रविवार, 28 मार्च 2021

स्वरगोष्ठी – 507: "सीमायें बुलायें तुझे, चल राही ..." : राग - देश/ देस :: SWARGOSHTHI – 507 : RAG - DES

           



स्वरगोष्ठी – 507 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 11 

"सीमायें बुलायें तुझे, चल राही...", राग देश में सिपाही के नाम संदेश सीमा से




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की दस कड़ियों में राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण, जोगिया, काफ़ी, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, देश/देस और देस मल्हार पर आधारित देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी, जिसमें राग देश की चर्चा जारी रहेगी। जावेद अख़्तर का लिखा और अनु मलिक द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म ’LoC Kargil' का गीत "सीमायें बुलायें तुझे, चल राही, सीमायें पुकारे सिपाही..." की चर्चा के साथ-साथ राग देश की एक रचना उस्ताद राशिद ख़ान की आवाज़ में। 


Alka Yagnik, Anu Malik
देश
 पर मर मिटने वाले सिपाहियों का बलिदान जितना महान होता है, उनके परिवार जनों का त्याग भी किसी माईने में कम नहीं होता। उत्सव-त्योहारों में जब हर कोई अपने पूरे परिवार के साथ ख़ुशियाँ मना रहा होता है, तब सीमा पर तैनात सिपाही के गाँव में उसकी बीवी, उसके बच्चे, उसके माँ-बाप, के लिए वह त्योहार उसके बिना किस तरह का होता होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। जब छुट्टियों के बीच में ही एक दिन अचानक सीमा से फ़ोन आ जाए कि आज ही सिपाही को सीमा पर लौटना है, तब सिपाही के परिवार वालों पर क्या बीतती होगी! बच्चे, जो अपने पिता के कन्धों पर उछल-कूद कर रहे थे यह सोच कर कि अभी तो पापा कई दिन और रहेंगे हमारे साथ, उस फ़ोन कॉल के आते ही जैसे अचानक मायूसी छा जाती है उन कोमल दिलों पर। और सिपाही की पत्नी? वो तो ना किसी से कुछ कह पाती है, बस अन्दर ही अन्दर घुटती है। और अपने सिपाही पति के सकुशल वापस लौटने की ईश्वर से प्रार्थना करती है। कुछ ऐसे ही जज़्बात फ़िल्म ’LoC कारगिल’ के एक गीत में सुनने को मिला। अलका यागनिक और साथियों की आवाज़ों में जावेद अख़्तर का लिखा और अनु मलिक का संगीतबद्ध किया हुआ यह गीत है "सुनो जाने वाले, लौट के आना, कोई राह देखे, भूल न जाना, तुम बिन पल पल, रहूंगी मैं बेकल, बनके बिरहन, संग है तुम्हारे मेरे देश के सिपाही, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन..."।

वर्ष 1997 में फ़िल्म ’Border' में "संदेसे आते हैं", "ऐ जाते हुए लम्हों", "हमें जब से मोहब्बत हो गई है", और फिर वर्ष 2000 में फ़िल्म ’Refugee' में "पंछी नदिया पवन के झोंके" जैसे सिपाही के जीवन से सम्बन्धित गीत रचने के बाद जावेद अख़्तर और अनु मलिक ने जैसे इस जौनर के गीतों में महारथ हासिल कर ली थी। शायद इसीलिए जब वर्ष 2002 में ’LoC Kargil' के निर्माण की योजना बनी, तब जावेद अख़्तर और अनु मलिक ही निर्माता की पहली पसन्द बने। और इन दो कलाकारों ने फिर एक बार साबित किया कि इस तरह के गीतों के लिए उनका कोई सानी नहीं है। "एक साथी और भी था", "प्यार भरा गीत कोई, "मैं कहीं भी रहूँ", "तुम्हें क़सम है, तुम ख़ुश रहना", और "सीमायें बुलायें", हर गीत आधारित है सिपाही की ज़िन्दगी के अलग-अलग पहलू पर। अलका यागनिक की आवाज़ में राग देश आधारित "सुनो जाने वाले" कलेजा चीर कर रख देता तो है ही, गीत सुनते हुए आंखें नम हो जाती हैं, और दूसरी तरफ़ कोरस का "सीमायें बुलायें तुझे चल राही" जैसे रोंगटे खड़े कर देता है।
 



गीत : “सीमायें बुलायें तुझे, चल राही...” , फ़िल्म : LoC कारगिल, गायक: अलका यागनिक, साथी 


फ़िल्म ’LoC कारगिल’ के इस सुमधुर गीत में राग देश का स्पष्ट प्रयोग आपने अनुभव किया होगा। "सीमायें बुलाये..." पंक्ति में मार्च-पास्ट जैसा रीदम होते हुए भी राग देश है और अलका यागनिक के "सुनो जाने वाले" में भी राग देश है। दो बिलकुल अलग तरह की धुन प्रतीत होने के बावजूद दोनों में ही राग देश साफ़ सुनाई दे जाता है। इस गीत के लिए संगीतकार अनु मलिक की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। गीत में कहीं कहीं तिलक कामोद की हल्की छाया का आभास भी होता है, शायद खमाज थाट का राग होने की वजह से। देश अथवा देस खमाज थाट का राग माना जाता है। इस राग में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। इसके आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। राग-विवरण में यह बताया गया है कि आरोह में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है, किन्तु राग के सौन्दर्य के लिए कभी-कभी इस नियम का उल्लंघन किया जाता है, अर्थात आरोह में भी उन्हें प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार अथवा धैवत स्वर प्रयोग करते समय मींड़ और द्रुत स्वरों का प्रयोग किया जाता है। यह चंचल प्रकृति का राग है, अतः इसमें अधिकतर द्रुत खयाल और ठुमरी का गायन-वादन किया जाता है। कुछ विद्वान राग देश का वादी-संवादी स्वर क्रमशः पंचम और ऋषभ मानते हैं। किन्तु “राग परिचय” पुस्तक के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव इसे उचित नहीं मानते। श्री श्रीवास्तव के अनुसार राग देश पूर्वांग प्रधान राग है, अतः इसका चलन सप्तक के पूर्वांग में अधिक होता है। साथ ही इसके गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है, अर्थात यह समय दिन के पूर्व अंग में आता है, इसलिए इसका वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में और संवादी स्वर स्वर उत्तरांग में मानना राग-नियम के अनुकूल है। इस राग के अवरोह में अधिकतर ऋषभ स्वर का वक्र प्रयोग होता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम राग देश, की एक बन्दिश और एक तराना सुविख्यात गायक उस्ताद राशिद ख़ान के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके बोल हैं "करम कर दीजे ख़्वाजा मोइनुद्दीन..."



बंदिश : करम कर दीजे ख़्वाजा मोइनुद्दीन...”, राग : देश, गायक : उस्ताद राशिद ख़ान 



अपनी बात

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कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
स्वरगोष्ठी – 507: "सीमायें बुलायें तुझे, चल राही ..." : राग - देश/ देस :: SWARGOSHTHI – 507 : RAG - DES



रविवार, 21 मार्च 2021

स्वरगोष्ठी – 506: "सरफ़रोशी की तमन्ना..." : राग - दरबारी कान्हड़ा और देस/ देस मल्हार :: SWARGOSHTHI – 506 : RAAG - DARBARI KANHDA & DES MALHAR

          



स्वरगोष्ठी – 506 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 10 

"सरफ़रोशी की तमन्ना...", प्रेम धवन ने बांधा दरबारी कान्हड़ा में और रहमान ने देस व देस मल्हार में



“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की नौ कड़ियों में राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण, जोगिया, काफ़ी और भूपाली पर आधारित देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में एक ऐसे देशभक्ति गीत की चर्चा जिसके दो फ़िल्मी संस्करण अलग-अलग रागों पर आधारित हैं। एक संस्करण में अगर दरबारी कान्हड़ा की छाया है तो दूसरे में देस और देस मल्हार का प्रभाव। बिसमिल अज़ीमाबादी का लिखा यह मशहूर देशभक्ति गीत है "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है..."।


"23 मार्च 1931,
 हमारी मातृभूमि को पराधीनता की ज़ंजीरों से आज़ाद करवाने की राह पर शहीद हुए थे देश के तीन वीर सपूत - सरदार भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर। आगामी 23 मार्च 2021 को इन तीन अमर शहीदों की शहादत को पूरे 90 वर्ष हो जाएंगे। ’स्वरगोष्ठी’ का आज का यह अंक समर्पित है इन तीन अमर शहीदों की पुण्य स्मृति को। और क्योंकि इन दिनों ’स्वरगोष्ठी’ पर जारी है श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’, आज के इस अंक के लिए हमने एक ऐसा गीत सुना है जिसके बग़ैर शहीद भगत सिंह पर कोई भी फ़िल्म पूरी नहीं होती। हालांकि "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" राम प्रसाद ’बिसमिल’ का लिखा हुआ है और "सरफ़रोशी की तमन्ना" बिसमिल अज़ीमाबादी का, इन दो गीतों को इनसे अधिक भगत सिंह के साथ जोड़ा जाता है। कारण, भगत सिंह को ये दो गीत अत्यन्त प्रिय थे। आज के इस अंक के लिए हमने चुना है "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है"। भगत सिंह पर जितनी भी फ़िल्में बनी हैं, उन सभी में इस गीत को शामिल किया गया है। उदाहरण स्वरूप, 1954 की फ़िल्म ’शहीद-ए-आज़म भगत सिंह’ में संगीतकार लच्छीराम के संगीत में मोहम्मद रफ़ी ने गाया था यह गीत। 1963 की फ़िल्म ’शहीद भगत सिंह’ में हुस्नलाल भगतराम के संगीत में एक बार फिर रफ़ी साहब ने यह गीत गाया। 1965 की फ़िल्म ’शहीद’ में प्रेम धवन के संगीत में जिन तीन गायकों की आवाज़ें सजीं भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के चरित्रों पर, वे हैं मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे और राजेन्द्र मेहता। 2002 में भगत सिंह पर तीन फ़िल्में बनीं जिनमें भी यह गीत मौजूद था। ’शहीद भगत सिंह’ में संगीतकार जयदेव कुमार के संगीत में  हरभजन मान ने यह गीत गाया, ’23rd March 1931 शहीद’ में संगीतकार आनन्द राज आनन्द के संगीत में हंस राज हंस ने इसे गाया और ’दि लिजेन्ड ऑफ़ भगत सिंह’ में ए. आर. रहमान के संगीत में इसे स्वर दिया सोनू निगम और हरिहरन ने। इस अंक के लिए इनमें से राग आधारित जिन दो गीतों को हमने चुना है, अब उनकी चर्चा की जाए!

1965 की फ़िल्म ’शहीद’ में प्रेम धवन ने बिसमिल के मूल गीत के बोलों को फेर बदल कर एक नए लिबास में पेश किया। मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे और राजेन्द्र मेहता का गाया यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। गीत फ़िल्माया गया था भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के चरित्रों पर जिन्हें परदे पर साकार किया क्रम से, अभिनेता मनोज कुमार, प्रेम चोपड़ा और अनन्त मराठे ने। "सरफ़रोशी की तमन्ना" गीत का यह संस्करण आधारित है राग दरबारी कान्हड़ा पर। राग दरबारी कान्हड़ा आसावरी थाट का राग माना जाता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर सदा कोमल प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध लगते हैं। राग की जाति वक्र सम्पूर्ण होती है। अर्थात इस राग में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। मध्यरात्रि के समय यह राग अधिक प्रभावी लगता है। गान्धार स्वर आरोह और अवरोह दोनों में तथा धैवत स्वर केवल अवरोह में वक्र प्रयोग किया जाता है। कुछ विद्वान अवरोह में धैवत को वर्जित करते हैं। तब राग की जाति सम्पूर्ण-षाडव हो जाती है। राग दरबारी का कोमल गान्धार अन्य सभी रागों के कोमल गान्धार से भिन्न होता है। राग का कोमल गान्धार स्वर अति कोमल होता है और आन्दोलित भी होता है। इस राग का चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक में किया जाता है। हालांकि किसी फ़िल्मी गीत में अति कोमल गान्धार और अति कोमल धैवत की बहुत ज़्यादा उम्मीद करना उचित नहीं है, दरबारी कान्हड़ा को अनुभव करने के लिए यह गीत काफ़ी है।



गीत : “सरफ़रोशी की तमन्ना...” , फ़िल्म : शहीद, गायक: मो रफ़ी, मन्ना डे, राजेन्द्र मेहता


फ़िल्म ’शहीद’ के इस गीत में दरबारी कान्हड़ा की छाया का अनुभव आपने किया होगा। अब हम आते हैं दूसरे गीत पर। यह है सन् 2002 में बनी फ़िल्म ’दि लिजेन्ड ऑफ़ भगत सिंह’ का गीत। इस गीत में "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" के बोलों में गीतकार समीर ने फेर बदल कर गीत अपने नाम कर लिया है। सोनू निगम और हरिहरन की आवाज़ों में इस गीत के दो संस्करण हैं। पहला संस्करण द्रुत लय में है जबकि दूसरा संस्करण धीमा और शास्त्रीय रागों से सजा हुआ है। संगीतकार ए. आर. रहमान ने बड़ी ख़ूबसूरती से राग देस और देस मल्हार का प्रयोग इस संस्करण में किया है।मुखड़ा और दो अन्तरे राग देस पर आधारित है जबकि तीसरे इन्टरल्युड से गीत देस मल्हार पर आधारित हो जाता है। देस मल्हार वाला भाग आधा ताल सोलह मात्रा में निबद्ध है जबकि राग देस वाला भाग आठ मात्रा कहरवा है।

राग देस, भारतीय संगीत का अत्यन्त मनोरम और प्रचलित राग है। प्रकृति का सजीव चित्र उपस्थित करने में यह पूर्ण सक्षम राग है। ’स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में हम राग देस की विस्तृत चर्चा करेंगे, आज हम बात करते हैं देस मल्हार की। यदि इस राग में मल्हार अंग का मेल हो जाए तो फिर 'सोने पर सुहागा' हो जाता है।  राग देस मल्हार के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह स्वतंत्र राग देस और मल्हार अंग के मेल से निर्मित राग है। राग देस अत्यन्त प्रचलित और सार्वकालिक होते हुए भी स्वतंत्र रूप से वर्षा ऋतु के परिवेश का चित्रण करने में समर्थ है। एक तो इस राग के स्वर संयोजन ऋतु के अनुकूल है, दूसरे इस राग में वर्षा ऋतु का चित्रण करने वाली रचनाएँ बहुत अधिक संख्या में मिलती हैं। राग देस औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसमें कोमल निषाद के साथ सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। राग देस मल्हार में देस का प्रभाव अधिक होता है। दोनों का आरोह-अवरोह एक जैसा होता है। इसमे दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। रें नी(कोमल) ध प, ध म ग रे स्वरों से देस की झलक मिलती है। इसके बाद जब रे प ग(कोमल) ग(कोमल) म रे सा और उत्तरांग में म प नी(कोमल) (ध) नी सां के प्रयोग से राग मियाँ मल्हार की झलक मिलती है। मल्हार अंग के चलन और म रे प, रे म, स रे स्वरों के अनेक विविधता के साथ किये जाने वाले प्रयोग से राग विशिष्ट हो जाता है। राग देस की तरह राग देस मल्हार में भी कोमल गान्धार का अल्प प्रयोग किया जाता है। राग का यह स्वरुप पावस के परिवेश को जीवन्त कर देता है। परिवेश की सार्थकता के साथ यह मानव के अन्तर्मन में मिलन की आतुरता को यह राग बढ़ा देता है। तो आइए राग देस और देस मल्हार पर आधारित यह गीत सुनें।




गीत : सरफ़रोशी की तमन्ना...”, फ़िल्म : दि  लिजेन्ड ऑफ़ भगत सिंह, गायक : सोनू निगम, हरिहरन 



अपनी बात

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कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
स्वरगोष्ठी – 506: "सरफ़रोशी की तमन्ना..." : राग - दरबारी कान्हड़ा और देस/ देस मल्हार :: SWARGOSHTHI – 506 : RAAG - DARBARI KANHDA & DES MALHAR: 21 मार्च, 2021



रविवार, 14 मार्च 2021

स्वरगोष्ठी – 505: "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है" : राग भूपाली :: SWARGOSHTHI – 505 : RAG BHUPALI

         



स्वरगोष्ठी – 505 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 9 

"जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है...", राग भूपाली में  स्वर्गतुल्य जन्मभूमि की वन्दना



“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की आठ कड़ियों में राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण, जोगिया और काफ़ी पर आधारित देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की नौवीं कड़ी में राग भूपाली पर आधारित एक फ़िल्मी रचना। और साथ में इसी राग में एक ख़याल रचना कुमार गंधर्व की आवाज़ में।


वसन्त देसाई, भरत व्यास (PC: hamaraphotos.com)
"जननी
 जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी",अर्थात् माता और मातृभूमि अथवा माता रूपी मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर होता है। यह वाल्मीकि रामायण के दो श्लोकों की द्वितीय पंक्ति है। पहला श्लोक है जिसमें भारद्वाज मुनि, श्री राम को सम्बोधित करते हुए कहते हैं:

मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव ।
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
(मित्र, धन्य, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है। (किन्तु) माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।)

दूसरे श्लोक में राम, लक्ष्मण से कहते हैं-

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
(लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। (क्योंकि) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।)

हमारे देश की महान संस्कृति ने हमारी इस धरती को दिए हैं अनगिनत महामानव। इनमें से कुछ महात्मा हमें नेक राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं तो कुछ अपने शौर्य और पराक्रम की गाथा से हमें अपने देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने का पाठ पढ़ाते हैं। और ऐसे ही महामानवों की अमर गाथाओं को अपने गीत संगीत से ओजस्वी बना दिया है गीतकार भरत व्यास और संगीतकार वसन्त देसाई ने। सप्त सुरों के साधक थे वसन्त देसाई और अद्भुत शब्दों के जादूगर थे भरत व्यास, जिनके सुरीले गीत-संगीत से सजे कई धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्में। ’सम्राट पृथ्वीराज चौहान’ ऐसी ही एक फ़िल्म है। इस फ़िल्म में मन्ना डे और साथियों का गाया देशभक्ति गीत "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" श्लोकांश पर आधारित है। "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है, इसके वास्ते ये तन है, मन है और प्राण है..."। अन्तिम हिन्दू सम्राट, पृथ्वीराज चौहान की वीरता और अदम्य साहस का चित्रण इस फ़िल्म में किया गया है, और इस गीत के मुखड़े से पहले शुरुआती पंक्ति भी सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बलिदान की ओर ही इशारा करती है - "मातृभूमि के लिए जो करता अपने रक्त का दान, उसका जीवन देवतुल्य है, उसका जन्म महान"।

"जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है" गीत राग भूपाली पर आधारित है। राग भूपाली, कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। संगीत के ग्रन्थों में यह राग भूप या भोपाली नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। राग भूपाली औड़व जाति का राग है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का पहला प्रहर इस राग के गायन-वादन का समय होता है। अब आप राग भूपाली में पिरोया यह मधुर फिल्मी गीत सुनिए जिसे सुनते हुए मन में देशभक्ति की लहरें उमड़ने लग जाती हैं। गीत के शुरुआती भाग में राजमहल में राजऋषि युद्ध पर जा रहे अपने राजा (सम्राट पृथ्वीराज चौहान) के मस्तक पर शुभकामनाओं और आशिर्वाद का तिलक लगाते हुए गीत को प्रार्थना के रूप में गा रहे हैं। कोरस में सम्राट (अभिनेता जयराज) और उनकी रानी (अनीता गुहा) उनकी पंक्तियों को दोहरा रहे हैं। दूसरे और तीसरे अन्तरों में सम्राट स्वयम् घोड़े पर युद्ध पर जाते हुए इस गीत को आगे बढ़ाते हैं।




गीत : “जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है...” : फ़िल्म: सम्राट पृथ्वीराज चौहान , गायक: मन्ना डे, साथी


कुमार गंधर्व
रात्रि के प्रथम प्रहर में गाने-बजाने के लिए उपयुक्त राग भूपाली, कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसके आरोह और अवरोह में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। अर्थात यह औड़व-औड़व जाति का राग है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तकों के पहले भाग में होता है। इन्हीं स्वरों को यदि उत्तरांग प्रधान कर दिया जाय तो यह राग देशकार का स्वरूप बन जाता है। राग भूपाली और देशकार में एक सा ही स्वर प्रयोग किया जाता है, परन्तु वादी-संवादी स्वरों के बदल जाने से राग बदल जाता है। भूपाली में वादी-संवादी क्रमशः गान्धार और धैवत होता जबकि देशकार में धैवत और गान्धार हो जाता है। राग भूपाली में गान्धार और पंचम स्वर पर न्यास होता है, किन्तु धैवत पर कभी भी न्यास नहीं होता, जबकि राग देशकार में पंचम, धैवत और तार सप्तक के षडज पर न्यास होता है, किन्तु गान्धार स्वर पर कभी भी न्यास नहीं होता। दोनों रागों में समान स्वर लगने के बावजूद पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान होने के कारण दोनों रागों में अन्तर हो जाता है। राग भूपाली के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव करने के लिए आइए, अब हम इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ कुमार गंधर्व से सुनते हैं। तीनताल में निबद्ध इस खयाल रचना के बोल हैं, “मोरा ध्यान मन्दिल रा ...”। आप यह बन्दिश सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


गीत : ख़याल- “मोरा ध्यान मन्दिल रा...” : गायक: कुमार गंधर्व 



अपनी बात

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कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
"जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है": राग भूपाली : स्वरगोष्ठी – 505 : SWARGOSHTHI – 505 : RAG BHUPALI: 14 मार्च, 2021



रविवार, 7 मार्च 2021

"आ अब लौट चलें": राग काफ़ी : स्वरगोष्ठी – 504 : SWARGOSHTHI – 504 : RAG KAFI

        



स्वरगोष्ठी – 504 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 8 

"आ अब लौट चलें...", राग काफ़ी का वलय और मनमोहक ऑरकेस्ट्रेशन




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की सात कड़ियों में राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण और जोगिया पर आधारित आठ देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की आठवीं कड़ी में राग काफ़ी पर आधारित एक फ़िल्मी रचना। और साथ में राग काफ़ी में एक ठुमरी ग़ुलाम अली की आवाज़ में।


मुकेश, लता, शैलेन्द्र, शंकर-जयकिशन (PC:hamaraphotos.com)
राज कपूर 
 की कालजयी फ़िल्म ’जिस देश में गंगा बहती है’। फ़िल्म की कहानी डाकुओं को समाज की मुख्य धारा में मिलाने के प्रयास की कहानी है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स् में राजु (राज कपूर) डाकुओं को आत्मसमर्पण करने के लिए मनवा लेता है और इस दृश्य के लिए एक गीत का प्रयोग किया जाता है। ढलान के एक तरफ़ राजु डाकुओं के साथ चल रहा है, और दूसरी तरफ़ है फ़िल्म की नायिका (पद्मिनी) जो पुलिस लेकर आ रही है। इस सिचुएशन पर शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन ने एक ऐसे ज़बरदस्त गीत की रचना की कि वह उस समय तक के सर्वाधिक "महंगे" गीतों में से एक था। 100 से ऊपर वायलिन, विशाल कोरस और वाद्यवृन्द के साथ "आ अब लौट चलें, नैन बिछाये, बाहें पसारे, तुझको पुकारे देश तेरा" की रिहर्सल शुरू हुई। गीतकार शैलेन्द्र के पुत्र दिनेश शंकर शैलेन्द्र जी बताते हैं कि इतने सारे साज़िन्दों को बिठाने के लिए ’फ़ेमस तारदेव स्टुडियो’ में जगह नहीं होती थी, इसलिए कुछ साज़िन्दों के बैठने का इन्तज़ाम स्टुडियो के बाहर किया जाता था। इस गीत में प्रयुक्त शास्त्रीय राग पर हम थोड़ी देर में आते हैं, पहले उल्लेख इसके ऑरकेस्ट्रेशन का। गीत शुरू होता है वायलिन और ब्रास के टुकड़ों से, गीत की भूमिका बंधती है। शोर भरा संगीत अचानक पिज़िकातो की सुरीली धुनों में बदल जाता है। पिज़िकातो दर‍असल किसी तार वाद्य के तारों को बिना धनुष (bow) के छेड़ने को कहा जाता है। पिज़िकातो, मैन्डोलिन और गिटार के साथ मुकेश की सीधी सुरीली आवाज़ में गीत शुरू होता है "आ अब लौट चलें..."। मुखड़े के तुरन्त बाद बढ़ती हुई पुलिस फ़ौज के दृश्य के साथ पद्मिनी के गले से लता मंगेशकर की अद्भुत पुकार "आजा रे, आ जा रे, आ जा..."। और यही हिस्सा गीत को एक अलग ही मुकाम पर पहुँचा देता है। इस तरह का प्रयोग फिर कभी किसी ने शायद ही किया होगा। हर अन्तरे के बाद लता जी द्वारा ऊँची पट्टी पर "आ जा रे" इस गीत की सबसे विशिष्ट बात है, जिसे हम गीत का X-factor भी कह सकते हैं। कुल 6 मिनट 12 सेकण्ड की अवधि होने के बावजूद मुकेश के गाये शैलेन्द्र के सरल पर गहरे बोल, लता मंगेशकर का अनोखा ऊँचा आलाप, कोरस का निरन्तर गायन और आकर्षक ऑरकेस्ट्रेशन गीत में श्रोताओं का उत्साह अन्त तक बनाये रखता है। गीत के अन्तिम चरण में राज कपूर और पद्मिनी एक दूसरे को देख लेते हैं, पुलिस डाकुओं को निहत्था जान लेती है, और एक लम्बे संगीत के साथ गीत समाप्त हो जाता है। ’स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंक में "जाने वाले सिपाही से पूछो" गीत की चर्चा करते समय कोरस द्वारा काउन्टर मेलडी गाने का उल्लेख किया गया था। कोरस गायन की लगभग वैसी ही शैली ’जिस देश में गंगा बहती है’ के इस गीत में भी सुनने को मिलता है।

अब आते हैं "आ अब लौट चलें" गीत के शास्त्रीय संगीत के पक्ष की ओर। पूरे गीत में राग काफ़ी का एक वलय महसूस किया जा सकता है। मुख्य रूप से "आ अब लौट चलें" पंक्ति में काफ़ी के गुण स्पष्ट रूप से अनुभव किए जा सकते है। इन्टरल्युड संगीत, कोरस वाले हिस्सों और लता मंगेशकर की ऊँची आलाप वाले हिस्सों को अगर अलग रखा जाए तो पूरा गीत ही काफ़ी की छाया लिए हुए है। हालांकि राग काफ़ी के स्वरों में ग कोमल होता है, जो मुकेश की गायी पंक्तियों में सुनी जा सकती है, लता जी के आलाप और कोरस वाले जगहों पर "ग" कहीं शुद्ध और कहीं कोमल सुनाई देता है, जिस वजह से ये हिस्से विशुद्ध काफ़ी नहीं है। सच्चाई यह है कि काफ़ी कई रूप में पाये जाते हैं। विवादी स्वरों से इस राग का दूषण होता चला आया है जो अब सामान्य बात हो गई है। इस तरह के दूषण की वजह से काफ़ी एक तरह से मिश्र काफ़ी बन गया है। काफ़ी का विशुद्ध रूप बहुत कम ही सुनाई देता है। "आ अब लौट चलें" पूरे गीत में कहरवा ताल का प्रयोग हुआ है। राग काफ़ी की चर्चा आगे बढ़ाने से पहले फ़िल्म ’जिस देश में गंगा बहती है’ का यह गीत सुन लिया जाए!



गीत : “आ अब लौट चलें...” : फ़िल्म: जिस देश में गंगा बहती है, गायक: मुकेश, लता मंगेशकर, साथी


ग़ुलाम अली
राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली की गायी राग काफ़ी में एक ठुमरी, जिसके बोल हैं "लागे ना मोरा जिया..."। वैसे इस ठुमरी में राग भीम पलासी और बरवा का अनुभव भी किया जा सकता है। यह रचना निबद्ध है   ताल में।



गीत : ठुमरी - “लागे ना मोरा जिया...” : गायक:ग़ुलाम अली 



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कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
"आ अब लौट चलें..." : राग काफ़ी : SWARGOSHTHI – 504 : RAG KAFI: 7 मार्च, 2021



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