का निर्माण व निर्देशन भी उन्होंने ही किया था। इसके बाद उनकी कुछ और फ़िल्में आईं जैसे कि ’हृदय मंथन’, ’मोती का हार’ और ’जीवन स्वप्न’, लेकिन उनका लिखा कोई गीत इनमें नहीं था। 

सरोज मोहिनी नय्यर
1936 में जद्दनबाई के लिखे उस गीत के बाद एक लम्बे समय तक किसी महिला गीतकार की रचना सुनाई नहीं दी। 50 के दशक के शुरू शुरू में संगीतकार ओ.पी. नय्यर की धर्मपत्नी सरोज मोहिनी नय्यर ने एक गीत लिखा "प्रीतम आन मिलो" जो एक प्राइवेट गीत था। सी. एच. आत्मा की आवाज़ में ओ. पी. नय्यर द्वारा स्वरबद्ध यह गीत इतना कामयाब हुआ कि नय्यर साहब की गाड़ी चल पड़ी। लेकिन इस गीत की मक़बूलियत से सी. एच. आत्मा को जितनी प्रसिद्धी मिली, सरोज मोहिनी नय्यर और उनके पति ओ. पी. नय्यर को नहीं मिली। अपनी पत्नी के लिखे इस गीत को उसका हक़ दिलाने के लिए नय्यर साहब ने ’Mr. and Mrs. 55’ फ़िल्म में इस गीत को रखने का निश्चय किया। इस फ़िल्मी संस्करण को गीता दत्त ने गाया था। आगे चल कर इस गीत का एक पैरोडी संस्करण गुलज़ार ने अपनी फ़िल्म ’अंगूर’ में रखा जिसे सपन चक्रवर्ती ने गाया था। जानीमानी अभिनेत्री और माँ की भूमिका में सर्वाधिक चर्चित अभिनेत्री निरुपा रॉय ने भी अपने करियर में कम से कम एक गीत ज़रूर लिखा था। 
निरुपा रॉय
1958 की फ़िल्म ’सम्राट चन्द्रगुप्त’, जो संगीतकार कल्याणजी वीरजी शाह की शुरुआती फ़िल्मों में से थी, में एक गीत लिखा "मुझे देख चाँद शरमाए, घटा थम जाए..."। लता मंगेशकर ने इसे गाया था। फ़िल्म के बाकी गीत भरत व्यास, इंदीवर और हसरत जयपुरी ने लिखे। निरुपा रॉय ने इस फ़िल्म में नायिका के किरदार में थीं और इस तरह से संभव है कि उन्होंने कोई गीत लिखा हो और फ़िल्म के निर्माता/निर्देशक/संगीतकार को वह पसंद आ गया हो और फ़िल्म में रख लिया गया हो। 1969 में एक ’शतरंज’ नाम की फ़िल्म आई जिसमें शंकर जयकिशन का संगीत था। हसरत जयपुरी, इंदीवर और एस. एच. बिहारी जैसे नामी गीतकारों के साथ साथ एक गीत किरण कल्याणी का लिखा हुआ भी फ़िल्म में सुनाई दिया, और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह गीत ज़बरदस्त हिट हुआ। मोहम्मद रफ़ी, शारदा और महमूद की आवाज़ों में "बदकम्मा बदकम्मा..." अपने ज़माने का सुपरहिट गीत रहा है। किरण कल्याणी ने आगे चल कर भी जितना काम किया, शंकर जयकिशन के लिए ही किया। 1971 की फ़िल्म ’एक नारी एक ब्रह्मचारी’ में रफ़ी साहब की आवाज़ में उनका लिखा गीत था "चिराग़ किस के घर का है तू, लाल किस के घर का है, कमल है कौन ताल का, तू किस चमन का फूल है"। किशोर कुमार - शंकर जयकिशन - किरण कल्याणी का कॉम्बिनेशन अजीब-ओ-ग़रीब कॉम्बिनेशन सा प्रतीत होता है, लेकिन 1974 की फ़िल्म ’वचन’ में यह तिकड़ी एक साथ आकर एक मस्ती भरे गीत की रचना की थी "ऐ हबीबा ख़ुशनसीबा, यार के दिल के क़रीब आ..."। मध्य-एशियाई संगीत के अंदाज़ में रचा यह गीत एक आइटम गीत होने की वजह से और फ़िल्म के पिट जाने से इस गीत को सफलता नहीं मिली। किरण कल्याणी फिर इसके बाद किसी फ़िल्म में गीतकार के रूप में नज़र नहीं आईं। 

प्रभा ठाकुर
किरण कल्याणी की तरह एक और महिला गीतकार जिन्होंने शंकर जयकिशन के साथ काम किया, वो हैं प्रभा ठाकुर। प्रभा ठाकुर ना केवल एक गीतकार हैं बल्कि एक जानीमानी कवयित्री भी हैं और साथ ही गायिका के रूप में भी उन्होंने गीत गाए हैं। प्रभा ठाकुर ने फ़िल्मी गीत लेखन 1974 में शुरू की कल्याणजी-आनन्दजी के संगीतबद्ध फ़िल्म ’अलबेली’ से। सुमन कल्याणपुर और कंचन का गाया वह गीत है "तनिक तुम हमरी नजर पहचानो"। कम बजट की फ़िल्म, उस पर फ़्लॉप, कुल मिला कर गीत कहीं खो गया और प्रभा ठाकुर भी। इस फ़िल्म के तीन साल बाद 1977 में शंकर जयकिशन के संगीत में फ़िल्म ’दुनियादारी’ में उन्होंने एक गीत लिखा जिसे लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने गाया। "प्यार करने से पहले ज़रूरी है ये, मैं तुझे जान लूँ, तू मुझे जान ले" गीत सुनने में बहुत मामूली लगता है, लेकिन ध्यान से पूरा गीत सुनने पर अहसास होता है कि कितने सीधे सरल शब्दों में प्रभा जी ने पते की बात बतायी हैं इस गीत में। और इस गीत से ख़ुश होकर ही तो शंकर जयकिशन की अगली फ़िल्म ’आत्माराम’ में भी उनसे एक और गीत लिखवाया गया। 1979 की इस फ़िल्म में प्रभा ठाकुर का लिखा गीत किशोर कुमार ने गाया - "चलते चलते इन राहों पर ऐसा भी कुछ हो जाता है, कोई अनचाहा मिल जाता है और मनचाहा खो जाता है..."। उनके अब तक के लिखे गीतों में यह सबसे अर्थपूर्ण गीत रहा है। शंकर-जयकिशन की एक और फ़िल्म ’पापी पेट का सवाल है’ (1984) में प्रभा ठाकुर ने एक गीत लिखा और उसे अपनी आवाज़ भी दी। लोक शैली में निबद्ध और हास्य रस लिए जया प्रदा पर फ़िल्माया यह गीत है "मोसे चटणी पिसावे, कैसा बेदर्दी समझे ना मेरे जी की बात..."। यह वह दौर था जब जयकिशन के बिना शंकर अकेले ही संगीत दे रहे थे। फ़िल्मों और फ़िल्म-संगीत के बदलते मिज़ाज की गति के आगे वो क्रमश: पीछे होते चले जा रहे थे और उनकी फ़िल्मों का संगीत उन कम बजट की फ़िल्मों की असफलता की वजह से ठंडे बस्ते में घुसते चले जा रहे थे। इसी दौरान 1983 में प्रभा ठाकुर ने उस दौर में अपना अन्तिम फ़िल्मी गीत लिखा कल्याणजी-आनन्दजी के लिए, फ़िल्म थी ’घुंघरू’। आशा भोसले की आवाज़ में यह मुजरा गीत है "तुम सलामत रहो यह है मेरी दुआ, मेरे दामन में है भी क्या दुआ के सिवा..."। प्रभा ठाकुर के लिखे इन सारे गीतों को ध्यान दें तो पता चलता है कि उनका लिखा हर गीत उनके लिखे पहले गीत से अलग है। उन्होंने कभी अपने गीतों को एक ही निर्दिष्ट शैली में बांधने की कोशिशें नहीं की। करीब 22 सालों तक फ़िल्म-संगीत से दूर रहने के बाद वर्ष 2006 में प्रभा ठाकुर के लिखे तीन गीत सुनाई दिए उत्तम सिंह के संगीतबद्ध फ़िल्म ’कच्ची सड़क’ में। पहला गीत है उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "इक तुमसे बात पूछूँ, बुरा नहीं मानो, पर यह बात जानो..."; और दूसरा गीत है उदित नारायण और विनोद राठौड़ की आवाज़ों में "हंगामा हंगामा"। तीसरे गीत के रूप में अदनान सामी की गायी मज़हबी क़व्वाली "ख्वाजा मेरे ख्वाजा" इन तीनों में से श्रेष्ठ रचना मानी जाएगी।

अमृता प्रीतम 
पंजाबी की पहली प्रसिद्ध महिला उपन्यासकार, लेखिका, कवयित्री और गीतकार के रूप में जो नाम सबसे पहले ध्यान में आता है, वह है अमृता प्रीतम का। पंजाबी भाषा की बीसवीं सदी की इस सशक्त कवयित्री को सरहद के दोनों तरफ़ से भरपूर मोहब्बत मिली। छह दशकों के करिअर में अमृता प्रीतम ने सौ से भी अधिक किताबें लिखीं, जिनमें पंजाबी लोक गीतों का संग्रह और उनकी आत्मकथा भी शामिल है जिसे कई भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उनकी लिखी कविता ’अज्ज आखां वारिस शाह नु’ (Today I invoke Waris Shah – "Ode to Waris Shah") कालजयी बन गई है जिसमें 1947 के बटवारे के मंज़र का मार्मिक वर्णन मिलता है। एक उपन्यासकार के रूप में ’पिंजर’ उनकी लिखी सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास रही जो उन्होंने 1950 में प्रकाशित की थीं। इस उपन्यास में बटवारे के समय औरतों के साथ होने वाले अत्याचारों का वर्णन मिलता है। इसी उपन्यास पर 2003 में फ़िल्म बन चुकी है। इसकी चर्चा हम आगे करेंगे। बटवारे के बाद अमृता प्रीतम लाहौर से भारत आ गईं, लेकिन वो ता-उम्र पाक़िस्तान में ज़्यादा लोकप्रिय रहीं अपने समकालीन मोहन सिंह और शिव कुमार बटालवी की तुलना में। ’साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ’ज्ञानपीठ पुरस्कार’, ’पद्मश्री’, ’पद्मविभूशण’ और ’साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप’ जैसे उच्चस्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित अमृता प्रीतम की लेखनी कुछ एक बार फ़िल्मों में भी सुनाई दी गीतों के रूप में। पहली बार उनका लिखा गीत आया 1975 की फ़िल्म ’डाकू’ में। बासु भट्टाचार्य निर्देशित इस फ़िल्म में संगीत था श्यामजी-घन्श्यामजी का। फ़िल्म के गीतों के लिए हसरत जयपुरी, चमन लाहोरी, रमेश्वर त्यागी, साजन दहल्वी और अमृता प्रीतम को चुना गया। अमृता प्रीतम के लिखे पहले गीत को गाया लता मंगेशकर ने - "तू आज अपने हाथ से कुछ बिगडई संवार दे, ऐ ख़ुदा मेरे जिस्म से मेरा साया उतार दे"। बच्चे के जन्म के बाद माँ के दिल की पुकार है इस गीत के शब्द। और गीत को सुन कर अहसास हो जाता है कि एक बहुत अच्छा लेखक ही ऐसा गीत लिख सकता/सकती हैं। इस फ़िल्म में अमृता प्रीतम का लिखा एक और गीत था रफ़ी साहब की आवाज़ में - "ये दुनिया थी दिल की जो हमने बसाई, ये दुनिया है दिल की जो हमने लुटाई..."। 1976 में एक फ़िल्म आई थी ’कादम्बरी’ जिसमें उस्ताद विलायत ख़ाँ का संगीत था। इसमें अमृता प्रीतम का लिखा आशा भोसले का गाया गीत "अंबर की एक पाक सुराही बादल का एक जाम उठा कर..." एक कालजयी रचना है। इस तरह की काव्यात्मक रचना हिन्दी फ़िल्मों में बहुत कम ही सुना दी है। इन दो फ़िल्मों के बाद अमृता प्रीतम ने फिर किसी हिन्दी फ़िल्म के लिए गीत नहीं लिखे। 2003 में जब उनकी उपन्यास ’पिंजर’ पर फ़िल्म बनी तो इसमें उनका लिखा एक गीत रखा गया "चरखा चलाती माँ, धागा बनाती माँ, बुनती है सपनों की केसरी..."। उत्तम सिंह के संगीत में इसे गाया प्रीति उत्तम ने। यह एक बेहद मार्मिक लोरी है जिसका एक एक शब्द सीधे कलेजे को चीर के रख देती है। अमृता प्रीतम की ही लिखी मशहूर कविता "अज्ज आखां वारिश शाह नु" को भी इस फ़िल्म में शामिल किया गया जिसे वडाली ब्रदर्स और प्रीति उत्तम ने गाया। "वारिस शाह, बजा अखा वाले शाह नू कितो करा विचो बोले, आज अखा वाले शाह नु वाह दिसाऊ, कित्तो कब्रा विचो बोले, थी आज किताबे इश्क़ दा कोई अगला वर्ग फूल..."। 

फ़िल्म ’कादम्बरी’ में अमृता प्रीतम के अलावा एक और महिला गीतकार का लिखा गीत शामिल था। ये हैं गीतांजलि सिंह। संगीतकार अजीत सिंह के संगीत में पत्नी गीतांजलि ने यह गीत लिखा जिसे अजीत सिंह ने ही गाया। "क्यों हम तुम रहें अकेले, क्यों ना बाहों में बाहें ले ले, देखो ज़िंदगी के मेले..."। यह एक नशे से भरा क्लब सॉंग् है, अमृता प्रीतम के लिखे "अंबर की एक पाक सुराही" से बिल्कुल विपरीत। अजीत सिंह ने इसके बाद कई फ़िल्मों में संगीत दिया है, लेकिन गीतांजलि सिंह के लिखे गीत इसके बाद सिर्फ़ एक ही फ़िल्म में सुनाई दी, और वह फ़िल्म है 1999 की ’होश’। दरसल फ़िल्म ’होश’ में दो गीतकार थे, दोनों महिलाएँ - एक तो गीतांजलि सिंह थीं ही, दूसरी थीं आशा रानी। संगीतकार अजीत सिंह के संगीत में इन दो गीतकारों ने मिला-जुला कर कुल आठ गीत लिखे जिन्हें अजीत सिंह और तान्या सिंह ने गाए। तान्या सिंह अजीत सिंह की बेटी हैं। गीतकार आशा रानी ने भी अजीत सिंह के संगीत में एक और फ़िल्म में गाने लिखीं। यह फ़िल्म है 1989 की ’पुरानी हवेली’। अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में "कैसे मैं भुलाऊँ तेरा प्यार", सुरेश वाडकर की आवाज़ में "आता है मुझको याद तेरा प्यार" और "संगमर्मर सा था उसका बदन" आशा रानी की लिखी रचनाएँ हैं इस फ़िल्म की। 

महिला संगीतकारों में एक नाम शारदा राजन का रहा है। उनके द्वारा संगीतबद्ध 1976 की फ़िल्म ’ज़माने से पूछो’ में एक गीत शबनम करवारी का लिखा हुआ था। रफ़ी साहब की आवाज़ में यह गीत है "कहीं चमन खिला दिया, कहीं धुंआ उड़ा दिया, दिल में जो आय अपने किया पाप किया या पुण्य किया, हमसे ना पूछो, ज़माने से पूछो..."। इस तरह से फ़िल्म के शीर्षक गीत के गीतकार के रूप में शुरु हुई थी पारी महिला गीतकार शबनम करवारी की। 1979 में एक फ़िल्म बनी थी ’अरब का सोना: अबु कालिया’। जतिन-श्याम के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म के गीत ऐश कंवल और शबनम ने लिखे थे। फ़िल्म के गीतों में आवाज़ें थीं मोहम्मद रफ़ी, दिलराज कौर और नितिन मुकेश की। शबनम करवारी का लिखा और नितिन मुकेश का गाया एक गीत है "नेकी और बदी सब की एक दिन तोली जाएगी, पाप और पुण्य के पुस्तक सबकी एक दिन खोली जाएगी..."। इस सुंदर दार्शनिक गीत की ही तरह न जाने कितने गीत लोगों तक पहुँचने से वंचित रह गए होंगे सिर्फ़ इस वजह से कि ये फ़िल्में या तो सही तरीके से बन नहीं सकीं या फिर इन्हें प्रोमोट करने के लिए अर्थ का अभाव था।

यहाँ आकर पूरी होती है ’हिन्दी फ़िल्मों के महिला गीतकार’ का पहला भाग जिसमें हमने बातें की जद्दन बाई, सरोज मोहिनी नय्यर, निरुपा रॉय, किरण कल्याणी, प्रभा ठाकुर, अमृता प्रीतम, गीतांजलि सिंह, आशा रानी और शबनम करवारी की। इस लेख के दूसरे भाग में हम कुछ और महिला गीतकारों और उनके लिखे गीतों की जानकारी लेकर उपस्थित होंगे। तब तक के लिए अपने दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार!

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 14 नवंबर 2010

अम्बर की एक पाक सुराही....अमृता प्रीतम की कलम का जादू और आशा के स्वरों की खुशबू

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 526/2010/226

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज रविवार की शाम, यानी कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई सप्ताह का शुभारंभ। पिछले हफ़्ते हमने शुरु की थी लघु शृंखला 'दिल की कलम से', जिसके तहत हिंदी साहित्यकारों द्वारा लिखे फ़िल्मी गीत हम आपको सुनवा रहे हैं। अब तक हमने इस शृंखला में जिन साहित्यकारों को शामिल किया है, वो हैं पंडित नरेन्द्र शर्मा, वीरेन्द्र मिश्र, गोपालसिंह नेपाली, बालकवि बैरागी, और गोपालदास नीरज। आज हम जिस साहित्यकार की बात करने जा रहे हैं, वो हैं मशहूर लेखिका व कवयित्री अमृता प्रीतम। मानव मन की जो अभिव्यक्ति होती है, उन्हें वर्णन करना बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन अमृता प्रीतम द्वारा लिखे साहित्य को अगर हम ध्यान से पढ़ें तो पायेंगे कि किस सहजता से उन्होंने बड़ी से बड़ी बात कह डाली है, जिन्हें हम केवल महसूस ही कर सकते हैं। उनकी लेखनी तो जैसे फूल पर ठहरी हुई ओस की बूंदें हैं। ३१ अगस्त १९१९ को जन्मीं अमृता प्रीतम पंजाब की पहली मशहूर कवयित्री और लेखिका हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वो पहली महिला हैं और राष्ट्रपति से पद्मश्री प्राप्त करने वालीं प्रथम पंजाबी लेखिका। युं तो उन्होंने पंजाबी में ही अधिकतर लिखा है, पर हिंदी साहित्य में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई हैं। १९३५ में अमृता कौर ने प्रीतम सिंह से विवाह किया, जो लाहोर के विख्यात अनारकली बाज़ार के एक नामी व्यापारी थे। १९६० में अमृता प्रीतम अपने पति को छोड़ कर साहिर लुधियानवी के पास चली गईं। उनकी साहिर के साथ इस प्रेम कहानी को उन्होंने अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में व्यक्त की हैं। जब साहिर साहब की ज़िंदगी में एक दूसरी औरत ने प्रवेश कर लिया, तब अमृता साहिर को छोड़ नामचीन आर्टिस्ट और लेखक इमरोज़ के पास चली गईं। अपनी ज़िंदगी के आख़िरी ४० साल वो इमरोज़ के साथ गुज़ारीं, जिन्होंने अमृता के ज़्यादातर किताबों के कवर डिज़ाइन किए। अमृता प्रीतम और इमरोज़ का युगल-जीवन एक किताब का विषय भी बना, अमृता इमरोज़: ए लव स्टोरी। अमृता प्रीतम ३१ अक्तुबर २००५ को एक लम्बी बीमारी के बाद इस दुनिया से चल बसीं।

हिंदी फ़िल्म 'कादम्बरी' में अमृता प्रीतम ने एक गीत लिखा था, "अम्बर की एक पाक सुराही, बादल का एक जाम उठाकर"। कहते हैं सौ सुन्हार की, और एक लुहार की, यही बात हम अमृता प्रीतम के लिए भी कह सकते हैं। बस उनका लिखा यह एक गीत दूसरे गीतकारों के लिखे कई कई गीतों पर साफ़ साफ़ भारी पड़ता है। आज हम इसी ख़ूबसूरत गीत को सुनेंगे, और बार बार सुनेंगे। 'कादम्बरी' १९७६ की एक समानांतर फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था मधुसुदन कुमार ने और निर्देशक थे एच. के. वर्मा। फ़िल्म में शबाना आज़्मी, विजय अरोड़ा, चांद उस्मानी, जीत उपेन्द्र, अपर्णा चौधरी प्रमुख ने अभिनय किया था। फ़िल्म में संगीत दिया था शास्त्रीय संगीत की मशहूर हस्ती उस्ताद विलायत ख़ान ने। इस फ़िल्म में आशा भोसले के अलावा अजीत सिंह ने भी गीत गाए हैं। 'कादम्बरी' तो व्यावसायिक दृष्टि से चली नहीं, लेकिन आज इस गीत की वजह से इस फ़िल्म का नाम लोगों के ज़हन में बाक़ी है। दोस्तों, जो गीत मुझे बेहद बेहद पसंद होते हैं, उनके बोलों को टंकित करने में मुझे अलग ही आनंद आता है। ऐसा करते हुए मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं उस गीत को एक अलग ही अंदाज़ में जी रहा हूँ। लीजिए इस गीत के बोल ये लिख रहा हूँ -

अम्बर की एक पाक़ सुराही,
बादल का एक जाम उठाकर,
घूंट चांदनी पी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

कैसे इसका कर्ज़ चुकाएँ,
माँग के अपनी मौत के हाथों,
उमर की सूली सी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

अपना इसमें कुछ भी नहीं है,
दो दिल जलते उसकी अमानत,
उसको वही तो दी है हमने,
बात कुफ़्र की की है हमने।

आशा भोसले ने क्या ख़ूब गाया है इस गीत को। इस आलेख को लिखते हुए जब मैं यह गीत सुन रहा हूँ तो आलेख के ख़त्म होने तक ध्यान आया कि इस गीत को मैं पिछले २० मिनट में ६ बार सुन चुका हूँ, फिर भी दिल नही भर रहा। आख़िर क्या ख़ास बात है इस गीत में? मुझे तो समझ नहीं आया। अगर आप बता सकें तो बताइएगा ज़रूर...



क्या आप जानते हैं...
कि उस्ताद विलायत ख़ान ने १९५१ की फ़िल्म 'मदहोश' का बैकग्राउण्ड म्युज़िक तैयार किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०७ /शृंखला ०३
ये है गीत का आरंभिक शेर-


अतिरिक्त सूत्र - रफ़ी साहब की आवाज़ है गीत में

सवाल १ - गीतकार कवि कौन है यहाँ - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
श्यामकान्त जी, अमित जी और बिट्टू जी आप तीनों को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

बुधवार, 23 जून 2010

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने.. दिल पर पत्थर रखकर खुद को तोड़ रहे हैं साहिर और तलत

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८९

"सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं?" - मुमकिन है कि आपने यह पंक्ति पढी या सुनी ना हो, लेकिन इस पंक्ति के इर्द-गिर्द जो नज़्म बुनी गई थी, उससे नावाकिफ़ होने का तो कोई प्रश्न हीं नहीं उठता। यह वही नज़्म है, जिसने लोगों को गुरूदत्त की अदायगी के दर्शन करवाएँ, जिसने बर्मन दा के संगीत को अमर कर दिया, जिसने एक शायर की मजबूरियों का हवाला देकर लोगों की आँखों में आँसू तक उतरवा दिए और जिसने बड़े हीं सीधे-सपाट शब्दों में "चकला-घरों" की हक़ीकत बयान कर मुल्क की सच्चाई पर पड़े लाखों पर्दों को नेस्तनाबूत कर दिया... अभी तक अगर आपको इस नज़्म की याद न आई हो तो जरा इस पंक्ति पर गौर फरमा लें- "जिसे नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?" पूरी की पूरी नज़्म वही है, बस एक पंक्ति बदली गई है और वो भी इसलिए क्योंकि फिल्म और साहित्य में थोड़ा फर्क होता है.. फिल्म में हमें अपनी बात खुलकर रखनी होती है। जहाँ तक मतलब का सवाल है तो "सना-ख़्वाने..." में पूरे पूरब का जिक्र है, वहीं "जिसे नाज़ है..." में अपने "हिन्दुस्तान" का बस। लेकिन इससे लफ़्ज़ों में छुपा दर्द घट नहीं जाता.... और इस दर्द को उकेरने वाला शायर तब भी घावों की उतनी हीं गहरी कालकोठरी में जब्त रहता है। इस शायर के बारे में और क्या कहना जबकि इसने खुद कहा है कि "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?" ... जिसे दुनिया का मोह नहीं ,उससे ज़ीस्त और मौत के सवाल-जवाब करने से क्या लाभ! इस शायर को तो अपने होने का भी कोई दंभ, कोई घमंड, कोई अना नहीं है.. वो तो सरे-आम कहता है "मैं पल-दो पल का शायर हूँ..... मुझसे पहले कितने शायर आए और आ कर चले गए....

कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले,
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले ।
कल कोई मुझ को याद करे, क्यों कोई मुझ को याद करे
मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बरबाद करे ॥


इस शायर से मेरा लगाव क्या है, यह मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मुझे लिखने का शौक़ है और आज-कल थोड़े गाने भी लिख लेता हूँ... गाना लिखने वालों के बारे में लोग यही ख्याल पालते हैं (लोग क्या... खुद गीतकार भी यही मानते हैं) कि गानों में मतलब का कुछ लिखने के लिए ज्यादा स्कोप, ज्यादा मौके नहीं होते.. लेकिन जब भी मैं इन शायर को पढता हूँ तो मुझे ये सारे ख्याल बस बहाने हीं लगते हैं... लगता है कि कोई अपनी लेखनी से बोझ हटाने के लिए दूसरों के सर पर झूठ का पुलिंदा डाल रहा है। अब अगर कोई शायर अपने गाने में यह तक लिख दे कि

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी


और लोग उसके कहे हरेक लफ़्ज़ को तहे-दिल से स्वीकार कर लें तो इससे यह साबित हो जाता है कि मतलब का लिखने के लिए मौकों की जरूरत नहीं होती बल्कि यह कहिए कि बेमतलब लिखने के लिए मौके निकालने होते हैं। यह शायर मौके नहीं ढूँढता, बल्कि आपको मौके देता है अपनी अलसाई-सी दुनिया में ताकने का.. उसे निखरने का, उसे निखारने का। आप पशेमान होते हो तो आपसे कहता है

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले


ना मुंह छिपा के जियो और ना सर झुका के जियो
गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो ।


फिर आप संभल जाते हो... लेकिन अगले हीं पल आप इस बात का रोना रोते हो कि आपको वह प्यार नहीं मिला जिसके आप हक़दार थे। यह आपको समझाता है, आप फिर भी नहीं समझते तो ये आपके हीं सुर में सुर मिला लेता है ताकि आपके ग़मों को मलहम मिल सके

जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला ?
हमने तो जब कलियाँ मांगीं, काँटों का हार मिला ॥


आपको प्यार हासिल होता है, लेकिन आप "बेवफ़ाईयो" का शिकार हो जाते हैं। आपको उदासियों के गर्त्त में धँसता देख यह आपको ज़िंदगी के पाठ पढा जाता है:

तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।
वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥


इतना सब करने के बावजूद यह आपसे अपना हक़ नहीं माँगता.. यह नहीं कहता कि मैंने तुम्हें अपनी शायरी के हज़ार शेर दिए, तुम्हें तुम्हारी ज़िंदगी के लाखों लम्हें नसीब कराए... यह तो उल्टे सारा श्रेय आपको हीं दे डालता है:

दुनिया ने तजुर्बातो हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं


यह शायर, जिसके एक-एक हर्फ़ में तसव्वुरात की परछाईयाँ उभरती हैं.. अपने चाहने वालों के बीच "साहिर" के नाम से जाना जाता है। इनके बारे में और कुछ जानने के लिए चलिए हम "विकिपीडिया" और "प्रकाश पंडित" के दरवाजे खटखटाते हैं।

साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हयी साहिर है। उनका जन्म ८ मार्च १९२१ में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। माता के अतिरिक्त उनके पिता की कई पत्नियाँ और भी थीं। किन्तु एकमात्र सन्तान होने के कारण उसका पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार में हुआ। मगर अभी वे बच्चा हीं थे कि पति की ऐय्याशियों से तंग आकर उनकी माता पति से अलग हो गई और चूँकि ‘साहिर’ ने कचहरी में पिता पर माता को प्रधानता दी थी, इसलिए उनके बाद पिता से और उसकी जागीर से उनका कोई सम्बन्ध न रहा और उन्हें गरीबी में गुजर करना पड़ा। साहिर की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। सन् १९३९ में जब वे गव्हर्नमेंट कालेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा । कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए ख्यात हो गए थे और अमृता उनकी प्रशंसक । लेकिन अमृता के घरवालों को ये रास नहीं आया क्योंकि एक तो साहिर मुस्लिम थे और दूसरे गरीब । बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया।

सन् १९४३ में साहिर लाहौर आ गये और उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली कविता संग्रह ’तल्खियाँ’ छपवायी। सन् १९४५ में वे प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार (लाहौर) के सम्पादक बने। बाद में वे द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी सम्पादक बने और इस पत्रिका में उनकी किसी रचना को सरकार के विरुद्ध समझे जाने के कारण पाकिस्तान सरकार ने उनके खिलाफ वारण्ट जारी कर दिया। १९४९ में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहकर वे बंबई आ गये जहाँ पर व उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के सम्पादक बने। फिल्म आजादी की राह पर (१९४९) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म नौजवान, जिसके संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे, के लिये लिखे गीतों से मिली।

शायर की हैसियत से ‘साहिर’ ने उस समय आँख खोली जब ‘इक़बाल’ और ‘जोश’ के बाद ‘फ़िराक़’, ‘फ़ैज़’, ‘मज़ाज़’ आदि के नग़्मों से न केवल लोग परिचित हो चुके थे बल्कि शायरी के मैदान में उनकी तूती बोलती थी। कोई भी नया शायर अपने इन सिद्धहस्त समकालीनों से प्रभावित हुए बिना न रह सकता था। अतएव ‘साहिर’ पर भी ‘मजाज़’ और ’फ़ैंज़’ का ख़ासा प्रभाव पड़ा। लेकिन उनका व्यक्तिगत अनुभव जो कि उनके पिता और उनकी प्रेमिका के पिता के प्रति घृणा और विद्रोह की भावनाओं से ओत-प्रोत था, उनके लिए कामगर साबित हुआ। लोगों ने देखा कि फ़ैज़’ या ‘मजाज़’ का अनुकरण करने के बजाय ‘साहिर’ की रचनाओं पर उसके व्यक्तिगत अनुभवों की छाप है और उसका अपना एक अलग रंग भी है।

‘साहिर’ मौलिक रूप से रोमाण्टिक शायर है। प्रेम की असफलता ने उसके दिलो-दिमाग़ पर इतनी कड़ी चोट लगाई कि जीवन की अन्य चिन्ताएँ पीछे जा पड़ी। बस एक प्रेम की बात हो तो कोई सह भी ले, लेकिन उन्हें तो जीवन में दो प्रेम असफलता मिली - पहला कॉलेज के दिनों में अमृता प्रीतम के साथ और दूसरी सुधा मल्होत्रा से। वे आजीवन अविवाहित रहे तथा उनसठ वर्ष की उम्र में २५ अक्टूबर १९८० को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया ।

’साहिर’ की ग़ज़लें बहुत कुछ ऐसा कह जाती हैं, जिसे आप अपनी आँखों में रोककर रखे होते हैं.. न चाहते हुए भी, मन मसोसकर आप उन जज्बातों को पीते रहते हैं। आपको बस एक ऐसे आधार की जरूरत होती है, जहाँ आप अपने मनोभावों को टिका सकें। यकीन मानिए.. बस इसी कारण से, बस यही उद्देश्य लेकर हम आज की गज़ल के साथ हाज़िर हुए हैं। ’साहिर’ के लफ़्ज़ और क्या करने में सक्षम हैं, यह तो आपको गज़ल सुनने के बाद हीं मालूम पड़ेगा.... सोने पे सुहागा यह है कि आपके अंदर घर कर बैठी कड़वाहटों को मिटाने के लिए "तलत महमूद" साहब की आवाज़ की "मिश्री" भी मौजूद है। तो देर किस बात की... पेश-ए-खिदमत है आज की गज़ल:

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ये दिल में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने

तुझे अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ घड़ियाँ तेरे ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैंने

बस अब तो मेरा _____ छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिये मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सितम" और शेर कुछ यूँ था-

भूल जाता हूँ मैं सितम उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है

पिछली महफ़िल की शान बने "नीरज रोहिल्ला" जी। एक-एक करके महफ़िल में और भी कई सारे मेहमान (मेरे हिसाब से तो आप स्ब घर के हीं है.. मेहमान कहकर मैं महफ़िल की रस्म-अदायगी कर रहा हूँ..बस) शामिल हुए। जहाँ शन्नो जी ने हमारी गलती सुधारी वहीं सुमित जी हर बार की तरह बाद में आऊँगा कहकर निकल लिए। जहाँ सीमा जी ने पहली मर्तबा अपने शेरों के अलावा कुछ शब्द कहे (भले हीं उन शेरों का मतलब बताने के लिए उन्हें अतिरिक्त शब्द महफ़िल पर डालने पड़े, लेकिन उनकी तरफ़ से कुछ अलग पढकर सुखद आश्चर्य हुआ :) ) ,वहीं अवनींद्र जी के शेर अबाध गति से दौड़ते रहें। मंजु जी और नीलम जी ने महफ़िल के अंतिम दो शेर कहे... इन दोनों में एक समानता यह थी कि जहाँ मंजु जी अपनी हीं धुन में मग्न थीं तो वहीं नीलम जी शन्नो जी की धुन में।

इस तरह से एक सप्ताह तक हमारी महफ़िल रंग-बिरंगे लोगों से सजती-संवरती रही। इस दरम्यान ये सारे शेर पेश किए गए:

दुनिया के सितम याद ना अपनी हि वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद । (जिगर मुरादाबादी)

तकदीर के सितम सहते जिन्दगी गुजर जाती है
ना हम उसे रास आते हैं ना वो हमें रास आती है. (शन्नो जी)

तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश, जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़, तो सितम क्या है? (ग़ालिब)

भरम तेरे सितम का खुल चुका है
मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ (फ़िराक़ गोरखपुरी)

कितनी शिद्दत से ढाये थे सितम उसने
अब मैं रोया तो ये इश्क मैं रुसवाई है (अवनींद्र जी)

फूल से दिल पे उसका ये सितम देखो
तोड़ के अपनी किताबों मैं सजाया उसने (अवनींद्र जी)

शफा देता है ज़ख्मो को तुम्हारा मरहमी लहजा ,
मगर दिल को सताते हैं वो सितम भी तुम्हारे हैं (अवनींद्र जी)

जिंदगी को याद आ रहे तेरे सितम ,
धड़कने भुलाने की दे रही हैं कसम . (मंजु जी)

सितम ये है कि उनके ग़म नहीं,
ग़म ये है कि उनके हम नहीं (नीलम जी)

और अब एक महत्वपूर्ण सूचना:

हम टिप्पणियों पे नियंत्रण (टिप्पणियों का "मोडरेशन") नहीं करना चाहते, इसलिए हम आपसे अपील करते हैं कि महफ़िल-ए-ग़ज़ल पर शायराना माहौल बनाए रखने में हमारी मदद करें। दर-असल कुछ कड़ियों से महफ़िल पे ऐसी भी टिप्पणियाँ आ रही हैं, जिनका इस आलेख से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें पढकर लगता है कि लिखने वाले ने बिना ग़ज़ल सुने, बिना आलेख पढे हीं अपनी बातें कह दी हैं। हमारे कुछ मित्रों ने महफ़िल की इस बिगड़ी स्थिति पर आपत्ति व्यक्त की है। इसलिए हम आप सबसे यह दरख्वास्त करते हैं कि अपनी टिप्पणियों को यथा-संभव इस आलेख/गज़ल/शायर/संगीतकार/गुलूकार/शेर तक हीं सीमित रखें। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप टिप्पणी देना या फिर महफ़िल में आना हीं बंद कर दें.. तब तो दूसरे मित्र आराम से जान जाएँगे कि हम किनकी बात कर रहे थे :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

रविवार, 7 मार्च 2010

ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है, पर तेरे साथ....एक चित्रकार, एक कवि और इन सबसे भी बढ़कर मोहब्बत की जीती जागती मिसाल है इमरोज़ - एक खास मुलाकात

दोस्तों, कभी कभी कुछ विशेष व्यक्तियों से मिलना, बात करना जीवन भर याद रह जाने वाला एक अनुभव बन रह जाता है, अपना एक ऐसा ही अनुभव आज हम सब के साथ बांटने जा रही हैं, रश्मि प्रभा जी, तो बिना कुछ अधिक कहे हम रश्मि जी और उनके खास मेहमान को सौंपते हैं आपकी आँखों को, हमें यकीन है कि ये गुफ्तगू आपके लिए भी उतनी यादगार होने वाली है जितनी रेशमी जी के लिए थी...

आज मैं रश्मि प्रभा आपकी मुलाकात प्यार के जाने-माने स्तम्भ इमरोज़ से करवाने जा रही हूँ...
प्यार कभी दर्द, कभी ख़ुशी, कभी दूर, कभी पास के एहसास से गुजरता है. हर प्यार करनेवालों का यही रहा अफसाना.
पर इन अफसानों से अलग एक प्यार- जहाँ कोई गम, कोई दूरी नहीं हुई, कोई इर्ष्या नहीं उठी, बस एक विश्वास की लौ रोशन रही ...विश्वास - जिसका नाम है इमरोज़ !

अमृता के इमरोज़ या इमरोज़ की अमृता - जैसे भी कह लें, एक ही अर्थ है.

तो मिलाती हूँ आप सबों को इमरोज़ से.

“नमस्कार इमरोज़ जी,..........शुरू करें हम अपनी बातें ख़ास?..........शुरू करती हूँ बातें उम्र के उस मोड़ से जहाँ आप एक युवक थे...वहाँ चढ़ते सूरज सी महत्वाकांक्षाएं होंगी...”
कूची और कैनवास से आपकी मुलाकात कब हुई ?


इमरोज़ - बचपन मैंने पंछियों के साथ
तितलियों के साथ उड़कर देखा था
पर ख्यालों के साथ में
स्कूल में ड्राइंग कहीं भी नहीं थी
न प्राइमरी स्कूल में न हाई स्कूल में
पर मेरे हाथों में ड्राइंग थी
अपने आप आई हुई

मैं स्कूल की हर कॉपी पर
कुछ न कुछ बनाता रहता था
ब्रश के साथ मेरी मुलाकात
लाहौर के आर्ट स्कूल में हुई थी
आर्ट स्कूल में वाटर कलर के रंगों से
मैं तीन साल खूब खेला था
वो खेल अब भी जारी है...

कैनवस के साथ मेरी मुलाकात
ज़िन्दगी के स्कूल में हुई आर्टिस्ट होकर
जब रंगों से दोस्ती हुई अमृता से भी दोस्ती हो गई
कैनवस पर पहली पेंटिंग
मैंने अमृता के लिए ही बनाई थी.........

ख़्वाबों की लकीरों से परे अमृता कब कैनवस पर उतरीं ?

इमरोज़ - अमृता मेरे ख़्वाबों में नहीं आई
सीधी ज़िन्दगी में आ गई
वो बात और है
कि वो ख्वाब जैसी ज़िन्दगी है
उससे मिलकर मैं ज़िन्दगी को भी मिलता रहा
और साथ अपने आपको भी मिलता रहा
साथ मिलकर चलते चलते
अपने आप ज़िन्दगी राह भी होती रही
और मंजिल भी
एक दिन चलते चलते उसने पूछा
तेरा क्या ख्याल है
ज़िन्दगी सच है कि सपना
मैंने उसकी बोलती आँखों को देखकर कहा
ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है
पर तेरे साथ .....

उसके आने पर
मुझे लिखना आया
और उसको देख देख लिखा ...

तू अक्षर अक्षर कविता
और कविता कविता ज़िन्दगी ....
कभी कभी खूबसूरत ख्याल
खूबसूरत बदन भी धर लेते हैं ....

अमृता नज़्म बनकर आईं या ज़िन्दगी ?

इमरोज़ - अमृता ज़िन्दगी बनकर आई
और कविता बनकर मिली
एक खूबसूरत माहौल बनाकर
सुबह शाम करती रही
रसोई करती तो वो भी मज़े से करती
वो ज़िन्दगी के सपने देखती
और सपने उसकी नज्में लिखते .....

कैसा लगता है इमरोज़ जी जब आपको प्यार का स्तम्भ कहा जाता है ?

इमरोज़ - जिन्होंने ये कहा है मेरे बारे में
उन सब मेहरबान लोगों का
बहुत-बहुत शुक्रिया

आज की भागती ज़िन्दगी में आप क्या सोचते हैं? क्या महसूस करते हैं?

इमरोज़ - सुकून उसमें है जो आपके पास है
और जो मिला हुआ है
वो ज़िन्दगी का सुकून बन जाता है
पर जो भाग रहे हैं
वे बहुत कुछ चाहते हैं
बहुत कुछ
चाहत की दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती
ये ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है
खाना सेहत बनाता है
पर ज़रूरत से ज्यादा खाना
ज़हर भी बन जाता है

आपकी चित्रकला का मुख्य केंद्र अमृता प्रीतम के अलावा और क्या रहा ?

इमरोज़ - मैं रंगों से खेलता हूँ
और रंग मुझसे
रंगों से खेलते खेलते
मैं भी रंग हो जाता हूँ
कुछ बनने ना बनने से
बेफिक्र बेपरवाह
कभी कभी खेलते खेलते
कुछ अच्छा भी बन जाता है
वो ही अच्छा मेरी पेंटिंग बन जाती है
मैं अपने लिए अपने आपको
पेंट करता हूँ

लोगों को सोचकर
मैंने कभी कुछ नहीं बनाया
लोगों को सोचकर कभी भी पेंटिंग नहीं हो पाती

एक प्रेमी से अलग आपकी क्या सोच रही?

इमरोज़ - मेरी सोच....
किताबें पढ़ने से लिखना पढना आ जाता है
और ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
प्यार होने से प्यार का पता लगता है

सिंगलिंग्रों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है. सिंगलिंग्रों की लड़की जवान होकर जिसके साथ जी चाहें चल-फिर सकती हैं, दोस्ती कर सकती हैं और जब वो अपना मर्द चुन लेती हैं. एक दावत करती हैं, अपना मर्द चुनने की ख़ुशी में. अपने सारे दोस्तों को बुलाती हैं और सबसे कहती हैं कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई और उसका मनचाहा सबसे हाथ मिलाता है, फिर सब जश्न मानते हैं.

कुछ दिनों से ये दावत और ये जीने की दलेरी ये साफगोई मुझे बार बार याद आ रही है.
मेरे एक दोस्त को उम्र के आख़री पहर में मोहब्बत हो गई. एक सयानी उम्र की खूबसूरत औरत से, जो खूबसूरत कवि भी है, दोस्त आप भी मशहूर शायर है...मोहब्बत के बाद दोस्त की शायरी में एक खूबसूरती बढ़ने लगी है पर उसके घर की खूबसूरती कम होनी शुरू हो रही है !

जब किसी का घर से बाहर ध्यान लग जाता है, तो उसके घर का ध्यान टूट जाता है. वो पत्नी के पास बैठा भी, पत्नी के पास नहीं होता घर में होकर भी घर में नहीं होता अब घर भी घर नहीं लगता, पत्नी भी पत्नी नहीं लगती ! रिश्ता अपने आप छूट गया है, पर संस्कार नहीं छूंट रहे वो माना हुआ सयाना है , कॉलेज में फिलोसफी पढ़ाता रहा है - कई साल !

आस-पास के लोगों की मुश्किलें आसान कर देनेवाले को आज अपनी मुश्किल का हल मिलना मुश्किल हो गया है... ज़िन्दगी दूर खड़ी हैरान हो रही है !

मोहब्बत करनेवालों को जाने की राह नहीं नज़र आ रही ! राह तो सीधी है, पर संस्कारों के अँधेरे में नज़र नहीं आ रही! जब से पत्नी को मर्द की मोहब्बत का पता लगा है, वह हैरान तो है, मगर उदास नहीं !

पूछा सिर्फ हाजिर से जा सकता है, गैर हाजिर पति से क्या पूछना ? वह चुपचाप हालात को देख रही है और अपने अकेले हो जाने को मानकर अपने आपके साथ जीना सीख रही है !

मोहब्बत यह इलज़ाम कबूल नहीं करती कि वो घर तोडती है ! मोहब्बत ही घर बनाती है, ख्यालों से भी खूबसूरत घर... सच तो ये है कि मोहब्बत बगैर घर बनता ही नहीं.

पत्नी अब एक औरत है अपने आप की आप- जिम्मेदार और बदमुख्तियार चारों तरफ देखती है, घर में बड़ा कुछ बिखरा हुआ नज़र आता है !कल के रिश्ते की बिखरी हुई मौजूदगी और एक अजीब ख़ामोशी भी ....वह सब बिखरा हुआ बहा देती है !

और चीजों को संवारती है, सजाती है और सिंग्लिरी लड़की की तरह एक दावत देने की तैयारी करती है !

मर्द को विदा करने के लिए और विदा लेने के लिए जा रहे मर्द की मर्जी का खाना बनाती है, मेज़ फूलों से सजाती है, सामने बैठकर खाना खिलाती है.... वो ऑंखें होते हुए भी ऑंखें नहीं मिलाता !

जाते वक़्त औरत ने पैरों को हाथ लगाने की बजाय मर्द से पहली बार हाथ मिलाया और कहा- पीछे मुड़कर न देखना, आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है और 'आज' में है, अपने आप का ख्याल रखना, मेरे फिकर अब मेरे हैं !

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है. पर आज ने रोज़ आना है ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी , आदर के साथ विदा लेने के लिए भी ....

अब बहुत कुछ बदल गया है , अब आपकी दिनचर्या क्या होती है ?

इमरोज़ - उसकी धूप में
और अपनी छाँव में बैठा
मैं अपनी फकीरी करता रहता हूँ ...
पता नहीं ये फकीरी मुझे ज़िन्दगी ने दी है
कि ज़िन्दगी देनेवाले ने...

अमृता जी के लिए क्या कहना चाहेंगे ?

इमरोज़ - सपना सपना होकर
औरत हुई
और अपने आपको
अपनी मर्जी का सोचा ...
फिक्र फिक्र होकर
कवि हुई
वारिस शाह को जगाया
और कहा- देख अपना पंजाब लहुलुहान ...
मोहब्बत मोहब्बत होकर
एक राबिया हुई
किसी से भी नफरत करने से
इनकार किया
और अपने वजूद से बताया
कि मोहब्बत किसी से भी नफरत नहीं करती

ज़िन्दगी ज़िन्दगी होकर
वो मनचाही हुई
मनचाहा लिखा भी
और मनचाहा जिया भी....
मैं अमृता पर
कितना भी बोल लूँ
अमृता अनलिखी रह जाती है ....

वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज़्म नज़र आती है

मैं उस अनलिखी नज़्म को
कई बार लिख चुका हूँ
वो फिर भी अनलिखी ही रह जाती है

हो सकता है
ये अनलिखी नज़्म
लिखने के लिए हो ही ना,

सिर्फ जीने के लिए ही है ....

जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है?

इमरोज़ - हर जगह आदर
पहली तालीम होनी चाहिए
जो इस वक़्त कहीं नहीं
ना सोच में ना घर में ना ज़िन्दगी में
माँ बाप बच्चों के लिए आदर जानते ही नहीं
आदर करनेवाले माँ बाप हुकम कभी नहीं करते
स्कूलों में टीचर बच्चों के साथ
थप्पड़ों से गुस्से से
बच्चों का निरादर करते रहते हैं
आदर ना टीचरों में है ना किसी स्कूल के कोर्स में
आदर ज़िन्दगी का
एक खूबसूरत रंग भी है
हर मेल मिलाप हर रिश्ते का
लाजमी रंग और ज़रूरी अंग भी है
यहाँ तक कि
एक-दूसरे से विदा
होने के लिए भी आदर ज़रूरी है
और एक दूजे को विदा करने के लिए भी ज़रूरी ....
किसी को भी फूल देते वक़्त
कुछ खुशबू अपने हाथों को भी लगी रह जाती है ....
आदर रिश्तों की खुशबू है

आप तो आम लोगों से बिल्कुल अलग हैं, शांत,स्थिर ..... फिर भी जानना चाहूँगी क्या ज़िन्दगी में क्षणांश के लिए भी कोई शिकायत आपके मन को नहीं हुई?

इमरोज़ - एक छोटी सी शिकायत
जो बता सकते हैं
वो लोगों को क्यूँ नहीं बताते
कि पाप सोच करती है
जिस्म नहीं
गंगा जिस्म साफ़ करती है
सोच नहीं

शिकायत के लहजे में
कोई मुझसे पूछता है
कि मैं अपनी पेंटिंग पर
अपना नाम क्यूँ नहीं लिखता ?

मैंने कहा
मेरा नाम मेरी पेंटिंग का
हिस्सा नहीं बनता इसलिए......

वैसे किसी भी पेंटर का नाम
उसकी पेंटिंग का हिस्सा
कभी नहीं बना
जब कभी भी
मैंने शब्द तो बोले
पर अर्थ नहीं जिए

तब अपने आप से शिकायत होती रही है....

दूसरों से शिकायत करना
गुस्सा ही है
अपने से शिकायत अपनत्व

यह मुलाकात अविस्मरणीय, अद्भुत, ज्ञानवर्धक रही ........... इस मुलाकात के दरम्यान मैंने जाना इमरोज़ प्यार का स्तम्भ ही नहीं, हम जिसे खुदा कहते हैं, उसकी परछाईं हैं.......विदा लेने से पहले कुछ झलकियाँ देखिये उस घर की, जहाँ आज भी अमृता की खुशबू है, हर कमरे, हर दीवार, हर कोने में सशरीर न होते हुए भी अमृता मौजूद है, और मौजूद है इमरोज़ और उनकी बे-इन्तेहाई मोहब्बत.

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

एक ऑडियो-वीडियो पुस्तक अमृता-इमरोज़ के नाम

रश्मि प्रभा
अमृता-इमरोज़ के प्रेम-सम्बन्धों को अमृता की कविताओं और इमरोज़ की पेंटिंगों के माध्यम से देखने वालों ने जितना महसूसा है, वह उन्हें भावातिरेक से उपजी यूटोपिया पर पहुँचा देता है, जहाँ जिस्मानी आकर्षण का ज़ादू भी आध्यात्मिक प्यार की डगर की तरह दिखता है। अमृता की कविताओं के रसज्ञ कविताओं को पढ़कर न तो अपनी बेचैनी ज़ाहिर कर पाते हैं और न किसी तरह का सुकूँन महसूस कर पाते हैं। उन्हें लगता है कि घर की दीवारें, हवा, पानी मौसम, दिन-रात सब तरफ अमृता-इमरोज़ के किस्सों के साये हैं।

प्यार के रुहानी सफर की प्रसंशक यदि कोई महिला हो और वह भी कवि हृदयी, तो यह लगभग तयशुदा बात है कि अमृता की नज्मों में वह खुद को उतारने लगती है। अमृता-इमरोज के सम्बंधों में उसे हर तरह के आदर्श प्रेम संबंधों की छाया दिखती है। अमृता की हर अभिव्यक्ति उसे अपनी कहानी लगती है और इमरोज़ की पेंटिंगों से भी कोई न कोई आत्मिक सम्बंध जोड़ लेती है।

इसी तरह की एक अति सम्वेदनशील कवयित्री रश्मि प्रभा की आडियो-पुस्तक का विमोचन आज हम अपने श्रोताओं के हाथों करा रहे हैं। रश्मि प्रभा की कविताओं के इस संग्रह (कुछ उनके नाम) की ख़ास बात यही है कि इसकी हर कविता अमृता और इमरोज़ को समर्पित है। इनकी कविताओं में प्रेम का विहान है, सुबह है, दोपहर, शाम और रात है और इसके बाद शुरू होती प्रेम की अनंत यात्रा के संकेत हैं।

रश्मि की दृष्टि में अमृता के जीवन के किसी भी आयाम का हर सफहा इमरोज़ के नाम है। इमरोज़ अमृता का बिस्तर भी है, भोजन भी है, खुदा भी है, आदि भी है और अंत भी।

मेरा मानना है कि अमृता की कविताएँ प्रेम की जो दुनिया बनाती हैं, लगभग उसी दुनिया का विस्तार प्रस्तुत ऑडियो-बुक की नज़्मों में हमें मिलता है।

--शैलेश भारतवासी


कविता-प्रेमियो,

आज आप इसी ऑडियो-किताब का लोकार्पण अपने हाथों कीजिए। माउस को कैची समझकर नीचे दिख रहे एलबम का फीता काटिए॰॰॰



हमने अमृता-इमरोज़ को और अधिक समझने के लिए अमृता की कविताओं और इमरोज़ की पेंटिंगों को नज़दीक से महसूसने वालीं रंजना भाटिया और जेन्नी शबनम से संपर्क किया। रंजना भाटिया एक प्रसिद्ध ब्लॉगर हैं और 'अमृता प्रीतम की याद में' नाम से एक ब्लॉग चलाती हैं। जेन्नी शबनम इमरोज़ से अक्सर मिलती रहती हैं और इमरोज़-अमृता के रुहानी सफर की चश्मदीद भी हैं, शायद जेन्नी इमरोज़ की पेंटिंगों के संदेशों को बहुत अच्छे से समझती हैं। तो पढ़िए इन दोनों के विचार॰॰॰


जेन्नी शबनम
अमृता जी और इमरोज़ जी मेरे साहित्य सफ़र के प्रेरणा-स्रोत हैं। इमरोज़ जी की वजह से आज यहाँ मैं अपनी रचनाएँ सार्वजनिक रूप से प्रेषित करने का साहस कर सकी हूँ। मेरी ये चंद पँक्तियाँ जो कभी मैं उनके बारे में लिखी थी और सबसे पहले इमरोज़ जी को सुनाई थी-

बहुत तलाशी हूँ,
कोई और अमृता नहीं मिलती,
न कोई और इमरोज़ मिलता।
एक युग में,
एक ही अमृता-इमरोज़ होते,
कोई दूसरा नहीं होता।
प्यार, दोस्ती, नाते, रिश्ते,
सारे बंधनों से परे,
दो रूहानी हमसफ़र...
अमृता और इमरोज़।


-----जेन्नी शबनम
रंजना भाटिया
हर बार अमृता जी के लिखे को पढ़ना एक नया अनुभव दे जाता है ..और एक नई सोच ..वह एक ऐसी शख्सियत थी जिन्होंने ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी ..एक किताब में उनके बारे में लिखा है कि हीर के समय से या उस से पहले भी वेदों-उपनिषदों के समय से गार्गी से लेकर अब तक कई औरतों ने अपनी मर्जी से जीने और ढंग से जीने की जरुरत तो की पर कभी उनकी जरुरत को परवान नहीं चढ़ने दिया गया और अंत दुखदायी ही हुआ! आज की औरत का सपना जो अपने ढंग से जीने का है वह उसको अमृता-इमरोज़ के सपने सा देखती है ..ऐसा नहीं है कि अमृता अपनी परम्पराओं से जुड़ी नहीं थीं ..वह भी कभी-कभी विद्रोह से घबरा कर हाथों की लकीरों और जन्म के लेखो जोखों में रिश्ते तलाशने लगती थीं, और जिस समय उनका इमरोज़ से मिलना हुआ उस वक्त समाज ऐसी बातों को बहुत सख्ती से भी लेता था ..पर अमृता ने उसको जी के दिखाया ..

वह ख़ुद में ही एक बहुत बड़ी लीजेंड हैं और बंटवारे के बाद आधी सदी की नुमाइन्दा शायरा और इमरोज़ जो पहले इन्द्रजीत के नाम से जाने जाते थे, उनका और अमृता का रिश्ता नज्म और इमेज का रिश्ता था। अमृता की नज़में पेंटिंग्स की तरह खुशनुमा हैं, फिर चाहे वह दर्द में लिखी हों या खुशी और प्रेम में वह और इमरोज़ की पेंटिंग्स मिल ही जाती है एक दूजे से !!

मुझे उनकी लिखी इस पर एक कविता याद आई ..

तुम्हें ख़ुद से जब लिया लपेट
बदन हो गए ख्यालों की भेंट
लिपट गए थे अंग वह ऐसे
माला के वो फूल हों जैसे
रूह की वेदी पर थे अर्पित
तुम और मैं अग्नि को समर्पित
यूँ होंठो पर फिसले नाम
घटा एक फिर धर्मानुष्ठान
बन गए हम पवित्र स्रोत
था वह तेरा मेरा नाम
धर्म विधि तो आई बाद !!


अमृता जी ने समाज और दुनिया की परवाह किए बिना अपनी ज़िंदगी जी। उनमें इतनी शक्ति थी की वह अकेली अपनी राह चल सकें। उन्होंने अपनी धारदार लेखनी से अपन समय की सामजिक धाराओं को एक नई दिशा दी थी!!बहुत कुछ है उनके बारे में लिखने को ....पर जितना लिखा जाए उतना काम है ...

अभी उन्हीं की लिखी एक सुंदर कविता से अपनी बात को विराम देती हूँ ..

मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुए
सितारों की मुट्ठियाँ भरकर
आसमान ने निछावर कर दीं

दिल के घाट पर मेला जुड़ा,
ज्यूँ रातें रेशम की परियाँ
पाँत बाँध कर आईं......

जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
काग़ज़ के ऊपर उभर आयीं
केसर की लकीरें

सूरज ने आज मेहंदी घोली
हथेलियों पर रंग गयी,
हमारी दोनो की तकदीरें


--रंजना भाटिया


कवयित्री की ही आवाज़ में सुनिए सम्पूर्ण पुस्तक-


आवाज़ की इंजीनियर खुश्बू ने पूरी पुस्तक का चित्रों से भरा एक वीडियो बनाया है। आशा है यह भी आपको पसंद आयेगा।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

अरे कैसे मिलेगा मुझ जैसा हीरो....एक मस्ती भरा गीत गोपाल राव और महालक्ष्मी अय्यर का गाया

ताजा सुर ताल (22)

ताजा सुर ताल में आज में आज सुनिए एक कम चर्चित फिल्म का कम चर्चित मगर शानदार गीत

सजीव- सुजॉय, आज हम अपने श्रोताओं को कौन सी अपकमिंग फ़िल्म के संगीत से अवगत करवाने जा रहे हैं?

सुजॉय- आज हम चर्चा करेंगे 'लव खिचड़ी' फ़िल्म की और ये फिल्म अपकमिंग नहीं रही, फिल्म आ चुकी है और अधिकतर सिनेमाघरों से जा भी चुकी है, लेकिन इस फिल्म का एक गीत ख़ास ध्यान आकर्षित करता है जो आज हम सुनवाएँगे।

सजीव- अच्छा, नाम से तो लगता है कि यह कोई कॉमेडी फ़िल्म होगी, क्या ख़याल है?

सुजॉय- हाँ, यह कॊमेडी फ़िल्म ही है, और यह भी आपको बता दूँ कि इसकी कहानी कॉपी की गई है एक ऐसी हॉलीवुड फ़िल्म से, और यह हॉलीवुड फ़िल्म कॉपी है एक अमेरिकन टीवी धारावाहिक 'किचन confidentials' की।

सजीव- यानी कि चोर पे मोर!

सुजॉय- सजीव जी, ज़रा ज़बान संभाल के, सभ्य समाज में इसे चोरी नहीं कहते, इसे कहते हैं 'इन्स्पायर्ड', यानी कि प्रेरीत!

सजीव- बिल्कुल बिल्कुल, ग़लती हो गई मुझसे! इस फ़िल्म में नायक हैं रणदीप हुडा जो फ़िल्म में एक लड़कीबाज़ नौजवान का रोल अदा कर रहे हैं। साथ मे हैं सदा, रितुपर्णा सेनगुप्ता, सोनाली कुल्कर्णी, दिव्या दत्ता, कल्पना पंडित, जेसी रंधवा और रिया सेन।

सुजॉय- यानी कि नायिकाओं की भरमार है फ़िल्म में। अच्छा संगीतकार कौन है?

सजीव- प्रीतम। सुजॉय, आज के दौर के कामयाब संगीतकारों में प्रीतम ऐसे संगीतकार हैं जो सही रूप में नए गायकों को मौके दे रहे हैं। इस फ़िल्म में उन्होने गोपाल राव और सुनिता सारथी जैसे नए गायकों से गाने गवाए हैं।

सुजॉय- ये आपने बिल्कुल ठीक बात कही है, प्रीतम ने हर फ़िल्म में कम से कम एक नए कलाकार को मौका दिया है। अब इसी फ़िल्म में कुल पाँच गीतों में से दो गीतों को इन दो नए गायकों से गवाए हैं। बाक़ी के तीन गीत गाए हैं शान, श्रेया घोषाल और अलिशा चुनॉय ने।

सजीव- सुजॉय, कई बार फिल्म के न चलने से अच्छे गीत भी लोगों तक पहुँचने से वंचित रह जाते हैं, आज का प्रस्तुत गीत भी कुछ ऐसा ही है। 'लव आजकल', 'न्युयार्क', और 'लाइफ़ पार्ट्नर' के कामयाब संगीत के बाद प्रीतम तो सब से आगे चल रहे हैं इस साल। एक के बाद एक उनकी फिल्में आई जा रही है, अगर वो इसी रफ़्तार से काम करेंगें तो उनका हाल भी नदीम श्रवण जैसा हो जायेगा....मैं तो हैरान होता है की एक संगीतकार एक साथ कैसे इतनी सारी फिल्मों पर ध्यान दे पाता है.

सुजॉय- हाँ इतना सारा कार एक साथ करने पर संगीत की गुणवतत्ता पर असर पड़ना लाजमी ही है ।

सजीव- वैसे आज जिस गीत को हमें चुना है प्रीतम का रचा, उसके बारे में आपका क्या ख़याल है..

सुजॉय- मैने इस गीत को सुना है हाल ही में, एक 'रोक्किंग song' है, और इसका संगीत भी प्रीतम के दूसरे गीतों से बिल्कुल अलग है। गीत फ़िल्म के किसी 'सिचुयशन' पर लिखा गया होगा, ऐसा लगता है। इसके गीतकार कौन हैं, कुछ पता है?

सजीव- हाँ, इस फ़िल्म के सभी गीत सिचुयशनल' हैं, यानी कि बे-मतलब का कोई गीत ज़बरदस्ती नहीं डाला गया है। जहाँ तक गीतकारों का सवाल है, तो अमिताभ वर्मा और शालीन शर्मा ने गानें लिखे हैं।

सुजॉय- यानी कि गीतकार भी नए?

सजीव- हाँ।

सुजॉय- यह एक पेपी नंबर है, जैसा कि गीत के बोल हैं "मेरा नशा है तुम पर चढ़ा है जो, डर है मज़ा है नज़दीक आती रहो", तो हम भी यही कामना करेंगे कि इस गीत का नशा लोगों पर चढ़े और लम्बे समय तक इसका सुरूर बरक़रार रहे। गोपाल राव की आवाज़ बिल्कुल ताज़े हवा के झोंके की तरह सुनाई दी मुझे । मुझे तो अच्छी लगी उनकी आवाज़, एक यूथ अपील है इस नई आवाज़ में, आपका क्या कहना है सजीव?

सजीव- सही कहा तुमने, उम्मीद करते हैं कि दूसरे संगीतकारों की भी नज़र इन पर जल्द ही पड़ेगी, और जहाँ तक गीत का सवाल है ये इस साल आये कुछ बेहतरीन गीतों में से है यकीनन, मुझे इस गीत का संगीत संयोजन जबरदस्त लगा, पियानों के थिरकते नोट्स पर जैज़ बीट्स कमाल का नशा पैदा कर देते हैं.

सुजॉय- तो चलिए, अब सुनते हैं गोपाल राव और महालक्ष्मी अय्यर का गाया आज का ताज़ा सुर ताल, मेरी तरफ़ से गीत को ३.५.

सजीव - बिलकुल सुजॉय मैं भी इस गीत को ३.५ अंक दूंगा, एक और ख़ास बात ये है की ये गीत लगभग ९.५ मिनट लम्बा है, जैसे की आजकल के अधिकतर गीत नहीं होते, और ४ लम्बे लम्बे अंतरे हैं....पर हमें यकीं है की इस गीत को हमारे श्रोता भी उतना ही एन्जॉय करेंगें जितना हमने किया



आवाज़ की टीम ने दिए इस गीत को 3.5 की रेटिंग 5 में से. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसा लगा? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत गीत को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

क्या आप जानते हैं ?
आप नए संगीत को कितना समझते हैं चलिए इसे ज़रा यूं परखते हैं.एक ताजा गीत में "मर्तबा" शब्द का बहुत खूब इस्तेमाल हुआ है, कौन है इस गीत के गीतकार ...बताईये और हाँ जवाब के साथ साथ प्रस्तुत गीत को अपनी रेटिंग भी अवश्य दीजियेगा.

पिछले सवाल का सही जवाब दिया एक बार फिर से सीमा जी ने, बहुत बहुत बधाई, सागर जी आपने गलती दुरुस्त की उसके लिए धन्येवाद....और आपको गीत पसंद आया जानकर ख़ुशी हुई...



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई..... महफ़िल-ए-बेइख्तियार और "गुलज़ार"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३६

दिशा जी की नाराज़गी को दूर करने के लिए लीजिए हम लेकर हाज़िर हैं उनकी पसंद की पहली गज़ल। इस गज़ल की खासियत यह है कि जहाँ एक तरह इसे आवाज़ दिया है गज़लों के उस्ताद "गज़लजीत" जगजीत सिंह जी ने तो वहीं इसे लिखा है कोमल भावनाओं को अपने कोमल लफ़्जों में लपेटने वाले शायर "गुलज़ार" ने। जगजीत सिंह जी की गज़लों और नज़्मों को लेकर न जाने कितनी बार हम इस महफ़िल में हाज़िर हो चुके हैं और यकीन है कि इसी तरह आगे भी उनकी आवाज़ से हमारी यह बज़्म रौशन होती रहेगी। अब चूँकि जगजीत सिंह जी हमारी इस महफ़िल के नियमित फ़नकार हैं इसलिए हर बार उनका परिचय देना गैर-ज़रूरी मालूम होता है। वैसे भी जगजीत सिंह और गुलज़ार ऐसे दो शख्स हैं जिनकी ज़िंदगी के पन्ने अकेले हीं खुलने चाहिए, उस दौरान किसी और की आमद बने बनाए माहौल को बिगाड़ सकती है। इसलिए हमने यह फ़ैसला किया है कि आज की महफ़िल को "गुलज़ार" की शायरी की पुरकशिश अदाओं के हवाले करते हैं। जगजीत सिंह जी तो हमारे साथ हीं हैं, उनकी बातें अगली बार कभी कर लेंगे। "गुलज़ार" की बात अगर शुरू करनी हो तो इस काम के लिए अमृता प्रीतम से अच्छा कौन हो सकता है। अमृता प्रीतम कहती हैं: गुलज़ार एक बहुत प्यारे शायर हैं- जो अक्षरों के अंतराल में बसी हुई ख़ामोशी की अज़मत को जानते हैं, उनकी एक नज़्म सामने रखती हूँ-

रात भर सर्द हवा चलती रही...
...रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने

इन अक्षरों से गुजरते हुए- एक जलते और बुझते हुए रिश्ते का कंपन हमारी रगों में उतरने लगता है, इतना कि आँखें उस कागज़ की ओर देखने लगती हैं जो इन अक्षरों के आगे खाली हैं और लगता है- एक कंपन है, जो उस खाली कागज़ पर बिछा हुआ है। गुलज़ार ने उस रिश्ते के शक्ति-कण भी पहचाने हैं, जो कुछ एक बरसों में लिपटा हुआ है और उस रिश्ते के शक्ति-कण भी झेले हैं, जो जाने कितनी सदियों की छाती में बसा है...कह सकती हूँ कि आज के हालात पर गुलज़ार ने जो लिखा है, हालात के दर्द को अपने सीने में पनाह देते हुए, और अपने खून के कतरे उसके बदन में उतारते हुए-वह उस शायरी की दस्तावेज है, जो बहुत सूक्ष्म तरंगों से बुनी जाती है। ताज्जुब नहीं होता, जब अपने खाकी बदन को लिए, उफ़क़ से भी परे, इन सूक्ष्म तरंगों में उतर जाने वाला गुलज़ार कहता है-

वह जो शायर था चुप-सा रहता था,
बहकी-बहकी-सी बातें करता था....

फ़ना के मुकाम का दीदार जिसने पाया हो, उसके लिए बहुत मुश्किल है उन तल्ख घटनाओं को पकड़ पाना, जिनमें किसी रिश्ते के धागे बिखर-बिखर जाते हैं। गुलज़ार ने सूक्ष्म तरंगों का रहस्य पाया है, इसलिए मानना मुश्किल है कि ये धागे जुड़ नहीं सकते। इस अवस्था में लिखी हुई गुलज़ार की एक बहुत प्यारी नज़्म है, जिसमें वह कबीर जैसे जुलाहे को पुकारता है-

मैने तो इक बार बुना था एक हीं रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे..

लगता है- गुलज़ार और कबीर ने एक साथ कई नज़्मों में प्रवेश किया है- और ख़ाकी बदन को पानी का बुलबुला मानते हुए- यह रहस्य पाया है कि वक्त की हथेली पर बहता यह वह बुलबुला है, जिसे कभी न तो समंदर निगल सका, न कोई इतिहास तोड़ पाया!


गुलज़ार ने अपने जिस मित्र "मंसूरा अहमद" के लिए ये पंक्तियाँ लिखीं थी:

आज तेरी एक नज़्म पढी थी,
पढते-पढते लफ़्ज़ों के कुछ रंग लबों पर छूट गए...
....सारा दिन पेशानी पर,
अफ़शाँ के ज़र्रे झिलमिल-झिलमिल करते रहे।

उन्होंने गुलज़ार का परिचय कुछ यूँ दिया है:

कहीं पहले मिले हैं हम
धनक के सात रंगों से बने पुल पर मिले होंगे
जहाँ परियाँ तुम्हारे सुर के कोमल तेवरों पर रक़्स
करती थीं
परिन्दे और नीला आसमां
झुक झुक के उनको देखते थे
कभी ऐसा भी होता है हमारी ज़िंदगी में
कि सब सुर हार जाते हैं
फ़्रक़त एक चीख़ बचती है
तुम ऐसे में बशारत बन के आते हो
और अपनी लय के जादू से
हमारी टूटती साँसों से इक नग़मा बनाते हो
कि जैसे रात की बंजर स्याही से सहर फूटे
तुम्हारे लफ़्ज़ छू कर तो हमारे ज़ख़्म लौ देने लगे हैं...!


अब चलिए जनाब विनोद खेतान से रूबरु हो लेते हैं जो गुलज़ार साहब के बारे में ये विचार रखते हैं: ज़िन्दगी के अनगिन आयामों की तरह उनकी कविता में एक ही उपादान, एक ही बिम्ब कहीं उदासी का प्रतीक होता है और कहीं उल्लास का। गुलज़ार की कविता बिम्बों की इन तहों को खोलती है। कभी भिखारिन रात चाँद कटोरा लिये आती है और कभी शाम को चाँद का चिराग़ जलता है; कभी चाँद की तरह टपकी ज़िन्दगी होती है और कभी रातों में चाँदनी उगाई जाती है। कभी फुटपाथ से चाँद रात-भर रोटी नजर आता है और कभी ख़ाली कासे में रात चाँद की कौड़ी डाल जाती है। शायद चाँद को भी नहीं पता होगा कि ज़मीन पर एक गुलज़ार नाम का शख़्स है, जो उसे इतनी तरह से देखता है। कभी डोरियों से बाँध-बाँध के चाँद तोड़ता है और कभी चौक से चाँद पर किसी का नाम लिखता है, कभी उसे गोरा-चिट्टा-सा चाँद का पलंग नज़र आता है जहाँ कोई मुग्ध होकर सो सकता है और कभी चाँद से कूदकर डूबने की कोशिश करता है। गुलज़ार के गीतों में ये अद्भुत प्रयोग बार-बार दीखते हैं और हर बार आकर्षित करते हैं। कभी आँखों से खुलते हैं सबेरों के उफ़ुक़ और कभी आँखों से बन्द होती है सीप की रात; और यदि नींद नहीं आती तो फिर होता है आँखोंमें करवट लेना। कभी उनकी ख़ामोशी का हासिल एक लम्बी ख़ामोशी होता है और कभी दिन में शाम के अंदाज होते हैं या फिर जब कोई हँसता नहीं तो मौसम फीके लगते हैं। जब गुलज़ार की कविता में आँखें चाँद की ओर दिल से मुख़ातिब होती हैं तो लगता है इस शायर का ज़मीन से कोई वास्ता नहीं। पर यथार्थ की ज़मीन पर गुलज़ार का वक्त रुकता नहीं कहीं टिककर (क्योंकि) इसकी आदत भी आदमी-सी है, या फिर घिसते-घिसटते फट जाते हैं जूते जैसे लोग बिचारे। शायर ज़िन्दगी के फ़लसफ़े को मुक़म्मल देखना चाहता है और आगाह करता है कि वक़्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते; या फिर वक़्त की विडंबना पर हँसता है कि वो उम्र कम कर रहा था मेरी, मैं साल अपने बढ़ा रहा था। कभी वह ख़्वाबों की दुनिया में सोए रहना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि जाग जाएगा ख़्वाब तो मर जाएगा और कभी वह बिल्कुल चौकन्ना हो जाता है क्योंकि उसे पता है कि समय बराबर कर देता है समय के हाथ में आरी है, वक्त से पंजा मत लेना वक्त का पंजा भारी है। पर फिर भी उम्मीद इतनी कि उसने तिनके उठाए हुए हैं परों पर।

गुलज़ार साहब के बारे में कहने को और भी कई सारी बाते हैं, लेकिन आज बस इतना हीं। अब चलिए हम "मरासिम" से आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं। जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ के बीच गुलज़ार जब "तुम्हारे ग़म की..." लेकर आते हैं तो मानो वक्त भी बगले झांकने लगता है। यकीन न हो तो खुद हीं देख लीजिए:

दिन कुछ ऐसे ग़ुज़ारता है कोई
जैसे एहसाँ उतारता है कोई

आईना देख कर तसल्ली हुई
हमको इस घर मे जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

तुम्हारे ग़म की डली उठाकर
जबां पर रख ली देखो मैने,
ये कतरा-कतरा पिघल रही है,
मैं कतरा-कतरा हीं जी रहा हूँ।

देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हमको पुकारता है कोई




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

___ लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...


आपके विकल्प हैं -
a) सब्र, b) जब्त, c) दर्द, d) शेखी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ग़म" और शेर कुछ यूं था -

अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं,
तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी।

इस शब्द के साथ सबसे पहला जवाब आया शरद जी का। शरद जी ने दो शेर भी पेश किए:

आप तो जब अपने ही ग़म देखते है
किसलिए फ़िर मुझमें हमदम देखते हैं (स्वरचित)

दिल गया तुमने लिया हम क्या करें
जाने वाली चीज़ का ग़म क्या करें । (दाग़ देहलवी)

शरद जी के बाद कुलदीप जी हाज़िर हुए और उन्होंने तो जैसे शेरों की बाढ हीं ला दी। एक के बाद १७-१८ टिप्पणियाँ करना इतना आसान भी नहीं है। मुझे लगता है कि कुलदीप जी शामिख साहब को पीछे करने पर तुले हैं और यह देखिए आज शामिख साहब हमारी महफ़िल में आए हीं नहीं। कुलदीप जी ने घोषणा हीं कर दी कि चूँकि "ग़म" उनका प्रिय शब्द है, इसलिए आज उन्हें कोई नहीं रोक सकता :) अब उनके सारे शेरों को तो पेश नहीं किया जा सकता। इसलिए उन शेरों का यहाँ ज़िक्र किए देता हूँ जिनमें ग़म शब्द आता है:

अब तो हटा दो मेरे सर से गमो की चादर को
आज हर दर्द मुझपे इतना निगेहबान सा क्यूँ है

नीचे पेश हैं खुमार साहब के शेर, जिन्हें कुलदीप जी ने कई सारी गज़लों के माध्यम से हमारे बीच रखा:

हाले गम उन को सुनते जाइये
शर्त ये है के मुस्कुराते जाईये

हाले-गम कह कह के गम बढा बैठे
तीर मारे थे तीर खा बैठे

कभी जो मैं ने मसर्रत का एहतमाम किया
बड़े तपाक से गम ने मुझे सलाम किया

सुकून ही सुकून है खुशी ही खुशी है
तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है

कुलदीप जी के बाद मंजु जी का हमारी महफ़िल में आना हुआ। यह रहा उनका स्वरचित शेर:

उनका आना है ऐसा जैसे हो हसीन रात ,
उनका जाना है ऐसे जैसे गम की हो बरसात

अदा जी भी अपने आप को एक पूरी गज़ल पेश करने से रोक नहीं पाईं। यह रहा वह शेर जिसमें ’ग़म’ शब्द की आमद है:

गम है या ख़ुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मनु जी ने अपना वह शेर पेश किया जिसे कुछ दिनों पहले ’हिन्द-युग्म’ पर पोस्ट किया गया था:

मिला जो दर्द तेरा और लाजवाब हुई
मेरी तड़प थी जो खींचकर गम-ए-शराब हुई

रचना जी की प्रस्तुति भी काबिल-ए-तारीफ़ रही। यह रहा उनका शेर:

मेरी सोच का कोई किनारा न होता
ग़म न होता तो कोई हमारा न होता

शरद जी की बात से एक हद तक मैं भी इत्तेफ़ाक रखता हूँ। हमारी पहेली का नियम यह है कि जो शब्द सही हो उसे लेकर या तो अपना कोई शेर डालें या फिर किसी जानीमानी हस्ती का, लेकिन बस शेर हीं। पूरी गज़ल डालने से मज़ा चला जाता है। लेकिन अगर पूरी गज़ल डालने का आपने मन बना हीं लिया है तो इस बात का यकीन कर लें कि उस गज़ल में वह शब्द ज़रूर आता है, रवानी में इस कदर भी न बह जाएँ कि किसी शायर की सारी गज़लें डालने लगें।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

"अमृता - इमरोज़"- रंजना भाटिया की नज़र में


पॉडकास्ट पुस्तक समीक्षा (अंक २)

अमृता इमरोज
लेखिका – उमा त्रिलोक
मूल्य – 120
प्रकाशक – पेंगुइन बुक्स इंडिया प्रा. लि. भारत
आईएसबीएन नं. – 0-14-309993-0


उमा त्रिलोक की किताब को पढ़ना मुझे सिर्फ़ इस लिए अच्छा नही लगा कि यह मेरी सबसे मनपसंद और रुह में बसने वाली अमृता के बारे में लिखी हुई है ..बल्कि या मेरे इस लिए भी ख़ास है कि इसको इमरोज़ ने ख़ुद अपने हाथो से हस्ताक्षर करके मुझे दिया है ...उमा जी ने इस किताब में उन पलों को तो जीवंत किया ही है जो इमरोज़ और अमृता की जिंदगी से जुड़े हुए बहुत ख़ास लम्हे हैं साथ ही साथ उन्होंने इस में उन पलों को समेट लिया है जो अमृता जी की जीवन के आखरी लम्हे थे. और उन्होंने हर पल उस रूहानी मोहब्बत के जज्बे को अपनी कलम में समेट लिया है

फ़िर सुबह सवेरे
हम कागज के फटे हुए टुकडों की तरह मिले
मैंने अपने हाथ में उसका हाथ लिया
उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया

और फ़िर हम दोनों एक सेंसर की तरह हँसे
और फ़िर कागज को एक ठंडी मेज पर रख कर
उस सारी नज़्म पर लकीर फेर दी !

मैंने इस किताब को पढ़ते हुए इसके हर लफ्जे को रुह से महसूस किया एक तो मैं उनके घर हो कर आई थी यदि कोई न भी गया हो तो वह इस किताब को पढ़ते हुए शिद्दत से अमृता के साथ ख़ुद को जोड़ सकता है ...उनके लिखे लफ्ज़ अमृता और इमरोज़ की जिंदगी के उस रूहानी प्यार को दिल के करीब ला देते हैं ..जहाँ वह लिखती है इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता जी की कविताओं में, किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ दिखायी देता है ..एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे सामजिक मंजूरी की जरुरत नही पड़ती है ...

मैं एक लोकगीत
बेनाम ,हवा में खड़ा
हवा का हिस्सा
जिसे अच्छा लगूं
वो याद कर ले
जिसे और अच्छा लगूं
वो अपना ले --
जी में आए तो गा भी ले
में एक लोकगीत
जिसको नाम की
जरुरत नही पड़ी...


प्यार के कितने रंग हैं और कितनी दिशाएँ और कितनी ही सीमायें हैं...कौन जान सकता है...

उमा जी का हर बार अमृता जी के यहाँ जाना रिश्तो की दुनिया का एक नया सफर होता...यह उन्होंने न केवल लिखा है बलिक इस को उनके लिखे में गहराई से महसूस भी किया जा सकता है...इस किताब में अमृता का अपने बच्चो के साथ रिश्ता भी बखूबी लिखा है उन्होंने..और इमरोज़ से उनके बच्चो के रिश्ते को बखूबी दर्शाया है लफ्जों के माध्यम से..उमा उनसे आखरी दिनों में मिली जब वह अपनी सेहत की वजह से परेशान थी तब उमा जी जो की रेकी हीलर भी है इस मध्याम से उनके साथ रहने का मौका मिला जिससे वह हर लम्हे को अपनी इस किताब में लिख पायी अपने आखरी दिनों की कविता "मैं तेनु फेर मिलांगी" जो उन्होंने इमरोज़ के लिए लिखी थी उसका अंगेरजी में अनुवाद करने को बोला था

इमरोज़ के भावों को उस आखरी वक्त के लम्हों को बहुत खूबसूरती से उन्होंने लिखा है...सही कहा है उमा जी ने की प्यार में मन कवि हो जाता है वह कविता को लिखता ही नही कविता को जीता है तभी उमा के संवेदना जताने पर इमरोज़ कहते हैं कि एक आजाद रुह जिस्म के पिंजरे से निकल कर फ़िर से आज़ाद हो गई...

अमृता इमरोज़ के प्यार को रुह से महसूस करने वालों के लिए यह किताब शुरू से अंत तक अपने लफ्जों से बांधे रखती है...और जैसे जैसे हम इस के वर्क पलटते जाते हैं उतने ही उनके लिखे और साथ व्यतीत किए लम्हों को ख़ुद के साथ चलता पाते हैं...

आज से कुछ साल पहले अमृता इमरोज़ ने समाज को धता बता कर साथ रहने का फैसला किया था. यह दस्तावेज है उनकी जुबानी उनकी कहानी का..इमरोज़ कहते हैं..."एक सूरज आसमान पर चढ़ता है. आम सूरज सारी धरती के लिए. लेकिन एक सूरज ख़ास सूरज सिर्फ़ मन की धरती के लिए उगता है,इस से एक रिश्ता बन जाता है,एक ख्याल,एक सपना,एक हकीक़त..मैंने इस सूरज को पहली बार एक लेखिका के रूप में देखा था,एक शायरा के रूप में,किस्मत कह लो या संजोग,मैंने इस को ढूंढ़ कर अपना लिया,एक औरत के रूप में,एक दोस्त के रूप में,एक आर्टिस्ट के रूप में,और के महबूबा के रूप में !"

कल रात सपने में एक
औरत देखी
जिसे मैंने कभी नही देखा था
इस बोलते नैन नक्श बाली को
कहीं देखा हुआ है ..

कभी कभी खूबसूरत सोचे
खूबसूरत शरीर भी धारण कर लेती है...




प्रस्तुति -रंजना भाटिया

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

तेरी नज्म से गुजरते वक्त खदशा रहता है...

चाहे बात हो गुलज़ार साहब की या जिक्र छिड़े अमृता प्रीतम का, एक नाम सभी हिन्दी चिट्टाकारों के जेहन में सहज ही आता है- रंजना भाटिया का, जिन्होंने इन दोनों हस्तियों पर लगातार लिखा है और बहुत खूब लिखा है, आज हम जिस एल्बम का जिक्र आवाज़ पर कर रहें हैं उसमें संवेदनायें हैं अमृता की तो आवाज़ है गुलज़ार साहब की. अब ऐसे एल्बम के बारे में रंजना जी से बेहतर हमें कौन बता सकता है. तो जानते हैं उन्हीं से क्या है इस एल्बम की खासियतें -

तेरी नज्म से गुजरते वक्त खदशा रहता है
पांव रख रहा हूँ जैसे ,गीली लैंडस्केप पर इमरोज़ के
तेरी नज्म से इमेज उभरती है
ब्रश से रंग टपकने लगता है

वो अपने कोरे कैनवास पर नज्में लिखता है ,
तुम अपने कागजों पर नज्में पेंट करती हो


-गुलजार

अमृता की लिखी नज्म हो और गुलजार जी की आवाज़ हो तो इसको कहेंगे सोने पर सुहागा .....दोनों रूह की अंतस गहराई में उतर जाते हैं ..रूमानी एहसास लिए अमृता के लफ्ज़ हैं तो मखमली आवाज़ में गुलजार के कहे बोल हैं इसको गाये जाने के बारे में गुलजार कहते हैं की यह तो ऐसे हैं जैसे "दाल के ऊपर जीरा" किसी ने बुरक दिया हो ..गुलजार से पुरानी पीढी के साथ साथ आज की पीढी भी बहुत प्रभावित है ..उनके लिखे बोल .गाए लफ्ज़ हर किसी के दिल में अपनी जगह बना लेते हैं ..पर गुलजार ख़ुद भी कई लिखने वालों से बहुत ही प्रभावित रहे हैं ..अमृता प्रीतम उन में से एक हैं ...अमृता प्रीतम पंजाबी की जानी मानी लेखिका रही हैं ...

गुलजार जी पुरानी यादों में डूबता हुए कहते हैं कि .मुझे ठीक से याद नही कि मैं पहली बार उनसे कब मिला था ...पर जितना याद आता है .तो यह कि तब मैं छात्र था और साहित्य कारों को सुनने का बहुत शौक था ..अमृता जी से शायद में पहली बार "एशियन राईटर की कान्फ्रेंस" में मिला था एक लिफ्ट मैं जब मैं वहां ऊपर जाने के लिए चढा तब उसी लिफ्ट मैं अमृता प्रीतम और राजगोपालाचारी भी थे .जब उनसे मिला तो उनसे बहुत प्रभावित हुआ उनकी नज्मों को पढ़ते हुए ही वह बड़े हुए और उनकी नज्मों से जुड़ते चले गए और जब भी दिल्ली आते तो उनसे जरुर मिलते ..तब तक गुलजार भी फ़िल्म लाइन में आ चुके थे.

अमृता जी की लिखी यह नज्में गुलजार जी की तरफ़ से एक सच्ची श्रद्दांजली है उनको ..उनकी लिखी नज्में कई भाषा में अनुवादित हो चुकी है .पर गुलजार जी आवाज़ में यह जादू सा असर करती हैं ..इस में गाई एक नज्म अमृता की इमरोज़ के लिए है .

मैं तुम्हे फ़िर मिलूंगी ...
कहाँ किस तरह यह नही जानती
शायद तुम्हारे तख्यिल की कोई चिंगारी बन कर
तुम्हारे केनवास पर उतरूंगी
या शायद तुम्हारे कैनवास के ऊपर
एक रहस्यमय रेखा बन कर
खामोश तुम्हे देखती रहूंगी


गुलजार कहते हैं की यदि इस में से कोई मुझे एक नज्म चुनने को कहे तो मेरे लिए यह बहुत मुश्किल होगा ..क्योँ की मुझे सभी में पंजाब की मिटटी की खुशबू आती है ..और मैं ख़ुद इस मिटटी से बहुत गहरे तक जुडा हुआ हूँ ..यह मेरी अपनी मात्र भाषा है .. अमृता की लिखी एक नज्म दिल को झंझोर के रख देती है ...और उसको यदि आवाज़ गुलजार की मिल गई हो तो ..दिल जैसे सच में सवाल कर उठता है ...

आज वारिस शाह से कहती हूँ
अपनी कब्र से बोलो !
और इश्क की किताब का कोई नया वर्क खोलो !
पंजाब की एक बेटी रोई थी ,
तुने उसकी लम्बी दास्तान लिखी
आज लाखों बेटियाँ रो रही है वारिस शाह !
तुमसे कह रही है :


इसकी एक एक नज्म अपने में डुबो लेती है ..और यह नशा और भी अधिक गहरा हो जाता है ..जब गुलजार जी की आवाज़ कानों में गूंजने लगती है ..यह नज्में वह बीज है इश्क के जो दिल कि जमीन पर पड़ते ही कहीं गहरे जड़े जमा लेते हैं ..और आप साथ साथ गुनगुनाने पर मजबूर हो जाते हैं ..

एक जमाने से
तेरी ज़िन्दगी का पेड़
कविता ,कविता
फूलता फलता और फैलता
तुम्हारे साथ मिल कर देखा है
और जब
तेरी ज़िन्दगी के पेड़ ने
बीज बनना शुरू किया
मेरे अन्दर जैसे कविता की
पत्तियां फूटने लगीं है ..

और जिस दिन तू पेड़ से
बीज बन गई
उस रात एक नज्म ने
मुझे पास बुला कर पास बिठा कर
अपना नाम बताया
अमृता जो पेड़ से बीज बन गई


गुलज़ार की आवाज़ में अमृता प्रीतम की कविताओं की यह CD टाईम्स म्यूजिक ने जारी की है, इसकी कुछ झलकियाँ आप आज आवाज़ पर सुन सकते हैं (कृपया नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें).पूरी CD आप यहाँ से खरीद सकते हैं,आप भी इस नायाब संकलन को हमेशा के लिए अपनी संगीत लाइब्रेरी का हिस्सा अवश्य बनाना चाहेंगे.



प्रस्तुति - रंजना भाटिया "रंजू"

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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