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Friday, May 13, 2016

रेडियो प्लेबैक ओरिजिनल - तुमको खुशबू कहूं कि फूल कहूं या मोहब्बत का एक उसूल कहूं

प्लेबैक ओरिजिनलस् एक कोशिश है दुनिया भर में सक्रिय उभरते हुए गायक/संगीतकार और गीतकारों की कला को इस मंच के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने की.

रेडियो प्लेबैक ओरिजिनल की  श्रृंखला में वर्ष २०१६ में हम लेकर आये हैं , उभरते हुए गायक और संगीतकार "आदित्य कुमार विक्रम" का संगीतबद्ध किया हुआ और उनकी अपनी आवाज में गाया हुआ गाना. इस ग़ज़ल के रचनाकार हैं हृदयेश मयंक ने...



तुमको खुशबू कहूं कि फूल कहूं
या मोहब्बत का एक उसूल कहूं

तुम हो ताबीर मेरे ख़्वाबों की  
इक हसीं ख़्वाब क्यों फ़िजूल कहूँ  

तुम तो धरती हो इस वतन की दोस्त 
कैसे चन्दन की कोई धूल कहूँ 

जितने सज़दे किए थे तेरे लिए 
इन दुआओं की हो क़बूल कहूँ

आदित्य कुमार विक्रम वरिष्ठ कवि महेंद्र भटनागर  के गुणी सुपुत्र हैं.

वर्तमान में आदित्य जी मुंबई में अपनी पहचान बनाने में प्रयासरत हैं.

रेडिओ प्लेबैक इण्डिया परिवार की शुभकामनाएं आपके साथ हैं.

श्रोतागण सुनें और अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अपने विचार पहुंचाएं. 



Saturday, April 14, 2012

आज छुपा है चाँद - नया ओरिजिनल - वरिष्ठ कवि पिता और युवा संगीतकार पुत्र की संगीतमयी बैठक


कवि महेंद्र भटनागर 
दोस्तों लीजिए पेश है वर्ष २०१२ का एक और प्लेबैक ओरिजिनल. ये गीत है वरिष्ठ कवि मेहन्द्र भटनागर का लिखा जिसे स्वरबद्ध किया और गाया है उन्हीं के गुणी सुपुत्र कुमार आदित्य ने, जो कि एक उभरते हुए गायक संगीतकार हैं. सुनें और टिप्पणियों के माध्यम से सम्न्बधित फनकारों तक पहुंचाएं.

गीत के बोल -


नभ के किन परदों के पीछे आज छिपा है चाँद ?


मैं पूछ रहा हूँ तुमसे ओ
नीरव जलने वाले तारो !
मैं पूछ रहा हूँ तुमसे ओ
अविरल बहने वाली धारो !


सागर की किस गहराई में आज छिपा है चाँद ?
नभ के किन परदों के पीछे आज छिपा है चाँद ?

मैं पूछ रहा हूँ तुमसे ओ
मन्थर मुक्त हवा के झोंको !
जिसने चाँद चुराया मेरा
उसको सत्वर भगकर रोको !
नयनों से दूर बहुत जाकर आज छिपा है चाँद ?
नभ के किन परदों के पीछे आज छिपा है चाँद ?

मैं पूछ रहा हूँ तुमसे ओ
तरुओ ! पहरेदार हज़ारों,
चुपचाप खड़े हो क्यों ? अपने
पूरे स्वर से नाम पुकारो !
दूर कहीं मेरी दुनिया से आज छिपा है चाँद !
नभ के किन परदों के पीछे आज छिपा है चाँद ?
संगीतकार गायक कुमार आदित्य 







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