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Saturday, June 2, 2018

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71

हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

"मैं नागन तू सपेरा..." 




रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक। आइए आज 70 के दशक से इस सफ़र को आगे बढ़ाते हैं। प्रस्तुत है इस लेख की दूसरी व अन्तिम कड़ी।



वाक् फ़िल्म निर्माण के शुरुआती चार दशकों में नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली फ़िल्मों में नज़र दौड़ाते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि जहाँ 50 के दशक तक इस तरह के विषयवस्तु की पौराणिक या स्टण्ट फ़िल्में दर्शकों में बेहद लोकप्रिय हो जाया करती थीं, वहाँ 60 के दशक में ऐसी बहुत सी फ़िल्में फ़्लॉप होने लगी। दर्शकों की रुचि में बदलाव, बदलता दौर और बदलती पीढ़ी का असर नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली पौराणिक और फ़ैन्टसी फ़िल्मों में पड़ने लगी। 70 के दशक में पहली फ़िल्म बनी 1971 में ’नाग पूजा’ शीर्षक से। 1962 में ’नाग देवता’ और 1966 में ’नाग मन्दिर’ निर्देशित करने का अनुभव रखने वाले निर्देशक शान्तिलाल सोनी को ’नाग पूजा’ निर्देशित करने का मौका दिया गया। उधर अभिनेत्री इंदिरा भी सांपों की फ़िल्मों में काफ़ी काम कर चुकी थीं। इस फ़िल्म में उनके साथ पी. जयराज, सुजीत कुमार, संजना, मोहन चोटी आदि कलाकार थे। फ़िल्म के निर्माता को बदलते दौर और दर्शकों के मिज़ाज का अंदाज़ा नहीं था और यह फ़िल्म बुरी तरह पिट गई। फ़िल्म के गीत-संगीत ने भी कोई कमाल नहीं दिखा सका। उषा खन्ना के संगीत में भरत व्यास और इरशाद के लिखे अधिकतर भक्ति रचनाओं की तरफ़ श्रोताओं ने ध्यान नहीं दिया। जिस फ़िल्म से सही मायने में नाग-नागिन की परम्परा हिन्दी फ़िल्मों में शुरू हुई, वह थी 1953 की फ़िल्म ’नाग पंचमी’। निरुपा रॉय अभिनीत यह फ़िल्म ख़ूब चली थी। इसके लगभग 20 साल बाद, 1972 में दोबारा इसी शीर्षक से निर्माता एन. डी. कोठारी ने एक पौराणिक फ़िल्म बनाने का निश्चय किया। निर्देशक के रूप में पौराणिक फ़िल्मों के जानेमाने निर्देशक बाबूभाई मिस्त्री को चुना गया। फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं श्री भगवान, मन्हर देसाई, वत्सला देशमुख, उमा दत्त, जयश्री गडकर, पृथ्वीराज कपूर, शशिकला, आशिष कुमार, जयश्री टी आदि ने। फ़िल्म की कहानी राजकुमारी बेहुला और महादेवी मनसा की पौराणिक कथा पर आधारित थी। नागलोक पर राज करने वाली महादेवी मनसा को पता चलता है कि वो भगवान शिव जी और माता पार्वती की पुत्री हैं। वो उनसे मिलने जाती हैं और उन्हें पता चलता है कि पूरी मानव जाति शिव जी के पूरे परिवार की पूजा करती है। जब महादेवी मनसा ने भी शिव जी से यह इच्छा जतायी कि उनकी भी पूजा हो, तब शिव जी ने उनसे कहा कि इसके लिए वो पहले महाराज चन्द्रधर से आज्ञा ले आए। महादेवी मनसा महाराज चन्द्रधर के पास जाती हैं लेकिन उन्हें पूजे जाने की आज्ञा नहीं ले पातीं। ग़ुस्से में आकर वो चन्द्रधर के सभी पुत्रों का वध कर देती हैं। होश आने पर वो चन्द्रधर को एक पुत्र (लक्ष्मेन्द्र) का पिता बनने का मौका देती हैं, और यह उम्मीद भी करती हैं कि लक्ष्मेन्द्र चन्द्रधर का मन-परिवर्तन करने में सक्षम होगा और महाराज चन्द्रधर उसे पूजने लगेंगे। लक्ष्मेन्द्र बड़ा होता है और उसका विवाह राजकुमारी बेहुला से होता है। अब भी चन्द्रधर मनसा की पूजा करने से मना कर देते हैं जिसकी वजह से ग़ुस्से में आकर मनसा लक्ष्मेन्द्र का वध कर देती हैं। अपने मृत पति को पुनर्जीवित करने के लिए बेहुला चार धामों (जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, द्वारकाधीश, बद्रीनाथ) की यात्रा करती हैं, लेकिन मनसा उसे अंधा कर देती हैं और उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ देती हैं ताकि वो अपने निर्जीव पति को कभी जीवित ना कर सके। 70 के दशक में इस रंगीन पौराणिक फ़िल्म की चर्चा ज़रूर हुई थी लेकिन फ़िल्म ज़्यादा चली नहीं। संगीतकार रवि और गीतकार इंदीवर ने गीत-संगीत के पक्ष पर अच्छा काम ज़रूर किया था। लता मंगेशकर की आवाज़ में "ऐ नागिन जा बस अपने द्वारे, मेरे पिया मेरे प्राणों से प्यारे..." फ़िल्म के उस मोड़ पर आती है जब लक्ष्मेन्द्र (आशिष कुमार) और बेहुला (जयश्री गडकर) के सुहाग-रात के कमरे में नागकन्या नैनत्री (जयश्री टी) आकर अपने नाग-पति के मृत्यु का बदला लेने की धमकी देती है, जिसके नाग-पति को लक्ष्मेन्द्र की रथ के पहिए के नीचे कूचल कर मृत्यु प्राप्त हुआ था। बेहुला इस गीत के माध्यम से नैनत्री से क्षमा की भीख माँग रही है। 1973 में फिर एक बार शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग मेरे साथी’। सुजीत कुमार - संजना अभिनीत इस फ़िल्म का शीर्षक 1971 की फ़िल्म ’हाथी मेरे साथी’ से प्रेरित लगता है। संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी 70 के दशक के आते आते प्रतियोगिता में पिछड़ चुके थे। भरत व्यास के शुद्ध हिन्दी आधारित गीतों की क़द्र करने वाले लोग फ़िल्म जगत में कम ही रह गए थे। इस फ़िल्म के गीतों में भरत व्यास और एस. एन. त्रिपाठी ख़ास कमाल नहीं दिखा सके, और यह उनकी नाग-नागिन की अन्तिम फ़िल्म सिद्ध हुई।

1954 की फ़िल्म ’नागिन’ के बाद अगर किसी नाग-नागिन की फ़िल्म को ब्लॉकबस्टर का दर्जा प्राप्त हुआ, तो वह थी 1976 की इसी शीर्षक से बनने वाली फ़िल्म। निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली ने नाग-नागिन को पौराणिक कथाओं से निकाल कर एक रहस्य और रोमांच से भरपूर थ्रिलर फ़िल्म में ले आए। अपने ज़माने के एक से एक बड़े अभिनेताओं को लेकर 1976 की यह फ़िल्म ’नागिन’ ज़बरदस्त कामयाब फ़िल्म साबित हुई, जिसने नाग-नागिन पर बनने वाले फ़िल्मों की धारा को एक नया मोड़, एक नया आयाम दे दिया। जीतेन्द्र और रीना रॉय इस फ़िल्म में इच्छाधारी नाग और नागिन की भूमिकाओं में नज़र आए, और इस मल्टी-स्टारर फ़िल्म में उनके साथ थे सुनील दत्त, फ़िरोज़ ख़ान, संजय ख़ान, विनोद मेहरा, रेखा, मुमताज़, योगिता बाली, कबीर बेदी, अनिल धवन, रणजीत, प्रेमा नारायण, प्रेम नाथ और अरुणा इरानी प्रमुख। ’नागिन’ की कहानी दिलचस्प थी। इच्छाधारी नाग-नागिन की जोड़ी मानव रूप में प्रेमालाप कर रहे हैं। जैसे ही नाग फिर से नाग रूप में परिवर्तित हो जाता है, शिकारियों के दल का एक सदस्य उसे गोली मार देता है यह सोच कर कि वो उन्हें काटने जा रहा है। इसके बाद नागिन (रीना रॉय) कैसे अपने नाग की मृत्यु का बदला लेती है, यही है इस फ़िल्म की कहानी। कहानी के अन्त में केवल विजय (सुनील दत्त) को नागिन ज़िन्दा छोड़ती है और नागिन को अहसास होता है कि वो ग़लत थी और उसके बदले की भावना ने बहुत सी ज़िन्दगियों को बरबाद कर दिया, ठीक वैसे जैसे उसकी ज़िन्दगी बरबाद हुई है। अन्त में नागिन मर जाती है और स्वर्ग में पहुँच कर वो अपने नाग से मिल जाती है। फ़िल्म ’नागिन’ के गीत संगीत ने भी ख़ूब धूम मचाई। वर्मा मलिक के लिखे गीत और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का संगीत ज़ररदस्त हिट रहा। लता और महेन्द्र कपूर का गाया "तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना, चाहे तेरे पीछे जग पड़े छोड़ना" फ़िल्म का थीम-सॉंग् है जिस पर इच्छाधारी नाग-नागिन गाते, नृत्य करते, प्रेमालाप करते नज़र आते हैं। फ़िल्म के अन्य गीत भी मशहूर रहे, पर वो नाग-नागिन पर नहीं फ़िल्माये गए। 1979 में ’नागिन और सुहागन’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई थी जिसकी तरफ़ किसी का ख़ास ध्यान नहीं गया। फिर एक बार यह शान्तिलाल सोनी निर्मित व निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें विजय अरोड़ा और रीता भादुड़ी नायक-नायिका की भूमिकाओं में नज़र आए। इस फ़िल्म की कहानी भी लगभग उन्हीं पौराणिक फ़िल्मों की कहानियों जैसी ही है जिनमें नागकन्या के पति की मृत्यु फ़िल्म के नायक के हाथों ग़लतीवश हो जाती है और फिर नागिन बदला लेना चाहती है। ’नागिन’ की तरह यह फ़िल्म बड़ी बजट की फ़िल्म नहीं थी, और यह फ़िल्म नहीं चली। उषा खन्ना के संगीत में कवि प्रदीप का लिखा आरती मुखर्जी का गाया एक गीत है "ओ पाताल के राजा, मेरा दुखड़ा सुन लो राजा..."। इस गीत में पाताल के राजा नागराज से विनती और शिकायत की जा रही है - "मुझ पर है नसीबा रूठा, मुझ पर दुख पर्वत टूटा, मेरे बसे बसाये घर को एक नाग लुटेरे ने लूटा"।

80 के दशक के प्रथमार्ध में नाग-नागिन पर कोई फ़िल्म नहीं बनी। फ़िल्म निर्माताओं को लगा होगा कि यह शैली अब पुरानी हो चुकी है जो दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट कर पाने में असमर्थ है। 1976 में ’नागिन’ के सुपरहिट होने के बावजूद जब 1979 में ’नागिन और सुहागन’ पिट गई, तब फ़िल्मकारों ने इस विषय से दूर रहने में ही भलाई समझी। बार बार एक ही तरह की वही नागिन का अपने मरे हुए नाग की मृत्यु का इन्तकाम जैसी कहानियों की फ़िल्मों से एकरसता आ गई थी। लेकिन 1986 में इस शैली में फिर एक बड़ा मोड़ आया जब निर्माता-निर्देशक हरमेश मल्होत्रा श्रीदेवी को लेकर आए ’नगीना’ में। फ़िल्म की नायिका रजनी, एक इच्छाधारी नागिन है, जो कुछ दुष्ट सपेरों से अपने प्रेमी की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक साधारण नागरिक से शादी करती है। यह फ़िल्म उस वर्ष की सफलतम फ़िल्मों में से एक थी जिसने दुनियाभर में 130 मिलियन रुपये का कारोबार किया, और 1986 की दूसरी बड़ी फ़िल्म सिद्ध हुई (पहली फ़िल्म थी अमिताभ बच्चन की ’आख़िरी रास्ता’)। 1983-84 में श्रीदेवी तेज़ी से स्टारडम की सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही थीं। ’नगीना’ ने उन्हें पहली फ़ीमेल सुपरस्टार बना दिया और आज भी इस फ़िल्म में उनके अभिनय को उनकी श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। इस फ़िल्म में हर कलाकार ने अपने अपने चरित्र को बख़ूबी निभाया। फ़िल्म के नायक राजीव (ॠषि कपूर) और उनकी माँ (सुषमा सेठ) अपने महल समान घर में रहते हैं। राजीव और रजनी (श्रीदेवी) एक दूसरे से प्यार करते हैं और शादी कर लेते हैं, लेकिन जल्द ही बिजली टूट पड़ती है जब सपेरों का मुखिया भैरो (अमरीश पुरी) उनके घर आकर राजीव की माँ को ख़बर देते हैं कि रजनी दरसल एक नागिन है। बीन बजा कर भैरो रजनी को सम्मोहित कर सबके सामने नाचने पर मजबूर कर देता है और यह सिद्ध हो जाता है कि वो नागिन है। रजनी घर से भाग निकलती है पर भैरो उसे पकड़ लेता है। भैरो को रजनी से उस मणि का पता लगवाना है जिसके मिलने पर वो दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर सकता है। राजीव की मदद से रजनी भैरो ने चुंगल से बच निकलती है और सांपों के काटने से भैरो का अन्त होता है। राजीव और रजनी फिर ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करते हैं। आनन्द बक्शी के गीत और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का संगीत ज़बरदस्त हिट रहा। फ़िल्म के सभी पाँच गीत सुपरहिट। लेकिन सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना लता मंगेशकर का गाया "मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा, मैं नागन तू सपेरा" जो फ़िल्म के क्लाइमैक्स का हिस्सा था। इस गीत और नृत्य को बॉलीवूड के श्रेष्ठ ’स्नेक डान्स नंबर’ में गिना जाता है। इस गीत का शुरुआती बीन संगीत भी यादगार रहा है। श्रीदेवी के नृत्य गीतों में यह शीर्ष पर विराजमान है और iDiva ने इसे "the stuff of movie legends" कह कर सम्मानित किया है। इस गीत से जुड़ा एक विवाद भी है। शुरू में इस गीत को अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था, लेकिन फ़िल्म के रिलीज़ से पहले इसे लता मंगेशकर से गवाया गया जो अनुराधा पौडवाल को "unethical" लगा। ख़ैर, हक़ीक़त यही है कि आज तक ’नगीना’ सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों में एक बहुत ऊंचा मकाम रखती है। 2013 में श्रीदेवी को फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार के तहत उनके ’नगीना’ और ’मिस्टर इंडिया’ में शानदार अभिनय के लिए एक विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह शायद इसलिए दिया गया क्योंकि 1987 और 1988 में फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार का आयोजन नहीं हुआ, जिस वजह से इन दोनों सालों की फ़िल्मों को पुरस्कृत नहीं किया जा सका था। अगर किया गया होता तो ’नगीना’ के लिए श्रीदेवी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के बहुत क़रीब होतीं। 1989 में ’नगीना’ की सीकुइल फ़िल्म बनी ’निगाहें’ जिसमें राजीव और रजनी की बेटी के रूप में फिर एक बार श्रीदेवी ही नज़र आईं और उनके नायक बने सनी देओल। यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की पहली सीकुइल फ़िल्म थी। हालांकि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर नाकामयाब रही, पर फ़िल्म के गीत-संगीत ख़ासा लोकप्रिय रहा। एक बार फिर आनन्द बक्शी और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के गीत सर चढ़ कर बोले। और ख़ास बात यह कि इस फ़िल्म में दो गीत सांपों की पार्श्व पर बने - अनुराधा पौडवाल का गाया "किसे ढूंढ़ता है पागल सपेरे, मैं तो सामने खड़ी हूँ तेरे" और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "खेल वही फिर आज तू खेला, पहले गुरु आया अब चेला", जो ’नगीना’ के "मैं तेरी दुश्मन..." का ही विस्तार है। गीत अन्तरे से ही शुरू होता है और मुखड़े पर आकर "मैं नागन तू सपेरा" से ख़त्म होता है। इस गीत और इस गीत पर श्रीदेवी के नृत्य को वह लोकप्रियता नहीं मिली जो "मैं तेरी दुश्मन" को मिली थी। समालोचक इसके दो कारण बताते हैं - पहला कारण, इस गीत को लता मंगेशकर से गवाया जाना चाहिए था, दूसरा कारण, इस गीत की कोरियोग्राफ़ी ’नगीना’ के कोरियोग्राफ़ी से कमज़ोर थी। 

’नगीना’ के बाद फिर एक बार फ़िल्मकारों में नाग-नागिन पर फ़िल्में बनाने की होड़ सी लग गई। 1988 में ’नागिन के दो दुश्मन’ शीर्षक से एक सी-ग्रेड फ़िल्म आई थी जिसमें जयश्री टी. ने अभिनय किया था। लक्ष्मी किरण फ़िल्म की संगीतकार थीं। 1989 में वी. मेनन निर्देशित फ़िल्म बनी ’तू नागन मैं सपेरा’ जो ’नगीना’ के गीत के मुखड़े से प्रेरित था। सोनिका गिल, सुमीत सहगल, श्रीप्रदा अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी भी ’नगीना’ की कहानी के इर्द-गिर्द घूमती ही महसूस हुई। अनवर उसमान का संगीत और महेन्द्र दहल्वी के गीत लोकप्रिय नहीं हुए। अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में "ओ सपेरे मेरे दुश्मन, तेरी दुश्मन हूँ मैं नागन, तूने मारा है मेरा साजन, तुझको मारेगी अब ये नागन" गीत कोई कमाल नहीं दिखा सकी। 1990 में कुल पाँच फ़िल्में बनीं नाग-नागिन पर।  श्रीदेवी को नागिन के रूप में देखने के बाद कई बड़े फ़िल्मकार और अभिनेत्रियों के मन में भी इस शैली की फ़िल्में बनाने और उनमें काम करने का विचार आया। सदाबहार अभिनेतेरी रेखा को लेकर फ़िल्म बनी ’शेषनाग’। फ़िल्म बड़ी बजट की थी और रेखा के अलावा इस फ़िल्म में जीतेन्द्र, ॠषि कपूर, मंदाकिनी, माधवी जैसे कलाकार थे। अमरीश पुरी की जगह दुष्ट सपेरे का किरदार इस फ़िल्म में डैनी ने निभाया। कहानी ’नगीना’ से अलग ज़रूर थी, लेकिन यह फ़िल्म ’नगीना’ जैसा कमाल नहीं दिखा पाया। आनन्द बक्शी - लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के गीतों में भी "छेड़ मिलन के गीत रे मितवा" (अनुराधा - सुरेश) के अलावा कोई भी गीत लोकप्रिय नहीं हुआ। रेखा के बाद उस दौर की एक और जानीमानी अभिनेत्री मीनाक्षी शेशाद्री ने भी नागिन की भूमिका निभाई ’नाचे नागिन गली गली’ फ़िल्म में। बी. के. जैसवाल के इस फ़िल्म में नायक बने नितिश भारद्वाज (जिन्होंने दूरदर्शन के ’महाभारत’ में श्रीकृष्ण का चरित्र निभाया था)। यह फ़िल्म भी ’नगीना’ के आगे टिक नहीं सकी। अनजान के गीत और कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत में फ़िल्म का एक ही गीत कुछ समय तक रेडियो पर गूंजता सुनाई दिया - "नाचे नागिन गली गली, तेरी याद में सजना गली गली" (साधना सरगम)। लेकिन फ़िल्म में दम नहीं था और लोगों ने बहुत जल्द इस फ़िल्म को भुला दिया। ’शेषनाग’ की सह-अभिनेत्री मंदाकिनी को मुख्य नागिन की भूमिका में भी उतारा गया था इसी साल। फ़िल्म ’राम तेरी गंगा मैली’ के स्टार कास्ट (राजीव कपूर, मंदाकिनी, रज़ा मुराद और विजेता पंडित) को लेकर रामकुमार बोहरा ने ’नाग नागिन’ बनाई, लेकिन फ़िल्म बुरी तरह असफल रही और साल की सबसे बड़ी फ़्लॉप फ़िल्म सिद्ध हुई। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और गीतकार संतोष आनन्द भी फ़िल्म को बचा नहीं सके। फ़िल्म का कविता कृष्णमूर्ति - नितिन मुकेश का गाया "मैं नाग तू नागिन, नहीं जीना तेरे बिन" में कोई नई बात नहीं थी और बीन संगीत भी वही जाना पहचाना ’नगीना’ शैली का। 80 के दशक तक नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों के शीर्षक में भी नाग-नागिन-नगीना का उल्लेख होता था। लेकिन 90 के दशक के आते-आते इस तरह के शीर्षक इतने ज़्यादा बार प्रयोग हो चुके थे कि अब फ़िल्मकार नाग-नागिन-सपेरे की कहानियों के शीर्षक साधारण फ़िल्मों के शीर्षक जैसे रखने लगे। 1990 में आमिर ख़ान - जुही चावला अभिनीत फ़िल्म आई ’तुम मेरे हो’। ’क़यामत से क़यामत तक’ के बाद आमिर-जुही की जोड़ी सर चढ़ कर बोल रही थी उन दिनों। ताहिर हुसैन (आमिर ख़ान के पिता) ने इस फ़िल्म को निर्देशित किया, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म असफल रही। सिर्फ़ कामयाब जोड़ी अगली फ़िल्म को भी कामयाब बना दे यह ज़रूरी नहीं। इस फ़िल्म में आमिर ख़ान शिवा नामक सपेरा है जिसे सांपों को वश में करने के जादूई शक्ति प्राप्त है। वो और पारो (जुही चावला) एक दूसरे से प्यार करते हैं दोनों के प्रभावशाली पिताओं की मर्ज़ी के ख़िलाफ़। उधर शिवा के पिता ने शिवा के बालपन में एक इच्छाधारी नागिन की हत्या कर दी थी जिस वजह से नागिन की माँ ने उससे बदला लेने का वचन लिया था। क्या नागिन शिवा को मार कर अपना वचन निभा पाती है, यही थी ’तुम मेरे हो की कहानी’। फ़िल्म फ़्लॉप होने के बावजूद ’क़यामत से क़यामत तक’ के गीतकार-संगीतकार जोड़ी मजरूह - आनन्द-मिलिंद ने सुरीले गीत रचे और फ़िल्म के गीत हिट हुए। हालांकि इसमें सांपों पर कोई गीत नहीं था, लेकिन "जब से देखा तुमको यारा" (उदित-अनुपमा), "जतन चाहे जो करले" (उदित-साधना), "शीशा चाहे टूट भी जाए" (उदित), "आसमां से गिरे खजूर पे अटके" (अनुराधा) जैसे गीत उस ज़माने में ख़ूब चले थे। 

1990 की एक और फ़िल्म थी ’दूध का कर्ज़’। सलीम अख़्तर की इस फ़िल्म में जैकी श्रॉफ़ और नीलम थे मुख्य भूमिकाओं में। फ़िल्म की कहानी नाग-नागिन की कहानी तो नहीं थी, लेकिन सांपों के पार्श्व पर ज़रूर थी। सपेरन पार्वती (अरुणा इरानी) अपने नवजात पुत्र सूरज (जैकी श्रॉफ़)के साथ अपने पति को तीन दरिंदों द्वारा चोरी के झूठे इलज़ाम पर पीट पीट कर मारते हुए देखा। पार्वती अपने पति की चिता की अग्नि को छू कर शपथ लेती है उन दरिंदों को उचित सज़ा दिलवाने की। वो सूरज और एक सांप को पालती है। धर्मा लोहार इसमें उनकी मदद करता है। बड़ा होने पर सूरज को रेशमा (नीलम) से प्यार हो जाता है जिसे वो एक सांप के काटने पर उसके ज़हर से बचाता है। जब पार्वती अपने पति के क़ातिल गंगु को मार कर अपना बदला पूरा करने का सोचती हैं, तब उसे पता चलता है कि सूरज की प्रेमिका रेशमा दरसल गंगु की ही बेटी है। आनन्द बक्शी और अनु मलिक की जोड़ी के रचे गीतों ने धूम मचा दी। हालांकि मोहम्मद अज़ीज़ और अनुराधा पौडवाल के गाए "तुम्हें दिल से कैसे जुदा हम करेंगे" और "शुरू हो रही है प्रेम कहानी" फ़िल्म के लोकप्रियतम गीत रहे, सांप और सपेरे पर भी दो गीत थे - "बीन बजाता जा सपेरे बीन बजाता जा, छम छम नाचती जाऊं मैं, तू मुझे नचाता जा" (अनुराधा) और "बीन बजाऊँ तुझे बुलाऊँ, तेरे बदले मैं मर जाऊँ"। 1989 में वी. मेनन ने ’तू नागन मैं सपेरा’ निर्देशित किया था जिसमें सुमीत सहगल नायक थे और सोनिका गिल व श्रीप्रदा नायिकाएँ थीं। 1991 में वी. मेनन ने सुमीत सहगल को ही नायक लेकर बनाई म्युज़िकल फ़िल्म ’नाग मणि’। नायिका के रूप में दिखीं शिखा स्वरूप। दुष्ट सपेरे और नाग मणि की तलाश के बीच नायक-नायिका की मधुर प्रेम कहानी वाली यह फ़िल्म कामयाब रही। फ़िल्म का सर्वाधिक शक्तिशाली पक्ष था इसका गीत-संगीत। अनु मलिक के संगीत में संतोष आनन्द के लिखे गीत बेहद लोकप्रिय हुए। टी-सीरीज़ और अनुराधा पौडवाल उन दिनों मेलडियस गीतों का पर्याय बन गए थे। यह फ़िल्म भी उन्हीं टी-सीरीज़ म्युज़िकल फ़िल्मों में से एक थी। बस अफ़सोस एक ही बात का है कि इस फ़िल्म में नाग-नागिन-सपेरे का कोई गीत नहीं था। 1991 में सलिल परिदा निर्मित व जग मुंध्रा निर्देशित फ़िल्म आई थी ’विषकन्या’ जो पूजा बेदी के बोल्ड दृश्यों की वजह से विवादों में घिर गई थी। यह फ़िल्म भी बदले की कहानी है। निशा (पूजा बेदी) अपने माता-पिता (कबीर बेदी - मुनमुन सेन) की मौत का बदला लेने के लिए एक तांत्रिक से सांप का ज़हर युक्त गोली खा कर विष कन्या बन जाती है। चर्चा में रहने के बावजूद दर्शकों के दिल को छू नहीं सकी यह फ़िल्म और बप्पी लाहिड़ी का संगीत और सैयद गुलरेज़ के गीत कोई कमाल नहीं दिखा सके। पाँच वर्षों के बाद 1996 में गौतम भाटिया निर्मित व निर्देशित कम बजट की फ़िल्म ’हसीना और नगीना’ आई जिसमें किरण कुमार और एकता सोहिनी मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म कब आई कब गई पता भी नहीं चला। दिलीप सेन - समीर सेन के संगीत में शोभा जोशी और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "मैं हूँ एक हसीना मैं हूँ एक नगीना" में पंक्ति है "नागिन सी बलखाके लहराऊंगी, छेड़ेगा मुझको तो डस जाऊंगी, मैं मार दूंगी या मर जाऊंगी, मैं आज हद से गुज़र जाऊंगी"।

21-वीं सदी आ गई। हालांकि इस नए दौर में नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम होती जा रही थी, सिलसिला पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई। वर्ष 2000 में दक्षिण की एक डब की हुई फ़िल्म हिन्दी में प्रदर्शित हुई ’एक वरदान नगीना’ शीर्षक से। साई किरण, प्रभाकर, प्रेमा और मल्लिकार्जुन राव अभिनीत यह फ़िल्म थी। 2002 की फ़िल्म ’जानी दुश्मन’ एक डार्क फ़ैन्टसी ऐक्शन फ़िल्म थी। इस मल्टी-स्टारर फ़िल्म में अक्षय कुमार, अरमान कोहली, मनीषा कोयराल, सनी देओल, सुनील शेट्टी, आफ़ताब शिवदासानी, शरद कपूर, सोनू निगम और अरशद वारसी जैसे कलाकार थे। जहाँ तक सांपों की बात है, फ़िल्म की एक नायिका दिव्या (मनीषा कोयराला) को पिछले जनम की बातें याद आती हैं कि उस जनम में वो कपिल (अरमान कोहली) नामक इच्छाधारी नाग से प्यार करती थी। जब इस जनम में दिव्या का कुछ लोग बलात्कार करते हैं जिस वजह से वो आत्महत्या कर लेती है, तब कपिल पुनर्जीवित हो उठता है और इच्छाधारी नाग के शक्तियों से बदला लेता है। 2004 में एक फ़िल्म प्रद्रशित हुई थी ’हत्या’ जिसमें अक्षय कुमार थे। दरसल यह फ़िल्म बहुत पहले की बनी हुई थी, जिसे बरसों बाद 2004 में रिलीज़ कर दिया गया। इस फ़िल्म में अक्षय कुमार को एक इच्छाधारी नाग में परिणत होते हुए दिखाया गया। फ़िल्म में नायिका थीं वर्षा उसगाँवकर और संगीतकार थे नदीम-श्रवण। 2008 में ’Heaven on Earth' शीर्षक से दीपा मेहता की एक कनाडियन फ़िल्म आई थी जिसे भारत में ’विदेश’ शीर्षक से प्रदर्शित की गई थी। प्रीति ज़िंटा और वंश भारद्वाज अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी सीधे सीधे सांप की कहानी तो नहीं है, लेकिन नायिका, जिसने बचपन में नाग-नागिन की एक लोकगाथा सुन रखी होती है, उसे शादी के बाद ससुराल में अत्याचारी पति के दुर्व्यवहार की वजह से बार बार बचपन में सुनी हुई वह सांप की लोक-कथा याद आती रहती है, जो उसके जीवन को प्रभावित करती है। हिन्दी फ़िल्मों में सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की श्रॄंखला 2010 में जा कर ख़त्म हो जाती है फ़िल्म ’हिस्स्स’ से। यह एक ऐडवेंचर-हॉरर फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था Jennifer Chambers Lynch ने। वही जानी-पहचानी इच्छाधारी नागिन की कहानी, लेकिन इस बार एक नए आधुनिक अंदाज़ में पेश की गई जिसमें मुख्य किरदार मल्लिका शेरावत ने निभाई। फ़िल्मों के तकनीकी विकास के साथ-साथ कई असंभव दृश्यों को दिखाना अब आसान काम हो गया था। इस फ़िल्म में मल्लिका शेरावत के इंसान से नागिन बनने का दृश्य बड़ा डरावना दिखाई देता है। अनु मलिक के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म के गीत भी आधुनिक शैली के रहे। "मैं नागिन तू सपेरा" में ना उलझ कर अबकि बार है "I got that poison" (श्वेता पंडित) और "I have been here before" (श्रुति हासन) जैसे गीत।

वर्तमान दशक में अभी तक बॉलीवूड में कोई भी फ़िल्म सांपों के पार्श्व पर नहीं बनी है। इस तरह से 1933 में ’ज़हरी सांप’ से जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह 2010 में ’हिस्स्स’ तक आकर रुक गया। लेकिन जब जब इस तरह की फ़िल्मों की बात चलेगी, तब जो तीन फ़िल्में सबसे पहले याद आएंगी, वो हैं ’नागिन’ (1954), 'नागिन’ (1976), और 'नगीना’ (1986)।


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Saturday, March 4, 2017

चित्रकथा - 8: 2017 के प्रथम दो महीनों की फ़िल्मों का संगीत


अंक - 8

2017 के प्रथम दो महीनों की फ़िल्मों का संगीत

साजन आयो रे, सावन लायो रे...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

देखते ही देखते वर्ष 2017 के दो महीने बीत चुके हैं। फ़िल्म-संगीत की धारा, जो 1931 में शुरु हुई थी, निरन्तर बहती चली जा रही है, और इस वर्ष भी यह सुरीली धारा रसिकों के दिलों से गुज़रती हुई, उथल-पुथल करती हुई बहे जा रही है। आइए आज ’चित्रकथा’ में आज चर्चा करें इन दो महीनों, यानी जनवरी और फ़रवरी 2017, में प्रदर्शित हुई फ़िल्मों के गीत-संगीत की। आज ’चित्रकथा’ में प्रस्तुत है यह संगीत समीक्षा। 




22 अक्टुबर 2015 के दिन गायक लाभ जंजुआ की असमय मृत्यु ने फ़िल्म-संगीत जगत को एक बड़ा
लाभ जंजुआ
झटका दिया। "सोनी दे नख़रे सोनी लगदे", "लंदन ठुमकदा", "जी करदा भई जी करदा" जैसे सुअपर हिट गीतों को गा कर लाभ जंजुआ तेज़ी से सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे थे। पर यह सिलसिला देर तक चल नहीं सका। पर वर्ष 2017 की शुरुआत लाभ जंजुआ के गाए गीत "इश्क़ दा करेण्ट" से ही हुई। फ़िल्म का नाम ’प्रकाश इलेक्ट्रॉनिक्स’ जो प्रदर्शित हुई 6 जनवरी के दिन।  गीतकार-संगीतकार प्रवीण भारद्वाज ने उनसे यह गीत पहले ही रेकॉर्ड करवा लिया था। इस फ़िल्म में कुल चार गीत हैं, चार अलग रंगों के। लाभ जंजुआ के गाए इस थिरकाने वाले डान्स नंबर के बाद दूसरा गीत है गायक के.के की आवाज़ में "इश्क़ जो भी करे वो पागल"। हमेशा अपना लो-प्रोफ़ाइल इमेज रखने वाले के.के अपने गीतों से बोलते हैं। के.के. की आवाज़ में एक ताज़गी है, एक युवा-अपील है, एक आकर्षण है जो दिल को छू जाती है। वैसे तो इस तरह के गीत उन्होंने पहले भी बहुत गाए हैं, पर एक अन्तराल के बाद उनकी आवाज़ में इस गीत को सुनना एक सुखद अनुभव ही रहा। एक और गायक जो एक लम्बे अरसे के बाद सुनाई दिए, वो हैं कमाल ख़ान, जी हाँ, "अ ओ जानेजाना" वाले कमाल ख़ान। उनकी आवाज़ में "इश्क़ तेरी लीला न्यारी" में 90 के दशक की सुगन्ध है। जुदाई के दर्द से भीगा इस तरह का गीत आजकल फ़िल्मों में सुनाई नहीं देती। इसके लिए प्रवीण भारद्वाज का शुक्रिया। और फ़िल्म का अन्तिम गीत है "हबीबी" सुनिधि चौहान की आवाज़ में जिसके कम्पोज़िशन में अरबी रंग है और ऑरकेस्ट्रेशन में रॉक शैली भी है और बीच-बीच में अंग्रेज़ी रैप भी है। सुनिधि के इस तरह के गीत अनगिनत सुनने को मिले हैं, किसी और गायिका से गवाया जाना चाहिए था इसे।


13 जनवरी को प्रदर्शित हुई ’ओके जानु’। आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर के अन्तरंग केमिस्ट्री की
ए. आर. रहमान
वजह से चर्चा में बनी रहने वाली इस फ़िल्म में गुलज़ार साहब के लिखे गीत हैं और संगीतकार ए. आर. रहमान। इसलिए निस्संदेह इस फ़िल्म के गीतों से लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं। इस फ़िल्म में कुल आठ गीत हैं पर तीन गीतों को छोड़ कर बाकी गीतों की धुनें रहमान ने अपनी तमिल फ़िल्म ’ओ कादल कनमनी’ के गीतों से उठाया। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए दो नए गीत बनाए जो "ऐ सिनामिका" और "मलर्गल काएत्तें" के हिन्दी संस्करण हैं। ’ओके जानु’ ऐल्बम का पहला गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है जिसे ए. आर. रहमान और श्रीनिधि वेंकटेश ने गाया है। दूसरा गीत "परंधु सेला वा" के मशहूर हिन्दी संस्करण "हम्मा हम्मा" का कवर वर्ज़न है। मूल शब्द मेहबूब के हैं जिस पर रैपिंग् की है बादशाह ने। इस कवर वर्ज़न में आवाज़ रेमो फ़र्नन्दे की नहीं, बल्कि जुबिन नौटियाल, शाशा तिरुपति, बादशाह, तनिश्क बागची और ए. आर. रहमान की है। यह वर्ज़न ठीक ठाक बना है, पर रेमो वाले मूल गीत की बात ही अलग है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में "इन्ना सोणा क्यों रब ने बनाया" गुलज़ार साहब की रचना है। वैसे तो इसे नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ साहब की मूल रचना कही सकती है, समय-समय पर कई गीतकारों और संगीतकारों ने अपने हिसाब से इसे अपने गीतों में ढाल लिया है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में यह संस्करण बहुत ज़्यादा दिल को नहीं छूती। अगला गीत है "जी लें ज़रा" जो शायद इस ऐल्बम का सबसे अलग हटके गीत है। नीति मोहन, अर्जुन चंडी, सावित्री आर. पृथ्वी और ए. आर. रहमान की आवाज़ों में इस गीत में पुरुष आवाज़ों को धीमा रखा गया है, इसकी वजह है पुरुष आवाज़ों का स्वरमान मुलायम होने की वजह से इससे एक प्रतिध्वनित अंग दिया जा सका है। यह गीत हमें ’रॉकस्टार’ के "फिर से उड़ चला" और ’तमाशा’ के "सफ़रनामा" गीतों की याद दिला जाता है। अगला गीत "कारा फ़नकारा कब आए रे" गुलज़ार साहब का लिखा हुआ नहीं है, बल्कि इसे नवनीत विर्क, कैली, हार्ड कौर और एडीके ने लिखा है। रैप शैली का यह गीत कैली, हार्ड कौर, दिनेश कनगारत्नम, शाशा तिरुपति, अशिमा महाजन और पारोमिता दासगुप्ता ने गाया है। पाश्चात्य बीट्स और साज़ों पर आधारित यह गीत लिरिकल हिप-हॉप जौनर का गीत है और इस तरह के गीत साधारणत: हिन्दी फ़िल्मों में सुनाई नहीं देते। जोनिता गांधी और नकश अज़ीज़ की आवाज़ों में "साजन आयो रे, सावन लायो रे" एक अद्‍भुत शास्त्रीय संगीत आधारित वर्षाकालीन रचना है। गुलज़ार साहब को इसमें बहुत कुछ लिखने का मौका तो नहीं मिला, पर दो पंक्तियों का यह गीत इससे जुड़े सभी कलाकारों की प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। इसी तरह से गुलज़ार साहब का ही लिखा और शाशा तिरुपति का गाया "सुन भँवरा" भी एक शास्त्रीय संगीत आधारित रचना है, जो लेखन, संगीत और गायकी की दृष्टि से एक उत्कृष्ट रचना है। इन दो गीतों को सुन कर जैसे एक उम्मीद जाग उठा है कि अच्छे गीत-संगीत का दौर अभी समाप्त नहीं हुआ है। और ऐल्बम का अन्तिम गीत एक पारम्परिक रचना है "मौला वा सलीम" जिसे ए. आर. अमीन और ए. आर. रहमान ने गाया है।


13 जनवरी को एक और फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी - ’हरामखोर’। श्लोक शर्मा निर्देशित और नवाज़ुद्दीन
अनु मलिक
सिद्दिक़ी - श्रेता त्रिपाठी अभिनीत इस फ़िल्म को 15-वें न्यु यॉर्क इन्डियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल और इन्डियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल ऑफ़ लॉस ऐन्जेलिस में प्रदर्शित किया गया, और नवाज़ुद्दीन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला था। केवल 16 दिनों में तैयार इस फ़िल्म के संगीतकार हैं जसलीन रॉयल, जो एक गायिका हैं। उन्होंने इस फ़िल्म के लिए एक गीत कम्पोज़ किया और गाया, जिसके बोल हैं "किदरे जावाँ"। फ़ेस्टिवल फ़िल्म होने की वजह से आदित्य शर्मा के लिखे इस गीत को व्यावसायिक सफलता नहीं मिलेगी, पर संगीतकार के रूप में उभरने के लिए जसलीन को शुभकामनाएँ। 20 जनवरी को प्रदर्शित हुई ’कॉफ़ी विथ डी’। इस कमचर्चित और कम बजट की फ़िल्म में गीत लिखे समीर ने और संगीत दिया सुपरबिया ने। फ़िल्म का शीर्षक गीत अनु मलिक की आवाज़ में है। "एक गरम चाय की प्याली" से वो अब कॉफ़ी की तरफ़ रुख़ कर चुके हैं जब वो गाते हैं "बोलो क्या करूँ पीछे ख़ौफ़ है आगे मौत है खड़ी, तेरा काम है चक्का जाम है अपनी है फ़टी पड़ी, मैंने सोच ली, तू भी सोच ले, जी में दम है तो पी, कॉफ़ी विथ डी"। मस्ती भरे बोलों, मस्ती भरे संगीत और अनु मलिक के अंदाज़ की वजह से गीत झूमने पर मजबूर ज़रूर करता है। दूसरा गीत शबाब साबरी का गाया हुआ है; गीत नहीं बल्कि यह एक क़व्वाली है "अली अली हाजी अली"। बहुत सुन्दर कम्पोज़िशन और गायकी की तो बात ही कुछ है। तीसरा गीत शान का गाया हुआ है, "नेशन वान्ट्स टू नो", गीत आज के दौर की प्रवृत्तियों पर व्यंग का निशाना साधता है। अरनब गोस्वामी के मशहूर जुमले "दि नेशन वान्ट्स टू नो" का पंच लाइन लेकर देश में चल रहे मुद्दों को उजागर करता है यह गीत। और फ़िल्म का अन्तिम गीत एक सॉफ़्ट रोमान्टिक डुएट है शान और आकांक्षा शर्मा की आवाज़ों में "तुम्हारी मोहब्बत"। गीत कर्णप्रिय है पर इसमें कोई नई बात या एक्स-फ़ैक्टर नहीं है कि गीत एक लम्बे समय तक याद रहे।


गणतंत्र दिवस के सप्ताह दो महत्वपूर्ण फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। एक राकेश रोशन की ’काबिल’ और दूसरा
राजेश रोशन
शाहरुख़ ख़ान का ’रईस’। फ़िल्म के रिलीज़ डेट को लेकर विवाद खड़ा हुआ जब शाहरुख़ ख़ान ने जान बूझ कर इसे ’काबिल’ के साथ रिलीज़ करने का फ़ैसला लिया। इस वजह से राकेश रोशन ने अपनी फ़िल्म को 26 की जगह 25 को रिलीज़ करने का निर्णय लिया, पर शाहरुख़ ने भी फिर अपनी फ़िल्म को 25 में रिलीज़ करने की घोषणा कर दी। इस वजह से रोशन और ख़ान में एक द्वन्द छिड़ गया। ख़ैर, दोनों फ़िल्में 25 जनवरी को रिलीज़ हुईं। पहले करते हैं ’काबिल’ के गीतों की चर्चा। जब भी राकेश रोशन, राजेश रोशन और हृतिक रोशन की तिकड़ी साथ में आए हैं, हमें कुछ मधुर कर्णप्रिय गाने सुनने को मिले हैं। ’काबिल’ के गाने भी हमें निराश नहीं करते। इस फ़िल्म में तीन मौलिक गीत हैं और दो पुराने गीतों के कवर। फ़िल्म का शीर्षक गीत "मैं तेरे काबिल हूँ या तेरे काबिल नहीं"। नासिर फ़राज़ के लिखे तथा जुबिन नौटियाल व पलक मुछाल के गाए इस गीत में मेलडी है, सुन्दर बोल हैं, और राजेश रोशन का स्टाम्प भी है। गीत का संयोजन और बीट्स कुछ हद तक "आओ सुनाऊँ प्यार की एक कहानी" गीत जैसा है। हृतिक पर जुबिन नौटियाल की आवाज़ सुन्दर बन पड़ा है। इस गीत का एक सैड वर्ज़न भी है जुबिन की आवाज़ में। जुबिन नौटियाल की एकल आवाज़ में "कुछ दिन से मुझे तेरी आदत हो गई है" मनोज मुन्तशिर का लिखा गीत है। गीत का भाव ’कहो ना प्यार है’ के "क्यों चलती है पवन" गीत से मेल खाता है। हृतिक रोशन की फ़िल्म हो और उनका कोई धमाकेदार डान्स सीक्वेन्स ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। ’काबिल’ में भी "मोन आमोर" गीत को रखने का यही मक़सद था। विशाल ददलानी के गाए मनोज मुन्तशिर के लिखे इस थिरकते गीत को सुनते हुए हृतिक की तसवीर आँखों के सामने आ ही जाती है। यह गीत अगर हिट हुआ तो गीत की दृष्टि से नहीं बल्कि हृतिक के नृत्य की वजह से होगा। बाक़ी के दो गीत राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध 70 के दशक के दो गीतों का रिवाइवल है। पहला है "सारा ज़माना हसीनों का दीवाना", ’याराना’ फ़िल्म का गीत। अनजान के मूल बोलों में गीतकार कुमार ने नए बोल डाले हैं। गौरव-रोशिन ने इस संस्करण का संगीत तैयार किया है। ख़ास बात यह कि किशोर कुमार के गाए मूल गीत के इस संस्करण के लिए किसी पुरुष गायक नहीं बल्कि गायिका पायल देव को चुना गया। हाँ, रैपिंग् ज़रूर रफ़्तार ने किया है। मूल गीत से इस संस्करण की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि यह संस्करण एक क्लब रीमिक्स संस्करण है और दोनों अपनी अपनी जगह है। दूसरा गीत है ’जुली’ फ़िल्म का किशोर कुमार का गाया "दिल क्या करे जब किसी से किसी को प्यार हो जाए"। आनन्द बक्शी - राजेश रोशन के रचे मूल गीत को एक बार फिर कुमार और गौरव-रोशिन ने रीक्रिएट किया है। गायक जुबिन नौटियाल ने अच्छा निभाया है यह नया संस्करण है। 70 के दशक के गीत का 2010 के दशक में जो लिबास होना चाहिए, वैसा ही किया है पूरी टीम ने।


शाहरुख़ ख़ान की महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’रईस’ के गीत-संगीत की अब बात की जाए। ऐल्बम शुरु होता है
जावेद अख़्तर
सनी लियोन के आइटम नंबर से। इन्दीवर के लिखे और कल्याणजी-आनन्दजी के संगीतबद्ध किए फ़िल्म ’कुर्बानी’ के मशहूर गीत "लैला मैं लैला" गीत को रीक्रिएट किया गया है। पावनी पाण्डे की आवाज़ में संगीतकार राम सम्पथ और गीतकार जावेद अख़्तर ने इस गीत को नया जामा पहनाया है। जनता-जनार्दन को यह संस्करण पसन्द आई है। दूसरा गीत है "ओ ज़ालिमा" जिसे अरिजीत सिंह और हर्षदीप कौर ने गाया है। "गेरुआ" के बाद अरिजीत फिर एक बार शाहरुख़ की आवाज़ बने हैं। JAM8 के संगीत में बोल लिखे हैं अमिताभ भट्टाचार्य ने। इस गीत की ख़ास बात यह कि इसमें हारमोनियम का प्रयोग हुआ है और साथ ही अरिजीत सिंह ने ख़ुद इसमें अकोस्टिक गीटार बजाया है। तीसरे गीत "उड़ी उड़ी जाए दिल की पतंग" में आवाज़ें हैं सुखविन्दर सिंह, भूमि त्रिवेदी और करसन सर्गठिया की। जावेद अख़्तर के लिखे और राम सम्पथ के स्वरबद्ध किए इस गीत में गुजरात की लोक शैली है, और फ़िल्म ’हम दिल दे चुके सनम’ के "ढील दे ढील दे रे भैया" की याद दिला जाता है। करसन सर्गठिया के इन्टरल्युड में गुजराती बोल गीत को और भी ज़्यादा आकर्षक बनाते हैं। कुल मिलाकर एक सुन्दर लोक आधारित गीत। इस गीत में तापस रॉय का मैन्डोलिन सुनाई दिया। मिका सिंह की आवाज़ में मयूर पुरी का लिखा और अहीर का संगीतबद्ध गीत "धिंगाना धिंगाना" मस्ती भरा गीत है मिका के पहले के गीतों की ही तरह। फ़िल्म के बाहर इस गीत की क्या वजूद रह जाएगी कह नहीं सकते। राम सम्पथ और तरन्नुम मलिक की आवाज़ों में ’रईस’ का शीर्षक गीत "एनु नाम छे रईस" भी फ़िल्म की कहानी के अनुसार है जो फ़िल्म के बाहर शायद बहुत ज़्यादा ना सुना जाए । राम सम्पथ और हिरल ब्रह्मभट्ट ने गीत लिखा है। इस गीत के संगीत संयोजन में उइलियन पाइप का प्रयोग किया गया है जिसे बजाया है उलिक नेवेल ने। के.के. की आवाज़ में "साँसों के किसी एक मोड़ पर मिली थी तू ज़िन्दगी मेरी दोस्त बनके" एक संजीदा गीत है जिसे मनोज मुन्तशिर ने ख़ूबसूरत बोलों से सजाया है और अहीर ने भी सुन्दर कम्पोज़ किया है। के.के की इन्टेन्स गायकी ने गीत को अपने अंजाम तक पहुँचाया है। और फ़िल्म का अन्तिम गीत एक गुजराती पारम्परिक रचना है "घम्मर घम्मर" जिसे राम सम्पथ के संगीत संयोजन में रोशन राठौड़ ने गाया है। लोक शैली के फ़िल्मी गीतों में यह गीत एक लम्बे समय तक याद रहेगा।


जनवरी के बाद अब हम आ पहुँचे हैं फ़रवरी में। 10 फ़रवरी को ’जॉली एल एल बी 2’ प्रदर्शित हुई। 2013
सुखविन्दर सिंह
में आई ’जॉली एल एल बी’ कामयाब फ़िल्म थी जिसे बहुत से पुरस्कार मिले। अब इसके सीक्वील में अक्षय कुमार के आ जाने से इससे उम्मीदें और भी ज़्यादा बढ़ गईं। इस फ़िल्म में कुल चार गीत हैं और चारों गीत अलग अलग श्रेणी के हैं। पहला गीत "गो पागल" एक होली गीत है। फ़िल्म-संगीत के अन्य गीतों की तरह होली गीतों का अंदाज़ भी अब बदल चुका है। रफ़्तार, निन्दी कौर, गिरिश नाकोड और मंझ म्युज़िक के गाए इस गीत को लिखा है मंज म्युज़िक और रफ़्तार ने तथा इसमें संगीत दिया है मंज म्युज़िक और नीलेश पटेल ने। दूसरा गीत है "बावरा मन राह ताके तरसे से", जुबिन नौटियाल, नीति मोहन और रीक चक्रवर्ती की आवाज़ों में। जुनैद वसी के बोल और चिरन्तन भट्ट का संगीत। निस्सन्देह यह ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत है। चिरन्तन भट्ट के कीज़ और स्ट्रिंग्स अरेंजमेण्ट ने गीत को ख़ूबसूरत जामा पहनाया है। इस गीत ने अक्षय कुमार और हुमा क़ुरेशी के बीच की केमिस्ट्री को उजागर करने में मदद की है। तीसरा गीत है मीत ब्रदर्स का गाया व कम्पोज़ किया हुआ "जॉली गूड फ़ेलो"। मूल गीत "For He's A Jolly Good Fellow" का देसीकरण किया है गीतकार शब्बीर अहमद ने। कहा जाता है कि अक्षय कुमार ने अपनी बेटी को यह राइम गाते सुना और फिर उन्होंने फ़िल्म के निर्माता/निर्देशक को इस तरह का एक गीत तैयार करने का परामर्श दिया जो फ़िल्म के प्रोमोशन के लिए इस्तमाल में लाया जा सके। यह गीत फ़िल्म के मुख्य नायक के चरित्र और स्वभाव को उजागर करता है। और ऐल्बम का अन्तिम गीत एक भक्तिमूलक क़व्वाली है "ओ रे रंगरेज़ा" जिसे सुखविन्दर सिंह, मुतज़ा मुस्तफ़ा और क़ादिर मुस्तफ़ा ने गाया है। बहुत ही सुन्दर रचना और सुखविन्दर सिंह तो अपने हर गीत में चार चाँद लगाते ही हैं और यह क़व्वाली कोई व्यतिक्रम नहीं। 


17 फ़रवरी को कुल चार फ़िल्में प्रद्रशित हुईं, लेकिन एक भी बॉक ऑफ़िस पर टिक नहीं सकी। पहली
बप्पी लाहिड़ी
फ़िल्म है ’रनिंग् शादी डॉट कॉम’। अमित साध - तापसी पन्नु अभिनीत इस रोमान्टिक कॉमेडी फ़िल्म के मिजाज़ के मुताबिक गाने बनाए गए। ऐल्बम की शुरुआत होती है अभिषेक-अक्षय के संगीत में "प्यार का टेस्ट" गीत से जिसे बप्पी लाहिड़ी और कल्पना पटवारी ने गाया है। डिस्को बीट्स, बप्पी दा की आवाज़, कुल मिला कर जैसे 80 के दशक में पहुँच गए हम। कुछ मज़ेदार बोल हैं इस गीत में जैसे कि "तुम हमारे लुडो हो, हम तुम्हारे हैं चेस"। "मैनरलेस मजनूं" के स्ट्रिंग्स प्रील्युड हमें गीत की तरफ़ आकर्षित करता है और सुकन्या पुरकायस्थ अपनी शालीन गायकी से गीत को आगे बढ़ाती है। इन्हीं की आवाज़ थी "पानी दा रंग वेख के" में। "डिम्पी दे नाम भागे बंटी" एक मस्ती भरा शादी वाला पंजाबी बीट वाला गीत है, शेली के मज़ेदार बोल और एक बार फिर लाभ जंजुआ की जोशीली गायकी से गीत हमारे अन्दर थिरकन पैदा करती है। इस गीत को सुनते हुए यह अनुभव करना मुश्किल है कि अब लाभ हमारे बीच नहीं रहे। सनम पुरी और सोनू कक्कर का गाया "भाग मिल्की भाग" फ़िल्म के भाव से मिलता जुलता गीत है जिसे कीगन पिन्टो ने कम्पोज़ किया है। पिन्टो का अगला गीत "फ़रार" बेहतर है जिसमें जुबिन नौटियाल अपनी मोहक आवाज़ से इस आशावादी गीत को सुरीला अंजाम देते हैं। सॉफ़्ट रॉक का रंग भी इस गीत में सुनने को मिलता है। अनुपम रॉय और हंसिका अय्यर का गाया नर्मो नाज़ुक युगल गीत "मैं फ़रार सा" एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आता है जिसमें इन दो गायकों की आवाज़ ही गीत का मुख्य आकर्षण है। साथ ही रिदमिक बीट्स, गीटार और बंसुरी का सुन्दर संयोजन गीत की शोभा बढ़ाते हैं। जुबिन की आवाज़ में "कुछ तो है" का स्ट्रिंग्-सैक्सोफ़ोन संयोजन ने भी कमाल किया। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह ऐल्बम देसी बीट्स और पाश्चात्य प्रभाव का कॉकटेल है।


17 फ़रवरी की दूसरी फ़िल्म थी ’दि ग़ाज़ी अटैक’, पर इस फ़िल्म में कोई गीत नहीं था। तीसरी फ़िल्म थी
सुरेश वाडकर, साधना सरगम
’इरादा’। इस फ़िल्म में कुछ सुन्दर रचनाएँ हैं। गायक नीरज श्रीधर ने संगीतकार के रूप में फ़िल्म के चारों गीतों को स्वरबद्ध किया है। उनके बैण्ड ’बॉम्बे वाइकिंग्स’ ने इन्हें गाया है। ऐल्बम की शुरुआत "माही" से होती है; यह एक ऐसा गीत है जो दिल के करीब रहने वाले किसी के खो जाने के दर्द को साकार करता है। हर्षदीप कौर और शबद साबरी ने समीर अनजान के बोलों को सजीव कर देते हैं। लोक वाद्यों के प्रयोग से यह सूफ़ीयाना गीत और भी कर्णप्रिय बन पड़ा है और निस्संदेह यह ऐल्बम का सवश्रेष्ठ गीत है। दूसरा गीत फ़िल्म का शीर्षक गीत है जो बिल्कुल नीरज श्रीधर का फ़ोर्टे है। निखिल उज़गरे की सशक्त आवाज़ और रॉक शैली आधारित यह गीत एक प्रेरणादायक गीत है जो दृढ़ संकल्प के शक्ति को उजागर करता है। लेकिन इस गीत को बार-बार सुनने का मन नहीं होता। तीसरा गीत एक लोरी है; पापोन की आवाज़ में "चाँद रजाई ओढ़े" सुन कर आश्वस्त हुए कि फ़िल्मों से अभी पूरी तरह से लोरियाँ ग़ायब नहीं हुई हैं। यह लोरी सुनते हुए जैसे इससे जुड़ने लगते हैं। चौथा व अन्तिम गीत है "मित्रान दे" जो भंगड़ा बीट्स से शुरु तो होता है पर दिल को छू नहीं पाता। मास्टर सलीम, कौर बी और अर्ल एडगर का गाया यह गीत केवल क्लब्स में डान्स करने के लिए सटीक है। कुल मिला कर ’इरादा’ का ऐल्बम लम्बी रेस का घोड़ा नहीं है। 17 फ़रवरी की चौथी फ़िल्म थी ’चौहर’। कम बजट की फ़िल्म थी, कब आई कब गई पता भी नहीं चला। इस फ़िल्म में कुल चार गीत थे और उल्लेखनीय बात यह कि इनमें से दो गीतों में साधना सरगम और सुरेश वाडकर की आवाज़ें थीं। अश्विनी कुमार के संगीत में साधना सरगम का गाया गीत है "तुम जो मिले तो मिला सवेरा, किस्मत मेरी चमक उठी"। बिना अनर्थक साज़ों के कुंभ के यह सुरीला गीत हमें सुरीले दौर की याद दिलाते हैं। पर साधना सरगम की आवाज़ में कुछ कमी सी सुनाई दी है। दूसरा गीत सुरेश वाडकर की आवाज़ में है "पाप पराजित करे पुण्य को झूठ से हारे सच्चाई, न्याय पराजित अन्याय से कलयुग की यह सच्चाई, धर्म अधर्म से हारे, कोई माने या ना माने, राम जाने राम जाने"। सुधीर-सरबजीत के सुन्दर बोल और सुरेश जी की मोहक आवाज़ से गीत सुकून देता है। फ़िल्म के बाकी दो गीत "मुन्नी बदनाम हुई" के गायक ऐश्वर्य निगम की आवाज़ में है - "यार मिला है ऐसा दिलदार मिला है ऐसा" और "हम हैं भैया कमाल के"।


फ़रवरी के अन्तिम सप्ताह तीन फ़िल्में रिलीज़ हुईं - ’वेडिंग् ऐनिवर्सरी’, ’मोना डारलिंग्’ और ’रंगून’।
राशिद ख़ाँ
’वेडिंग् ऐनिवर्सरी’ के संगीतकार अभिषेक राय ने अच्छा काम किया है। राशिद ख़ाँ की आवाज़ में "आए बिदेसिया मोरे द्वारे, हम तो अपनी सुध-बुध हारे" शास्त्रीय संगीत आधारित गीत होते हुए भी पाश्चात्य संगीत का फ़्युज़न है। मानवेन्द्र का लिखा यह गीत इस कमचर्चित फ़िल्म का एक मुख्य आकर्षण है। उस पर नाना पाटेकर का अभिनय। गीत के इन्टरल्युड में अंग्रेज़ी बोल "द स्ट्रेन्जर कम्स नॉकिंग् ऑन द डोर" फ़्युज़न ईफ़ेक्ट को सहारा देते हैं। भूमि त्रिवेदी का गाया "आए सैयां मोरे द्वारे" की धुन "आए बिदेसिया" वाली ही है। भूमि ने एक बार फिर इस शास्त्रीय रचना में कमाल करती हैं। तीसरा गीत है "इत्तेफ़ाक़न जो मिले हैं हम यहाँ" अभिषेक राय और अमिका शैल की आवाज़ों में। एक नयापन है इस युगल गीत में। फ़िल्म हिट होती तो निस्सन्देह गीत चलता, पर अफ़सोस की बात! अभिषेक और भूमि की आवाज़ों में "द रेनबो सॉंग्’ एक जोशीला पाश्चात्य रीदम युक्त गीत है, पर "इत्तेफ़ाक़न" को यकीनन ज़्यादा अंक मिलते हैं। वैसे अभिषेक की आवाज़ को सुन कर इसे लम्बी रेस का घोड़ा जैसा लगता है। अन्तिम गीत है "धिनचक" अभिनन्दा सरकार की आवाज़ में। यह एक आइटम गीत है और इस तरह के अरबी शैली के आइटम गीत हम अनेकों बार सुन चुके हैं, कोई ख़ास बात नही! ’मोना डारलिंग्’ एक हॉरर-थ्रिलर फ़िल्म है, इसलिए गीतों की गुंजाइश नहीं। फ़िल्म का एकमात्र गीत "एक तलाश है ज़िन्दगी" सकीना ख़ान और वसुधा शर्मा ने गाया है। मनीष जे. टिपु का संगीत और समीर सतीजा के बोल। पार्टी नंबर, बस कुछ और नहीं!


फ़रवरी के अन्तिम सप्ताह, 24 तारीख को प्रदर्शित हुई विशाल भारद्वाज की ’रंगून’। जब जब गुलज़ार
गुलज़ार, विशाल भारद्वाज
और विशाल साथ में आए हैं, फ़िल्म और उसके गीतों में कमाल हुआ है। ’रंगून’ के साथ भी वही हुआ। इस फ़िल्म की कहानी और पार्श्व के अनुसार गाने स्वाधीनता-पूर्व समय के होने चाहिए। पहला गीत है "ब्लडी हेल", सुनिधि चौहान की आवाज़। यह एक पेप्पी ट्रैक है जिसमें कंगना रनौत नज़र आती हैं उस ज़माने की अभिनेत्री जुलिया के किरदार में। इस जौनर के बहुत गीत हैं पर जब भी ऐसे गीत पर गुलज़ार साहब के कलम चलते हैं, तब कुछ और ही कमाल होता है। इस गीत के बारे में कुछ न लिख कर बस इसे सुना जाना चाहिए। दूसरा गीत है "मेरे मियाँ गए इंगलैण्ड" जो "मेरे पिया गए रंगून" की धुन पर आधारित है। रेखा भारद्वाज ने अपनी आवाज़ को शमशाद बेगम की तरह नैज़ल कर लिया है इस गीत में। गीत में ऐडोल्फ़ हिटलर और विन्स्टन चर्चिल का उल्लेख है। तीसरा गीत है "जुलिया" जिसके साथ फ़िल्म में कंगना रनौत उर्फ़ जुलिया की एन्ट्री होती है। सुखविन्दर सिंह, के.के, कुणाल गांजावाला और विशाल भारद्वाज का गाया यह गीत सिचुएशनल गीत है। फ़िल्म के बाहर शायद इस गीत को ज़्यादा सुना ना जाए! एक लम्बे समय के बाद कुणाल की आवाज़ सुन कर अच्छा लगा। रेखा की आवाज़ में "एक दूनी दो, दो दूनी चार" भी एक मस्ती भरा गीत है। अभी तक इस फ़िल्म के जितने गीतों का ज़िक्र हमने किया, वो सब पेप्पी या सिचुएशनल गाने थे। इस फ़िल्म में कुछ कर्णप्रिय रोमान्टिक गाने भी हैं। अरिजीत सिंह की आवाज़ में "ये इश्क़ है" शाहिद कपूर और कंगना पर फ़िल्माया एक कामुक अभिव्यक्ति भरा गीत है। गीत के बोल शायद आम जनता को समझ ना आए क्योंकि गुलज़ार साहब ने इसमें भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग किया है। इसी गीत का रेखा भारद्वाज का गाया एक एकल संस्करण भी है। दोनों संस्करण अपनी अपनी जगह अपना कमाल दिखाता है। रेखा भारद्वाज, सुखविन्दर सिंह, सुनिधि चौहान और ओ.एस. अर्जुन का गाया "टिप्पा" को बस इसके बोलों की वजह से सुना जाना चाहिए। गुलज़ार साहब आख़िर गुलज़ार साहब हैं। आज भी वो साबित करते हैं कि उनका किसी से मुक़ाबला नहीं। "टप टप टोपी टोपी" वाला गीत याद है जो आपने कभी दूरदर्शन पर सुना होगा? यकीन मानिए यह गीत आपको उस बीते युग में ले जायेगी। दूसरी तरफ़ अरिजीत की आवाज़ में "अलविदा अलविदा तो नहीं" एक संजीदा व दर्द भरा गीत है। अरिजीत की आवाज़ में दो तरह के गीत ख़ूब उभरते हैं, एक कामुक, दूसरा दर्द भरा। हालाँकि इस तरह के गीत अब वो बहुत गा चुके हैं, यह गीत यक़ीनन उनके लिए ख़ास है क्योंकि यह गुलज़ार की रचना है। क्योंकि यह फ़िल्म 40 के दशक के पार्श्व की फ़िल्म है, इसके गीतों में उस ज़माने के ब्रिटिश प्रभाव से भरे संगीत का असर है। ऐल्बम के बाकी तीन गीत "बी स्टिल" और "शिमी शेक" उस दौर के रेट्रो शैली के अंग्रेज़ी गीत हैं।



आपकी बात


’चित्रकथा’ के पिछले अंक में हमने आपको गुज़रे ज़माने की अभिनेत्री आशालता बिस्वास पर उनकी पुत्री शिखा वोहरा से की गई बातचीत पेश की थी। इसके संदर्भ में हमारे पाठक श्रीदास गुरजर ने हमसे पूछा कि "हमीनस्तु" और "हमीनस्तो" में क्या अन्तर है और अगर अन्तर है तो इन दोनों शब्दों का क्या मतलब है। श्रीदास जी, सबसे पहले तो हम आपको यह बता दें कि "हमीनस्तो" और "हमीनस्तु" का एक ही अर्थ है। और यही नहीं इसे "हमीं अस्तु", "हमीं अस्तो", "हमीं अस्त" और "हमीनस्त" भी कहा जाता है। यह दरसल फ़ारसी (परशियन) शब्दावली है जिसका अर्थ है "यहीं है"। इसे लोकप्रियता मिली अमीर ख़ुसरौ के मशहूर शेर "गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त" से जो उन्होंने कशमीर के लिए कही थी। इसका अर्थ यह है कि अगर ज़मीं पर स्वर्ग कहीं है, तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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