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Sunday, May 8, 2016

राग भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 269 : RAG BHIMPALASI






स्वरगोष्ठी – 269 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 2 : लता और मदन भैया का साथ

‘नैनों में बदरा छाए बिजली सी चमके हाय ऐसे में सजन मोहे गरवा लगाए...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर पिछले अंक से शुरू हुई हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का भी सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की और फिर उस राग की जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हमने राग भीमपलासी में उनका स्वरबद्ध किया, फिल्म ‘मेरा साया’ का एक गीत चुना है। इस गीत को पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। इस गीत को चुनने का एक कारण यह भी है कि फिल्म जगत में मदन मोहन और लता मंगेशकर की भाई-बहन की जोड़ी विख्यात रही है। इस जोड़ी ने संगीत-प्रेमियों को अनेक मधुर गीतों का उपहार दिया है। आज हम राग भीमपलासी पर आधारित इसी जोड़ी का तैयार किया एक गीत फिल्म ‘मेरा साया’ से चुन कर प्रस्तुत कर रहे हैं। इस गीत के साथ ही राग का स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में राग भीमपलासी की एक बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 



फ़िल्म-संगीत जगत में जब जोड़ियों की बात चलती है, या यूँ कहें कि जब गायक-संगीतकार जोड़ियों की बात की जाती है, तब लता मंगेशकर और मदन मोहन की जोड़ी का उल्लेख अवश्य होता है। इस जोड़ी ने एक से एक लाजवाब शास्त्रीय रचनाएँ हमें दी हैं, फिर चाहे वो शुद्ध हिन्दी के बोलों पर आधारित गीत हो या फिर ग़ज़लनुमा अन्दाज़ की कोई रचना। आज हम जिस रचना की चर्चा कर रहे हैं, वह 1964 की फ़िल्म ’मेरा साया’ से लिया गया है। राग भीमपलासी पर आधारित यह गीत है "नैनों में बदरा छाये, बिजली सी चमके हाय..."। लता मंगेशकर और मदन मोहन की जोड़ी की यह एक बेहद महत्वपूर्ण रचना है जिसे जितनी बार भी सुनें मन नहीं भरता। क्या बोल, क्या संगीत, क्या गायकी, क्या ऑरकेस्ट्रेशन, हर पहलू अद्वितीय, हर बात कमाल। इस गीत की ख़ास बात यह है कि अगर इसे यूँ ही उपर उपर सुना जाए तो कोई भी इसमें राग ढूँढ़ता रह जाएगा और गीत ख़त्म हो जाएगा, लेकिन बहुत ध्यान से सुनने पर पूरे गीत में भीमपलासी का छाया हुआ वलय महसूस किया जा सकता है। पहली पंक्ति में गान्धार और मध्यम का प्रयोग हुआ है और "ऐसे में बलम मोहे" में कोमल निषाद का खटका है। इसी टुकड़े में भीमपलासी राग से बाहर जाते हुए मदन मोहन ने कोमल धैवत का गज़ब का प्रयोग किया है।

मदन मोहन का संगीत जितना कोमल रहा है, उनकी बाहरी शख़्सियत उतनी ही कठोर थी। वो अपने अनुशासन में इतने दृढ़ थे कि वो अपने साज़िन्दों के बजाये हुए टुकड़े को गीत से हटवा तक देते थे अगर वो ठीक न बजाए या फिर अगर रेकॉर्डिंग पर वो देर से पहुँचे। ऐसा ही एक क़िस्सा हुआ "नैनों में बदरा छाए..." की रेकॉर्डिंग पर। इस गीत के रिहर्सल हो रहे थे और कुछ साज़िन्दे बार-बार एक जगह पर ग़लत बजा रहे थे, जिस वजह से लता जी को बार-बार गीत गाना पड़ रहा था। मदन जी के धैर्य की सीमा पार हो गई। वो इतने ज़्यादा उत्तेजित हो गए कि स्टुडियो के कन्ट्रोल रूम से रेकॉर्डिंग रूम तक (जहाँ साज़िन्दे बैठे थे) पहुँचने के लिए उन्होंने सामने का शीशा ही तोड़ डाला अपने हाथों से और अपने आप को लहूलुहान कर लिया। साज़िन्दे उनके इस रूप को देख कर घबरा गए। ग़ुस्से से तिलमिलाए हुए मदन मोहन ने हाथ पर पट्टी बाँधने से इनकार कर दिया, जब तक गाना ठीक तरीके से रेकॉर्ड नहीं हो गया। मदन मोहन की रचनाएँ उत्कृष्ट होने के बावजूद पुरस्कार उनसे हमेशा दूर ही रहा करते। 1964 में मदन मोहन को ’वो कौन थी’ के संगीत के लिए फ़िल्मफ़ेयर के लिए नामांकित किया गया, पर पुरस्कार चला गया लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को ’दोस्ती’ के लिए। 1966 में ’मेरा साया’ के लिए फिर उनका चयन हुआ ’गाइड’ और ’सूरज’ के साथ, पर फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका से मतभेद होने के बाद उनका नाम हटा दिया गया और उसकी जगह ’दो बदन’ फ़िल्म को शामिल कर लिया गया। पुरस्कार शंकर जयकिशन (’सूरज’) को मिला। मदन जी बहुत निराश हुए थे इस घटना से। फ़िल्मफ़ेयर ने भले उनके साथ नाइंसाफ़ी की हो, Cine Music Directors Award उन्हें कई बार प्राप्त हुए जिसका चयन केवल फ़िल्मी संगीतकार ही किया करते थे। जब अन्य संगीतकारों ने "नैनों में बदरा छाये..." गीत के लिए यह पुरस्कार उन्हें दिया, तो उन्होंने सभी संगीतकारों को अपने घर पर रात्रि-भोज पर बुलाया और अपने हाथों से खाना बना कर सभी को बड़े प्यार से खिलाया। यह उनका तरीक़ा था धन्यवाद कहने का। लीजिए, पहले आप यह गीत सुनिए।


राग भीमपलासी : नैनों में बदरा छाए...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – मेरा साया



राग ‘भीमपलासी’ भारतीय संगीत का एक ऐसा राग है, जिसमें भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ खिल उठती है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात आरोह में पाँच स्वर- सा, (कोमल), म, प, नि (कोमल), सां और अवरोह में सात स्वर- सां नि (कोमल), ध, प, म (कोमल), रे, सा प्रयोग किए जाते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। यह काफी थाट का राग है और इसका वादी और संवादी स्वर क्रमशः मध्यम और तार सप्तक का षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर मध्यम के स्थान पर पंचम का प्रयोग भी किया जाता है। भीमपलासी के गायन-वादन का समय दिन का चौथा प्रहर होता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में ‘भीमपलासी’ के समतुल्य राग है ‘आभेरी’। ‘भीमपलासी’ एक ऐसा राग है, जिसमें खयाल-तराना से लेकर भजन-ग़ज़ल की रचनाएँ संगीतबद्ध की जाती हैं। श्रृंगार और भक्ति रस की अभिव्यक्ति के लिए यह वास्तव में एक आदर्श राग है। आइए अब हम आपको इसी राग में कण्ठ संगीत का एक मोहक उदाहरण सुनवाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे राग भीमपलासी, तीनताल में निबद्ध एक मोहक बन्दिश प्रस्तुत कर रही हैं। आप इस रचना का रसास्वादन कीजिए और मुझे, आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : ‘जा जा रे अपने मन्दिरवा...’ विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 269वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 14 मई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 271वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 267 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – रागेश्री या रागेश्वरी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायक – मन्ना डे

इस बार की संगीत पहेली में चार प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी नई श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ का रसास्वादन कर रहे हैं। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे राग भीमपलासी पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



Sunday, February 28, 2016

राग नन्द : SWARGOSHTHI – 259 : RAG NAND


स्वरगोष्ठी – 259 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 7 : राग नन्द

कुमार गन्धर्व और मदन मोहन का राग नन्द





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की छ्ठी कड़ी में आज हम राग नन्द के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले हम आपको अप्रतिम संगीतज्ञ पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वरों में राग नन्द का एक खयाल सुनवाते हैं। इसके बाद इसी राग पर आधारित फिल्म ‘मेरा साया’ से मदनमोहन का संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर का गाया मधुर गीत भी प्रस्तुत करेंगे।


दो मध्यम अरु शुद्ध स्वर, आरोहण रे हानि,
स-प वादी-संवादी तें, नन्द राग पहचानि।

ज के अंक में हमने आपके लिए दोनों मध्यम स्वरों से युक्त, अत्यन्त मोहक राग ‘नन्द’ चुना है। इस राग को नन्द कल्याण, आनन्दी या आनन्दी कल्याण के नाम से भी पहचाना जाता है। यह कल्याण थाट का राग माना जाता है। यह षाडव-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसके आरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग नहीं होता। इसके आरोह में शुद्ध मध्यम का तथा अवरोह में दोनों मध्यम का प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम माना जाता है। यह राग कामोद, हमीर और केदार के निकट होता है अतः गायन-वादन के समय राग नन्द को इन रागों से बचाना चाहिए। राग नन्द से मिल कर राग नन्द भैरव, नन्द-भैरवी, नन्द-दुर्गा और नन्द-कौंस रागों का निर्माण होता है।

पण्डित कुमार गन्धर्व
राग नन्द की सार्थक अनुभूति कराने के लिए आज हम आपको पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में एक बन्दिश सुनवाएँगे। पण्डित कुमार गन्धर्व का जन्म आठ अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। जिन दिनों कुमार गन्धर्व ने संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 के बीच वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। कुमार गन्धर्व की सांगीतिक प्रतिभा की अनुभूति कराने के लिए अब हम आपको उनके प्रिय राग नन्द के स्वरों में एक बन्दिश सुनवाते हैं। तीनताल में निबद्ध इस खयाल के बोल हैं- “राजन अब तो आजा रे...”


राग नन्द : ‘राजन अब तो आजा रे...’ : पण्डित कुमार गन्धर्व 




राग नन्द में तीव्र मध्यम स्वर का अल्प प्रयोग अवरोह में पंचम स्वर के साथ किया जाता है, जैसा कि कल्याण थाट के अन्य रागों में किया जाता है। राग नन्द में राग बिहाग, कामोद, हमीर और गौड़ सारंग का सुन्दर समन्वय होता है। यह अर्द्ध चंचल प्रकृति का राग होता है। अतः इसमें विलम्बित आलाप नहीं किया जाता। साथ ही इस राग का गायन मन्द्र सप्तक में नहीं होता। इस राग का हर आलाप अधिकतर मुक्त मध्यम से समाप्त होता है। आरोह में ही मध्यम स्वर पर रुकते हैं, किन्तु अवरोह में ऐसा नहीं करते। राग नन्द में पंचम और ऋषभ स्वर की संगति बार-बार की जाती है। आरोह में धैवत और निषाद स्वर अल्प प्रयोग किया जाता है, इसलिए उत्तरांग में पंचम से सीधे तार सप्तक के षडज पर पहुँचते है।

लता मंगेशकर और मदन मोहन
भारतीय संगीत के इस बेहद मनमोहक राग नन्द के सौन्दर्य का आभास कराने के लिए अब हम आपको इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। लता मंगेशकर के सुरों और मदनमोहन के संगीत से सजे अनेक गीत कर्णप्रियता और लोकप्रियता की सूची में आज भी शीर्षस्थ हैं। इस सूची में 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘मेरा साया’ का एक गीत है- ‘तू जहाँ जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा...’। राजा मेंहदी अली खाँ की गीत-रचना को मदनमोहन ने राग नन्द के आकर्षक स्वरों पर आधारित कर लोचदार कहरवा ताल में ढाला है। मदनमोहन से इस गीत को राग नन्द में निबद्ध किये जाने का आग्रह स्वयं लता मंगेशकर जी ने किया था। न जाने क्यों, हमारे फिल्म-संगीतकारों ने इस मनमोहक राग का प्रयोग लगभग नहीं के बराबर किया। आप यह गीत सुनिए और राग नन्द के सौन्दर्य में खो जाइए। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। और हाँ, इस अंक की संगीत पहेली को हल करने का प्रयास करना न भूलिएगा।


राग नन्द : ‘तू जहाँ जहाँ चलेगा...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – मेरा साया 





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 259वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित गीत है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक और गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 5 मार्च, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 261वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 257 की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ के एक रागमाला गीत का एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – गौड़ सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक-गायिका – मन्ना डे और लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागी सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के सातवें अंक में हमने आपसे राग नन्द पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पास हर सप्ताह आपकी फरमाइशे आती हैं। हमारे कई पाठकों ने ‘स्वरगोष्ठी’ में दी जाने वाली रागों के विवरण के प्रामाणिकता की जानकारी माँगी है। उन सभी पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि रागों का जो परिचय इस स्तम्भ में दिया जाता है, वह प्रामाणिक पुस्तकों से पुष्टि करने का बाद ही लिखा जाता है। यह पुस्तकें है; संगीत कार्यालय, हाथरस द्वारा प्रकाशित और श्री वसन्त द्वारा संकलित और श्री लक्ष्मीनारायण गर्ग द्वारा सम्पादित ‘राग-कोष’, संगीत सदन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित और श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’ तथा आवश्यकता पड़ने पर पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’। हम इन ग्रन्थों से साभार पुष्टि करके ही आप तक रागों का परिचय पहुँचाते हैं। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Saturday, September 19, 2015

"झुमका गिरा रे बरेली के बज़ार में..." - बड़ी रोचक है इस गीत के बनने की कहानी


एक गीत सौ कहानियाँ - 66

 

'झुमका गिरा रे बरेली के बज़ार में...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 66-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’मेरा साया’ के सुपरहिट गीत "झुमका गिरा रे बरेली के बज़ार में..." के बारे में जिसे आशा भोसले ने गाया था।


फ़िल्मी गीतों में शहरों के नाम की परम्परा पुरानी है। हर दशक में बहुत से फ़िल्मी गीत ऐसे बने जिनमें शहरों के नामों का उल्लेख हुआ है। जहाँ तक भारतीय शहरों के नामों का सवाल है, तो शायद सबसे ज़्यादा बम्बई या मुंबई नगरी का ज़िक्र फ़िल्मी गीतों में हुआ है। बम्बई या मूम्बई पर बनने वाले अनगिनत गीतों में कुछ उल्लेखनीय गीत हैं "ये है बम्बई नगरिया तू देख बबुया" (डॉन), "ये है बॉम्बे मेरी जान"(सी.आइ.डी), "ये बम्बई शहर हादसों का शहर है"(हादसा), "बम्बई से आया मेरा दोस्त"(आपकी ख़ातिर), "बम्बई से आया बाबू चिनन्ना" (बम्बई का बाबू), "बम्बई शहर की चल तुझको सैर करा दूँ"(पिया का घर), "बम्बई शाम के बाद हसीं कुछ और ही हो जाती है"(सरकारी मेहमान) आदि। इसी तरह से दिल्ली पर भी कई गीत बन चुके हैं। उत्तर प्रदेश के शहरों में फ़िल्म 'चौदहवीं का चाँद’ में "यह लखनऊ की सरज़मीं" गीत ख़ासा उल्लेखनीय है; बनारस पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा "ओ खईके पान बनारस वाला"(डॉन)। ताज महल की ख़ातिर आगरा शहर भी कई बार गीतों में जगह पाया है। यू.पी का एक और शहर जिसे कई गीतों में सुना गया, वह है बरेली। बरेली का ज़िक्र पहली बार शायद 1942 की फ़िल्म ’दि रिटर्ण ऑफ़ तूफ़ान मेल’ के एक गीत में हुआ था जिसके बोल थे "मेरा बालम गया है बरेली रे..." जिसे गाया बृजमाला ने, लिखा इन्द्र चन्द्र ने और स्वरबद्ध किया ज्ञान दत्त ने। बरेली वाले कुछ और गीत हैं "वो तो बांस बरेली से आया, सावन में ब्याहन आया"(दहेज), "सुरमा बरेली का, काजल है देहली का" (जलवा), "मेरी दुल्हन बरेली से आई रे" (मेहन्दी), "झुमका बरेली वाला कानो में ऐसा डाला, झुमके ने ले ली मेरी जान" (किस्मत), "आगरे से आई हो या आई बरेली से, पूछ लेंगे जाके हम आपकी सहेली से" (दिल की बाज़ी), "न्यू डेल्ही में बरेली जैसा स‍इयाँ" (U Me Aur Hum), और बरेली के ज़िक्र वाला जो सबसे ज़्यादा मशहूर गीत रहा वह है फ़िल्म ’मेरा साया’ का "झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में"। बरेली के बाज़ार से मतलब है वहाँ के बड़ा बाज़ार इलाके का जो मुग़ल काल से बहुत मशहूर रहा है। इसी गीत से प्रेरित हाल की फ़िल्म ’आजा नचले’ के शीर्षक गीत के शुरुआती पंक्ति में कहा गया है कि "मेरा झुमका उठा के लाया रे यार वे, जो गिरा था बरेली के बाज़ार में"। बरेली के बाज़ार में झुमका गिरने का अर्थ बरेली वासी कुछ यूं बताया करते हैं कि वहाँ की गलियाँ इतनी तंग हैं कि आते जाते लोगों में कभी कभार धक्का लग जाने की वजह से कभी कभी कान के झुमके गिर जाते हैं। पर ’मेरा साया’ के गीत में झुमका गिरने की कहानी कुछ और ही थी।

Harivanshrai & Teji Bachchan
अब सवाल यह है कि "झुमका गिरा रे" गीत में बरेली के बाज़ार का ज़िक्र क्यों आया जबकि फ़िल्म की कहानी या पार्श्व में दूर दूर तक बरेली का ज़िक्र नहीं, ताल्लुख नहीं? बड़ी दिलचस्प है इसके पीछे की कहानी। दरसल बात उन दिनों की है जब दादा बच्चन, यानी कि मशहूर साहित्यकार हरिवंशराय बच्चन, और तेजी जी एक दूसरे के नज़दीक आ रहे थे। दोनों के बेच प्रेम का बंधन बंध रहा था। तो ऐसे में इन दोनो की मुलाक़ात होती थी मशहूर साहित्यकार निरंकार देव जी के घर पर और निरंकार देव जी रहते थे बरेली में। जब एक दिन दोनों से यह पूछा गया कि भाई बात क्या है, इतने दिन हो गए, अब यह स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि तुम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हो, एक दूसरे के लिए जो प्रेम है उसका निवेदन क्यों नहीं कर देते, तब एक दिन जब तेजी जी और हरिवंश जी ने एक दूसरे से प्रेम की बात को कुबूल किया तो एकाएक तेजी के मुख से निकल गया "मेरा झुमका खो गया रे बरेली के बाज़ार में"। उन्होंने यूं ही कह दिया होगा कि बरेली में आकर वो हरिवंशराय जी से मिल कर अपना सुध बुध खो बैठीं हैं, यानी कि झुमका गिर गया हो और उन्हें ख़बर तक नहीं हुई। और यही बात उन दिनों हिन्दी साहित्य जगत में ख़ूब चर्चा में आ गई। अब इत्तेफ़ाक़ देखिये इस क़िस्से से राज मेहन्दी अली ख़ाँ साहब भी अच्छे तरह से वाक़िफ़ थे। तो जब ’मेरा साया’ के गीत लिखने की बारी आई तो उन्हें अचानक यह क़िस्सा याद आ गया और उन्होंने गीत में हीरोइन के झुमके को बरेली में ही गिरा दिया। है ना बड़ा ही अनोखा और रोचक क़िस्सा। 

Shamshad Begum
इस गीत से जुड़ा एक और दिलचस्प बात यह है कि यूं तो इस गीत की रचना राजा मेहन्दी अली ख़ाँ और मदन मोहन ने साल 1966 में की थी, पर यह उनकी मौलिक रचना नहीं है। इस गीत के बनने से क़रीब 20 साल पहले 1947 में एक फ़िल्म बनी थी ’देखो जी’ के नाम से, जिसमें वली साहब ने बिल्कुल ऐसा ही एक गीत लिखा था जिसके बोल थे "झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में, होय झुमका गिरा रे, मोरा झुमका गिरा रे"। तूफ़ैल फ़ारूख़ी द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को गाया था शमशाद बेगम ने। यह बात और है कि ना तो यह फ़िल्म चली थी और ना ही यह गीत। फ़िल्म के ना चलने से इस गीत की तरफ़ किसी का नज़र नहीं गया, जबकि 20 साल बाद एक नए पैकेज में पिरोया हुआ गीत चल पड़ा और आज भी उतना ही लोकप्रिय है। शमशाद बेगम के साथ ऐसा एकाधिक बार हुआ है कि उनका गाया मूल गीत ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ जबकि बाद में उन गीतों को आधार बना कर बनने वाला नया गीत ख़ूब कामयाब हो गया। ’देखो जी’ के इस गीत के अलावा एक और गीत था "इन्ही लोगों ने ले ली ना दुपट्टा मेरा" जिसे उन्होंने 1941 की फ़िल्म ’हिम्मत’ में गाया था, जिसका लता मंगेशकर का गाया फ़िल्म ’पाक़ीज़ा’ का संस्करण ज़्यादा लोकप्रिय हुआ। इसी तरह से हाल में बनी 2011 की फ़िल्म ’Rockstar' का गीत "कतेया करूँ" भी शमशाद बेगम ने 1963 की पंजाबी फ़िल्म ’पिण्ड दी कुड़ी’ में गाया था जिसके संगीतकार थे हंसराज बहल। आशा भोसले का गाया "झुमका गिरा रे..." आपने हज़ारों बार सुना होगा, पर आज इस गीत से जुड़ी तमाम बातों को जानने के बाद इस गीत को सुनने का मज़ा दोगुना हो जाएगा यकीनन! आइए सुनते हैं फ़िल्म ’मेरा साया’ से "झुमका गिरा रे..."। 


फिल्म मेरा साया : "झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में..." : आशा भोसले : मदनमोहन : राजा मेंहदी अली खाँ 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, January 20, 2013

दिन के तीसरे प्रहर के कुछ मोहक राग



 

स्वरगोष्ठी-105 में आज
राग और प्रहर – 3

कृष्ण की बाँसुरी और राग वृन्दावनी सारंग 



‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों आपके इस प्रिय स्तम्भ में लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। गत सप्ताह हमने आपसे दिन के दूसरे प्रहर के कुछ रागों के बारे में चर्चा की थी। आज दिन के तीसरे प्रहर गाये-बजाये जाने वाले रागों पर चर्चा की बारी है। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न लगभग तीन बजे तक की अवधि के बीच का माना जाता है। इस अवधि में सूर्य की सर्वाधिक ऊर्जा हमे मिलती है और इसी अवधि में मानव का तन-मन अतिरिक्त ऊर्जा संचय भी करता है। आज के अंक में हम आपके लिए तीसरे प्रहर के रागों में से वृन्दावनी सारंग, शुद्ध सारंग, मधुवन्ती और भीमपलासी रागों की कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे।


सारंग अंग के रागों में वृन्दावनी सारंग और शुद्ध सारंग राग तीसरे प्रहर के प्रमुख राग माने जाते हैं। यह मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपनी प्रिय बाँसुरी पर वृन्दावनी सारंग और मेघ राग की अवतारणा किया करते थे। सारंग का अर्थ होता है मयूर और कृष्ण द्वारा दिन के तीसरे प्रहर वृन्दावन के कुंजों में अपने सखाओं के संग इस राग की अवतारणा की परिकल्पना के कारण ही वृन्दावनी सारंग नाम प्रचलन में आया होगा। वर्तमान में राग वृन्दावनी सारंग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-औड़व जाति के इस राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद, अर्थात दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। सामान्य परिवेश में इस राग का गायन-वादन दिन के तीसरे प्रहर में ही किया जाता है, परन्तु ग्रीष्म ऋतु की चरम अवस्था और वर्षा ऋतु का आहट देने वाले कजरारे मेघों के एकत्रीकरण के परिवेश का सार्थक चित्रण करने में भी राग वृन्दावनी सारंग पूर्ण समर्थ होता है। अब हम आपको राग वृन्दावनी सारंग में निबद्ध एक मध्य-द्रुत तीनताल की रचना बाँसुरी पर सुनवाते हैं। वादक हैं आश्विन श्रीनिवासन्।

राग वृन्दावनी सारंग : बाँसुरी - मध्य-द्रुत तीनताल की रचना : आश्विन श्रीनिवासन् 


दिन के तीसरे प्रहर अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न तक की अवधि का एक और राग है, शुद्ध सारंग। आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों, अर्थात औड़व-षाडव जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और धैवत स्वर तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित है। साथ ही आरोह में तीव्र मध्यम स्वर तथा अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। इस राग को कुछ संगीतकार कल्याण थाट से तो कुछ बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। आपको राग शुद्ध सारंग का एक मनमोहक उदाहरण सुनवाने के लिए एक बार फिर हमने बाँसुरी वाद्य का ही चयन किया है। विश्वविख्यात बाँसुरी-वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के प्रिय रागों में राग शुद्ध सारंग भी एक राग है। उन्हीं का बजाया राग शुद्ध सारंग का आकर्षक आलाप अब हम आपको सुनवाते हैं।

राग शुद्ध सारंग : बाँसुरी – आलाप : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


दिन के तीसरे प्रहर में ही गाया-बजाया जाने वाला एक और मधुर राग है, मधुवन्ती। इस राग के बारे में यह तथ्य प्रचलित है कि मैहर घराने के सुप्रसिद्ध सरोद-वादक उस्ताद अली अकबर खाँ ने कर्नाटक पद्यति के 29वें मेलकर्ता राग धर्मावती के आरोह से ऋषभ और धैवत को हटा कर इस राग को स्वरूप दिया। स्वयं उस्ताद अली अकबर खाँ, पण्डित रविशंकर और इनके शिष्यों ने इस राग को प्रचारित-प्रसारित किया। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। आरोह में कोमल गान्धार और तीव्र मध्यम तथा अवरोह में इन स्वरों के साथ शुद्ध धैवत और ऋषभ स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। अब हम आपको राग मधुवन्ती की एक मध्य लय की रचना सरोद पर ही सुनवाते है। वादक हैं, उस्ताद अली अकबर खाँ।

राग मधुवन्ती : सरोद – मध्यलय की गत : उस्ताद अली अकबर खाँ


तीसरे प्रहर में अधिकाधिक प्रयोग किया जाने वाला एक राग भीमपलासी है। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला भीमपलासी, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है। इसमें गान्धार व निषाद कोमल तथा अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है, किन्तु अवरोह में सभी सातों स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर तार सप्तक का षडज होता है। कुछ विद्वान वादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी करते हैं। आज के इस अंक में अब हम आपको राग भीमपलासी पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। 1966 में सुनील दत्त और साधना अभिनीत एक फिल्म ‘मेरा साया’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीत निर्देशक मदनमोहन ने राग भीमपलासी के सुरों में गीत- ‘नैनों में बदरा छाए...’ संगीतबद्ध किया था। गीतकार राजा मेंहदी अली खाँ के शब्दों को लता मंगेशकर के स्वरों का साथ मिला था। राग भीमपलासी पर आधारित इस फिल्मी गीत का आप रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : फिल्म – मेरा साया : ‘नैनों में बदरा छाए...’ : लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 105वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 103वें अंक में हमने आपको 1991 में बनी फिल्म ‘लेकिन’ से राग गूजरी अथवा गूर्जरी तोड़ी पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गूजरी या गूर्जरी तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हृदयनाथ और गायिका लता मंगेशकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। इन्हें पूरे दो अंक मिलते हैं। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दूसरे प्रश्न के आधे भाग का सही उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं .5 अंक। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने पहले प्रश्न का अधूरा उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं 1.5 अंक। जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग को तो सही पहचाना किन्तु गायक-गायिका को नहीं पहचान सके, अतः इन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का 

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए दिन के चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। आप हमारे आगामी अंकों के लिए आठवें प्रहर तक के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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