रविवार, 29 सितंबर 2013

‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’

   
स्वरगोष्ठी – 139 में आज

रागों में भक्तिरस – 7

राग मालकौंस का रंग : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के संग


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। आज माह का पाँचवाँ रविवार है और इस दिन ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक हमारे अतिथि संगीतज्ञ द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। आज का यह अंक प्रस्तुत कर रहे हैं, मयूर वीणा और इसराज के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र। श्रृंखला के आज के अंक में श्रीकुमार जी आपसे अत्यन्त लोकप्रिय राग मालकौंस पर चर्चा करेंगे। आज हम आपको राग मालकौंस के भक्तिरस के पक्ष को स्पष्ट करने के लिए तीन रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम आपको सुनवाएँगे, 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ का भक्तिरस से परिपूर्ण एक गीत, जो राग मालकौंस के स्वरों पर आधारित है। इसके साथ ही संगीत-मार्तण्ड ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा इसी राग में प्रस्तुत किया गया मीरा का एक भक्तिपद और यही रचना पण्डित जी की शिष्या विदुषी एन. राजम् वायलिन पर गायकी अंग में प्रस्तुत करेंगी।


थाट भैरवी, वादी म सा, रखिए रे प वर्ज्य,

तृतीय प्रहर निशि गाइए, मालकौंस का अर्ज।

पं. श्रीकुमार मिश्र 
राग भैरवी के कोमल ऋषभ और पंचम को हटा देने पर बचे हुए भैरवी के स्वरों- कोमल गान्धार, मध्यम, कोमल धैवत और कोमल निषाद में मध्य व तार सप्तक के षडज का संयोग कर देने से जिस राग का रूप निर्मित होता है वह मालकौंस है। औड़व जाति के इस इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। राग मालकौंस सागर की भाँति है। विविध नदियों का मानों इसमें समागम है। इसके मन्द्र धैवत को षडज मान कर यदि मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाए तो राग भूपाली का दर्शन होने लगता है। मन्द्र निषाद को जब षडज मान कर मालकौंस के स्वरों का प्रयोग किया जाता है तब राग मेघ मल्हार का आभास होने लगता है। इसी प्रकार गान्धार स्वर को यदि षडज मान कर प्रयोग किया जाए तो राग दुर्गा और मध्यम को षडज मान कर चलने पर राग धानी की झलक मिलने लगती है। राग भूपाली का आत्मनिवेदन, मेघ मल्हार का नैसर्गिक गाम्भीर्य, राग दुर्गा में व्याप्त भक्तिभाव की विनयपूर्ण अभिव्यक्ति और राग धानी का वैचित्र्य भाव, इन सभी के समागम से राग मालकौंस का गम्भीर चिन्तनशील स्वरूप कायम होता है। राग मालकौंस में षडज स्वर आधार है। कोमल गान्धार स्वर से पुकार का भाव और मध्यम स्वर पर ठहराव से मन व्यापक चिन्तन की दिशा में अग्रसर होने लगता है।

नौशाद और रफी
पण्डित श्रीकुमार मिश्र द्वारा प्रस्तुत राग मालकौंस पर यह चर्चा हम जारी रखेंगे, पहले आपको सुनवाते है, राग मालकौंस का एक आकर्षक फिल्मी रूपान्तरण। संगीतकार नौशाद ने फिल्म ‘बैजू बावरा’ के लिए एक कालजयी भक्तिगीत रचा था। नौशाद की भक्तिरस प्रधान गीतों की रचनात्मक कुशलता के बारे में फिल्म संगीत के इतिहासकार पंकज राग, अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखते हैं- “नौशाद के संगीत के दो पहलू रहे हैं- एक तो शास्त्रीय आधार का सरस, सुगम्य रूपान्तरित लोकसंगीत और दूसरा शास्त्रीय आधारित आभिजात्य संगीत जिसमें कभी मुगलिया या लखनऊ की नवाबी संस्कृति की खूबसूरत भंगिमाएँ रहती थीं, तो कभी ईश्वर की आराधना करता उदात्त भक्ति-संगीत। साहित्य में भक्ति-साहित्य भले ही लोकरंजक और लोकसंस्कृति से प्रेरित रहा हो, पर नौशाद के भक्ति-गीतों में शुद्ध, गम्भीर शास्त्रीय सुर ही लगे हैं। नौशाद के संगीत की मूल प्रवृत्ति भारतीय शास्त्रीय संगीत-परम्परा की तरह ही कलावादी रही है।” फिल्म ‘बैजू बावरा’ के भक्तिपरक गीत यदि नौशाद को शिखर तक ले जाते हैं, वहीं गायक मुहम्मद रफी को उनके भावपूर्ण गायन के लिए प्रथम श्रेणी के गायकों में शामिल कराते हैं। प्रस्तुत है, गीतकार शकील बदायूनी, संगीतकार नौशाद और गायक मुहम्मद रफी द्वारा सृजित आस्था, समर्पण और पुकार से युक्त फिल्म ‘बैजू बावरा’ का यह गीत।


राग मालकौंस : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मुहम्मद रफी : फिल्म ‘बैजू बावरा’



पं. ओंकारनाथ ठाकुर 
राग मालकौंस की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए पण्डित श्रीकुमार मिश्र आगे लिखते हैं- राग मालकौंस में कोमल ऋषभ और पंचम स्वर के न होने से मध्यम के साथ शेष तीनों कोमल स्वर गान्धार, धैवत और निषाद के मिलाप से गाम्भीर्य कायम होता है। कोमल ऋषभ के विषाद भाव और पंचम की जागृति दोनों ही दार्शनिक गाम्भीर्य निर्मित करने में व्यवधान उत्पन्न न करें, इसीलिए इनका प्रयोग निषिद्ध है। राग मालकौंस में प्रयुक्त स्वरों को निरन्तर दुहराने से राग भूपाली, मेघ मल्हार, दुर्गा और धानी झलक जाएँगे। इसलिए राग मालकौंस को बरतना सरल नहीं होता। मध्यम के साथ मिल कर स्वरात्मक व सहयोगी क्रियाकलाप होंगे तो मालकौंस का स्वरूप कायम रहेगा। 
 

विदुषी एन. राजम्
अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, राग मालकौंस के यथार्थ स्वरूप को प्रदर्शित करती दो रचनाएँ। पहले आप सुनेंगे संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया, राग मालकौंस में गूँथा मीरा का एक पद। पण्डित जी के मालकौंस में राग की गम्भीर व संवेदनशील भावाभिव्यक्ति पूर्णरूप से विद्यमान है। इस पद के बाद आप विदुषी एन. राजम् से वायलिन पर गायकी अंग में मीरा के इसी पद का भावपूर्ण और संवेदनशील वादन। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि विदुषी एन. राजम् पण्डित जी की प्रमुख शिष्या रही हैं। राजम् जी ने पण्डित जी के साथ अनेक संगीत सभाओं में वायलिन पर संगति भी की है। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर द्वारा प्रस्तुत मीरा के पद की जो रिकार्डिंग आप इस अंक में सुन रहे हैं, इसमें भी राजम् जी ने वायलिन संगति की है। आप इन रचनाओं के भक्तिरस का आस्वादन करें और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की की अनुमति दें।


राग मालकौंस : गायन : ‘पग घुँघरू बाँध कर नाची रे...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर

राग मालकौंस : वायलिन वादन : ‘पग घुँघरू बाँध कर नाची रे...’ : विदुषी एन. राजम्




आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ की 139वीं संगीत पहेली में हम आपको वाद्य संगीत पर एक राग रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – यह रचना किस ताल में प्रस्तुत की गई है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 141वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 137वीं संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी लक्ष्मी शंकर के स्वरों में एक खयाल रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग धानी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल झपताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के उत्तर मिन्नेसोटा, U.S.A से दिनेश कृष्णजोइस और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

   
 मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे अतिथि संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ राग मालकौंस की चर्चा की और इस राग की तीन रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपको एक अत्यधिक प्रचलित राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्ति और श्रृंगार, दोनों रसों की रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


आलेख : श्रीकुमार मिश्र 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

शनिवार, 28 सितंबर 2013

आज की 'सिने पहेली' लता जी के नाम...

सिने पहेली – 82

  







"मुझसे चलता है सर-ए-बज़्म सुखन का जादू
चाँद ज़ुल्फ़ों के निकलते है मेरे सीने से,
मैं दिखाता हूँ ख़यालात के चेहरे सब को
सूरतें आती हैं बाहर मेरे आईने से।

हाँ मगर आज मेरे तर्ज़-ए-बयां का यह हाल
अजनबी कोई किसी बज़्म-ए-सुखन में जैसे,
वो ख़यालों के सनम और वो अल्फ़ाज़ के चाँद
बेवतन हो गए हों अपने ही वतन में जैसे।

फिर भी क्या कम है, जहाँ रंग न ख़ुशबू है कोई
तेरे होंठों से महक जाते हैं अफ़कार मेरे,
मेरे लफ़्ज़ों को जो छू लेती है आवाज़ तेरी
सरहदें तोड़ के उड़ जाते हैं अशार मेरे।

तुझको मालूम नहीं, या तुझे मालूम भी हो
वो सियाह बख़्त जिन्हें ग़म ने सताया बरसों,
एक लम्हे को जो सुन लेते हैं तेरा नग़मा
फिर उन्हें रहती है जीने की तमन्ना बरसों।

जिस घड़ी डूब के आहंग में तू गाती है
आयतें पढ़ती है साज़ों की सदा तेरे लिए,
दम बदम ख़ैर मनाते हैं तेरी चंग-ओ-रबाब
सीने नये से निकलती है दुआ तेरे लिए।

नग़मा-ओ-साज़ के ज़ेवर से रहे तेरा सिंगार
हो तेरी माँग में तेरी ही सुरों की अफ़शां,
तेरी तानों से तेरी आँख में काजल की लकीर
हाथ में तेरे ही गीतों की हिना हो रखशां।"







बरसों पहले शायर और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने इन शब्दों में जिस आवाज़ की तारीफ़ें की थी, उस आवाज़ का जादू पिछले छह दशकों से सर चढ़ कर बोल रहा है। कानों में मिश्री घोलने वाली, मन की हर पीड़ा को दूर करने वाली इस आवाज़ की शीतल छाँव में बैठ कर इंसान ज़िन्दगी की दुख-तकलीफ़ों को पल में भूल जाता है। यह वह आवाज़ है जिसकी स्वरगंगा में नहा कर हर मन पवित्र हो जाता है। यह आवाज़ है लता मंगेशकर की। मरुस्थल को भी हरियाली में परिवर्तित कर देने वाली लता जी का आज अपना 85-वाँ जनमदिवस मना रही हैं। आइए लता जी को जनमदिवस की शुभकामनायें देते हुए शुरु करते हैं आज की 'सिने पहेली', और उपहार स्वरूप आज की यह पहेली उन्हीं को समर्पित करते हैं।



आज की पहेली : बूझो तो जाने!




लता मंगेशकर का गाया एकल गीत है "A"। इसके फ़िल्म का नाम है "B"। इस गीत के संगीतकार हैं राहुल देव बर्मन।

मज़ेदार बात यह है कि इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के तीन वर्ष पहले (1965 में) एक सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म आयी थी "C" जिसमें "A" के मुखड़े के पहले कुछ शब्दों को हास्य अभिनेता महमूद ने फ़िल्म के एक सीन में गुनगुनाया था, और वह भी बिल्कुल उसी धुन में जिस धुन में तीन वर्ष बाद "A" गीत बना। पर "C" फ़िल्म के संगीतकार राहुल देव बर्मन नहीं थे, बल्कि वो थे शंकर जयकिशन।

"B" शब्द से अमिताभ बच्चन का गाया हुआ एक फ़िल्मी गीत शुरू होता है जिसके फ़िल्म का नाम है "D"। अब "D" शब्द से लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया एक युगल गीत भी तो शुरू होता है जिसे हम "E" कह सकते हैं, और यह गीत फ़िल्माया गया है संजीव कुमार और वहीदा रहमान पर। तो फिर पहचानिये A, B, C, D, और E को। यही है आज की पहेली। कुल अंक हैं 10।

इस पहेली का जवाब आप cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 82" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 3 अक्टुबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।







पिछली पहेली का हल

A-  आशा भोसले
B-  ओ पी नैय्यर
C-  फ़िल्म - प्राण जाए पर वचन न जाए
D-  फ़िल्म - राम तेरी गंगा मैली
E- सुनो तो गंगा ये क्या सुनाये,
कि मेरे तट पर जो लोग आए,
जिन्होंने ऐसे नियम बनाए,
प्राण जाए पर वचन न जाए
गंगा हमारी कहे बात ये रोते-रोते
राम तेरी गंगा मैली हो गयी
पापियों के पाप धोते-धोते
[टाईटल सांग - 'राम तेरी गंगा मैली' -----
सुरेश वाडेकर वाले वर्जन के शुरू में कोरस]
[इस गाने के अंतरे में --- 'जिस देश में गंगा बहती है' की
ये पंक्ति है --> "हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है..... न तो होठों पे सच्चाई, न ही दिल में सफाई...."
F-  सुरेश वाडकर
G-  राज कपूर
H-  फिल्म - जिस देश में गंगा बहती है
I-  "होठों पे सच्चाई रहती है..."
J-  मुकेश


पिछली पहेली के विजेता

नवे सेगमेण्ट के पहले अंक की गीतों भरी गूगली शायद प्रतियोगियों पर भारी पड़ा और अधिकतर प्रतियोगी क्लीन बोल्ड हो गए। जी हाँ, इस पहेली के जवाब में केवल चार प्रतियोगी के ईमेल हमें प्राप्त हुए, और उनमें केवल दो प्रतियोगियों ने पहेली का 100% सही जवाब दिया। सबसे पहले सही जवाब देकर इस बार 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं लखनऊ के श्री प्रकाश गोविंद। बीकानेर के श्री विजय कुमार व्यास के भी जवाब सही हैं। स्कोरकार्ड इस प्रकार रहा...



कौन बनेगा 'सिने पहेली' महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स। इस प्रतियोगिता के 81 एपिसोड्स पूरे हो चुके हैं, आज है 82वाँ एपिसोड।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जोड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेता के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। आठवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा-



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी 'सिने पहेली' में। लेकिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के अन्य स्तंभ आपके लिए पेश होते रहेंगे हर रोज़। तो बने रहिये हमारे साथ और सुलझाते रहिये अपनी ज़िंदगी की पहेलियों के साथ-साथ 'सिने पहेली' भी, लता जी को जनमदिन की एक बार फिर से हार्दिक शुभकामनायें देते हुए अनुमति चाहूँगा, नमस्कार!


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

पूरी रात पार्टी का इंतजाम लेकर आया है 'बॉस'

क्षय कुमार अपने खिलाड़ी रूप में फिर से लौट रहे हैं फिल्म बॉस के साथ. लगता है उन्हें हनी सिंह का साथ खूब रास आ रहा है. तभी तो पूरी एल्बम का जिम्मा उन्होंने हनी सिंह के साथ मीत ब्रोस अनजान को सौंपा है. फिल्म हिट मलयालम फिल्म पोखिरी राजा का रिमेक है, यहाँ अक्षय हरियाणा के पोखिरी यानी टपोरी बने हैं. आईये देखें इस बॉस को कैसे कैसे गीत दिए हैं हनी सिंह ने.

शीर्षक गीत बॉस को बखूबी परिभाषित करता है. हनी सिंह का हरियाणवी तडका अच्छा जमा है. गीत में पर्याप्त ऊर्जा और जोश है. शब्द एवें ही है पर शायद जानकार ऐसा रखा गया है.

दक्षिण के जाने माने संगीतकार पी ए दीपक के मूल गीत अपदी पोडे पोडे का हिंदी संस्करण है अगला गीत हम न छोड़े तोड़े, जिसे पूरे दम ख़म से गाया है विशाल ददलानी ने. शब्द अच्छे बिठाए गए है, पर मूल गीत इतनी बार सुना जा चुका है कि गीत कुछ नया सुनने का एहसास नहीं देता. दूसरे अंतरे से पहले अक्षय से बुलवाए गए संवाद बढ़िया लगते हैं.

सोनू निगम इन दिनों बेहद कम गीत गा रहे हैं ऐसे में किसी अच्छे गीत में उन्हें सुनना वाकई सुखद लगता है. एल्बम के तीसरे गीत पिता से है नाम तेरा एक भाव प्रधान गीत है जिसमें क्लास्सिकल और सूफी अंदाज़ को भी घोला गया है.

एल्बम का सबसे तारो ताज़ा और कदम थिरकाने वाला गीत है पार्टी ऑल नाईट. हालंकि शब्द खासे आपत्तिजनक हैं पर ठेठ हरियाणवी अंदाज़ का ये गीत हनी सिंह के मशहूर स्टाइल का है. कौन कहता है कि जट्टां दी भाषा लट्टमार होती है. सुरों में पिरो दो सब कुछ सुरीला ही सुनाई देता है. बेशक हनी सिंह के नाम से बहुत से लोग नाक भौ चढा लेते हैं, पर उनके ऐसे गीत सुनकर वाकई शरीर को थिरकने से रोक पाना बेहद मुश्किल है. आने वाले त्योहारों और शादियों के मौसम में ये गीत जम कर बजने वाला है ये तय है.

नब्बे के दशक के हिट गीत हर किसी को नहीं मिलता को एक नए रूप में पेश किया गया है एल्बम में. दो संस्करण है क्रमशः निखिल और अरिजीत की आवाजों में. एक बेहद यादगार गीत को कुछ अलग अंदाज़ में पेश कर आज की पीढ़ी के लिए भी इसे जिंदा किया गया है. अरिजीत वाले संस्करण में नीति मोहन की आवाज़ बेहद दिलचस्प लगी है.

बॉस का संगीत खालिस मस्ती और नाचने गाने के लिए ही है. जाहिर है लंबे समय तक इन्हें याद नहीं रखा जायेगा.

एल्बम के बेहतरीन गीत : पार्टी ऑल नाईट, हर किसी को नहीं मिलता

हमारी रेटिंग : ३.४   

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी   

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

मुंशी प्रेमचंद कृत शिकारी राजकुमार

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने माधवी चारुदत्ता के स्वर में मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित व्यंग्य "मोटर की छींटें" सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित रोचक कहानी शिकारी राजकुमार जिसे स्वर दिया है माधवी चारुदत्ता ने।

प्रस्तुत कहानी का गद्य "भारत डिस्कवरी" पर उपलब्ध है। "शिकारी राजकुमार" का कुल प्रसारण समय 23 मिनट 33 सेकंड है। सुनिए और बताइये कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।





मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
 ~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)


हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी


"मृग पृथ्वी पर पड़ा तड़प रहा था और उस अश्वारोही की भयंकर और हिंसाप्रिय आँखों से प्रसन्नता की ज्योति निकल रही थी।”
 (मुंशी प्रेमचंद कृत "शिकारी राजकुमार" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
शिकारी राजकुमार MP3

#31st Story, Shikari Rajkumar: Munshi Premchand Hindi Audio Book/2013/31. Voice: Madhavi Charudatta

रविवार, 22 सितंबर 2013

‘प्रभु तेरो नाम जो ध्याये फल पाए...’


  
स्वरगोष्ठी – 138 में आज

रागों में भक्तिरस – 6

राग धानी का रंग : लता मंगेशकर और लक्ष्मी शंकर के संग


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे संगीत के शास्त्रीय मंचों पर कम प्रचलित राग धानी पर चर्चा करेंगे। आज हम आपको इस राग में निबद्ध सुप्रसिद्ध गायिका लक्ष्मी शंकर के स्वरों में एक खयाल सुनवाएँगे। साथ ही इस राग पर आधारित, 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘हम दोनों’ से एक बेहद लोकप्रिय भक्तिगीत विख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। आपको याद ही होगा कि आगामी 28 सितम्बर को कोकिलकंठी गायिका लता मंगेशकर का जन्मदिवस है। इस अवसर के लिए हमने पिछले अंक में और आज के अंक में भी लता जी के ही उत्कृष्ट गीतों का चुनाव किया है।  

फिल्म संगीत में रागों के समिश्रण के बावजूद गीत को जन-जन के बीच लोकप्रिय स्वरूप देने में संगीतकार जयदेव का कोई विकल्प नहीं था। 1961 में प्रदर्शित नवकेतन की फिल्म ‘हम दोनों’ में उनके संगीतबद्ध गीतों को आशातीत सफलता मिली। इस फिल्म के प्रायः सभी गीतों में जयदेव ने विभिन्न रागों का स्पर्श किया था। फिल्म में राग बिलावल पर आधारित गीत- ‘मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया...’, यमन कल्याण पर आधारित- ‘अभी ना जाओ छोड़ कर...’ और ‘जहाँ में ऐसा कौन है...’ बेहद लोकप्रिय हुए थे। परन्तु इस फिल्म के दो भक्तिगीत तो कालजयी सिद्ध हुए। पहला भजन गाँधीवादी विचारधारा से प्रेरित और राग गौड़ सारंग के स्वरों में पिरोया हुआ- ‘अल्ला तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम...’ था। फिल्म का दूसरा भक्तिरस प्रधान गीत था-‘प्रभु तेरो नाम जो ध्याये फल पाए...’, जिसे संगीतकार जयदेव ने राग धानी के स्वरों में बाँध कर एक अलौकिक स्वरूप प्रदान किया। आज हमारी चर्चा में यही गीत है। फिल्म ‘हम दोनों’ के इन भक्तिरस से परिपूर्ण गीतों को लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। फिल्म के इन गीतों से एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। सचिनदेव बर्मन से कुछ मतभेद के कारण उन दिनों लता मंगेशकर ने उनकी फिल्मों में गाने से मना कर दिया था। बर्मन दादा के सहायक रह चुके जयदेव ने इस प्रसंग में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पहले तो लता जी ने जयदेव के संगीत निर्देशन में गाने से मना कर दिया, परन्तु जब उन्हें यह बताया गया कि यदि ‘हम दोनों’ के गीत लता नहीं गाएँगी तो फिल्म से जयदेव को ही हटा दिया जाएगा। यह जान कर लता जी गाने के लिए तैयार हो गईं। उन्हें यह भी बताया गया कि भक्तिरस में पगे इन गीतों के लिए जयदेव ने अलौकिक धुनें बनाई है। अब इसे लता जी कि उदारता मानी जाए या व्यावसायिक कुशलता, उन्होने इन गीतों को अपने स्वरों में ढाल कर कालजयी बना दिया। अब हम आपको साहिर लुधियानवी का लिखा, जयदेव द्वारा राग धानी के स्वरों में पिरोया और लता मंगेशकर का गाया यही गीत सुनवाते हैं। यह गीत अभिनेत्री नन्दा पर फिल्माया गया था।


राग धानी : ‘प्रभु तेरो नाम जो ध्याये फल पाए...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – हम दोनो 



मुख्य रूप से श्रृंगाररस के विरह पक्ष को उकेरने में सक्षम राग धानी भक्तिरस का सृजन करने में भी सक्षम होता है। उत्तर भारतीय संगीत में धानी नाम से प्रचलित यह राग कर्नाटक संगीत में राग शुद्ध धन्यासी के नाम से पहचाना जाता है। राग धानी का प्राचीन स्वरूप इस दक्षिण भारतीय राग के समतुल्य है। कुछ विद्वान इस राग को उदय रविचन्द्रिका नाम से भी सम्बोधित करते हैं। राग धानी काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग के दो स्वरूप प्रचलित है। प्राचीन स्वरूप के अन्तर्गत यह राग औड़व-औड़व जाति काहै। अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग वर्जित होता है। वर्तमान में प्रचलित इस राग के आरोह में पाँच किन्तु अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। अर्थात इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। परन्तु राग के इस रूप में ऋषभ और धैवत का अल्प प्रयोग ही किया जाता है। राग धानी में गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किए जाते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। दिन के चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले इस राग के स्वर समूह मन की उलझन, भटकाव और पुकार जैसे भावों की अभिव्यक्ति में सहायक होते हैं। अब हम आपको राग धानी में एक खयाल सुनवाते हैं। पटियाला घराने की गायकी में दक्ष गायिका लक्ष्मी शंकर ने राग धानी, झपताल में इस खयाल को प्रस्तुत किया है। इस रचना में कृष्ण-भक्त नायिका को उनके आगमन की प्रतीक्षा का भाव है। आप भक्तिरस के एक भिन्न रूप से साक्षात्कार कीजिए और मुझे आज इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग धानी : ‘अबहूँ न आए श्याम...’ : विदुषी लक्ष्मी शंकर 




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 138वें अंक की पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत पर प्रस्तुत एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 140वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – वाद्य संगीत की यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – गायकी अंग में प्रस्तुत संगीत की इस रचना का अंश सुन कर बताइए कि इस बेहद चर्चित भक्तिगीत के बोल अर्थात आरम्भिक पंक्ति क्या है?

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

 
‘स्वरगोष्ठी’ के 136वें अंक की पहेली में हमने आपको उस्ताद सईदुद्दीन डागर द्वारा प्रस्तुत एक ध्रुवपद रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरव और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल सूल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग धानी के भक्तिरस के पक्ष पर चर्चा की। आगामी अंक में हम एक और भक्तिरस प्रधान राग में गूँथी रचनाएँ लेकर उपस्थित होंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की सातवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 21 सितंबर 2013

'सिने पहेली' में आज आप पर फेंक रहे हैं गीतों भरी गूगली

सिने पहेली – 81

  

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक लम्बे अन्तराल के बाद मैं वापस 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर उपस्थित हुआ हूँ, और 'सिने पहेली' में वापस आकर मुझे बेहद ख़ुशी हो रही है। सबसे पहले मैं अमित तिवारी जी का तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ कि उन्होंने मेरी अनुपस्थिति में 'सिने पहेली' के सफ़र को जारी तो रखा ही, इसके मिज़ाज को ज़रा सा भी ठंडा नहीं पड़ने दिया और इस मुकाबले की रोचकता को बनाये रखा।

पिछले दिनों सरताज प्रतियोगी को एक अंक दिये जाने के सुझाव पर मतभेद सामने आया है। अत: हमारे सम्पादक मण्डल ने सर्वसम्मति से सरताज प्रतियोगी को एक अंक दिये जाने का प्रस्ताव रद्द कर दिया है। साथ ही यह निर्णय लिया है कि अब 'सिने पहेली' की समाप्ति तक इसके किसी भी नियम में न तो फेर-बदल किये जायेंगे और न ही कोई नया नियम लागू होगा। आशा है इस फ़ैसले का सभी प्रतियोगी समर्थन करेंगे।

आइए सबसे पहले आपको बतायें पिछले सप्ताह पूछे गए सवालों के सही जवाब...


पिछली पहेली के सही जवाब

'गीत अपने धुन पराई' शीर्षक के अन्तर्गत हमने आपसे पूछे थे 10 सवाल, जिनके सही जवाब इस प्रकार हैं-

1. प्यार की पुंगी बजा कर (एजेण्ट विनोद) -- Soosan Khanoom
2. ज़रा ज़रा टच मी टच मी (रेस) -- In the Depths of the Bamboo Forest
3. प्यार की घंटी (बेशरम) --- Bella Ciao
4. झिलमिल सितारों ने कहा (खोटे सिक्के) -- Raindrops Keep Falling On My Head
5. हरि ओम हरि (प्यारा दुश्मन) -- One way ticket
6. पहली बार मिले हैं (साजन) -- Solitude Standing
7. जय माँ काली (करण अर्जुन) -- It's alright by East 17
8. तेरा मुझसे है पहले (आ गले लग जा) -- The Yellow Rose of Texas 
9. सूट बूट में आया कन्हैया (किशन कन्हैया) -- The Belle Stars - Iko Iko
10. चांस पे डान्स मार ले (रब ने बना दी जोड़ी) -- Insomnia


सबसे पहले सभी सवालों के सही जवाब दे कर इस सप्ताह 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं लखनऊ के श्री प्रकाश गोविंद। बहुत बहुत बधाई आपको! 
आठवें सेगमेण्ट की समाप्ति पर अंक तालिका इस प्रकार रही-



तो इस तरह से आठवें सेगन्मेण्ट के तीन विजेताओं के नाम ये रहे-

प्रथम स्थान

प्रकाश गोविन्द, लखनऊ


द्वितीय स्थान

पंकज मुकेश, बेंगलुरू


तृतीय स्थान

विजय कुमार व्यास, बीकानेर


बहुत बहुत बधाई आप तीनो को, और इस सेगमेण्ट में भाग लेने वाले सभी प्रतियोगियों को भी बहुत बधाई और धन्यवाद। इसी तरह से अगले दो सेगमेण्टों में भी जुड़े रहिये हमारे साथ।

'सिने पहेली' का सफ़र अब अपनी मंज़िल की तरफ़ बड़ी तेज़ी से बढ़े चला जा रहा है। अब बस 20% का सफ़र ही शेष रह गया है। काँटे की टक्कर जारी है, और महा-मुकाबले में कौन किसे मात दे जाये कुछ भी कहा नहीं जा सकता। आप सब बस इस प्रतियोगिता के हिस्सेदार बने रहिए और आनन्द लीजिए इस निर्मल आनन्द का।

'सिने पहेली-81' के सवाल पर जाने से पहले एक नज़र महाविजेता बनने के नियमों को एक बार फिर हम दुहरा देते है।

कौन बनेगा 'सिने पहेली' महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स। इस प्रतियोगिता के 80 एपिसोड्स पूरे हो चुके हैं, आज है 81वाँ एपिसोड।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जोड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेता के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। आठवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा-


4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

तो आइए अब पूछा जाये 'सिने पहेली - 81' की पहेली-

आज की पहेली : गीतों भरी गूगली

पार्श्वगायिका "A" और संगीतकार "B" की मशहूर जोड़ी की अन्तिम फ़िल्म रही "C"। "C" में छह शब्द हैं। "C" एक अन्य फ़िल्म "D" के शीर्षक गीत "E" के शुरुआती पंक्ति (मुखड़े से पहले की पंक्ति) में आता है। "E" के दो संस्करण हैं, महिला संसकरण में आवाज़ है लता मंगेशकर की, जबकि पुरुष संस्करण को गाया है "F" ने। "D" के निर्देशक "G" हैं। "G" द्वारा निर्मित एक पुरानी फ़िल्म "H" का शीर्षक गीत है "I" जिसके मुखड़े के एक अंश का प्रयोग "E" गीत के एक अन्तरे में हुआ है (इस अंश में "H" शामिल है)। "E" और "I" गीतों के भाव एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं; अगर "I" में आशावाद, देशभक्ति और गर्व का अहसास है तो "E" में निराशा और सामाजिक पतन के स्वर हैं। "I" गीत के गायक हैं "J", जिनके पुत्र एक गायक हैं और पोता एक अभिनेता। क्या आप पहचान सकते हैं A, B, C, D, E, F, G, H, I और J को? 
यही है आज की पहेली। कुल अंक है 10.



जवाब भेजने का तरीका


उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 81" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। नए प्रतियोगी अपना प्रोफाइल अवश्य भेजें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 26 सितंबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह सुबह 9 बजे फिर मुलाक़ात होगी 'सिने पहेली' में। लेकिन 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के अन्य स्तंभ आपके लिए पेश होते रहेंगे हर रोज़। तो बने रहिये हमारे साथ और सुलझाते रहिये अपनी ज़िंदगी की पहेलियों के साथ-साथ 'सिने पहेली' भी, नमस्कार!

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

लव की घंटी बजा रहे हैं ललित कुछ 'बेशरम' होकर

90 के दशक की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में इस जोड़ी का संगीत था, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे , कुछ कुछ होता है, जो जीता वही सिकंदर  जैसी फिल्मों के नाम जुबाँ पे आते ही याद आते हैं जतिन ललित. फना  के बाद दोनों भाईयों ने अलग अलग काम करने का फैसला लिया, और अब एक लंबे अरसे बाद ललित लौटे हैं रणबीर कपूर अभिनीत बेशरम  के साथ. देखें क्या ललित अकेले दम पर वही पुराना सुरीला जादू फिर से पैदा कर पाए हैं या नहीं.   

जैसा कि हम बता चुके हैं कि ललित फिल्म के प्रमुख संगीतकार हैं पर यहाँ एक अतिथि संगीतकार के रूप में इश्क बेक्टर भी मौजूद हैं और इन्हीं का है शीर्षक गीत बेशरम . धुन कैची है, शब्द बेतरतीब हैं, ८० के दशक जैसा टेम्पो है गीत का, और फिल्म के शीर्षक गीत के रूप में एकदम सटीक है.

रणबीर पर फिल्माए ताजा हिट गीत दिल्ली वाली गर्ल फ्रेंड  की तर्ज पर ही लगता है हम लुट गए रे पिया आके तेरे मोहल्ले  गीत भी. तेज रिदम पर ममता शर्म और एश्वर्या निगम की दिलफेंक गायकी गीत को एक चार्टबस्टर बनाने में पूरी तरह समर्थ है.

किशोर कुमार के चुलबले गीतों का अंदाज़ झलकता है लव की घंटी   गीत में. सुजीत शेट्टी के साथ खुद रणबीर की भी आवाज़ है गीत में. राजीव बरनवाल ने शब्द भी अच्छे गढे है यहाँ. सुजीत की गायिकी में संभावनाएं नज़र आती है. इस तरह के खिलंदड गीतों को निभाना आसान नहीं है, हालांकि धुन चुराई हुई है और खुद ललित भी इसे स्वीकार कर चुके हैं, तो हम ललित को इस गीत के लिए बधाई देना जरूरी नहीं समझते.

ललित अपने स्वाभाविक फॉर्म में नज़र आते हैं अगले गीत दिल का जो हाल है  , गीत रोमांटिक तो है पर चुलबुला भी. पर अभिजीत और श्रेया की आवाज़ में वो जरूरी विरोधाभास नज़र नहीं आता. शब्द भी औसत हैं. बड़े नामों के बावजूद गीत सामान्य ही लगता है.

श्रेया पिछले गीत की कमी को सोनू के साथ पूरा करती नज़र आती है तू है  गीत में, बेहतर और अधिक सुरीला है ये गीत जहाँ धुन शब्द और गायिकी सभी एक दूसरे को जरूरी साथ देते हुए प्रतीत होते हैं, गीत में सोनू की आवाज़ बहुत देर बाद प्रवेश करती है, पर उन्हीं का गायन गीत को मुक्कमल करती है यहाँ.

श्रेया एक बार सुनाई देती है जोशीले मिका के साथ. मराठी लोक धुन पर आधारित गीत आ रे आ रे एक बार फिर औसत ही लगता है. हालाँकि गायकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है पर गीत में नयेपन का अभाव है.

तडके में कहीं कमी न रह जाए तो ललित ले आये मिका और सीनियर मेहदी के साथ. चल हैंड उठा के नचे  एक जोशीला डांस गीत है, जो सुनने से अधिक देखने में अधिक सुखद लगेगा. बेशरम का संगीत फिल्म के अनुरूप है, शायद लंबे समय तक दिल पर टिके रहने का दम ख़म न हों इनमें पर फिल्म को जरूरी ताम झाम देने में पूरी तरह समर्थ है. ललित यहाँ प्रीतम 'मोड' में हैं.

एल्बम के बहतरीन गीत - लव की घंटी, मोहल्ले, बेशरम 
हमारी रेटिंग - ३.७ 

बुधवार, 18 सितंबर 2013

कब तक न हँसेगी गुडिया...

रूठ जाए कभी जो नन्हीं गुडिया तो उसे मनाने से बड़ा कोई काम नहीं. वो हंसी जो नित होंठो पर खिली मिलती है कुछ पल को कभी पलकों के तले तो कभी आँखों के किनारे छुप सी जाती है, पर यकीन मानिये वो लौट भी आती है झट से अगर उसे इस तरह बुलाओगे तो....सुनिए लता के स्वरों में एल पी का रचा, मजरूह का लिखा ये नटखट सा गीत, प्रस्तुतकर्ता हैं अर्शिना सिंह
  

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

मुंशी प्रेमचंद की मोटर की छींटें

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा के स्वर में रयुनासुके अकुतागावाकी जापानी कहानी "संतरे" का हिंदी अनुवाद सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित व्यंग्यात्मक कहानी मोटर की छींटें जिसे स्वर दिया है माधवी चारुदत्ता ने।

प्रस्तुत व्यंग्य का गद्य "भारत डिस्कवरी" पर उपलब्ध है। "मोटर की छींटें" का कुल प्रसारण समय 11 मिनट 17 सेकंड है। सुनिए और बताइये कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।





मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
 ~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)


हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी


"जजमान का दिल देखकर ही मैं उनका निमंत्रण स्वीकार करता हूँ ... ”
 (मुंशी प्रेमचंद कृत "मोटर की छींटें" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
मोटर की छींटें MP3

#30th Story, Motor Ki Chhinten : Munshi Premchand Hindi Audio Book/2013/30. Voice: Madhavi Charudatta

रविवार, 15 सितंबर 2013

स्वरगोष्ठी – 137 में आज : ‘मन रे हरि के गुण गा...’


 
स्वरगोष्ठी – 137 में आज

रागों में भक्तिरस – 5

ध्रुवपद अंग में राग भैरव का रंग


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे राग भैरव पर चर्चा करेंगे जो भक्तिरस की सृष्टि करने में सबसे उपयुक्त राग है। भारतीय संगीत के इस प्राचीनतम राग में आज हम आपको एक ध्रुवपद रचना सुनवाएँगे। साथ ही इस राग पर आधारित, 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुसाफिर’ से एक मधुर भक्तिगीत प्रस्तुत करेंगे। 


स श्रृंखला के पिछले अंकों में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वर्तमान भारतीय संगीत की परम्परा वैदिक काल से जुड़ी है। उस काल के उपलब्ध प्रमाणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्कालीन संगीत का स्वरूप धर्म और आध्यात्म से प्रभावित था। वैदिक युग के बाद भारतीय संगीत का अगला पड़ाव पौराणिक युग में होता है। इस युग में जनसामान्य का झुकाव शास्त्रगत संगीत की अपेक्षा लोक-गीत और नृत्य की ओर अधिक हुआ। इस प्रवृत्ति को और अधिक स्पष्ट करते हुए हैलीन कॉफमैन ने ‘दी म्यूजिक ऑफ आर्य’ नामक पुस्तक में लिखा है कि पौराणिक युग में लोक-गीत और लोक-नृत्यों का सर्वाधिक विकास हुआ था। इन विधाओं में स्थानीय रुचियों का पूरा ध्यान रखा जाता था। इस युग में लिखे ‘हरिवंश पुराण’ में नृत्य और मार्कण्डेय पुराण, वायु पुराण तथा वृहद्धर्म पुराण में वाद्य संगीत का विस्तृत उल्लेख मिलता है। जैन साहित्य में उल्लेख है कि इस युग में वीणा का सर्वाधिक प्रचार हुआ। वीणा के विविध प्रकार- परिवादिनी, विपंची, बल्लकी, महती, नकुली, कच्छपी आदि लोकप्रिय थे।

आज हम आपसे राग भैरव की चर्चा करेंगे। प्राचीन ग्रन्थों में भैरव को प्रथम राग माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस राग का सृजन स्वयं भगवान शिव ने किया था। यह प्रातःकालीन राग है, अर्थात सूर्योदय के पश्चात इस के गायन-वादन की परम्परा है। आजकल अधिकतर संगीत सभाओं और गोष्ठियों का आयोजन आम तौर पर सायंकाल या रात्रि में किया जाता है। इस कारण राग भैरव सुनने का अवसर कम मिलता है। सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के राग भैरव में ऋषभ और धैवत स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। कुछ विद्वानो के अनुसार प्राचीन काल में भैरव में शुद्ध निषाद (वर्तमान स्वरूप) के स्थान पर कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता था। राग के अवरोह में वक्रगति का प्रयोग किया जाता है। राग भैरव में जोगिया की तरह शुद्ध मध्यम पर ठहराव नहीं दिया जाता। राग कलिंगड़ा इससे मिलता-जुलता राग है। आइए, अब हम आपको राग भैरव के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते है।

आज हम आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘मुसाफिर’ से राग भैरव पर आधारित एक गीत लता मंगेशकर के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह कीर्तन शैली का भक्ति गीत है, जिसके संगीतकार सलिल चौधरी थे। राग भैरव को आधार बना कर सलिल चौधरी ने फिल्म ‘जागते रहो’ में भी एक आकर्षक गीत- ‘जागो मोहन प्यारे...’ तैयार किया था, जो आज भी लोकप्रिय है। यह गीत हम कई अवसरों पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ से प्रस्तुत कर चुके है। आज उन्हीं सुरीले संगीतकार का राग भैरव पर आधारित यह दूसरा गीत सुनिए। इस गीत में बंगाल के लोकप्रिय ताल वाद्य ‘खोल’ का प्रयोग कहरवा ताल में किया गया है। गीत में आपको एकाध स्थान पर राग जोगिया का स्पर्श भी परलक्षित होगा, किन्तु गीत का ढाँचा राग भैरव के स्वरों में है। इस गीत से जुड़े दो तथ्य भी उल्लेखनीय हैं। आगामी 28 सितम्बर को कोकिलकंठी गायिका लता मंगेशकर का जन्मदिन है। भक्तिरस से पगे उनके इस गीत के माध्यम से हम उन्हें शुभकामनाएँ अर्पित करते हैं। इसके साथ ही फिल्म ‘मुसाफिर’ सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की प्रथम निर्देशित फिल्म थी। आगामी 30 सितम्बर को उनकी 91वीं जयन्ती है। इस गीत के माध्यम से हम उस महान फ़िल्मकार की स्मृतियों को नमन करते हैं। लीजिए, आप यह गीत सुनिए।



राग भैरव : ‘मन रे हरि के गुण गा...’ : लता मंगेशकर : फिल्म मुसाफिर




वर्तमान में भारतीय संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, उनमें ध्रुपद अथवा ध्रुवपद शैली सबसे प्राचीन है। प्राचीन ग्रन्थों में प्रबन्ध गीत शैली का उल्लेख मिलता है। ध्रुवपद या ध्रुपद का जनक इसी प्रबन्ध गीत को माना जाता है। ध्रुवपद शैली की विशिष्ट पद रचना और गायन पद्यति का विकास ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के काल (1468-1516 ई.) में उन्हीं के प्रयासों से हुआ था। वे मध्ययुगीन पद शैली के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। राजा मानसिंह स्वयं एक संगीतज्ञ थे, इसलिए उनके द्वारा प्रवर्तित शैली में परम्परा की उपेक्षा नहीं की गई थी। उन्होने प्राचीन शास्त्र को ही आधार मान कर ध्रुवपद शैली का विकास किया था। आगे चल कर ध्रुवपद शैली चार भिन्न बानी (वाणी), गौरहार, डागर, खण्डहार और नौहार बानी के नाम से विकसित हुई। आज के अंक में हम आपके लिए डागरबानी के अन्तर्गत राग भैरव का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। डागर परिवार के सुविख्यात साधक उस्ताद सईदुद्दीन डागर के स्वरों में सुनिए, राग भैरव में निबद्ध ध्रुवपद। सूल ताल में पखावज संगति उद्धवराव आपेगाँवकर ने किया है। आप राग भैरव में यह ध्रुवपद सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग भैरव : ‘मध आली मध अन्त शिव आली...’ : उस्ताद सईदुद्दीन डागर





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 137वीं संगीत पहेली में हम आपको एक भक्तिरस प्रधान खयाल रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – यह खयाल रचना किस ताल में प्रस्तुत की गई है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 139वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 135वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित जसराज के स्वरों में प्रस्तुत एक स्तुतिगीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग दरबारी कान्हड़ा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित जसराज। इस अंक के दोनों प्रश्नो के उत्तर एक लम्बे अन्तराल के बाद मिन्नेसोटा, U.S.A से दिनेश कृष्णजोइस, हमारे नियमित प्रतिभागी जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपको राग भैरव की चर्चा करते हुए इस राग की दो रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपको एक कम प्रचलित राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्ति और श्रृंगार, दोनों रसों की रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र
 

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